Sex Kahani ह्ज्बेंड ने रण्डी बना दिया - Printable Version

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RE: Sex Kahani ह्ज्बेंड ने रण्डी बना दिया - sexstories - 06-19-2018

जब इतना सब हो गया तो अब शरमाना क्या.. मैं यही सोचते हुए नाईटी ऊपर करके बुर सहलाने लगी। मैंने जैसे ही बुर पर हाथ रखा.. मेरी गरम बुर एक बार फिर चुदने के लिए चुलबुला उठी, मेरी बुर से गरम-गरम भाप निकल रही थी।
अपने हाथों से बुर को रगड़ती रही.. पर मेरी बुर चुदने के लिए फूल के कुप्पा हो रही थी। मैं कुछ देर यूँ ही चूत और चूचियों से खेलती रही।
लेकिन मेरा मन शान्त होने के बजाए भड़कता रहा और मैं एक बार फिर से डिसाईड करके बुड्ढे से चुदने के लिए छत पर चली गई। 
पर छत पर कोई भी नहीं था.. मैं कुछ देर चाचा का इन्तजार करती हुई.. इस आशा में एक हाथ बुर में डाल कर सहलाती रही कि जैसे हर बार अचानक से आकर मुझे दबोच लेते हैं वैसे ही फिर आकर मुझे दबोच कर फिर से मेरी चूत की भड़कती ज्वाला को शान्त कर देंगे। 
काफी देर हो गई और शाम होने को हुई पर चाचा ना आए और ना ही दिखे।
चाचा के ना आने से मेरा मन बेचैन हो गया और मैं वासना के नशे में चाचा को देखने के लिए दीवार के उस पार गई और मैं धीमी गति से चारों तरफ देखते हुए मैं छत पर बने कमरे की तरफ गई।
कमरे के किवाड़ बंद थे, मैं कुछ देर वहाँ रूकी फिर दरवाजे पर जरा जोर दिया.. दरवाजा खुलता चला गया। मैं यह भी भूल गई कि छत और छत पर बना कमरा दूसरे का है। यहाँ कोई हो सकता है.. पर मैं चूत की काम-ज्वाला के नशे में सब कुछ भूल चुकी थी।
मेरी प्यासी चूत को लण्ड चाहिए था.. बस यही याद ऱह गया था।
जैसे ही दरवाजा खुला.. अन्दर कोई नहीं था, एक चौकी थी जिस पर गद्दा लगा था और एक पानी का जग.. गिलास रखा था। सामने हेंगर पर कुछ कपड़े टंगे थे जो चाचा के ही लग रहे थे।
मैं पूरे कमरे का मुआयना करके वहाँ चाचा को ना पाकर मायूस होकर कमरे से बाहर आ गई। फिर ना चाहते हुए मैं भारी कदमों से अपनी छत की तरफ बढ़ी ही थी कि तभी पीछे से चाचा के पुकारने की आवाज आई- बहू यहाँ क्या कर रही हो.. और किस को ढूँढ़ रही हो?
अभी मैं चाचा की तरफ घूमी भी नहीं थी.. चाचा की तरफ पीठ किए खड़ी रही। चाचा की आवाज मेरे नजदीक होती जा रही थी और जैसे-जैसे चाचा नजदीक आते जा रहे थे.. यह सोच कर मेरी चूत पानी-पानी हो रही थी कि अब मैं हुई चाचा की बाँहों में.. अब वह पीछे से मुझे पकड़ कर अपने शरीर से चिपका कर मेरी गुदा में अपना लण्ड गड़ाएंगे। 
कुछ ही देर में चाचा ने खुली छत पर मुझे बाँहों में भर कर पूछा- किसी को खोज रही हो क्या जान?
चाचा एक हाथ मेरी गदराई चूची पर आ गया और उन्होंने दूसरा हाथ मेरी चूत पर ले जाकर दबा दिया।

