Porn Hindi Kahani दिल दोस्ती और दारू - Printable Version

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RE: Porn Hindi Kahani दिल दोस्ती और दारू - - 12-14-2018

मेरा मोबाइल एक बार फिर बज उठा और मैने घड़ी मे टाइम देखा...घड़ी का सबसे छोटा काँटा अब भी सिर्फ़ 9 पर अटका हुआ था,लेकिन फिर भी मुझे ऐसा लगा कि शायद ये कॉल निशा ने की होगी....मैं तुरंत बिस्तर से उठा और कूदकर टेबल पर से अपना मोबाइल उठाकर स्क्रीन पर नज़र डाली...नंबर अननोन था लेकिन कुच्छ जाना-पहचाना सा लग रहा था....
"हेलो..."

"क्या यार बलराम भाई...माल अभी तक नही पहुचा, भाई मुर्गियो के अन्डो वाला एक ट्रक आख़िर है किधर....कब तक इंतज़ार करूँ..."

ये सुनते ही मैने नंबर पर नज़र डाली और समझ गया कि क्यूँ मुझे ये नंबर जाना-पहचाना सा लग रहा था...

"क्या बोला,माल अभी तक नही पहुचा..."

"अरे नही पहुचा...वरना क्या मैं झूठ बोलता ,तेरे चक्कर मे मैं एक से गाली भी खा चुका हूँ..."

"एक काम करो, अपने दोनो अंडे निकाल कर भिजवा दो..."

"ओये बलराम क्या बक रहा है..."

"बेटा अगर अगली बार से इस नंबर पर कॉल किया तो तेरे अंडे निकालकर तुझे ही खिला दूँगा...बक्चोद साले,अनपढ़...फोन रख लवडे"
.
"कौन था..."अरुण ने मेरा लाल होता हुआ चेहरा देखकर पुछा...

"पता नही साला कोई अंडे वाला है...ग़लती से बार-बार मुझे ही कॉल लगा देता है...चोदु साला"

"अरे हटा उस अंडे फंडे वाले को और तू आगे बता ,फिर क्या हुआ..."वरुण ने मुझे पकड़ा और पकड़ कर सीधे बेड पर खीच लिया...

"अरुण की संगत मे तू भी गे टाइप हरकत करने लगा है..."

"कोई बात नही...तू आगे बता.."
.
.
"तुम दोनो आज कॅंटीन मे जो हुआ,उसका ज़िकरा किसी से भी मत करना...अपने आप से भी नही..."जब कार कॉलेज के बाहर पहुचि तो मैने एश और दिव्या से कहा...
"ऐसा क्यूँ...हम तो इसकी शिकायत प्रिन्सिपल से करेंगे..."एश से तुरंत पीछे पलट कर जवाब दिया...

"और मैं इसकी शिकायत अपने डॅड से करूँगी..."दिव्या ने भी पीछे पलट कर जवाब दिया...

"पहली बात तो ये कि दिव्या तू आगे देख कर ड्राइव कर और दूसरी बात ये कि "एश की तरफ देखकर मैने कहा"सुन बिल्ली,यदि ऐसा हुआ तो उन दोनो का करियर खराब हो जाएगा लेकिन मुझे उनके करियर की बिल्कुल भी परवाह नही है दरअसल बात ये है कि यदि ये मामला कॉलेज मे उच्छला तो इसका रिज़ल्ट ये होगा कि नौशाद और उसके दोस्त कॉलेज से निकले जाने के साथ-साथ जैल भी जाएँगे..."

"तो इसमे प्राब्लम क्या है..."दिव्या एक बार फिर पीछे मुड़कर बोली...

"तू आगे देख के कार चला ना वरना किसी को ठोक-ठाक दिया तो सत्यानाश हो जाएगा..."

"दिव्या ने सही कहा,इसमे प्राब्लम क्या है...उनके साथ ऐसा ही होना चाहिए..."दिव्या का समर्थन करते हुए एश ने कहा"डॉन'ट वरी ,हम तुम दोनो को इन्वॉल्व नही करेंगे..."

"सुन रे फ़ेलीनो...इस केस मे हम दोनो कब्के इन्वॉल्व हो चुके है...और मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूँ क्यूंकी कॅंटीन मे हमारी ठुकाई करने के बाद उन्होने हमे जान से मारने की धमकी दी है..."

"आवववव...."मैं अपनी बात कंप्लीट नही कर पाया था उससे पहले ही दोनो ने आववव करके मुझे रोक दिया....
"क्या आववववव , "

"फिर तो तुम्हे भी पोलीस मे कंप्लेन करना चाहिए..."दिव्या तीसरी बार पीछे मुड़कर बोली...

"तू आगे देख के कार चला ना...मैं बहरा नही हूँ, बिना मेरी तरफ देखे तू कुच्छ बोलेगी तब भी मैं सुन लूँगा..."मैं एक बार फिर दिव्या पर चिल्लाया और जब दिव्या आगे मूड गयी तो बोला"देखो तुम दोनो समझ नही रहे हो...यदि उन दोनो पर केस हुआ तो हॉस्टिल वाले हमारे खिलाफ हो जाएँगे और फिर मेरे साथ-साथ अरुण भी शहीद हो जाएगा..."

"तो इससे हमे क्या लेना-देना..."

"वाह ! यदि यही बात हम दोनो ने उस वक़्त सोची होती,जब कॅंटीन मे तू नौशाद के शिकंजे मे थी...तो शायद ये सिचुयेशन आती ही नही...यदि दिमाग़ नही है तो मत चला ,जितना बोल रहा हूँ उतना कर...कम से कम मेरे भाई जैसे मेरे इस दोस्त की हालत पर तो रहम खाओ पापियो...देख नही रही इसकी हालत..."

"हाई दिव्या..."दिव्या ने जब कार के मिरर मे अरुण को देखा तो अरुण चहकता हुआ बोला..

"हाई अरुण..."मिरर मे देखकर दिव्या ने जवाब दिया...

"अबे तुम दोनो अपना ही,बाइ...बंद रखोगे..कुच्छ देर के लिए"

"ओके,हम तुम दोनो की बात मानने को तैयार है..."आगे मुड़ते हुए एश ने कहा...

"थॅंक्स माइ फ़ेलीनो..."

"पहले बिल्ली अब फ़ेलीनो..इसका मतलब क्या हुआ...लेकिन ये नाम अच्छा लगता है,फ़ेलीनो"

"ज़्यादा खुश मत हो बिल्ली,फ़ेलीनो को स्पॅनिश मे बिल्ली ही कहते है..."
.
उसके बाद हम दोनो कार से उतर गये और उन दोनो को जाने के लिए कहा....

"अबे तूने कहा था तेरे पास एक आइडिया है ,नौशाद के कहर से बचने का..."

"हां, है ना..."

"मुझे भी बता वो आइडिया क्या है.."

"सीडार..."मैने मुस्कुराते हुए कहा .

उसके बाद मैने सीडार को कॉल किया और उसे सारी घटना बताई...शुरू-शुरू मे एमटीएल भाई मुझ पर भड़क उठे और बोले कि दुनियाभर के सारे लफडे मे मैं ही क्यूँ फँसता हूँ...लेकिन बाद मे मेरी रिक्वेस्ट पर वो हॉस्टिल आने के लिए तैयार हो गये,उन्होने मुझसे ये भी कहा कि जब तक वो मुझे कॉल करके हॉस्टिल आने के लिए ना कहे मैं हॉस्टिल के आस-पास भी ना दिखू....एमटीएल भाई की कॉल के बाद मैं और अरुण लगभग चार घंटे तक बाहर ही रहे और फिर रात के 7 बजे सीडार का कॉल आया....
.
"चल,हॉस्टिल चलते है...सीडार पहुच गया है..."

"मुझे अब ऐसा क्यूँ लग रहा है कि हमने कॅंटीन मे जो किया,वो हमे नही करना चाहिए था..."

"तुझे ऐसा इसलिए लग रहा है,क्यूंकी तेरी पूरी तरह से फॅट चुकी है...अब चुप-चाप हॉस्टिल चल वरना मेरे हाथो शहीद हो जाएगा..."
.
जब हम दोनो हॉस्टिल के अंदर दाखिल हुए तो हॉस्टिल मे रहने वाला हर एक लड़का हमे घूर कर देख रहा था,उनके चेहरे से ऐसा लग रहा था कि जैसे वो मुझसे कहना चाहते हो कि उन्हे ,मुझसे ऐसी उम्मीद नही थी...

अरुण के साथ मैं सीधे अमर सर के रूम मे घुसा जहाँ सीडार,अमर ,नौशाद और उसके कॅंटीन वाले दोस्त बैठे हुए थे...

"आ गया साला, बीसी हरामी..."मुझे देखते ही नौशाद ने गालियाँ बाकी...

नौशाद का इस तरह से सबके सामने गाली बकना मुझे पसंद नही आया और मैने भी उस गान्डु को अपने तेवेर दिखाते हुए बोला"म्सी ,चुप रह...तू सीनियर है ,सोचकर मैं कॅंटीन मे मार खा गया...लेकिन यदि एक लफ्ज़ भी और बोला तो यही पटक-पटक कर चोदुन्गा और तू मेरे लंड का एक बाल भी नही उखाड़ पाएगा..."

"मार म्सी को, दाई छोड़ दे साले की.."अरुण भी गुस्से से भड़क उठा...

"बस बहुत हो गया..नौशाद तू चुप रह और तुम दोनो भी अपना मुँह सिल लो...वरना तीनो को मारूँगा..."सीडार ने तेज़ आवाज़ मे कहा,जिसके बाद हम सब शांत हो गये....

"अरमान पहले तू बोल कि,तू हॉस्टिल वालो के खिलाफ क्यूँ गया...ये जानते हुए भी कि नौशाद ने वरुण को मारने मे तेरा साथ दिया था..."

"एक मिनिट एमटीएल भाई...पहले मैं आपको एक एग्ज़ॅंपल देता हूँ..."सीडार के पास जाते हुए मैं बोला"यदि आज कॅंटीन मे उन्दोनो लड़कियो की जगह पर विभा और मेरी जगह पर आप होते....तो क्या आप क्या करते..."

"तू बात को घुमा रहा है अरमान...सच ये है कि ना तो मैं वहाँ था और ना ही विभा..."

"सवाल ये नही है कि मैं क्या कह रहा हूँ,सवाल ये है कि मैं कहना क्या चाहता हूँ...इन्स्ट्रुमेंट वही है,ऑब्स्टकल भी वही है...बस अब्ज़र्वर दूसरा है तो क्या हम उस इन्स्ट्रुमेंट की थियरी बदल देते है, नही ना...बस मैं यही समझाना चाहता हूँ,दट'स ऑल"
.
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"एकतरफ़ा बीड़ू..."वरुण मुझे बीच मे ही रोक कर बोला"आज तूने साबित कर दिया कि तू मेरा दोस्त है..."

"थॅंक्स "बोलते हुए मैने घड़ी मे टाइम देखा...घड़ी का सबसे छोटा काँटा अब 10 मे आने को बेकरार था,..

"एक बात कहूँ ,तूने सीडार की सोर्स का बहुत सॉलिड तरीके से इस्तेमाल किया है..."

"दट'स ट्रू..जब तक वो हमारे साथ रहा , मैने उसका इस्तेमाल बहुत अच्छे से किया था..."बोलते हुए मैं बिस्तर से सिगरेट का पॅकेट लेने के लिए उठ खड़ा हुआ...

"तूने ये क्यूँ कहा कि तूने उसका इस्तेमाल तब तक किया,जब तक वो तेरे साथ रहा..."

वरुण के इस सवाल का जवाब देना मेरे मुश्किल कामो मे से एक था,लेकिन उसे सच तो मालूम ही पड़ता,आज नही तो कल मैं खुद उसे ये सच बताने ही वाला था...मैने एक सिगरेट सुलगाई और लंबा कश लेने के बाद बोला..
"मैने ऐसा इसलिए कहा क्यूंकी सीडार अब ज़िंदा नही है..."


.
अरुण ये सच पहले से जानता था लेकिन वरुण को ये सच एक झटके मे मालूम चला था ,इसलिए वरुण इस वक़्त झटका खाकर शांत बैठा था,सीडार अब ज़िंदा नही है...ये सुनकर वरुण की आँखे बड़ी हो गयी,मुँह खुला का खुला रह गया और दिमाग़ शुन्य हो गया था....वो काफ़ी देर तक मुझे सिगरेट के कश लेते हुए चुप-चाप देखता रहा, वो शायद इस वक़्त सोच रहा था कि मैं सीडार के डेत पर इतना नॉर्मल बिहेवियर कैसे कर सकता हूँ....पर सच ये नही था, सच ये था कि मैं खुद भी बहुत बेचैन हुआ था,जब मुझे सीडार की मौत की खबर मिली थी...उस पल,उस समय,उस वक़्त जब मुझे ये बद्जात और मनहूस खबर मिली तो मुझे यकीन ही नही हो रहा था कि सीडार अब नही रहा ,जब तक कि मैने अपनी आँखो से खुद सीडार की बॉडी को नही देखा था....मैं ये सोच कर चल रहा था कि ये सब झूठ है,सीडार ऐसे ,कैसे मर सकता है...लेकिन मेरे यकीन करने या ना करने से सच नही बदल जाता और ना ही मुझमे और किसी और मे इतनी काबिलियत और ताक़त है कि वो सच को बदल कर रख दे.....

वरुण अब भी एक दम खामोश था और मैं सिगरेट के कश पर कश लिए जा रहा था...जब सिगरेट ख़त्म हुई तो मैने सिगरेट को अपनी उंगलियो के नाख़ून मे फसाया और दूर रखे डस्टबिन पर निशाना लगाकर उछाल दिया....
"गोल..."
"यार,मैं कभी सीडार से नही मिला लेकिन फिर भी उसके बारे मे सुनकर सदमा सा लगा है...कुच्छ करने की इच्छा जैसे ख़त्म सी हो गयी है..."बड़ी मुश्किल से वरुण सिर्फ़ इतना ही बोल पाया...

"किसी से जुड़ने के लिए उससे जान-पहचान ज़रूरी नही...जुड़ाव दिल से होता है,सूरत से नही..."

"ये सब एक दम अचानक से कैसे हुआ...सीडार की मौत कैसे हुई ?"

"मेरे ख़याल से मुझे धीरे-धीरे करके सब बताना चाहिए...लेकिन यदि तू चाहता है कि मैं डाइरेक्ट सीडार के डेत पॉइंट पर आउ,तो मुझे कोई प्राब्लम नही..."

"नही...धीरे-धीरे करके बता.."

मैने घड़ी मे टाइम देखा ,इस वक़्त 10:30 बज रहे थे,लेकिन निशा की कॉल का अभी तक कोई अता-पता नही था,इसलिए मैने कहानी आगे बढ़ाई.....
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"सीडार भाई,ये आपको बातो मे फसा रहा है....यहाँ क्वेस्चन ये है कि अरमान और अरुण हमारे खिलाफ क्यूँ गये...जबकि मैने इन दोनो को प्यार से समझाया भी था कि वहाँ से चले जाए..."नौशाद ने अपना जाल फेका...

अब तक अमर सर के रूम के बाहर हॉस्टिल के लगभग सभी लड़के मौज़ूद हो चुके थे, जो दीवारो,दरवाजो और खिड़कियो पर अपने कान लगाकर बंद दरवाजे के पीछे क्या हो रहा है...ये सुन रहे थे...नौशाद के इस सवाल से मैं एक बार फिर शिकंजे मे फँसने लगा था और मुझे जल्द से जल्द कुच्छ ना कुच्छ करना था...इस वक़्त अमर सर का ये रूम किसी अदालत की तरह था,जहाँ जड्ज के तौर पर एमटीएल भाई थे, नौशाद यहाँ किसी पीड़ित के तौर पर था,जिसने मुझ पर केस ठोका था....यहाँ और असलियत की अदालत मे फरक सिर्फ़ इतना था कि दोनो पार्टी अपनी वकालत खुद कर रही थी...मतलब की नौशाद मुझ पर आरोप पर आरोप देकर मुझे मुजरिम साबित करने पर तुला हुआ था और मैं उन आरोप से बचने की कोशिश मे खुद की पैरवी कर रहा था.....
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नौशाद और उसके दोस्तो का कहना था कि मैने हॉस्टिल की बरसो से चले आ रहे नियम को तोड़ा है,जिसकी सज़ा मुझे मिलनी चाहिए और मेरा कहना था कि मैने नियम इसलिए तोड़ा क्यूंकी ये उस वक़्त ज़रूरी था..क्यूंकी कोई भी नियम ,क़ानून किसी की ज़िंदगी से बड़े नही होते....

"सीडार भाई,मैं तो बोलता हूँ कि ,आप यहाँ से जाओ और इन दोनो को हमारे हवाले कर दो...सालो को सब सिखा देंगे..."नौशाद ने कहा ,जिसके बाद उसके दोस्तो और रूम के बाहर खड़े हॉस्टिल के लड़को ने उसका समर्थन किया....

"एक मिनिट ,एमटीएल भाई...मैने आज कॅंटीन मे जो किया वो सब नौशाद और उसके दोस्तो की भलाई के लिए किया....अब आप सोचो कि ये दोनो जो करने जा रहे थे,उसके बाद इनका क्या हाल होता...."

"क्या होता,कोई कुच्छ नही उखाड़ पाता मेरा "नौशाद बीच मे बोला..

"सुन बे नौशाद...जितनी देर तक इज़्ज़त दे रहा हूँ...ले ले वरना अभी एनएसयूआइ के लौन्डो को बुलवाकर मरवा दूँगा..."उसके बाद मैने सीडार की तरफ देखकर कहा"एमटीएल भाई, यदि आज कॅंटीन मे ये सब अपना काम कर दिए होते तो बहुत लंबा केस बनता, कॉलेज से निकाले जाते...सात साल जैल मे सड़ते और तो और ये भी हो सकता था कि ये चारो कल का सूरज नही देख पाते क्यूंकी एश और दिव्या ,हमारे कॉलेज की कोई मामूली लड़की नही है...जिनके माँ-बाप अपनी दुहाई लेकर पोलीस स्टेशन मे भागते फिरेंगे...एक का बाप इस शहर का बहुत बड़ा बिज़्नेसमॅन है तो दूसरे का बाप इस शहर का डॉन...वो दोनो मिलकर नौशाद और इसके चूतिए दोस्तो को कुत्ते की मौत मारते, इनका लंड काट देते और जब कल सुबह होता तो इनकी लाश किसी अनाथ की तरह सड़को पर पड़ी रहती....और फिर नतीजा ये होता कि इनके घरवालो को पोलीस के चक्कर काटने पड़ते..."मैने अमर सर के रूम का दरवाजा खोला और जो-जो लोग दरवाजे पर कान लगाए हुए थे,मेरी इस हरकत के कारण वही गिर गये और उन सबको देखकर मैने कहा"अब तुम सब ही बताओ कि सही क्या है और ग़लत...और रही हॉस्टिल के सीनियर्स की रेस्पेक्ट की बात तो इन चारो से पुछो की कॅंटीन मे मैने क्या इनपर एक भी बार हाथ उठाया ? ये मुझे और अरुण पर अपनी फ्रस्टेशन निकालते रहे,हमे मारते रहे...लेकिन हमने कुच्छ नही कहा,यहाँ तक कि इनसे मार खाने के बाद मैने और अरुण ने उन दोनो लड़कियो के पैर पकड़ कर इन चारो महापुरषो की हरकत पर माफी भी माँगी और उनसे रिक्वेस्ट भी की..कि वो ये बात किसी को ना बताए और उन्होने हमारी बात मान भी ली है...दट'स ऑल और मेरे ख़याल से अब कहने और सुनने को कुच्छ नही बचा है...आम आइ राइट एमटीएल भाई..."
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फिर क्या था...जहाँ कुच्छ देर पहले हॉस्टिल के लड़के मुझ पर नाराज़ थे वो अब मुझसे खुश थे,हॉस्टिल के सभी लड़के..इंक्लूडेड माइ कमीने फ्रेंड्स अरुण और सौरभ(जो मेरी तारीफ कभी नही करते ) भी मेरी तारीफ कर रहे थे...हॉस्टिल के सभी लफंगो ने नौशाद और उसके दोस्तो को चोदु,गान्डु कहा...कुच्छ ने उनके पिछवाड़े पर एक दो लात भी मारी....
अदालत का फ़ैसला मेरे पक्ष मे हुआ और जब एमटीएल भाई ,रात को अपने घर जा रहे थे तो उन्होने मुझे बुलाया...
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"काफ़ी अच्छा प्लान बनाया तूने..."

"कोई प्लान नही बनाया सीडार भाई...जो सच था ,वही बोला..."

"अरमान ,अपने शब्दो के जाल मे किसी और को फसाना...मुझे पूरा यकीन है कि तूने ये सारे ईक्वेशन सिर्फ़ इसलिए जोड़े,ताकि तू उन दोनो लड़कियो को बचा सके और फिर बाद मे खुद को...सबसे पहले तू कॅंटीन से बाहर आया और मेरे ख़याल से तू कन्फ्यूषन मे था कि हॉस्टिल वाले का साथ दूं या फिर उन दोनो लड़कियो का,..उसके बाद तूने एश का साथ देने का सोचा और उन्दोनो को कॅंटीन से बाहर भगा दिया...तूने नौशाद और उसके दोस्तो पर हाथ भी नही उठाया ताकि तू मेरे और सारे हॉस्टिल वालो के सामने अपना पक्ष मज़बूत कर सके...तूने मुझे अपने प्लान मे तभी शामिल कर लिया था,जब तू एश और दिव्या को बचाने के लिए कॅंटीन मे घुसा और मेरे ख़याल से तूने उन दोनो को ये भी कहा कि वो दोनो कॅंटीन वाली बात किसी को ना बताए,जिससे ये मामला रफ़ा-दफ़ा हो जाए...और फिर तूने मुझे कॉल किया क्यूंकी तू जानता था कि हॉस्टिल वाले मेरी बात मानेंगे और तू ये भी जानता था कि मैं तेरी ही साइड लूँगा...आम आइ राइट ,अरमान सर"

"सच तो यही है लेकिन मुझे लगा नही था कि आप सच जान जाओगे..."

"एक बात याद रखना अरमान कि इस हॉस्टिल मे तेरे अब चार दुश्मन हो गये है...ये चार ,चालीस मे तब्दील ना हो जाए...इसका ख़याल रखना..गुड नाइट, अब मैं चलता हूँ..."

"मैं कभी ये नही सोचता कि मेरे दुश्मन कितने है...मैं हमेशा ये सोचता हूँ कि मेरे दोस्त कितने है....यदि ये चार,चालीस मे बदल जाए...तो मैं कोशिश करूँगा कि मेरे दो दोस्त, 200 मे बदल जाए...वो क्या है ना एमटीएल भाई की ज़िंदगी मे जब तक मार-धाड जैसा एक्शन,अड्वेंचर ना हो तो ज़िंदगी जीने मे मज़ा नही आता... गुड नाइट आंड टेक केर..."

मेरी नज़र अब भी टिक-टिक करती दीवार पर लगी घड़ी पर अटकी हुई थी...घड़ी का सबसे छोटा काँटा बस 1 पर पहुचने ही वाला था,लेकिन निशा की कॉल का अब तक कोई नाम-ओ-निशान नही था...पहले मुझसे बात करने की बेचैनी निशा को थी लेकिन अब मैं बेचैन हुआ जा रहा था....मैं इस उम्मीद मे अभी तक जाग रहा था कि शायद वो मुझे अब कॉल करे, क्यूंकी हो सकता है कि उसे 12 बजे तक टाइम ना मिला हो...या फिर उसके मोम-डॅड उसके आस-पास हो....जब मेरी ये हालत है तो ना जाने उस दायां का क्या हाल हो रहा होगा...मुझे तो ऐसा लगता है कि यदि इस वक़्त मैं उसके सामने आ जाउ तो खुशी के मारे वो किसी दायां की तरह मुझे नोच डाले....

"अब तो हद हो गयी,2 बजने वाला है और मैं उल्लू की तरह उसके कॉल का इंतज़ार कर रहा हूँ...कुच्छ देर मे तो सुर्य भगवान भी अपने दर्शन दे देंगे...."मैने एक सिगरेट जलाई और बाल्कनी पर आ गया....
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ना जाने मैं किस उम्मीद मे निशा के घर की तरफ देख रहा था,मैं इस वक़्त पागलो की तरह सोचने भी लगा था...मैं इस समय ये सोच रहा था कि शायद निशा रात को मेरे फ्लॅट की तरफ आए....मेरा दिल और दिमाग़ इस वक़्त अपनी जगह से थोड़ा खिसक गया था जो मैं ऐसी बेबुनियाद ख़यालात अपने जहाँ मे ला रहा था...मैने बहुत देर तक निशा के घर की तरफ अपनी नज़ारे गढ़ाए रखी इस सोच के साथ कि वो कही यहाँ आकर लौट ना जाए.....

मेरा दिल अब मेरे दिमाग़ पर हावी होते जा रहा था...निशा के उस एक कॉल की इंतज़ार ने मेरे सारी क्षमताओ पर क्वेस्चन मार्क लगा दिया था...मुझे इस समय ना तो रात के तीसरा पहर दिख रहा था और ना ही उल्लू की तरह जाग रहा मैं...मुझे तो दिख रही थी तो सिर्फ़ निशा...कभी-कभी मुझे निशा के घर की तरफ जाने वाली गली मे कुच्छ आहट सुनाई देती ,मुझे ऐसा लगता जैसे कि निशा अभी चारो तरफ फैले इस अंधेरे से बाहर निकल कर प्रकट हो जाएगी....

मेरे 1400 ग्राम वेट वाले ब्रेन का एक नुकसान यही था कि मेरा दिमाग़ हद से ज़्यादा क्रियेटिव था...वो अक्सर छोटी से छोटी आहट को किसी का आकार देने पर जुट जाता है...हर कहानी की एक दूसरी कहानी ही बनाने लग जाता है....जैसे कि इस वक़्त हो रहा था और यदि शॉर्ट मे कहे तो मेरा दिमाग़ फॉर्वर्ड की जगह बॅक्वर्ड डाइरेक्षन मे काम कर रहा था....
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"एक बार निशा के घर का राउंड मार कर आता हूँ,क्या पता वो अपने घर की छत मे खड़े होकर मेरा इंतज़ार कर रही हो..."इसी के साथ एक और बेवकूफी भरी सोच मेरे अंदर आई...

"अबे पागल है क्या, इतनी रात को निशा अपने घर की छत पर क्या दे & नाइट मॅच खेल रही होगी...तू शांति से सो जा..."मैने खुद का विरोध किया....

"अरमान...एक बार देख कर आने मे क्या जाता है...वैसे भी तो तू बाल्कनी मे खड़ा होकर सिगरेट ही जला रहा है...ज़्यादा सोच मत और चल निशा के घर के पास चलते है..."


RE: Porn Hindi Kahani दिल दोस्ती और दारू - - 12-14-2018

मैने पीछे पलट कर रूम के अंदर देखा ,अरुण और वरुण इस समय गहरी नींद मे थे...मैने जल्दी-जल्दी सिगरेट के चार-पाँच कश लिए और बाल्कनी से डाइरेक्ट नीचे कूद गया और अंधेरे मे ही निशा के घर की तरफ चल पड़ा...निशा के घर से कुच्छ दूरी पर आकर मैं रुक गया और निशा के घर पर एक नज़र डाली..वैसे कहने को तो निशा का घर इस कॉलोनी का सबसे बड़ा और आलीशान घर था...लेकिन इस वक़्त रात के अंधेरे मे निशा का घर सबसे भयानक लग रहा था,..पूरे घर की लाइट्स ऑफ थी ,वहाँ रोशनी के नाम पर निशा के घर का चौकीदार जिस रूम मे रहता था,सिर्फ़ उसी रूम की लाइट जली हुई थी....सबसे खूबसूरत चीज़ सबसे बदसूरत भी हो सकती है ,ये मैं अभी देख रहा था इसलिए मैने खुद को यहाँ आने के लिए कोसा और चुप-चाप वहाँ से खिसक लिया...मैं अब अपने फ्लॅट की तरफ आ रहा था ये सोचते हुए कि निशा के दिमाग़ मे इस वक़्त आख़िर चल क्या रहा है और उससे भी ज़्यादा ये कि मेरे दिमाग़ मे इस वक़्त क्या चल रहा है...क्या सोचकर मैं इतनी रात को निशा के घर की तरफ गया कि वो रात के 3 बजे छत पर खड़े होकर पतंग उड़ा रही होगी...उसके बाद मैं ठीक उसी रास्ते से फ्लॅट के अंदर घुसा ,जिस रास्ते से मैं बाहर आया था...अंदर पहुचने मे थोड़ा टाइम लगा, मुश्किले भी आई पर दरवाजे के बाहर खड़े होकर घंटो दरवाजा पीटना और वरुण को आवाज़ देने से ये अच्छा ही था....मैने पीसी ऑन करके अपनी ईमेल भी चेक की ,लेकिन निशा का कोई मैल अभी तक नही आया था....

"कहीं उसके बाप को मालूम तो नही चल गया कि ,निशा और मेरा चक्कर चल रहा है...यदि ऐसा हुआ तो फिर मेरा तो उपरवाला ही मालिक है..."
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आधे से अधिक रात तो मैने सिगरेट पीने मे बीता दी थी और बचा हुआ समय बिस्तर पर पड़े-पड़े करवटें बदलने मे गुजर गया और सुबह 6 बजे जाकर नींद लगी लेकिन 2 घंटे बाद ही मुझे अरुण ने जगा दिया....
.
"उठ बे, 12 बज गये..."

"क्या ? 12 बज गये...धत्त तेरी की..."मैं एक दम से उठकर बैठते हुए बोला और घड़ी पर नज़र डाली"अभी तो 8 बजे है बे "
"चल आगे बता क्या हुआ..."चाय का एक बड़ा सा कप मेरे सामने रखते हुए वरुण बोला...

"अभी नींद आइंग..."बोलते हुए मैं वापस बिस्तर पर लुढ़क गया...

"अबे 10 बजे मुझे ऑफीस जाना है...इसलिए सोच रहा हूँ कि तेरी बकवास सुनता चालू...ले पी.."

मैने कप उठाया और ज़ुबान से लगाया "अबे ये तो दारू है..."शकल बिगाड़ते हुए मैं बोला

"उससे क्या फरक पड़ता है..वैसे यदि तेरा मन नही तो रहने दे..मैं पी लूँगा..."
"ना मुन्ना ना...यू नो दट आइ लव दारू मोर दॅन टी....."
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एश और दिव्या पर मुझे भरोसा नही था कि वो दोनो मेरी बात मानेगी और अपना मुँह बंद करके रखेगी...इसलिए मुझे हर दिन थोड़ा सा डर ज़रूर रहता कि कही वो कॅंटीन वाली बात किसी को बता ना दे...कॅंटीन वाले कांड के बाद कयि दिनो तक दिव्या और एश कॉलेज मे नही दिखी और अपने पास अब इतना टाइम भी नही होता था कि उनके क्लास के बाहर खड़े होकर उनका इंतज़ार करता रहूं....इधर वर्कशॉप वाला फ़ौजी हम पर गोली पे गोली फाइयर किए जा रहा था...उसका कहना था कि हर एक शॉप की एक अलग प्रॅक्टिकल कॉपी बनानी पड़ेगी और 2 फिगर फ्रेम करवाने होंगे...इधर फ़ौजी तो उधर थर्ड सेमेस्टर के एग्ज़ॅम भी कुच्छ हफ्ते बाद दस्तक देने वाले थे....इसलिए समय का मानो अकाल सा पड़ गया था...बड़ी मुश्किल से हम बाथरूम को स्पर्म डोनेट कर पाते...क्यूंकी प्रॅक्टिकल और असाइनमेंट के पन्नो ने हमे सब कुच्छ लगभग भुला सा दिया था...कभी-कभार आते-जाते..एश से मेरी मुलाक़ात हो जाती थी और अब वो मुझे देखकर इग्नोर ना करके एक प्यारी सी स्माइल देती थी ,वो भी गौतम से छिप्कर.......
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जैसा कि मैने पहले बताया कि मेरी याददाश्त बहुत तेज़ है ,मैं चीज़ो को उतनी जल्दी नही भूलता और ना ही उन्हे इग्नोर करता हूँ और पोलीस स्टेशन वाला केस तो जब मेरे क्लास के लौन्डे नही भूले तो भला मैं कैसे भूल सकता हूँ...मैं फर्स्ट एअर के उन दोनो लड़को को दिखाना चाहता था कि मैं क्या हूँ और मेरी स्टेटस क्या है....मेरे ख़याल से ऐसे सिचुयेशन मे दुनिया मे सिर्फ़ दो केटेगरी के लोग होते है....

पहला वो जो बड़ी से बड़ी बात को हंस कर टाल देते है और ऐसे बिहेव करते है..जैसे कि कुच्छ हुआ ही नही...जबकि किसी ने अच्छे से खोलकर उनकी मारी होती है और दूसरे केटेगरी के लोग वो होते है जो एक बूँद जैसी छोटी से छोटी बात को समुंदर बना देते है....

