Muslim Sex Stories सलीम जावेद की रंगीन दुनियाँ - Printable Version

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Muslim Sex Stories सलीम जावेद की रंगीन दुनियाँ - sexstories - 04-25-2019

फ्रेंड्स सलीम जावेद मस्ताना की कहानियों के बिना सेक्स कहानियो का संसार अधूरा है वैसे तो ये कहानियाँ हर साइट पर मिल जाएँगी लेकिन किसी ने भी कहानियों का क्रेडिट लेखक को नही दिया . इसीलिए मैं मस्ताना की कहानियो को उनके नाम से पोस्ट कर रहा हूँ आशा करता हूँ इससे सलीम जावेद मस्ताना जी को खुशी होगी . फ्रेंड्स इस सूत्र मे आपको इनकी ही कहानियाँ मिलेंगी . और आपको ज़रूर पसंद आएँगी 

सलीम जावेद की रंगीन दुनियाँ

लेखक==सलीम जावेद मस्ताना 


चौधराइन
भाग 1 - चौधराइन की दुनिया


हमारे गांव के चौधरी साहब की चौधराइन का नाम माया देवी है। माया देवी, प्रभावशाली व्यक्तित्व के अलावा एक स्वस्थ भरे-पूरे शरीर और की मालकिन भी हैं। अच्छे खान पान तथा मेहनती दिनचर्या से उनके बदन में सही जगहों पर भराव है । सुडौल मांसल बाहें उन्नत वक्ष, कमर थोड़ी मोटी सी, पर केले के खम्भों जैसी मोटी मोटी जांघे, भारी कूल्हे और नितम्बों के कारण बुरी न लग के मादक लगती हैं और पीछे से तो गुदाज पीठ के नीचे भारी कूल्हे थिरकते चूतड़ भी गजब ढाते हैं। सुंदर रोबदार चेहरा तेज तर्रार पर नशीली आंखे तो ऐसी जैसे दो बोतलें शराब पी रखी हो। वह अपने आप को खूब सजा संवार के रखती हैं। घर में भी बहुत तेज-तर्रार अन्दाज में बोलती हैं और सारे घर के काम वह खुद ही नौकरो की सहायता से करवाती हैं । उसने सारे घर को एक तरह से अपने कब्जे में कर रखा है। उसकी सुंदरता ने उसके पति को भी बांध कर रखा है। चौधरी शुरू से ही अपनी बीवी से डरता भी था। बीवी जब आई थी तो बहुत सारा दहेज ले के आई थी इसलिये उसके सामने मुंह खोलने में भी डरता है, बीवी शुरू से ही उसके ऊपर पूरा हुकुम चलाती थी। धीरे धीरे चौधरी ने घर के मामलों में जो थोड़ी बहुत टिका टिप्पड़ी वो करता थ वो भी बन्द कर सबकुछ उसे ही सौंप अपनी अलग दुनियां बना ली क्योंकि काम-वासना के मांमले में भी वह बीवी से थोड़ा उन्नीस ही पड़ता था सो अगर चौधराइन ने कभी हाथ धरने दे दिया तो ठीक नहीं तो गांव की कुछ अन्य औरतों से भी उसका टाँका था। माया देवी कुछ ज्यादा ही गरम लगती हैं। उसका नाम ऐसी औरतों में शामिल है जो पायें तो खुद मर्द के ऊपर चड़ जाये। गांव की लगभग सारी औरते उनको मानती हैं और कभी भी कोई मुसीबत में फँसने पर उन्हें ही याद करती है। चौधरी बेचारा तो बस नाम का ही चौधरी है असली चौधरी तो चौधराइन हैं।
गांव के वैद्यराज पन्डित सदानन्द पान्डे ने पन्डिताई और वैद्यगी करते करते थोड़ी जमीन जायदाद जोड़ छोटे मोटे जमींदार भी हो गये हैं एक तो पण्डितजी चौधराइन के गाँव के थे, दूसरे पन्डिताइन चौधरी साहब को अपना भाई मानती हैं ऊपर से पैसे और रहन सहन के मामले में दोनों का बराबर का होने की वजह से भी उनकी चौधरी परिवार से काफ़ी गाढ़ी छनती है। पाण्डे जी का का एक ही बेटा मदन है प्यार से सब उसे मदन कहते हैं। वो देखने में बचपन से सुंदर था, थोड़ी बहुत चंचल पर वैसे सीधा सादा लड़का है। वो चौधराइन को चाची कहता है उसका भी एक कारण है चौधराइन उससे कहती थी मुझे बुआ कहा कर पर उसकी पन्डिताइन माँ कहती थी चौधरी तेरे मामा और चौधराइन मामी हैं। बच्चे ने परेशान हो कर चाचा चाची कहना शुरू कर दिया क्यों कि गाँव के सब बच्चे चौधरी चौधराइन को चाचा चाची ही कहते थे । मदन से थोड़ी छोटी, चौधराइन की एक मात्र लड़की मोना थी। वो जब बड़ी हुई तो चौधराइन ने उसे शहर पढ़ने भेज दिया । देखा देखी पाण्डे जी को भी लगा की लड़के को गांव के माहौल से दूर भेज दिया जाये ताकि इसकी पढ़ाई लिखाई अच्छे से हो और गांव के लौंडों के साथ रह कर बिगड़ ना जाये। चौधराइन और सदानन्द ने सलाह कर के मोना और मदन दोनों को मदन के मामा के पास भेज दिया जो की शहर में रह कर व्यापार करता था।

दिन इसी तरह बीत रहे थे। चौधरी सबकुछ चौधराइन पर छोड़ बाहर अपनी ही दुनिया में अपने में ही मस्त रहते हैं। अगर घर में होते भी तो के सबसे बाहर वाले हिस्से जिसे मर्दाना कहते हैं और चौधराइन या अन्य कोई घर की औरत उधर नहीं जाती में ही रहते हैं वहीं वे अपने मिलने वालों और मिलने वालियों से मिलते हैं और दोस्तों के साथ हुक्का पीते रहते। चौधराइन का सामना करने के बजाय नौकर से खाना मंगवा बाहर ही खा लेते और वहीं सो जाते। 
आज चौधराइन ने पण्डितजी को खबर भेजी कि एक जरूरी बात बिचरवानी है जल्दी से आ जायें। पण्डितजी अपना काम समेट करीब साढ़े 11 बजे चौधराइन से मिलने चले ।
तकरीबन १२ बजे के आस पास जब चौधराइन माया देवी अपने पति चौधरी साहब से कुछ अपना दुखड़ा बयान कर रही थीं। तब तक पण्डित सदानन्द पाण्डे जी आ पहुँचे।
चौधरी साहब, “आओ सदानन्द! लो माया, आगया तुम्हारा भाई अब मेरा पीछा छोड़ जो पूछना है इससे पूछ ले। मुझे जरूरी काम से बाहर जाना है।”
यों बोल चौधरी साहब खिसक लिये।
माया देवी सदानन्द उसको देख कर खुश होती हुई बोली आओ सदानन्द भाई अच्छा किया आप जल्दी आ गये, पता नही दो तीन दिन से पीठ में बड़ी अकड़न सी हो रही है। पण्डित सदानन्द पाण्डे जी ने पोथी खोल के कुछ बिचारा और बोले “वायू प्रकोप है एक महीने चलेगा।”
“कोई उपाय पण्डितजी” माया देवी ने मुस्कुरा के पूछा।
पण्डित सदानन्द - “उपाय तो है अभिमन्त्रित(मन्त्रों से शुद्ध किये) तेल से मालिश और जाप पर ये सब मुझे अभी ही शुरू करना होगा।”
चौधराइन, “ठीक है”
पण्डितजी “एकान्त और थोड़े सरसों के तेल की व्यवस्था कर लें। ”
चौधराइन, “ठीक है।”
जाप क्या होना था, ये जो पण्डित सदानन्द पाण्डे जी हैं ये चौधराइन के पूराने आशिक हैं पण्डितजी और चौधराइन दोनों को अपने गन्दे दिमाग के साथ अभी भी पूरे गांव की तरह तरह की बाते जैसे कि कौन किसके साथ लगी है, कौन किससे फँसी है और कौन किसपे नजर रखे हुए है आदि करने में बड़ा मजा आता है। गांव, मुहल्ले की बाते खूब नमक मिर्च लगा कर और रंगीन बना कर एकदूसरे से बताने में उन्हें बड़ा मजा आता था। इसीलिये दोनो की जमती भी खूब है। इस प्रकार अपनी बातों और हरकतों से पण्डितजी और कामुक चौधराइन एक दूसरे को संतुष्टि प्रदान करते हैं।
हाँ तो फिर चौधराइन पण्डितजी को ले इलाज करवाने के लिये अपने कमरे में जा घुसी। दरवाजा बंद करने के बाद चौधराइन बिस्तर पर पेट के बल लेट गई और पण्डित सदानन्द पाण्डे जी उसके बगल में साइड टेबिल पर तेल की कटोरी रखकर खड़े हो गये। दोनो हाथों में तेल लगा कर पण्डितजी ने अपने हाथों को धीरे धीरे चौधराइन की कमर और पेट पर चलाना शुरु कर दिया था। चौधराइन की गोल-गोल नाभि में अपने उंगलियों को चलाते हुए पण्डितजी और चौधराइन की बातो का सिलसिला शुरु हो गया । चौधराइन ने थोड़ा सा मुस्कुराते हुए पुछा “और सुना सदानन्द, कुछ गांव का हाल चाल तो बता, तुम तो पता नही कहाँ कहाँ मुंह मारते रहते हो।”
पण्डितजी के चेहरे पर एक अनोखी चमक आ गई “अरे नहीं माया, मैं शरीफ़ आदमी हूँ हाल चाल क्या बताये गांव में तो अब बस जिधर देखो उधर जोर जबरदस्ती हो रही है, परसों मुखिया ने नंदु कुम्भार को पिटवा दिया पर आप तो जानती ही हो आज कल के लडकों को, मुखिया पड़ा हुआ है अपने घर पर अपनी टूटी टाँग ले के।”
चौधराइन “पर एक बात तो बता मैंने तो सुना है की मुखिया की बेटी का कुछ चक्कर था नन्दु के बेटे से।”
पण्डितजी “सही सुना है चौधराइन, दोनो मे बड़ा जबरदस्त नैन-मटक्का चल रहा है, इसी से मुखिया खार खाये बैठा था बड़ा खराब जमाना आ गया है, लोगों में एक तो उंच नीच का भेद मिट गया है, कौन किसके साथ घुम फिर रहा है यह भी पता नही चलता है,
चौधराइन “खैर और सुनाओ पण्डित, मैंने सुना है तेरा भी बड़ा नैन-मटक्का चल रहा है आज कल उस सरपंच की बीबी के साथ, साले अपने को शरीफ़ आदमी कहते हो ।”
पण्डितजी का चेहरा कान तक लाल हो गया था, चोरी पकड़े जाने पर चेहरे पर शरम की लाली दौड़ गई।
शरमाते और मुस्कुराते हुए बोले “अरे कहाँ चौधराइन मुझ बुड्ढ़े को कौन घास डालता है ये तो आप हैं कि बचपन की दोस्ती निभा रही हैं वैसे मुझे भी आपके मुकाबले तो कोई जचती नहीं ।”
पण्डितजी, ”उह बुड्ढ़ा और साले तू! परसों पण्डिताइन ने बताया था कि तू आधी रात तक उसे रौन्दता रहा था जब्कि उसी दिन दोपहर में मुझे पूरा निचोड़ चुका था साले तेरा बस चले तो गाँव की सारी जवान बुड्ढी सबको समूचा निगल जाये।“
ये सुन कर पण्डित सदानन्द ने पूरा जोर लगा के चौधराइन की कमर को थोड़ा कस के दबाया, गोरी चमड़ी लाल हो गई, चौधराइन के मुंह से हल्की सी आह निकल गई,
“आआह।” 
पण्डितजी का हाथ अब तेजी से चौधराइन की कमर पर चल रहा था। तेज चलते हाथों ने चौधराइन को थोड़ी देर के लिये भूला दिया की वो क्या पूछ रही थी। पण्डितजी ने अपने हाथों को अब कमर से थोड़ा नीचे चलाते हुए पेट तक फ़िर नाभि के नीचे तक पेटीकोट के अन्दर तक ले जाने लगे । इस प्रकार करने से चौधराइन की पेटीकोट के अन्दर नाभि के पास खुसी हुइ साड़ी धीरे धीरे बाहर निकल आई और फ़िर धीरे से पण्डितजी ने चौधराइन की कमर की साइड में हाथ डाल कर पेटीकोट के नाड़े को खोल दिया। चौधराइन चिहुंकी, सर घुमा के देखा तो पण्डितजी की धोती में उनका फ़ौलादी लण्ड फ़ुफ़्कार रहा था चौधराइन ने अपना मुंह फ़िर नीचे तकिये पर कर लिया पर धीरे से हाथ बढ़ाकर उनका साढ़े आठ इन्च का फ़ौलादी लण्ड धोती के ऊपर से ही थाम फ़ुसफ़ुसाते हुए बोलीं -
“खाल में रहो पण्डित अभी इतना टाइम नहीं है बहुत काम है।”
पण्डितजी ने सुनी अनसुनी सी करते हुए चौधराइन के पेटीकोट को ढीला कर उसने अपने हाथों से कमर तक चढ़ा दिया। पण्डितजी हाथों में तेल लगा कर चौधराइन के मोटे-मोटे चूतड़ों को अपनी हथेलीं में दबोच-दबोच कर मजा लेने लगे। माया देवी के मुंह से हर बार एक हल्की-सी आनन्द भरी आह निकल जाती थी। अपने तेल लगे हाथों से पण्डितजी चौधराइन की पीठ से लेकर उसके मांसल चूतड़ों तक के एक-एक कस बल को ढीला कर दिया था। उनका हाथ चूतड़ों को मसलते मसलते उनके बीच की दरार में भी चला जाता था। चूतड़ों की दरार को सहलाने पर हुई गुद-गुदी और सिहरन के करण चौधराइन के मुंह से हल्की-सी हँसी के साथ कराह निकल जाती थी। पण्डितजी के मालिश करने के इसी मस्ताने अन्दाज की माया देवी दिवानी थी। पण्डितजी ने अपना हाथ चूतड़ों पर से खींच कर उसकी साड़ी को जांघो तक उठा कर उसके गोरे-गोरे बिना बालों की गुदाज मांसल जांघो को अपने हाथों में दबा-दबा के मालिश करना शुरु कर दिया। चौधराइन की आंखे आनन्द से मुंदी जा रही थी। उनके हाथ से लण्ड छूट गया। पण्डित सदानन्द का हाथ घुटनों से लेकर पूरी जाँघों तक घुम रहे थे। जांघो और चूतड़ों के निचले भाग पर मालिश करते हुए पण्डितजी का हाथ अब धीरे धीरे चौधराइन की चूत और उसकी झांठों को भी टच कर रहा था। पण्डितजी ने अपने हाथों से हल्के हल्के चूत को छूना करना शुरु कर दिया था। चूत को छूते ही माया देवी के पूरे बदन में सिहरन-सी दौड़ गई थी। उसके मुंह से मस्ती भरी आह निकल गई। उस से रहा नही गया और पलट कर पीठ के बल होते हुए झपट कर उनका हलव्वी लण्ड थाम बोलीं “तु साला न मेरी शादी से पहले मानता था न आज मानेगा।”
“चौधराइन पण्डित वैद्य से इलाज करवाने का यही तो मजा है”
“चल, आज जल्दी निबटा दे मुझे बहुत सारा काम है”
“अरे काम-धाम तो सारे नौकर चाकर कर ही रहे है चौधराइन, जरा अच्छे से पण्डित से जाप करवा लो बदन हल्का हो जायेगा तो काम भी ज्यादा कर पाओगी।“
चौधराइन -“हट्ट साले आज मैं तेरे से बदन हल्का करवाने के चक्कर में नही पड़ती थका डालेगा साला मुझे । जाके पण्डिताइन का बदन हलका कर।”
चौधराइन ने अपनी बात अभी पूरी भी नही की थी और पण्डितजी का हाथ सीधा साड़ी और पेटीकोट के नीचे से माया देवी की चूत पर पहुंच गया था। चूत की फांको पर उंगलियाँ चलाते हुए अपने अंगुठे से हलके से माया देवी की चूत की पुत्तियों को सहला दिया। चूत एकदम से पनिया गई।”
चौधराइन ने सिसकारी ली “सीस्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्सई आआह शैतान।” 
अब चौधराइन अपनी पीठ के पीछे दो तीन मोटे बड़े तकियों की धोक लगा कर अधलेटी हो गईं जिससे छातियों पर से आंचल नीचे सरक गया। चौधराइन की साड़ी पेटीकोट पण्डितजी की हरकतों से जाँघों के ऊपरी हिस्से तक पहले ही सिमट चुका था उन्होंने अपनी जांघो को फ़ैला, और चौड़ा कर दिया फ़िर अपना एक पैर घुटनो के पास से मोड़ दिया। जिससे साड़ी पेटीकोट और सिमट कर कमर के आसपास इकट्ठा हो गया और दोनों फ़ैली जांघों के बीच झाँकती चूत पण्डितजी को दिखने लगी मतलब चौधराइन ने पण्डित सदानन्द को ये सीधा संकेत दे दिया कि कर ले अपनी मरजी की, जो भी करना चाहता है। बिस्तर की साइड में खड़े पण्डितजी मुस्कुराते हुए बिस्तर पर चढ़ आये और उनकी टाँगों के बीच घुटनों के बल बैठ गये इस कार्यवाही में उनका लण्ड चौधराइन के हाथों से निकल गया। चौधराइन की गोरी चिकनी मांसल टांगो पर तेल लगाते हुए पण्डितजी ने धीरे से हाथ बढ़ा चूत को हथेली से एक थपकी लगाई और चौधराइन की ओर देखते हुए मुस्कुरा के बोले
“पानी तो छोड़ रही हो मायारानी”
इस पर माया देवी सिसकते हुए बोली –“सीस्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्सई आआह! साले ऐसे थपकी लगायेगा तो पानी तो निकलेगा ही।“
पण्डितजी ने पुछा “क्या ख्याल है जाप पूरा करवाओगी चौधराइन।
चौधराइन ने पण्डित सदानन्द की तरफ़ घूर के देखा और उनका फ़ौलादी लण्ड झपटकर अपनी चूत की तरफ़ खीचते हुए बोलीं “पूरा तो करवाना ही पडेगा साले पण्डित अब जब तूने आग लगा दी है तो।”
चौधराइन के लण्ड खींचने से पण्डित अपना सन्तुलन सम्हाल नहीं पाये और चौधराइन के ऊपर गिरने लगे। सम्हलने के लिए उन्होंने चौधराइन के कन्धे थामें तो उनका मुँह चौधराइन के मुँह के बेहद करीब आ गया और लण्ड चूत से जा टकराया । बस पन्डित ने मुँह आगे बढ़ा उनके रसीले होठों पर होठ रख दिये और चूसने लगे। चौधराइन भी भी अपने बचपन के यार से अपने रसभरे होठ चूसवाते हुए उसका लण्ड अपनी चूत पर रगड़ रही थीं। पण्डित के हाथ कन्धों से सरक पीठ पर पहुँचे और चौधराइन के ब्लाउज के हुक खोलने लगी। ब्लाउज के बटन खुलते ही पन्डित सदानन्द ने बड़ी फ़ुर्ती से ब्रा का हुक भी खोल दिया और ब्लाउज और ब्रा एक साथ कन्धों से उतार दी उनकी इस अचानक कार्यवाही से हड़बड़ा कर चौधराइन ने सीने के पास ब्रा पे हाथ रख उन्हें धकेलते हुए बोलीं –
“अरे अरे रुको तो!”
पन्डित सदानन्द (झपट के ब्रा नोच उनके बदन से अलग करते हुए) –“अभी तो कह रहीं थी जल्दी करो, अब कहती हो रुको रुको।”
झटके से ब्रा हटने से चौधराइन के दोनों बड़े बड़े खरबूजों जैसे स्तन उछल के बाहर आगये तो पन्डित सदानन्द ने अपने दोनों हाथ बढ़ा माया देवी की हलव्वी खरबूजे थाम लिये और उनको हल्के हाथों से पकड़ कर सहलाने लगे जैसे की पुचकार रहे हो। “सीस्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्सई आआह!
सदानन्द की हरकतों से उत्तेजित चौधराइन सिसकारियाँ भरते हुए उनका लण्ड अपनी चूत पर रगड़ रही थीं । पन्डित सदानन्द ने अपने हाथों पर तेल लगा के पहले दोनो चुचों को दोनो हाथों से पकड़ के हल्के से खिंचते हुए निप्पलो को अपने अंगुठे और उंगलियों के बीच में दबा कर मसलने लगे। निप्पल खड़े हो गये थे और दोनो चुचों में और भी मांसल कठोरता आ गयी थी । पण्डितजी की समझ में आ गया था की अब चौधराइन को गरमी पूरी चढ़ गई है। उत्तेजना से बौखलाई चौधराइन की दोनों आँखें बन्द थीं और उनके मुँह से “सीस्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्सई आआह!
जैसी आवाजे आ रहीं थीं और वो अपनी गुदाज हथेली में पण्डित सदानन्द का हलव्वी लण्ड दबाये अपनी चूत के बूरी तरह गीले हो रहे मुहाने पर जोर जोर से रगड़ रही थीं तभी चौधराइन ने पण्डित सदानन्द की तरफ़ देखा दोनों की नजरें मिलीं और चौधराइन ने आँख से इशारा किया । चौधराइन का इशारा समझ तेल लगी चुचियों को सहलाते दबाते धक्का मारा और उनका सुपाड़ा पक से चौधराइन की चूत में घुस गया ।
सीस्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्सई आआह!
चौधराइन ने दबी आवाज में सिसकारी भरी पर साथ ही चूतड़ उछालकर पण्डित सदानन्द को बचा लण्ड चूत मे डालने में मदद भी की।
सदानन्द ने चौधराइन की मदद से तीन ही धक्कों मे पूरा लण्ड धाँस दिया बस फ़िर क्या था कभी पण्डित ऊपर तो कभी चौधराइन, दोनों ने धुँआधार चुदाई की।
क्रमश:………………………………