‘आहह्ह्ह्…सीईईई.. तुम्म म्म्म्म बह्ह्ह्हुत जालिम हो.. एक तो मेरे जिस्म मेरी चूत में आग भड़का दी और ऊपर से पूछते हो कि मैं किसे ढूँढ रही हूँ। छोड़ो मैं आपसे नहीं बात करती.. आपको पता नहीं है कि मेरी प्यासी चूत इतनी रिस्क लेकर किसे खोज रही है। नीचे पति थे.. लेकिन में आपका लण्ड बुर में फंसाकर खड़ी थी और इस समय भी मैं यहाँ आपके लौड़े का और बुर का संगम कराने को खुद ही रिस्क लेकर इन कपड़ों में पड़ोसी के छत पर हूँ। जैसे आपने मुझे एकाएक आवाज दी है.. वैसै ही कोई और होता तो बदनामी मेरी होती.. आपकी नहीं..’
और मैं चाचा जी से छिटक कर दूर हो गई.. पर चाचा मेरे करीब आकर बोले- मैं मजाक कर रहा था.. मुझे पता है कि तुम मुझे अपनी चूत को चुदवाकर अपनी प्यास बुझावाने के लिए खोज रही थी.. चलो कमरे में चलते हैं।
फिर चाचा मुझे खींचते हुए कमरे में लेकर चले गए और मुझे लेकर चौकी पर बैठ गए। 
‘यहाँ कोई और भी आ सकता है ना?’
‘नहीं आज कोई नहीं है.. सब एक शादी में गए है और दो दिन अभी कोई नहीं आएगा.. इसलिए मैं तुमको यहाँ लाया.. नहीं तो मैं पागल नहीं हूँ कि तेरी और अपनी बदनामी करवाऊँ।’
‘लेकिन आप पागल हो और आप दूसरों को भी पागल कर देते हो।’
‘वो कैसे बहू..?’
‘आप चूत के लिए पागल हो कि नहीं?’
‘हाँ बहू.. तुम सही कह रही हो.. पर मैं दूसरों को कैसे पागल करता हूँ?’
‘अपना लण्ड दिखाकर.. जैसे मैं आपके लण्ड देख कर उसे अपनी चूत में लेने के लिए पागल हो गई हूँ।’
चाचा हँसने लगे और मुझे वहीं चौकी पर लिटा कर मेरी नाईटी को ऊपर कर दी।
मेरी फूली हुई चूत को देख कर बोले- बहुत प्यासी है क्या बहू?
‘हाँ चाचा..’
मेरे ‘हाँ’ करते चाचा ने मेरी बुर पर मुँह लगा कर मेरी जाँघों को सहलाते हुए मेरी बुर को किस कर लिया।
मैं अपनी बुर पर चुम्मी पाकर सीत्कार कर उठी ‘ओह्ह्फ्फ ऊफ्फ्फ आई ईईसीई.. आहह्ह्ह्..’
पर चाचा मेरी चूत के चारों तरफ अपनी जीभ घुमा कर मेरी प्यास को भड़काने में लगे हुए थे। चाचा अपनी जीभ को लपलपाते हुए चूत के छेद में जीभ डाल कर मुँह से मेरी चूत मारने लगे।
मेरी गरम चूत पर चाचा की जीभ चटाई से मैं अपनी सुधबुध खोकर सिसकारी लेने लगी ‘आहह्ह आहह मेरे राजा.. यसस्स्स स्स्सस्स.. चूसो मेरी चूत को अहह.. चाचा अपने मोटे लण्ड से मेरी चूत चोदो.. मैं प्यासी हूँ.. मेरी प्यास बुझा दे.. आहह्ह्ह्.. चाटो मेरी चूत को.. आहह्ह्ह् सीईईई..’
मैं सीत्कार करती हुई चूत उछाल कर चुसवाए जा रही थी।
तभी चाचा चूत पीना छोड़कर खड़े हो गए और अपनी लुंगी को निकाल कर फेंक दिया। उन्होंने मुझे इशारे से अपने लण्ड को चूसने को कहा और मैं चाचा के बम पिलाट लण्ड को मुँह में लेकर सुपारे पर जीभ फिरा कर पूरा लण्ड गले तक लील गई। चाचा भी मस्ती में मेरे मुँह में ही लण्ड पेलने लगे ‘ओह्ह बेबी.. आह.. चूस बेबी.. मेरे लण्ड को.. आहसीईई.. मैं भी प्यासा हूँ बेबी.. चूत के लिए.. एक तुम्हारी जैसी प्यासी औरत की जरूरत है.. आहह्ह सीईईई.. बेबी.. मैं तुम्हारी गरम चूत का गुलाम हूँ.. बेबी ले.. मेरे लण्ड को.. अपने मुँह में..’ 
मुँह चोदते हुए चाचा घपाघप लण्ड मेरी मुँह में पेलते रहे और मैं भी काफी देर चाचा के लण्ड से खेलती रही। फिर समय का ख्याल करके मैं चाचा का लण्ड मुँह से निकाल कर चौकी पर लेट कर चूत फैला कर चाचा के मोटे लण्ड को लेने के लिए अपनी छाती मींजने लगी।