मेरे अंदर ये दोनो ही खूबिया थी,जिन्हे मैं अकॉरडिंग टू सिचुयेशन ,अपने सिक्स्त सेन्स की मदद से अपनी इस खूबी का अच्छे तरीके से इस्तेमाल करता था...मैने उन दोनो को उनकी उस एफ.आइ.आर. वाली करतूत के लिए एक प्लान बनाया था और जैसा कि अक्सर होता है...इस प्लान की खबर सिर्फ़ मुझे और मेरे दिमाग़ को थी...जब मामला लड़ाई-झगड़ा का हो और मेरे प्लान मे सीडार शामिल ना रहे,ये नामुमकिन ही था...इसलिए मैने अपना मोबाइल निकाला और सीडार का नंबर मिलाया....


"गुड आफ्टरनून एमटीएल भाई..."दूसरी तरफ सीडार के द्वारा कॉल रिसीव करते ही मैं बोला...

"मेरे ख़याल से तूने मुझे गुड आफ्टरनून बोलने के लिए तो कॉल नही किया है...चल जल्दी से काम बोल..."

"उन दो लड़को को तो जानते ही होगे,जिन्होने मुझपर और अरुण पर एफ.आइ.आर. किया था..."मैं सीधे पॉइंट पर आ गया,क्यूंकी अब लंच ख़तम ही होने वाला था और मैं नही चाहता था कि वर्कशॉप वाला फ़ौजी मुझपर मिज़ाइल दागे....

"हां नाम से जानता हूँ,..."

"वो दोनो बहुत उड़ रहे है,दोनो को ज़मीन पर लाने का है "

"अभी मुश्किल से तू कॅंटीन वाले केस से बचा है और अब नया लफडा...अबे तू शांति से इंजिनियरिंग क्यूँ नही करता..."

"वो क्या है एमटीएल भाई...कि जब दो अहंकारी लोग टकराते है तो ऐसा धमाका होते ही रहता है...उन्दोनो को थोड़ा सा हम हॉस्टिल वालो की पॉवर दिखानी है..."

"तो इसमे मैं क्या करूँ...लड़के तो तेरी बात मान ही लेंगे, सबको साथ लेजा कर उन दोनो को फोड़ डाल...इसमे प्राब्लम क्या है..."

"प्राब्लम ये है कि मेरी हॉस्टिल वॉर्डन से मेरी जमती नही है और जितना मुझे मालूम है उसके हिसाब से हमारा हॉस्टिल वॉर्डन आपके दोस्त की तरह है..."

"अबे सीधे-सीधे बोल कि करना क्या है....."

मैने एमटीएल भाई को क्या करना है,ये बताया और उसके बाद अपनी प्रॅक्टिकल कॉपी और ड्रॉयिंग शीट लेकर वर्कशॉप की तरफ चल पड़ा....
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"रोल नंबर 11...."

"प्रेज़ेंट सर..."बाहर से मैं चिल्लाया"मे आइ कम इन सर..."

"अंदर आओ और अपने हथियार निकाल कर जंग के लिए तैयार हो जाओ..."

"मैं तैयार हूँ सर..."

"गुड लक...."उसके बाद उस फ़ौजी ने अपने हाथ मे रखी लिस्ट पर नज़र डाली और पूरा दम लगाकर चीखा"रोल नंबर 12...."
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"तेरी हालत ऐसी क्यूँ है बे,तेरा रोल नंबर तो मेरे बाद ही आएगा..."

"उधर देख...साला वो फ़ौजी आज गोली नही मिज़ाइल फाइयर कर रहा है...एक की उसने ड्रॉयिंग रेड पेन से लाल कर दी मतलब 5 नंबर गये,...उस लड़के का ड्रॉयिंग तो मुझसे ठीक-ठाक ही था,जब उसकी ये हालत है तो मेरा क्या होगा...यही सोचकर मैं परेशान हो रहा हूँ...."

"मैं तो बच जाउन्गा "

"कैसे...अपनी ड्रॉयिंग शीट दिखा तो..."

"अबे ,तूने अभी तक एक चीज़ नोटीस की या नही..."जब अरुण ने मेरी ड्रॉयिंग शीट की तरफ अपने हाथ बढ़ाया तो मैने उसके हाथ को रोक उससे पुछा...

"अरे इधर फटी पड़ी है और तू गोल-मोल सवाल कर रहा है..."

"अपना फ़ौजी हर एक बंदे को एग्ज़ॅक्ट 15 मिनिट्स तक रेमंड पर लेता है,ना एक सेकेंड कम और ना ही एक सेकेंड अधिक...."

"तुझे कैसे पता..."

"अबकी बार जब रोल नंबर 10 वाला लड़का जाए तो टाइम देख लेना...उसकी टेबल पर रखी स्टॉप . तब चालू होती है जब कोई स्टूडेंट अपनी फाइल खोलकर रखता है और वो 15 मिनिट्स तक उस स्टूडेंट पर बॉम्ब फोड़ता है और फिर बेज़्जती करके भेज देता है और फिर बाद वाले स्टूडेंट को 10 सेकेंड्स के अंदर ही वहाँ पहुचना है,जिसके बाद उस फ़ौजी की स्टॉप . फिर चालू हो जाती है....."

"ये सब क्या उस छोटे कद वाले फ़ौजी ने तेरे सपने मे आकर कहा "

"रोल नंबर 9 तक तो वो यहीं करता आ रहा है "

"और यदि उसके पास पहुचने मे 10 सेकेंड्स से ज़्यादा वक़्त लग गया तो..."

"तो फिर वो उस लड़के/लड़की की प्रॅक्टिकल कॉपी और ड्रॉयिंग शीट को छोड़ देगा...इसलिए मर्दो की तरह लंबे-लंबे कदम बढ़ाना...वरना वहाँ पहुचने से पहले ही चुड जाएगा...समझा...."
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थोड़ी देर तक अरुण शांत रहा लेकिन फिर मेरे पास आकर बोला"यार अरमान, उसने अभी-अभी एक की राइटिंग खराब होने की वजह से सी+ ग्रेड दिया है....मेरी राइटिंग तो उससे भी खराब है मैं क्या करूँ... ,कुच्छ जुगाड़ जमा ना"

"एक जुगाड़ है..."

"क्या..."

"वो जुगाड़ क्या मैं तुझे चिल्ला-चिल्ला कर बताउन्गा... कान इधर ला..."

अरुण को जुगाड़ बताने के बाद मैं एक दम सीधा खड़ा हो गया ,क्यूंकी अगला रोल नंबर मेरा ही था.....चूतिए थे शुरू के 10 स्टूडेंट्स जो ड्रॉयिंग शीट को उपर रख कर ले जा रहे थे, मैने ड्रॉयिंग शीट को सबसे नीचे रखा और अब मुझे कैसे भी करके 15 मिनिट्स तक बिना ड्रॉयिंग शीट दिखाए उस फ़ौजी के वॉर को सहना था...क्यूंकी मेरी ड्रॉयिंग शीट तो एक दम सफेद थी...मतलब कि उसमे कोई ड्रॉयिंग ही नही थी और यदि वो फ़ौजी भूल से भी मेरा वो कारनामा देख लेता तो मुझ पर अटॉमिक अटॅक कर देता और यही वजह थी कि जब अरुण ने मेरी ड्राइंग शीट देखने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाया तो मैने उसका हाथ रोक दिया था,क्यूंकी मैं नही चाहता था कि वो गला फाड़कर मुझपर चिल्लाए कि"अरमान तो एक दम कोरा कागज है..."
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"रोल नंबर. 11...."अपनी घड़ी पर 10 सेकेंड्स का समय देखते हुए उसने मेरा नाम पुकारा...

और मैं 6 सेकेंड मे ही उसके पास पहुच गया....जब फ़ौजी मेरी प्रॅक्टिकल कॉपी देख रहा था तभी मैने आर्मी वाला मॅटर छेड़ दिया...जिसके बाद उसने मेरी प्रॅक्टिकल कॉपी और ड्रॉयिंग शीट एक तरफ रखवा दी और मुझसे उसी मॅटर पर बात करने लगा...वो इस डिस्कशन मे इतना खो गया था कि मुझे ,उसको याद दिलाना पड़ा की "ल्यूटेनेंट सर,15 मिनिट्स हो गये है "
"रोल नंबर. 12...."फ़ौजी ने फिर से अपनी स्टॉप . शुरू कर दी और उसी वक़्त अरुण के पास जाकर मैने धीरे से कहा की ..."नेवी के बारे मे इससे बात कर...लेकिन पहले प्रॅक्टिकल कॉपी दिखा देना,ताकि उसे शक़ ना हो"


अरुण के पास जाकर मैने धीरे से कहा की..."नेवी के बारे मे इससे बात कर...लेकिन पहले प्रॅक्टिकल कॉपी दिखा देना,ताकि उसे शक़ ना हो"
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"अपुन को तो बस थोड़ा हिंट चाहिए था ,बाकी दिमाग़ तो मेरे पास भी है....अब तू देख इस फ़ौजी को कैसे चकमा देता हूँ..."
अरुण ने चलते-चलते अपनी सारी प्रॅक्टिकल कॉपी एक हाथ मे और ड्रॉयिंग शीट को दूसरे हाथ से पकड़ लिया और टेबल पर बैठे उस फ़ौजी के पास जाकर बोला...

"भारत माता की जय..."

"जय हो भारतमाता की..."एका एक फ़ौजी जैसे खुशी से झूम उठा और अरुण की तरफ देखकर बोला"मुझे तुम्हारे जैसे जोशीले लड़को की ज़रूरत है...खैर अपनी प्रॅक्टिकल कॉपी दिखाओ"

अरुण ने अपनी प्रॅक्टिकल कॉपी एक के बाद एक दिखानी शुरू कर दी...शुरू मे जहाँ फ़ौजी अरुण से एक दम खुश हुआ था ,वही अब अरुण की राइटिंग देखकर उसके चेहरे का रंग बदलने लगा था....

"तुम जैसे जोशीले जवान की इतनी खराब पेर्फोमन्स "अफ़सोस जाहिर करते हुए उस फ़ौजी ने अपना चश्मा उतार कर टेबल पर रख दिया....

"हाथ मे गोली लग गयी थी सर,वरना मेरी राइटिंग का पूरे क्लास मे क्या पूरे कॉलेज मे कोई शानी नही है..."

"हाथ मे गोली लग गयी थी,मतलब..."वापस अपना चश्मा लगाते हुए फ़ौजी ने पुछा...

"मतलब की मैं हॉस्टिल मे गिर गया था...और कल रात भर दर्द सहते हुए जैसे-तैसे काम कंप्लीट किया है..."

"एक्सलेंट, माइ बॉय....एक्सलेंट...मुझे तुम्हारे जैसे जोशीले लड़को को देखकर अपने दिन याद आ जाते है...."

"तो अब मैं चलूं..."

"बिल्कुल जाओ और नंबर की परवाह मत करना...."

"थॅंक यू सर..."

अपना कॉलर उपर करते हुए अरुण मेरे पास आया 

"बेटा अरमान, शर्त लगा ले...वर्कशॉप मे तो तुझसे ज़्यादा नंबर पाउन्गा...."
"तूने रात भर मेहनत की ,सारा दिन प्रॅक्टिकल कॉपी को नीली स्याही से भरने मे बिताया,...फिर 4 से 5 घंटे मे तूने ड्रॉयिंग बनाया ,इसलिए यदि तू 1-2 नंबर अधिक पा जाता है तो इसमे कौन सी बड़ी बात है..."

"देख अपनी हार मान ले..."

"कभी नही....बिल्कुल भी नही..."

"साले घमंडी..."

"चल...चलकर सौरभ और सुलभ को इस जंग को जीतने का उपाय बता देते है ,वरना वो दोनो खाम खा शहीद हो जाएँगे...."
जब हमारा काम ख़तम हुआ तो हम दोनो सौरभ और सुलभ की तरफ बढ़ गये, दोनो का रोल नंबर लास्ट मे आता था,इसलिए इस वक़्त दोनो आपस मे बात-चीत करने मे मगन थे
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"सुलभ ,मैं तुझे उस फ़ौजी से बचने का ट्रिक बताता हूँ...."सुलभ के सामने जाकर मैने शान से कहा...

"रहने दो अरमान सर, मुझे उस फ़ौजी से बचने के लिए किसी ट्रिक की ज़रूरत नही है..."

"जब वो पकड़ कर चोदेगा तब तुझे समझ मे आएगा,..."

"लंड मेरे पास भी है...मतलब कि ड्रॉयिंग एक दम करेक्ट है,राइटिंग मेरी सॉलिड है, फाइल भी कंप्लीट है और मुझे सब याद है...."

"चल ठीक है,तू निकल...सौरभ अंकल आपको ट्रिक बताऊ या आपकी भी फाइल कंप्लीट है,ड्रॉयिंग सही है,राइटिंग सॉलिड है और सब कुच्छ याद है..."

"पढ़ने ,लिखने से किसका भला हुआ है यार , तू तो मुझे ट्रिक बता...."
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"अरुण तुझे फर्स्ट एअर के वो दो लड़के याद है ,जिन्होने एफ.आइ.आर. किया था..."वर्कशॉप से बाहर आने के बाद मैने अरुण से पुछा...

"*** की चूत उन दोनो की, बड़ी मुश्किल से बचा था लास्ट टाइम...आत्मा शरीर से निकालने ही वाली थी कि सीडार ने आकर सब संभाल लिया...याद मत दिला वो कांड..."

"मैं उन दोनो को ठोकने का सोच रहा हूँ...."

"क्या...."अरुण जहाँ था वही रुक गया और साथ मे सौरभ और सुलभ के भी पैर वही जम गये...वो तीनो मुझे ऐसे देख रहे थे, जैसे की अभी-अभी मैने उन्हे कोई बहुत बुरी खबर सुनाई हो...जिसपर उन्हे यकीन नही हो रहा था....

"क्या कहा तूने..."आगे बढ़ते हुए अरुण ने मुझे घूरा...

"तूने कहा कि तू उन दोनो लड़को को ठोकने वाला है..."अबकी बार सौरभ ने मुझे घूरा और आख़िर मे मेरे आख़िरी दोस्त,सुलभ ने भी मुझे गुस्से से घूरा....
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"हर बार सीडार तुझे बचा नही पाएगा...."सौरभ ने एक मुक्का मारते हुए कहा...

"और मैं तेरे इस कांड मे तेरे साथ नही हूँ..."दूसरा मुक्का जड़ते हुए अरुण बोला और फिर सुलभ से तीसरा मुक्का जड़ते हुए कहा"छोड़ना मत उन दोनो को...."

"अरे ग़ज़ब...जियो मेरे लाल..."दिल किया कि सुलभ को पकड़ कर किस कर लूँ,लेकिन साला वो लड़का था..इसलिए मैं वहिच पर रुक गया


RE: Porn Hindi Kahani दिल दोस्ती और दारू - - 12-14-2018

सौरभ और अरुण को मानने मे बहुत दिमाग़ खफ़ाना पड़ा और ये मैं पहले से जानता था कि वो दोनो मुझे ऐसा हरगिज़ नही करने देंगे और वो दोनो कैसे मानेंगे...ये मुझे अच्छी तरह मालूम था...मैने सौरभ से कहा कि मैं उसे विभा माँ की चूत दिलाउन्गा और अरुण से कहा कि उसे मैं दिव्या की चूत....सॉरी चूत नही चम्मी दिलाउन्गा...और वो दोनो एक सेकेंड मे मान गये....

"तो क्या उन्हे उनके ही क्लास मे घुसकर मारने का प्लान है..."सुलभ अपने शर्ट की बाहे उपर उठाते हुए बोला...

"नो...और तू जा..."सौरभ बोला"मैं नही चाहता कि तेरे जैसा ब्रिलियेंट लौंडा ,हमारी वजह से मुश्किलो मे पड़े..."

"तेरे चाहने और ना चाहने से क्या होता है..."

"मैं भी ऐसा चाहता हूँ..."

"और मैं भी यही चाहता हूँ कि तू यही से वापस लौट जाए..."

अरुण और मेरे द्वारा सौरभ की बात का समर्थन करने पर सुलभ चिढ़ गया और हम तीनो को गाली देते हुए वहाँ से चला गया....

"लगता है साला बुरा मान गया..."सुलभ को जाते देख सौरभ ने मुस्कुराते हुए कहा"लेकिन मुझे मालूम है कि वो आज रात फोन ज़रूर करेगा,ये जानने के लिए कि क्या हुआ..."

"बुरा वो मानता है,जिसका बुर होता है...और हम लड़को के पास बुर नही लंड होता है..."अरुण ने एक दम शांति से ये डाइलॉग मारा...जिसके बाद हम हँसते-हँसते हॉस्टिल की तरफ चले गये....
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अकॉरडिंग टू और प्लान...फर्स्ट एअर के उन दो लड़को को उनके ही क्लास के कुच्छ लड़के...ठीक उसी ग्राउंड पर लाने वाले थे,जहाँ पर वरुण और उसकी दोस्तो को हमने जम कर ठोका था या फिर ये कहे कि जहाँ मेरी रॅगिंग ली गयी थी...और ये वही जगह थी ,जहाँ से इन सबकी शुरुआत हुई थी....जो दो लड़के ,उन दो चूतियो को उस ग्राउंड पर लाते...वो सिटी मे ही किराए के रूम लेकर रहते थे और इस कांड के बाद उन्हे कुच्छ ना हो ,इसलिए हमारा साथ देने वाले सिटी के उन लड़को को हॉस्टिल मे शिफ्ट किया जा रहा था....जहाँ वो सेफ थे....
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"अरमान सर, वो दोनो ग्राउंड पर पहुच चुके है...."पोलीस स्टेशन मे झूठी गवाही देने वाले राजश्री पांडे ने मेरे रूम मे आकर कहा....जो कि अब अपने दोस्त के साथ सीडार का रूम छोड़ कर ,हॉस्टिल मे शिफ्ट हो गया था....

"तुम दोनो चलो...आइ आम कमिंग..."मैने अरुण और सौरभ से कहा...

"तू कहाँ जा रहा है..."

"गॉगल्स तो ले लूँ...ताकि लड़ाई मे मैं हीरो दिखू,विलेन नही 


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हम पर एफ.आइ.आर. करने वाले लड़के जाल मे फँस चुके थे और वो ग्राउंड पर हॉस्टिल के लड़को के बीच घिरे हुए थे...हॉस्टिल से निकलते वक़्त मैने सोचा था कि उन दोनो लड़को की चड्डी इस समय डर के कारण गीली हो रही होगी और वो सबसे हाथ जोड़कर विनती कर रहे होंगे कि उन्हे वहाँ से जाने दिया जाए...लेकिन जब मैं ग्राउंड पर पहुचा तो वहाँ बिल्कुल भी वैसा नही था...जैसा कि मैने सोचा था....फर्स्ट एअर के वो दोनो लड़के इस वक़्त अपने दोस्तो से,जो कि उन्हे झूठ बोलकर यहाँ लाए थे,उनसे बहस कर रहे थे...वो दोनो वहाँ खड़े हॉस्टिल के 20 लड़को को धमकी दे रहे थे और साथ मे अपने दोस्तो को भी...राजश्री पांडे को मैने मामले की जाँच करने के लिए भेजा जिसके बाद राजश्री पांडे,राजश्री चबाते हुए मेरे पास आया और बोला..
"अरे कुच्छ नही,साले अकड़ रहे है बीसी, वो तो हम सब आपके इंतज़ार मे रुके हुए थे...वरना कब का साले को खून से नहला देते...."

"क्या बोल रहे है दोनो..."

"बोल रहे है कि उनपे जिसने भी हाथ उठाया उसे वो चुन-चुन कर मारेंगे..."

"तो तुम लोगो ने क्या सोचा है..."मैने वहाँ खड़े सभी लड़को की तरफ देखकर पुछा...

"कुच्छ भी हो जाए अरमान भैया...हम तो आज पेलेंगे..."

"दट'स दा स्पिरिट,..."गॉगल्स पहने हुए मैं अरुण और सौरभ के साथ उन्दोनो के पास गया और वहाँ खड़े सभी लड़को को दूर हटने का इशारा किया...
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उनके तरफ जाते हुए मैने सोचा कि अब वो दोनो लड़के अट्लिस्ट मुझे देखकर तो डर ही जाएँगे और मुझसे माफी भी माँगेंगे...लेकिन उन सालो ने इस बार भी मेरी सिक्स्त सेन्स के इमॅजिनेशन की हत्या कर दी

"अरमान, हम तुझसे नही डरते...तू ये याद से अपने दिमाग़ मे बिठा ले कि एक दिन तू भी यही अपने इन लल्लुओ के साथ खड़ा होगा और मैं तुझे कुत्ते की तरह मारूँगा...."गुस्से से भरी अपनी लाल आँखे दिखाते हुए उन दोनो मे से एक ने कहा...जिसके बाद हॉस्टिल के सभी लड़के आगे बढ़े लेकिन मैने सबको वापस पीछे हटने के लिए कहा....

"मैं तो तुझसे डर गया...मुझे माफ़ कर दे..."उसकी आँखो मे आँखे डालकर मैं बोला"वैसे तूने कुत्ता मुझे कहा या खुद को..."

"तुझे कुत्ता कहा भडवे साले ,म्सी"

ये सुनकर हॉस्टिल के लड़के और मेरे दोनो दोस्त ,जो उस समय मेरे पास ही थे,वो उसे मारने के लिए आगे बढ़े ही थे कि मैने एक बार फिर से सबको रुकने का इशारा किया...

"चल पुरानी बात छोड़ और ये बता,मेरा गॉगल्स कैसा लग रहा है...एक दम स्मार्ट दिख रहा हूँ ना मैं..."

"तेरे चूतिए गॉगल्स की तरह तू भी चूतिया दिख रहा है.."

ये सुनकर एक बार फिर सब आगे बढ़े ,जिन्हे रोक कर मैने कहा"अबे तुम्ही लोग मार लो,मैं यहाँ क्या लवडा हिलाने आया हूँ...पीछे जाओ सब..."

"अरे अरमान भैया...छोड़ दो साले को..."राजश्री पांडे ने राजश्री का एक और पाउच मुँह मे डालते हुए चिल्लाया...

जिसके बाद मैने उस लड़के के सर के बाल को ज़ोर से पकड़कर खींचा और उसे गोल-गोल घुमाने लगा...

"मेरे गॉगल्स के बारे मे कुच्छ नही बोलने का...साले खुद की शकल तो गधे की गान्ड जैसी है और मुझे बोलता है कि मैं हॅंडसम नही हूँ..."

जब मैं उसके सर के बाल को पकड़ कर गोल-गोल घुमा रहा था तो अरुण ने एक हॉकी स्टिक ली और उसके पीठ पर हॉकी स्टिक से जोरदार प्रहार किया...जिसके बाद वो लड़का चीख उठा...लेकिन अरुण नही माना और हॉकी स्टिक से उसे पेलता रहा.....हम दोनो को आक्षन मे देखकर भला सौरभ कैसे शांत रह सकता है,सौरभ ने दूसरे लड़के के कान पर एक मुक्का जड़ा और ज़मीन पर धक्का देकर उसे लातों से मारने लगा....वो दोनो लड़के इस समय हम तीनो की पिटाई से सिर्फ़ चीख रहे थे ,रो नही रहे थे...जबकि मैं चाहता था कि वो दोनो रोते हुए हमारे पैर पकड़ कर हमसे माफी की गुहार मारे...
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सौरभ दूसरे लड़के के कभी मुँह पर तो कभी पेट पर लात मारता और जब वो लड़का पीछे पलट जाता तो सौरभ उसके पीठ पर धड़ा धड़ लात मरता,...इधर मैने एक का बाल मज़बूती से पकड़ रखा था और अरुण अपने हाथ मे हॉकी स्टिक थामे उसके हाथ-पैर,पीठ-पेट...तोड़े जा रहे था....वो दोनो लड़के अधमरे से हो गये थे,लेकिन उन्दोनो ने सॉरी अभी तक नही बोला था....

"बीसी, तेरी *** का लंड...मेरा गॉगल्स तोड़ दिया तूने..."अभी तक मैने जिसका बाल पकड़ रखा था उसकी नाक मे एक मुक्का जड़ते हुए कहा और उसे ज़मीन पर फेक दिया....

"तू अभी अपने चश्मे को छोड़ और इनकी धुनाई कर..."उस लड़के के पैर पर ज़ोर से हॉकी स्टिक मारते हुए अरुण ने कहा....

"लवडे,घर से दो बुक्स का पैसा मँगाया था, उसके बाद मैने बुक्स ना ख़रीदकर 1351 का ये गॉगल्स खरीदा और तू बोल रहा है कि..... गान्ड तोड़ दे इस म्सी की,ताकि साला जब कभी भी हॅगने बैठे तो इसे अपनी ग़लती का अहसास हो..."

"जो हुकुम मेरे आका..."बोलते हुए अरुण ने उस लड़को को पलटाया और उसके पिछवाड़े पर हॉकी स्टिक से मारने लगा....
मेरे गॉगल्स की मौत ने मेरे अंदर दफ़न गुस्से के ज्वालामुखी को भड़का दिया था,मैने अरुण को रोक कर उस लड़के को वापस सीधा किया और हवा मे हाथ उठाकर कसकर एक तमाचा उसके गाल पर मारा...जिससे मेरी पाँचो उंगलियो का प्रोजेक्षन उसके गाल पर बन गया...उसके बाद मैं दूसरी साइड गया और एक बार फिर से हवा मे हाथ उठाकर उसके दूसरे गाल पर भी पाँचो उंगलियो के निशान छाप दिए...

"हाथ हटा म्सी..."उस लड़के ने जब अपने दोनो गाल पर हाथ रखे तो एक लात मारते हुए मैने कहा और लगातार उसके गाल पर कसकर थप्पड़ मारने लगा.....

"सॉरी बोल,..."उसके मुँह पर एक लात मारते हुए मैने कहा....

"सॉरी..."धूल और खून से सने मुँह को खोलते हुए उस लड़के ने इतना ही कहा.....
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"अरमान,एक ने तो सॉरी बोल दिया...लेकिन ये साला नही मान रहा...पता नही इस बीसी के अंदर अभी कितना दम बाकी है..."दूसरे लड़के पर सौरभ अब भी लात बरसाए पड़ा था....

"तू हट और देख ये एक मिनिट मे सॉरी बोलेगा..."

सौरभ को मैने दूर हटाया और ज़मीन पर लोट रहे उस लड़के के उपर दोनो पैर से एक साथ कुदा..जिसके बाद उसके मुँह से खून और सॉरी शब्द एक साथ निकला.... 
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उन दोनो को तो मैं ठोक चुका था,लेकिन मुझे अब गम मेरे गॉगल्स के टूटने का था ,क्यूंकी इसके लिए मैने दो बुक्स की कुर्बानी दी थी...उन्दोनो को मारने के बाद मैं वहाँ खड़ा होकर अपने चश्मे की मौत का दुख मना रहा था कि सडन्ली मुझे एक आइडिया आया और मैने तुरंत पीछे मुड़कर उन दोनो लड़को का वॉलेट निकाल लिया...एक के वॉलेट मे 100-100 की 4 पत्तिया थी तो एक की वॉलेट मे 1000 और 500 की पत्तिया थी.. उन दोनो के वॉलेट से कुल मिलाकर लगभग 5000 मिले,जिनमे से मैने हज़ार का एक-एक नोट अपने दोनो खास दोस्तो को दिया और हज़ार का एक नोट वहाँ खड़े हॉस्टिल के लौन्डो की तरफ बढ़ाकर दो हज़ार अपने जेब मे रख लिए.....

"चलो...अब सब खिसक लो...इधर से.."अरुण ने सबको वहाँ से जाने के लिए कहा...

जब हम सब वहाँ से कुच्छ दूरी पर आ गये थे तभी मुझे अचानक ना जाने फिर से गुस्सा आया और मैं ज़मीन पर दर्द से कराह रहे उन दोनो लड़को के पास पहूचकर दोनो के मुँह मे एक-एक लात जदकर बोला"अरमान....ये नाम अपने जेहन मे बिठा ले और एक बात मेरे अंदर दिल और दया नही है...तुम दोनो जब भी ठीक होगे,मैं तुम दोनो को फिर से मारूँगा और इसी हालत मे ला पटकुंगा....याद रखना आज से तुम दोनो के दो बाप है ,एक बाप को तो तुम दोनो जानते हो और दूसरा बाप मैं हूँ"

"और मैं तीसरा बाप..."अरुण दूर से ही चिल्लाया....
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"तो अब प्लान क्या है..."हॉस्टिल मे पहूचकर अरुण ने मुझसे पुछा...

"मैं सोच रहा हूँ कि 2001 प्राइस वाला गॉगल्स आज ही माल से ले आउ,जो मैने लास्ट वीक माल मे देखा था 

"भाड़ मे जाए तेरा वो गॉगल्स और अब ये बता कि करना क्या है...मुझे अब ना जाने क्यूँ ऐसा लग रहा है कि मैने तेरा साथ देकर ग़लत किया,कही हम लंबे लफडे मे ना फँस जाए "अपने चेहरे को टवल से पोछते हुए सौरभ ने मेरे न्यू गॉगल्स लेने के प्लान को बीच मे ही रोक दिया

"अब कैसा लफडा बे, अब तो जो होना था हो चुका है...जिन्हे मारना था उन्होने मार दिया और जिन्हे मार खाना था ,उन्होने भी मार खा लिया...बस टॉपिक एंड "

"बेटा,टॉपिक एंड नही हुआ है..अभी हमने जो एक्शन किया है उसका अकॉरडिंग तो न्यूटन'स थर्ड लॉ हमारे एक्शन के बदले उसके बराबर एक रिएक्शन तो आएगा ही और वो भी ऑपोसिट डाइरेक्षन मे...बोले तो तलवार अब हमारे गर्दन के उपर लटकने वाली है..."जिस टवल से सौरभ अपना चेहरा सॉफ कर रहा था उसे मेरे फेस पर फेक्ते हुए कहा

"मुझे समझ नही आता कि लोग हमेशा न्यूटन के थर्ड लॉ का ही एग्ज़ॅंपल क्यूँ देते है, जबकि थर्ड लॉ से पहले फर्स्ट आंड सेकेंड लॉ आता है...और वैसे भी मैने उनके रिक्षन को शुरू होने से पहले ही ख़तम कर दिया है इसलिए चिंता की कोई बात नही"

"क्या किया तूने और जब से कॅंटीन मे मेरी पेलाइ हुई है तब से मेरा तुझपर से विश्वास उठ सा गया है...साले खुद तो मरता है साथ मे मुझे भी मरवाता है..."अरुण बीच मे ही टपक पड़ा"मुझे भी अब ऐसा लग रहा है कि तेरा साथ देकर मैने बहुत बड़ी ग़लती कर दी,कहीं उन दोनो ने फिर से पोलीस मे रिपोर्ट कर दिया तो "

"वो तो करेंगे ही"अरुण की फाड़ते हुए मैने कहा"और पोलीस कॉलेज मे भी आएगी और हॉस्टिल मे भी आएगी और तो और हमे अपने साथ ले जाने की कोशिश भी करेगी..."

"बोसे ड्के, इस बार तो गये काम से, तू हमारा दोस्त नही है..."अरुण और सौरभ एक साथ मुझपर चिल्लाए...

"अबे गला फाड़ना बंद करो...पहले मुझे बात तो पूरी करने दो..."अपनी टी-शर्ट उतारकर अरुण के फेस पर फेक्ते हुए मैं बोला"अपना कल्लू वॉर्डन किस दिन काम आएगा..."

"क्या घंटा काम आएगा वो कल्लू...बल्कि वो तो उल्टा हमारी और शिकायत कर देगा...एक तो पहले से ही तू उसे पसंद नही है ,उपर से अब ये नया लोचा.."मेरी टी-शर्ट को वापस मेरी तरफ फेक्ते हुए अरुण ने सौरभ से कहा"सौरभ मेरे भाई, मेरा भी सिक्स्त सेन्स कुच्छ-कुच्छ काम करने लगा है...और जैसा कि मैने अंदाज़ा लगाया है उसके हिसाब से हम दोनो के पैर पोलीस वालो ने रस्सी से बाँध दिए है और डंडे से गान्ड फटट ले पेल रहे है.... अबकी बार तो अच्छे से चुद गये..."

"चुप कर बे चोदु ,खुद तो डरा हुआ है उपर से सौरभ के पिछवाड़े मे भी पिन ठोक रहा है...सौरभ तू यकीन मान अपना वॉर्डन अपनी साइड लेगा..."

"सुनकर दिल को सुकून मिला लेकिन मुझे ऐसा लग रहा है कि ऐसा कुच्छ भी नही होने वाला...मतलब की हॉस्टिल वॉर्डन भला हमारा साथ क्यूँ देगा "

"और कल्लू वॉर्डन विल डू दिस फॉर मी ,फॉर यू,फॉर अरुण,फॉर हॉस्टिल,फॉर होस्टेलेर्स आंड फॉर सीडार "

"देख अरमान ,अभी ज़्यादा डाइलॉग बाज़ी मत छोड़...वरना दो को तो पेल के आया ही हूँ,तीसरा नंबर तेरा लगा दूँगा...इसलिए शॉर्ट मे बता लेकिन अच्छे से बता..."