RE: Muslim Sex Stories सलीम जावेद की रंगीन दुन�... - sexstories - 04-25-2019

चौधराइन
भाग -2 बेला मालिन - गाँव का रेडियो
पण्डित वैद्यराज सदानन्द जी की चुदाई भरे इलाज से बुरी तरह थकी चौधराइन, उन के जाने के बाद सो गई तो उनकी नींद करीब साढ़े तीन बजे दोपहर में खुली । उनका बदन बुरी तरह टूट रहा था । सोचा अब तो सचमुच मालिश करवानी पड़ेगी। कमरे से बाहर आयीं नौकर को आवाज दी,
“बल्लू जा बेला मालिन को बुला ला बोलना मालकिन ने मालिश के लिए बुलाया है।”
बेला मालिन आयी और आंगन में खुलने वाले सारे दर्वाजे बन्द कर चौधराइन को धूप में बैठा आंगन में मालिश(असली वाली) करवाने लगीं। जब चौधराइन मालिश करवाती थीं तो वो सोच रही थी कि पन्डित सदानन्द की मालिश और असली मालिश में कितना फ़र्क है पन्डित सदानन्द साला थका देता है जबकी असली मालिश थकान उतारती है।”
बेला “क्या सोच रहीं हई मालकिन ।
उसी समय घर के मुख्य दरवाजे से “चाची ओ चौधराइन चाची!”
पुकारते हुए मदन अन्दर आया । चौधराइन की साड़ी घुटनों तक ऊपर उठी हुई थी और पिन्डलियाँ दोपहर की धूप की रोशनी में चमक रही थी। ये सब इतना अचानक हुआ कि ना तो चौधराइन ना ही बेला के मुंह से कुछ निकला। कुछ देर तक ऐसे ही रहने के बाद बेला को जैसे कुछ होश आया तो उसने जल्दी से चौधराइन की पिन्डलियों को साड़ी खींच कर ढक दिया। चौधराइन को जैसे होश आया वो झट से अपने पैरो को समेटते झेंप मिटाते हुए बोली,
" क्या बात है मदन, कब आया शहर से।"

अब मदन को भी अपनी गलती का अहसास हुआ और उसने अपना सर नीचे करते हुए कहा,
" दो हफ़्ते हुए, वो पिता जी ने पूछने भेजा है कि उनको चौधरी चचा से कुछ काम है कल घर पर कितने बजे तक रहेंगे ।"

इस बीच माया देवी अब अपने आप को संभाल चुकी थी। उन्होंने सहज हो मदन को देखा और बोलीं – “कल शाम चार बजे से पहले क्या ही आयेंगे तो उससे पहले तो उनसे मुलाकात होनेकी कोई उम्मीद नहीं।तू तो काफ़ी बड़ा हो गया है रे कौन सी क्लास में पहुंच गया ।” 
मदन बताने लगा कि अब वो सत्रह बरस का हो चुका है। बारहवी कि परीक्षा उसने दे दी है। परीक्षा जब खतम हुई तो शहर में रह कर क्या करता?, परीक्षा के खतम होते ही वह गांव वापस आ गया। मोना (चौधराइन की लड़की) उससे एक साल छोटे क्लास में है उसकी परीक्षा अगले महीने है। मैं यहां भी बोर होने लगा था पर गांव के कुछ बचपन के दोस्त मिल गये हैं, उनके साथ सुबह शाम क्रिकेट घुमना फिरना शुरु कर दिया है।”
मदन बता रहा था और चौधराइन देख रही थीं । मदन (मदन) पर नई-नई जवानी चढी है। शहर की हवा लग चुकी है पर पंडिताइन ने गांव से खाने पीने का ख्याल रखा है जिससे बदन खूब गठीला हो गया है।
फ़िर मदन प्रणाम कर वहां से चला गया।
बेला ने झट से उठ कर दरवाजा बंद किया और बोली,
" दरवाजा लगता है, पूरी तरह से बंद नही हुआ था, पर इतना ध्यान रखने की जरुरत तो कभी रही नही क्यों की आम तौर पर तो कोई आता नहीं ऐसे।"

"चल जाने दे जो हुआ सो हुआ अपने सदानन्द का बेटा ही तो है।"

इतना बोल कर चौधराइन चुप हो गई पर बेला एक हरामिन थी उसकी नजरें चौधराइन की नजरों ताड़ रही थी और खूब पहचान रही थीं सो उसने फिर से बाते छेड़नी शुरु कर दी,
“मालकिन अब क्या बोलु, मदन बाबू (मदन) भी कम उस्ताद नहीं है”
बेला को घूरते हुए माया देवी ने पुछा, “क्यों, क्या किया मदन ने तेरे साथ।”
“अरे मेरे साथ नहीं पर…
चौधराइन चौकन्नी हो गई
“हाँ हाँ बोल ना क्या बोलना है”
“मालकिन अपने मदन बाबू भी कम नही है, उनकी भी संगत बिगड़ गई है”
“ऐसा कैसे बोल रही है तु”
“ऐसा इसलिये बोल रही हुं क्यों की, मदन बाबू भी तालाब के चक्कर खूब लगाते है”
“ हो सकता है दोस्तों के साथ खेलने या फिर तैरने चला जाता होगा”
“खाली तैरने जाये तब तो ठीक है मालकिन मगर, मदन बाबू को तो मैंने कल तालाब किनारे वाले पेड़ पर चढ़ कर छुप कर बैठे हुए भी देखा है।”

चौधराइन और ज्यादा जानना चाहती थी, इसलिये फिर बेला को कुरेदते हुए कहा
“अब जवान भी तो हो गया है थोड़ी बहुत तो उत्सुकता सब के मन में होती है, वो भी देखने चला गया होगा इन मुए गांव के छोरो के साथ।”
“पर मालकिन मैंने तो उनको शाम में बगीचे में गुलाबो के ब्लाउज में हाथ घुसेड़ दबाते हुए भी देखा है।”
चौधराइन, “अरे अभी दो ही हफ़्ते तो हुए हैं इसे आये और इसने ये सब कर डाला।” बेला हँसती हुइ बोली “मालकिन मैं एकदम सच-सच बोल रही हूँ। झूठ बोलु तो मेरी जुबान कट के गिर जाये अरे मदन बाबू को तो कई बार मैंने गांव की औरते जिधर दिशा-मैदान करने जाती है उधर भी घुमते हुए देख है।”
“हाय दैय्या उधर क्या करने जाता है”
“बसन्ती के पीछे भी पड़े हुए है छोटे मालिक, वो भी साली खूब दिखा दिखा के नहाती है। साली को जैसे ही मदन बाबू को देखती है और ज्यादा चूतड़ मटका मटका के चलने लगती है, मदन बाबू भी पूरे लट्टु हुए बैठे है।”
“क्या जमाना आ गया है, इतना पढ़ाने लिखाने का कुछ फायदा नही हुआ, सब मिट्टी में मिला दिया, सदानन्द ने इन्ही भन्गिनो और धोबनो के पीछे घुमने के लिये इसे शहर भेजा था”
“आप भी मालकिन बेकार में नाराज हो रही हो, नया खून है थोड़ा बहुत तो उबाल मारेगा ही, फिर यहां गांव में कौन-सा उनका मन लगता होगा, मन लगाने के लिये थोड़ा बहुत इधर उधर कर लेते है”
“नही मैं सोचती थी कम से कम पन्डित सदानन्द का बेटा तो ऐसा ना होगा”
“तो आप के हिसाब से जैसे आप खुद आग में जलती रहती हो वैसे ही हर कोई जले”
बेला से नजरे छुपाते हुए चौधराइन ने कहा
“मैं कौन सी आग में जल रही हूँ री कुतिया “
“क्यों जलती नही हो क्या, क्या मुझे पता नही की मर्द के हाथों की गरमी पाये आपको ना जाने कितने साल बीत चुके है,चौधरी जाने कहाँ अपने ही में मस्त रहते हैं क्या मुझे पता नहीं है। अगर मैं आप की जगह होती तो अपने गाँव के (पन्डित सदानन्द चौधराइन के ग़ांव के हैं) रिश्ते का ऐसा चाची चाची करने वाला भतीजा कभी न छोड़ती क्योंकि किसी को कभी शक हो ही नहीं सकता वैसे मदन बाबू आपकी गोरी गोरी सुडौल गुदगुदी पिन्डलियों को चोरी चोरी देख भी रहे थे।”
“ऐसा नही है री, ये सब काम करने की भी एक उमर होती है वो अभी बच्चा है।”
“बच्चा है, आप कहती हो बच्चा है अरे मालकिन वो ना जाने कितनो को अपने बच्चे की मां बना दे ।”
“चल साली क्या बकवास करती है”
चौधराइन की दोनो टांगो को फैला कर बेला उनके बीच में बैठ गई। बेला ने मुस्कुराते हुए चौधराइन के पेटीकोट के ऊपर से उनकी पावरोटी सी फ़ूली चूत पर हाथ फ़ेरते हुए कहा- अभी आपको मेरी बाते तो बकवास ही लगेगी मगर मालकिन सच बोलु तो आपने अभी मदन बाबू का औजार नहीं देखा मदन बाबू का औजार देख के तो मेरी भी पनिया गई थी।
“दूर हट कुतिया, क्या बोल रही है बेशरम मेरे तेरे बेटे की उमर का है।”
“हंह! बेटे की उमर का है तो क्या औजार अन्दर घुसने से इन्कार कर देगा।”
बेला ने चौधराइन की पावरोटी सी फ़ूली चूत की दरार को पेटीकोट के ऊपर से सहलाते हुए कहा । चौधराइन ने अपनी जांघो को और ज्यादा फैला दिया, बेला के पास अनुभव था अपने हाथों से मर्दों और औरतों के जिस्म में जादु जगाने का। माया देवी के मुंह से बार-बार सिसकारियां फुटने लगी। बेला ने जब देखा मालकिन अब पूरे उबाल पर आ गई है तो फिर से बातों का सिलसिला शुरु कर दिया
“मेरी बात मान लो मालकिन, कुछ जुगाड़ कर लो।”
“क्या मतलब है री तेरा”
“मतलब तो बड़ा सीधा सादा है मालकिन, मालकिन आपकी चूत मांगती है लण्ड और आप हो की इसको खीरा ककडी खिला रही हो”
-बेला ने तवा गरम देख खुल के कहा
“चुप साली, अब कोई उमर रही है मेरी ये सब काम करवाने की बिना मर्द के सुख के इतने दिन बीत गये तो अब क्या, अब तो बुढिया हो गई हुँ ।”
“ आप क्या जानो गाँव के सारे जवान आप को देख आहे भरते हैं”
“चल साली क्यों चने के झाड़ पर चढ़ा रही है”

“क्या मालकिन मैं ऐसा क्यों करूँगी, मैं तो सच्चाई बता रही थी कि क्यों अपनी जवानी यूँ ही सत्यानाश करवा रही हो”
“तु क्यों मुझे बिगाडने पर क्यों तुली हुई है।”
बेला ने हँसते हुए कहा, “थोड़ा आप बिगड़ो और थोड़ा अपने मुँहबोले भतीजे को को भी बिगड़ने का मौका दो से मदन बाबू से बढ़िया मौका अब दूसरा मिलना मुश्किल है। चाची चाची कहता है किसी को कभी शक भी न होगा।”

“छी रण्डी कैसी कैसी बाते करती है! सदानन्द मेरे गाँव के हैं मैं भाई कहती हूँ उन्हें।”
“अरे छोड़िये मालकिन कौन से आपके सगे भाई भतीजे हैं। मैं आपकी जगह होती तो सबसे पहले पन्डितजी को टाँगों के बीच लाती फ़िर मदन बाबू को । एक भाई दूसरा भतीजा जी भर के मजे करो किसी साले को कभी शक हो ही नहीं सकता। 
ये सुन चौधराइन मन ही मन मुसकराई, अब वो बेला को ये कैसे बतायें कि पन्डितजी तो टाँगों के बीच रहते ही हैं।”
बेला आगे बोल रही थी –“अरे मुझे क्या है मैं तो आप के लिए परेशान हूँ वैसे भी ईमानदारी से देखा जाय तो मदन बाबू जैसे कड़ियल जवान को आप जैसी सुन्दर भरी पूरी साफ़ सुथरी औरत मिलनी चाहिये न कि गाँव की गन्दी छिछोरियाँ । इस रिश्तों की भलमनसाहत और शरम में मदन बाबू चाची चाची करते रहेंगे और आप बेटा बेटा। आप अपने जिस्म की आग खीरा, ककड़ी में बर्बाद करना, उधर आपका मुँहबोला भतीजा अपने जिस्म की आग से परेशान हो हो कर गाँव की गन्दी छिछोरियों मे अपनी कड़ियल जवानी और अपना सुन्दर जवान जिस्म बरबाद कर डालेगा। मैं तो अनपढ़ जाहिल हूँ पर क्या मुँहबोले प्यारे भतीजे की उस बरबादी की तरफ़ आप की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती ।”
“वो कोई ऐसा काम क्यों करेगा री। वो कुछ नही करने वाला।”
“मालकिन बड़ा मस्त हथियार है मदन बाबू का, गांव की छोरियां छोड़ने वाली नही।”

ये सुनते ही चौधराइन को पण्डित सदानन्द के हलव्वी लण्ड का ख्याल आया वो मन ही मन हँसीं कि लगता है जैसा बाप वैसा ही बेटा भी है पर प्रकट में बेला को लताड़ा –“हरामजादी, छोरियों की बात छोड़ मुझे तो लगता है तु ही उसको नही छोड़ेगी, शरम कर बेटे की उमर का है।“
“यही तो मैं कह रही हूँ मदन बाबू मुझे भी घूरते रहते हैं किसी दिन पटक के चढ़ बैठे तो आपके हिस्से का ये केला मुझ नासपीटी को ना खाना पड़ जाये।”
अगर ऐसा हुआ तो मैं तेरा मुंह नोच लुँगी”
“हाय मालकिन उतना बड़ा औजार देख के तो मैं सब कुछ भुल जाती हुँ। पर इसमें मेरी कोई गलती नहीं है उसे देख किसी भी औरत का यही हाल होगा।”
इतनी देर से ये सब सुन-सुन के माया देवी के मन में भी उत्सुकता जाग उठी थी। उसने आखिर बेला से पूछ ही लिया,,,,
" कैसे देख लिया तूने मदन का। " 
बेला ने अन्जान बनते हुए पुछा, "मदन बाबू का क्या मालकिन। "

फिर बेला को चौधराइन की एक लात खानी पड़ी, फिर चौधराइन ने हँसते हुए कहा,
" कमीनी सब समझ के अन्जान बनती है। "

बेला ने भी हँसते हुए कहा,
" मालकिन मैं तो सोच रही थी कि आप अभी तक तो बेटा भतीजा कर रही थी फिर उसके औजार के बारे में थोड़े ही न पूछोगी?"

बेला की बात सुन कर चौधराइन थोड़ा शरमा गई। उसकी समझ में ही नही आ रहा था कि वो बेला को क्या जवाब दे। फिर भी उन्होंने थोड़ा झेपते हुए कहा,
" साली मैं तो ये पूछ रही थी की तूने कैसे देख लिया. '

" मैंने बताया तो था मालकिन की मदन बाबू जिधर गांव की औरतें दिशा-मैदान करने जाती है, उधर घुमते रहते है, और ये साली बसन्ती भी उनपे लट्टु हुइ बैठी है। एक दिन शाम में मैं जब पाखाना करने गई थी तो देखा झाड़ियों में खुसुर पुसुर की आवाज आ रही है। मैंने सोचा देखु तो जरा कौन है, देखा तो हक्की-बक्की रह गई क्या बताऊँ, मदन बाबू और बसन्ती दोनो खुसुर पुसुर कर रहे थे। मदन बाबू का हाथ बसन्ती की चोली में और बसन्ती का हाथ मदन बाबू की हाफ पैन्ट में घुसा हुआ था। मदन बाबू रिरयाते हुए बसन्ती से बोल रहे थे, ' एक बार अपना माल दिखा दे. ' और बसन्ती उनको मना कर रही थी।"

इतना कह कर बेला चुप हो गई तो माया देवी ने पूछा,
" फिर क्या हुआ। "


RE: Muslim Sex Stories सलीम जावेद की रंगीन दुन�... - sexstories - 04-25-2019

" मदन बाबू ने फिर जोर से बसन्ती की एक चुची को एक हाथ में थाम लिया और दूसरी हाथ की हथेली को सीधा उसकी दोनो जांघो के बीच रख के पूरी मुठ्ठी में उसकी चूत को भर लिया और फुसफुसाते हुए बोले,
' हाय दिखा दे एक बार, चखा दे अपनी लालमुनीया को बस एक बार रानी फिर देख मैं इस बार मेले में तुझे सबसे महंगा लहंगा खरीद दुँगा, बस एक बार चखा दे रानी॑.' , इतनी जोर से चुची दबवाने पर साली को दर्द भी हो रहा होगा मगर साली की हिम्मत देखो एक बार भी मदन बाबू के हाथ को हटाने की उसने कोशिश नही की, खाली मुंह से बोल रही थी,
' हाय छोड़ दो मालिक. छोड़ दो मालिक. '
मगर मदन बाबू हाथ आई मुर्गी को कहाँ छोड़ने वाले थे। "

ये सब सुनकर माया देवी की चूत भी पसीज रही थी उसके मन में एक अजीब तरह का कौतुहल भरा हुआ था। बेला भी अपनी मालकिन के मन को खूब समझ रही थी इसलिये वो और नमक मिर्च लगा कर मदन की करतुतों की कहानी सुनाये जा रही थी।

" फिर मालकिन मदन बाबू ने उसके गाल का चुम्मा लिया और बोले, ' बहुत मजा आयेगा रानी बस एक बार चखा दो, हाय जब तुम चूतड़ मटका के चलती हो तो क्या बताये कसम से कलेजे पर छूरी चल जाती है, बसन्ती बस एक बार चखा दो॑. ' बसन्ती शरमाते हुए बोली,
' नही मालिक आपका बहुत मोटा है, मेरी फट जायेगी॑, '
इस पर मदन बाबू ने कहा,
' हाथ से पकड़ने पर तो मोटा लगता ही है, जब चूत में जायेगा तो पता भी नही चलेगा॑. '
फिर उन्होंने बसन्ती का हाथ अपनी नीकर से निकाल, अपनी नीकर उतार, झट से अपना लण्ड बसन्ती के हाथ में दे दिया, हाय मालकिन क्या बताऊँ कलेजा धक-से मुंह को आ गया, बसन्ती तो चीख कर एक कदम पीछे हट गई, क्या भयंकर लण्ड था मालिक का एक दम से काले सांप की तरह, लपलपाता हुआ, मोटा मोटा पहाड़ी आलु के जैसा गुलाबी सुपाड़ा और मालकिन सच कह रही हु कम से कम १० इंच लम्बा और कम से कम २.५ इंच मोटा लण्ड होगा मदन बाबू का, उफफ ऐसा जबरदस्त औजार मैंने आज तक नही देखा था, बसन्ती अगर उस समय कोशिश भी करती तो चुदवा नही पाती, वहीं खेत में ही बेहोश हो के मर जाती साली मगर मदन बाबू का लण्ड उसकी चूत में नही जाता."