चाचा मेरी चूत को जल्द से जल्द पेलना चाह रहे थे, चाचा मेरे पैरों के पास बैठकर मेरी जाँघ पर हाथ फेरकर मेरे ऊपर छा गए।
चाचा ने मेरी चूत अपना लण्ड लगा कर एक ही करारे धक्के में अन्दर धकेल दिया। मैं चाचा के लण्ड के इस अचानक से हुए हमले को सहन नहीं कर सकी ‘आआआ आअहह.. ओह.. चाआआआचाजी.. मेरी बुर.. आह.. थोथ्थ्थ्थ्थोड़ा.. धीमे पेलो.. आह..’
फिर चाचा मेरी चूची को मुँह में भर कर दूसरा शॉट लगा कर अपने बचे-खुचे लण्ड को पूरा अन्दर करके मेरी बुर की चुदाई शुरू कर दी। मैं भी चाचा के लण्ड को बुर उठा अन्दर ले रही थी।
चाचा मेरी चिकनी चूत में लण्ड फिसला रहे थे और मेरी चूचियों को मसकते हुए शॉट लगाते जा रहे थे।
चाचा के हर धक्के से मेरी चूत में नशा छा जाता। चाचा का लंबा, मोटा लण्ड एक ही बार में दनदनाता हुआ मेरी फूली गद्देदार चूत में घुसता चला जाता।
इस तरह से तो आज तक मेरे पति से भी मुझे ऐसी चुदाई का सुख नहीं मिल पाया था। इसलिए आज मैं इस मजे को जी भरकर लेना चाहती थी। मैं हर धक्के के साथ अपनी कमर उचका कर चाचा के लण्ड की हर चोट चूत पर ले रही थी। मेरी चुदाई के हर ठप्पे से मैं चुदने के लिए बेकरार होती जा रही थी।
तभी मेरे मोबाईल पर रिंग बज उठी।
मैं चाचा को रुकने का इशारा करके फोन उठाकर बोली- हैलो?
‘कहाँ हो तुम.. आधे घण्टे से संतोष गेट और बेल बजा रहा है..’
‘मैं तो यही हूँ.. शायद सो गई थी.. आप फोन रखो.. मैं देख रही हूँ।’
यह कह कर मैंने फोन कट कर दिया।
मुझे तो संतोष के आने का ध्यान ही नहीं रहा।
मेरे फोन रखते चाचा ने चूत चोदना चालू कर दिया।
मैं चाचा से बोली- हटो.. मैं बाद में आती हूँ..
पर चाचा ताबड़तोड़ मेरी चूत मारते हुए मेरी चूत में झड़ने लगे। चाचा को मेरी बातों का एहसास हो चुका था।
मैं किसी तरह चाचा को ढकेल कर प्यासी और वीर्य से भरी चूत को अनमने से ना चाहते मैं अपनी छत पर जाकर सीढ़ी से नीचे उतर गई।
मैंने जाकर गेट खोला.. सामने एक नाटे कद का काला सा लड़का खड़ा था। मैं चुदाई के कारण कुछ हांफ सी रही थी और मेरी जाँघ से वीर्य गिर रहा था। 
मैं चुदाई के कारण कुछ हांफ सी रही थी और मेरी जाँघ से वीर्य गिर रहा था.. जिससे एक महक सी आ रही थी।
मेरे अस्त-व्यस्त कपड़े और मेरी बदहाशी की हालत देख कर वह केवल एकटक मुझे देख रहा था और मैं भी उसके शरीर की बनावट को देखे जा रही थी।
एक तो पहले से ही आज मेरी बुर की प्यास हर बार किसी ना किसी कारण अधूरी रहे जा रही थी। मैं भी सब कुछ भूल कर उसको देख रही थी। 
मुझे होश तब आया.. जब उसने कहा- मेम.. मुझे साहब ने भेजा है।
‘ओह्ह..ह्ह्ह.. आओ अन्दर..’ 
वह मेरे पीछे-पीछे वह मेरी लचकते चूतड़ों को देखते हुए अन्दर आ गया। मैं अन्दर आते समय यही सोच रही थी कि आज इसका पहला दिन है और आज ही इसने मेरी गदराई जवानी को जिस हाल में देखा है.. इससे तो जरूर इसका लण्ड खड़ा हो गया होगा। 
फिर मैं सोफे पर बैठ गई और मैं अपने एक पैर को दूसरे पैर पर रख कर आराम से सोफे पर बैठ गई। मैंने जब उसकी तरफ देखा.. तो वह अपनी आँखों से मेरी जांघ और मेरी चूचियों का मुआयना कर रहा था।
मैं अपने शरीर के अंगों को संतोष को घूरते देख कर उससे पूछने लगी- तो मिस्टर आप का नाम?
वह जैसे नींद से जागा हो- जी..ज्ज्ज्जी संस्स्स्स्न्तोष है..
‘तुम क्या-क्या कर लेते हो?’
‘मेम.. मैं सब कुछ..’ 
‘अच्छा.. तो आप सब कुछ कर लेते हो..’
‘जी.. मेमसाहब..’