"सीडार ने वॉर्डन को हमारी तरफ से गवाही देने के लिए मना लिया है,दट'स इट...अब तुम दोनो के गोबर भरे दिमाग़ मे कुच्छ घुसा या फिर जर्मन लॅंग्वेज मे समझाऊ या फिर फ्रेंच मे या फिर स्पॅनिश मे..."

"सब समझ गया अपुन" मुझे गले लगाते हुए सौरभ ने थॅंक्स कहा...

"अपुन भी सारा मॅटर समझ गया है , थॅंक्स तो सीडार की वो हर समय हमारी मदद करने के लिए तैयार रहता है...बेटा अरमान ,यदि सीडार ना होता तो तेरी कोई भी दाल नही ग़लती...."

"यॅ...आइ नो "सिगरेट के पॅकेट से एक सिगरेट निकालते हुए मैने कहा और दिल ही दिल मे एमटीएल भाई का हमारा साथ देने के लिए शुक्रिया अदा किया...
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"वैसे सौरभ,अरमान ने कुच्छ और भी प्रॉमिस किया था...याद है कि भूल गया..."

अरुण के ऐसा बोलते ही मैं समझ गया कि वो मेरे किस प्रॉमिस की बात कर रहा है और मैं उस वक़्त थोड़ा परेशान सा हो गया...क्यूंकी दोनो को लड़ाई मे शामिल करते वक़्त तो मैने बड़ी आसानी से कह दिया था कि मैं उनके लिए दिव्या और विभा का जुगाड़ करूँगा...लेकिन मुझे मालूम था कि ये काम बहुत मुश्किल है . विभा को तो मैं खुद भी अभी तक नही पटा पाया था,इसलिए सौरभ का मामला कैसे जोड़ू और अरुण के मामले मे तो भयंकर ख़तरा था..क्यूंकी यदि दिव्या के बाप को ज़रा सी भी भनक लग गयी की उसकी बेटी को कॉलेज के किसी लड़के ने किस किया है तो फिर वो लड़का तो गया जान से.....

"इधर-उधर क्या देख रहे हो अरमान बाबू...अपना प्रॉमिस याद तो है ना या हम दोनो याद दिलाए..."मेरे गर्दन को पीछे से पकड़ कर सौरभ ने कहा...

"मैं अभी आया..."

उन दोनो से पीछा छुड़ाने के लिए मैं वहाँ से उठा ही था कि अरुण कूद कर दरवाजे के पास पहुचा और दरवाजा अंदर से बंद कर दिया...वही सौरभ ने मेरे दोनो हाथ को पीछे से पकड़ कर मरोडने लगा....
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"जल्दी से हम दोनो के अरमान पूरे कर..वरना तेरा खून कर दूँगा..."सौरभ ने धमकी दी

"मैं तो डाइरेक्ट रेप करूँगा..."दरवाजे के पास खड़े होकर अरुण ने भी धमकी दी...

अब मुझे अंदाज़ा हो गया था कि यदि इस वक़्त मैने उन दोनो को ना कहा तो ,वो दोनो मुझे बहुत मारेंगे इसलिए मैने इस समय उन दोनो को हां कहने मे ही अपनी भलाई समझी और बोला...

"अरुण तेरा काम कुच्छ दिनो मे हो जाएगा और सौरभ तुझे कुच्छ दिन के लिए इंतज़ार करना पड़ेगा,...क्यूंकी विभा को ठोकने के लिए मनाना थोड़ा मुश्किल है,लेकिन मैं इसे करूँगा ज़रूर...अब तो मेरा हाथ छोड़...."


RE: Porn Hindi Kahani दिल दोस्ती और दारू - - 12-14-2018

दोपहर शाम मे ढली और शाम रात मे तब्दील हुई और फिर सवेरा हुआ...सवेरा होते-होते कल के ग्राउंड वाले कांड की खबर लगभग हर एक के कानो तक पहुच चुकी थी...कोई कहता कि फर्स्ट एअर के उन दोनो लड़को को अरमान ने और उसके दोस्तो ने मारा,तो कोई कहता कि सिटी वाले सीनियर के साथ उनका कुच्छ लोचा था , कुच्छ तो ये भी कहने वाले थे कि शायद उन दोनो को दिव्या के बाप ने मारा था.....उन्दोनो की हालत इस वक़्त खराब थी और दोनो सिटी के बेस्ट हॉस्पिटल मे अड्मिट थे...किसी को शक़ ना हो इसलिए मैं दूसरे दिन नॉर्मल सा बिहेव करते हुए नॉर्मल तरीके से कॉलेज गया और साथ मे बीमार होने का धंसु आक्टिंग भी किया... मेरा और मेरे खास दोस्तो का अंदाज़ वही था,जिसके लिए हम जाने जाते थे...और क्लास मे हम आज भी लास्ट बेंच पर लड़कियो के पीछे बैठे...बोले तो हम पहले की तरह आज भी बॅक बेन्चेर्स थे...क्लास के कुच्छ लड़को ने मुझसे पुछा कि क्या मैने फर्स्ट एअर के लड़को को मारा है...ऐसा सवाल करने वालो की लिस्ट मे मेरे क्लास के साथ-साथ मेरा दोस्त नवीन और कयि टीचर्स भी शामिल थे...वो सब जितनी भी बार मुझसे ये सवाल पुछ्ते मेरा जवाब हर बार एक होता और वो जवाब था कि"मैं तो कल लंच के बाद तबीयत खराब होने के कारण हॉस्टिल जाकर सीधे सो गया था....मुझे तो आज कॉलेज आने पर इस झगड़े के बारे मे मालूम चला..."
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एमओएस की चलती क्लास के बीच मे हमारे होड़ सर क्लास मे घुसे और मुझे प्रिन्सिपल के ऑफीस मे चलने के लिए कहा ,जहाँ प्रिन्सिपल सर और थ्री स्टार की खाकी वर्दी पहने हुए एक पोलीस वाला मेरा इंतज़ार कर रहा था.....

"मे आइ कम इन सर..."रूखे आवाज़ मे मैने प्रिन्सिपल सर से अंदर आने की इजाज़त माँगी....

किसी को मुझपर शक़ ना हो इसलिए मैने आज ना तो सर मे तेल लगाया था और ना ही कंघी किया था...जिससे मेरे सर के बाल बिखरे हुए थे और मेरे बीमार होने की गवाही दे रहे थे...प्रिन्सिपल के ऑफीस मे आते वक़्त मैने अपनी दो उंगलियो को आँखो मे डाल लिया था,जिससे मेरी आँखे इस वक़्त एक दम लाल थी और जलन पैदा कर रही थी....जिससे मैं थ्री स्टार की वर्दी धारण किए पोलिसेवाले को यकीन दिला सकूँ मैं सचमुच मे बीमार हूँ और बड़ा कष्ट झेलकर कॉलेज आया हूँ,फिलहाल खुद को ग़लत होते हुए भी सही साबित करने की धुन मे मैने ब्रश तक नही किया था जिससे इस वक़्त मेरे मुँह से एक शानदार खुश्बू भी निकल रही थी जिसका असर वहाँ पर बैठे प्रिन्सिपल सर और उस पोलीस वाले पर हो रहा था.... मुझे सर्दी बिल्कुल भी नही थी लेकिन मैं वहाँ प्रिन्सिपल के ऑफीस मे खड़ा होकर अपनी नाक को सुड़कता और बीच-बीच मे खाँसता...ऐसी आक्टिंग करते हुए एक समय जब मैने खांसने का झूठा अभिनय किया तो उस वक़्त मुझे सच मे जोरो की खाँसी आ गयी और मेरी आँख लाल हो गयी ,ये खाँसी इतनी जबर्जस्त थी कि मेरे आँखो से आँसू भी निकल आए और मुँह से लार भी टपक गया 

"अरे भाई,पानी पिलाओ इसको..."थ्री स्टार की वर्दी पहने हुए उस शक्स ने कहा और मुझे अपने पास,बगल वाली चेयर मे बिठाया...

वैसे मुझे बीमार बनकर प्रिन्सिपल के ऑफीस मे आने की कोई ज़रूरत नही थी ,क्यूंकी हमारा हॉस्टिल वॉर्डन ऑलरेडी हमारे पक्ष मे गवाही देने के लिए तैयार था...जिसके बाद कोई कुच्छ नही कर सकता था, लेकिन मैने सर मे तेल और बालो मे कंघी इसलिए नही किया क्यूंकी मैं देखना चाहता था कि यदि सीडार का हाथ मेरे सर पर नही होता तो क्या मैं तब भी खुद को बचाने मे कामयाब होता, मैं ये एक्सपेरिमेंट करना चाहता था कि यदि सीडार का पॉवर मेरे साथ नही होता तो क्या मैं तब भी खुद को पवरफुल साबित कर पाता या नही, ये एक्सपेरिमेंट थोड़ा हटकर था और साथ मे हमारे कॉलेज की लॅबोरेटरी मे होने वाले बोरिंग एक्सपेरिमेंट से ज़्यादा इंट्रेस्टेड भी था, सो आइ डिड....लेकिन मेरा ये एक्सपेरिमेंट तब फैल हो गया जब मेरे साइड वाली चेयर मे थ्री स्टार की वर्दी पहने हुए उस पोलीसवाले ने मेरी तरफ झुक कर कहा...
"मेरे कंधे पर थ्री स्टार यूँ ही नही लगी है मिसटर....मुझे हक़ीक़त की खाँसी और दिखावे मे फरक करना बहुत अच्छी तरह आता है,तूने क्या मुझे अपने कॉलेज का टीचर समझ रखा है जिसे तू जब चाहे तब बेवकूफ़ बना दे...हुह्म"
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उस पोलीस वाले के ऐसा कहते ही मेरी साँस मानो एक पल के लिए रुक गयी थी,मैं उसकी तरफ एकटक देखे जा रहा था...
"पसीना सॉफ कर लो..."उस थ्री स्टार वाले ने अब प्रिन्सिपल की तरफ देखते हुए कहा"इस पर उन दोनो लड़को के दोस्तो ने रिपोर्ट की है और रिपोर्ट के मुताबिक इसने फर्स्ट एअर के दोनो लड़को को हॉस्टिल के पास वाले ग्राउंड पर ले जाकर बुरी तरह से मारा,पीटा...जिसकी वजह ये हो सकती है कि उन्होने कुच्छ दिनो पहले ही इसपर एफ.आइ.आर. किया था,जिसका बदला इसने उन्हे बुरी तरह से मारकर लिया...इसे हमारे साथ पोलीस स्टेशन चलना होगा....तू तो गया बेटा लंबे से"

"मैं तो परेशान हो गया हूँ इस लड़के से...मैं एक काम करता हूँ,इसके घरवालो को खबर करके कह देता हूँ कि इसकी टी.सी. कॉलेज से ले जाए और इसे पोलीस स्टेशन से ले जाए..."प्रिन्सिपल सर ने मेरी तरफ देखकर गुस्से से कहा और बाहर खड़े पीयान को अंदर बुलाया

जब पीयान प्रिन्सिपल के कॅबिन मे आया तो प्रिन्सिपल सिर ने उसे मेरे अड्मिशन फॉर्म से मेरे घर का कॉंटॅक्ट नंबर लाने को कहा...

मेरी खाँसी ये सब देखकर एक दूं ठीक हो चुकी थी,अब आँख भी लाल से सफेद हो गयी थी और मेरा पूरा शरीर पसीने से भीग चुका था और यही वो वक़्त था जब सीडार के पॉवर का उसे करके खुद को बचाया जा सकता था...
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"प्लान नंबर. 2 आक्टीवेटेड...."मैने खुद से कहा और फिर अपने चेहरे पर आए पसीने को सॉफ करके बोला"सर,आप बेवजह मेरे घरवालो को परेशान कर रहे है...मैने कुच्छ किया ही नही है ,मैं तो कल रिसेस के बाद से ही हॉस्टिल मे कंबल ओढ़ कर सोया हुआ था..."

"सच मे "मुझपर तिरछि नज़र मारते हुए थ्री स्टार वाले ने पुछा....

"यदि आपको यकीन ना हो तो हमारे हॉस्टिल वॉर्डन से पुच्छ लीजिए...उन्ही के रूम से मैं फीवर की टॅबलेट और झांदू बॉम लेकर गया था...जिसके बाद मैं अपने रूम मे जाकर सो गया और रात के 9 बजे मेरी नींद वॉर्डन के उठाने से खुली...जो उस समय हॉस्टिल का राउंड लगा रहे थे..." 

ये सुनते ही प्रिन्सिपल सर ने सामने रखे फोन से हॉस्टिल के फोन पर घंटी मारी,जिसके बाद हमारे वॉर्डन ने उन्हे वही सब बताया जो मैने अभी-अभी बताया था....
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"सॉरी ,पर अरमान सच कह रहा है और मेरी अतॉरिटी मुझे इज़्जजत नही देती कि मैं किसी स्टूडेंट को बेवजह परेशान करूँ...."प्रिन्सिपल सर ने अपना चश्मा टेबल पर रखते हुए पोलीस वाले से कहा और फिर वापस अपने चश्मे को आँखो मे फिट करते हुए एक ए-4 साइज़ के पेपर मे कुच्छ लिख कर,कॉलेज के सील का ठप्पा लगाया और उस कागज को पोलीस वाले के हाथ मे सौंप दिया......

उसके बाद पोलीस वाले ने कुच्छ देर मुझे देखा और वो कागज लेकर वहाँ से चलता बना....
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प्रिन्सिपल के ऑफीस से बाहर निकल कर मैने एक मस्त लंबी साँस ली और ठंडा पानी पीकर क्लास की तरफ खुशी से कूदते-फान्दते गया...इस समय दंमो रानी की क्लास चल रही थी ,पहले तो उसने मुझे अंदर आने की पर्मिशन नही दी लेकिन जब मैने उसे बताया कि मुझे प्रिन्सिपल सर ने एक अर्जेंट काम से बुलाया था तो वो मान गयी और मुझे अंदर आने के लिए....

"बीसी, मेरी जगह पर इसे क्यूँ बैठाया...अब क्या मैं ज़मीन पर बैठू..."लड़कियो के पीछे वाली बेंच पर 7 लड़को को बैठे देखकर मैं धीरे से चिल्लाया और एक साइड अपना पिछवाड़ा टिका कर बैठ गया.....

"अरमान, आया समझ मे कि आन्सर कैसे आया..."चलती क्लास के बीच मे दमयंती ने मुझे खड़ा करके पुछा....

"सब समझ मे आ गया मॅम..."(लवडा समझ मे आया, मुझे तो ये तक नही मालूम की क्वेस्चन क्या था,साली चुदि चुदाई औरत...)

"तो फिर सामने आकर एक्सप्लेन करो..."

"आज थोड़ा...आननह "ज़ोर से खाँसते हुए मैने कहा और फिर रुमाल निकाल कर नाक सॉफ किया"आज तबीयत खराब है मॅम, कभी और एक्सप्लेन करूँगा..."

"ओके,सिट डाउन..."

"थॅंक्स "
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दंमो गयी तो दंमो के बाद एमएस का टीचर आ टपका और भका भक लिखवाना शुरू कर दिया, साला एक तो ढंग से बैठा नही था उपर से वो ऐसे स्पीड मे बोले जा रहा था जैसे कि उसके गान्ड मे किसी ने लंड डाल दिया हो, बक्चोद कही का.....
"म्सी, बाद मे कौन आया है...वो उठकर अपनी जगह जाए..."फ्रस्टेशन मे मैं भड़क उठा....

"कोई कहीं नही जाएगा...जिसको प्राब्लम हो वो दूसरे बेंच मे जाकर बैठे..."

"सुन बे ,यदि ऐसा है तो भूल जा फिर कि दिव्या से मैं तेरी सेट्टिंग करवाउन्गा..."

"सॉरी यार,तू तो बुरा मान गया..."

"बुरा वो मानता है जिसके पास बुर होता है और मेरे पास बुर नही लंड है "
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मेरी ये धमकी असर कर गयी और अरुण ने तुरंत वहाँ से 3 लड़को को आगे भगा दिया ,अब वहाँ सबसे पीछे वाली बेंच पर सिर्फ़ मैं,अरुण,सौरभ और सुलभ बैठे थे...एमएस वाला टीचर अब भी भका भक स्पीड से लिखाए पड़ा था बिना इस बात की परवाह किए की आधे से अधिक लौन्डो-लौन्डियो ने लिखना बंद कर दिया है...लेकिन हम चारो अब भी लिख रहे थे और साथ-साथ मे बक्चोदि भी कर रहे थी....
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"बेटा मुझे कुच्छ दो,वरना मैं सबको बता दूँगा कि उन दोनो को तुम लोगो ने ही ठोका है..."हमारी भका भक लिखाई के बीच मे सुलभ बोला...

"बोल क्या चाहिए तुझे...कार,बंग्लॉ,दमयंती की चूत...तू बोल क्या चाहिए तुझे...तू कहे तो तेरे लिए चाँद-सितारे तोड़ कर ले आउ "

"रहने दे ,तू बस तीन दिन के कॅंटीन का बिल दे देना अरुण...और तू सौरभ,तू बाकी के तीन दिन का बिल दे देना...."

"हम दोनो अपने लंड पर हाथ रख कर तुझे वचन देते है..."अरुण और सौरभ ने एक साथ कहा और अपना एक-एक हाथ अपने लंड पर रख लिया...

"और तू अरमान..."सुलभ की नज़रें अब मुझपर जम गयी...

"मैं तुझे हमारी अगली फाइट मे शामिल करूँगा...."

"ये हुई बात,तू ही है मेरा सच्चा मित्र...आइ लव यू "

"आइ लव यू टू...चल एक पप्पी दे "मज़ाक करते हुए मैं सुलभ की तरफ बढ़ा ही था कि एम एस वाले सर की नज़र हम पर पड़ गयी और वो ज़ोर से चीखा"क्या यार,ये तुम लोग क्या कर रहे हो...बेशर्मी की भी हद होती है..."

"कुच्छ नही सर,वो सुलभ की आँख मे कुच्छ घुस गया था,बस उसे निकाल रहा था..." बिना देरी किए मैं झटपट बोल उठा...

"मुझे मत सीखा तू...और यदि अगली बार से ऐसी हरकत की तो मार-मार के भरता बना दूँगा...समझा..."

"सब समझ गया सर..."
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"अबे उसने हम दोनो को गे तो नही समझ लिया..."कुच्छ देर बाद सुलभ ने पुछा...

"यही तो प्यार है पगले और वैसे भी वो हमारा क्या उखाड़ लेगा..."
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उसके बाद जब तक कॉलेज चला अरुण मेरी जान ख़ाता रहा वो मुझसे कयि बार पुछ चुका था की मैं उसकी,दिव्या से सेट्टिंग कब करवा रहा हूँ...जवाब मे मैने उसे कुच्छ देर रुकने के लिए कहा और जब कॉलेज ऑफ हुआ तो बाहर निकलते वक़्त मैने अरुण का मोबाइल माँगा....

"अब क्या करेगा मेरे मोबाइल का..."

"सीडार का नंबर ऑफ आ रहा है ,एक मेस्सेज कर देता हूँ कि सब कुच्छ कंट्रोल मे है..."

"तो तेरा मोबाइल कहाँ गया..."

"मेस्सेगे पॅक नही है अंकिल..."

अरुण से मैने कुच्छ देर के लिए मोबाइल लिया और फिर उसे वापस कर दिया....जब हम दोनो कॉलेज से हॉस्टिल की तरफ आ रहे थे तभी अरुण अचानक अपने मोबाइल को देखते हुए खुशी से रोड पर ही गिर पड़ा....

"मिर्गी मार गयी क्या बे "

"अबे अरमान...ये देख..."अरुण ने रोड पर लेटे-लेटे अपना मोबाइल मेरी तरफ बढ़ाया ,मैने उसके हाथ से मोबाइल लिया और मोबाइल की स्क्रीन पर नज़र डाली....

"आइ लव यू टू....सेनडर:-दिव्या..."पढ़ते हुए मैने अरुण को हाथ देकर उठाया...

अब अरुण की चाल ही बदल गयी थी...जहाँ हर दिन कॉलेज के बाद हमारी हालत खराब हो जाती थी,वही आज दिव्या के एक मेस्सेज ने अरुण के अंदर एनर्जी ला दी थी...वो इस समय उस छोटे बच्चे की तरह खुश हो रहा था,जिसे उसका मन पसंद खिलौना लाकर दे दिया गया हो....वो बार-बार दिव्या के मेस्सेज को पढ़ता और बीच-बीच मे मोबाइल की स्क्रीन को चूमने लगता...तो कभी अपने मोबाइल को सीने से लगाकर दिव्या का नाम लेने लगता....पूरे रास्ते भर अरुण ने ऐसी हरकते करके मुझे पकाया और जब हम हॉस्टिल के सामने आ गये तो वो रुक गया....

"अब क्या हुआ बे..."

"देखा बे,अपुन की स्मार्टनेस के आगे दिव्या फ्लॅट हो गयी...उसने मुझे खुद प्रपोज़ किया...अब मानता है ना कि मैं तुझसे और सौरभ से ज़्यादा हॅंडसम हूँ...लेकिन मुझे एक बात समझ नही आई कि इसने आइ लव यू टू ,क्यूँ लिखकर भेजा..."

"वो इसलिए मेरे लल्लू दोस्त क्यूंकी तूने उसे आइ लव यू का मेस्सेज लिख कर भेजा था इसलिए उसने आइ लव यू टू ,लिखकर रिप्लाइ किया "

ये सुनकर अरुण फिर से ज़मीन मे गिरने ही वाला था कि मैने उसे पकड़ लिया, 

"मैने कब किया बे उसे मेस्सेज..."

"तूने नही,मैने किया था मेस्सेज...तेरे मोबाइल से उसके नंबर पर...कुच्छ याद आया या फ्लॅशबॅक मे ले जाउ..."

"बोसे ड्के ,तूने मुझसे कहा था कि तू सीडार को मेस्सेज करेगा "

"चल बोल पापा 


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मैं आज तक यही सोचता था कि मेरी थियरी हमेशा लड़कियो के मामले मे फैल होती है लेकिन उस दिन मुझे ये भी मालूम चल गया कि अरुण भी उन चन्द ग्रेट हमंस मे शामिल है...जिनपर मेरा सिक्स्त सेन्स कभी-कभी फैल हो सकता है....मुझे ये उम्मीद थी कि जब अरुण को मेरे द्वारा दिव्या के मोबाइल पर आइ लव यू ,वाले मेस्सेज का पता होगा तो वो मुझे गले लगाएगा और बोलेगा कि"अरमान कल तेरे कॅंटीन का बिल मैं भरुन्गा" या फिर आज रात के दारू का पूरा पैसा वो देगा....लेकिन साला यहाँ तो मेरी सारी सोच का ही क्रियाकर्म हो गया....मैं चुप चाप हॉस्टिल के अंदर अपने रूम की तरफ जा रहा था और अरुण मुझे गालियाँ बके जा रहा था...


RE: Porn Hindi Kahani दिल दोस्ती और दारू - - 12-14-2018

"अबे लवडे,तेरा दिमाग़ घास चरने गया है क्या,..यदि दिव्या आइ लव यू,वाला मेस्सेज अपने भाई या अपने बाप को दिखा देती तो मेरा क्या हाल होता...यदि उसने भूले से भी वो मेस्सेज हमारे प्रिन्सिपल को दिखा देती तो आज ही मैं कॉलेज-निकाला घोसित हो जाता...."

"तू इतना भड़क क्यूँ रहा है,ऐसा कुच्छ भी तो नही हुआ ना..."

इतना अच्छा काम करने के बाद अरुण की गालियाँ सुनने से गुस्सा मुझे भी आ रहा था, अरुण की बॉडी की तरह मेरे भी बॉडी का टेंपरेचर बढ़ रहा था...लेकिन कैसे भी करके मैने अपने बॉडी टेंपरेचर को 25°सी पर मेनटेन करके रखा हुआ था क्यूंकी वो अपुन का सॉलिड दोस्त था....

"ऐसा कुच्छ भी नही हुआ का क्या मतलब बे...तू हमेशा चूतिया रहेगा..बकलंड कही का...उल्लू साले,कुत्ते,कमीने..."मुझे धक्का देते हुए अरुण ने कहा...

अरुण का ये धक्का सीधे मेरे लेफ्ट साइड मे असर किया और मैने अपने बिस्तर के नीचे रखा हुआ हॉकी स्टिक उठाया और बोला...

"सुन बे झन्डू ,यदि आगे एक शब्द भी बोला तो ये डंडा तेरी गान्ड मे घुसाकर मुँह से निकालूँगा...यदि गान्ड मे इतना ही दम था तो फिर मुझे क्यूँ बोला कि मैं तुझे दिव्या की चम्मी दिलाऊ, जा के खुद क्यूँ नही माँग ली...एक तो साला एहसान करो उपर से गाली भी खाऊ...सही है बेटा,बिल्कुल सही है..इसिच को कहते है हवन करते हुए हाथ जलना....चल फुट इधर से अभी और यदि अपने साले गौतम और अपने ससुर का तुझे इतना ही डर था तो फिर दिमाग़ से पैदल उस दिव्या से इश्क़ ही क्यूँ लड़ाया...बेटा ये प्यार-मोहब्बत वो मीठी खीर नही,जिसे घर मे तेरी मम्मी सामने वाली टेबल पर रखकर कहती है कि खा ले बेटा,खीर बहुत मीठी बनी है जिसके बाद तू अपना मुँह फाड़कर सारा का सारा निगल जाता है और डकार भी नही मारता...ये प्यार-मोहब्बत वो मीठी खीर है जिसे खाने के बाद बंदे की जीभ से लेकर कलेजा और आख़िर मे गान्ड तक जल जाती है...इसलिए यदि गट्स है तभी माल के पीछे पडो,वरना उन्हे पीछे छोड़ दो...और तूने क्या बोला मुझे...."

"माफ़ कर दीजिए जहांपनाह और मेरी फाड़ना बंद करिए...आप कहे तो मैं गंगा नदी के बीच मे जाकर दोनो कान पकड़ कर उठक-बैठक लगा लूँगा...."

"अब आया ना लाइन पर..."

"अब आगे क्या करूँ..."

"फ़ेसबुक चला और उसको अपनी आदत डलवा दे...ताकि जब तू उससे एक पल के लिए भी दूर रहे तो वो तड़प जाए,तुझसे बात करने को..वो बेचैन हो उठे तुझ जैसे बदसूरत को देखने के लिए....फिर देखना वो चुम्मी भी देगी और चुसेगी भी..."

"क्या चुसेगी बे.."

"होंठ...होंठ चुसेगी,वैसे तूने क्या सोचा था "

"मैने भी होंठ ही सोचा था "

"बस मेरे बताए रास्ते पर चलते रह...कुच्छ ही दिनो मे वो मज़े से लेगी भी और मज़े से देगी भी..."

"ये क्या बक रहा है बे कुत्ते..."

"मेरा मतलब तो गिफ्ट से था,अब भाई जब तुम दोनो कपल हो ही गये हो तो एक-दूसरे को गिफ्ट तो दोगे ही ना और बेटा ज़रा संभाल कर उसे दारू मत दे देना गिफ्ट मे..."

"ओह! समझ गया..."

"बस तू मेरे नक्शे कदम पर चल,दिव्या अपने आगे से भी लेगी और पीछे से भी लेगी..."

"मुझे मालूम है तेरे कहने का मतलब गिफ्ट है..."

"ग़लत...मेरा कहने का मतलब लंड था,मतलब कि वो आगे भी लंड लेगी और पिछवाड़े मे भी लंड लेगी.."ये बोलते ही मैं तुरंत वहाँ से काल्टी हो गया और अरुण हॉकी स्टिक लेकर मुझे दौड़ाने लगा......
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"अरमान,यही पर रोक दे यार...अबकी बार तीसरा कॉल आया है ऑफीस से,मैं चलता हूँ..."वरुण अपने वाइब्रट होते मोबाइल को हाथ मे पकड़ कर बोला...वरुण तैयार तो पहले से था इसलिए उसने एक मिनिट मे शू पहने और फ्लॅट से निकल गया.....

वरुण के जाने के बाद मेरे होंठो पर एक मुस्कान थी...ये मुस्कान उस वक़्त की थी ,जब अरुण मुझे धमकिया देते हुए पूरे हॉस्टिल मे दौड़ा रहा था...साला वो भी क्या पल थे,..कहने को तो हमारा हॉस्टिल किसी फाइव स्टार होटेल की तरह आलीशान तो नही था...लेकिन हमारे लिए हमारा हॉस्टिल किसी फाइव स्टार होटेल से कम भी नही था...हॉस्टिल की बेजान सी दीवारो,दरवाजो जिन पर हम अक्सर पेन से ड्रॉयिंग और कॉलेज के टीचर्स के कार्टून बनाया करते थे ,उन भद्दी सी दीवारो से हमे एक लगाव सा हो गया था...और आज फिर दिल कर रहा था कि उन बेजान सी भद्दी दीवारो के बीच रहूं, आज फिर दिल कर रहा था की अपने टीचर्स के कार्टून उन बेजान सी दीवारो पर बनाऊ और हॉस्टिल के बाथरूम मे जाकर स्पर्म डोनेट करूँ...पर ये मुमकिन नही था और शायद समय का चक्र ही एक ऐसी घटना थी,जिसके सामने मैने हार मानी थी....
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"अबे ओये मुँह बंद कर ले..." मुझे ज़ोर से हिलाते हुए अरुण बोला"इसी दुनिया मे है ना या फिर किसी एलीयन के साथ दूसरे प्लॅनेट की सैर कर रहा है..."

"मैं तो अपने स्वर्ग की सैर कर रहा था और तूने मुझे वहाँ से खींच लिया...साले तू हमेशा मेरे खास पल के बीच मे ही क्यूँ आकर टपक पड़ता है..."

"वो इसलिए क्यूंकी मैने तेरी एमाइल आइडी चेक की और निशा के सारे मेस्सेज पढ़ डाले..."

"ये तूने क्या किया..."

"अबे रिक्ट तो ऐसे रहा है,जैसे मैने तेरी गान्ड मार ली हो..."

"लेकिन फिर भी तुझे ऐसा नही करना चाहिए था...ये ग़लत है.."

"कुच्छ ग़लत नही है बीड़ू और जाकर इनबॉक्स चेक कर 40 मिनिट्स पहले निशा डार्लिंग ने मेस्सेज भेजा है..."

"सच...!"वहाँ से तुरंत उठकर मैं कंप्यूटर के पास पहुचा और अपना इनबॉक्स चेक किया...निशा ने आज एक मेस्सेज भेजा था लेकिन वो अनरीड मेस्सेज के ऑप्षन मे नही था जिसका सॉफ-सॉफ शुद्ध मतलब था की मेरे विशुध दोस्त ने निशा का ये मेस्सेज भी पढ़ लिया है....


"दूसरो के मेस्सेज पढ़ने की तेरी आदत अभी तक गयी नही..."बोलते हुए मैने निशा का मेस्सेज ओपन किया...

निशा ने अपने मेस्सेज मे लिखा था कि उसकी कंडीशन अब और भी खराब हो चुकी है...अब यदि उसकी कोई फ्रेंड भी मिलने आती है तो उसे ,निशा से मिलने नही दिया जाता...उसके बाप ने घर के बाहर दो गार्ड्स और लगवा दिए है जिससे उसका निकलना अब तो नामुमकिन ही है...निशा ने अपने मेस्सेज मे लिखा था कि उसे रात को जबर्जस्ति जल्दी सुला दिया जाता है...यदि वो नींद ना आने का बहाना करती है तो उसके माँ-बाप उसे नींद की गोलियाँ खाने की सलाह देते है और उसके बाद सबसे बुरी खबर निशा ने अपने मेस्सेज मे ये दी थी कि उसके घर के बाहर चौकीदारी करने वाले गार्ड ने उसके बाप को बता दिया है कि निशा का एक लड़के के साथ चक्कर है...लेकिन वो गार्ड मेरा नाम नही जानता इसलिए फिलहाल मुझे चिंता करने की कोई ज़रूरत नही है...निशा ने मुझे सलाह भी दी थी कि मैं उके घर के आस-पास भी नज़र ना आउ,वरना वो गार्ड मुझे पहचान लेगा.....अट दा एंड, निशा ने आख़िर इस मेस्सेज के ज़रिए एक खुशख़बरी दे ही दी,वो खुशख़बरी ये थी कि अभी से ठीक एक घंटे बाद निशा ऑनलाइन रहेगी....
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"अभी तक क्या कम मुसीबत थी ,जो तेरी उस लैला के गार्ड ने बीच मे एंट्री मार दी..."मेरे पीछे से अरुण बोला...
मैं पीछे मुड़ा तो देखा कि अरुण अपने घुटनो मे हाथ रखे झुक कर कंप्यूटर स्क्रीन मे नज़र गढ़ाए हुए था...

"अबे तू मेरा मेस्सेज क्यूँ पढ़ रहा है ...चल भाग यहाँ से..."

"एक शर्त पर..."

"बोल.."

"तू घर वापस चलेगा..."