चौधराइन साँस रोके ये सब सुन रही थी। बेला को चुप देख कर उस से रहा नही गया और वो पूछ बैठी,
"आगे क्या हुआ। "

बेला ने फिर हँसते हुए बताया, " अरे मालकिन होना क्या था, तभी अचानक झाड़ियों में सुरसुराहट हुई, मदन बाबू तो कुछ समझ नही पाये मगर बसन्ती तो चालु है, मालकिन, साली झट से लहंगा समेट कर पीछे की ओर भागी और गायब हो गई। और मदन बाबू जब तक सम्भलते तब तक उनके सामने बसन्ती की भाभी मुटल्ली लाजवन्ती जिसे लाजो भी कहते हैं अपने घड़े जैसे चूतड़ हिलाती आ के खड़ी हो गई। अब आप तो जानती ही हो की इस साली लाजवन्ती ठीक अपने नाम की उलट बिना किसी लाज शरम की औरत है। जब साली और नई नई शादी हो के गांव में आई थी तो बसन्ती की उमर की थी तब से उसने २ साल में गांव के सारे जवान मर्दों के लण्ड का पानी चख लिया था। अभी भी हरामजादी ने अपने आप को बना संवार के रखा हुआ है।" इतना बता कर आया फिर से चुप हो गई।

" फिर क्या हुआ, लाजवन्ती तो खूब गुस्सा हुई होगी. "
"अरे नही मालकिन, उसे कहाँ पता चला की अभी अभी २ सेकंड पहले मदन बाबू अपना लण्ड उसकी ननद को दिखा रहे थे। वो साली तो खुद अपने चक्कर में आई हुई थी। उसने जब मदन बाबू का बलिश्त भर का खड़ा मुसलण्ड देखा तो उसके मुंह में पानी आ गया और मदन बाबू को पटाने के इरादे से बोली यहां क्या कर रहे है मदन बाबू आप कब से हम गरीबों की तरह यहाँ खुले में दिशा करने लगे॑। मदन बाबू तो बेचारे हक्के बक्के से खड़े थे, उनकी समझ में नही आ रहा था की क्या करें, एक दम देखने लायक नजारा था। हाफ पैन्ट घुटनो तक उतरी हुइ थी और शर्ट मोड़ के पेट पर चढ़ा रखी थी, दोनो जांघो के बीच एक दम काला भुजंग मुसल लहरा रहा था ।" 

" मदन बाबू तो बस. ' अरे वो आ मैं तो' कर के रह गये। तब तक लाजवन्ती मदन बाबू के एक दम पास पहुंच गई और बिना किसी झिझक या शरम के उनके हथियार को अप्नी गोरी गुदाज हथेली में धर दबोचा और बोली,
'क्या मालिक कुछ ।गड़बड तो नही कर रहे थे पूरा खड़ा कर के रखा हुआ है। इतना क्यों फनफना रहा है आपका औजार, कहीं कुछ देख तो नही लिया॑।"
इतना कह कर हँसने लगी । मदन बाबू के चेहरे की रंगत देखने लायक थी। एक दम हक्के-बक्के से लाजवन्ती का मुंह ताके जा राहे थे। अपना हाफ पैन्ट भी उन्होंने अभी तक नही उठाया था। लाजवन्ती ने सीधा उनके मुसल को अपने हाथों में थाम रखा था और मुस्कुराती हुइ बोली
“क्या मालिक औरतन को हगते हुए देखने आये थे क्या॑”
कह कर खी खी कर के हँसते हुए साली ने मदन बाबू के औजार को अपनी गुदाज हथेली से कस के दबा दिया।
उस अन्धेरे में भी मालिक का लाल लाल मोटे पहाड़ी आलु जैसा सुपाड़ा एक दम से चमक गया जैसे की उसमें बहुत सारा खून भर गया हो और लण्ड और फनफना के लहरा उठा।”

“बड़ी हरामखोर है ये लाजवन्ती, साली को जरा भी शरम नही है क्या”

“जिसने सारे गांव के लौंडो क लण्ड अपने अन्दर करवाये हो वो क्या शरम करेगी”

“फिर क्या हुआ, मेरा मदन तो जरुर भाग गया होगा वहां से बेचारा”

“मालकिन आप भी ना हद करती हो अभी २ मिनट पहले आपको बताया था की आपका भतीजा बसन्ती के चुचो को दबा रहा था और आप अब भी उसको सीधा सीधा समझ रही हो, जबकी उन्होंने तो उस दिन वो सब कर दिया जिसके बारे में आपने सपने में भी नही सोचा होगा”
चौधराइन एक दम से चौंक उठी, "क्या कर दिया, बात को क्यों घुमा फिरा रही है"

"वही किया जो एक जवान मर्द करता है"

"क्यों झूठ बोलती हो, जल्दी से बताओ ना क्या किया" , 
मदन बाबू में भी पूरा जोश भरा हुआ था और ऊपर से लाजवन्ती की उकसाने वाली हरकते दोनो ने मिल कर आग में घी का काम किया। लाजवन्ती बोली
“छोरियों को पेशाब और पाखाना करते हुए देख कर हिलाने की तैय्यारी में थे क्या, या फिर किसी लौन्डिया के इन्तजार में खड़ा कर रखा है॑”
मदन बाबू क्या बोलते पर उनके चेहरे को देख से लग रहा था की उनकी सांसे तेज हो गयी है। उन्होंने भी अब की बार लाजवन्ती के हाथों को पकड़ लिया और अपने लण्ड पर और कस के चिपका दिया और बोले
“हाय भौजी मैं तो बस पेशाब करने आया था॑”
इस पर वो बोली “तो फिर खड़ा कर के क्यों बैठे हो मालिक कुछ चाहिये क्या॑”
मदन बाबू की तो बांछे खिल गई। खुल्लम खुल्ला चुदाई का निमंत्रण था। झट से बोले “चाहिये तो जरुर अगर तु दे दे तो मेले में से पायल दिलवा दुँगा।“
खुशी के मारे तो साली लाजवन्ती क चेहरा चमकने लगा, मुफ्त में मजा और माल दोनो मिलने के आसार नजर आ रहे थे। झट से वहीं पर घास पर बैठ गई और बोली, “हाय मालिक कितना बड़ा और मोटा है आपका, कहाँ कुवांरियों के पीछे पड़े रहते हो, आपका तो मेरे जैसी शादी शुदा औरतो वाला औजार है, बसन्ती तो साली पूरा ले भी नही पायेगी॑”
मदन बाबू बसन्ती का नाम सुन के चौंक उठे की इसको कैसे पता बसन्ती के बारे में। लाजवन्ती ने फिर से कहा
“कितना मोटा और लम्बा है, ऐसा लण्ड लेने की बड़ी तमन्ना थी मेरी॑”
इस पर मदन बाबू ने लाजो के टमाटर से गाल पर चुम्मा लेते हुए कहा आज तमन्ना पूरी कर ले, बस चखा दे जरा सा, बड़ी तलब लगी है॑ इस पर लाजवन्ती बोली जरा सा चखना है या पूरा मालिक॑”
तो फिर मदन बाबू बोले-
“हाय पूरा चखा दे तो मेले से तेरी पसंद की पायल दिलवा दूँगा।

बेला की बात अभी पूरी नही हुई थी की चौधराइन बीच में बोल पड़ी "ओह सदानन्द तेरी तो किस्मत ही फुट गई, बेटा रण्डियों पर पैसा लुटा रहा है, किसी को लहंगा तो किसी हरामजादी को पायल बांट रहा है।"
कह कर बेला को फिर से एक लात लगायी और थोड़े गुस्से से बोली, "हरामखोर, तु ये सारा नाटक वहां खड़ी हो के देखे जा रही थी, तुझे जरा भी पन्डितजी का खयाल नही आया, एक बार जा के दोनो को जरा सा धमका देती दोनो भाग जाते।"
बेला ने मुंह बिचकाते हुए कहा, " मेरी तो औकात नहीं है वरना मेरा बस चले तो खुद ही ऐसे गोरे चिट्टे पन्डितजी पर चढ़ बैठूँ। फ़िर मैं शेर के मुंह के आगे से निवाला छिनने की औकात कहाँ से लाती मालकिन, मैं तो बुस चुप चाप तमाशा देख रही थी।"
कह कर बेला चुप हो गई और मालिश करने लगी। चौधराइन के मन की उत्सुकता दबाये नही दब रही थी कुछ देर में खुद ही कसमसा कर बोली, " चुप क्यों हो गई आगे बता ना "
क्रमशः……………………………


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चौधराइन

भाग 3 - बेला की सीख पर चौधराइन का प्लान


" फिर क्या होना था मालकिन, लाजो वहीं घास पर लेट गई और मदन बाबू उसके ऊपर, दोनो गुत्थम गुत्था हो रहे थे। कभी वो ऊपर कभी मदन बाबू ऊपर। मदन बाबू ने अपना मुंह लाजवन्ती की चोली में दे दिया और एक हाथ से उसके लहेंगे को ऊपर उठा के उसकी चूत सहलाने लगे, लाजो के हाथ में मालिक का मोटा लण्ड था और दोनो चिपक चिपक के मजा लूटने लगे। कुछ देर बाद मदन बाबू उठे और लाजो की दोनो टांगो के बीच बैठ गये। उस छिनाल ने भी अपनी साड़ी को ऊपर उठा, दोनो टांगो को फैला दिया। मदन बाबू ने अपना मुसलण्ड सीधा उसकी चूत के ऊपर रख के धक्का मार दिया। जब मदन बाबू का हलव्वी लण्ड चूत फ़ैलाता हुआ अन्दर जाने लगा तो साली चुद्दक्कड़ का इतना धाकड़ चुद्दक्कड़ भोसड़ा भी चिगुरने लगा और वो कराह उठी
“उम्म्म्ह मालिक”
इतना मोटा लण्ड घुसने से कोई कितनी भी बड़ी रण्डी हो उसकी हेकडी एक पल के लिये तो गुम हो ही जाती है। फ़िर मदन बाबू का तो अभी नया खून है, उन्होंने कोई रहम नही दिखाया, उलटा और कस कस के धक्के लगाने लगे."

" हाय मालकिन पर कुछ ही धक्कों के बाद तो साली चुद्दकड़ अपने घड़े जैसे चूतड़ ऊपर उछालने लगी और गपा गप मदन बाबू के लण्ड को निगलते हुए बोल रही थी, 'हाय मालिक मजा आ गया फ़ाड़ दो, हाय ऐसा लण्ड आज तक नही मिला, सीधा बच्चेदानी को छु रहा है, लगता है मैं ही पन्डितजी के पोते को पैदा करूँगी, मारो कस कस के॑..”
मदन बाबू भी पूरे जोश में थे, हुमच हुमच के ऐसा धक्का लगा रहे थे की क्या कहना, जैसे चूत फ़ाड़ के चूतड़ों से लण्ड निकाल देंगे, दोनों हाथ से पपीते जैसी चूचियाँ दबाते हुए पका पक लण्ड पेले जा रहे थे। लाजवन्ती साली सिसकार रही थी और बोल रही थी, ' मालिक पायल दिलवा देना फिर देखना कितना मजा करवाऊंगी, अभी तो जल्दी में चुदाई हो रही है, मारो मालिक, इतने मोटे लण्ड वाले मालिक को अब नही तरसने दूँगी, जब बुलाओगे चली आऊँगी, हाय मालिक पूरे गांव में आपके लण्ड के टक्कर का कोई नही है॑।' " इतना कह कर बेला चुप हो गई।
बेला ने जब लाजवन्ती के द्वारा कही गई ये बात की, पूरे गांव में मदन के लण्ड के टक्कर का कोई नही है सुन कर चौधराइन मानना पड़ा कि ये जरूर सच होगा क्योंकि लाजो से तो कोई लण्ड शायद ही बचा होगा।
फिर भी चौधराइन ने बेला से पूछा, " तु जो कुछ भी मुझे बता रही है वो सच है ना बना के तो नहीं बता रही? "

" हां मालकिन सौ-फीसदी सच बोल रही हूँ। माफ़ करना मालकिन छोटा मुँह बड़ी बात पर अब मैं आप से अपना सवाल दोहराती हूँ क्या अपने मुँहबोले भाई के बेटे, अपने भतीजे की उस बरबादी की तरफ़ आप की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती ।”
चौधराइन कुछ सोचने सी लगी और उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया
चालाक बेला समझ गई कि लोहा गरम है तो उसने आखरी चोट की-
“हाय मालकिन जब मैं रात में बिस्तर पर लेट, मदन बाबू के कसरती बदन में दबते पिसते आपके इस मांसल संगमरमरी जिस्म की कल्पना करती हूँ तो मेरी चूत पनिया जाती है”
अब चौधराइन चौंकी उन्होंने बेला से पूछा तेरी पनिया जाती है! अच्छा एक बात बता तू मुझे ये सब करने के लिए क्यों उकसा रही है इसमें तेरा क्या फ़ायदा है?
“मदन बाबू अगर आपके आकर्षण में फ़ंस यहाँ आने लगे तो इस गाँव की इन मर्दखोर हरामिनों से बच जायेंगे और कभी कभी मुझे भी आप की जूठन मिल जाया करेगी।”
अपनी बात का असर होते देख बेला झोंक में बोल गई फ़िर सकपका के बात सम्हालने कि कोशिश करने लगी –“मेरामतलब है…………
तब तक चौधराइन ने हँसते हुए लात जमायी और बेला हँसते हुए वहाँ से भाग गई।
पर बेला की बात थोड़ी बहुत चौधराइन के भेजे में भी घुस गई थी भतीजे को बचाने की चाहत और शायद दिल के किसी कोने में उसके अनोखे हथियार को देखने की उत्सुकता भी पैदा होगई थी। वो सोचने लगीं कि इतना सीधा लड़का आखिर बिगड़ कैसे गया ।
चौधराइन कुछ देर तक सोचती रही कैसे सदानन्द के बेटे अपने मुँहबोले भतीजे को अपनी पकड़ में लाया जाये। चुदक्कड़ औरत की खोपड़ी तो शैतानी थी ही। तरकीब सुझ गई। सबेरे उठ कर सीधी आम के बगीचे की ओर चल दीं।

चौधराइन जानती थीं कि उनके जितने भी बगीचे हैं, सब जगह थोड़ी बहुत चोरी तो सारे मैंनेजर करते ही हैं, पर अनदेखा करती थीं क्योंकि पर अनदेखा करती थीं क्योंकि अन्य बड़े आदमियों कि तरह वो भी सोचती थीं कि चौधरी की इतनी जमीन-जायदाद है गरीब थोड़ा बहुत चुरा भी लेंगे तो कौन सा फ़रक पड़ जायेगा । आम के बगीचे में तो कोई झांकने भी नही जाता. जब फल पक जाते तभी चौधराइन एक बार चक्कर लगाती थी।
मई महीने का पहला हफ़्ता चल रहा था। बगीचे में एक जगह खाट डाल कर मैंनेजर बैठा हुआ, दो लड़कियों की टोकरियों में अधपके और कच्चे आम गिन-गिन कर रख रहा था। चौधराइन एकदम से उसके सामने जा कर खड़ी हो गयी। मैंनेजर हडबड़ा गया और जल्दी से उठ कर खड़ा हुआ।
“क्या हो रहा है, ?,,,,,,ये अधपके आम क्यों बेच रहे हो ?,,,,,,,”

मैंनेजर की तो घिग्घी बन्ध गई, समझ में नही आ रहा था क्या बोले ?।

“ऐसे ही हर रोज एक दो टोकरी बेच देते हो क्या,,,,,,,,, ?” थोड़ा और धमकाया।

“मालकिन,,,,,,,, मालकिन,,,,,,,,,,,,वो तो ये बेचारी ऐसे ही,,,,,,,,बड़ी गरीब बच्चीयां है. अचार बनाने के लिये मांग रही थी,,,,,,,,,,"

दोनो लड़कियां तब तक भाग चुकी थी।

“खूब अचार बना रहे हो।"



RE: Muslim Sex Stories सलीम जावेद की रंगीन दुन�... - sexstories - 04-25-2019

मैंनेजर झुक कर पैर पकड़ने लगा। चौधराइन ने अपने पैर पीछे खींच लिए, और वहाँ ज्यादा बात न कर तेजी से घर आ गयीं। घर आ कर चौधराइन ने तुरन्त मैंनेजर और रखवाले को बुलवा भेजा, खूब झाड़ लगाई और बगीचे से उनकी ड्युटी हटा दी और चौधरी को बोला कि मैंने बगीचे से मैंनेजर और रखवाले की ड्युटी हटा दी है दीनू को रखवाली के लिये बगीचे में भेज दे और सदानन्द से आग्रह करके जितने दिन उसका बेटा मदन गाँव में है तब तक अगर हो सके तो वो दीनू और बाकी रखवालों की निगरानी करे। तबतक या तो आप दूसरा मैंनेजर खोज लें नहीं तो खुद जाकर देखभाल करें।
चौधराइन ने सोचा मैंने एक तीर से तीन शिकार किये हैं एक तो गाँव की छिछोरी औरतों से पीछा छूट जायेगा दूसरे मदन बाबू के द्वारा बगीचे का काम सुधर जायेगा तीसरे सबसे बढ़कर मदन बाबू का चौधराइन के घर आना जाना बढ़ जायेगा तो फ़िर मौके और माहौ को देख उसके हिसाब से अगले कदम के बारे में सोचा जायेगा। 
दोपहर को अपने सदानन्द भाई से अपनी चूत का जाप करवाते समय चौधराइन ने जब छुट्टियों भर मदन को बगीचे का काम देखने के लिए पूछा तो उनकी चूत के प्रेमरस में डूबे सदानन्द ने तुरन्त हाँ कर दी कि अच्छा है लड़का कुछ सीखेगा ही और उसका बोर होना भी खत्म हो जायेगा । 
आम के बगीचे में खलिहान के साथ जो मकान बना था वो वास्तव में चौधरी पहले की ऐशगाह थी। वहां वो रण्डियां नचवाता और मौज-मस्ती करता था। अब उमर बढ़ने के साथ साथ उसका मन इन नाच गाना हो हुल्लड़ से भर गया था अब उसकी दिलचस्पी उन्ही औरतों में थी जिनसे उसका टाँका था वो घर परिवार वाली औरते उससे बगीचे में तो मिलने आने से रहीं। उनसे वो उनके या अपने घर के अपने बाहर वाले कमरे में (जहाँ वो उठता, बैठता, दारू पीता था) मिलता था, तब से उसकी बगीचे और उस मकान में दिलचस्पी खत्म हो गई थी सो चौधरी ने वहां जाना लगभग छोड़ ही दिया था।
पर आज के चौधाराइन के आदेश से चौधरी घबड़ाया कि ऐसे तो उसकी सारी आजादी खत्म हो जायेगी सो उसने दूसरे दिन सुबह सुबह ही सदानन्द के घर जा मदन को बड़े प्यार मनुहार से बेटा बेटा कर इस काम के लिये राजी कर लिया और सब रखवालों को हिदायत कर दी कि मदन बाबू के आदेश पर काम करें और मदन कहीं इनकार न कर दे इस डर से उससे कह दिया कि वो अपने दोस्तों को क्रिकेट खेलने के लिये वहीं बुला लिया करे और गाहे बगाहे आराम के लिये बगीचे वाले मकान की चाबी भी दे दी।

अन्धा क्या चाहे दो आँखें, मदन ने चौधरी से बगीचे वाले मकान की चाबी ले ली। और तुरन्त बगिया में दीनू को बोल दिया ' तु भी चोर है बगिया मे दिखाई मत देना दिखा तो टांग तोड़ दुँगा' दीनू डर के मारे गया ही नही, और ना ही किसी से इसकी शिकायत की।
बाहर से देखने पर तो खलिहान जैसा गांव में होता है, वैसा ही दिखता था मगर अन्दर चौधरी ने उसे बड़ा खूबसुरत और आलीशान बना रखा था। दो कमरे, जो की काफी बड़े और एक कमरे में बहुत बड़ा बेड था। सुख-सुविधा के सारे सामान वहां थे। 

इस बीच जैसाकि आप जानते ही हैं मदन ने गांव की लाजो भौजी (लाजवन्ती) को तो चोद ही दिया था. और उसकी ननद बसन्ती के स्तन दबाये थे, मगर चोद नही पाया था। सीलबन्ध माल थी। आजतक मदन ने कोई अनचुदी बुर नही चोदी थी. इसलिये मन में आरजु पैदा हो गई की, बसन्ती की लेते। बसन्ती, मदन बाबू को देखते ही बिदक कर भाग जाती थी। हाथ ही नही आ रही थी। उसकी शादी हो चुकी थी मगर, गौना नही हुआ था।

मदन बाबू के शैतानी दिमाग ने बताया की, बसन्ती की बुर का रास्ता लाजो भौजी की चूत से होकर गुजरता है। तो फिर उन्होंने लाजो भौजी को पटाने की ठानी। मदन जब दीनू से चौधरी से बगीचे वाले मकान की चाबी ले लौट रहे थे तो गन्ने के खेत के पास लाजो लोटा हाथ में लिये वापस आती दिखी, मदन ने आवाज दी,

"क्या भौजी, उस दिन के बाद से तो दिखना ही बन्द हो गया, तुम्हारा,,,,?"