RE: Sex Kahani ह्ज्बेंड ने रण्डी बना दिया - sexstories - 06-19-2018

‘मैं कुछ जान सकती हूँ कि आप क्या क्या कर सकते हो..?’ ये कहते हुए मैंने अपने पैर नीचे कर लिए और दोनों पैरों को छितरा लिया। मेरे ऐसा करते मेरी जाँघ के बीच से वीर्य की एक तीखी गंध आने लगी। मेरी चूत और जाँघें चाचा के वीर्य से सनी हुई थीं। 
शायद संतोष को भी महक आने लगी, वह बोला- मेम साहब, कुछ अजीब सी महक आ रही है?
‘कैसी महक?’
‘पता नहीं.. पर लग रहा है कि कुछ महक रहा है।’
‘तुमको कभी और ऐसी महक आई है.. कि आज ही आ रही है?’
‘मुझे याद नहीं आ रहा..’ 
‘चलो याद आ जाए कि यह महक किस चीज की है.. तो मुझे भी बताना.. क्योंकि मैं भी नहीं समझ पा रही हूँ कि यह महक किस चीज की है। खैर.. तुमने बताया नहीं कि क्या- क्या कर लेते हो?’
‘जी मेमसाहब.. मैं खाना बनाऊँगा.. और घर के सभी काम करूँगा.. जो भी आप या साहब करते हैं।’ 
‘अच्छा तो तुम साहब के भी सारे काम करोगे?’
‘जी मेम साहब..’
वह मेरी दो अर्थी बातों को नहीं समझ पा रहा था। मैं तो उस समय सेक्स में मतवाली थी, मैं वासना के नशे में चूर होकर हर बात कर रही थी, मैं यह भी भूल गई थी कि यह मेरे बारे में क्या सोचेगा।

तुम्हारी उम्र क्या है?’
‘जी.. 19 साल और 3 महीने..’
‘गाँव कहाँ है?’
‘मोतीहारी.. बिहार का हूँ।’
‘ओके.. तुम को यहाँ रहना पड़ेगा..’
‘जी मेम साहब..’ 
वह बात के दौरान मेरी जाँघ के बीच में निगाह लगाए हुए ज्यादा से ज्यादा अन्दर देखने की कोशिश में था। वह बिल्कुल मेरे सामने खड़ा था.. जहाँ जाँघ से अन्दर का नजारा दिख रहा था.. पर शायद उसे मेरी चूत के दीदार नहीं हो पा रहे थे.. इसलिए वह कोशिश कर रहा था कि मेरी मुनिया दिखे.. और मैंने भी संतोष की यह कोशिश जरा आसान कर दी।
मैंने पूरी तरह सोफे पर लेटकर पैरों को चौड़ा कर दिया। मेरा ऐसा करने से मानो संतोष के लिए किसी जन्नत का दरवाजा खुल गया हो.. वह आँखें फाड़े मेरी मुनिया को देखने लगा। 
‘वेतन क्या लोगे?’
मेरी चूत के दीदार से संतोष का हलक सूख रहा था। वह हकलाते हुए बोला- जो..ज्ज्ज्जो आअअप दे दें..
‘मैं जो दूँगी.. वह तुम ले लेगो?’
‘जरूर मैडम..’
‘और कुछ और नहीं माँगेगा?’
मैं यह वाक्य बोलते हुए पैर मोड़ कर बैठ गई।
मैंने गौर किया कि जैसे कोई फिल्म अधूरी रह गई हो.. ठीक वैसे ही उसका मन उदास हो गया था। 
‘अच्छा.. तो मैं तुमको 5000 हजार दूँगी।
‘ठीक है मेम साहब..’
‘फिर तुम काम करने को तैयार हो?’
‘जी मेमसाब..’ 
‘अभी तुम रसोई में जाओ और अपने हाथ की पहली चाय पिलाओ।
मैंने उसे रसोई में ले जाकर सब सामान दिखा दिया।
‘तुम दो कप चाय बना कर ले आओ..’
मैं उसे कहकर बेडरूम में चली गई और मैं अपने बेडरूम में पहुँच कर कपड़े निकाल कर बाथरूम में घुस गई और सूसू करने बैठी। मेरी फड़कती और चुदाई के लिए तड़पती चूत से जब सूसू निकली.. तो ‘सीसी सीस्स्स्स्सीइ..’ की तेज आवाज करती हुई मेरी मुनिया मूत्र त्याग करने लगी।
सूसू करने से मुझे काफी राहत मिली और फिर मैं फुव्वारा खोल कर नहाने लगी.. जिससे मेरे तन की गरमी से कुछ राहत मिली। मैंने नीचे हाथ ले जाकर चूत और जाँघ पर लगे वीर्य को साफ किया और चूत को हल्का सा सहलाते हुए मैं बीते हुए पल को याद करने लगी। 
आह.. क्या लौड़ा है चाचा का.. मजा आ गया.. आज रात तो जरूर चुदूँगी.. चाहे जो हो जाए.. हाय क्या कसा-कसा सा मेरी चूत में जा रहा था। अगर चाचा मेरी फोन पर बात ना सुनते और जल्दबाजी में अपना पानी ना निकालते.. तो मैं भी अपना पानी निकाल कर ही आती। 
यही सब सोचते हुए मैंने एक उंगली बुर में डाल दी और बड़बड़ाने लगी ‘आहह्ह्ह् सीईईई.. चाचा.. आह क्या माल झड़ा था.. चाचा के लण्ड से आहह्ह्ह्.. सीईईई काफी समय बाद लग रहा था कि चाचा को बुर मिली है.. इसलिए मेरी बुर को अपने पानी से भर दिया।’
मैंने अपनी बुर में उंगली करना चालू रखी थी कि बाहर से संतोष की आवाज आई- मेम साहब चाय ले आया हूँ। 