"रहने दे,कोई ज़रूरत नही...तू मेरा मेस्सेज देख सकता है..."बड़बड़ाते हुए मैने कहा...
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"हाई...हाउ आर यू"ठीक एक घंटे बाद निशा का मेस्सेज आया...जिसे देखकर मेरा सीना खुशी के मारे 5 इंच ज़्यादा फूल गया...

"आक्सिडेंट हो गया है मेरा और मैं जल्द ही एड्स की बीमारी से मरने वाला हूँ...."

"ऐसा क्यूँ बोल रहे हो..."

"मुझे ये ही...बाइ..हाउ आर यू...जैसे सेंटेन्सस से नफ़रत है.."

"क्क्क...मेरा लास्ट मेस्सेज मिला ,जो मैने आज सुबह किया था..."

"हां मिल गया..."
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"अब कहाँ मर गयी..."जब कुच्छ देर तक निशा का रिप्लाइ नही आया तो मैने मेस्सेज सेंड किया...

"यही हूँ,..."

"तो फिर इतना शांत क्यूँ है..."

"मैने सोचा कि तुम कुच्छ बोलोगे..."

"ज़्यादा मत सोच...और वैसे मुझे सच मे कुच्छ कहना था..."

"क्या..."

"चुम्मि देगी क्या...."

मैने जैसे ही ये लिखकर सेंड बटन को क्लिक किया अरुण "एसस्स" बोलते हुए ज़ोर से हवा मे कुदा...

"तू क्यूँ खुश हो रहा है बे "

"कुच्छ नही यार,भाई है तू मेरा..."

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"हमारे मिलने का कोई चान्स नही अरमान "

निशा के इस रिप्लाइ पर मैने बिस्तर से वरुण का गॉगल्स उठाया,जो शायद वो अपने साथ ले जाना भूल गया था और उसे पहनकर टाइप किया"वेल,आइ हॅव आ प्लान तेरे घर मे नींद की कयि गोलिया होंगी...राइट"

"रॉंग...कल ही ख़तम हो गयी.."

"डायन कही की...कोई एक्सपाइर्ड मेडिसिन है..."

"हां...लेकिन ये तुम क्यूँ पुच्छ रहे हो.."

"क्यूंकी मैं तुमसे अब नागपुर के बेस्ट हॉस्पिटल मे मिलने वाला हूँ..."

"मैं कोई एक्सपाइरी टॅब्लेट्स या मेडिसिन नही लेने वाली...समझे..दिमाग़ खराब है क्या तुम्हारा"

"तेरे दिमाग़ का फ्यूज़ उड़ गया है क्या...एक्सपाइरी मेडिसिन तुझे नही तेरे बाप को...सॉरी अंकल जी को खिलानी है...ताकि उनकी तबीयत खराब हो और जब वो हॉस्पिटल मे अड्मिट होंगे तब अपुन दोनो का टांका भिड़ेगा...क्या बोलती ,सॉलिड आइडिया है ना..."

"एक दम बकवास आइडिया है...तुम ऐसा सोच भी कैसे सकते हो...."

" दिमाग़ से "जमहाई लेते हुए मैने आगे टाइप किया"अरे टेन्षन मत ले..ऐसी गोली,दवाई से कुच्छ नही होता...मैने खुद पर बहुत बार एक्सपेरिमेंट किया है...."

"आआववववव...."

"क्या आआवववव "

"तुमने अभी कहा कि तुमने खुद पर एक्सपेरिमेंट किया है..."

"हां, जब भी एग्ज़ॅम मे मेरे कम मार्क्स आते या फिर मुझसे कोई ग़लती हो जाती तो घरवालो की डाँट से बचने के लिए मैं यही करता था..क्यूंकी मैं तब कुच्छ घंटो के लिए बीमार हो जाता था..जिसके बाद कोई कुच्छ नही बोलता था...यकीन मान अंकल जी का ज़्यादा से ज़्यादा सर दर्द करेगा या फिर बेहोश हो जाएँगे..."

"सच..."

"अब खून से लिख कर दूं क्या.."

"ठीक है...लेकिन मेरे डॅड को मेडिसिन देगा कौन..."

"मैं दूँगा...मैं तेरे घर आउन्गा और तेरे बाप से...सॉरी अंकल जी से कहूँगा कि ससुर जी मैं आपका दामाद हूँ...उसके बाद मैं अपने ससुर जी के साथ खाना खाउन्गा और चुपके से मेडिसिन उनके खाने मे मिला दूँगा...सिंपल.."

"क्या तुम सच मे ऐसा करोगे, मुझे तो ये डेंजरस लग रहा है...लेकिन कोई बात नही ,मैं तुम्हारे आने का इंतेजार करूँगी..."
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निशा का ये मेस्सेज पढ़ते ही मैने गॉगल्स निकाल कर बिस्तर पर फेका और ज़ोर से चिल्लाया"हे भगवान,तूने लड़कियो को दिमाग़ क्यूँ नही दिया...यदि तूने इनको दिमाग़ दिया होता तो ये हम मासूम लड़को का दिमाग़ नही खाती...."

मैने गुस्से मे अपने सर के बाल भी नोचे और फिर वापस जाकर कंप्यूटर के सामने बैठ गया...

"देख निशा...मैं अब जो बोल रहा हूँ ठीक वैसा ही करना और प्लीज़...प्लीज़...प्लीज़ अपना दिमाग़ मेरे इस प्लान मे मत लगाना सबसे पहले तो कोई एक्सपाइरी मेडिसिन ढूँढ और अपने बाप...सॉरी यार, मतलब अंकल जी के खाने पीने मे दबाई से मिला देना और हां ज़्यादा मत डाल देना..."

निशा के ऑफलाइन होने से पहले मैने उसे अपना नंबर भी दे दिया और कहा कि जब उसके डॅड की तबीयत खराब हो जाए तो वो आंब्युलेन्स वालो को कॉल करे देन मौका मिलते ही मेरे नंबर पर कॉल कर दे और उसी कॉल के दौरान आगे क्या करना है,मैं उसे बताउन्गा....
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"एक बात बता..."जब मैने कंप्यूटर शट डाउन किया तो अरुण बोला"तूने बीच मे गॉगल्स क्यूँ पहना...वीडियो चॅट तो तुम दोनो कर नही रहे थे फिर बाबा आदम के जमाने की टेक्स्ट चाटिंग मे तूने गॉगल्स क्यूँ पहना..."

"मैं तो तुझे लाइन मार रहा था..वो क्या है कि मैं तुझे पटा कर ठोकना चाहता हूँ ...जो काम मैं चार साल मे नही कर पाया ,वो मैं अब करने वाला हूँ... चल चलती क्या 11 से 12 के शो मे..."घड़ी की तरफ देखते हुए मैं बोला"आक्च्युयली अपुन जब भी गॉगल्स पहनता है तो एक दमदार फीलिंग्स आती है...मुझे ऐसा लगता है जैसे कि मैं कुच्छ भी कर सकता हूँ..."
"अपनी गान्ड भी मार सकता है ,क्यूँ "
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अरुण ने खाना बनाया और मैने खाना खाया...एक घंटे पहले मैने निशा को जो प्लान बताया था उसमे रिस्क था,क्यूंकी यदि कही मेडिसिन ने निशा के बाप पर रियेक्शन कर दिया तो बहुत बड़ी दिक्कत हो सकती थी और इन सबका दोषी मैं होता...मुझे अब भी यकीन नही हो रहा था कि मैने निशा के बाप की जान सिर्फ़ एक किस के लिए दाँव पर लगा दी थी...खैर ये सच था और ये कारनामा करने का आइडिया मेरा ही था इसलिए मैं इस समय अब अपने प्लान के बॅक अप के बारे मे सोच रहा था....लेकिन दिमाग़ था कि फ्यूचर मे होने वाले हॉस्पिटल के उस सीन की इमॅजिनेशन कर रहा था ,जब मैं और निशा 

"साला मेरे को अब भी यकीन नही हो रेला है कि मैने सिर्फ़ एक किस के लिए इतना सब कुच्छ किया..."

"अब क्या कर दिया बे तूने...आजा दारू पिएगा..."

"वैसे तो आइ लव दारू मोर दॅन गर्ल्स...लेकिन इस समय ये फ़ॉर्मूला चेंज करना है..इसलिए नो दारू, दो चखना.."

अरुण को देखकर और निशा के बाप के बारे मे सोचकर मुझे कॉलेज के दिनो का मेरा एक एक्सपेरिमेंट याद आया जब मैने अरुण के नये शर्ट और जीन्स पहनने के लिए उसे एक्सपाइरी टॅब्लेट्स खिला दी थी साला सुबह से शाम तक सर पकड़ कर रोता रहा था.... 
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"अरमान मैने डॅड को मेडिसिन दे दी है...वो इस समय बेहोश है और मोम बहुत परेशान है..."

"गुड...रेप्स आडेड "

"मुझे बहुत डर लग रहा है अरमान..मुझे अब ना जाने क्यूँ ऐसा लग रहा है कि हमे ये नही करना चाहिए था..."

"मुझे भी अब यही लग रहा है "

"क्य्ाआ...पर तुमने तो कहा था कि..."

"चल बाइ..ससुर जी को लेकर हॉस्पिटल पहुच ,मैं भी उधरिच मिलता हूँ..."
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कॉल डिसकनेक्ट करने के बाद मैने वरुण की बाइक उठाई और हॉस्पिटल के लिए निकल पड़ा...वैसे मैने निशा से हॉस्पिटल का नाम नही पुछा था लेकिन मुझे 101 % मालूम था कि निशा का रहीस बाप नागपुर के सबसे बेस्ट हॉस्पिटल मे अड्मिट होगा और मेरी ये सोच एक दम सही निकली...
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जिस रूम मे निशा के डॅड अड्मिट थे वहाँ का नज़ारा बिल्कुल जाना पहचाना था..जैसा की अक्सर होता है,निशा का बाप बेड पर बेहोश पड़ा था ,उसके हाथ मे ग्लूकोस की एक बोतल सुई छेद्कर चढ़ाई गयी थी...और निशा अपनी माँ के साथ बेड के आस-पास उदास बैठी हुई थी....
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"क्या हाल है अंकल का..."निशा को कॉल करके मैने कहा...

कॉल रिसीव करने के बाद निशा मुझे बात करने मे थोड़ा हिचकिचा रही थी जिसकी वजह उसके पास बैठी उसकी माँ थी...

"मोम, आपने नीचे जाकर फॉर्म भर दिया क्या..."कॉल होल्ड मे रख कर निशा ने अपनी माँ से पुछा...

"नही..."

"आप जाइए मैं यहाँ बैठी हूँ..."
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"अरमान तुमने बिल्कुल ग़लत किया...तुम्हे ज़रा सा भी अंदाज़ा है कि डॅड की हालत क्या है..वो पिछले दो घंटे से बेहोश पड़े है..."
"डॉन'ट वरी, मैं भगवान हूँ ,मेरी इज़ाज़त के बिना इस दुनिया का एक पत्ता भी नही हिल सकता..."

"ये मज़ाक का वक़्त नही है...वैसे तुम हो कहा"

"बाहर खड़ा हूँ..."
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जब निशा की माँ लिफ्ट से नीचे चली गयी तो मैं उस रूम के अंदर आया जहाँ निशा के पप्पा जी बिस्तर पर एक्सपाइर हो चुकी गोली खाकर अपनी नींद पूरी कर रहे थे....अंदर घुसते ही मैने दरवाजा लॉक किया और पर्दे को खिसका दिया ताकि यदि बाहर से कोई टपोरी अंदर नज़र मारे तो उसे कुच्छ ना दिखे....
"डॅड ,जाग जाएँगे तो प्राब्लम हो जाएगी..."जब मैने निशा को कसकर पकड़ा तो वो बोली...

"इसका भी जुगाड़ है..."बोलते हुए मैने निशा का एक हाथ पकड़ा और उसके लंबे-लंबे नाख़ून से उसके डॅड के तलवे पर खरोंच मारी...

"ससुर जी सो रहे है..."निशा के डॅड के शरीर पर कोई हल चल ना देख कर मैने कहा और निशा के होंठो को अपने होंठो से जकड लिया...


RE: Porn Hindi Kahani दिल दोस्ती और दारू - - 12-14-2018

निशा को किस करने के बाद मैने फॉरमॅलिटी निभाते हुए उसका हाल चल पुछा और वो भी फॉरमॅलिटी निभाते हुए लड़कियो के घिसे पिटे अंदाज़ मे बोली "आइ आम फाइन..व्हाट अबाउट यू " जबकि मैं जानता था कि वो इन दिनो कुच्छ परेशान सी है...निशा ने ये फॉरमॅलिटी निभाई ये जानते हुए भी कि मैं सब कुच्छ जानता हूँ...उस थोड़े से वक़्त मे जब मैं उसके साथ था वो हर पल मुस्कुराने का झूठा नाटक करती रही...वो मुझे ये शो कर रही थी की वो बहुत खुश है...जबकि मैं उसकी आँखो को देख कर ही समझ गया था कि वो ऐसा बर्ताव सिर्फ़ मेरा दिल रखने के लिए कर रही है....जब मैं वहाँ से जा रहा था तब वो बहुत खुश नज़र आ रही थी, उसने मुझपर"बाइ...टेक केर युवरसेल्फ "जैसा घिसा पिटा डाइलॉग भी फेक के मारा...लेकिन मैं जानता था की उसने ज़ुबान से तो जाने के लिए कह दिया...लेकिन दिल से वो नही चाहती थी की मैं जाउ....वो इस वक़्त अंदर से कुच्छ और...और बाहर से कुच्छ और थी...वो ये सोच रही थी कि मैं उसकी झूठी हँसी और उसकी झूठी मुस्कान पर यकीन करके ये मान जाउन्गा कि वो सच मे बहुत खुश है...जबकि वो खुद मुझे हर दिन मेरी ईमेल आइडी पर अपने परेशानियो को टेक्स्ट फॉर्म मे कॉनवर्ट करके मुझे सेंड करती थी....जब बात एक दम नाज़ुक सिचुयेशन की हो तो घिसा पिटा डाइलॉग हर किसी के मुँह से निकल जाता है...मेरे भी मुँह से निकला...

" ठीक है तो फिर मैं चलता हूँ...अपना ख़याल रखना और अंकल का भी..."निशा को मैने एक मोबाइल देते हुए कहा..."ये मेरा मोबाइल है,इसे संभाल कर रख और ये बता तू मोबाइल रखती कहाँ है जो ससुर जी हर बार पकड़ लेते है...मुझसे सीख हॉस्टिल स्कूल टाइम मे मैं 3 साल हॉस्टिल मे रहा और तीनो साल मोबाइल अपने पास रखा लेकिन मुझे कभी कोई पकड़ नही पाया...मेरे स्कूल के जाने माने काई टीचर्स जो खुद को शरलॉक होम्ज़ की औलाद समझते थे वो कभी मेरे मोबाइल का दीदार नही कर पाए...."

निशा को समझा-बुझा कर जब मैं बाहर आ ही रहा था कि तभी मेरी सासू माँ दरवाजा खोल कर अंदर टपक पड़ी और मुझे देख कर वो निशा की तरफ सवालिया नज़रों से देखने लगी....सासू माँ की हरकतों को देख कर मैं समझ गया कि वो किस उलझन मे है...

"मैं यहाँ झाड़ू मारने आया था, लेकिन रूम पहले से चका चक है..अब मैं चलता हूँ..."ये बोलकर मैने तुरंत वहाँ से काल्टी मारी और वापस अपने फ्लॅट की तरफ जाने लगा....
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हॉस्पिटल से अपने रूम आते वक़्त मैं हर पल बस निशा के बारे मे सोचता रहा कि कितना नाटक कर रही थी खुश होने का...फिर मेरा ध्यान निशा के बाप पर गया जो बेड पर बेहोश लेटे हुए थे...उनकी हालत देख कर मुझे थोड़ा खराब लगा.
"ये मैने क्या किया...सिर्फ़ एक किस के लिए निशा के बाप की ये हालत कर दी...मुझे ऐसा नही करना चाहिए था...इट'स टू बॅड "

मैने खुद को गाली दी ,बहुत बुरा भला कहा ये सोचकर कि अब ये ख़यालात मेरे दिमाग़ से चले जाएँगे..लेकिन जैसे-जैसे वक़्त बीत रहा था मैं सिर्फ़ और सिर्फ़ निशा के डॅड के बारे मे ही सोच रहा था और ये होना ही था क्यूंकी मेरे 1400 ग्राम के वजन वाले दिमाग़ का ये एक साइड एफेक्ट था कि मैं हद से ज़्यादा किसी टॉपिक पर सोचता हूँ और हद से ज़्यादा किसी काम को करने के लिए उतावला रहता हूँ...मैं कभी ये सोचता ही नही कि फलाना काम मुझसे नही होगा या फलाना परेशानी मैं दूर नही कर पाउन्गा...इस समय अपने रूम की तरफ जाते हुए भी मैं निशा के बाप के बारे मे हद से ज़्यादा सोच रहा था...मैं सोच रहा था कि यदि निशा का बाप ठीक ना हुआ तो .....? यदि निशा के बाप की हालत और नाज़ुक हो गयी तो ......?यदि निशा का बाप एक्सपाइरी मिडिसिन के रिक्षन के कारण मर गया तो.....?
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ये मेरे साथ पहली बार नही हो रहा था जब मैं इतना आगे की सोच रहा था, ऐसा कयि बार मेरे साथ पहले भी हो चुका था...मेरे एक दोस्त ने जब स्यूयिसाइड (ए डेड ड्रीम ) किया था तब मैं काई रात तक बस इसीलिए नही सो पाया था क्यूंकी मेरा दिमाग़ हर वक़्त बस उसी इन्सिडेंट की रट लगाए रहता था...मेरे दिमाग़ मे मेरा वो मरा हुआ दोस्त बहुत दिनो तक ज़िंदा रहा और अक्सर रात को वो मुझे मेरे रूम के दरवाजे के पास हाथ मे फरसा लिए खड़ा दिखता था...
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मेरा ब्रेन भी कितना घन चक्कर था जिसने बात कहाँ से कहाँ पहुचा दी थी...मैं इस टॉपिक पर और भी ज़्यादा खोया रहता यदि सामने से गुज़र रहे एक शक्स ने मुझे देखकर चलने की नसीहत ना दी होती तो..
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"कहाँ था बे और तेरा मोबाइल कहाँ है...कितनी देर से कॉल कर रहा हूँ लेकिन तू कोई रेस्पोन्स ही नही देता..."रूम के अंदर घुसते ही वरुण ने पुछा...

"निशा को देकर आ रहा हूँ अपना मोबाइल..."बिना उसकी तरफ देखे मैं सामने वाली टेबल के पास गया और ड्रॉ खोलकर सिगरेट की पॅकेट निकाली...

"साला आज बहुत भयंकर आक्सिडेंट हो जाता,.."तीन-चार कश लगातार मार कर मैने कहा और वरुण की तरफ देखा....वरुण की तरफ देखते ही सिगरेट का जो धुआ मेरे सीने मे था वो अंदर ही रह गया और मैं ज़ोर से खांसने लगा....क्यूंकी इस वक़्त वहाँ वरुण के साथ-साथ सोनम भी मौजूद थी...मैने जिस हाथ मे सिगरेट पकड़ रखी थी उसे पीछे करके दीवार से घिसकर बुझा दिया और सिगरेट वही फेक दी...

"अरुण कहाँ है..."वरुण की तरफ देख कर मैने पुछा...

"बाल्कनी की तरफ देखो...तुम्हारा दोस्त पिछले एक घंटे से बाल्कनी मे खड़ा होकर मुझे लाइन दे रहा है..."

"तुम दोनो अपना कार्यक्रम जारी रखो...मैं आता हूँ..."बोलकर मैं बाल्कनी की तरफ बढ़ा ,जहाँ से अरुण टकटकी लगाए सोनम को देख रहा था...

"पलकें भी झपका लो अंकिल...वरना आँख निकल कर बाहर आ जाएँगी.."

"अरे अरमान तू..."

"नही...मैं अरमान नही बल्कि कोई भूत हूँ.."

"कॉमेडी मत मार और वरुण की आइटम को देख...साली क्या लपपप खाना खाए जा रही है"

"तू एक बात बता कि तू खाने के लिए लार टपका रहा है या सोनम के लिए लार टपका रहा है..."

"दोनो के लिए "
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"निशा के डॅड की हालत कैसी है अब अरमान..."अंदर से सोनम ने आवाज़ लगाई...

"एक दम बढ़िया...कुच्छ ही देर मे पहले की तरह खेलने-कूदने लगेंगे..."

"निशा ने मुझे कॉल करके बताया था कि उसके डॅड की तबीयत खराब हो गयी है..."सोनम एक बार फिर अंदर से चिल्लाई...
"मुझे भी निशा ने ही कॉल करके बताया था..."

"तुम हॉस्पिटल से ही आ रहे हो ना..."सोनम मेरा कान फाड़ते हुए एक बार फिर चीखी...

"हााआआन्न्न्नननननणणन्......"झुंझलाते हुए मैने अपना पूरा दम लगाया और ज़ोर से चीखा...जिसके बाद सोनम ने और कुच्छ नही पुछा
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सोनम कुच्छ देर तक और वहाँ रही और फिर वहाँ से जाते वक़्त वरुण को बाइ...टेक केर कहा उसके बाद उन दोनो के बीच पप्पी-झप्पी का आदान-प्रदान भी हुआ...
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सोनम के जाने के बाद हम तीनो फिर बैठे हाथ मे एक-एक ग्लास लिए...वरुण जहाँ 8थ सेमेस्टर की दास्तान सुनने के लिए बैठा था वही मैं 8थ सेमेस्टर की दास्तान सुनाने के लिए बैठा था और अरुण...अरुण हम दोनो का पेग बना रहा था...
"मेरे मे इस बार कम पानी डालना बे ,लोडू...झान्ट टाइप से पेग बनता है ,साला असर ही नही करता..."

"तू आगे बोल...फिर क्या हुआ..."
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फिर....फिर बहुत बड़ा कांड हुआ...एक दिन कॉलेज से आते वक़्त अरुण ने कहा कि उसे होड़ सर के पास कुच्छ काम है ,इसलिए मैं सौरभ के साथ हॉस्टिल चला जाउ,वो कुच्छ देर मे आएगा....मैं और सौरभ हॉस्टिल आ गये...हमारे हॉस्टिल आने के लगभग आधे घंटे बाद ही अरुण हांफता हुआ आया और रूम के अंदर घुसकर दरवाजा अंदर से बंद कर दिया....
"क्या हुआ बे...किसी ने ठोक दिया क्या..."

"बहुत बड़ा लफडा हो गया भाई..."अरुण सीधे आकर मेरे पास बैठा और बोला"दिव्या से किस करते वक़्त गौतम ने देख लिया...गौतम और उसके दोस्त मुझे मारने के लिए दौड़ा रहे थे ,बड़ी मुश्किल से जान बचा कर आया हूँ...मेरा बॅग भी पीछे कही गिर गया है..."

ये सुनकर कुच्छ देर के लिए मैं घबरा उठा क्यूंकी गौतम इसका बदला अरुण से ज़रूर लेगा और यदि उसने इस बात की हल्की सी भी खबर अपने बाप को दी तो फिर एक बहुत पड़ा बखेड़ा खड़ा होने वाला था...जिसमे गौतम और उसकी बहन दिव्या को तो कुच्छ नही होता...लेकिन मेरा खास दोस्त अरुण पिस जाता....

"होड़ के पास जाने का बोलकर तू इश्क़ लड़ाने गया था बक्चोद,झाटु..."

"बाद मे चाहे जितना मार लेना लेकिन अभी कुच्छ कर...क्यूंकी गौतम अपने सभी लौन्डो के साथ हॉस्टिल आ रहा है,मुझे मारने के लिए...."

"अरुण..."ये एक ऐसा शक्स था जो मेरे दिल के बेहद ही करीब था या फिर कहे कि सबसे करीब था...ये एक ऐसा शक्स था जो जानता था कि मैं आक्चुयल मे क्या हूँ, मैं आक्च्युयली क्या पसंद और ना-पसंद करता हूँ...

किसी के बारे मे मेरी सोच क्या हो सकती है...ये पता करने के सिर्फ़ तीन तरीके है, पहला ये कि मैं खुद आपको बताऊ, जो की कभी हो नही सकता दूसरा ये कि आप मेरे 1400 ग्राम के ब्रेन की स्कॅनिंग करके सब मालूम कर ले और ये भी 99.99999999 % इंपॉसिबल ही है लेकिन तीसरा तरीका बहुत आसान है और वो तीसरा तरीका मेरा खास दोस्त अरुण है... 
इस समय अरुण मुझे इस उम्मीद मे ताक रहा था कि मैं उसे इस प्राब्लम से निकलने का कोई आइडिया या फिर कोई सुझाव दूँगा...वो जब से रूम के अंदर घुसा था तब से लेकर अब तक हर 10 सेकेंड्स मे मुझसे पुछ्ता कि मुझे कोई आइडिया आया या नही.....और हर बार की तरह इस बार भी जब उसने 10 सेकेंड्स के पहले ही टोक कर मुझसे पुछा तो मैं भड़क उठा....

"अबे ये एल मे भरा जमाल घोटा है क्या,जो कहीं भी ,किसी भी वक़्त लंड निकाल कर माल बाहर कर दिया...बेटा प्लान सोचना पड़ता है और सोचने के लिए थोड़ा टाइम चाहिए होता है..."

"जल्दी सोच...तब तक मैं मूत कर आता हूँ..."

"हां तू जा मूत कर आ...यही सही रहेगा और सुन..."

"बोल.."

"मेरे बदले भी मूत कर आना "
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अरुण की मदद तो मुझे करनी ही थी चाहे कुच्छ भी हो जाए बिकॉज़ ही ईज़ लाइक माइ चड्डी आंड बनियान ,जिसके बगैर मैं जी तो सकता था लेकिन उसके बिना हर वक़्त एक बेचैनी सी रहती....हे इस लीके राइफल ऑफ मी पेन,जिसके बिना कॉलेज मे मैं एक दिन भी नही गुजर सकता था...हे इस लीके इयरफोन ऑफ मी मोबाइल,जिसके बिना मैं अपने डूस हज़ार के मोबाइल मे गाना तक नही सुन सकता था और सबसे बड़ी बात ये की वो मेरा रूम पार्ट्नर था और उससे बड़ी बात ये कि वो मेरे दिल के बहुत करीब था ,इतना करीब की कभी-कभी मुझे ऐसा लगने लगता जैसे कि हम दोनो एक-दूसरे के गे-पार्ट्नर है....जब कुच्छ टूटा-फोटा सा आइडिया मेरे दिमाग़ मे आया तो मैं खिड़की के पास गया और बाहर देखने लगा कि गौतम और उसके दोस्त हॉस्टिल की तरफ आ रहे है या नही....और जैसा मैने सोचा था वैसा ही हुआ ,गौतम ,बहुत सारे लौन्डो के साथ हॉस्टिल की तरफ आते हुए मुझे दिखाई दिया...
.
"सौरभ तू जाकर हॉस्टिल के सब लौन्डो को जमा कर और मेरे रूम मे आने के लिए बोल..."

सौरभ के जाने के बाद अपने पैंट की चैन बंद करते हुए अरुण रूम मे घुसा...

"कुच्छ सोचा बे लवडे या अभी तक मरवा रहा है..."अंदर घुसते हुए अरुण ने पुछा....

"तू अभिच यहाँ से काल्टी मार, गौतम बहुत सारे लड़को को लेकर हॉस्टिल की तरफ आ रहा है..."

"शेर ,कुत्तो के झुंड से डरकर भागता नही,बल्कि उनका मुक़ाबला करता है ,उनकी माँ चोद देता है और फिर लवडा चुसाता है..."

"पर अभी सच ये है कि तू ना ही कोई शेर है और गौतम के दोस्त ना ही कुत्ते के झुंड...इसलिए जितना बोला उतना कर और बाहर यदि शोर-शराबा हो तो रूम से बाहर मत निकल जाना....समझा.."

"तू बोल रहा है तो छिप जाता हूँ ,वरना आज ही उन सालो को पेलता..."
.
मैने अरुण को किसी दूसरे रूम मे छुपाया, क्यूंकी जैसा मैने सोचा था उसके अनुसार गौतम...सबसे पहले हॉस्टिल के अंदर एंट्री मारेगा और उसके सामने हॉस्टिल का जो भी लौंडा दिखेगा उसे पकड़ कर सीधे अरुण का रूम नंबर पुछेगा....मैं नही चाहता था कि गौतम ,अरुण को देखे इसीलिए मैने अरुण को दूसरे रूम मे छिपने के लिए कहा और एक कॉपी खोलकर पढ़ने का नाटक ऐसे करने लगा...जैसे की मुझे कुच्छ पता ही ना हो....

हॉस्टिल के अंदर घुसकर गौतम ने एक लड़के का कॉलर पकड़ कर उससे अरुण का रूम नंबर पुछा और फिर दरवाजे पर लात मारकर वो रूम के अंदर आया.....
.
"तो तू भी उसी म्सी के साथ रहता है..."अंदर आते ही गौतम ने गालियाँ बाकी"वो म्सी कहाँ छिपा बैठा है,उसे बोल की बाहर आए, अभी साले के अंदर से इश्क़ का जुनून निकालता हूँ...."

"ओ...हेलो...किसकी बात कर रहा है और गालियाँ किसे बक रहा है..ज़रा औकात से बात कर..."किताब बंद करते हुए मैने कहा...

"तू बीसी ,आज शांत रहना...वरना आज तुझे भी तेरे उस दोस्त के साथ मारूँगा...म्सी शांत हूँ इसका मतलब ये नही कि मैं तुम लोगो से डरता हूँ..."

"म्सी होगा तू ,तेरा बाप,तेरा दादा,तेरा परदादा और तेरे परदादा का परदादा.....और ये बता कि यहाँ गान्ड मरवाने क्यूँ आया है..."मैने भी अपने तेवर दिखाते हुए कहा...

"अरुण..कहाँ है वो बीसी....."

"देख ऐसा है बेटा कि तुम लोग अब निकल लो..."

"पहले बता कि वो है कहाँ...वरना आज तुझे भी ठोकेंगे..."गौतम के एक जिगरी दोस्त ने आगे आते हुए कहा...
"अरुण तो एस.पी. अंकल के यहाँ है...अभी कुच्छ देर पहले उसका फोन आया था..."


RE: Porn Hindi Kahani दिल दोस्ती और दारू - - 12-14-2018

एस.पी. का नामे सुनते ही उन लोगो के तेवर काफ़ी हद तक कम हो गया...वो सभी,जो गौतम के साथ आए थे,एक -दूसरे का मुँह तकने लगे...और मैं यही तो चाहता था कि एस.पी. का सपोर्ट अरुण पर है,ये सोचकर वो वहाँ से चले जाए और बात को भूल जाए.....
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"मुझे इस पर यकीन नही,तुम लोग एक-एक रूम चेक करो और जहाँ भी वो लवडा का बाल दिखे...मार दो साले को...बीसी मेरी बहन से इश्क़ लड़ाता है..."

गौतम के ऐसा कहने पर उसके चम्चे हॉस्टिल के हर एक रूम को चेक करने लगे...अरुण को मैने फ्लोर के सबसे लास्ट रूम मे छुपने के लिए कहा था...इसलिए शुरू के कुच्छ कमरो को जब गौतम के चम्चो ने चेक किया तो उन्हे अरुण नही मिला....लेकिन जब वो फ्लोर के आख़िरी छोर की तरफ बढ़े तो मेरी साँसे अटकने लगी...क्यूंकी यदि उन्होने अरुण को हॉस्टिल मे देख लिया तो वो जान जाएँगे कि एस.पी. से ना तो मेरा कोई रीलेशन है और ना ही अरुण का...यदि ऐसा होता तो फिर वो ये भी जान जाते कि एस.पी. का सपोर्ट लेकर मैं उन्हे आज तक सिर्फ़ चूतिया ही बनाते आया हूँ....
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"ओये, इसे रंडी खाना समझ रखा है क्या, जो हर रूम को खोल कर देख रहे हो...मैने बोला ना कि अरुण यहाँ नही है..."

"तू बीसी चुप रहा..."मेरा कॉलर पकड़ कर गौतम ने मुझे मेरे रूम के अंदर किया और बोला"तू क्या सोचता है कि मुझे मालूम नही तेरे कांड...फर्स्ट एअर के दो लौन्डो को तूने ही मारा था ये मुझे पता है और बहुत जल्द तेरा भी नंबर आने वाला है....बेटा ऐसा मारूँगा तुझे कि तेरी सारी हेकड़ी निकल जाएगा...एक हिजड़े की ज़िंदगी जीने पर मज़बूर कर दूँगा तुझे मैं...तेरा बाप भी तुझे देखकर हिजड़ा कहेगा और तालिया बजाएगा....मादरचोद तेरी मैं वो हालत करने वाला हूँ कि तुझ पर कोई पेशाब भी करने से पहले सौ बार सोचेगा...चल भाग मादरचोद..."मुझे ज़ोर से धक्का देते हुए गौतम ने कहा...जिसके बाद मैं सीधे अपने बेड के पास गिरा और मेरा सर ज़ोर से किसी चीज़ से टकराया...दर्द तो बहुत कर रहा था लेकिन मेरे अंदर उफन रहे ज्वालामुखी ने उस दर्द को लगभग शुन्य कर दिया...मैने बिस्तर के नीचे पड़ा लोहे का रोड निकाला और खड़ा होकर गौतम को आवाज़ दी...