लाजो पहले तो थोड़ा चौंकी, फिर जब देखा की आस पास कोई नही है, तब मुस्कुराती हुइ बोली,
"आप तो खुद ही गायब हो गये मदन बाबू, वादा कर के,,,,,,!"

"अरे नही रे, दो दिन से तो तुझे खोज रहा हूँ. और हम पन्डित लोग झूठ नहीं बोलते. मुझे सब याद है,"

"तो फिर लाओ मेरा इनाम,,,,,,,,,"

"ऐसे कैसे दे दूँ, भौजी !?,,,,,,,,इतनी हडबड़ी भी ना दिखाओ,,,,,'

"अच्छा, अभी मैं तेजी दिखा रही हूँ !!?,,,,,,और उस दिन खेत में लेटे समय तो बड़ी जल्दी में थे आप, छोटे मालिक,,,,,,आप सब मर्द लोग एक जैसे ही हो."
मदन ने लाजो का हाथ पकड़ कर खींचा, और कोने में ले खूब कस के गाल काट लिया। लाजो दर्द से चीखी तो उसका मुंह दबाते हूए बोला,
"क्या करती हो भौजी ?, चीखो मत, सब मिलेगा,,,,,,तेरी पायल मैं ले आया हूँ, और बसन्ती के लिये लहँगा भी।"

मदन ने चारा फेंका। लाजो चौंक गई,
"हाय मालिक, बसन्ती के लिये क्यों,,,,,,?।"

"उसको बोला था की, लहँगा दिलवा दूँगा सो ले आया ।",
कह कर लाजो को एक हाथ से, कमर के पास से पकड़, उसकी एक चूची को बायें हाथ से दबाया।

लाजो थोड़ा कसमसाती हुई, मदन के हाथ की पकड़ को ढीला करती हुई बोली,
"उस से कब बोला था, आपने ?"

"अरे जलती क्यों है ?,,,,,,उसी दिन खेत में बोला था, जब तेरी चूत मारी थी..",
और अपना हाथ चूची पर से हटा कर, चूत पर रखा और हल्के से दबाया।

"अच्छा अब समझी, तभी आप उस दिन वहां खड़ा कर के खड़े थे. मुझे देख कर वो भाग गई और आपने मेरे ऊपर हाथ साफ कर लिया ।"

"एकदम ठीक समझी रानी,,,,,,,",
और उसकी चूत को मुठ्ठी में भर कस कर दबाया। लाजो चिहुंक गई। मदन का हाथ हटाती बोली,
"छोड़ो मालिक, वो तो एकदम कच्ची कली है।"

अचानक सुबह सुबह उसके रोकने का मतलब लाजो को तुरन्त समझ में आ गया।

अरे, कहाँ की कच्ची कली ?, मेरे उमर की तो है,,,,"

"हां, पर अनचुदी है,,,,,,एकदम सीलबन्द,,,,,,,दो महीने बाद उसका गौना है.."

"धत् तेरे की, बस दो महीने की ही मेहमान है. तो फिर तो जल्दी कर भौजी कैसे भी जल्दी से दिलवा दे,,,,,,"
कह कर उसके होठों पर चुम्मा लिया।

ऊउ...हहहह छोड़ो, कोई देख लेगा !?,,,,,,,पायल तो दी नही, और अब मेरी कोरी ननद भी मांग रहे हो,,,,,,,,बड़े चालु हो, छोटे मालिक...!!!"
लाजो को पूरा अपनी तरफ घुमा कर चिपका लिया और खड़ा लण्ड साड़ी के ऊपर से चूत पर रगड़ते हुए, उसकी चूतड़ों की दरार में उँगली चला, मदन बोला,
"अरे कहाँ ना, दोनो चीज ले आया हूँ,,,,,दोनो ननद-भौजाई एक दिन आ जाना, फिर,,,,,"

"लगता है, छोटे मालिक का दिल बसन्ती पर पूरा आ गया है..."

"हां रे ,तेरी बसन्ती की जवानी है ही ऐसी,,,,,,,,बड़ी मस्त लगती है,,,,,,"

"हां मालिक, गांव के सारे लौंडे उसके दिवाने है,,,,....."

"गांव के छोरे, मां चुदाये,,,,,,,तू बस मेरे बारे में सोच,,,,,,,"
कह कर उसके होठों पर चुम्मी ले, फिर से चूची को दबा दिया।

"सीईई,,,,,,मालिक क्या बताये..??, वो मुखिया का बेटा तो ऐसा दिवाना हो गया है, की,,,,,,,,उस दिन तालाब के पास आकर पैर छुने लगा और सोने की चेन दिखा रहा था, कह रहा था की भौजी, 'एक बार बसन्ती की,,,,,,!!! ' पर, मैंने तो भगा दिया साले को. दोनो बाप-बेटे कमीने है.."
मदन समझ गया की, साली रण्डी, अपनी औकात पर आ गई है। पैंट की जेब में हाथ डाल कर पायल निकाली, और लाजो के सामने लहरा कर बोला,
"ले, बहुत पायल-पायल कर रही है ना, तो पकड़ इसको,,,,,,,,,और बता बसन्ती को कब ले कर आ रही है ?,,,,,,"

"हाय मालिक, पायल लेकर आये थे,,,,,और देखो, तब से मुझे तड़पा रहे थे,,,,,,,,"

और पायल को हाथ में ले उलट पुलट कर देखने लगी। मदन ने सोचा, जब पेशगी दे ही दी है, तो थोड़ा सा काम भी ले लिया जाये. और उसका एक हाथ पकड़ खेत में थोड़ा और अन्दर खींच लिया।

लाजो अभी भी पायल में ही खोई हुई थी। मदन ने उसके हाथ से पायल ले ली और बोला,
"ला पहना दूँ"

लाजो ने चारो तरफ देखा, तो पाया की वो खेत के और अन्दर आ गई है। किसी के देखने की सम्भावना नही है, तो चुप-चाप अपनी साड़ी को एक हाथ से पकड़ घुटनो तक उठा एक पैर आगे बढ़ा दिया। मदन ने बड़े प्यार से उसको एक-एक करके पायल पहनायी, फिर उसको खींच कर घास पर गिरा दिया और उसकी साड़ी को उठाने लगा। लाजो ने कोई विरोध नही किया। दोनो पैरों के बीच आ जब मदन लण्ड डालने वाला था, तभी लाजो ने अपने हाथ से लण्ड पकड़ लिया और बोली,
"हाय, मालिक थोड़ा खेलने दें न ।“
और लण्ड थाम अपनी चूत के होठों पर रगड़ती हुई बोली,
"वैसे छोटे मालिक, एक बात बोलुं,,,,,,,???"
"हां बोल,,,,,,,,,पर ज्यादा खेल मत कर छेद पर लगा दे, मुझ से रुका न जायेगा ।"

"सोने की चैन बहुत महेंगी आती है, क्या??"
क्रमश:………………………


RE: Muslim Sex Stories सलीम जावेद की रंगीन दुन�... - sexstories - 04-25-2019

चौधराइन

भाग 4 – मदन की इन्द्र सभा1



मदन समझ गया की, साली को पायल मिल गयी है. अब मुझे बसन्ती बिना चैन नही और इसे सोने की चैन बिना। लण्ड पर से उसके हाथ को हटा, चूत के मुहाने पर लगा धक्का मारता हुआ बोला,

"महेंगी आये, चाहे सस्ती तुझे क्या,?,,,,आम खाने से मतलब रख गुठली, मत गीन."

इतना सुनते ही, जैसे लाजो एकदम गनगना गई. दोनो बाहों का हार मदन के गले में डालती बोली,
"हाय मालिक,,,,मैं कहाँ,?,,,,मैं तो सोच रही थी, कहीं आपका ज्यादा खर्चा ना हो जाये,,,,,,सम्भल के मालिक, जरा धीरे-धीरे आपका बड़ा मोटा है।"

"मोटा है, तभी तो तेरे जैसी छिनाल की चूत में भी टाईट जाता है,,,,?"
जोर जोर से धक्के लगाता हुआ मदन बोला।

"हाय मालिक, चोदो अब ठीक है,,,,,मालिक अपने लण्ड के जैसी मोटी चैन लेना,,,,,जैसे आपका मोटा लण्ड खा कर चूत को मजा आ जाता है, वैसे ही चैन पहन कर,,,,,"

"ठीक है भौजी, तु चिन्ता मत कर,,,,,,,सोने से लाद दूँगा,,,,,,,,।"

मदन ने लाजो की धुंआधार चुदाई की और उसके भोसड़े की प्यास अपने माल से बुझा दी लाजो भी जीभर के झड़ी। मदन ने झड़ने के बाद लण्ड निकाल कर उसके पेटीकोट में पोंछ कर पैन्ट पहन लिया। लाजो उठती हुई बोली,

"मालिक, जगह का उपाय करना होगा। बसन्ती की अभी अनचुदी बुर है। पहली बार लेगी, वो भी आपका हलब्बी लण्ड, तो बिदकेगी और चिल्लायेगी। ऐसे खेत में जल्दी का काम नही है। उसकी तो आराम से लेनी होगी..."
मदन हँस के बोला बोला,
"अरे अब कोई फ़िकर नहीं ये जो अपने चौधरी चाचा का आम का बागीचा है न, ये आज से मेरी देख रेख में है बगीचे वाले मकान की चाबी भी मेरे पास है बस अब अपनी ऐशगाह वहीं रहेगी अब बोलो कैसा रहेगा वो?"

लाजो ने हां में सिर हिलाते हुए कहा,
"हां मालिक, ठीक रहेगा,,,,,ज्यादा दूर भी नही, फिर रात में किसी बहाने से मैं बसन्ती को खिसका के लेते आऊँगी...."

"चल फिर ठीक है, जैसे ही बसन्ती मान जाये मुझे बता देना."

फिर दोनो अपने अपने रास्ते चल पडे।
घर जा के मदन ने पन्डित सदानन्द से कहा,
“पिताजी रात में रखवाले सो जाते हैं सोचता हूँ अगर मैं वहाँ सोऊँगा तो मेरे डर से जाग कर रख्वाली करेंगे ।”
पन्डित सदानन्द बहुत खुश हुए कि लड़का जिम्मेदार हो रहा है बोले –“ठीक है वहीं सो जाना।”
फ़िर तो दो रातो तक मदन ने चौधरी के बगीचे वाले मकान में उनके मोटे गद्दे वाले विशाल बिस्तर पर खूब जम के लाजो की जवानी का रस चुसा और उसे नंगाकर चिपट के सोया। आखिर पायल की कीमत जो वसुलनी थी। तीसरे दिन लाजो ने बता दिया की रात में बसन्ती को ले कर आऊँगी। मदन बाबू पूरी तैयारी से बगीचे वाले मकान पर पहुंच गये। करीब आधे घंटे के बाद ही दरवाजे पर खट-खट हुई।

मदन ने दरवाजा खोला सामने बनी ठनी लाजो खड़ी थी। मदन ने धीरे से पुछा,
“भौजी, और बसन्ती...???"

लाजो ने अन्दर घुसते हुए, आंखो से अपने पीछे इशारा किया। दरवाजे के पास बसन्ती सिर झुकाये खड़ी थी। मदन के दिल को करार आ गया। बसन्ती को इशारे से अन्दर बुलाया। बसन्ती धीरे-धीरे शरमाती-संकुचती अन्दर आ गई। मदन ने दरवाजा बंद कर दिया, और अन्दर वाले कमरे की ओर बढ़ चला। लाजो, बसन्ती का हाथ खींचती हुई पीछे-पीछे चल पड़ी। अन्दर पहुंच कर मदन ने अंगड़ाई ली। उसने लुंगी पहन रखी थी। लाजो को हाथों से पकड़ अपनी ओर खींच लिया, और बाहों में कसते हुए उसके होठों पर चुम्मा ले बोला,
“क्या बात है भौजी, आज तो कयामत लग रही हो”

“हाय छोटे मालिक, हाय मेरी,,,,,,,हड्डीयां तोड़ोगे क्या,,,,,,,,,,,"आप तो ऐसे ही,,,,,,,,बसन्ती को ले आई।”

बसन्ती बेड के पास चुप चाप खड़ी थी।

“हां, वो तो देख ही रहा हुँ,”
“हां मालिक, लाजो अपना किया वादा नही भुलती,,,,,,,,,लोग भुल जाते है,” 

“आते ही अपनी औकात पर आ गई”
कहते हुए मदन ने पास में पड़े कुर्ते में हाथ डाल कर एक डिब्बा निकाला, और लाजो के हाथों में थमा दिया। फिर उसको कमर के पास से पकड़ कर अपने से चिपका कर, उसके बड़े बड़े चूतड़ों को कस कर दबाता हुआ बोला,
"खोल के देख ले।”

लाजो ने खोल के देखा, तो उसकी आंखो में चमक आ गई।

“हाय मालिक, मैं आपके बारे में कहाँ बोल रही थी ??,,,,,,,,,मैं क्या आपको जानती नहीं।”

लाजो की चूतड़ों की दरार में साड़ी के ऊपर से उँगली चलाते हुए, उसके गाल पर दांत गड़ा उसकी एक चूची पकड़ और कस कर चिपकाया।
लाजो “आह मालिक आआआअ उईईई”
बसन्ती एक ओर खड़ी होकर उन दोनो को देख रही थी। मदन ने लाजो को बिस्तर पर पटक दिया। बिस्तर इतना बड़ा था की, चार आदमी एक साथ सो सकें। दोनो एक दूसरे से गुत्थम-गुत्था हो कर बिस्तर पर लुढकने लगे। होठों को चूसते हुए कभी गाल कटता कभी गरदन पर चुम्मी लेता। इस खींचतान उठापटक में साड़ी कब खुल के अजमीण पे जा गिरी पता ही नहीं चला अब लाजो सिर्फ़ पेटीकोट ब्लाउज में बिस्तर पर पड़ी थी मदन ने ब्लाउज में हाथ डालने की कोशिश की तो चुटपुटिया वाले बटन चौपट खुल गये और मदन ने एकदम से ब्लाउज उतारकर एक तरफ़ डाल दिया लाजो जैसी बेशरम ने भी लजा कर बिस्तर पर पलट सीने के बल हो अपना सीना छिपा लिया, अब उसकी पीठ मदन की तरफ़ थी । मदन ने पीठ पर लगा अंगिया का हुक खोल दिया। चौंक के लाजो के मुँह से निकला –
“ अरे मालिक रुको तो”
और वो उठके बैठगई मदन ने उसे और गोद में खीच लिया और अंगिया भी उतार के फ़ेक दी दो बड़े बड़े खरबूजों जैसे गोल स्तन उछल के बाहर आ गये। मदन ने उन गोलों को दोनों हाथों में दबोच जोर से दबाया फ़िर उनपर मुँह मारने लगा।
लाजो के मुंह से “आ हा अह,,,,,,,,उईईईईईइ, मालिक.."
तभी लाजो फुसफुसा के बोली,
“मेरे पर ही सारा जोर निकालोगे क्या,?,,,,,बसन्ती तो,,,,,,,,,,”

मदन भी फुसफुआते हुए बोला,
“अरे खड़ी रहने दे, तुझे एक राउण्ड चोद दूँ तो कुछ चैन पड़े, चुदाई देख के खुद ही गरम हो जायेगी।” 

मदन की चालाकी समझ, वो भी चुप हो गई।
फिर मदन ने जल्दी से लाजो का पेटी कोट ऊपर समेट दिया जिससे वो लगभग पूरी नंगी लगने लगी। अपनी ननद के सामने पूरी नंगी होने पर शरमा कर बोली,
“हाय मालिक, कुछ तो छोड़ दो,,,,,,,,।”

मदन अपनी लुंगी खोलते हुए बोला,
“पेटीकोट पहने तो हो, भौजी”

मदन का दस इंच लम्बा लण्ड देख कर बसन्ती एकदम सिहर गई। मगर लाजो ने लपक कर अपने दोनों हाथों में थाम लिया, और सहलाने लगी। फ़िर एक हाथ में हथौड़े की तरह लण्ड पकड़ सुपाड़े को दूसरे हाथ की गदेली पर मारते हुए बोली,
“मालिक, बसन्ती ऐसे ही खड़ी रहेगी क्या,,,,,,,,,???”

“अरे, मैंने कब कहा खड़ी रहने को ??,,,,,,,बैठ जाये,,,,,,,,,”

“ऐसी क्या बेरुखी मालिक ?,,,,,,,बेचारी को अपने पास बुला लो ना,” ,
लाजो मदन के बगल में बैठ लण्ड पर अपनी जाँघ चढ़ा कर रगड़ते हुए बोली।

“हाय, बहुत अच्छा भौजी मैं कहाँ बेरुखी दिखा रहा हुं. वो तो खुद ही दूर खड़ी है,,,,,,,”

“हाय मालिक, जब से आई है, आपने कुछ बोला नही है,अरे, बसन्ती आ जा, अपने मदन बाबू बहुत अच्छे है,शहर से पढ़ लिख कर आये है,गांव के उजड्ड गंवारो से तो लाख दरजे अच्छे हैं ।"

बसन्ती थोड़ा सा हिचकी तो, लण्ड छोड़ कर लाजो उठी और हाथ पकड़ उसे बेड पर खींच लिया। मदन ने एक और मसनद लगा, उसको थप थपाते हुए बैठने का इशारा किया। बसन्ती शरमाते हुए मदन के बगल में बैठ गई।
लाजो ने मदन का लण्ड पकड़ हिलाते हुए दिखाया,
“देख कितना अच्छा है !?, अपने मदन बाबू का,,,,एकदम घोड़े के जैसा है,,,,,ऐसा पूरे गांव में किसी का नही,,,,,,,।"

झुकी पलकों के नीचे से बसन्ती ने मदन का हलब्बी लण्ड देखा, दिल में एक अजीब सी कसक उठी। हाथ उसे पकड़ने को ललचाये, मगर शर्म और हलव्वी आकार का डर नही छोड़ पाई।

मदन ने बसन्ती की कमर में हाथ डाल अपनी तरफ खींचा,
“शरमाती क्यों है ? आराम से बैठ,,,,,,,आज तो बड़ी सुन्दर लग रही है,,,,,,,,,खेत में तो तुझे अपना लण्ड दिखाया था ना,,,,,तो फिर क्यों शरमा रही है ?।”

बसन्ती ने शरमा कर गरदन झुका ली। उस दिन के मदन और आज के मदन में उसे जमीन आसमान का अन्तर नजर आया। उस दिन मदन उसके सामने गिड़गिड़ा रहा था. उसको लहंगे का तोहफा दे कर ललचाने की कोशिश कर रहा था, और आज का मदन अपने पूरे रुआब में था.
“हाय् मालिक,,,,,,,,मैंने आज तक कभी,,,,,,,,”

“अरे, तेरी तो शादी हो गई है. दो महीने बाद गौना हो कर जायेगी, तो फिर तेरा पति तो दिखायेगा ही,,,,,,,”

“धत् मालिक,,,,,,,,,,”

“तेरा लहंगा भी लाया हूँ,,,,,,,,,,लेती जाना,,,,,,,,सुहागरात के दिन पहनना,,,,,,,,”

कह कर अपने पास खींच कर, उसकी एक चूची हल्के थाम ली । बसन्ती शरमा कर और सिमट गई। मदन ने उसे अपने से सटा ठुड्डी से पकड़ कर उसका चेहरा ऊपर उठाते हुए कहा,
“बड़ी नशीली लग रही है.”