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मैंने बुर से उंगली निकाल कर चाटते हुए तौलिया लपेटकर बाहर आ गई। मुझे ऐसी हाल देख कर संतोष आँखें फाड़ कर मुझे देखने लगा।
मैंने बेड पर बैठ कर संतोष की तरफ देखा, वह अब भी वहीं खड़ा था और मेरी अधखुली चूचियों को घूर रहा था।
‘संतोष चाय दोगे कि यूँ ही खड़े रहोगे?’
‘हह्ह्ह्ह्हा.. मेम्म्म्म सास्साब..’
उसने चौंकते हुए मेरी तरफ चाय बढ़ा दी। मैं कप उठाया और चाय पीते हुए.. दूसरे कप की चाय उसे पीने को बोल कर मैं पति को फोन करने लगी।
‘हैलो.. हाँ जी.. बात हो गई संतोष से.. वह आज से ही काम पर है।
‘ओके.. ठीक है जानू..’
मैंने फोन कट कर दिया.. फिर मैं संतोष को बाहर बने सर्वेन्ट क्वार्टर को दिखा कर बोली- तुमको यहीं रहना है और जो भी जरूरत हो.. तुम मुझसे ले लेना.. और मेन गेट खुला है.. ध्यान रखना। 
फिर मैं वहाँ से चली आई और मैं कुछ देर आराम कर ही रही थी कि जेठ जी मुझे पुकारते हुए अन्दर मेरे कमरे में आ गए और मुझे किस करके बोले- जानू कोई लड़का आया है क्या? 
‘हाँ.. वह आज से घर का सब काम करेगा..’
‘वाह वैरी गुड.. इसका मतलब अब मेरी जान मुझसे बुर चुदाने के लिए बिल्कुल खाली रहेगी।’
‘हटिए आप भी.. जब देखो इसी ताक में रहते हो.. चलो हटो नहीं तो नायर देख लेगा..’
‘वह साला अभी कहाँ आया है.. वह रात तक आएगा.. उसे कुछ काम था। मेरा मन नहीं लग रहा था इसलिए चला आया।’
जेठ जी ने मुझे बाँहों में कस कर मेरे होंठ चूसने लगे.. साथ में ब्रा के कप में हाथ घुसा कर मेरी छाती को दबाने लगे।
मैं तो पहले से ही सेक्स में मतवाली थी, जेठ जी के आगोश में जाते मैं चुदने के लिए बेकरार हो कर जेठ से लिपट गई।
‘यह हुई ना बात..’
‘हाय मसल डालो मेरे राजा.. मेरी चूचियों को.. और मेरे सारे बदन अच्छी तरह से दबाकर चोद दो.. कि मेरी गरमी निकल जाए।’
‘हाय मेरी जान.. तेरे जैसी औरत को कौन मर्द चोदना नहीं चाहेगा..!’
‘हाँ मेरी जान जमकर चोद दो.. और किसी के आने से पहले मेरी बुर को झाड़ दो..’
बस फिर क्या था.. जेठ ने पीठ पर हाथ ले जाकर ब्रा का हुक खोल दिया। वे मेरी चूचियों को दबाते हुए चाटने लगे और मैंने भी जेठ के सर को पकड़ कर अपनी छातियों पर भींच लिया।
जेठ जी ने मेरे सारे कपड़े निकाल कर मुझे चूमते हुए मेरी टांगों को खोल दिया और अपनी जुबान को मेरी चूत पर रगड़ने लगे। 
जेठ मेरी चूत में अपनी जुबान घुसा कर मेरी चूत चाटते और कभी मेरे भगनासे को अपने होंठों और जीभ से रगड़ते.. तो मैं सिसकारी लेने लगती ‘आहह्ह्ह् सीईईई..’ 
मेरी सिसकारी को सुन कर जेठ मेरी फुद्दी को कस कर चाटने लगे। एक पल तो लगा कि सारे दिन की गरमी जेठ जी चाटकर ही निकाल देगें।
मैं झड़ने करीब पहुँच कर जेठ से बोली- आहह्ह्ह् उईईसीई आह.. क्या आप मेरी चूत को अपने मुँह से ही झाड़ दोगे.. घुसा दो अपना टूल.. और मेरी मुनियाँ को फाड़ दो.. आहह्ह्ह..
तभी जेठ मुझे खींच कर बिस्तर के किनारे लाए और मुझे पलटकर मेरे चूतड़ों की तरफ से खड़े-खड़े ही अपने लण्ड को मेरी चूत में घुसाने लगे।
आज दिन भर से लंड ले-लेकर बस मैं तड़पी थी.. इसलिए मेरी फुद्दी काफी पानी छोड़ कर चुदने के लिए मचल रही थी।
तभी जेठ ने मेरी चूत पर शॉट लगा कर अपने लण्ड को मेरी चूत में उतार दिया। 
देखते ही देखते जेठ का पूरा लंड मेरे अन्दर था और वे झटके देकर मेरी चूत का बाजा बजाने लगे। मैं घोड़ी बनी हुई पीछे को चूतड़ और चूत धकेल कर अपनी बुर मराने लगी।