"इधर देख बे रंडी की औलाद...पहले जाकर अपनी माँ से पुछ्ना कि कितनो का लंड लेकर तुझे पैदा किया है,फिर मुझसे बात करना"लोहे की रोड को मज़बूती से पकड़ते हुए मैने कहा और बिना कुच्छ सोचे-समझे अपनी पूरी ताक़त से वो रोड गौतम के सर मे दे मारा....
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गौतम के सर पर लोहे का रोड मैने इतनी तेज़ी से मारा था कि वो उसी वक़्त अपने होश खो बैठा ,उसके सरसे खून की धारा बहने लगी...मेरा प्रहार इतना तेज था कि गौतम के चेहरे का कोई भी अंग इस वक़्त नही दिख रहा था...दिख रहा था तो सिर्फ़ खून...सिर्फ़ और सिर्फ़ खून...तब तक हॉस्टिल के सारे लड़के भी मेरे रूम के सामने पहुच गये थे और गौतम के चम्चो को पकड़ कर धो रहे थे.... गौतम ज़मीन पर पट बेहोश पड़ा हुआ था,जिसे मैने रोड से ही सीधा किया और अपनी पूरी क्षमता से एक और रोड उसके पेट मे मारा...जिसके बाद खून सीधे उसके मुँह से निकल कर मेरे उपर पड़ा.......
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उस दिन हॉस्टिल मे बहुत बड़ा लफडा हुआ था...हम हॉस्टिल वालो ने गौतम और उसके सभी दोस्तो को बहुत मारा...उस समय गुस्से मे शायद मैं ये भूल चुका था कि लोहे की रोड से जिसका मैं सर फोड़ रहा हूँ,वो कोई आम लड़का नही है....गौतम के पेट मे रोड मारकर उसके मुँह से खून निकालते वक़्त मैं ये भूल चुका था कि गौतम का बाप एक बहुत बड़ा गुंडा है और वो इसका बदला मुझसे ज़रूर लेगा....

मैने अब तक के अपने ज़िंदगी के 19 साल मे आज सबसे बड़ी ग़लती कर दी है ,इसका अंदाज़ा मुझे तब हुआ , जब गौतम को बेहोशी की हालत मे आंब्युलेन्स के ज़रिए हॉस्पिटल ले जाया जा रहा था...मैं उसी वक़्त समझ गया था कि इस आक्षन का रिक्षन तो होगा और वो भी बहुत बहुत बहुत बुरा...मेरा गुस्सा जब से शांत हुआ था तभी से मेरे अंदर एक डर घर कर चुका था...वो ये था की गौतम का बाप अब मेरा क्या हाल करेगा...यदि ये कॉलेज की छोटी-मोटी लड़ाई होती तो शायद उसका बाप इसे इग्नोर भी कर देता लेकिन यहाँ उसके एकलौते बेटे का मैने सर फोड़ डाला था...मैं ख़ौफ्फ खा रहा था उस पल के लिए,जब गौतम का बाप अपने बेटे का खून से सना शरीर देखेगा...इस समय मेरे दिमाग़ ने भी अपना साइड एफेक्ट दिखाना शुरू कर दिया..इस समय जब मुझे मेरे दिमाग़ की सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी तो वो मुझे धोका देकर आने वाले समय मे मेरा हाल क्या होने वाला है ,ये बता रहा था...मैने देखा कि गौतम के बाप ने मेरे सर पर ठीक उसी तरह से रोड मारा जैसा कि मैने गौतम के सर पर मारा था...
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"अरमान..."किसी ने मुझे पुकारा 

"अरमान..."

"अबे अरमाआअन्णन्न्...."कोई मेरे कान के पास ज़ोर से चिल्लाया...

"क्या है बे बोसे ड्के "हॉस्टिल मे रहने वाले उस स्टूडेंट को देख कर मैने पुछा

"सीडार सर,तुझे अमर सर के रूम मे बुला रहे है...चल जल्दी.."

"सीडार भाई,इतनी जल्दी हॉस्टिल कैसे पहुचे...उन्हे तो मैने कॉल तक नही किया था..."

"तू खिड़की के पास ही खड़ा है तो क्या तूने सूरज को ढलते हुए नही देखा...बेटा बाहर नज़र मार ,रात हो चुकी है...अब चल जल्दी से,वॉर्डन भी वहाँ अमर सर के रूम मे मौज़ूद है..."

उसके कहने पर मैने बाहर देखा और इस वक़्त सच मे रात थी...मैने बौखलाते हुए अपनी घड़ी मे टाइम भी देखा तो रात के 7 बज रहे थे...यानी कि मैं घंटो से यही खिड़की के पास खड़ा हूँ,लेकिन मुझे ये नही मालूम चला कि रात कब हो गयी....

"चल..चलते है.."उस लड़के के साथ रूम से बाहर निकलते हुए मैने कहा...

रूम से बाहर आते वक़्त मेरी नज़र अपने आप ही वहाँ पड़ गयी,जहाँ कुच्छ घंटे पहले गौतम खून मे सना हुआ लेटा था...वहाँ खून के निशान अब भी थे और मेरे दिमाग़ ने आने वाले पल की भविष्यवाणी करते हुए मुझे वो सीन दिखाया जिसे देख कर मेरी रूह कांप गयी,...मैने देखा कि मैं खून से लथपथ कहीं पड़ा हुआ हूँ और जानवर मेरे शरीर को नोच-नोच कर खा रहे है....

"अरमान..क्या हुआ,.."मुझे होश मे लाते हुए उस लड़के ने हैरानी से मेरी तरफ देखा....

"कुच्छ नही...चल"
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अमर सर के रूम के अंदर इस वक़्त लगभग सभी सोर्स वाले होस्टेलेर्स बैठे हुए थे...कुच्छ फोन पर किसी से बात कर रहे थे तो कुच्छ आपस मे आज हॉस्टिल मे हुए मार-पीट के बारे मे डिस्कशन कर रहे थे...हमारा हॉस्टिल वॉर्डन सब लड़को के सामने एक चेयर पर अपना सर पकड़ कर बैठा हुआ था....मेरे अंदर आते ही सब शांत हो गये,जो कुच्छ देर पहले किसी को कॉल पे कॉल किए जा रहे थे उन्होने मोबाइल नीचे कर लिया...जो लोग घंटो पहले हुई इस मार-पीट के बारे मे डिस्कशन कर रहे थे वो मुझे देख कर चुप हो गये और हॉस्टिल वॉर्डन ने बिना समय गवाए एक तमाचा मेरे गाल पर जड़ दिया...


"बहुत बड़ा गुंडा है तू...अब पता चलेगा तुझे की असलियत मे गुंडागिरी क्या होती है...तेरी वजह से मेरी नौकरी तो जाएगी ही,साथ मे तेरी जान भी जाएगी..."बोलकर वॉर्डन ने अपनी कुर्सी पकड़ ली और बैठ कर फिर से अपना सर पकड़ लिया....साला फट्टू

वैसे तो मैं वहाँ मौज़ूद सभी सीनियर्स,क्लासमेट और जूनियर्स को जानता था पर इस वक़्त मेरी आँखे सिर्फ़ और सिर्फ़ सीडार पर टिकी हुई थी...

"ये लोग जो कह रहे है क्या वो सच है...क्या तूने ही गौतम को मारा है..."सीडार ने पुछा

"हां..."

"तो अब क्या सोचा है...कैसे बचेगा इन सब से और मेरे ख़याल से तूने प्लान तो बनाया ही होगा कि गौतम को मारने के बाद तू उसके बाप से कैसे बचेगा..."

"मैं गौतम को नही मारना चाहता था,वो तो सडन्ली सब कुच्छ हो गया..."
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उस दिन शायद वो पहला मौका था जब मैं कुच्छ सोच नही पा रहा था,मैं जब भी इन सबसे बचने के लिए कुच्छ सोच-विचार करता तो मेरा दिमाग़ अलग ही डाइरेक्षन मे मुझे ले जाता था..जहाँ मैं जाना नही चाहता था...उस दिन हमारी मीटिंग घंटो तक चली और उस मीटिंग से हमारे सामने दो प्राब्लम आए और हॉस्टिल के हर एक लड़के ने सुझाव दिया ,सिर्फ़ मुझे छोड़ कर ,कि अब आगे क्या करना चाहिए....वॉर्डन हमारे साथ था और वॉर्डन ने कॉलेज के प्रिन्सिपल को भी रात मे पट्टी पढ़ा दी थी ,जिसके बाद हमे ये उम्मीद थी कि प्रिन्सिपल पोलीस के सामने हमारा साथ देगा..हमारे सामने इस वक़्त सिर्फ़ दो प्रॉब्लम्स थी और दोनो ही प्रॉब्लम्स कल सुबह की पहली किरण के साथ मेरी ज़िंदगी मे दस्तक देने वाली थी....पहली प्राब्लम ये थी कि मुझपर और मेरे दोस्तो पर हाफ-मर्डर ओर अटेंप्ट टू मर्डर का केस बनेगा...दूसरा ये कि गौतम का बाप हाथ धोकर मेरे पीछे पड़ जाएगा,जिसके बाद मेरा बचना नामुमकिन ही था..
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पोलीस केस को सुलझाने मे हमे ज़्यादा दिक्कतो का सामना नही करना पड़ा क्यूंकी गौतम और उसके दोस्त हॉस्टिल के अंदर घुसे थे मतलब लड़ाई करने के इरादे से वो वहाँ आए थे और फिर सब लड़को के बीच मार-पीट मे गौतम का सर किसी चीज़ से टकराया और वो वही बेहोश हो गया...हम मे से कोई एक भी सामने नही आया जिससे पोलीस किसे रिमॅंड पर ले और किसे ना ले ये उनके लिए मुश्किल हो गया.... हमने उस थ्री स्टार की वर्दी पहने हुए पोलीसवाले के सामने ये प्रूव कर दिया कि गौतम हमे मारने आया था और जिन लोगो का नाम एफ.आइ.आर. मे दर्ज हुआ है वो तो कल रिसेस के बाद वॉर्डन से दो दिन की छुट्टी माँग कर घर के लिए निकल चुके थे लेकिन उन्हे आज वापस इसलिए बुलाया गया ताकि पोलीस को शक़ ना हो कि कॉलेज किसी को बचाने की कोशिश कर रहा है...
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मुझे ,हॉस्टिल मे रहने वाले कुच्छ लड़को के साथ पोलीस स्टेशन भी ले जाया गया...जहाँ मुझे शुरू मे धमकाया गया और फिर कहा गया कि "यदि मैं उन्हे सब सच बता देता हूँ तो वो मुझे कुच्छ नही होने देंगे..."

वो मुझसे वो सब पुच्छ रहे थे जिसे ना बताने की प्रॅक्टीस मैने कल रात भर की थी,..पोलीस वालो ने मुझसे कल की घटना के बारे मे जितनी भी बार पुछा...जिस भी तरीके से पुछा, मैने हर बार अपना सर ना मे हिलाया और ज़ुबान ना मे चलाई...

"हां सर,हम उसे ला रहे है..."उस थ्री स्टार की वर्दी पहने हुए पोलीस वाले ने फोन पर किसी से कहा और मेरी तरफ देख कर बोला"चल ...तेरे प्रिन्सिपल का फोन आया है,.."

"मैने तो पहले ही कहा था कि मुझे कुच्छ नही मालूम...जो लड़के मेरा नाम बता रहे है वो मुझसे खुन्नस खाए हुए है...इसीलिए उन्होने मेरा नाम बताया..."

"मैने तुझसे पहले भी कहा है और अब भी कह रहा हूँ कि मेरे कंधे पर ये तीन स्टार ऐसे ही नही लगे है...चूतिया किसी और को बनाना...अब चल.."

उसके बाद सारे रास्ते भर मैने अपना मुँह नही खोला क्यूंकी धीरे-धीरे मुझे ऐसा लगने लगा था कि मेरे दिमाग़ पर इस समय शनि और मंगल कुंडली मार कर बैठे हुए है...इसीलिए मैं जो कुच्छ भी सोचता हूँ,जो कुच्छ भी करता हूँ...वो सब उल्टा मुझे ही आकर लगता है.....
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हमारी पहली प्राब्लम तो लगभग सॉल्व हो गयी थी यानी कि पोलीस केस का अब कोई झंझट नही था अब झंझट था तो वो था गौतम का बाप...

"पोलीस अंकिल...मेरा दोस्त गौतम कैसा है..उसे होश आया या अभी तक लेटा हुआ है..."जीप से उतरते हुए मैने पुछा...

"अपने प्रिन्सिपल के अतॉरिटी का यूज़ करके तू पोलिक के झमेले से तो बच जाएगा...लेकिन उस गुंडे से कैसे बचेगा जिसके लिए नियम,क़ानून कोई मायने नही रखता..."मुस्कुराते हुए उसने जवाब दिया "मुझे इस केस मे कोई खास दिलचस्पी नही है लेकिन तुझे आगाह कर देता हूँ कि तेरा बुरा वक़्त अब शुरू होने वाला है..."

मैं उस थ्री स्टार वाले की तरफ देखकर अपने दिमाग़ की डिक्षनरी मे कोई दमदार डाइलॉग ढूंढता रहा लेकिन जब मुझे कुच्छ नही सूझा तो मैने कहा

"वो क्या है कि इस वक़्त मुझे कोई दमदार डाइलॉग याद नही आ रहा है,इसलिए आप फिलहाल जाओ...आपके इस सवाल का जवाब किसी और दिन दूँगा"

कॉलेज के सामने पोलीस जीप से उतर कर मैं क्लास की तरफ बढ़ा...मन तो नही था क्लास जाने का लेकिन हॉस्टिल मे अकेले रहता तो मेरा दिमाग़ मुझे गौतम के बाप से पहले ही मार देता, इसलिए मैने क्लास अटेंड करना ही बेहतर समझा....क्लास की तरफ आते हुए सामने मुझे एश दिखी तो मेरे कदम खुद ब खुद रुक गये ,मैं जानता था कि वो इस समय मुझसे बेहद ही खफा होगी और मुझपर गुस्सा करेगी...लेकिन मैं फिर भी उसकी तरफ बढ़ा और ना चाहते हुए भी मुस्कुराया ताकि उसकी मुस्कान देख सकूँ...अपने सामने अचानक मुझे पाकर एश कुच्छ देर तक मुझे यूँ ही देखती रही और फिर आँखो मे मेरे लिए दुनियाभर की नफ़रत भरे हुए वहाँ से आगे बढ़ गयी...
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पिछले कुच्छ दिनो मे मुझे देखकर उसके होंठो मे जो एक प्यारी सी मुस्कान छा जाती थी ,उसकी जिस मुस्कान का मैं दीवाना था ,उसकी जिस मुस्कान पर मैं दिल से फिदा था...आज उसके होंठो से वही मुस्कान गायब थी...उसकी जिन भूरी सी आँखो से मुझे प्यार था,..सबसे ज़्यादा लगाव था ,इस वक़्त वो आँखे एक दम लाल थी...उसकी उन्ही आँखो मे मैने अपने लिए दुनियाभर की नफ़रत देखी ,जिनमे मैं हमेशा अपने लिए एक प्यार, एक अहसास देखना चाहता था....
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"एश...वेट आ मिनिट..." बिना कुच्छ सोचे-समझे,बिना किसी की परवाह किए मैं एश के पीछे भागा...

"अरमान ,रास्ता छोड़ो..."मुझे अपने सामने पाकर उसने अपना चेहरा दूसरी तरफ फेर लिया...

"गौतम की वजह से हम, अपन दोनो के बीच मे ख़टाश क्यूँ पैदा करे...चल हाथ मिला..."
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वो फिर चुप रही और अपना चेहरा दूसरी तरफ करके मेरे वहाँ से जाने का इंतज़ार करती रही...उसकी ये खामोशी तीर बनकर मेरे लेफ्ट साइड मे चुभ रही थी...आज अगर एश मुझे सॉरी बोलने के लिए कहती तो मैं एक बार नही हज़ार बार उसे सॉरी बोलता...लेकिन साली परेशानी तो यही थी कि वो आज कुच्छ बोल ही नही रही थी....
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"एश..."उसकी तरफ अपना एक हाथ बढ़ाते हुए मैने कहा...

"दूर जाओ मुझसे..."चीखते हुए उसने कहा और सबके सामने मुझे धक्का दिया लेकिन मैं फिर भी उसी की तरफ बढ़ा...सबके सामने अपनी बेज़्जती का अंदेशा होने के बावजूद मैं एश की तरफ बढ़ा...
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मैं ये नही कहता कि मेरे मन मे एश के सिवा किसी और लड़की का ख़याल नही आता ,मैं हर दिन एश के साथ-साथ कयि दूसरी लड़कियो के बारे मे भी सोचता लेकिन एश के लिए मेरे अंदर जो अहसास ,जो लगाव है वो अहसास,वो लगाव किसी दूसरी लड़की के लिए आज तक नही हुआ था...मैं ये बात ढोल-नगाड़े पीट पीट कर इसलिए कह सकता हूँ क्यूंकी...एश मेरे मान मे नही बल्कि मेरे दिल मे बसी थी....


मैं ये नही कह रहा कि मेरा प्यार किसी फिल्मी प्यार की तरह हंड्रेड पर्सेंट है लेकिन ये मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि जितना भी पर्सेंट मेरे दिल मे उसके लिए मोहब्बत है ,वो एक दम सच है और पवित्र भी...वरना मैं कॉलेज मे इस वक़्त सिर्फ़ एक लड़की के लिए...सिर्फ़ और सिर्फ़ और सिर्फ़ एक लड़की के लिए सबके सामने अपनी बेज़्जती सहन नही करता....
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"अरमान,तुम मुझे अपना दोस्त कहते थे,पर अब पता चला कि तुम तो बस आय्याश किस्म के वो इंसान हो,जिसे किसी की कोई परवाह नही है...अब सामने से हट जाओ,वरना कही ऐसा ना हो कि...मैं सबके सामने तुम पर हाथ उठा दूं..."

"मुझे कोई फरक नही पड़ता कि यहाँ कौन-कौन है और ना ही मुझे इसकी परवाह है..."

"लेकिन मुझे परवाह है...खुद की और गौतम की....गौतम सच ही कहता था कि दोस्ती अपने स्टेटस के बराबर वाले लोगो के साथ ही करना चाहिए..."

उसके बाद मैने सिर्फ़ उसे वहाँ से जाते हुए देखा,क्यूंकी मेरे पास अब कोई शब्द नही थे जिसका इस्तेमाल करके मैं उसे एक बार फिर से आवाज़ दूं या रोकने की कोशिश करू...उसने अभी-अभी कहा था कि इस जहांन मे उसे सिर्फ़ दो लोगो की परवाह है..एक खुद की और एक अपने प्यार की लेकिन मुझे तो परवाह सिर्फ़ एक की थी और वो एश थी..जिसने मुझसे अभी-अभी नफ़रत करना शुरू किया था...मैं अब भी उससे बात करना चाहता था ये जानते हुए भी कि वो अब मुझसे बात नही करना चाहती है लेकिन मेरे दिल ने ,उसके लिए मेरे जुनून ने मुझे फिर से उसके पीछे भागने लिए मुझे मज़बूर कर दिया....
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"एश,यार एक मिनिट सुन तो ले कि मैं क्या कहना चाहता हूँ..."उसकी कार के पास पहूचकर मैने खिड़की से अंदर देखा और एक बार फिर से एश को आवाज़ दी"बस एक मिनिट..."

"दिव्या तू कार आगे बढ़ा..."मुझसे एक बार फिर मुँह फेर कर वो बोली...

माँ कसम खाकर कहता हूँ कि उस वक़्त मुझे ऐसा लगने लगा जैसे कि उस एक पल मे मेरे सारे सपने जो मैने एश को रेफरेन्स मानकर सोचे थे...मेरी सारी ख्वाहिशें ,जो कि एश को लेकर थी...इस दिल के सारे अरमान ,जिसके रग-रग मे वो बसी हुई थी...मेरे उन सारे सपनो ने, मेरे उन सारी ख्वाहिशों ने,मेरे उन सारे अरमानो ने अपना दम तोड़ दिया था...दिल किया कि यही रोना शुरू कर दूनन और तब तक रोता रहूं जब तक एश खुद आकर मुझे चुप ना कराए...दिल किया कि पागलो की तरह अपना सीना तब तक पीटता रहूं ,जब तक कि मेरी रूह मेरे जिस्म से ना निकल जाए...मेरी उस हालत पर जब एश ने मुझे पलट कर भी नही देखा तो मेरे अंदर उस नरम दिल वाले अरमान को मारकर एक खुद्दार, घमंडी शक्सियत रखने वाले अरमान ने अपनी जगह ले ली...


"ये तुम क्या कर रहे हो..."जब मैने एश के हेडफोन को निकाल कर बाहर फेक दिया तो वो मुझपर चिल्लाते हुए तुरंत कार से बाहर निकली और मुझे थप्पड़ मारने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाया....

"शूकर मना कि तेरे इस हाथ को मैने रोक लिया...वरना तेरा ये हाथ यदि ग़लती से भी मेरे गाल को छु जाता तो जो हाल तेरे आशिक़ का किया है उससे भी बुरा हाल तेरा करता...तेरा आशिक़ तो हॉस्पिटल मे ज़िंदा पड़ा है लेकिन तुझे तो मैं सीधे उपर भेजता...साली तू खुद को समझ के क्या बैठी है..."मैने कार का गेट खोला और एश को अंदर फेकते हुए कहा"जिसपर तुझे गुस्सा आता है तो तू उससे बात करना बंद कर देती है लेकिन जब मुझे किसी पर गुस्सा आता है तो मैं उसे बात करने के लायक नही छोड़ता...अब चल जल्दी से निकल इस चुहिया के साथ वरना तेरे बाप को तेरे आशिक़ के बगल मे एक और बेड बुक करना पड़ेगा...."
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पार्किंग मे मैने आज एश से अपने लगभग सारे लगाव को तोड़कर आया था और इस समय मेरा गुस्सा मुझपर पहले से भी ज़्यादा हावी था...हॉस्टिल पहुचने के बाद मुझे वॉर्डन ने कहा कि पोलीस केस को तो वो लोग कैसे भी करके संभाल लेंगे...लेकिन गौतम के बाप को रोकना उनके बस मे नही है,इसलिए बेहतर यही होगा कि मैं कुच्छ हफ़्तो के लिए अपने घर चला जाउ.

हाइवे के किनारे खड़ा मैं इस वक़्त बहुत सारी उलझनों से घिरा हुआ था...मेरे अंदर क्या चल रहा था ये मैं खुद भी ठीक तरीके से नही समझ पा रहा था...कभी मुझे गौतम के पप्पा जी दिखते तो कभी मेरे दोस्त मुझे दिखते..,तो कभी हॉस्टिल मे लड़ाई वाला सीन आँखो के सामने छा जाता तो कभी एश के साथ आज हुई झड़प सीने मे एक टीस पैदा कर रही थी...कभी मैं खुद को गालियाँ देता कि मैने एश के साथ ऐसा बर्ताव क्यूँ किया तो कभी मेरा घमंडी रूप सामने आ जाता और मुझसे कहता कि...मैने जो किया सही किया,भाड़ मे जाए एश और उसका प्यार...सच तो ये था कि इस वक़्त मैं ठीक से किसी भी मॅटर के बारे मे नही सोच पा रहा था और सारी दुनिया से अलग होकर हॉस्टिल से हाइवे को जोड़ने वाली सड़क के सबसे अंतिम छोर पर खोया-खोया सा खड़ा था...मुझे इसका बिल्कुल भी होश नही था कि मेरे सामने से तीन-तीन ऑटो निकल चुके है...मुझे इस बात की बिल्कुल भी परवाह नही हो रही थी कि मेरे इस तरह से यहाँ खड़े रहने पर मेरी ट्रेन छूट सकती है...

"ओये...रुक...अबे रुक मुझे भी जाना है..."सिटी बस जब सामने से गुज़र गयी तो मुझे जैसे एका एक होश आया ,लेकिन सिटी बस तब तक बहुत दूर जा चुकी थी.....

जब सिटी बस निकल गयी तो मैं वापस अपने कंधे मे बॅग टांगे हुए हॉस्टिल से हाइवे को जोड़ने वाली सड़क के अंतिम छोर पर खड़ा हो गया और फिर से सारी दुनिया को भूल कर अपने अंदर चल रहे तूफान मे खो गया....
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क्या मैने एश के साथ पार्किंग मे जो किया वो सही था...कहीं मैने अपने हाथो ही अपने अरमानो का गला तो नही घोंट डाला...क्यूंकी यदि एश की जगह कोई और भी होता,यहाँ तक मैं भी होता...तो अपने प्यार को चोट पहुचने वाले से नफ़रत करता...और एसा ने भी आज वही किया,...ग़लत तो मैं ही था जो बार-बार उसके सामने खड़ा हो जा रहा था. उससे बात करने की मेरी ज़िद ने शायद उसे,मुझपर और भी ज़्यादा गुस्सा दिला दिया और फिर पार्किंग मे उसे धमकी देकर आना,.तट वाज़ माइ फॉल्ट,मुझे ऐसा नही करना चाहिए था..किसी भी हाल मे नही करना चाहिए था... 
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लेकिन उसी वक़्त मेरे अंदर से एक और आवाज़ आई कि" दट वाज़ नोट माइ फॉल्ट, यदि एश की जगह पर और कोई होता तो वो बेशक वही करता..जो एश ने किया,आइ अग्री....लेकिन यदि मेरी जगह पर भी कोई और होता तो वो भी वही करता जो मैने किया था...अरुण मेरे भाई जैसा है और उसे कोई मारने आए तो क्या मैं छिप कर सिर्फ़ इसलिए बैठा रहूं क्यूंकी मेरे दोस्त को मारने आ रहा वो लड़का मेरे प्यार का प्यार है...बिल्कुल नही, मैने जो किया बिल्कुल सही किया..जिसको जो समझना है समझे,जिसे नफ़रत करनी है वो करे, अपुन को ज़िंदगी गुज़ारने के लिए सिर्फ़ दोस्त और दारू की बोतल ही काफ़ी है...."


RE: Porn Hindi Kahani दिल दोस्ती और दारू - - 12-14-2018

मेरे अंदर इस समय दो अरमान मौज़ूद थे और दोनो अपने-अपने विचार दे रहे थे...एक सही था और एक ग़लत ,ये तो मैं जानता था लेकिन सही कौन है ? और ग़लत कौन है ? मैं ये डिसाइड नही कर पा रहा था.मेरा मन कर रहा था कि मैं सड़क के किनारे लगे पेड़ो पर अपना सर दे मारू या फिर अपने बाल नोच डालु...क्यूंकी दूसरो से तो बचा जा सकता है लेकिन खुद से बचने की कोई राह नही होती, इस वक़्त मेरे अंदर दो अरमान थे..एक वो अरमान था जो एश से बेहिसाब मोहब्बत करता था तो दूसरा अरमान ,अरुण को अपना ख़सम खास यार मानता था...उन दोनो अरमान की लड़ाई से मेरे अंदर इस समय एक तूफान उठा हुआ था कि एक स्कूटी मेरे सामने से होकर गुज़री और थोड़ी दूर जाकर रुक गयी....

"अब ये कौन है और मैने इसका क्या बिगाड़ा है...जो मुझे घूर रही है..."अपने चेहरे पर स्कार्फ बाँधे उस लड़की को अपनी तरफ देखता हुआ पाकर मैने सोचा....

मैने अपने अगल-बगल ,आगे-पीछे भी चेक किया की वहाँ मेरे सिवा और कोई तो नही,जिसे ये स्कार्फ वाली आइटम देख रही है...लेकिन वहाँ कोई नही था.. हॉस्टिल को हाइवे से जोड़ने वाली सड़क के अंतिम छोर पर मैं सिर्फ़ अकेला खड़ा था जिसका सॉफ मतलब था कि वो स्कूटी वाली लड़की वहाँ खड़ी होकर मुझे ही देख रही है....

"अरमान...तुम यहाँ"अपने चेहरे पर स्कार्फ लपेटे हुए ही उस लड़की ने मुझसे कहा...

स्कार्फ बँधे हुए होने के कारण उसकी आवाज़ सॉफ नही आ रही थी,लेकिन मैं इतना तो समझ गया था कि ये लड़की कौन है...आक्च्युयली मैं आज इतने दिनो बाद उसे देख कर थोड़ा शॉक्ड हो गया था और साथ ही उसे देखकर एक मुस्कान मेरे होंठो पर आ गयी....
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"दीपिका मॅम, काफ़ी दिनो बाद देखा..."

"वेट..."उसने स्कूटी का डाइरेक्षन चेंज किया और मेरी तरफ आने लगी मेरे सामने स्कूटी रोकने के बाद दीपिका मॅम ने अपना स्कार्फ हटाया और मुझसे पुछि कि मैं कहाँ जा रहा हूँ....

"कुच्छ काम है घर मे,इसलिए घर जा रहा हूँ..."

"गौतम के बारे मे सुना मैने..."स्कूटी साइड करके वो मेरे पास आई

"हां,मैने भी सुना...पता नही उसे किसने मारा,उस वक़्त मैं घर पर था..."

दीपिका मॅम से मैने झूठ बोला ,क्यूंकी मैं नही चाहता था कि उसे ये मालूम हो कि मुझे बचाने के लिए मेरे वॉर्डन और प्रिन्सिपल सर ने पोलीस से झूठ बोला था...सबको यही मालूम था कि जब गौतम की लड़ाई हुई तब मैं हॉस्टिल मे नही बल्कि अपने घर मे था....

"तो,कितने बजे की ट्रेन है..."

"6'ओ क्लॉक.."

"एक काम करो तुम मेरे साथ चलो..मेरा रूम रेलवे स्टेशन के आगे ही है तो तुम्हे वहाँ छोड़ते हुए चलूंगी..."कुच्छ देर सोचने के बाद दीपिका मॅम बोली...

"ये सही रहेगा थॅंक्स...."बोलते हुए मैं दीपिका मॅम के साथ उनकी स्कूटी की तरफ बढ़ा....

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आज बहुत दिनो के बाद मैं दीपिका मॅम से मिला था इसलिए स्कूटी पर जब मैं उनके पीछे बैठा तो उनके पिछवाड़े के एक टच से ही मेरा अग्वाडा खड़ा हो गया....साला इतनी बुरी कंडीशन मे फँसे होने के बावजूद ठरक पन मेरे अंदर से नही गयी थी 

दीपिका मॅम की एक खास आदत जो मुझे हमेशा से उसकी तरफ आकर्षित करती थी और वो थी उनके पर्फ्यूम की महक...जो इस वक़्त सीधे मेरे रोम-रोम मे एक हॉट लड़की के पास होने का अहसास करा रही थी,...मैं थोड़ा और आगे खिसक कर दीपिका मॅम से चिपक गया और अपना एक हाथ उसकी जाँघ पर रख कर दबाने लगा...मेरी इस हरकत पर दीपिका मॅम कुच्छ नही बोली और चुप चॅप स्कूटी चलाती रही,...इस दौरान मैने पूरा मज़ा लिया और कयि बार पीछे से उसके गर्दन को किस भी किया....
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"सिगरेट पियोगे..."स्कूटी को धीमा करते हुए दीपिका मॅम ने मुझसे पुछा...

"हााइिईन्न्न्न्..." 

"मैने पुछा सिगरेट पियोगे या नही..."अबकी बार उसने स्कूटी रोक कर पुछा...

"मैं सिगरेट सिर्फ़ दारू के साथ लेता हूँ..."

"और मैं चाय के साथ.."बोलते हुए वो नीचे उतर गयी और पास ही बने एक चाय वाले के पास जाकर दो चाय का ऑर्डर दिया...
"ये चाय-वाय रहने दो..."

"ओके..."उस चाय वाले की तरफ देखकर वो बोली"भैया एक लाइट देना और एक चाय..."
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दीपिका मॅम लगभग 5 मिनिट तक सिगरेट की कश मारती रही और मैं सदमे मे था और दीपिका मॅम को अपनी आँखे फाड़-फाड़ कर देख रहा था....थोड़ी देर बाद जब उसकी सिगरेट और चाय ख़तम हो गयी तो उसने एक और चाय वित सिगरेट का ऑर्डर दिया....

"इसकी तो...एक और राउंड मार रही है"

"अरमान...एक काम करना..."सिगरेट के काश मारते हुए उसने मुझे अपने करीब आने के लिए कहा

"बोलो..."

"वो सामने...मेडिकल स्टोर दिख रहा है ना..."उसने सड़क के दूसरी तरफ इशारा करते हुए मुझसे पुछा...