और उसके होठों से अपने होंठ सटा कर चूसने लगा। बसन्ती की आंखे मुंद गई। मदन ने उसके होठों को चूसते हुए, उसकी चोली में हाथ डाल उसके कटीले आमों को सहलाते हुए दबाने लगा । बसन्ती सिसकारियाँ भरने लगी।

“सीईई,,,,,,, आह मालिक,”

मदन ने धीरे से उसकी चोली के बटन खोलने की कोशिश की, तो बसन्ती ने शरमा कर मदन का हाथ हल्के से हटा दिया। लाजो की विशाल चूची को पकड़ दबाते हुए मदन बोला,
“देखो भौजी, कैसे शरमा रही है ?,,,,,,,,पहले तो चुप-चाप वहां खड़ी रही, अब छूने भी नही दे रही,,,,,,,,,”

लाजो बसन्ती की ओर खिसकी, और उसके गालो को चुटकी में मसल बोली,
“हाय मालिक पहली बार है बेचारी का, शरमा रही है,,,,,,,,,लाओ मैं खोल देती हुं,,,,,”

“मेरे हाथों में क्या बुराई है,,,,,,,,”
“मालिक बुराई आपके हाथों में नही, लण्ड में है,इतना हलव्वी देख कर डर गई है.”
लाजो हाथ बढ़ा बसन्ती की ब्लाउज खोलने लगी तो मदन लाजो की सहूलियत के लिए बीच में से हट गया और घूम कर दोनों औरतों के सामने आ गया। उसने दोनों पर नजर डाली । बसन्ती और उसकी भौजी दोनो सिल्की चमकते हुए ताँम्बई गेहुंये रंग की है। मदन देख रहा था कि लाजो बसन्ती की अंगिया का हुक खोलने की कोशिश कर रही थी जिससे उसके उत्तेजना से खड़े निपल वाले बड़े बड़े स्तन थिरक रहे थे। ये देख मदन ने झपटकर लाजो के बड़े खरबूजे(स्तन) को दोनों हाथों मे दबोच लिया और उसके जामुन जैसे निपल को होठों मे दबा चूसने लगा। लाजो के मुँह से सिसकारियाँ फ़ूट रहीं थी और उसे बसन्ती की अंगिया खोलने में दिक्कत हो रही थी किसी प्रकार बसन्ती की अंगिया निकाल लाजो बोली –
“इस्स्स्स्स्स्स्स्स्स आह!!!! मालिक ये लो”
बसन्ती के दोनो स्तन बड़े कटीले लंगड़ा आम जैसे थे। निप्पल गुलाबी और छोटे-छोटे थे । एकदम अछूते कठोर और नुकिले। मदन ने एक स्तन को हल्के से थाम लिया।

“उफ़्फ़!!”

कहकर मदन ने चूची पर अपना मुंह लगा, जीभ निकाल कर निप्पल को छेड़ते हुए चारों तरफ घुमाने लगा। बसन्ती सिहर उठी। पहली बार जो था।

सिसकते हुए मुंह से निकला, “उई भौजीईईईईईई”
अब मदन के एक हाथ में लाजो का बायाँ और दूसरे में बसन्ती का दायाँ स्तन था और वो उत्तेजना से पागलों की तरह कभी एक पर कभी दूसरे पर पर मुँह मारता कभी जीभ से निपल छेड़ता, कभी चाटता कभी उन कभी दोनों को एक दूसरे से मिला एक साथ दोनों मुँह में भर लेता।
मदन –“ हाय ! भौजी तेरे ये खरबूजे और बसन्ती के लंगड़ा आम जैसी चूचियाँ तो कमाल की हैं।” 
दोनों औरतों के मुँह से निकल रहा था-
इस्स्स्स्स्स्स्स्स्स उई आह!!!! ईईईईईई”
लाजो ने बसन्ती का हाथ पकड़ कर मदन के लण्ड पर रख दिया, और उसके गाल को चुम बोली,
“इस्स्स्स्स्स्स्स्स्स आह!!!! मदन बाबू तो अपने खिलौनों से खेल रहे है, तु भी पकड़ के खेल, मसल, ,,,,,,,ये हम लोगों का खिलौना है.”

मदन को दोनो औरतों की चुचियों को बारी बारी से चूसने में बड़ा मजा आ रहा था ।
कुछ देर बाद उसने लाजो को अपनी गोद में खींच अपने लण्ड पर बैठा बोला –
“आओ भौजी, अपने राकेट पर तो बैठो”

मदन का खड़ा लण्ड उसके बड़े बड़े गद्देदार चूतड़ों में चुभने लगा। लाजो ने कमर हिला मदन का लण्ड चूतड़ों की दरार के बीच में दबा लिया और मदन उसके गुदाज कन्धों को थाम आगे पीछे कर चूतड़ों के बीच लण्ड रगड़ने लगा । मदन के हाथ कंधों से सरकते हुए लाजो के दोनो बड़े बड़े खरबूजों जैसे स्तनों पर आकर उन्हें सहलाने लगे। तभी उसने सामने शरमाती बैठी बसन्ती के गाल और गरदन को चुमते हुए कहा –“ देख बसन्ती हैं शरमायेगी तो सारा मजा तेरी भाभी लूट लेगी, यही तो उमर है मजा लेने की चल आ भौजी के खरबूजों के साथ मुझे अपने लंगड़ा आम (चूची) भी चूसवा ।”
और मदन ने हांथ बढ़ा बसन्ती के नये कटीले आम पकड़ अपनी तरफ़ खींचे और चूसने लगा तो बसन्ती ने सिसकारी भरी –“इस्स्स्स्स्स्स्स्स्स।”
और मदन के सर के पीछे हाथों से सहारा दे चूसने मे सहूलियत कर दी । ये देख मदन ने एक साथ चार चूचियों का मजा लेने के लिए, उसकी चूचियाँ छोड़ लाजो के दोनो बड़े बड़े खरबूजों जैसी चूचियाँ फ़िर से थाम लीं और दबाने लगा । अब मदन जन्नत में था. दोनो हाथ में लाजो के बड़े बड़े खरबूजे और मुँह में बसन्ती की चूचियाँ जिन्हें बसन्ती खुद से उसके मुंह में बारी बारी से ठेल-ठेल कर चूसवा रही थी । लाजो भौजी अपने बड़े बड़े गद्देदार चूतड़ और चूत मदन के फ़ौलादी लण्ड पर रख के बैठी उसकी गरमी से अपनी चूत सेंक रहीं थी। मदन का विशाल लण्ड उसके चूतड़ों की दरार में फ़ँस के चूत तक साँप की तरह फ़ैला हुआ था वो कमर हिला हिला के सिसकारियाँ भर रहीं थी –
“ इस्स्स्स्स्स्स्स्स्स उई आह!!!! ईईईईईई।”
थोड़ी ही देर में उसने दो चुचियों को मसल-मसल कर और दो को चूस-चूस कर लाल कर दिया। चूची चूसवा कर लाजो एकदम गरम हो गई. अपने हाथ से अपनी चूत को रगड़ने लगी। मदन ने देखा तो मुस्कुरा दिया और बसन्ती को दिखाते हुए बोला,
“देख. तेरी भौजी कैसे गरमा गई है, हाथी का भी लण्ड लील जायेगी।”

देख कर बसन्ती शरमा कर. “धत् मालिक,आपका तो खुद घोड़े जैसा,,,,,,,,”

इतनी देर में वो भी थोड़ा बहुत खुल चुकी थी।
“अच्छा है ना ?”

“आपका बहुत मोटा.....!!!धत् मालिक………………………”

क्रमश:…………………………



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चौधराइन
भाग 5 मदन की इन्द्र सभा 2


“मोटे और लम्बे लण्ड से ही मजा आता है,,,,,,,,,क्यों भौजी.....?”
मदन ने लाजो को आवाज दी।
“हां मदन बाबू, आपका तो बड़ा मस्त लण्ड है,,,,,,,,,मेरे जैसी चुदी चूत भी फ़टने लगती है।”
तभी लाजो मदन की गोद से उठ घुटनों के बल हो अपनी खरबूजे सी चूची का निपल मदन के होठों मे देते हुए बोली -“हाय मालिक, दबा मसल के आपने लाल कर दी बहुत दर्द कर रही है थोड़ा चूस के अपनी इस छिनाल भौजी की चूची को कुछ आराम दें। आह मदन चूसने लगा।
आह,,,,,,,,ह सीईईएए,,,,,,,,,,,ह सीईईएए,,,

मदन ““भौजी, जरा अपनी ननद के की नन्ही बिलैय्या(बिल्ली यानि बुर) के दर्शन तो करवाओ।”

“हाय मालिक, नजराना लगेगा…!!। एक दम कोरा माल है, आज तक किसी ने नही…”

“तुझे तो दिया ही है…अपनी बसन्ती रानी को भी खुश कर दूँगा…मैं भी तो देखु कोरा माल कैसा…।”

“हाय मालिक, देखोगे तो बिना चोदे ही निकाल दोगे…इधर आ बसन्ती, अपनी ननद रानी को तो मैं गोद मैं बैठा कर…”,
कहते हुए बसन्ती को खींच कर अपनी गोद मैं बैठा लिया और उसके लहन्गे को धीरे-धीरे कर उठाने लगी।
शरम और मजे के कारण बसन्ती की आंखे आधी बन्द थी। मदन उसकी दोनो टांगो के बीच बैठा हुआ, उसके लहन्गे को उठता हुआ देख रहा था। बसन्ती की गोरी-गोरी जांघे बड़ी कोमल और चिकनी थी। बसन्ती ने लहन्गे के नीचे एक कच्छी पहन रखी थी, जैसा गांव की कुंवारी लड़कियाँ आम तौर पर पहनती है।

लहँगा पूरा ऊपर उठाने के बाद, बसन्ती को शरमाते देख लाजो कच्छी के ऊपर हाथ फेरते हुए बोली,
“चल अच्छा जरा सा कच्छी हटाकर दिखा देती हूँ।”

“हाय, चाहे जैसे परदा हटा…, परदा हटने के बाद फ़ाड़ूँगा तो मैं फिर भी...”

लाजो ने कच्छी के बीच में बुर के ठीक ऊपर हाथ रखा और मयानी मे अपने दो उन्गलियाँ फ़ँसा एक तरफ़ सरका के बसन्ती की कोरी बुर से परदा हटा दिया।
उसकी १६ साल की बुर मदन की भुखी आंखो के सामने आ गई। हल्के-हल्के झाँटों वाली, एकदम कचौड़ी के जैसी फुली बुर देख कर मदन के लण्ड को एक जोरदार झटका लगा।

मदन ने लाजो को इशारा किया तो उसने बसन्ती की कच्छी उतार दोनो टांगे फैला दी और बसन्ती की बुर के ऊपर हाथ फेर उसकी बुर के गुलाबी होंठो पर उँगली चलाते हुए बोली,
“हाय मदन बाबू, देखो हमारी ननद रानी की लालमुनिया…”

नंगी बुर पर उँगली चलने से बसन्ती के पूरे बदन में सनसनी दौड़ गई। सिसकार कर उसने अपनी आंखे पूरी खोल दी। मदन को अपनी बुर की तरफ भूखे भेडिये की तरह से घूरते देख उसका पूरा बदन सिहर गया, और शरम के मारे अपनी जांघो को सिकोड़ने की कोशिश की मगर, लाजो के हाथों ने ऐसा करने नही दिया। वो तो उल्टा बसन्ती की बुर के गुलाबी होंठो को अपनी उंगलियों से खोल कर मदन को दिखा रही थी,

“हाय मालिक, देख लो कितना खरा माल है !!!…ऐसा माल पूरे गांव में नही है…वो तो आपकी मोहब्बत में, मैं आपको मना नही कर पाई…। नही तो ऐसा माल कहाँ मिलता है ?!!…”

“हां रानी, सच कह रही है तु…। मार डाला तेरी ननद की बुर ने…लगता है जैसे दो सन्तरे की फ़ाँके सी जुड़ी हैं!!!!!”

“खाओगे ये सन्तरा मालिक ?…चख कर तो देखो...”

“हाय रानी, खिला,,,,,कोरी बुर का स्वाद कैसा होता है ?…”

लाजो ने बसन्ती की दोनो जांघें फैला दीं।
मदन आगे सरक कर, अपने चेहरे को उसकी बुर के पास ले गया और सन्तरे की फ़ाँके होठों मे दबा लीं जीभ निकाल कर फ़ाँकों के बीच डालने लगा।

“ऊऊफफ्फ्……। भौजी…।
बसन्ती –“सीएएएए मालिक…॥”

बुर के गुलाबी होंठो के बीच जीभ घुसते ही मदन का लण्ड अकड़ के अप-डाउन होने लगा। मदन सन्तरे की फ़ाँके अपने मुंह में भर खूब जोर जोर से चूसने, और फिर बीच में जीभ डाल कर घुमाने लगा। बसन्ती की अनचुदी बुर ने पानी छोड़ना शुरु कर दिया। जीभ को बुर के छेद में घुमाते हुए, उसके भगनसे को अपने होंठो के बीच कस कर चुमलाने लगा। लाजवन्ती उसकी चुचियों को सहला रही थी।

बसन्ती के पूरे तन-बदन में आग लग गई। मुंह से सिसकारियाँ निकलने लगी। लाजो ने पुछा,
“बिट्टो, मजा आ रहा है…?"

“हाय मालिक,…ओओओओ ऊउस्स्स्स्सीईई भौजी, बहुत…उफफ्फ्फ्…भौजी, बचा लो मुझे कुछ हो जायेगा…उफह्फ्फ्फ् बहुत गुद-गुदी…सीएएएए मालिक को बोलो, जीभ हटा ले…हायएए।”

लाजो समझ गई की, मजे के कारण सब उल्टा पुल्टा बोल रही है। उसकी चुचियों से खेलती हुई बोली,
“हाय मालिक,,…चाटो…अच्छे से…अनचुदी बुर है, फिर नही मिलेगी…पूरी जीभ पेल कर घुमाओ...गरम हो जायेगी तब खुद…”
मदन भी चाहता था की, बसन्ती को पूरा गरम कर दे. फिर उसको भी आसानी होगी अपना लण्ड उसकी चूत में डालने में यही सोच, वो टीट के ऊपर अपनी जीभ चलाने लगा।

जीभ ने बुर की दिवारों को ऐसा रगड़ा की, उसके अन्दर आनन्द की एक तेज लहर दौड़ गई। ऐसा लगा जैसे बुर से कुछ निकलेगा, मगर तभी मदन भगनशे पर एक जोरदार चुम्मा ले, उठ कर बैठ गया।

मजे का सिलसिला जैसे ही टुटा, बसन्ती की आंखे खुल गई। मदन की ओर आशा भरी नजरो देखा।

“मजा आया, बसन्ती रानी…!!?”

“हाय मालिक…सीएएएए”, करके दोनो जांघो को भींचती हुई बसन्ती शरमाई।

“अरे, शरमाती क्यों है ?,…मजा आ रहा है तो खुल के बता…और चाटु,,,??”

“हाय मालिक…,! मैं नही जानती...”,
कह कर अपने मुंह को दोनो हाथों से ढक कर, लाजो की गोद में एक अन्गडाई ली।

“तेरी चूत तो पानी फेंक रही है.”

बसन्ती ने जांघो को और कस कर भींचा, और लाजो की छाती में मुंह छुपा लिया।
मदन समझ गया की, अब लण्ड खाने लायक तैयार हो गई है। दोनो जांघो को फिर से खोल कर, चूत की फांको को चुटकी में पकड़ कर, मसलते हुए बुर के भगनशे को अंगुठे से कुरेदा और आगे झुक कर बसन्ती का एक चुम्मा लिया। लाजो दोनो चुचियों को दोनो हाथों में थाम कर दबा रही थी। मदन फिर से टीट के ऊपर अपनी जीभ चलाने लगा। बसन्ती सिसकने लगी। 

“हाय मालिक, निकल जायेगा,,!!??… सीएएएए. हाय मालिक...“

“क्या निकल जायेगा…???,,, पेशाब करेगी क्या…??”

“हां मालिक,,,,, सीएएएए, पेशाब निकल…”

”ठीक है, जा पेशाब कर के आ जा,,,… मैं तब तक भौजी को चोद देता हुं …”
लाजो ने बसन्ती को झट से गोद से उतार दिया, और बोली,
“हां मालिक,,,,, बहुत पानी छोड़ रही है…”

उँगली के बाहर निकालते ही, बसन्ती आसमान से धरती पर आ गई। पेशाब तो लगा नही था, चूत अपना पानी निकालना चाह रही थी. ये बात उसकी समझ में तुरन्त आ गई। मगर तब तक तो पासा पलट चुका था।

उसने देखा की लाजो अपनी ताम्बई चमकती हुई मोटी मोटी केले के खम्बे जैसी जाँघे फैला कर लेट गई थी ।मदन, उसकी दोनो जांघो के बीच बैठ गया और अपने दोनों हाथों से उसकी फ़ूली हुई चुदक्क्ड़ चूत के मोटे मोटे होठों को फ़ैला अपने फ़ौलादी लण्ड का सुपाड़ा टिका, उसकी बड़ी चूचियों को दोनो हाथों में थाम कर बसन्ती की तरफ़ देख बोला –“ अब देख बसन्ती भौजी कैसे मजे से चुदवाती है। बसन्ती एकदम जल-भुन कर कोयला हो गई। उसका जी कर रहा था की लाजो को धकेल कर हटा दे, और खुद मदन के सामने लेट जाये, और कहे की मालिक मेरी में डाल दो।

तभी लाजो ने बसन्ती को अपने पास बुलाया,
“हाय बसन्ती, आ इधर आ कर देख, कैसे मदन बाबू मेरा भोसड़ा चोदते है…?। तेरी भी ट्रेनिंग़…।”

बसन्ती मन मसोस कर सरक कर, मन ही मन गाली देते हुए लाज्वन्ती के पास गई, तो उसने हाथ उठा उसकी चूची को पकड़ लिया और बोली,
“देख, कैसे मालिक अपना लण्ड मेरी चूत में डालते है ?!, ऐसे ही तेरी बुर में भी…उई!”
तभी मदन ने जोर का धक्का मारा. एक ही झटके में पक से पूरा लण्ड उतार दिया। लाजो कराह उठी,
“हाय मालिक, एक ही बार में पूरा …!!… सीएएएएए,,,”

“साली. इतना नाटक क्यों चोदती है? अभी भी तुझे दर्द होता है …??”

“हाय मालिक, आपका बहुत बड़ा है …!।” फिर बसन्ती की ओर देखते हुए बोली,
“…तु चिन्ता मत कर. तेरी में धीरे-धीरे खुद हाथ से पकड़ के डलवाउन्गी… तु मालिक को अपनी चूची चुसा।”

मदन अब धचा-धच धक्के मार रहा था। कमरे में लाजो की सिसकारियाँ और धच-धच फच-फच की आवज गुंज रही थी।

“ले मेरी छिनाल भौजी, ले अपना इनाम तेरी तो आज फ़ाड़ ही दूँगा…। बहुत खुजली है ना तेरी चूत में !!?…ले रण्डी…खा मेरा लण्ड…सीएएएए कितना पानी छोड़ती है !!?……कन्जरी.”