‘गपागप्प..’ जेठ का लण्ड मेरी चूत में अन्दर-बाहर हो रहा था। मैं ज़ोर से चुदने का मजा ले रही थी ‘आआआ.. सस्स्स्स स्स्सस्स.. ओह्ह.. हाय.. उम्म्म्मम.. सस्सस्स ज़ोर से.. अहह अहह.. चोदो आहह्ह्ह्.. मैं गई आहह्ह्ह!’
मेरी कामुक सिसकारी सुनकर जेठ जबरदस्त तरीके से चूत की कुटाई करने लगे और मैं भी ताबड़तोड़ लण्ड के झटके पाकर निहाल हो उठी।
मेरी चूत ने पानी छोड़ दिया ‘आहह्ह्ह् सीईईई.. मेरी चूत आपके लण्ड की रगड़ पाकर झड़ रही है.. मेरे प्रीतम.. आह्ह..’
जेठ के मस्त झटकों से चूत झड़ने लगी.. पर जेठ का लण्ड अब भी मेरी चूत को ‘भचाभच’ चोद रहा था।
जेठ मेरे छातियों को मसकते हुए मेरी फुद्दी की अपने लण्ड से ताबड़तोड़ चुदाई करते जा रहे थे, मेरी झड़ी हुई चूत में जेठ का लौड़ा ‘फ़च-फ़च’ की आवाज करता मुझे चोदता जा रहा था।


RE: Sex Kahani ह्ज्बेंड ने रण्डी बना दिया - sexstories - 06-19-2018

तभी जेठ सिसियाकर बोले- बहू मेरा लण्ड भी.. हाय रे.. गया.. मेरा लौड़ा निकला.. माल.. हाय रे.. निकला।’
अपना वीर्य निकलने से पहले ही जेठ ने अपना लण्ड बाहर खींच लिया और लण्ड मेरे मुँह तक लाकर तेज-तेज हाथ से हिलाते हुए मेरे मुँह पर माल की पिचकारी मारने लगे।
‘आह.. बहू लो पी लो.. मेरे वीर्य को.. आहह्ह्ह् बह्ह्ह्हू..’ 
उन्होंने मेरे होंठ पर जैसे ही वीर्य गिराया.. मैंने मुँह खोल कर जेठ का लौड़ा अपने मुँह में ले लिया। जेठ जी मेरे मुँह के अन्दर ही पानी छोड़ने लगे और मैं उनका सारा वीर्य पी गई और जेठ का लण्ड पूरा चाट कर साफ़ कर दिया।
फिर मैंने अपने होंठों से चेहरे का वीर्य भी जीभ निकाल कर चाट लिया। हम दोनों की वासना का सैलाब आकर जा चुका था। सुबह से मेरी प्यासी चूत को राहत मिल चुकी थी। 
तभी मुझे संतोष का ध्यान आया कि वो भी तो घर में ही है। मैं जेठ से बोली- भाई साहब मैं तो चूत चुदवाने के नशे में भूल गई थी.. पर आप भी भूल गए कि संतोष घर में ही है। उसने हम लोगों को देख लिया होगा तो क्या होगा.. आप जाईए और देखिए कि वह कहाँ है?