"सब समझ गया...अबॉर्षन की गोलिया लानी होगी,राइट"

"जाके कॉंडम ले आओ ताकि मुझे अबॉर्षन ना करना पड़े "

दीपिका के द्वारा मुझे कॉंडम लाने के लिए कहने से मैं समझ गया कि वो आज रात मेरे साथ कूची-कूची खेलने के मूड मे है लेकिन 6 बजे मेरी ट्रेन थी इसलिए मैं चाहकर भी उसके साथ नही रह सकता था इसलिए मैने थोड़ा शरमाते हुए कहा...
"मॅम, शायद आप भूल रही है मेरी 6 बजे की ट्रेन है "

"ओये..किस भ्रम मे जी रहा है, मैं तेरे साथ नही बल्कि किसी और के साथ पलंग तोड़ने वाली हूँ...जा जाकर कॉंडम लेकर आ और सीधा एक पॅकेट लेकर आना ,बार-बार कॉंडम लेने दुकान जाना मुझे अच्छा नही लगता..."

"साली कुतिया "बड़बड़ाते हुए मैं कॉंडम का एक पूरा पॅकेट लेने मेडिकल स्टोर की तरफ बढ़ गया....

किसी मेडिकल स्टोर मे कॉंडम खरीदने के लिए जाने वाले सभी हमान बीयिंग्स मेरे ख़याल से दो तरह के होते है...एक वो जो एक दम बिंदास बेझिझक होकर कोनों ले आते है और एक वो जो कॉंडम खरीदते वक़्त थोड़ा शरमाते है...

मैं खुद को बिंदास बनाने की हर मुमकिन कोशिश कर रहा था और जो लाइन मुझे मेडिकल स्टोर वाले से कहनी थी उसकी मैने केयी बार प्रॅक्टीस भी कर ली थी...लेकिन ना जाने क्यूँ मेडिकल स्टोर के पास आकर मैं शरमाने लगा, मुझे उस मेडिकल स्टोर वाले से कॉंडम मॅगने मे झिझक महसूस हो रही थी...ऐसी झिझक पहली बार किसी मेडिकल स्टोर से कॉंडम खरीदने वाले लड़के के अंदर आना बड़ी नॉर्मल बात है लेकिन ये झिझक तब और बढ़ जाती है जब आप ,जहाँ पहली बार कॉंडम खरीदने जा रहे हो ,वहाँ अचानक से भीड़ बढ़ जाए....उन लोगो के बीच मुझे कॉंडम माँगने मे शरम आ रही थी लेकिन मैने खुद को मज़बूत किया और अपनी लाइन्स तीन-चार बार रिवाइज़ करके उस मेडिकल वेल की तरफ देख कर बोला...
"भैया कॉंडम देना तो... "

मेरा ऐसा बोलना था कि वहाँ खड़े सभी लोगो ने कुच्छ देर के लिए मुझे देखा और फिर हल्की सी स्माइल उनके होंठो पर आ गयी....

"क्या चाहिए आपको..."मेडिकल वाले ने मुझसे पुछा...

"कॉंडम देना..कॉंडम "

"कितना दूं ,एक ,दो..."

"पूरा एक पॅकेट देना "

ये सुनते ही वहाँ खड़े लोगो के होंठो पर फिर से एक स्माइल छा गयी...वहाँ खड़े लोगो का मुझे देखकर ऐसे मुस्कुराना मुझे पसंद नही आया और मैं चाहता था कि जल्द से जल्द कॉंडम लूँ और यहाँ से चलता बनूँ....
"किस ब्रांड का चाहिए..."मेडिकल वाले ने एक बार फिर मुझसे पुछा...
"जो सबसे अच्छा हो..."
"मानफ़ोर्से दूं, चलेगा..."
"दौड़ेगा...."
"विच फ्लेवर..."
"कोई सा भी दे दे "खिसियाते हुए मैने कहा ,जिसके बाद मेडिकल वाले ने सॅट्ट से कॉंडम का एक पॅकेट निकाला और झट से मुझे दे दिया....
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"कमाल है ,चोदे कोई और उसकी प्रोटेक्षन के लिए कॉंडम लेने मैं दुकान जाउ... "मेडिकल स्टोर से वापस उस चाय वाले की तरफ आते हुए मैं बोला, जहाँ दीपिका मॅम सिगरेट के छल्ले बनाकर धुआ ,हवा मे उड़ा रही थी....

वापस आते समय मैने दूर से देखा कि दीपिका मॅम किसी से मोबाइल पर बात कर रही थी लेकिन मुझे अपनी तरफ आता देख उसने हड़बड़ाते हुए कॉल तुरंत डिसकनेक्ट कर दी...दीपिका मॅम की इस हरकत से मैं थोड़ा चौका ज़रूर लेकिन फिर बात को हवा मे उड़ाकर उसकी तरफ बढ़ा....
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"ये लो मॅम, पूरा एक पॅकेट है..."कॉंडम का पॅकेट देते वक़्त मुझे फिर से दीपिका मॅम द्वारा मुझे देखकर कॉल डिसकनेक्ट करना...याद आ गया

"थॅंक्स अरमान डियर..."दीपिका मॅम ने कॉंडम अपने बॅग मे डाला और मेरी तरफ देखकर एका एक मुस्कुराने लगी....

"ये बिन बादल बरसात कैसे हो रही है...बोले तो इस मुस्कान का क्या राज़ है..."

"बस यूँ ही..."बोलते हुए दीपिका मॅम ने छल्ले को एक और सिगरेट वित टी का ऑर्डर दिया...जिसके बाद मैं कभी उस चाय वाले की तरफ देखता तो कभी दीपिका मॅम की तरफ....

"ये तीसरा राउंड है "

"यह ! आइ नो, अभी तो दो राउंड और बाकी है..."

"सच "

दीपिका मॅम के ऑर्डर पर उस चाय वाले ने चाय और सिगरेट लाकर दीपिका मॅम को दिया और सिगरेट जलाकर दीपिका मॅम धुआ मेरे चेहरे पर फेकने लगी....दीपिका मॅम का यूँ बार-बार मेरे फेस पर सिगरेट का धुआ छोड़ने से मेरे अंदर भी सिगरेट पीने की इच्छा जाग गयी और जब मुझसे रहा नही गया तो मैने कहा...

"एक कश इधर भी देना..."अपना हाथ दीपिका मॅम की तरफ बढ़ा कर मैने सिगरेट माँगा...

"सॉरी ,मैं अपनी सिगरेट किसी और के साथ शेयर नही करती..यदि तुम्हे चाहिए तो दूसरी खरीद लो..."

"ये नियम किसी और के लिए बचा कर रखना..."दीपिका मॅम जब मेरे चेहरे पर सिगरेट का धुआ छोड़ रही थी तो मैने उनके हाथ से सिगरेट छीन ली और बोला"एक बात पुच्छू..."

"क्या..."मेरी इस हरकत पर मेरा खून कर देनी वाली नज़र से मुझे देखते हुए वो बोली...

"जब मैं वापस यहाँ आ रहा था तो आपने मुझे देखकर कॉल डिसकनेक्ट क्यूँ कर दिया....मैं आपका हज़्बेंड तो हूँ नही जो मुझसे अपने अफेर छुपाओ..."

"हां...."लंबी-लंबी साँसे भरते हुए दीपिका मॅम बोली"तुमने सच कहा ,तुम मेरे हज़्बेंड तो हो नही ,जो मैं तुमसे अपना अफेर छिपा कर रखूँगी, वो मेरे नये बाय्फ्रेंड का कॉल था और तुम्हे बुरा ना लगे इसलिए मैने तुरंत कॉल डिसकनेक्ट कर दिया...."
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"साली मुझे चूतिया बनाती है..."उसको देखकर मैने मन मे कहा....

मैने ऐसा जानबूझकर कहा था कि" मैं उसका हज़्बेंड तो हूँ नही ,जो वो मुझसे अपने अफेर्स छिपायेगी..." ताकि मैं उसका दिमाग़ पढ़ सकूँ, जब शुरू-शुरू मे मैने दीपिका मॅम से कॉल डिसकनेक्ट करने के बारे मे पुछा तो वो घबरा गयी थी लेकिन मेरे द्वारा अफेर वाली बात छेड़ने पर उसने एका एक राहत की साँस ली थी और फिर मुझसे बोली कि उसके बाय्फ्रेंड का कॉल था,...ऐसा बोलते वक़्त कोई भी दीपिका मॅम को देखकर ये बता सकता था कि दीपिका मॅम झूठ बोल रही थी,...उसका गोरा चेहरा लाल हो गया था ,जब मैने उससे कॉल डिसकनेक्ट करने का रीज़न पुछा था...अब जब दीपिका मॅम घबरा रही थी तो ज़रूर कोई घबराने वाली बात उसने फोन पर किसी से की होगी,ऐसा मैने अंदाज़ा लगाया और मुझे देखकर उसका कॉल डिसकनेक्ट करना मतलब वो नही चाहती थी कि मैं उसकी बात सुनूँ या फिर ये भी हो सकता था कि वो मुझसे रिलेटेड ही किसी से बात कर रही थी, लेकिन सवाल अब ये था कि किससे ? 
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अभी तक उस चाय वाले के दुकान मे बैठकर मैने ये गौर किया था कि दीपिका मॅम अधिक से अधिक समय तक मुझे यहाँ पर रोकने की कोशिश कर रही थी...मैं जब भी उसे वहाँ से चलने के लिए कहता तो वो चाय वाले को एक और चाय का ऑर्डर देकर मुझसे कहती कि"इतनी जल्दी रेलवे स्टेशन जाकर क्या करोगे,अभी तो सिर्फ़ 5 बजे है और वैसे भी मैं तुम्हे ड्रॉप करने जा ही रही हूँ ना..."

एक बार तो मैं कुच्छ देर के लिए ये मान भी लेता कि दीपिका मैम ऐसे ही कह रही है और मैं बेवजह ही छोटी सी बात को तूल दे रहा हूँ...लेकिन जबसे मैने उसे, मुझे देखकर कॉल डिसकनेक्ट करने के बारे मे पुछा था तब से वो पहले की तरह नॉर्मल बिहेव नही कर रही थी...वो कुच्छ घबराई हुई सी लग रही थी....

"सच सच बताओ मॅम कि उस वक़्त तुम किससे बात कर रही थी..."उसकी तरफ झुक कर मैने गंभीर होते हुए पुछा...
"किसी से तो नही, क्यूँ..."

"अब हमे चलना चाहिए ,5:30 बज चुके है और चाय वाले की चाय भी ख़तम हो चुकी है शायद..."बोलते हुए मैं खड़ा हो गया 
"बैठो ना, कुच्छ देर यहाँ रुक कर बात करते है..."मेरा हाथ पकड़ कर मुझे बैठाते हुए दीपिका मॅम बोली...

"हद हो गयी अब तो "उसका हाथ झटक कर मैं गुस्से से बोला"तुझे नही जाना तो मत जा..लेकिन मेरी 6 बजे की ट्रेन है...मैं निकलता हूँ..."
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"ओये लड़के सुन..."किसी ने पीछे से मेरा कंधा पकड़ कर कहा..

"कौन..."

"तेरा बाप,पीछे मूड..."

ये सुनते ही मैं गुस्से से उबलने लगा और तुरंत पीछे मुड़ा...पीछे मुड़कर मैं कुच्छ देखता ,कुच्छ समझता या फिर कुच्छ कहता उससे पहले ही मेरे माथे पर सामने से किसी ने जोरदार प्रहार किया और मैं वही अपना सर पकड़ कर बैठ गया, जिसने भी मुझे मारा था उसने पूरी टाइमिंग और पॉवर के साथ मारा था,जिससे कि मेरे कान मे इस वक़्त सीटिया बज रही थी और पूरा सर दर्द के साथ झन्ना रहा था...कुच्छ देर तक तो मैं वही नीचे अपने सर को पकड़ कर बैठा रहा और जब सामने की तरफ नज़र डाली तो कुच्छ दिखा ही नही,अपनी आँखो को रगड़ कर मैने सामने देखने की एक और कोशिश की लेकिन नतीज़ा पहले की तरह था,मुझे अब भी कुच्छ नही दिख रहा था...
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"कौन..."बड़ी मुश्किल से मैं इतना बोल पाया....

जिसके बाद किसी ने मुझे पकड़ कर उठाया ,मुझे उपर उस एमकेएल दीपिका ने उठाया था, क्यूंकी मैं उसके पर्फ्यूम की खुशबू को महसूस कर सकता था....

"कैसे हो अरमान..."मेरे कंधो को सहलाते हुए दीपिका रंडी ने अपना मुँह खोला"तुम पुच्छ रहे थे ना कि मैने किसको कॉल किया था और तुम्हे आता देख कॉल डिसकनेक्ट क्यूँ की थी...तो सुनो, मैने गौतम के फादर को कॉल करके ये बताया कि उसका शिकार मेरे साथ है...मैने उन्हे इस दुकान का अड्रेस भी बताया और जब तुम्हे आते हुए देखा तो हड़बड़ाहट मे कॉल डिसकनेक्ट कर दी ताकि तुम्हे मालूम ना हो कि मैं किससे बात कर रही...अब तुम ये भी समझ गये होगे कि मैं तुम्हे क्यूँ जबर्जस्ति यहाँ रोक रही थी..."

"50 दे बीसी..."मैने कहा...

"क्या "

"कॉंडम तेरे बाप की दुकान से लाया हूँ क्या,चल निकाल 50 "दीपिका मॅम की तरफ हाथ बढ़ाते हुए मैने कहा, अब मुझे हल्का-हल्का कुच्छ दिखने लगा था...

"इस सिचुयेशन मे तुम 50 माँग रहे हो..."

"हां , तू जल्दी से 50 दे..."

"ये ले भीखारी अपने 50 "अपने पर्स से एक नोट निकाल कर दीपिका मॅम ने मेरे हाथ मे थमा दिया...

"अब एक पप्पी भी दे दे..."

मैं नही जानता कि उस समय मेरी इन हरकतों से दीपिका और मुझे मारने आए गौतम के बाप के आदमी क्या सोच रहे थे,वहाँ आस-पास खड़े लोग क्या सोच रहे थे...उनका रिक्षन क्या था....क्यूंकी मेरी आँखो के सामने इस वक़्त धुँधला-धुँधला नज़ारा था और उस धुंधले-धुंधले नज़ारे मे किसी के फेस के रिक्षन को देख पाना मुमकिन नही था...

"लगता है दिमाग़ पर पड़ने से असर कुच्छ ज़्यादा हो गया है..."

"लवडा चुसेगी तो सही हो जाएगा, ले चूस ना उस दिन की तरह..."

मैं ऐसी हरकत तीन वजह से कर रहा था पहला ये कि दीपिका का सबके सामने मज़ाक बना सकूँ,दूसरा मुझे कुच्छ सोचने के लिए थोड़ा टाइम मिल रहा था,तीसरा मैं इस जुगाड़ मे था कि कब मैं ठीक से देख पाऊ और देखते ही यहाँ से खिसक लूँ...उसके बाद दीपिका की कोई आवाज़ नही आई और जल्द ही मुझे सही से दिखना भी शुरू हो गया था...मैने देखा कि मुझे मारने के लिए एक नही..दो नही बल्कि एक अच्छी-ख़ासी फौज आई थी...साला मैं कोही सूपर हीरो हूँ क्या,जो गौतम के बाप ने इतने आदमियो को भेज दिया 

"यदि ज़िंदा बच गया तो तेरा जीना हराम कर दूँगा दीपिका रंडी, अपनी चूत और गान्ड मे मेरी ये वॉर्निंग बच्चेदानी तक ठूंस ले..."स्कूटी के पास दीपिका को खड़ा देख कर मैने कहा...

"पहले ज़िंदा बच तो सही, चूतिए..."

"घर जाकर उपर वाले से यही दुआ करना कि मैं आज ज़िंदा ना बचु..."दीपिका से मैं बोला"क्यूंकी यदि मैं भूले से भी ज़िंदा बच गया,यदि भूले से भी मेरी आँख दोबारा खुल गयी...यदि भूले से भी मैं दोबारा कभी भी कॉलेज आया तो तू किसी को मुँह दिखाने के लायक नही रहेगी और तू ज़िंदगी भर यही सोचेगी कि उस दिन मैं अरमान के खिलाफ क्यूँ गयी..."

"अच्छा, पैर कब्र मे है लेकिन फिर भू दुनिया देखने की बात कर रहा है..."मुस्कुराते हुए दीपिका मॅम ने मुझे देखा और एक फ्लाइयिंग किस देकर वहाँ से चली गयी....

मुझे लाकर यहाँ फसाने वाली तो चली गयी थी ,अब मैं वहाँ अकेला बचा था...मैने आस-पास खड़े लोगो को देखा ,वो सब वहाँ खड़े मुझे देख तो रहे थे,लेकिन मेरी हेल्प करने के लिए उनमे से कोई भी आगे नही आया....खैर ये कोई बुरी बात नही क्यूंकी अगर उनकी जगह मैं होता तो मैं भी वही करता,जो इस वक़्त वहाँ खड़े लोग कर रहे थे....

मैने एक नज़र मुझे मारने आए गुन्डो पर डाली और देखते ही दहशत मे आ गया...मुझे कैसे भी करके वहाँ से भागना था, लेकिन जिसने मेरे सर मे कुच्छ देर पहले कसकर हमला किया था उसे मैं ऐसे ही नही छोड़ने वाला था...तभी मेरे गालो पर कुच्छ महसूस हुआ और मैने अपने हाथ से अपने गाल को सहलाया तो मालूम चला कि मेरे सर पर कुच्छ देर पहले जो रोड पड़ा था उसकी वजह से ब्लीडिंग शुरू हो गया है....मैने अपने दूसरे हाथ से चेहरे और सर को सहलाया और जब मेरे दोनो हाथ मेरी आँखो के सामने आए तो उनपर एक ताज़ा खून की परत जमी हुई थी, सहसा मेरा खून मेरे माथे से होते हुए मेरी आँखो तक पहुचा.....जिसके तुरंत बाद मैने डिसाइड किया कि मुझे अब करना क्या है....गौतम के बाप के गुंडे कोई फिल्मी गुंडे नही थे जो एक-एक करके मुझसे लड़ने आते ,वो सब एक साथ मेरी तरफ बढ़े....कुच्छ देर पहले जिसने मेरे सर पर रोड मारा था उसके हाथ मे वो रोड अब भी मौज़ूद था ,जिसे मज़बूती से पकड़े हुए वो मेरी तरफ बढ़ रहा था....

"तू तो गया आज कोमा मे..."चाय वाले की दुकान से मैने चाय की केटली उठाकर सीधा उसके सर पर ज़ोर से दे मारा जिसके हाथ मे मेरे खून से साना लोहे का रोड था....

"आआययईीी...मरो म्सी को.."कराहते हुए उसने अपने साथियो से कहा....
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उस हरामखोर के सर को चाय की केटली से फोड़ने के बाद मैं पीछे मुड़ा और अपनी रूह की पूरी ताक़त लगाकर वहाँ से भागने लगा ,भाग तो वो भी मेरे पीछे रहे थे लेकिन मेरी रफ़्तार और उनकी रफ़्तार मे इस समय खरगोश और कछुये के दौड़ के बराबर फासला था...साले मोटे भैंसे 

"आ जाओ लेडवो , तुम लोगो को शायद पता नही कि मैने पैदा होने के बाद चलना नही डाइरेक्ट दौड़ना शुरू किया था,इस खेल मे तो तुम्हारा बाप भी मुझे नही हरा सकता..."उनकी तरफ पलटकर मैने उन सबका मज़ाक उड़ाया और फिर से तेज़ रफ़्तार मे दौड़ने लगा.....

गौतम के बाप के गुन्डो की लगभग आधी फौज पीछे रह गयी थी और जो बचे हुए आधी फौज मेरा पीछा कर रही थी ,उनकी हालत भी मरे हुओ की तरह थी....अब मुझे इस भाग-दौड़ मे मज़ा आ रहा था क्यूंकी भागते वक़्त बीच-बीच मे मैं रुक जाता और पीछे मुड़कर उन गुन्डो को माँ-बहन की गालियाँ देता,जिससे वो फिर से मेरे पीछे भागने लगते....इसी भागम-भाग के बीच उन गुन्डो मे से कुच्छ ज़मीन पर धराशायी हो गये तो कुच्छ जहाँ थे वही किसी चीज़ का सहारा लेकर खड़े हो गये...अब मेरे पीछे सिर्फ़ 4-5 गुंडे ही थे....भागते हुए मैं एक पतली गली मे घुसा और बड़े से घर की दीवार पर खुद को टिका कर आराम करने लगा....लेकिन जो 4-5 लोग मेरे पीछे पड़े थे वो भी हान्फते हुए वहाँ पहुच गये जिसके बाद मैने उस घर का गोल-गोल राउंड लगाना शुरू कर दिया और बाकी बचे उन 4-5 लोगो को भी लगभग अधमरा सा कर दिया.....

"उसैन बोल्ट को जानता है..."उनमे से एक के पास जाकर मैने पुछा, क्यूंकी मुझे मालूम था कि वो जब खुद को नही संभाल पा रहे है तो मुझपर क्या खाक हमला करेंगे...

"नही ,कौन उसेन बलत...हह..."एक ने हान्फते हुए कहा

"बीसी, यदि तू हां मे जवाब देता तो सॉलिड डाइलॉग मारता...अनपढ़ साले.."

"ईईए...."वो मरी हुई आवाज़ मे चीखा

"चल बे ,साइड चल..."उसको ज़मीन पर गिराते हुए मैं वहाँ से खिसक लिया.....
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"ये सही जगह है...यहाँ तोड़ा आराम कर लेता हूँ..."अपने सर पर हाथ फिराते हुए मैने खुद से कहा , ब्लीडिंग रुक चुकी थी और मैं अब तक होश मे था...जिससे मुझे राहत मिली ,लेकिन सर अब भी रोड के जोरदार प्रहार से दुख रहा था....मैं इस वक़्त एक छोटे से ग्राउंड मे था,जहाँ कुच्छ लड़के क्रिकेट खेल रहे थे....

"पानी है क्या...पानी"उनके पास पहुच कर मैने उनसे पानी माँगा...

पहले तो वो लड़के मुझे देखकर घबरा गये और एक दूसरे का मुँह तकने लगे...लेकिन बाद मे उनमे से एक ने थोड़े दूर पर रखा अपना बॅग उठाया और पानी का एक बोतल मुझे थमा दिया...

"थॅंक्स भाई..."लंबी-लंबी साँसे भरते हुए मैने उसके हाथ से बोतल ले ली और बोतल का थक्कन खोल कर शुरू मे पानी के कुच्छ घूट अपने गले से नीचे उतारा और फिर बाद मे बाकी बचे पानी से अपना फेस सॉफ करने लगा....मेरे सर पर कयि जगह खून बालो से चिपक गया था और मैने जब अपने सर पर पानी डाला तो मेरा पूरा चेहरा खून से सन गया...मेरे सर मे जिस जगह रोड पड़ी थी वहाँ जब मेरा हाथ गया तो जोरो का दर्द हुआ ,जिसके बाद मैने तुरंत अपना हाथ वहाँ से हटा लिया और खून से सनी शर्ट उतार कर वही ग्राउंड मे फेक दी....
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मैने एक बार फिर क्रिकेट खेल रहे उन लड़को का शुक्रिया अदा किया और वहाँ से दूर जहाँ बैठने का इंतज़ाम था उधर चल पड़ा....रोड मुझे लगभग 15-20 मिनिट पहले पड़ा था लेकिन उसका असर अब हो रहा था. ग्राउंड पर चलते समय अचानक ही मेरी आँखो के सामने धूंधलापन छाने लगा और थोड़ी दूर पैदल चलने के बाद मेरे हाथ-पैर भी जवाब देने लगे...मैं लड़खड़ाने लगा था , कयि बार तो ज़मीन पर भी गिरा...लेकिन जैसे-तैसे मैं उस जगह पहुच ही गया जहाँ बैठने का इंतज़ाम किया गया था.....

"हेलो ,अमर भाई...मैं अरमान...अरमान बोल रहा हूँ,बहुत बड़ा पंगा हो गया है मेरे साथ...गौतम के बाप के आदमियो ने रेलवे स्टेशन जाते वक़्त मुझपर अचानक अटॅक किया और मैं बड़ी मुश्किल से उन्हे चकमा देकर इधर एक ग्राउंड पर पहुचा हूँ...आप तुरंत इधर आ जाओ, और हां साथ मे जितने हो सके उतने लड़को को भी ले आना...."ग्राउंड का अड्रेस बताते हुए मैने अमर से फोन पर कहा...

"आज आया है बेटा लाइन पर, अब तो तू गया....मैं अमर नही नौशाद बोल रहा हूँ,वो क्या है ना बेटा कि अमर का मोबाइल इस वक़्त मेरे पास है....तूने सबसे बड़ी ग़लती की अमर को फोन लगा कर और उससे भी बड़ी ग़लती की मुझे उस जगह का अड्रेस बताकर जहाँ तू अभी गीदड़ की तरह छिपा हुआ है...तू तो गया बेटा काम से, तुझे मुझसे पंगा नही लेना चाहिए था..."
"सॉरी फॉर दट डे, आइ नीड हेल्प..."अपनी बची कूची एनर्जी वेस्ट करते हुए मैं बोला...

"*** चुदा बीसी..."

"हेलो....हेलो...हेल...."

मेरा दस हज़ार का मोबाइल मेरे हाथ से छूट कर नीचे गिर गया, अब मेरी ज़ुबान थकने लगी थी,हाथ-पैर ने काम करना बंद कर दिया था...मैं खुद के पैरो पर खड़ा होना तो दूर अपने शरीर के किसी हिस्से को ठीक से हिला तक नही पा रहा था...जैसे-जैसे सूरज ढल रहा था वैसे-वैसे एक घाना अंधेरा मेरी आँखो के सामने फैलता जा रहा था....मैं किसी को आवाज़ देना चाहता था, मैं किसी को मदद के लिए पुकारना चाहता था...लेकिन ना तो वहाँ इस वक़्त कोई था और ना ही मुझमे किसी को आवाज़ देने की ताक़त बची थी...ग्राउंड पर क्रिकेट खेलने वाले लड़के कब के अपने-अपने घर जा चुके थे...साले मादरचोद, क्यूंकी यदि कभी मेरे सामने ऐसे खून से सना कोई व्यक्ति पड़ा होता तो मैं उसकी मदद ज़रूर करता, इतनी इंसानियत तो अब भी बाकी थी मुझमे की मैं उसे हॉस्पिटल तक पहुचा देता या फिर मोबाइल से 108 डायल करके ये खबर तो दे ही देता कि यहाँ एक इंसान मरने की कगार पर है...मैं अरमान ,उम्र 19 साल...मैं भले ही किसी के अरमानो की फिक्र नही करता लेकिन किसी के जान की कद्र करना मुझे आता है नही तो अब तक वरुण ,मुझपर एफआइआर करने वाले फर्स्ट एअर के वो दो लड़के और गौतम ,आज इस दुनिया मे नही होते.........

मुझे उस वक़्त नही पता था कि आज जो मेरी आँखे बंद होंगी तो फिर कब खुलेगी...खुलेंगी भी या नही ,मुझे इसपर भी संदेह था...जैसे-जैसे रात का पहर बढ़ रहा था मुझे ठंड लगनी शुरू हो गयी थी लेकिन ना तो मैं अपनी दोनो हथेलियो को रगड़ कर गर्मी का अहसास कर सकता था और ना ही किसी को मदद के लिए आवाज़ दे सकता था...थक-हार कर जोरदार ठंड से तिठुरते हुए मैने अपनी आँखे मूंद ली ,तब मुझे मेरे अतीत की किताब के कयि पन्ने याद आने लगे...

मुझे अब भी याद है एक बार जब मुझे जोरो का बुखार हुआ था तो कैसे पूरा घर मेरी देख भाल मे भिड़ा हुआ था...तब मुझे जो भी पसंद होता मैं वो माँगता और मेरी फरमाइश पूरी कर दी जाती थी...मैने कयि बार ठीक होते हुए भी ऐसा नाटक किया,जैसे मैं अब बस मरने ही वाला हूँ और घरवालो से ये कहता कि मुझे ये चाहिए .

मुझे अब भी याद है कि जब मेरी तबीयत खराब थी तो मेरा बड़ा भाई घंटो मेरे सामने बैठकर मुझे लेटेस्ट न्यूज़ सुनाता रहता ,जिसमे मुझे रत्ती भर भी इंटेरेस्ट नही था और जब मैं अपने बड़े भाई की न्यूज़ सुनकर जमहाई मारने लगता तो वो गुदगुदा कर मेरी सारी नींद भगा देता था.....
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"ढुंढ़ो साले को,उसने फोन करके इसी ग्राउंड का अड्रेस दिया था..."

इस आवाज़ ने मुझे मेरे अतीत की किताब से वापस लाकर वर्तमान मे ला पटका,जहाँ मेरा पूरा शरीर लहू-लुहान होकर पड़ा हुआ था...मैने आवाज़ की तरफ नज़र दौड़ाई तो पाया कि कुच्छ लोग हाथो मे टार्च लिए ग्राउंड के अंदर दाखिल हुए है...वैसे तो मेरा सर बहुत जोरो से दर्द कर रहा था ,लेकिन मैने इतना अंदाज़ा तो लगा लिया था कि ये लोग वही गुंडे है और ये यहाँ मुझे तालश रहे है....
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"नौशाद ने सच मे इन्हे बता दिया, यदि आज ज़िंदा बच गया तो सबसे पहले नौशाद को रगडूंगा बाद मे दीपिका को...."उन्हे अपनी तरफ आता देख मैने सोचा.

जैसे -जैसे वो गुंडे मेरे करीब आ रहे थे मुझमे थोड़ी बहुत ताक़त आने लगी थी..मैने अपनी आँखे इधर उधर हिलाई तो मालूम चला कि मुझसे थोड़ी दूर पर एक बड़ा सा पत्थर रखा हुआ ,जिसके पीछे यदि मैं छिप जाउ तो ज़िंदा बच सकता हूँ....ज़मीन पर घिसट-घिसट कर जब मैं उस पत्थर की तरफ जा रहा था तो मेरे अंदर सिर्फ़ एक ही ख़याल था कि सबसे पहले मैं नौशाद की खटिया खड़ी करूँगा और फिर दीपिका रंडी को कॉलेज से बाहर निकाल फेकुंगा....मुझे इन दोनो पर ही बहुत ज़्यादा गुस्सा आ रहा था क्यूंकी दीपिका मॅम ने मुझे इस लफडे मे फँसाया और जब मैं इससे बच गया तो नौशाद ने आकर मुझे वापस फँसा दिया.....
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आख़िर कर मैं उस बड़े से पत्थर तक पहुच ही गया ,वो गुंडे टॉर्च लेकर उस पत्थर से थोड़ी दूर तक आए और फिर चले गये, उन्हे वहाँ से जाता देख मैने राहत की साँस ली लेकिन मुझे ये नही पता था कि हालत अभी और बदतर होने वाले है....मैने उन गुन्डो को जाता देख सुकून की साँस तो ली लेकिन मैं उन गुन्डो मे शामिल उस एक को नही देख पाया जो अंधेरे मे अपनी टॉर्च बंद किए ठीक उसी पत्थर के उपर खड़ा था ,जिसकी ऊलत मे मैं लेटा हुआ था....मुझे इसका अहसास तक नही हुआ कि एक शाकस ठीक मेरे उपर है. उसके उपर होने का अहसास मुझे तब हुआ जब वो कूदकर मेरे सामने आया....उसने हाथ मे मुझे मारने के लिए हॉकी स्टिक टाइप का कुच्छ पकड़ रखा था ,जिसे उसने पहले पहल मेरे गाल मे हल्के से टच किया और फिर मेरे सर मे दे मारा.....इस बार भी दिमाग़ पूरी तरह झन्ना गया और एक तेज दर्द मेरे सर मे उठा..उसके बाद वो नही रुका और नोन-स्टॉप मेरे हाथ-पैर...सर, पेट ,सीने मे हमला करता रहा....कुच्छ देर बाद उसके साथी भी वहाँ पहुच गये और वो सब भी मुझ पर एक साथ बरस पड़े....

मुझे बहुत ज़्यादा दर्द हो रहा था, मैं दर्द से चीखना चाहता था...लेकिन आवाज़ थी कि गले से उपर नही आ रही थी...मेरे शरीर के हर एक अंग को बुरी तरह से पीटा जा रहा था बिना इसकी परवाह किए कि मैं मर भी सकता हूँ...वो मुझे तब भी मारते रहे जब मुझे होश था और शायद मुझे उन्होने तब भी बहुत मारा होगा जब मैं बेहोश हो चुका था....


RE: Porn Hindi Kahani दिल दोस्ती और दारू - - 12-15-2018

मुझे नही पता कि मैं कैसे बचा, मुझे किसने बचाया,मुझे किसने हॉस्पिटल मे अड्मिट किया...जब,मुझे होश आया तो मैं नही जानता था कि मैने आज कितने दिनो बाद अपनी आँखे खोली है.....मैने तो उस दिन पक्का सोच लिया था कि जब मुझे होश आएगा तो मैं यमराज के सामने खड़ा होऊँगा और दो देवदूत मुझे स्वर्ग मे ले जाने के लिए मेरा इंतज़ार कर रहे होंगे...उस दिन ग्राउंड पर मैने ये भी सोच लिया था कि स्वर्ग मे जाकर सबसे पहले मैं स्वर्ग के राजा इंद्र की माल को सेट करूँगा लेकिन मेरे इन अरमानो पर पानी तब फिर गया जब मैने देखा कि मैं एक हॉस्पिटल मे हूँ और मेरे शरीर के कयि हिस्सो मे ना जाने कैसी-कैसी भयानक मशीन्स लगी हुई है ,जो मेरी हर मूव्मेंट पर अलग-अलग आवाज़ कर रही थी.....
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"सॉरी स्वर्ग वालो..."उपर देखकर मैने कहा"तुम लोगो से बाद मे मिलूँगा ,लेकिन उदास मत होना क्यूंकी मैं जल्द ही कुच्छ लोगो को स्वर्ग भेजने वाला हूँ...."