“हाय मालिक .आज तो आप कुछ ज्यादा ही जोश में…। हाय, फ़ाड़ दी मालिक,,”

“हाय भौजी, मजा आ गया…। तूने ऐसी सन्तरेकी फ़ाँको के(जैसी बुर) के दर्शन करवाये हैं, की बस…लण्ड लोहा हो गया है…ऐसा हाय मजा आ रहा है ना भौजी…आज तो तेरी चूत फ़ाड़ मारुन्गा…।
“हाय मालिक, और जोर से चोदो मालिक और जोरसे फ़ाड़ दो …। ……हाय सीएएएएएए,,, सीईईईईईईहयेएएएए,,,”
बसन्ती देख रही थी, की उसकी भाभी अपने चूतड़ उछाल उछाल कर मदन का लण्ड अपनी चूत में ठुँकवा रही थी, और मदन भी कमर उठा-उठा कर उसकी चूत में लण्ड ठोक रहा था। मन ही मन सोच रही थी की, साला जोश में तो मेरी बुर को देख कर आया है, मगर चोद भाभी को रहा है। पता नही मेरी चोदेगा भी कि नही।

करीब पंद्रह मिनट की धका-पेल चोदा-चोदी के बाद लाजो ने पानी छोड़ दिया, और बदन अकड़ा कर मदन की छाती से लिपट गई। मदन रुक गया, वो अपना पानी आज बसन्ती की अनचुदी बुर में ही छोड़ना चाहता था। अपनी सांसो को स्थिर करने के बाद। मदन ने उसकी चूत से लण्ड खींचा। पक की आवाज के साथ लण्ड बाहर निकल गया। चूत के पानी में लिपटा हुआ लण्ड अभी भी तमतमाया हुआ था. लाल सुपाड़े पर से चमड़ी खिसक कर नीचे आ गई थी। पास में पड़ी साड़ी से पोंछने के बाद, वहीं मसनद पर सिर रख कर लेट गया। उसकी सांसे अभी भी तेज चल रही थी। लाजो को तो होश ही नही था। आंखे मूंदे, टांगे फैलाये, बेहोश पड़ी थी। उसकी चूत इतनी देर की ठुकाई से और सूझ गई थी।
बसन्ती ने जब देखा की, मदन अपना खड़ा लण्ड ले कर ऐसे ही लेट गया, तो उस से रहा नही गया। सरक कर उसके पास गई, और उसकी जांघो पर हल्के से हाथ रखा. मदन ने आंखे खोल कर उसकी तरफ देखा और पूछा –“क्या इरादा है?”
तो बसन्ती ने मुस्कुराते हुए कहा,
“हाय मालिक, मुझे बड़ा डर लग रहा है,,? ...आपका बहुत लम्बा !!…”

मदन समझ गया की, साली को चुदास लगी हुई है। तभी खुद उसके पास आ कर बाते बना रही है कि, मोटा और लम्बा है। मदन ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया,
“अरे, लम्बे और मोटे लण्ड से ही तो मजा आता है. एक बार डलवा लेगी, फिर जिन्दगी भर याद रखेगी चल, थाम इसे”
कहते हुए, बसन्ती का हाथ पकड़ के खींच कर अपने लण्ड पर रख दिया।

बसन्ती ने शरमाते-सकुंचते अपने सिर को झुका दिया. मदन ने कहा,
“अरे, शरमाना छोड़ रानी !।”
लाजो वहीं पास पड़ी, ये सब देख रही थी। थोड़ी देर में जब उसको होश आया, तो उठ कर बैठ गई और अपनी ननद के पास आ कर, उसकी चूत अपने हाथ से टटोलती हुई बोली,
“बहुत हुआ रानी, इस मूसल को कितना सहलायेगी ? … अब जरा इससे कुटाई करवा ले,,”

और बसन्ती के हाथ को मदन के लण्ड पर से हटा दिया. और मदन का लण्ड पकड़ के हिलाती हुई बोली.
“ हाय मालिक,,,… जल्दी करिये…बुर एकदम पनिया गई है ।"

“अच्छा भौजी,,,… क्यों बसन्ती डाल दे ना ?…”

“हाय मालिक, मैं नही जानती,,,”

“… चोदे ना,,,??!!??”

“हाय,,…मुझे नही…जो आपकी मरजी हो,,…”

“अरे आप भी क्या मालिक ? …। चल आ बसन्ती, यहां मेरी गोद में सिर रख कर लेट..”
इतना कहते हुए लाजो ने बसन्ती को खींच कर, उसका सिर अपनी गोद में ले लिया और उसको लिटा दिया।
बसन्ती अपनी आंखें बन्द किये किये ही दोनो पैर पसारकर लेट गई थी। मदन उसके पैरों को फैलाते हुए उनके बीच बैठ गया। तभी लाजवन्ती बोली,
“मालिक, इसके चूतड़ों के नीचे तकिया लगा दो … आराम से घुस जायेगा ।"

मदन ने लाजवन्ती की सलह मान कर मसनद उठाया, और हाथों से थप-थपा कर, उसको पतला कर के बसन्ती के चूतड़ों के नीचे लगा दिया। बसन्ती ने भी आराम से चूतड़ों उठा कर तकिया लगवाया। दोनो जांघो के बीच उसकी अनचुदी, हल्के झाँटों वाली बुर चमचमा रही थी। बुर की दोनो नारंगी फांके आपस में सटी हुई थी। मदन ने अपना फनफनाता हुआ लण्ड, एक हाथ से पकड़ कर बुर के थरथराते हुए छेद पर लगा दिया और रगड़ने लगा।
क्रमश:………………………………



RE: Muslim Sex Stories सलीम जावेद की रंगीन दुन�... - sexstories - 04-25-2019

चौधराइन

भाग 6 मदन की इन्द्र सभा 3



बसन्ती गनगना गई। गुदगुदी के कारण अपनी जांघो को सिकोड़ने लगी। लाजो उसकी दोनो चूचियों को मसलते हुए, उनके निप्पल को चुटकी में पकड़ मसल रही थी।
“मालिक, क्रीम लगा लो.”, लाजो बोली.

“चूत तो पानी फेंक रही है… इसी से काम चला लूँगा.”

“अरे नही. मालिक आप नही जानते. … आपका सुपाड़ा बहुत मोटा है … नही घुसेगा … लगा लो.”

मदन उठ कर गया, और टेबल से क्रीम उठा लाया। फिर बसन्ती की जांघो के बीच बैठ कर हाथ में क्रीम लेकर उसकी बुर की फांको को थोड़ा फैला कर अन्दर तक थोप दी।

“अपने सुपाड़े और लण्ड पर भी लगा लो मालिक.” लाजो ने कहा।

मदन ने अपने लण्ड के सुपाड़े पर क्रीम थोप ली।

“बहुत नाटक हो गया भौजी, अब डाल देता हुं....”

“हां मालिक, डालो.....” ,
कहते हुए लाजो ने बसन्ती की अनचुदी बुर के छेद की दोनो फांको को, दोनो हाथों की उंगलियों से फ़ैलाया और छेद पर, सुपाड़े को रख कर हल्का-सा धक्का दिया। कच से सुपाड़ा कच्ची बुर को चीरता आधा घुस कर अड़स गया। बसन्ती तड़प कर मचली, पर तब तक लाजो ने अपना हाथ बुर पर से हटा उसके कंधो को मजबूती से पकड़ लिया था। मदन ने भी उसकी जांघो को मजबूती से पकड़ फैलाये रखा, और अपनी कमर को एक और झटका दिया। अबकी पक की आवाज के साथ सुपाड़ा अन्दर धँस गया।

बसन्ती को लगा, बुर में कोई गरम मूसल घुस गया हो. मुंह से चीख निकल गई, “आआआ,,, ई मरररर, गईईईईई,,, ।"

लाजो उसके ऊपर झुक कर, उसके होठों और गालों को चुमते हुए, बोली,
“कुछ नही हुआ बिट्टो, कुछ नही ! … बस दो सेकंड की बात है.।"
बसन्ती का पूरा बदन अकड़ गया था। खुद मदन को लग रहा था, जैसे किसी जलते हुए लकड़ी के गोले के अन्दर लण्ड घुसा रहा है. सुपाड़े की चमड़ी पूरी उलट गई थी। उसे भी दर्द हो रहा था क्योंकि आज के पहले उसने किसी अनचुदी चूत में लण्ड नहीं डाला था। जिसे भी चोदा था, वो चुदा हुआ भोसड़ा ही था। सो उसने बसन्ती के होठों को, अपने होठों के नीचे कस कर दबा लिया. सुपाड़े को आगे पीछे कर धीरे धीरे चोदने लगा..”
कुछ देर में मदन के सुपाड़े की चमड़ी दुखनी बन्द हो गई और बसन्ती भी चूतड़ उचकने लगी। उसके चेहरे पर मुस्कान फैल गई। सुपाड़ा आराम से चूत के पानी में फिसलता हुआ, सटा-सट अन्दर बाहर होने लगा। दोनों इतने मस्त हो गये दोनों को पता ही नहीं चला कि कब मदन का पूरा लण्ड बसन्ती की बुर में आराम से आने जाने लगा। बसन्ती की बुर चुद के चूत बन गई।
उस रात भर खूब रासलीला हुई। बसन्ती दो बार चुदी। नई नई चूत बनी बुर सूज गई थी मगर, दूसरी बार में उसको खूब मजा आया। पहली चुदाई के बाद बुर से निकले खून को देख बसन्ती थोड़ा सहम गई थी , पर समझाने से मान गई और फिर दूसरी बार उसने खुब खुल कर चुदवाया। सुबह चार बजे जब अगली रात फिर आने का वादा कर दोनो बिदा हुई, तो बसन्ती थोड़ा लँगड़ा कर चल रही थी मगर उसकी आंखो में अगली रात के इन्तजार का नशा थ। मदन भी अपने आप को फिर से तरो ताजा कर लेना चाहता था, इसलिये घोड़े बेच कर सो गया।
आम के बगीचे में मदन की कारस्तानियाँ एक हफ्ते तक चलती रही। मदन के लिये, जैसे मौज-मजे की बहार आ गई थी। तरह तरह के कुटेव और करतूतों के साथ उसने लाजो और बसन्ती का खूब जम के भोग लगाया। पर एक ना एक दिन तो कुछ गड़बड़ होनी ही थी, और वो हो गई।

एक रात जब बसन्ती और लाजो अपनी चूतों की कुटाई करवा कर अपने घर में घुस रही थी, की बेला मालिन की नजर पड़ गई। वो उन दोनो के घर के पास ही रहती थी। उसके शैतानी दिमाग को एक झटका लगा की कहाँ से आ रही है, ये दोनो ?। लाजो के बारे में तो पहले से पता था की, गांव भर की रण्डी है। जरुर कहीं से चुदवा कर आ रही होगी। मगर जब उसके साथ बसन्ती को देखा तो सोचने लगी की, ये छोकरी उसके साथ कहाँ गई थी।
दूसरे दिन जब नदी पर नहाने गई तो, संयोग से लाजो भी आ गई। लाजो ने अपनी साड़ी, ब्लाउज उतारा और पेटीकोट खींच कर छाती पर बांध लिया। पेटीकोट उंचा होते ही बेला की नजर लाजो के पैरों पर पड़ी। देखा पैरों में नयी चमचमाती हुयी पायल। और लाजो भी ठुमक-ठुमक चलती हुई, नदी में उतर नहाने लगी।

“अरे बहुरिया, मरद का क्या हाल चल है ?…”

“ठीक ठाक है चाची, …। परसो चिट्ठी आई थी....”

“बहुत प्यार करता है… और लगता है, खूब पैसे भी कमा रहा है..”

“का मतलब चाची …?”

“वह बड़ी अन्जान बन रही हो बहुरिया, ? … अरे, इतनी सुंदर पायल कहाँ से मिली ये तो ??…”

“कहाँ से का क्या मतलब चाची, …!। जब आये थे, तब दे गये थे...”

“अरे, तो जो चीज दो महिने पहले दे गया था, उसको अब पहन रही है....”

लाजो थोड़ा घबरा गई, फिर अपने को संभालते हुए बोली,
“ऐसे ही रखी हुई थी…। कल पहनने का मन किया तो…”

बेला के चेहरे पर कुटील मुस्कान फैल गई.

“किसको उल्लु बना…???। सब पता है, तु क्या-क्या गुल खिला रही है…??, हमको भी सिखा दे, लोगो से माल ऐठने के गुन..”

इतना सुनते ही लाजो के तन-बदन में आग लग गई।

“चुप साली, तु क्या बोलेगी ?…हरमजादी, कुतनी, खाली इधर की बात उधर करती रहती है …।”
बेला का माथा भी इतना सुनते घुम गया, और अपने बांये हाथ से लाजो के कन्धे को पकड़, धकेलते हुए बोली,
“हरामखोर रण्डी,,,,…चूत को टकसाल बना रखा है…॥ मरवा के पायल मिली होगी, तभी इतनी आग लग रही है ।"

“हां, हां, मरवा के पायल ली है ॥ और भी बहुत कुछ लिया है…तेरी चूतड़ों में क्यों दर्द हो रहा है, चुगलखोर…?”

जो चुगली करे, उसे चुगलखोर बोल दो तो फिर आग लगना तो स्वाभाविक है।

“साली भोसड़चोदी, मुझे चुगलखोर बोलती है. सारे गांव को बता दूँगी । तु किससे-किससे से चुदवाती फिरती है !!?”

इतनी देर में आस-पास की नहाने आई बहुत सारी औरते जमा हो गई। ये कोई नई बात तो थी नही, रोज तालाब पर नहाते समय किसी ना किसी का पंगा होता ही था, और अधनंगी औरते एक दूसरे के साथ भिड़ जाती थी. दोनो एक दूसरे को नोच ही डालती, मगर तभी एक बुढिया बीच में आ गई। फिर और भी औरते आ गई, और बात सम्भल गई। दोनो को एक दूसरे से दूर हटा दिया गया।
नहाना खतम कर, दोनो वापस अपने घर को लौट गई. मगर बेला के दिल में तो कांटा घुस गया था। इस गांव में और कोई इतना बड़ा दिलवाला है नही, जो उस रण्डी को पायल दे। तभी ध्यान आया की, पन्डित सदानन्द का बेटा मदन उस दिन खेत में पटक के जब लाजो की ले रहा था, तब उसने पायल देने की बात कही थी. कहीं उसी ने तो नही दी होगी ?!। फिर रात में लाजो और बसन्ती जिस तरफ से आ रही थी, उसी तरफ तो चौधरी का आम का बगीचा है।

बस फिर क्या था, दोपहर ढलते ही बेला अपने भारी भरकम पिछवाडे को मटकाते हुए चौधरी के बगीचे कि तरफ़ टोह लेने के ख्याल से जा निकली पर उसकी किस्मत कहें या बदकिस्मती कि नदी पर हुए झगड़े की खबर मदन को पहले ही लग गई थी क्योंकि गाँव में ऐसी बाते छिपती ही कहाँ हैं। सो मदन भी बेला की टोह लेता घूम ही रहा था। बगिया के पास दोनों की मुलाकात हुई।
“ राम राम बेला चाची” –मदन ने बेला के भारी चूतड़ों और पपीते सी विशाल चूचियों पे हँसरत भरी नजर डाल के कहा।
“राम राम बेटा” –बेला मदन को देख थोड़ा सकपकाई पर उसकी नजरें अपनी चूचियों चूतड़ों पर देख मन ही मन खुश हो सहज हो गई।
“इधर कहाँ जा रही हो चाची” –मदन ने बेला से पूछा।
ऐसे ही बेटा थोड़ा पेट भारी था सो सोचा थोड़ा टहल लूँ।” – बेला फ़िर थोड़ा हड़बड़ाई पर ऐन मौके पर उसे बहाना सूझ ही गया । अरे चाची आप तो जानती हैं मेरे पिताजी वैद्य हैं मेरे पास उनका अचूक चूरन है क्योंकि मेरा भी पेट गड़बड करता ही रहता है सो मैंने यहीं बगिया वाले मकान पर ही रख रखा है क्योंकि मेरा अधिक समय यहीं गुजरता है आप एक मिनट चली चलो मैं आप को चूरन दे दूंगा तुरन्त आराम हो जायेगा चाची” –मदन ने बेला से बोला।
पहले तो बेला घबराई फ़िर सोचा ये शायद मेरी इसलिए चापलूसी कर रहा है कि मुझे खुश कर लाजो बसन्ती के बारे में मेरा मुँह बन्द करवाना चाहता है इसीलिए मुझे मुफ़्त चूरन देने को कह रहा है। मौका अच्छा है इस समय इससे अचार के लिये बगिया से आम भी ऐंठे जा सकते हैं। सो वो फ़टा फ़ट बगिया वाले मकान में जाने को तैयार हो गईं। मदन उसे आगे आगे कर पीछे से उसके हिलते चूतड़ देखते हुए चल दिया उसका शैतानी दिमाग तेजी से आगे की योजना बना रहा था। मकान के अन्दर पहुँच मदन ने दरवाजा बन्द करते हुए कहा –“ चाची ये दो तरह के चूरन हैं अगर पेट गरम हो तो एक और ठण्डा हो तो दूसरा, जरा पेट तो दिखाइये।”
बेला ने धोती का पल्लू हटा दिया। मदन के सामने उसकी पपीते सी विशाल चूचियाँ और पेट नंगा हो गया। गोरी चिट्टी बेला ने साड़ी पेटीकोट आधे पेट से नाभी के ऊपर बाँधा हुआ था। मदन ने अपनी हथेली उसके मांसल गोरे पेट पर रख दबाई फ़िर चारो तरफ़ दबा दबा के उसकी माँसलता का आनन्द लेने लगा । जवान मर्द का हाथ बेला को भी अपने पेट पर अच्छा लग रहा था। अचानक बेला को छोड़ अलमारी से चूरन की शीशी निकालते हुए मदन बोला –“पेट में गरमी है।”
फ़िर उसे चूरन और पानी का गिलास दे कर कहा –“तुम ये चूरन खालो मैं अभी दो मिनट में तुम्हा्रे पेट का भारीपन ठीक किये देता हूँ।”
बेला ने सोचा चूरन खाने में वैसे भी कोई हर्ज नहीं सो उसने चूरन खाके पानी पी लिया। इधर मदन बिना बेला से कुछ कहे फ़िर अपनी हथेली उसके मांसल गोरे पेट पर चारो तरफ़ दबा दबा के उसकी माँसलता का आनन्द लेने लगा । बेला ने ऐसा दिखाया जैसे वो मदन के इस अचानक व्यवहार के लिए तैयार नहीं थी सो थोड़ी सी लड़खड़ाई और गिरने से बचने के लिए मदन के कन्धे पर हाथ रख दिया।
मदन –“देखो गिरना नहीं मेरे गले में हाथ डाल लो मैं पेट की मालिश कर अभी दो मिनट में तुम्हा्रे पेट का भारीपन ठीक किये देता हूँ।”
बेला –“सचमुच बड़ा आराम मिल रहा है बेटा ।”
और बेला ने मजे से मदन के गले में बाँह डाल दी अब उसका भारी सीना मदन के सीने से टकरा रहा था और वो अपने पेट पर उसके मर्दाने हाथ का मजा लेने लगी। अचानक मदन ने पेटीकोट के नाड़े में हाथ डाल नाभी में उंगली डाल के घुमाई जवान मर्द की मोटी खुर्दुरी उंगली नाभी मे घुसते ही बेला के मुँह से सिसकी निकाल गई। मदन ने बेला चाची की प्रतिक्रिया जानने के लिए उसकी तरफ़ देखा बेला का चेहरा उत्तेजना की लाली से थोड़ा तमतमाया सा लगा।
मदन –“अब पेट कैसा है चाची”
बेला – “आह! काफ़ी आराम है बेटा।”
अचानक मदन का हाथ पेटीकोट के अन्दर ही नाभी से सरक के उसकी चूत पर पहुँच गया और मदन ने महसूस किया बेला की चूत पनिया गई है बस उसने पावरोटी सी फ़ूली चूत सहला दी। मदन ने सुनाकि बेला मालिन के मुँह से सिसकी निकली । बस मदन ने उसी क्षण आर या पार का फ़ैसला कर लिया और अचानक उसने बेला को उठा के बिस्तर पर पटक दिया। और खुद उसके ऊपर कूद गया। बेला अरे अरे ही कहती रह गई तब तक मदन ने एक हाथ से अपने पैंट की चैन खोलते हुए दूसरे हाथ से उसकी साड़ी पेटीकोट उलट दिया और बोला –“ बहुत दिनों से तेरे मटकते चूतड़ों ने परेशान कर रखा था आज मौका लगा है।”
मन ही मन खुश होती बेला मालिन अपनी मोटी मोटी जाँघे फ़ैला दी पर ऊपरी मन से बोली –“ अरे ये क्या बेटा तू मुझे चाची कहता है ।”
मदन ने देखा बेला मालिन की चूत, पावरोटी सी फ़ूली हुई, करीब एक बित्ते के आकार की मोटे मोटे मजबूत होठों वाला भोसड़ा थी । मदन उसकी मोटी मोटी जाँघों के बीच बैठ गया और अपने फ़ौलादी लण्ड का हथौड़े सा सुपाड़ा उसके भोसड़े के मोटे मोटे होठों के बीच रखकर बोला – “तो ले आज तेरा ये भतीजा तुझे खुश कर देगा।”
बेला ने हाथ बढ़ाकर उसका नौ इन्ची लण्ड थामा तो सिहर उठी और अपनी चूत से हटाने की बेमन या कमजोर सी कोशिश करते हुए बोली –“अरे नहीं! अरे ठहर!
मदन ने एक हाथ बेला मालिन के ब्लाउज में हाथ डाला और दूसरे से बेला चाची का हाथ पकड़ उससे अपना लण्ड छुड़ाने लगा । चुटपुटिया वाले बटन एक दम से खुल गये मदन ने ब्रा भी नोचली हुक टूट गया और बेला के विशाल स्तन लक्का कबूतरों से फ़ड़फ़ड़ा के बाहर आ गये स्तनों को हाथों से ढकने के बहाने चुदासी बेला मालिन ने फ़ौरन लण्ड छोड़ दिया पर इस नानुकुर के बीच उसने लण्ड का सुपाड़ा अपनी चूत की पुत्तियों के बीच सही ठिकाने पर लगा दिया था। मदन ने दोनों हाथों मे उसकी सेर सेर भर की चूचियाँ थाम धक्का मारा और एक ही बार मे पूरा लण्ड ठाँस दिया।
बेला के मुँह से निकला –“शाबाश बेटा।“
फ़िर क्या था मदन हुमच हुमच के चोद रहा था और बेला मालिन किलकारियाँ भर रही थी मदन ने उसे आगे पीछे अगल बगल अटक पटक तरह तरह से मन भर चोदा यहाँ तक कि खुद लेट के उसको अपनी गोद में बैठा उसकी चूचियाँ चूसते हुए भी चोदा। जब मदन चोद के और बेला मालिन चुदवा के अघा गये, तो मदन उसे अचार के लिए उसकी मन पसन्द ढेर सारी अमियाँ दे कर बिदा कर मुस्कुराते हुए बोला –“बेला चाची जब पेट भारी हो तो आती रहना ।”
बेला(मुस्कुराते हुए) –“ हाँ बेटा तुझसे अच्छा वैद्य मुझे कहाँ मिलेगा।”
ये बोल और एक अर्थ भरी मुस्कुराहट मदन पर डाल अपनी चुदाई से मस्त हुई बेला चाची वहाँ से चलती बनी।
क्रमश:……………………



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चौधराइन
भाग 7 - चौधराइन का जलवा


अगले दिन बेला खुशी खुशी चौधराइन के घर की ओर दौड़ गई। उसके पेट मे अपनी ये सफ़लता पच नहीं रही थी। चौधराइन ने जब बेला को देखा तो, उसके चेहरे पर मुस्कान फैल गई। हँसती हुई बोली,
“क्या रे, कैसे रास्ता भुल गई ?…कहाँ गायब थी…?। थोड़ा जल्दी आती, अब तो मैंने नहा भी लिया..”