RE: Sex Kahani ह्ज्बेंड ने रण्डी बना दिया - sexstories - 06-19-2018

जेठ जी के जाने के बाद मैं भी बाथरूम जाकर फ्रेश हुई और बाहर आई तो देखा कि जेठ जी बाहर ही बैठे हैं..
मुझे देखकर बोले- सब ठीक है। 
मैं भी संतोष के कमरे की तरफ गई.. संतोष अपने कमरे में नहीं था, मैं बाथरूम से आती आवाज सुनकर बाथरूम की तरफ चली गई और ध्यान से आवाज सुनने की कोशिश करने लगी शायद अन्दर संतोष कुछ कर रहा था। यह देखने के लिए कि वह कर क्या रहा है.. मैं दरवाजे के बगल में बने रोशनदान से संतोष को देखने के लिए वहाँ रखी चेयर के ऊपर चढ़कर देखने लगी। 
यह क्या..! बाथरूम के अन्दर के हालात को देखकर मैं चौंक गई.. संतोष पूरी तरह नंगा था और अपने हाथ से अपने लण्ड को हिलाते हुए मेरे नाम की मुठ्ठ मारते मेरी चूत और चूचियों का नाम ले कर लण्ड सौंट रहा था। संतोष का लण्ड भी काफी फूला और मोटा लग रहा था।
सुपारा तो देखने में ऐसा लग रहा था जैसे लवड़े के मुहाने पर कुछ मोटा सा टोपा रखा हो। लेकिन ज्यादा चौंकने की वजह यह थी कि एक 19 साल का लड़के का इतना फौलादी लण्ड.. बाप रे बाप..
आइए मैं आपको सुनाती हूँ कि कैसे मेरा नाम लेकर मेरा ही नौकर अपना लण्ड सौंट रहा था।
‘आहह्ह्ह.. डॉली मेम्म्म् साहब.. क्या तेरी चूत है.. क्या तेरे मस्त लचकते चूतड़ हैं.. और हाय तेरी चूचियाँ.. तो मेरी जान ही ले रही हैं.. आहह्ह.. ले खा मेरे लौड़े को अपनी चूत में.. आहह्ह.. डॉली मेम्म्म्म्म साससाब.. गया मेरा लौड़ा.. तेरी चूत में.. आह सीईईई.. मैं गया.. आह.. मेम्म्म्म्म साब.. तेरी चूत में मेरा लौड़ा पानी छोड़ रहा है..’
यह कहते हुए संतोष का लण्ड वीर्य उगलने लगा।
फिर मैं वहाँ से हट कर संतोष के सोने के लिए जो चौकी थी.. उसी पर बैठ कर संतोष की प्रतीक्षा करने लगी।
कुछ देर बाद संतोष ने बाथरूम का जैसे ही दरवाजा खोला.. मेरी और उसके निगाहों का आमना-सामना हो गया, वह मुझे देखकर उछल उठा- आअअअप यय..हाँ मेम साहब जी..!
संतोष बाथरूम से अंडरवियर में ही बाहर आ गया था, वह मुझे सामने पाकर घबराने लगा। 
‘संतोष मैं आई तो तुम यहाँ नहीं थे.. मैं जाने लगी.. तो बाथरूम से मुझे तुम्हारी कुछ आवाजें सुनाई दीं.. तो मैं रूक कर इन्तजार करने लगी। कुछ तबियत वगैरह सही नहीं है क्या संतोष?’
‘ननन…नहीं तो..’
‘तो.. फिर तुम्हारी आवाज कुछ सही नहीं लग रही थी.. क्या बात है?’
‘वो कुछ नहीं मेम्म.. बस ऐसे ही..’
‘लेकिन तुम क्यों अंडरवियर में ही खड़े हो.. कपड़े पहनो..’
‘मेम्म.. मेरे कपड़ों पर आप बैठी हैं..’
मैं भी चौंकते हुए- ओह्ह.. वो मैंने देखा ही नहीं.. मैं चलती हूँ.. तुम तुरन्त आओ काम है..
मैं वहाँ से हॉल में आकर बैठ गई।
जेठ जी रूम में थे.. तभी संतोष आ गया।
‘जी मेम साहब.. क्या काम है?’
‘तुम चाय बना लाओ और भाई साहब के साथ जाकर मार्केट देख भी लो और सब्जी भी ले लेना..’
‘ठीक है मेम साहब..’ 
फिर संतोष ने चाय बना कर दी। मैंने और जेठ ने एक साथ ही चाय पी और फिर संतोष के साथ मार्केट चले गए। मैं अकेली बैठी थी.. कुछ देर बाद मैं भी छत पर घूमने चली गई। 
मैं छत पर टहल ही रही थी कि चाचा की आवाज सुनाई दी ‘हाय मेरी जान.. कैसी हो?’ 
यह कहते हुए चाचा मेरी छत पर आकर मुझसे सटकर खड़े हो कर मेरी छाती पर हाथ रखकर मेरी चूचियों को दबाने लगे।
मैं गनगना उठी- आहह्ह्ह.. थोड़ा धीमे दबाओ ना.. बुढ़ौती में जवानी दिखा रहे हो..
‘हाँ मेरी जान.. जब लौड़ा चूत में गया था.. कैसा लगा था? बुड्ढे का कि जवान मर्द का?’
ये कहते हुए वे मेरी बुर पर हाथ ले जाकर सहलाने लगा।
‘यह क्या कर रहे हो.. कोई आ गया तो..!’
‘इतने अंधेरे में हम तुम सही से दिख नहीं रहे.. कोई आकर ही क्या देख लेगा..’
चाचा ने मुझे बाँहों में भर लिया। अपने लौड़े का दबाव मेरी बुर पर देते हुए मेरे होंठों को किस करने लगे। 
मैं भी चाचा को तड़फाने का सोच कर बोली- वह देखो कोई आ गया है..
और जैसे ही चाचा चौंक कर उधर देखने लगे.. मैं चाचा से छुड़ाकर दूर भागी.. ‘आप क्या उखाड़ोगे मेरी चूत का.. अब यह काम आपके बस का नहीं है.. यह काम किसी जवान मर्द का है।’