जब मुझे होश आए हुए कुच्छ वक़्त बीत गया तो मैने सबसे पहले ये चेक किया कि मेरे शरीर का कौन-कौन सा अंग काम कर रहा है....

गर्दन...बराबर दाए-बाए ,उपर-नीचे हिल रही थी...दोनो पैर भी सही सलामत थे लेकिन कयि जगह टाँके लगे थे, एक हाथ मे प्लास्टर चढ़ा हुआ था,लेकिन दूसरा हाथ बिल्कुल मस्त था,..लेकिन जब मैं अपने दूसरे हाथ की हथेलियो को हिलाता-डुलाता तो हल्का सा दर्द उभर रहा था....मेरे दोनो शोल्डर के साथ-साथ मेरी कमर को किसी चीज़ से बाँध कर रखा हुआ था,वो शायद इसलिए क्यूंकी मेरी हड्डिया बुरी तरह टूट चुकी थी जिसे वापस अपनी जगह सेट करने के लिए ये सब इंतज़ाम किया गया था....मेरे सर पर क्या-क्या करामात डॉक्टर लोगो ने की है ये मैं नही जानता था लेकिन जैसा कि मुझे अहसास हो रहा था उस हिसाब से सर पर भी काई जगह शायद टाँके लगाए होंगे...मैने अपना एक हाथ जो थोड़ा-बहुत हिल डुल सकता था उसे उठाकर अपने सर पर फिराया तो दंग रह गया क्यूंकी मेरे सर के सारे बाल ,जो कि मेरे हॅंडसम होने मे अहम भमिका निभाते थे ,उनको सॉफ कर दिया गया था...यानी कि मैं इस वक़्त एक हॉस्पिटल मे अपने हाथ-पैर, कंधे,सर और पीठ तुडवा के लेटा हुआ था....मुझे किसी चीज़ का ज़्यादा गम नही था सिवाय इसके के मेरे बाल अब मेरे सर पर नही है और मैं टकला हूँ 

"साला कितना धाँसू हेअर स्टाइल था मेरा,महीनो की मेहनत एक पल मे ये साले उड़ा ले गये...इनकी तो "अंदर ही अंदर हॉस्पिटल वालो को गाली देते हुए मैने खुद से कहा...

इस सदमे से उभरने मे मुझे थोड़ा वक़्त लगा और थोड़े वक़्त के बाद मैने अपने अगल-बगल झाँका तो पाया कि वहाँ और भी कयि लोग लेटे हुए है...लेकिन सब के सब बेहोश थे या फिर सो रहे थे.

"इस समय टाइम क्या हुआ है , घड़ी भी नही टन्गी है कही..."जिस रूम मे मैं था ,उस रूम की दीवारो को मैने च्चन मारा, लेकिन इस समय टाइम क्या हुआ है,ये मालूम चल सके ,इसका वहाँ कोई इंतेज़ां नही था...जिस बेड पर मैं लेता था उससे थोड़ी डोर पर एक डॉक्टर(फीमेल) चेर पर बैठी किसी फाइल के पन्ने पलट रही थी...
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"जानेमन....."एक घुटि हुई सी आवाज़ उस लेडी डॉक्टर को देख कर मेरे मुँह से निकली,जिसे मैं खुद ही ढंग से नही सुन पाया....

मैने एक और बार उस लेडी डॉक्टर को पुकारा ,जो एप्रन पहने हुए मुझसे थोड़ी दूर पर बैठी हुई कुच्छ पढ़ रही थी..मेरी आवाज़ वो डॉक्टर तो नही सुन पाई लेकिन मेरे हिलने डुलने से ना जाने कैसी-कैसी भयानक मशीन ,जो कि मेरे मेरे बॉडी से कनेक्टेड थी,वो चू-चू..तू-तू की आवाज़ करने लगी और फाइनली उस डॉक्टर ने मेरी तरफ नज़र मारी.....
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"बोलो मत, रूको मैं तुम्हारे फॅमिली को इनफॉर्म करती हूँ कि तुम्हे होश आ गया है..."मेरे पास आते हुए वो बोली...

वैसे तो उसने मुझे ना बोलने के लिए कहा था, लेकिन मैने टाइम पुछने के लिए एक बार फिर अपना मुँह फाडा और घुटि हुई आवाज़ मे उससे टाइम पुछा...

"2 बज रहे है...और तुम कुच्छ मत बोलो..."

"तेरी दाई की चूत, प्राब्लम मुझे होगी या तुझे...ज़्यादा होशियारी मत चोद वरना सारी डॉक्टर गिरी गान्ड मे ठेल दूँगा..."उसने जब अपना डाइलॉग दोबारा रिपीट किया तो मैने उसको देखकर अंदर ही अंदर खुद से कहा और एक बार फिर से अपना मुँह फाडा" एम या पीएम..."
"ह्म...."
"2 एम या 2 पीयेम"अबकी बार मैने अपना पूरा ज़ोर लगाकर कहा और ये बोलने के बाद ही निढाल होकर बेड पर लंबी-लंबी साँसे भरने लगा...

"मैने बोला था ना,बोलने की कोशिश मत करो...नाउ रिलॅक्स, मैं तुम्हारे रिलेटिव्स को इनफॉर्म कर दूँगी..."

"साली रंडी... जा चूत मरा बीसी"
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उसके बाद जो मेरी जो आँख लगी वो मुझे नही पता कि कब खुली...और जब मेरी आँख दोबारा खुली तो मुझे सिर्फ़ इतना पता था कि मैं दूसरी बार जगह हूँ...मैने कुच्छ देर तक अपने हाथ-पैर हिलाए ,जिससे मेरे बॉडी से कनेक्टेड वो भयानक मशीन्स फिर से अपना अलार्म बजने लगी और एक नर्स तुरंत मेरे पास आई....

"अपने हाथ-पैर मत हिलाओ..."मेरे पैर को पकड़ कर सीधा करते हुए उसने कहा...जिससे कि मेरा माथा एक बार फिर गरम हो गया...

"लवडा मेरा हाथ-पैर है ,मैं हिलाऊ चाहे ना हिलाऊ...तू कौन होती है मुझे टोकने वाली..."सोचते हुए मैने एक बार फिर से अपने पैर को टेढ़ा किया ,जिसे सीधा बेड पर करते हुए उस नर्स ने ना जाने मेरे पैर पर क्या बाँध दिया और एक दवाई से भरी सीरिंज मेरे पिछवाड़े मे घुसा दी....

"तू रुक, होश आने दे...फिर यही सरिंज तेरे गान्ड मे डालूँगाआअ...."जमहाई मारते हुए मैं बड़बड़ाया और फिर से सो गया....
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नेक्स्ट टाइम जब मेरी नींद खुली तो पिछली बार की तरह इस बार भी मुझे सिर्फ़ इतना ही मालूम था कि मेरी आँख पहले भी खुल चुकी है....मेरा पैर अब भी किसी चीज़ से बँधा हुआ था और वो नर्स जिसने मेरे पिछवाड़े मे सुई घुसाई थी वो इस समय किसी दूसरे पेशेंट के पिछवाड़े मे सुई डाल रही थी...

"अबे मुझे होश आ गया है,कोई जाकर मेरे घरवालो को इसकी खबर देगा या मैं खुद जाउ उन्हे ये बताने "अपनी पूरी ताक़त इकट्ठा करके मैं चीखा,लेकिन आवाज़ उतनी तेज़ नही थी ,जितनी की अक्सर मे चीखने से होती थी...लेकिन वहाँ मौज़ूद सभी लोगो को सुनाई दे...इतनी तेज़ तो थी ही...

"वेट..."उस पेशेंट के पिछवाड़े मे सरिंज डालकर उस नर्स ने वहाँ मौज़ूद दूसरी नर्स से कहा कि वो मेरे रिलेटिव्स को ये खबर दे दे....
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अब मुझे अंदाज़ा हो चला था कि अब से कुच्छ देर बाद क्या होने वाला है..जैसे मैने सोचा था उसके हिसाब से किसी हिन्दी मूवी की तरह मेरी माँ सबसे आगे दौड़ते हुए मेरे पास आएगी ,उसके आँखो मे खुशी के आँसू होंगे...देन मेरे पिता जी मेरी माँ के बाद एंट्री मारेंगे, वो खुश तो होंगे लेकिन रिएक्ट ऐसे करेंगे,जैसे उन्हे कोई फरक ही नही पड़ता उसके बाद मेरा बड़ा भाई एंट्री मारेगा और ये जानते हुए भी मैं ठीक से बात नही कर सकता वो मुझसे बहुत सारे सवाल करेगा...मेरे बड़े भाई के सवाल के बम-बारी से जब मैं घायल हो जाउन्गा तो फिर मेरी माँ जिसके आँख मे इस वक़्त भी खुशी के आँसू होंगे,वो मेरे भाई को दाँटेगी और मेरे पिता श्री से फलाना मंदिर मे फलाना भगवान के नाम पर दान-दक्षिणा करने को कहेगी.... 
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ऐसा मैने बेड पर पड़े-पड़े सोचा था लेकिन लगता है कि शनि और मंगल अब भी मुझसे खफा-खफा है क्यूंकी मुझसे सबसे पहले मिलने के लिए ना तो मेरी माँ आई और ना ही मेरे पापा....मुझसे सबसे पहले मिलने दो लोग आए...एक था मेरा बड़ा भाई विपेन्द्र और दूसरा था मेरा गे दोस्त-अरुण.......

विपिन भैया को देखते ही मैं समझ गया था कि अब सवाल-जवाब की जोरदार बम-बारी होने वाली है...इसलिए मैने तय कर लिया था कि अब मैं 2.2 एक्स 1 जे 0.7 एम ,साइज़ वाले बेड पर चुप-चाप लेटा हुआ सिर्फ़ सर हिलाउन्गा और ऐसे शो करूँगा जैसे कि मैं कुच्छ बोल ही नही सकता,जैसे कि मैं गूंगा ही हो गया हूँ.....अरुण और विपिन भैया मेरे सामने आए ,मैने दोनो को देखा और अरुण को देख कर मेरा कलेजा जल उठा कि उसके सर पर बाल है उसके बाद मैने एक और चीज़ ऐसी देखी जिसे देखकर मेरा कलेजा और भी जला...वो था उन दोनो की हालत, पिटाई मेरी हुई थी, सारे शरीर पर ज़ख़्म खाकर मैं बिस्तर पर लेटा हुआ था ...लेकिन दर्द उन दोनो की आँखो मे मैं सॉफ देख सकता था.अरुण और बड़े भैया की आँखो मे खुशी और दुख का बड़ा अजीब कॉंबिनेशन था.जिसे समझने के लिए मुझे थोड़ा वक़्त लगा. वो दोनो बहुत खुश इसलिए थे क्यूंकी आज मैने ना जाने कितने दिनो बाद अपनी आँखे खोली थी....और मुझे मेरे ज़ख़्मो के साथ देखकर वो दोनो बहुत ज़्यादा दुखी थे, उस एक पल मे दोनो की ये हालत देखकर दिल किया कि साला अभी बिस्तर से उठु और गौतम के बाप का मर्डर कर दूं,दीपिका को नंगा सड़क पर दौड़ाऊ और नौशाद को हॉस्टिल मे ही दफ़ना दूं...वो एक पल साला पूरा फिल्मी महॉल था और ऐसे फिल्मी मोमेंट मे उबाई मारने वाला मैं खुद भी कुच्छ देर के लिए भावनाओ मे बह गया था...कुच्छ देर तक तो वहाँ ऐसी ही सिचुएशन रही और उस एक पल मे मैं ये भी भूल गया कि मुझे अपना मुँह नही खोलना है,चाहे धरती पलट जाए या फिर आसमान उलट जाए, लेकिन मैने अपना मुँह खोला,आँखो मे नमी लाते हुए अपना मुँह खोला...
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"सॉरी भैया...."

मेरे द्वारा सॉरी बोलने पर मेरा बड़ा भाई अब गुस्से मे आया लेकिन मुझसे कुच्छ नही बोला....

"मुझे नही पता था कि बात इतनी आगे बढ़ जाएगी..."मैने दोबारा विपिन भैया की तरफ देख कर कहा...

"घरवालो को कुच्छ मत बताना और मम्मी-पापा से तुझे क्या कहना है ये अरुण तुझे बता देगा..."

इतना बोलकर मेरा बड़ा भाई वहाँ से चलता बना.मेरी हालत और मुझे होश मे देख कर मेरा बड़ा भाई कुच्छ ज़्यादा ही एमोशनल हो गया था और मैं जानता था कि यदि वो थोड़ी देर और उधर मेरे पास रुकते तो एक धांसु बोरिंग सीन बनाते... 

"क्या हाल है बे टकले..."विपिन भैया के जाने के बाद अरुण बोला"अब मूठ कैसे मारेगा बेटा...तेरा एक हाथ तो कुच्छ हफ़्तो के लिए गया काम से और दूसरा हाथ इस काबिल नही है कि तू मूठ मार सके..."

"मैने सोचा था कि तू थोड़ा बहुत दुखी होगा मेरी ये हालत देखकर "

"अबे दुखी तो मैं अब हुआ हूँ,तुझे होश मे देखकर..."अपनी चेयर को मेरी तरफ और पास खिसकाते हुए अरुण बोला"जब तक तू मरे हुए की तरह लेटा था ना तो मैं बेदम खुश था,मालूम है क्यूँ..."

"क्यूँ ? "

"क्यूंकी तब मैं तेरे सारे कॉपी-किताब को बेचकर मस्त पैसे बनाता...तेरे कपड़ो से मैं अपना रूम सॉफ करता...खामख़ाँ ज़िंदा हो गया बे तू "

"चल छोड़ ये सब और ये बता कि बड़े भैया ने ये क्यूँ कहा कि मैं मोम-डॅड से कुच्छ ना कहूँ..."

"क्यूंकी बड़े भैया ने सबको यही बता के रखा है कि तेरा आक्सिडेंट एक ट्रक के साथ हो गया था...."

"क्या यहाँ के डॉक्टर्स इतने काबिल है जो इन्हे मेरा इलाज़ करते वक़्त मालूम नही चला कि मेरा आक्सिडेंट नही बल्कि जोरदार ठुकाई हुई है "

"डॉक्टर्स को सब पता है लेकिन बड़े भैया ने बात दबा ली और तू भी बात दबा लेना....चोदु की तरह सब उगल मत देना...समझा..."

"ओके, बेबी..."
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बड़े भैया ने मेरा काम आसान कर दिया था क्यूंकी अब मुझसे कोई नही पुछने वाला था कि मुझे किसने मारा और क्यूँ मारा....साथ ही साथ इससे मेरी इज़्ज़त भी बच रही थी, क्यूंकी आक्सिडेंट तो आए दिन होते रहते है .इसमे कोई बड़ी बात नही थी....अरुण थोड़ी देर तक और मेरे साथ रहा और फिर वहाँ से चला गया .अरुण के जाने के बाद मेरे मोम-डॅड ने एंट्री मारी और मुझे और भी ज़्यादा एमोशनल कर दिया....उनके बाद मुझसे मिलने के लिए जैसे पूरी इंडिया की पब्लिक ही आ गयी ...एक जाता नही कि दूसरा इसके पहले ही पहुच जाता...मुझसे मिलने-जुलने वालो को मुझसे बात करने के लिए सॉफ मना किया गया था...मुझसे मिलने मेरे लगभग सारे रिलेटिव्स आए थे और उन्होने जब अंदर आकर मेरा हाल चाल पुछ लिया तो फिर मेरे दोस्तो क जमावड़ा लगना शुरू हो गया...वरुण, नवीन,सुलभ,सौरभ,अमर सर ईवन अपना भोपु भू तक मुझसे मिलने आया था, इतने लोगो को एक साथ देखकर सीना जैसे गर्व से चौड़ा हो गया था और ऐसे लगा जैसे कि बस कुच्छ ही देर मे मैं एक दम से ठीक हो जाउन्गा....लेकिन सच तो इससे कोसो दूर था.कुच्छ सच ऐसे थे जिसे मैं पहले से जानता था और कुच्छ सच ऐसे थे जिन्हे जानना बाकी थी...
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सबसे मिलने के बाद मैं थक हार कर अपने 2.2 एक्स 1 एक्स 0.7 मीटर के बेड पर एक हाथ से सर सहलाते हुए एक नर्स को आवाज़ दिया क्यूंकी मेरा सर अब हल्का-हल्का दर्द कर रहा था...मैने नर्स को अपने सर के दर्द के बारे मे बताया जिसके बाद उसने मुझे एक लाल कलर की टॅबलेट दी 

"पानी किधर है..."

"इसे मुँह मे रख कर चूसना है.."

"क्या "

"सीधे से मुँह मे रखो और चूस्ते रहो..."

"ओके..."(लवडी ये तेरे निपल्स नही है जो चूस्ता रहूं, ये टॅबलेट है...जो कड़वी होती है..)
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उस लाल कलर की टॅबलेट को मुँह मे रखने के बाद मैने चूसना शुरू ही किया था कि मेरे मुँह का पूरा टेस्ट बदल गया और मैने टॅबलेट निकाल कर हाथ मे पकड़ लिया ताकि मौका देखकर चौका मार सकूँ,,.लेकिन थोड़ी देर बाद मुझे ध्यान आया कि इधर तो कोई मौका ही नही है...ये आइसीयू था ,जहाँ धूल का एक कण भी नही था ऐसे मे टॅबलेट को उधर फेकना मतलब खुद के गले मे फंदा डालना था....फिर मैने सोचा कि क्यूँ ना टॅबलेट को बिस्तर के नीचे छिपा दूं ,लेकिन तभिच मेरे भेजे ने मुझे ऐसा करने से रोक दिया और बोला कि यदि मैने ऐसा करने की कोशिश भी की तो वो भयानक मशीन फिर से अपना राग अलापना शुरू कर देगी...तब मुझे अरुण का ध्यान आया कि अभी टॅबलेट को इधर ही कही छिपा देता हूँ और जब अरुण आएगा तो उसे देकर बाहर फिकवा दूँगा...कितना होशियार हूँ मैं 
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उस दिन रात को मेरी आँखो से नींद गायब थी क्यूंकी रह-रह कर मुझे दीपिका और नौशाद के करतूत याद आ रहे थे...नौशाद का तो फिर भी समझ मे आता है लेकिन दीपिका ने मुझे क्यूँ फँसाया ? और गौतम के बाप के साथ उसका क्या रिश्ता है ? ये मेरे समझ से परे था...लेकिन इस समय मेरे अंदर एक चीज़ नौशाद और दीपिका के लिए एकदम सेम और ईक्वल थी और वो थी मेरा गुस्सा ,उन दोनो से मेरे बदला लेने की चाहत. मुझे मालूम था कि इस वक़्त जैसे मैं उनके बारे मे सोच रहा हूँ वैसे वो भी मेरे ही बारे मे सोच रहे होंगे आंड अकॉरडिंग टू माइ सिक्स्त सेन्स ,उन दोनो की गान्ड बुरी तरह से फट चुकी होगी क्यूंकी उन दोनो ने ही ये सोचा था कि मैं ज़िंदा नही बचूँगा...लेकिन हुआ ठीक उल्टा ...

कुच्छ और भी चीज़े मेरी ज़िंदगी मे उल्टी हो चुकी थी जिसका मुझे अंदाज़ा नही था....मैं हॉस्पिटल मे हर दिन सुबह उठता ,कुच्छ ख़ाता-पीता और फिर सो जाता...दोपहर मे मैं फिर उठता ,फिर कुच्छ ख़ाता-पीता और सो जाता...उसके बाद मैं डाइरेक्ट शाम को उठकर दिन की आख़िरी खुराक लेकर फिर से सो जाता था.....हॉस्पिटल मे मेरे दिन ऐसे ही बीत रहे थे कि मुझे एक दिल को चीर देने वाली बात पता चली...

इस समय अरुण मेरे साथ बैठा बक्चोदि कर रहा था कि मैने उससे पुछा....
"अबे आज तारीख क्या है..."
"उम्म...मेरे ख़याल से आज 26 होना चाहिए..." अंदाज़ा लगाते हुए अरुण ने कहा..

"बक्चोद है क्या 25 अक्टोबर को तो ये कांड हुआ था जब मैं घर जा रहा था...मेरे ख़याल से आज 2-3 नवेंबर होगा...क्यूँ ?

"अरुण को देखकर मैने सोचते हुए कहा"साला 28 नवेंबर से एग्ज़ॅम है थर्ड सेमेस्टर के और मैं यहाँ बेड पर लेटा हुआ हूँ"

"अरमान...."

"हां बोल.."

"एग्ज़ॅम ख़तम हो चुके है और आज 26 डिसेंबर है, तू लगभग 2 महीने तक कोमा मे रहा था...."

"ये तो मुझे भी मालूम था कि तू 2 महीने तक कोमा मे था...लेकिन मुझे ये नही मालूम था कि तेरा ट्रक के साथ आक्सिडेंट नही बल्कि गौतम के बाप के कहने पर तेरी ठुकाई हुई थी....इन शॉर्ट मुझे तो तूने एश और गौतम के बारे मे कभी बताया ही नही था...."वरुण बोला...

"विपिन भैया ने सिचुयेशन हॅंडल कर लिया था...वो नही चाहते थे कि मोम-डॅड को मेरी लड़ाई के बारे मे पता चले...."

"बहुत बड़े-बड़े झंडे गाढ़े है भाई तूने तेरी कॉलेज लाइफ मे..."

"एक मिनिट रुक..."मैं वहाँ से उठा और अरुण का मोबाइल माँगा ,ताकि निशा को कॉल करके उसके डॅड का हाल-चाल जान सकूँ....निशा को कॉल करने की एक और वजह ये भी थी कि मुझे अब कुच्छ बेचैनी सी महसूस हो रही थी और ऐसी सिचुयेशन मे एक लड़की जो आपके दिल के करीब हो वो कुच्छ ऐसा कर जाती है कि दिल को सुकून सा मिलता है....
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"अब क्या हालत है..."

"मैं ठीक हूँ,मुझे क्या हुआ है..."

"तेरे बारे मे नही तेरे बाप...सॉरी अंकल जी के बारे मे पुच्छ रहा हूँ..."

"वो भी एक दम ठीक है,शाम तक लीव मिल जाएगी..."

"सेक्स करेगी,बहुत मन हो रहा है..."ऐसा मैने जान बूझकर कहा ताकि निशा मुझे फटकारे जिससे मुझे थोड़ा सुकून मिले....

"एक्सपाइरी मेडिसिन मेरे डॅड ने खाई लेकिन लगता है असर तुम्हारे उपर हो रहा है....ये कोई वक़्त है ये सब बात करने का...तुम्हारे अंदर ज़रा सी भी इंसानियत और समझ नही है क्या जो सेक्स करने को कह रहे हो...इधर मेरे डॅड तुम्हारी वजह से बीमार पड़े है,मेरी माँ उदास है और तुम सेक्स करने को कह रहे हो...बाय्स आर ऑल्वेज़......"

"हेलो...हेलो...निशा,लगता है कि नेटवर्क खराब है...तुम्हारी आवाज़ सुनाई नही दे रही है..मैं बाद मे कॉल करता हूँ..."बोलते हुए मैने कॉल डिसकनेक्ट कर दिया और एक लंबी साँस लेकर वापस बैठ गया.....

"ले बे अरुण ,अपना मोबाइल थाम और बेटा यदि निशा की कॉल आए तो खुद को अरमान बताकर उससे मत भिड़ जाना...समझा"फिर मैने वरुण से कहा"हां बोल ,तू क्या बोल रहा था..."

"अरमान ,मैं ये बोल रहा था कि तूने कॉलेज लाइफ मे बहुत सारे झंडे गाढ़े और गढ़वाए है....मैं भी ऐसी ही कॉलेज लाइफ जीना चाहता था...जिसमे हरदम ट्विस्ट आंड टर्न हो...एश जैसी एक लड़की हो ,जिसे पाने की चाहत हो लेकिन रास्ते मे उसका प्रेमी और उस प्रेमी का गुंडा बाप खड़ा हो...थोड़ा फाइट-साइट हो...लेकिन अपुन अपनी कॉलेज लाइफ मे ऐसा कुच्छ नही कर पाया ,मेरी कॉलेज लाइफ तो एक दम बोरिंग बीती है ,इतनी बोरिंग कि यदि मैं तुम लोगो को सुनाना चालू करू तो तुम दोनो बेहोश होकर कोमा मे चले जाओगे...."

"हम इंजिनीयर्स की बात ही कुच्छ और है.क्यूँ बे अरमान "अरुण गर्व से बोला...

"यस... "

"उसके बाद क्या हुआ...मतलब कि तूने दीपिका और नौशाद से बदला लिया या नही...."
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"एग्ज़ॅम ख़तम हो चुके है और आज 26 डिसेंबर है, तू लगभग 2 महीने तक कोमा मे रहा था...."

ये सुनकर ना तो मेरा मुँह खुला और ना ही मेरी आँखे शॉक्ड होकर बड़ी हुई,जैसा कि मेरे चौकने के दौरान मेरे साथ होता था...मैं दो महीने कोमा मे था,ये जानकार मैं बाहर से नॉर्मल था मतलब कि मैं ठीक उसी तरह 2.2 एक्स 1 एक्स 0.7 एम के बेड पर लेटा हुआ था,जैसे कि पिछले कयि दिनो से था....मैं बाहर से भले ही नॉर्मल दिख रहा था लेकिन मेरे अंदर एक भूचाल सा आ गया था उस वक़्त...मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे सर पर फिर से किसी ने रोड दे मारा हो...मेरा सर इस समय ठीक उसी तरह झन्ना रहा था...उस वक़्त मेरी हालत ऐसी थी जैसे की अभी-अभी किसी ने मेरे सर के बाल को ,जो की नही थे, पकड़ कर ज़ोर से खींचा हो और मैं ,मेरे सर के बाल खीचने वाले को चुप-चाप देखने के सिवाय और कुच्छ नही कर सकता...इस बीच मेरे बॉडी से कनेक्टेड मशीन्स अपना राग आलाप रही थी , और उस समय मुझे सिर्फ़ उन मशीन्स की आवाज़ मुझे सुनाई दे रही थी....

"सच मे मैं दो महीने तक कोमा मे था या तू मज़ाक कर रहा है..."दूसरी तरफ देख कर मैने अरुण से पुछा...

"हां यार..."
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जब कुच्छ दिनो पहले मुझे होश आया था तो अपने शरीर के ज़ख़्मो को देखकर मैने ये सोचा था कि मैं कितना स्ट्रॉंग हूँ,जो इतनी पेलाइ के बाद भी मेरे हाथ-पैर लगभग सही सलामत है...मैने ये सोचा था कि उन एमकेएल गुन्डो मे शायद उतना दम नही था कि वो मुझे अपंग बना सके...लेकिन सच ये था कि मैं उस दिन बहुत बुरे तरीके से उनके फंदे मे फँसा था क्यूंकी दो महीने बाद भी मेरे पैर पर कयि ज़ख़्म हरे थे और एक हाथ मे प्लास्टर चढ़ा हुआ था...कमर और पीठ भी किसी चीज़ से बाँध के रखी गयी थी....लेकिन यहाँ समस्या ये नही थी कि उन्होने मुझे इतनी बुरी तरह से मारा बल्कि यहाँ समस्या ये थी कि थर्ड सेमेस्टर के एग्ज़ॅम मैं नही दे पाया मतलब कि इस सेमेस्टर मे मुझे पूरा एक साल का पढ़ना होगा...और तो और मैं एक-दो महीने बाद ही यहाँ से डिसचार्ज होने वाला था तो मेरे पास अब कुल मिलकर 4-5 महीने ही बाकी थे,जिनमे मुझे एक साल का पूरा पढ़ना था....मैं बहुत देर तक शांत रहा और फिर अरुण से बिना कुच्छ बोले सो गया...सोते वक़्त मुझे कयि सपने भी आए और वो सारे सपने एग्ज़ॅम हॉल के थे...मैने सपने मे देखा कि मैं एग्ज़ॅम हॉल मे गुम्सुम सा अपनी सीट पर बैठा कुच्छ सोच रहा हूँ...वक़्त निकलते जा रहा है,लेकिन मैं हूँ कि बिना कुच्छ लिखे ना जाने किन ख़यालो मे खोया हुआ हूँ....और फिर अचानक किसी ने मेरे कान मे ज़ोर से चिल्लाया कि "तू फैल हो गया है...तू मरने वाला है..."
उस आवाज़ ने मुझे बुरी तरह डरा दिया और मैने जब उस आवाज़ की तरफ अपना रुख़ किया तो अपने उसी दोस्त को वहाँ खड़े हुए पाया,जिसकी मौत का सपना मैने अपने स्कूल मे देखा था....
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"अरमान..."किसी ने मुझे पकड़ कर ज़ोर से हिलाया...

"भैया...."हान्फते हुए मैने आँखे खोली और विपिन भैया को सामने देखकर राहत की साँस ली...

"क्या हुआ...तबीयत तो सही है..."

"हां...सब सही है...बस गर्मी कुच्छ ज़्यादा लग रही थी..."अपने माथे के पसीने को सॉफ करते हुए मैं बोला"अभी टाइम क्या हुआ है..."

"रात के 9 बज रहे है, खाना लाया हूँ तेरे लिए....ले खा ले..."बोलते हुए भैया ने टिफिन खोला...
"मम्मी,पापा कहाँ है..."
"कुच्छ दिन के लिए घर गये है...दो तीन दिन मे वापस आ जाएँगे..."
"आइ आम रियली सॉरी ,भैया..."जब मैने खाना खा लिया तो बोला...

लेकिन विपिन भैया ने कुच्छ नही कहा ,वो कुच्छ देर तक मुझे देखते रहे और फिर वहाँ से चले गये....
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दोपहर की लंबी नींद के बाद अब नींद मेरी आँखो से कोसो दूर थी, उस सपने को तो मैं भूल चुका था...लेकिन लाख कोशिशो के बावजूद ये बात मेरे जेहन से नही उतर रही थी कि मैने थर्ड सें का एग्ज़ॅम मिस कर दिया है...मुझे नौशाद और दीपिका मॅम पर एक बार फिर से गुस्सा आया और दिल किया कि वेमपाइर बनकर उन दोनो को काट डालु,क्यूंकी वो दोनो ही मुझे इस हालत मे पहुचने के ज़िम्मेदार थे....

"साला कितनी अच्छी लाइफ चल रही थी लेकिन अरुण के एक किस ने सब कुच्छ ख़तम कर दिया, यदि मैं उस दिन गौतम को नही मरता तो ये नौबत ही नही आती..."

"नींद नही आ रही है क्या...."मेरे सिरहाने के पास खड़े होकर उस नर्स ने मुझसे पुछा ,जिसने मुझे कल सुई लगाई थी...

"मैं ठीक कितने दिन मे हो जाउन्गा..."

"दिन नही ,महीने बोलो...कुच्छ महीने लगेंगे ठीक होने मे..."

"अंदाज़न बता सकती हो कि कितने महीने लगेंगे..."

"आप अभी सो जाओ , कल सुबह डॉक्टर से पुच्छ लेना...."बोलकर वो आगे बढ़ गयी....
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मुझसे अब भी हर दिन बहुत से लोग मिलने आते रहते , कुच्छ मेरी फिक्र की वजह से आते थे तो कुच्छ बस फॉरमॅलिटी निभाने के लिए...अभी तक मेरा इस तरफ ध्यान नही गया था लेकिन अचानक ही मेरा ध्यान एमटीएल भाई की तरफ गया तो मैं थोड़ा हैरान हो गया क्यूंकी जहाँ तक मुझे याद है एमटीएल भाई मुझे देखने,मेरा हाल-चाल पुछने के लिए एक बार भी हॉस्पिटल नही आए थे...जो अपने आप मे ही एक चौकाने वाली बात थी...मैं अपने 1400 ग्राम के दिमाग़ को फ्लश बॅक मे ले गया ये कन्फर्म करने के लिए की क्या सच मे सीडार मुझसे मिलने नही आया या फिर वो मुझसे मिलने आया था,लेकिन अब मुझे याद नही है....

"पांडे अंकल,वर्मा जी,शर्मा जी,मॅतमॅटिक्स वाले सक्सेना सर, दीक्षित सर,वरुण,भू,नवीन, सुलभ,सौरभ,अमर सर, क्लास के सभी लड़के-लड़किया...विपिन भैया के कयि दोस्त....जब ये सब मुझे याद है तो फिर सीडार क्यूँ याद नही है...नाउ आइ आम स्योर कि एमटीएल भाई अभी तक मुझसे मिलने नही आए है....शायद घर मे होंगे ,"मैने ऐसा अंदाज़ा लगाया...लेकिन अपने सामने बैठे अरुण से पुच्छ ही बैठा कि सीडार अभी तक आया क्यूँ नही....