बेला बोली, -“का कहे मालकिन, घर का बहुत सारा काम …। फिर तालाब पर नहाने गई तो वहां…”

“क्यों, क्या हुआ तालाब पर…?”

“छोड़ो मालकिन, तालाब के किस्से को. आप कुर्सी पर बैठो ना, बिना तेल के ही सही थोड़ी बहुत तो सेवा कर ही दूँ ।”

“अरे कुछ नहीं, रहने दे …”

पर बेला के जोर देने पर माया देवी पर बैठ गई । बेला पास बैठ कर माया देवी के पैरों के तलवे को अपने हाथ में पकड़ हल्के हल्के मसलते हुए दबाने लगी।
महा बदमाश बेला ने माया देवी तालाब का जिक्र कर जिज्ञासा तो पैदाकर दी फ़िर मक्करी से इधर उधर की बकवास करने लगी । कुछ देर तक तो माया देवी उसकी बकवास सुनती रहीं फ़िर उनके पेट की खलबली ने उन्हें बेला से पूछने पर मजबूर कर दियाउन्होंने हँसते हुए पूछा –“ क्या हुआ तालाब पर…?”

“अरे कुछ नहीं मालकिन,,पता नही… जरा सी गलत्फ़हमी में बात कहाँसे कहाँ पहुँच जाती है । मैंने तो जो कुछ देखा उससे जो समझ में आया वो किया अब मुझे क्या पता था बात इतनी बढ़ जायेगी कि……!
“अरे कुछ बतायेगी भी या यों ही बक बक किये जायेगी……!”
चौधराइन ने डाँटा।
बेला –“ अब क्या बताऊँ मालकिन कल सुबह मैंने मदन बाबू को आम के बगीचे की तरफ से आते हुए देखा था, तो फिर…॥”

माया देवी चौंक कर बैठती हुई बोली,
“क्या मतलब है तेरा…? वो क्यों जायेगा सुबह-सुबह बगीचे में !?”

“अब मुझे क्या पता क्यों गये थे ?… मैंने तो सुबह में उधर से आते देखा, फ़िर मैंने मैंने लाजो और बसन्ती को भी आते हुए देखा ।… लाजो तो नई पायल पहन ठुमक-ठुमक कर चल रही थी …॥”
जब मैं नहाने तालाब पे गई वहाँ लाजो को देख मैंने पूछ दिया कि पायल कहाँ से आयी तो वो लड़ने लगी। बात आयी गई हो गई मैं तो शाम तक भूल भी गई थी शाम को जब मैं बगिया की तरफ़ से निकली तो मदन बाबू खड़े थे बहाने से मुझे बगिया वाले मकान में बुला ले गये और वही हुआ जिसका दर था। लगता है लाजो ने तालाब वाली बात मदन बाबू को बता दी थी ।”
“अरी! पर हुआ क्या ये तो बता न ।”
मेरी तो कहते जुबान कटती है कि मदन बाबू ने एक हाथ मेरी गरदन में डाला और एक मेरे चूतड़ों में और वहीं बिस्तर पर पटक के चोद दिया।”

बस इतना ही काफी था. माया देवी, नथुने फुला कर बोली,
“एक नंबर की छिनाल है तु,,, … हरामजादी,,,,, कुतिया, तु बाज नही आयी न … रण्डी … निकल अभी तु यहां से,,,,,,चल भाग …। दुबारा नजर मत आना..…”

माया देवी दांत पीस-पीस कर मोटी-मोटी गालियां निकाल रही थी। बेला समझ गई की अब रुकी तो खैर नही। उसने जो करना था कर दिया, बाकी चौधराइन की गालियां तो उसने कई बार खाई थी। बेला ने तुरन्त दरवाजा खोला, और भाग निकली।

बेला के जाने के बाद चौधराइन का गुस्सा थोड़ा शांत हुआ. ठन्डा पानी पी कर बिस्तर पर धम से गिर पड़ी। बेला सच ही बोल रही होगी?… उसकी आखिर मदन से क्या दुश्मनी है, जो झूठ बोलेगी। पिछली बार भी मैंने उसकी बातो पर विश्वास नही किया था।
कैसे पता चलेगा ?
दीनू को बुलाया, फिर उसे एक तरफ ले जाकर पुछा। वो घबरा कर चौधराइन के पैरो में गिर पड़ा, और गिडगिडाने लगा,
“मालकिन, मुझे माफ कर दो …। मैंने कुछ नहीं किया …मालकिन, मदन बाबू ने चाबी लेने के बाद मुझे बगीचे पर जाने से मना कर दिया ।”

माया देवी का सिर चकरा गया। एक झटके में सारी बात समझ में आ गई।

कमरे में वापस आ कर, आंखो को बन्द कर बिस्तर पर लेट गई। मदन के बारे में सोचते ही उसके दिमाग में एक नंग्धड़ंग नवजवान लड़के की तसवीर उभर आती थी. जो किसी भरी पूरी जवान औरत के ऊपर चढ़ा हुआ होता। उसकी कल्पना में मदन एक नंगे मर्द के रुप में नजर आ रहा था। माया देवी बेचैनी से करवटे बदल रही थी।

उनको सदानन्द पर गुस्सा भी आ रहा था, कि लड़के की तरफ़ ध्यान नहीं देता । लड़का इधर-उधर मुंह मारता फिर रहा है। फिर सोचती, मदन ने किसी के साथ जबरदस्ती तो की नही. अगर गांव की औरतें लड़कियाँ खुद चुदवाने के लिये तैयार है, तो वो भी अपने आप को कब तक रोकेगा । नया खून है, आखिर उसको भी गरमी चढ़ती होगी, छेद तो खोजेगा ही अगर घरेलू छेद मिल जाय तो बाहर क्यों मुंह मारेगा। आखिर सदानन्द भी तो पहले दिन में यहाँ वहाँ मुँह मारता फ़िरता था पर जब से दिन में यहाँ मेरे पास आने लगा और मेरी चूत मिलने लगी तब से दिन में यहाँ मेरी लेता है और रात में तो घर पे रह पण्डिताइन की रगड़ता ही है। पण्डिताइन बेचारी को भी आनन्द है और आदमी घर का घर में है। ऐसे ही अगर मदन का भी कुछ इन्तजाम हो जाय तो वो गाँव की बदमाश औरतों से बचा रह सकता है वो सोच रही थी कि मेरे बचपन के दोस्त का बेटा है। मुझे ही कुछ करना होगा। मुझे ही अपनी कुर्बानी देनी होगी। वैसे भी साले सदानन्द को एक दिन में दो चूतें, दोपहर में मेरी और रात में पण्डिताइन की मिलती हैं पण्डिताइन बता रही थी कि साला रात भर रगड़ता है । मैं जब जवान थी, तब भी चौधरी ज्यादा से ज्यादा रात भर में उसकी दो बार लेता था. वो भी शुरु के एक महिने तक। फिर पता नही क्या हुआ, कुछ दिन बाद तो वो भी खतम हो गया. हफ्ते में दो बार, फिर घट कर एक बार से कभी-कभार में बदल गया। और अब तो पता नही कितने दिन हो गये। जबकी अगर बेला की बातो पर विश्वास करे तो, गांव की हर औरत कम से कम दो लंडो से अपनी चूत की कुटाई करवा रही थी। मेरी ही किस्मत फूटी हुई है। कुछ रण्डियों ने तो अपने घर में ही इन्तजाम कर रखा था। यहां तो घर में भी कोई नही, ना देवर ना जेठ । मुझे साला ले दे के दोपहर में एक लण्ड सदानन्द का मिलता है ये कहाँ का न्याय है ।
मुझे एक और लण्ड मिलना ही चाहिये बेला ठीक कहती है मदन को फ़ाँस लेने से किसी को शक नहीं होगा । अपना काम भी हो जायेगा और लड़का गन्दी औरतों से भी बचा रहेगा।
इस तरह विचार कर चौधराइन ने मदन का शिकार करने का पक्का फ़ैसला कर लिया। फ़िर सोचने लगी, क्या सच में मदन का हथियार उतना बड़ा है ?, जितना बेला बता रही थी। सदानन्द के लण्ड का ख्याल कर उसे बेला की बात का विश्वास होने लगा। सदानन्द के लण्ड के बारे में सोचते ही उसकी चूत दुपदुपाने लगती है फ़िर बेला के हिसाब से मदन का लण्ड तो और भी जबर्दस्त है उसकी कल्पना कर उसके बदन में एक सिहरन सी दौड़ गई, साथ ही साथ उसके गाल भी लाल हो गये। करीब घंटा भर वो बिस्तर पर वैसे ही लेटी हुई. मदन के लण्ड, और पिछली बार बेला की सुनाई, चुदाई की कहानियों को याद करती, अपनी जांघो को भींचती करवटें बदलती रही।
माया देवी ने सदानन्द के यहाँ नौकर भेज कर मदन को बुलवाया । मदन घर लुंगी बांधे जैसा बैठा था हड़बड़ाया सा वैसे ही चला आया।
माया देवी ने मदन को लुंगी पहने हड़बड़ाया हुआ देखा तो मन ही मन मुस्कुराई और पुछा, –“ये लुंगी कैसी बांधी हुई है आम के बगीचे पर नहीं जाना क्या आज। तू जाता भी है या योंही ।
“हाँ जाता हूँ चाची । अभी आपने बुलाया इसलिए बगैर कपड़े बदले जल्दी से चला आया अभी घर जा के बदल लूँगा तब जाऊँगा ।”
“जब तू जाता है तो इतने आम कैसे चोरी हो रहे हैं ?” इसी तरह जमीन-जायदाद की देखभाल की जाती है बेटा? तुझसे अकेले नहीं सम्हलता तो नौकरों की मदद ले लेता…
“नौकर ही तो सबसे ज्यादा चोरी करवाते हैं …सब चोर है। इसीलिए तो मैं वहां अकेला ही जाता हूँ ।”
मदन को मौका मिल गया था, और उसने तपाक से बहाना बना लिया।

तभी माया देवी गम्भीरता से बोली …“तो ये बात तूने मुझे पहले क्यों नही बताई…? कोई बात नही, मगर मुझे बता देता तो कोई भरोसे का आदमी साथ कर देती…।”

“अरे नहीं चौधचाची, उसकी कोई जरुरत नही है… मैं सब सम्भाल लूँगा।”
कहते हुए मदन उठने लगा। माया देवी मदन की मजबुत बदन को घूरती हुई बोली,
“ना ना, अकेले तो जाना ही नहीं है…। मैं चलती हूँ तेरे साथ… मैं देखती हुँ चोरों को”
इस धमाके से मदन की ऊपर की साँस ऊपर और नीचे की नीचे रह गई । कुछ देर तक तो वो माया देवी का चेहरा भौचक्का सा देखता ही रह गया।
कल रात ही लाजो वादा करके गई थी, की एक नये माल को फ़ँसा कर लाऊँगी। सारा प्लान चौपट।

फिर अपने आप को सम्भालते हुए बोला,
“नहीं चौधराइन चाची, तुम वहां क्या करने जाओगी ?… मुझे अभी कपड़े भी बदलने हैं। …मैं अकेला ही…”

“नही, मैं भी चलती हुं और तेरे कपड़े ऐसे ही ठीक हैं।…बहुत टाईम हो गया…बहुत पहले गर्मीयों में कई बार चौधरी साहिब के साथ वहां पर जाती थी यहाँतक कि सोती भी थी…कई बार तो रात में ही हमने आम तोड़ के भी खाये थे…चल मैं चलती हूँ।.”

मदन विरोध नही कर पाया।

“ठहर जा, जरा टार्च तो ले लुं…”

फिर माया देवी टार्च लेकर मदन के साथ निकल पड़ी। माया देवी ने अपनी साड़ी बदल ली थी, और अपने आप को संवार लिया था। मदन ने अपनी चौधराइन चाची को नजर भर कर देखा एकदम बनी ठनी, बहुत खूबसुरत लग रही थी। मदन की नजरो को भांपते हुए वो हँसते हुए बोली,
“क्या देख रहा है…?”

हँसते समय माया देवी के गालो में गड्ढे पड़ते थे।

“ कुछ नही. मैं सोच रहा था, आपको कहीं और तो नही जाना था”

माया देवी के होठों पर मुस्कुराहट फैल गई। हँसते हुए बोली,
“ऐसा क्यों…?, मैं तो तेरे साथ बगीचे पर चल रही हूँ।”

“नहीं, तुमने साड़ी बदली हुई है, तो…”

“वो तो ऐसे ही बदल लिया…क्यों,,,अच्छा नही लग रहा…??”

“नही, बहुत अच्छा लग रहा है…आप बहुत सुंदर लग अ…”,
बोलते हुए मदन थोड़ा शरमाया तो माया देवी ने हल्के हँस दी। माया देवी के गालो में पड़ते गड्ढे देख, मदन के बदन में सिहरन दौड़ गई।
दर असल अपनी चौधराइन चाची को उस दिन मालिश देखने के दो-तीन दिन बाद तक मदन बाबू को कोई होश नही था। इधर उधर पगलाये घुमते रहते थे। हर समय दिमाग में वही चलता रहता थ। चौधरी के घर जाते तो चौधराइन से नजरे चुराने लगे थे। जब चौधराइन चाची इधर उधर देख रही होती, तो उसको निहारते। हालांकि कई बार दिमाग में आता की, अपनी चाची को देखना बड़ी गलत बात है , कच्ची उम्र के लड़के के दिमाग में ज्यादा देर ये बात टिकने वाली नही थी। मन बार-बार माया देवी के नशीले बदन को देखने के लिये ललचाता। उसको इस बात पर ताज्जुब होता की, इतने दिनो में उसकी नजर चौधराइन चाची पर कैसे नही पड़ी। फिर ये चाची ही नहीं चौधराइन भी हैं, जरा सा उंच-नीच होने पर चमड़ी उधेड के रख देगी। इसलिये ज्यादा हाथ पैर चलाने की जगह, अपने लण्ड के लिये गांव में जुगाड़ खोजना ज्यादा जरुरी है। किस्मत में होगा तो मिल जायेगा।
मदन थोड़ा धीरे चल रहा था। चौधराइन चाची के पीछे चलते हुए, उसके मस्ताने मटकते चूतड़ों पर नजर पड़ी तो, उसका मन किया की धीरे से पीछे से माया देवी को पकड़ ले, और लण्ड को चूतड़ों की दरार में लगा कर, प्यार से उसके गालो को चुसे। उसके गालो के गड्ढे में अपनी जीभ डाल कर चाट ले। पीछे से सारी उठा कर उसके अन्दर अपना सिर घुसा दे, और दोनो चूतड़ों को मुट्ठी में भर कर मसलते हुए, चूतड़ों की दरार में अपना मुंह घुसा दे।

आज तो लाजवन्ती का भी कोई चांस नही था। तभी ध्यान आया की लाजो को तो बताया ही नही। डर हुआ की, कहीं वो चौधराइन चाची के सामने आ गई तो क्या करूँगा। और वही हुआ. बगीचे पर पहुंच कर खलिहान या मकान जो भी कहिये उसका दरवाजा ही खोला था, की बगीचे की बाउन्ड्री का गेट खोलती हुई लाजो और एक ओर औरत घुसी।।
अन्धेरा तो बहुत ज्यादा था, मगर फिर भी किसी बिजली के खम्भे की रोशनी बगीचे में आ रही थी। चौधराइन ने देख लिया और चौधराइन माया देवी की आवाज गूँजी,
“कौन घुस रहा है बगीचे में,,,,,…?”