"क..क्या बोला तूने..."

"हकला क्यूँ रहा है..मैने पुछा कि सीडार अभी तक आया नही..."

"आया था ना, तुझे याद नही होगा..."

"सच ...क्या मुझे सच मे ये याद नही है कि एमटीएल भाई मुझसे मिलने आए भी थे या नही..."

"आए थे ना..."अपने सूखे होंठो को दांतो से दबाते हुए अरुण ने कहा....

ऐसा बोलते वक़्त वो कभी उपर देखता तो कभी नीचे,कभी दाए देखता तो कभी बाए...उसने बात को टालने के लिए मुझसे मेरे घाव के बारे मे पुच्छना शुरू कर दिया...लेकिन उसकी इस हरकत से मुझे ये हवा लग गयी थी ,लौंडा झूठ बोल रहा है....
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"अरुण, तू तो मेरे साथ हमेशा रहता है तो क्या तुझे ये नही मालूम कि मुझे हमे रिक्षन के बारे मे थोड़ी-बहुत जानकारी है...तेरे हाव-भाव से सॉफ मालूम चल रहा है कि तू झूठ बोल रहा है....खैर कोई बात नही ,आइसीयू से जाने के बाद एमटीएल भाई को कॉल करके बोल देना कि अरमान उन्हे पुच्छ रहा था...."

"ठीक है...ठीक है...मैं बोल दूँगा, मैं बोल दूँगा...."

"तेरे स्पीकर से एक ही लाइन दो-दो बार क्यूँ निकल रही है...मैने कहा ना कोई बात नही..."

"अरमान...आक्च्युयली बात ये है कि...."अपने होंठ को अपने दाँत से चबाते हुए अरुण ने मेरी आँखो मे देखा और कुच्छ बोलकर अपनी आँखे बंद कर ली....

अरुण ने जो कुच्छ भी कहा था वो मेरे कान को गरम लोहे की रोड की तरह भेदता हुआ मेरे कानो से पार हो गया....दिल के धड़कनो की रफ़्तार हद से ज़्यादा तेज़ हो गयी जिसकी वजह से मेरे बॉडी से कनेक्टेड मशीनो ने एक बार फिर अपना राग अलापना शुरू कर दिया था...आइसीयू के उस एर कंडीशनर रूम मे भी मेरा पूरा शरीर एक पल मे बहुत ज़्यादा गरम हो गया और मेरा दिमाग़ फिर से झन्ना उठा और मैने एक बार फिर से अरुण के कहे शब्दो को महसूस किया....
"सीडार भाई ,अब ज़िंदा नही है...दो दिन पहले उनकी एक आक्सिडेंट मे मौत हो चुकी है..."


RE: Porn Hindi Kahani दिल दोस्ती और दारू - - 12-15-2018

मुझे कुच्छ समझ नही आया कि अरुण ने इस वक़्त जो कहा उसपर मैं कैसे रिएक्ट करूँ....ये अब तक की एक ऐसी घटना थी जिसे मैं सबसे बुरी घटना कह सकता था, मेरे दिल की धड़कने एक बार फिर से रेकॉर्ड तोड़ स्पीड के साथ चलने लगी थी....सीडार के मौत के बारे मे सुनते ही मुझे एक पल मे वो पल याद आने लगे ,जो मैने उसके साथ बिताए थे....उस एक पल मे जब मुझे उसके इस दुनिया मे ना होने की खबर मालूम हुई तो मुझे सच मे बहुत दुख हुआ, दिल और दिमाग़ दोनो से दुख हुआ....

सीडार से मेरी पहली मुलाक़ात तब हुई थी,जब मुझे उसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी, उस घटना को एक साल से अधिक बीत चुका था लेकिन मुझे अब भी याद है कि मेरी रॅगिंग लेकर कैसे वरुण और उसके दोस्तो ने मेरा बुरा हाल कर दिया था और तब मेरे उस बुरे वक़्त मे मेरा साथ देने के लिए एक अंजान शक्स आगे आ गया, जिससे मैं पहली बार मिला था....उसके बाद जो हुआ वो सब जानते है कि सीडार के दम पर मैने कैसे मेरी रॅगिंग लेने वालो को कुत्ते की तरह घसीट-घसीट कर मारा था...लेकिन अभी-अभी मुझे जो खबर मिली वो ये थी कि सीडार अब ज़िंदा नही है.....
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मुझे अब भी याद है कि कैसे मैं फर्स्ट एअर मे शेर बना घूमा करता था, इस बुनियाद पर कि यदि कुच्छ लफडा हो जाएगा तो एमटीएल भाई मुझे बचाने के लिए अपनी पूरी ताक़त लगा देंगे, मुझे अब भी याद है कि कैसे मैं कॅंटीन मे भर पेट खाने के बाद बिल सीडार के अकाउंट मे डलवा देता था...लेकिन उन्होने मुझसे कभी एक लफ्ज़ भी इस बारे मे नही कहा और ना ही मुझसे पुछा....लेकिन अभी-अभी मुझे मेरे खास दोस्त ने बताया था कि सीडार अब मर चुका है....
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मुझे अब भी अच्छे से याद है कि जब पोलीस स्टेशन मे मुझपर एफ.आइ.आर. होने की वजह से मेरे पसीने छूट रहे थे तो उस वक़्त अचानक सीडार बीच मे आया और मुझे बचा ले गया...उसके बाद उसी की मदद से मैने, मुझपर एफ.आइ.आर. करने वाले फर्स्ट एअर के दोनो लड़को को बहुत मारा था और बिना किसी परेशानी के उस पूरे झमेले से निकल गया था...लेकिन अब सच ये था कि मेरे कॅंटीन का बिल पे करने वाला,मुझे सारे झमेलो से बेदाग निकलने वाला सीडार अब ज़िंदा नही है....
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मुझे दुख इस बात का नही था कि अब मुझसे एक स्ट्रॉंग सपोर्ट छूट गया है, बल्कि मुझे दुख इस बात का है कि मेरा एक सबसे अच्छा दोस्त...जो मुझे हर वक़्त कयि नसीहत दिया करता था,जिसे मैं अपने बड़े भाई के समान मानता था,उसे मैं अब कभी नही देख पाउन्गा....अब मेरी पूरी ज़िंदगी मे शायद ही सीडार जैसा कोई मिले ,जो बिना कुच्छ सोचे, बिना अपनी परवाह किए...मेरे हर अच्छे-बुरे काम मे कंधे से कंधा मिला कर चलेगा...अब शायद ही मुझे कभी कोई मिले,जिसकी नसीहत,जिसकी सीख को मैं मानूँगा, सच तो ये था कि मैने एक बड़े भाई के समान अपना एक दोस्त खो दिया था...


सीडार मे वो सभी खूबिया थी जो हमेशा से मैं विपिन भैया के अंदर देखना चाहता था...सीडार मेरी ग़लत हरकतों पर मुझे डाइरेक्ट फटकार नही लगाता था ,बल्कि सबसे पहले वो मुझे मेरी उस ग़लत हरकत की वजह से खड़ी हुई मुसीबत से निकालता और फिर जब सब कुच्छ सही हो जाता तो मुझे समझाता कि मुझे ऐसा नही करना चाहिए...लेकिन अब सच तो ये था कि अब मुझे सही तरीके से समझाने वाला कोई नही था.....
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"कहीं सीडार की मौत मेरी वजह से तो नही हुई...यदि ऐसा हुआ तो मेरी ज़िंदगी हर दिन बाद से बदतर होता जाएगा...क्यूंकी ऐसा होने पर मैं भले ही उसकी मौत का ज़िम्मेदार ना ठहराया जाउ...लेकिन मेरा दिल और दिमाग़ मुझे जीने नही देगा कि सीडार की मौत का ज़िम्मेदार मैं हूँ...."

दिल की धड़कने इस वक़्त कम होने का नाम ही नही ले रही थी...बल्कि वो तो समय के साथ बढ़ते ही जा रही थी....
"ये सब कैसे हुआ..."घबराई हुई आवाज़ मे मैने अरुण से पुछा..

"एनटीपीसी मे कुच्छ हफ्ते पहले स्ट्राइक शुरू हुई थी पवर सप्लाइ को लेकर...जिससे एनटीपीसी को लगातार लॉस हो रहा था और जब ये बात सीडार को मालूम चली तो उसने स्ट्राइक शुरू कर दी ,जिसमे एनटीपीसी के कयि बड़े ऑफिसर्स उसके साथ थे...."

"फिर..."

"और फिर दो दिन पहले पूरे कॉलेज मे ये खबर फैल गयी कि स्ट्राइक करने वाले और पोलीस के बीच झड़प हो गयी है...उस झड़प मे कयि लोग मारे गये ,जिसमे से एक हमारा सीडार भी था...."
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बोलकर अरुण चुप हो गया और मैं भी गुम्सुम सा बेड पर लेटा रहा....बहुत देर तक हम दोनो मे कोई कुच्छ नही बोला और फिर अरुण ने ही चुप्पी तोड़ी...

"सीडार भाई की बॉडी अब भी इसी हॉस्पिटल मे है...."

"व्हाट "चौुक्ते हुए मैने अरुण की तरफ देखा....लेकिन कुच्छ बोला नही ,मेरे इस तरह से चौकने का कारण मेरा खास दोस्त अरुण मेरी शकल देख कर ही जान गया ,वो आगे बोला...

"सीडार की मौत के बाद वॉर्डन के मुँह से एक बहुत बड़ा सच हमे मालूम हुआ अरमान,जिसने हम सबको झकझोर के रख दिया था.."

"क्या..."अपने सीने पर हाथ फिराते हुए मैने पुछा...मैने अपने सीने को इसलिए सहलाया क्यूंकी आगे जो सच अरुण बताने वाला था ,वो सच,सच मे बहुत कड़वा होगा...ऐसा मैने अंदाज़ा लगा लिया था....

"सीडार एक अनाथ था, उसे अनाथ बच्चो को पालने वाली असोसियेशन ने पल-पोश कर बड़ा किया था और इस काबिल बनाया कि वो अपने पैरो पर खड़ा हो सके....कॉलेज मे ये सच सिर्फ़ हमारे प्रिन्सिपल और हॉस्टिल वॉर्डन को मालूम था और सीडार की मौत के बाद ये सच सबके सामने आया तो सबका कलेजा अपने मुँह को आ गया....किसी को यकीन नही हो रहा था की सीडार एक अनाथ था..."
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सीडार के अनाथ होने की खबर से जहाँ एक तरफ मेरे कलेजे का दुख दुगना हो गया वही दूसरी तरफ मुझे ,मेरे कयि छोटे सवालो का जवाब मिल गया था...मैं अक्सर एमटीएल भाई से पुछा करता था कि वो छुट्टियो मे घर क्यूँ नही जाते ?, क्या उन्हे हॉस्टिल मे अकेले वॉर्डन के साथ रहने मे ज़्यादा मज़ा आता है ? क्या आपके घर वाले आपको कुच्छ नही कहते ?
ऐसे ना जाने कितने सवाल मैं एमटीएल भाई से आए दिन पुछते रहता था और जवाब मे वो हर बार मेरे इन सवालो को मुस्कुरा कर टाल देते थे....और आज जब मुझे सच मालूम हुआ तो मुझे उनकी उस मुस्कुराहट के पीछे छिपे उस दर्द का अहसास हुआ,जिसे उन्होने कभी किसी के सामने ज़ाहिर नही किया था..... मैने ना जाने कितनी ही दफ़ा अंजाने मे ऐसे सवाल करके उनका दिल दुखाया था....मुझे अब भी याद है कि एक बार उन्होने मुझसे कहा था कि "अरमान यदि तू जनम से मेरा छोटा भाई होता तो मुझे बहुत खुशी होती....आइ लव यू यार..."
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"तो क्या तुम लोगो ने अनाथ बच्चो को सहारा देने वाली उस असोसियेशन को सीडार के बारे मे खबर नही दी..."

"दो दिन पहले ही उनको ये न्यूज़ हमने दे दी थी कि सीडार की मौत हो चुकी है लेकिन वो सीडार की बॉडी को लेने अब तक नही आए है..."

"आइ वान्ट सी हिम...नाउ"

"क्या..."झटका खाते हुए अरुण बोला

"हां, आइ वान्ट टू सी एमटीएल भाई...."

सीडार शायद ये भूल गया था कि कॉलेज के अंदर की लीडरशिप और बाहर की लीडरशिप मे बहुत डिफरेन्स होता है...कॉलेज के अंदर आप कुच्छ भी कर सकते है लेकिन कॉलेज के बाहर आपको कोई कुच्छ भी कर सकता है...सीडार से यही चूक हो गयी,वो एनटीपीसी की स्ट्राइक को कॉलेज के अंदर होने वाली स्ट्राइक समझ बैठा था,लेकिन वो स्ट्राइक करते वक़्त ये भूल चुका था मामला सरकार. से था जिनके हाथ मे पोलीस की बागडोर होती है...ना जाने क्यूँ मुझे ऐसा लग रहा था कि सीडार की मौत कोई कोयिन्सिडेन्स ना होकर फुल प्लॅनिंग मर्डर था...मैं सिर्फ़ ऐसा सोच सकता था कुच्छ कर नही सकता था और इस समय मैं सीडार की डेत बॉडी के सामने खड़ा उसको निहार रहा था....ये सच है कि मौत ,मरने वालो को इस दुनिया से आज़ाद कर देती है लेकिन एक सच ये भी है कि वही मौत उस मरने वाले से कयियो को जोड़ भी देती है....पता नही ,पर मुझे सीडार की बॉडी देखकर ना जाने ऐसा क्यूँ लग रहा था कि जैसे मेरी ज़िंदगी की बहुत बड़ी खुशी सीडार के साथ चली गयी है.....


किसी महान हस्ती ने कहा है कि“डेत एंड्स आ लाइफ, नोट आ रिलेशन्षिप.” और ये सच भी है ,क्यूंकी ढाई अक्षरो का शब्द "मौत" मुझसे ,सीडार को लाख कोशिशो के बावजूद भी अलग नही कर सकता था...मैं सीडार के साथ उस समय भी नही था जब वो कॉलेज छोड़ रहा था और मैं उसके साथ तब भी नही था जब वो ये दुनिया छोड़ रहा था....सीडार की मौत के तीन दिन बाद अनाथ बच्चो को पालने वाली उस असोसियेशन से एक आदमी हॉस्पिटल मे आया और उसने सीडार के शरीर को उन्ही पाँच तत्वो मे विलीन कर दिया जिन पाँच तत्वो से मिलकर उसका शरीर बना हुआ था और ये मेरी बदक़िस्मती थी कि उस आख़िरी वक़्त मे मैं वहाँ मौजूद नही था...क्यूंकी हॉस्पिटल के डॉक्टर्स ने विपिन भैया से सॉफ कह दिया था मुझे वहाँ नही जाना चाहिए.....और उस घटना के एक महीने से अधिक बीत जाने पर मैं पूरी तरह से ठीक हुआ , मेरे दोनो हाथ,दोनो पैर अब बिल्कुल सही-सलामत थे और पहले की तरह मज़बूत भी...मेरी कमर और शोल्डर भी अब पहले की तरह स्ट्रॉंग हो चुके थे...लेकिन हॉस्पिटल के उन आख़िरी दिनो मे मैने डॉक्टर्स को ये जताया कि अभी पूरी तरह से ठीक होने मे मुझे कुच्छ दिन का समय और लगेगा...डॉक्टर्स ने मेरी एक्स-रे रिपोर्ट देखी और मुझे ,मेरी हथेलियो को ओपन-क्लोज़ करने के लिए कहा तो मैने जान बूझकर वैसा नही किया और कहा कि मुझे ऐसा करने पर दर्द होता है....मेरी एक्स-रे रिपोर्ट देखकर डॉक्टर्स को जब यकीन हो गया की मैं अब पूरी तरह से ठीक हूँ तो उन्होने मुझे बिना किसी सहारे के चलने के लिए कहा और मैं जानबूझकर थोड़ी दूर चलने के बाद ज़मीन पर गिरा...ताकि उन्हे वो यकीन हो जाए जो मैं उन्हे यकीन दिलाना चाहता था....

"एक्स-रे रिपोर्ट के मुताबिक़ तो सब कुच्छ सही है...फिर तुझे प्राब्लम कहाँ हो रही है..."विपिन भैया ,जो कि इस समय मेरे पास बैठे थे उन्होने एक्स-रे रिपोर्ट उठाकर कहा...

"शायद हड्डियो को पुरानी जगह पर फिट होने मे कुच्छ टाइम लगे..."

"मतलब कि मुझे कुच्छ दिन और यहाँ रुकना पड़ेगा...."रिपोर्ट को एक किनारे रखते हुए भैया ने कहा...

"अरे नही...आप क्यूँ रुकोगे, अब तो मैं नॉर्मल हूँ,अब आप घर जाओ...थोड़े दिन बाद मैं भी हॉस्टिल से चला जाउन्गा...."

"स्योर..."

"हां...आप जाओ"

"ठीक है तो मैं आज ही रात की ट्रेन से निकलता हूँ..."अपनी घड़ी पर टाइम देखते हुए उन्होने कहा"अरुण को मैं कॉल कर दूँगा ,वो कल आ जाएगा...."

"वो तो क्या ,उसका बाप भी आएगा..."

"क्या..."

"कुच्छ नही...आप जाने की तैयारी करो "
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विपिन भैया को घर वापस भेजने के लिए मैं इतना उतावला इसलिए था क्यूंकी उनके यहाँ रहते तक मैं वो नही कर पाता जो मैं अब करने जा रहा था...जो मैं अब करने वाला था उसके लिए बड़े भैया का इस शहर से जाना बहुत ज़रूरी था और इसीलिए मैने बहुत ज़ोर देकर उन्हे जाने के लिए कहा...

दूसरे दिन अरुण मुझ से मिलने आया और आते ही उसने मेरे बेड के बगल मे रखी टेबल के उपर देखा कि कुच्छ खाने-पीने का समान रखा है या नही और जब उसे कुच्छ नही मिला तो मेरे सर के छोटे-छोटे बाल को खींच कर बोला...
"पूरा खा गया टकले,कुच्छ तो मेरे लिए छोड़ा होता...."

"अभी लंच आया नही ,आता होगा थोड़ी देर मे...."

"चल सही है...वैसे भी मुझे इस वक़्त सॉलिड भूख लग रही है..."

"बाइक पर आया है क्या..."

"और नही तो क्या हॉस्टिल से 20 किलोमेटेर पैदल आउन्गा...टकले तेरा दिमाग़ आजकल काम नही कर रहा है क्या..."

"गुड, मैं बहुत दिनो से इस मौके की तालश मे था..."एक पल मे कूदकर खड़ा होते हुए मैने कहा...

"बीसी...ये क्या था बे...कल तक तो तू ढंग से चल भी नही पा रहा था और आज एक दम से कूद कर खड़ा हो गया...."

"वो सब तू अभी नही समझेगा.."हॉस्पिटल द्वारा मुझे दी गयी मरीज़ो की ड्रेस उतारते हुए मैने वो कपड़े पहने जो मेरा भाई मुझे देकर गया था....

"साला कल तो एक चम्मच पकड़ते वक़्त तू दर्द से कराह रहा था और आज तो तुझे देखकर लगता है कि अभिच अपने हाथो से मूठ मार लेगा... "

"वो मैं नही कर सकता..."

"क्यूँ..."

"क्यूंकी कल रात ही मैने मूठ मारा है...ला बाइक की चाभी दे..."

"चूतिया है क्या...अगर कोई तुझे देखने आ गया तो..."

"अबे ये आइसीयू नही है जहाँ हर 15 मिनिट्स मे मुझे देखने कोई ना कोई आता रहेगा...इतने दिन बेड पर झूठी आक्टिंग करते हुए मैने जो नोटीस किया है उसके अनुसार अभी एक बार लंच सर्व करने के लिए हॉस्पिटल वाले आएँगे और फिर लंच देने के एक घंटे बाद ये देखने आएँगे कि मैं गोली,दवाई सही टाइम पर ले ली या नही....तो जब वो खाना देने आएँगे तो उनसे कहना कि मैं बाथरूम गया हूँ और जब वो एक घंटे बाद दोबारा आएँगे तो ये बोलना कि मैं फिर से बाथरूम गया हुआ हूँ....समझा"

"कुच्छ नही समझा, सीधे से लेट जा ...और वैसे तू कहाँ जाने की प्लॅनिंग कर रहा है..."मेरे हाथ से चाभी छीनते हुए अरुण ने पुछा....

"यदि मैने तुझे ये बता दिया तो तू मुझे जाने नही देगा और यदि तूने बिना सवाल-जवाब किए मुझे जाने दिया तो तुझे मैं वापस लौटने पर बहुत बड़ी खुशख़बरी दूँगा....सोच ले"बेड पर वापस बैठकर मैने कहा...
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अरुण कुच्छ देर तक किसी सोच मे डूबा रहा और फिर मुझे बाइक की चाभी पकड़ाते हुए बोला"जहाँ जाएगा,वहाँ से खाना खाकर आना...क्यूंकी तेरा लंच तो मैं सफ़ा चट करने वाला हूँ..."

"ओके...अपना मोबाइल, वॉलेट भी दे.."

"वो क्यूँ..."तीसरी बार चौक कर अरुण ने पुछा...

"तेरे लिए लड़की जुगाड़ करने जा रहा हूँ...अब जल्दी से वॉलेट और मोबाइल निकल...."
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हॉस्पिटल से बाहर आकर मैं जब पार्किंग की तरफ बढ़ा तब मुझे ध्यान आया कि मैने अरुण से बाइक का नंबर तो पुछा ही नही और मोबाइल अपने साथ ले आया हूँ तो अब उसे कॉल भी नही कर सकता....

"शायद उसने पार्किंग की स्लिप अपने पर्स मे डाली हो... "क्या करूँ ,क्या ना करूँ की उस अजीब सी उलझन मे फँसे मेरे 1400 ग्राम के दिमाग़ की बत्ती जैसे एका एक जली और तुरंत अरुण का वॉलेट निकाल कर चेक किया ...जिसमे मुझे अरुण की बाइक की स्लिप मिल गयी और मैं बाइक लेकर सीधे हॉस्पिटल से बाहर निकला

मेरा पहला टारगेट था नौशाद,क्यूंकी नौशाद को सबक सिखाने के लिए आज से अच्छा मौका मुझे कभी नही मिलता और इस वक़्त सारी सिचुयेशन ,सारी कंडीशन सेम वैसी ही थी जैसा कि मैने सोचा था...यहाँ तक कि अट्मॉस्फियरिक टेम्परेचर भी 
हॉस्टिल की तरफ जाते वक़्त मैं उसी मेडिकल स्टोर के पास रुका,जहाँ से मैने दीपिका के लिए कॉंडम खरीदा था

"एक पॅड देना...."मेडिकल स्टोर वाले लड़के से मैने कहा 

"कौन सा दूं, विस्पर या फिर स्टायफ्री...."

विस्पर और स्टायफ्री का नाम जब उस मेडिकल स्टोर वाले लड़के ने लिया तो मुझे अपनी ग़लती का अहसास हुआ लेकिन मैं अपनी ग़लती सुधारता उससे पहले ही वो मेडिकल स्टोर वाला लड़का बोल पड़ा...

"आइ नो..गर्लफ्रेंड के लिए चाहिए ना...भाई एक सजेशन है ,फोन करके पुच्छ ले उससे कि उसकी पसंद क्या है मतलब कि किस ब्रांड का पॅड वो यूज़ करती है...."

उसके ऐसा बोलने पर मैने अपनी आँखे छोटी की और उसे कुच्छ सेकेंड्स तक घूरता रहा.दिल किया कि साले का सर पकड़ कर सारे बाल नोच डालु और अपनी तरह टकला बना दूं...दिल किया कि सीधे उसका सर पकडू और बाहर खींचकर उसपर लातों की बारिश कर दूं....लेकिन मैने ऐसा नही किया क्यूंकी मुझे अपनी एनर्जी नौशाद के लिए बचा कर रखनी थी...

"गॉज़ पॅड देना बोले तो पट्टी और रूई भी देना...."

जब मैने उससे लड़कियो वाले पॅड की जगह दूसरा पॅड माँगा तो अबकी बार उसने अपनी आखे छोटी कर ली और कुच्छ सेकेंड्स तक मुझे घूरता रहा....

"तू समान देगा या मैं दूसरे दुकान से जाकर ले लूँ..."

"देता हूँ...देता हूँ..."
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उस मेडिकल स्टोर से निकल कर मैं फिर से हॉस्टिल की तरफ बढ़ने लगा और जैसे ही हॉस्टिल के करीब पहुचा तो मैने बाइक एक साइड रोक दी और अरुण का मोबाइल निकाल कर ,अमर सर को कॉल किया...

"मैं आ गया हूँ..."मैने कहा

"कहाँ है..."

"यही एस.पी. के बंगलों से थोड़ी दूर खड़ा हूँ..."

"ठीक है ,वही रुक मैं आता हूँ..."बोलकर अमर सर ने फोन काट दिया...
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वैसे तो मैं जो भी प्लान सोचता हूँ ,किसी को लेकर मैं जो भी स्ट्रॅटजी बनाता हूँ,उसकी खबर शुरुआत मे सिर्फ़ मुझे और मेरे दिमाग़ को होती है...लेकिन इस बार मेरे स्ट्रॅटजी ,मेरे प्लान की खबर अमर सर को भी थी...क्यूंकी वो इस प्लान मे बहुत इंपॉर्टेंट रोल प्ले कर रहे थे....बड़े भैया के मोबाइल से अक्सर रात को 12 बजे के बाद मैं अमर सर को कॉल करके उनसे नौशाद की खबर लेता रहता था और दो दिन पहले ही उन्होने मुझे बताया था कि इन दिनो मिड टर्म चल रहे है और नौशाद मिड टर्म देने ना जाकर पूरे दिन हॉस्टिल मे रहता है...यही सबसे सही मौका था क्यूंकी अकॉरडिंग टू माइ प्लान, मैने नौशाद को हॉस्टिल मे ठोका...ये बात जितने कम लोगो को मालूम चले ये उतना ही मेरे लिए सही था.जब मुझे सड़क के किनारे बाइक खड़े किए हुए कुच्छ देर बीत गई तो मैने सामने की तरफ नज़र डाली और अमर सर मुझे दूर, आते हुए दिख गये...

"क्या हाल है ,अरमान सर...बहुत दिन लगा दिए हॉस्टिल आने मे..."

"हॉस्पिटल की नर्सस को मुझसे प्यार हो गया है,साली डिसचार्ज ही नही करती...."मुस्कुराते हुए मैने कहा...

"ये ले खून की डिब्बी..."एक छ्होटी से डिब्बी मेरे हाथ मे पकड़ाते हुए अमर सर ने कहा"अब जा और छोड़ना मत साले को...*** चोद देना उस बीसी ,एमकेएल की....बेस्ट ऑफ लक..."

"लक तो मेरे ही हाथ मे है इसलिए यदि बोलना है तो ऑल दा बेस्ट बोलो..."

"ठीक है भाई,जैसी तेरी मर्ज़ी...ऑल दा बेस्ट...और सुन"

"टेलो..."

"सिर्फ़ आधा घंटा है तेरे पास क्यूंकी उसके बाद लड़के कॉलेज से हॉस्टिल आना शुरू कर देंगे..."

"डॉन'ट वरी..."बाइक स्टार्ट करके मैने स्कार्फ से अपना फेस बाँधा और बोला"मेरे पास जुगाड़ है..."
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कॉलेज मे सीनियर्स के मिड टर्म चल रहे थे ,इसलिए हॉस्टिल लगभग खाली ही था...लेकिन कुच्छ लौन्डे ऐसे होते है जिन्हे कॉलेज के मिड टर्म से कोई फ़र्क नही पड़ता और वो पूरे दिन हॉस्टिल मे रहकर खटिया तोड़ते रहते है.नौशाद उनमे से एक था. और भी कयि लड़के थे जो कॉलेज ना जाकर हॉस्टिल मे मौज़ूद थे...जिसमे से मेरा दोस्त सौरभ भी एक था और उसे इसकी भी जानकारी थी कि मैं आज यहाँ आने वाला हूँ....
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आज महीनो बाद हॉस्टिल को देखकर सीडार की याद खुद ब खुद आ गयी लेकिन मैने सीडार की यादों को अपने जहाँ से निकाल कर बाहर फेका क्यूंकी ये वक़्त किसी की याद मे दुखी होने का नही था और जब मैं इसमे कामयाब हुआ यानी कि खुद से सीडार की यादों को दूर करने के बाद मैने अपने फेस को स्कार्फ से बाँधे हुए अपने रूम की तरफ बढ़ा,जहाँ मेरा खास दोस्त सौरभ, मेरे दूसरे खास दोस्त सुलभ के साथ बैठा तब से मेरा इंतज़ार कर रहा था,जब से मैने उन्हे कॉल करके बताया था कि मैं हॉस्टिल आ रहा हूँ.....जब मैं अपने रूम की तरफ जा रहा था तो मुझे हॉस्टिल मे रहने वाले कुच्छ लड़को ने देखा लेकिन वो इतने जल्दी मे थे कि मुझे पहचान तक नही पाए..मुझे ना पहचान पाने की एक वजह शायद ये भी हो सकती है कि मैने उस वक़्त अपने चेहरे और सर को स्कार्फ से बँधा हुआ था....


अपने रूम की तरफ जाते हुए मैने ये सोचा था कि जाकर उन दोनो कामीनो से मैं गले मिलूँगा जिसके बाद दोनो शुरू मे मेरा हाल पुछेन्गे और फिर मेरे सर पर हाथ फिरकर मुझे टकलू-टकलू कहेंगे....लेकिन अंदर जाकर ना तो मैं उनसे गले मिला और ना ही उनका हाल पुछा....

"साले ,तू मेरे बिस्तर पर लेटकर मूठ मार मार रहा है उठ भोसडी के वहाँ से..."

मेरे अचानक रूम के अंदर आने से और मेरी तेज़ आवाज़ के कारण सौरभ बौखला गया और जल्दी से अपने पैंट को,जो कि घुटनो तक खिसक गया था,उसे कमर के उपर लाते हुए मेरी तरफ बढ़ा...

"कैसा है अरमान..."अपना एक हाथ मेरी तरफ बढ़ाते हुए सौरभ ने मेरा हाल पुछा....

"पीछे हट और लवडे मुझे छुना मत...साला जिस हाथ से मूठ मारता है उसी हाथ से हाथ मिलाता है..."अपने बिस्तर की बेडशीट को किनारे से पकड़ कर मैने खींचा और उसकी गठरी बनाकर सौरभ के मुँह पर दे मारा"बेटा इसे धो देना और सुलभ कहा है..."

"वो बाथरूम मे कर रहा है "

"वेरी गुड, लवडा मैं यहाँ इतने बड़े मिशन मे निकला हूँ और तुम दोनो यहाँ ये सब कर रहे हो...."

सौरभ को मैने बहुत सुनाया और जब सुलभ बाथरूम को स्पर्म डोनेट करके रूम मे आया तो मैने उसे भी बहुत गाली बाकी और फिर काम की बात करने लगे...

"नौशाद कहाँ है इस वक़्त..."उसका नाम लेते ही मेरा खून खौलने लगा ,क्यूंकी अब मुझे वो सब कुछ याद आने लगा था...जिसकी वजह से मैं 3 महीने से अधिक हॉस्पिटल मे पड़ा रहा था...उस दिन मुझे जितने भी ज़ख़्म मिले थे वो अब एक-एक करके हरे होते जा रहे थे....जब मेरे सारे ज़ख़्म एक-एक करके हरे हो रहे थे तो उसी वक़्त सौरभ ने मुझे सर्क्युलर शेप का लोहे का एक टुकड़ा दिया 

"ये कहाँ से लाया ,मैने तो ड्यूस बॉल माँगा था..."

"कॉलेज के वर्कशॉप से चोरी कर लिया और वैसे भी ये ड्यूस बॉल से ज़्यादा हार्ड और भारी है...जिसको भी पड़ेगा उसका सर फॅट जाएगा..."

"ठीक है"सौरभ के हाथ से मैने बॉल ली...बॉल सच मे हद से ज़्यादा भारी थी...बॉल को अपने हाथो मे लेकर मैने सौरभ से रोड के बारे मे पुछा...

"रोड का जुगाड़ नही हो पाया ,लेकिन हॉकी स्टिक दरवाजे के पीछे छुपा दी है...."

"चल कोई बात नही..."रूम के बाहर आते हुए मैं बोला"और अपनी आँखे खुली रखना और जैसे ही नौशाद बाथरूम मे घुसे ,काम मे लग जाना..."
.
सौरभ और सुलभ को हिदायत देने के बाद मैं उस फ्लोर के बाथरूम की तरफ बढ़ा...नौशाद का रूम बाथरूम के बगल मे था इसलिए वहाँ से गुज़रते वक़्त मैने नौशाद के रूम मे नज़र डाली तो देखा कि वो लोग दिन दहाड़े दारू पी रहे थे....यानी कि मेरा काम अब और भी आसान होने वाला था...


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