मदन ने भी पलट कर देखा, तुरन्त समझ गया कि लाजो होगी। इस से पहले की कुछ बोल पाता, कि चौधराइन की कड़कती आवाज इस बार पूरे बगीचे में गुंज गई,
“कौन है, रे ?!!!…ठहर. अभी बताती हूँ।”

इसके साथ ही माया देवी ने दौड़ लगा दी,
“ साली, आम चोर कुतिया,,,,,!। ठहर वहीं पर…!।”

भागते-भागते एक डन्डा भी हाथ में उठा लिया था। माया देवी की कड़कती आवाज जैसे ही लाजो के कानो में पड़ी, उसकी तो हवा खराब हो गई। अपने साथ लाई औरत का हाथ पकड़, घसीटती हुई बोली,
“ये तो चौधराइन…है…। चल भाग…”

दोनो औरतें बेतहाशा भागी। पीछे चौधराइन हाथ में डन्डा लिये गालियों की बौछार कर रही थी। दोनो जब बाउन्ड्री के गेट के बाहर भाग गई तो माया देवी रुक गई। गेट को ठीक से बन्द किया और वापस लौटी। मदन खलिहान के बाहर ही खड़ा था। माया देवी की सांसे फुल रही थी। डन्डे को एक तरफ फेंक कर, अन्दर जा कर धम से बिस्तर पर बैठ गई और लम्बी-लम्बी सांसे लेते हुए बोली,
“साली हरामजादियाँ,,,,,, देखो तो कितनी हिम्मत है !?? शाम होते ही आ गई चोरी करने !,,,,,अगर हाथ आ जाती तो सुअरनियों की चूतड़ों में डन्डा पेल देती…हरामखोर साली, तभी तो इस बगीचे से उतनी कमाई नही होती, जितनी पहले होती थी…। मादरचोदियां, अपनी चूत में आम भर-भर के ले जाती है…रण्डियों का चेहरा नही देख पाई…”
मदन माया देवी के मुंह से ऐसी मोटी-मोटी भद्दी गालियों को सुन कर सन्न रह गया। हालांकि वो जानता था कि चौधराइन चाची कड़क स्वभाव की है, और नौकर चाकरो को गरियाती रहती है. मगर ऐसी गन्दी-गन्दी गालियां उसके मुंह से पहली बार सुनी थी, हिम्मत करके बोला,

“अरे चौधराइन चाची, छोड़ो ना तुम भी…भगा तो दिया…अब मैं रोज इसी समय आया करूँगा ना. तो देखना इस बार अच्छी कमाई…”

“ना ना,,,,,ऐसे इनकी आदत नही छुटने वाली…जब तक पकड़ के इनकी चूत में मिर्ची ना डालोगे बेटा, तब तक ये सब भोसड़चोदीयां ऐसे ही चोरी करने आती रहेंगी…। माल किसी का, खा कोई और रहा है…”
मदन ने कभी चौधराइन चाची को ऐसे गालियां देते नही सुना था। बोल तो कुछ सकता नही था, मगर उसे अपनी वो सारी छिनाल, चुदक्कड़ औरतें याद आ गई. जो चुदवाते समय अपने सुंदर मुखड़े से जब गन्दी-गन्दी बाते करती थी, तब उसका लण्ड लोहा हो जाता था।

माया देवी के खूबसुरत चेहरे को वो एक-टक देखने लगा. भरे हुए कमानीदार होठों को बिचकाती हुई, जब माया देवी ने दो-चार और मोटी गालियां निकाली तो उनके इस छिनालपन को देख मदन का लण्ड खड़ा होने लगा। मन में आया उन भरे हुए होठों को अपने होठों में कस ले और ऐसा चुम्मा ले की होठों का सारा रस चूस ले। खड़े होते लण्ड को छुपाने के लिये जल्दी से बिस्तर पर चौधराइन चाची के सामने बैठ गया।
क्रमश:…………………



RE: Muslim Sex Stories सलीम जावेद की रंगीन दुन�... - sexstories - 04-25-2019

चौधराइन
भाग-8 चौधराइन के आम


माया देवी की सांसे अभी काफ़ी तेज चल रही थी, और उसका आंचल नीचे उसकी गोद में गिरा हुआ था। बड़ी बड़ी छातियाँ हर सांस के साथ ऊपर नीचे हो रही थी। गोरा चिकना मांसल पेट। मदन का लण्ड पूरा खड़ा हो चुका था।
तभी माया देवी ने पैर पसार अपनी साड़ी को खींचते हुए घुटनों से थोड़ा ऊपर तक चढ़ा, एक पैर मोड़ कर, एक पैर पसार कर, अपने आंचल से माथे का पसीना पोंछती हुई बोली,
“हरामखोरो के कारण दौड़ना पड़ गया…बड़ी गरमी लग रही है. खिड़की तो खोल दे, बेटा।"

जल्दी से उठ कर खिड़की खोलने गया। लण्ड ने लुंगी के कपड़े को ऊपर उठा रखा था, और मदन के चलने के साथ हिल रहा था। माया देवी की आखों में अजीब सी चमक उभर आई थी. वो एकदम खा जाने वाली निगाहों से लुंगी के अन्दर के डोलते हुए हथियार को देख रही थी। मदन जल्दी से खिड़की खोल कर बिस्तर पर बैठ गया, बाहर से सुहानी हवा आने लगी। उठी हुई साड़ी से माया देवी की गोरी मखमली टांगे दिख रही थी।

माया देवी ने अपने गरदन के पसीने को पोंछते हुए, अपनी ब्लाउज के सबसे ऊपर वाले बटन को खोल दिया और साड़ी के पल्लु को ब्लाउज के भीतर घुसा पसीना पोंछने लगी। पसीने के कारण ब्लाउज का उपरी भाग भीग चुका था। ब्लाउज के अन्दर हाथ घुमाती बोली,
“बहुत गरमी है,,,,!! बहुत पसीना आ गया ।"
मदन मुंह फेर ब्लाउज में घुमते हाथ को देखता हुआ, भोंचक्का सा बोल पड़ा,
“हां,,,,!! अह,,, पूरा ब्लाउज भीग,,,,गया...”

“तु शर्ट खोल दे ना…बनियान तो पहन ही रखी होगी…?!।"

साड़ी को और खींचती, थोड़ा सा जांघो के ऊपर उठाती माया देवी ने अपने पैर पसारे.

“साड़ी भी खराब हो…। यहां रात में तो कोई आयेगा नही…”

“नही चाची, यहां…रात में कौन…”

“पता नही, कहीं कोई आ जाये…। किसी को बुलाया तो नही...?”

मदन ने मन ही मन सोचा, जिसको बुलाया था उसको तो तुमने भगा ही दिया, पर बोला, “नही,,,नही,,,!!…किसी को नही बुलाया...!”

“तो, मैं भी साड़ी उतार देती हुं…”
कहती हुई उठ गई और साड़ी खोलने लगी।

मदन भी गरदन हिलाता हुआ बोला,
“हां चौधराइन चाची,,,,फिर पेटिकोट और ब्लाउज…सोने में भी हल्का…”

“हां, सही है…। पर, तु यहां सोने के लिये आता है ?…सो जायेगा तो फिर रखवाली कौन करेगा…???”
“मैं, अपनी नही आपके सोने की बात कहाँ कर रहा हूँ !…आप सो जाइये…मैं रखवाली करूँगा…”

“मैं भी तेरे साथ जाग कर तुझे बताऊँगी कि रखवाली कैसे करनी है नहीं तो मेरे आने का फ़ायदा ही क्या हुआ?”

“तब तो हो गया काम…तुम तो सब के पीछे डन्डा ले कर दौड़ोगी…”

“क्यों, तु नही दौड़ता डान्डा ले कर…? मैंने तो सुना है, गांव की सारी छोरियों को अपने डन्डे से धमकाया हुआ है, तूने !!!?”
चौधराइन ने बड़े अर्थपूर्ण ढंग से उसकी तरफ़ देख मुस्कुराते हुए कहा।
मदन एकदम से झेंप गया,
“धत् चाची,,,,…क्या बात कर रही हो…?”
“इसमे शरमाने की क्या बात है ?… ठीक तो करता है. अपने आम हमें खुद खानें है…। सब चूतमरानियों को ऐसे ही धमकाया दिया कर…।”
चौधराइन ने रंग बदलते गिरगिट की तरह बात का मतलब बदल दिया।

मदन की रीड की हड्डियों में सिहरन दौड़ गई। माया देवी के मुंह से निकले इस चूत शब्द ने उसे पागल कर दिया। उत्तेजना में अपने लण्ड को जांघो के बीच जोर से दबा दिया। चौधराइन ने साड़ी खोल एक ओर फेंक दिया, और फिर पेटिकोट को फिर से घुटने के थोड़ा ऊपर तक खींच कर बैठ गई, और खिड़की के तरफ मुंह घुमा कर बोली,
“लगता है, आज बारिश होगी ।"

मदन कुछ नही बोला. उसकी नजरे तो माया देवी की गोरी-गठीली पिन्डलियों का मुआयना कर रही थी। घुमती नजरे जांघो तक पहुंच गई और वो उसी में खोया रहता, अगर अचानक माया देवी ना बोल पड़ती,
“बदन बेटा, आम खाओगे…!!?”

मदन ने चौंक कर नजर उठा कर देखा, तो उसे ब्लाउज के अन्दर कसे हुए दो आम नजर आये. इतने पास, की दिल में आया मुंह आगे कर चूचियों को मुंह में भर ले. दूसरे किसी आम के बारे में तो उसका दिमाग सोच भी नही पा रहा था. हड़बडाते हुए बोला,
“आम,,,,? कहाँ है, आम…? अभी कहाँ से…?”

माया देवी उसके और पास आ, अपनी सांसो की गरमी उसके चेहरे पर फेंकती हुई बोली,
“आम के बगीचे में बैठ कर…आम नहीं दिख रहे…!!!! बावला हो रहा है क्या?”
कह कर मुस्कुराई…...।
“पर, रात में,,,,,,आम !?”,
बोलते हुए मदन के मन में आया की गड्ढे वाले गालो को अपने मुंह में भर कर चूस ले।

धीरे से बोली,
“अरे रात में ही आम खाने में मजा आता है खा ले! खा ले! वैसे भी तेरा वो बाप सदानन्द कंजूस तो तुझे आम खिलाने से रहा।”
“नहीं चाची, पिताजी आम लाते हैं।”
चौधराइन ने मन ही मन कहा –“वो भी मेरे ही आम चूसता है रोज रात को दुखते हैं।” पर ऊपर से बोलीं –“अरे मुझे न बता वो भी मेरे ही आम से काम चलाता है। चल बाहर चलते हैं।”,
कहती हुई, मदन को एक तरफ धकेलते बिस्तर से उतरने लगी।

इतने पास से बिस्तर से उतर रही थी, की उसकी नुकिली चूचियों ने अपनी चोंच से मदन की बाहों को छु लिया। मदन का बदन गनगना गया। उठते हुए बोला,
“क्या चौधराइन चाची आपको भी इतनी रात में क्या-क्या सूझ रहा है…इतनी रात में आम कहाँ दिखेंगे?”

“ये टार्च है ना,,,,,,बारिश आने वाली है…नहीं तोड़ेंगे तो जितने भी पके हुए आम है, गिर कर खराब हो जायेंगे…।”
और टार्च उठा बाहर की ओर चल दी।
आज उनकी चाल में एक खास बात थी. मदन का ध्यान बराबर उसकी मटकती, गुदाज कमर और मांसल हिलते चूतड़ों की ओर चला गया। गांव की उनचुदी, जवान लौंडियों को चोदने के बाद भी उसको वो मजा नही आया था, जो उसे औरतों (जैसे लाजो, बेला) वगैरह ने दिया था।

इतनी कम उम्र में ही मदन को ये बात समझ में आ गई थी, की बड़ी उम्र की मांसल, गदराई हुई औरतों को चोदने में जो मजा है, वो मजा दुबली-पतली अछूती अनचुदी बुरों को चोदने में नही आता । खेली-खाई औरतें कुटेव करते हुए लण्ड डलवाती है, और उस समय जब उनकी चूत फच-फच…गच-गच अवाज निकालती है, तो फिर घंटो चोदते रहो…उनके मांसल, गदराये जिस्म को जितनी मरजी उतना रगड़ो।

एकदम गदराये-गठीले चूतड़, पेटिकोट के ऊपर से देखने से लग रहा था की हाथ लगा कर अगर पकड़े, तो मोटे मांसल चूतड़ों को रगड़ने का मजा आ जायेगा। ऐसे ठोस चूतड़ की, उसके दोनो भागों को अलग करने के लिये भी मेहनत करनी पड़ेगी। फिर उसके बीच चूतड़ों के बीच की नाली बस मजा आ जाये।

पायजामा के अन्दर लण्ड फनफाना रहा था। अगर माया देवी उसकी चौधराइन चाची नही होती तो अब तक तो वो उसे दबोच चुका होता। इतने पास से केवल पेटिकोट-ब्लाउज में पहली बार देखने का मौका मिला था। एकदम गदराई-गठीली जवानी थी। हर अंग फ़ड़फ़ड़ा रहा था। कसकती हुई जवानी थी, जिसको रगड़ते हुए बदन के हर हिस्से को चुमते हुए, दांतो से काटते हुए रस चूसने लायक था। रात में सो जाने पर साड़ी उठा के चूत देखने की कोशिश की जा सकती थी, ज्यादा परेशानी शायद ना हो, क्योंकि उसे पता था की गांव की औरतें कच्छी नही पहनती।
इसी उधेड़बुन में फ़ँसा हुआ, अपनी चौधराइन चाची के हिलते चूतड़ों और उसमें फँसे हुए पेटिकोट के कपड़े को देखता हुआ, पीछे चलते हुए आम के पेड़ों के बीच पहुंच गया। वहां माया देवी फ्लेश-लाईट (टार्च) जला कर, ऊपर की ओर देखते हुए बारी-बारी से सभी पेड़ों पर रोशनी डाल रही थी।

“इस पेड़ पर तो सारे कच्चे आम है…इस पर एक-आध ही पके हुए दिख रहे…”

“इस तरफ टार्च दिखाओ तो चौधराइन चाची,,…इस पेड़ पर …पके हुए आम…।”

“कहाँ है,,,? इस पेड़ पर भी नही है, पके हुए…तु क्या करता था, यहां पर…?? तुझे तो ये भी नही पता, किस पेड़ पर पके हुए आम है…???”
मदन ने माया देवी की ओर देखते हुए कहा,
“पता तो है, मगर उस पेड़ से तुम तोड़ने नही दोगी…!।"

“क्यों नही तोड़ने दूँगी,,?…तु बता तो सही, मैं खुद तोड़ कर खिलाऊँगी..”

फिर एक पेड़ के पास रुक गई,
“हां,,,!! देख, ये पेड़ तो एकदम लदा हुआ है पके आमों से…। चल ले, टार्च पकड़ के दिखा, मैं जरा आम तोड़ती हूँ…।”
कहते हुए माया देवी ने मदन को टार्च पकड़ा दिया। मदन ने उसे रोकते हुए कहा,
“क्या करती हो…?, कहीं गिर गई तो …? तुम रहने दो मैं तोड़ देता हुं…।”

“चल बड़ा आया…आम तोड़ने वाला…बेटा, मैं गांव में ही बड़ी हुई हुं…जब मैं छोटी थी तो अपनी सहेलियों में मुझसे ज्यादा तेज कोई नही था, पेड़ पर चढ़ने में…देख मैं कैसे चढ़ती हुं…”

“अरे, तब की बात और थी…”

पर मदन की बाते उसके मुंह में ही रह गई, और माया देवी ने अपने पेटिकोट को थोड़ा ऊपर कर अपनी कमर में खोस लिया, और पेड़ पर चढ़ना शुरु कर दिया।
मदन ने भी टार्च की रोशनी उसकी तरफ कर दी। थोड़ी ही देर में काफी ऊपर चढ़ गई, और पेर की दो डालो के ऊपर पैर जमा कर खड़ी हो गई, और टार्च की रोशनी में हाथ बढ़ा कर आम तोड़ने लगी. तभी टार्च फिसल कर मदन की हाथों से नीचे गिर गयी।

“अरे,,,,,क्या करता है तु…? ठीक से टार्च भी नही दिखा सकता क्या ?”

मदन ने जल्दी से नीचे झुक कर टार्च उठायी और फिर ऊपर की…

“ठीक से दिखा,,,इधर की तरफ…”

टार्च की रोशनी चौधराइन जहां आम तोड़ रही थी, वहां ले जाने के क्रम में ही रोशनी माया देवी के पैरो के पास पड़ी तो मदन के होश ही उड़ गये...॥
माया देवी ने अपने दोनो पैर दो डालो पर टिका के रखे हुए थे. उसका पेटिकोट दो भागो में बट गया था. और टार्च की रोशनी सीधी उसके दोनो पैरो के बीच के अन्धेरे को चीरती हुई पेटिकोट के अन्दर के माल को रोशनी से जगमगा दिया।

पेटिकोट के अन्दर के नजारे ने मदन की तो आंखो को चौंधिया दिया। टार्च की रोशनी में पेटिकोट के अन्दर कैद, चमचमाती मखमली टांगे पूरी तरह से नुमाया हो गई. रोशनी पूरी ऊपर तक चूत की काली काली झाँटों को भी दिखा रही थी। टार्च की रोशनी में कन्दली के खम्भे जैसी चिकनी मोटी जांघो और चूत की झाँटों को देख, मदन को लगा की उसका लण्ड पानी फेंक देगा. उसका गला सुख गया और हाथ-पैर कांपने लगे।
तभी माया देवी की आवाज सुनाई दी,
“अरे, कहाँ दिखा रहा है ? यहां ऊपर दिखा ना…!!।

हकलाते हुए बोला,
“हां,,,! हां,,,!, अभी दिखाता…वो टार्च गिर गयी थी…”

फिर टार्च की रोशनी चौधराइन के हाथों पर फोकस कर दी। चौधराइन ने दो आम तोड़ लिये फिर बोली,
“ले, केच कर तो जरा…”
और नीचे की तरफ फेंके, मदन ने जल्दी से टार्च को कांख में दबा, दोनो आम बारी-बारी से केच कर लिये और एक तरफ रख कर, फिर से टार्च ऊपर की तरफ दिखाने लगा…और इस बार सीधा दोनो टांगो के बीच में रोशनी फेंकी. इतनी देर में माया देवी की टांगे कुछ और फैल गई थी. पेटिकोट भी थोड़ा ऊपर उठ गया था और चूत की झाँटें और ज्यादा साफ दिख रही थी। मदन का ये भ्रम था या सच्चाई पर माया देवी के हिलने पर उसे ऐसा लगा, जैसे चूत के लाल लपलपाते होठों ने हल्का सा अपना मुंह खोला था। लण्ड तो लुंगी के अन्दर ऐसे खड़ा था, जैसे नीचे से ही चौधराइन की चूत में घुस जायेगा। नीचे अन्धेरा होने का फायदा उठाते हुए, मदन ने एक हाथ से अपना लण्ड पकड़ कर हल्के से दबाया। तभी माया देवी ने कहा,
“जरा इधर दिखा…।”

मदन ने वैसा ही किया. पर बार-बार वो मौका देख टार्च की रोशनी को उसकी टांगो के बीच में फेंक देता था। कुछ समय बाद माया देवी बोली,
“और तो कोई पका आम नही दिख रहा।…चल मैं नीचे आ जाती हुं. वैसे भी दो आम तो मिल ही गये…। तु खाली इधर उधर लाईट दिखा रहा है, ध्यान से मेरे पैरों के पास लाईट दिखाना।"

कहते हुए नीचे उतरने लगी।
मदन को अब पूरा मौका मिल गया. ठीक पेड़ की जड़ के पास नीचे खड़ा हो कर लाईट दिखाने लगा। नीचे उतरती चौधराइन के पेटिकोट के अन्दर रोशनी फेंकते हुए, मस्त चौधराइन माँसल, चिकनी जांघो को अब वो आराम से देख सकता था. क्योंकि चौधराइन का पूरा ध्यान तो नीचे उतरने पर था, हालांकि चूत की झाँटों का दिखना अब बन्द हो गया था, मगर चौधराइन का मुंह पेड़ की तरफ होने के कारण पीछे से उसके मोटे-मोटे चूतड़ों का निचला भाग पेटिकोट के अन्दर दिख रहा था। गदराई गोरी चूतड़ों के निचले भाग को देख लण्ड अपने आप हिलने लगा था।

एक हाथ से लण्ड पकड़ कस कर दबाते हुए, मदन मन ही मन बोला, “हाय ऐसे ही पेड़ पर चढी रह उफफ्फ्…क्या चूतड़ हैं ?…किसी ने आज तक नही रगड़ा होगा एकदम अछूते चूतड़ों होंगे…। हाय चौधराइन चाची…लण्ड ले कर खड़ा हूँ, जल्दी से नीचे उतर के इस पर बैठ जा ना…”

ये सोचने भर से लण्ड पनिया गया था। तभी चौधराइन का पैर फिसला और हाथ छुट गया। मदन ने हडबड़ा कर नीचे गिरती चौधराइन को कमर के पास से लपक के पकड़ लिया। मदन के दोनो हाथ अब उसकी कमर से लिपटे हुए थे और चौधराइन के दोनो पैर हवा में और मदन का लण्ड सीधा चौधराइन की मोटे गुदाज चूतड़ों को छु रहा था। हडबड़ाहट में दोनो की समझ में कुछ नही आ रहा था, कुछ पल तक मदन ने भी उसके भारी शरीर को ऐसे ही थामे रखा और माया देवी भी उसके हाथों को पकड़े अपनी चूतड़ों को उसके लण्ड पर टिकाये झुलती रही।
कुछ देर बाद, धीरे से शरमाई आवज में बोली,
“हाय,,,,, बच गई,,,,,, अभी गिर जाती. अब छोड़, ऐसे ही उठाये रखेगा क्या,,,,??”

मदन उसको जमीन पर खड़ा करता हुआ बोला
“मैंने तो पहले ही कहा था…”

माया देवी का चेहरा लाल पर गया था। हल्के से मुस्कुराती हुई, कनखियों से लुंगी में मदन के खड़े लण्ड को देखने की कोशिश कर रही थी। अन्धेरे के कारण देख नही पाई मगर अपनी चूतड़ों पर, अभी भी उसके लण्ड की चुभन का अहसास उसको हो रहा था। अपने पेट को सहलाते हुए धीरे से बोली,
“कितनी जोर से पकड़ता है तु ?,,,,लगता है, निशान पड़ गया…”

मदन तुरन्त टार्च जला कर, उसके पेट को देखते हुए बुदबुदाते हुए बोला,
“…वो अचानक ही…।”

मुस्कुराती हुई माया देवी धीरे कदमों से चलती मदन के एकदम पास पहुंच गई…इतने पास की उसकी दोनो चूचियों का अगला नुकिला भाग लगभग मदन की छातियों को टच कर रहा था, और उसकी बनियान में कसी छाती पर हल्के से हाथ मरती बोली,
“पूरा सांड़ हो गया है…तु… मैं इतनी भारी हुं…मुझे ऐसे फ़ूल सा टांग लिया…। चल आम उठा ले।"
क्रमश:………………………………



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