मैं यह सब चाचा को चिड़ाने और उकसाने के लिए कर रही थी और हुआ भी यही.. चाचा मेरी तरफ लपके.. पर मैं छत पर भागने लगी। चाचा मेरे पीछे और मैं आगे.. दाएं-बाएं करते हुए चाचा को चिड़ाती रही। 
‘अरे चचा काहे को मेरे पीछे भाग रहे हो.. बुढ़ौती है, थक जाओगे.. अब आप वह सांड नहीं रहे.. जो कभी हम जैसी गरम औरतों की चूत पर चढ़कर गरमी निकाल देते थे.. अब वह जोश कहाँ है आप में..’ 
तभी चाचा ने मुझे दबोच लिया, मुझे दबोचते हुए बोले- अब देख साली.. मैं तेरा और तेरी इस बुर और गांड का क्या हाल करता हूँ। तेरी बुर को तो मैं आज अपने इस लौड़े से चोद कर कचूमर निकाल दूँगा.. और तेरी गदराई गांड को भी आज फाड़ कर तुमको अपने लण्ड का परिचय दूँगा.. अभी तेरी ऐसी चुदाई करता हूँ.. कि हफ्ता भर तू सीधी तरह चल भी ना सकेगी..
और मुझे चाचा वहीं छत पर ही पटक कर नंगी करने लगे।
मैं मन ही मन बड़बड़ाई कि यह तो मेरा ही दांव उलटा पड़ रहा है.. इस टाईम अगर यह मेरी चुदाई चालू कर देगा.. तो ठीक नहीं रहेगा। कोई आ गया तो इसका क्या यह मर्द है.. साला निकल लेगा.. फसूंगी मैं.. किसी तरह चाचा को रोकूँ। 
‘चाच्चचाचा.. छोड़ो.. कोई आ जाएगा..!’
‘बस मेरी रानी.. बस एक मिनट रूको अभी मैं दिखाता हूँ कि बुढ्ढा किसे कहा है..’
‘मममममैं.. मजाक कर रही थी.. आप तो मर्दों के मर्द हो.. बाबा अब तो छोड़ो.. मैं रात को आऊँगी.. तब दिखाना अपनी मर्दानगी.. मैं आपको अपनी वासना दिखाऊँगी..’ 
पर चाचा मेरी चूचियों और चूतड़ों को भींचते हुए मुझे अपनी बाँहों में क़ैद करके मेरे होंठों का रस पान करने लगे। मैं चाचा की बाँहों में बस मचलती हुई चाचा की हरकतों को पाकर गरम होने लगी थी। मेरी बुर चुदने के लिए एक बार फिर फड़कने लगी और मैं चाचा की ताल से ताल बजाने लगी।


RE: Sex Kahani ह्ज्बेंड ने रण्डी बना दिया - sexstories - 06-19-2018

वहीं छत पर चाचा मेरी चूचियों को निकाल कर मुँह में लेकर चूसने लगे और अपने मोटे लण्ड के सुपारे को मेरी बुर पर चांप कर मेरी आग को भड़काने लगे।
मैं होश सम्हालते हुए बोली- चाचा कोई आ सकता है.. नीचे का गेट भी बंद नहीं है.. आज रात मेरी जमकर चूत मारना.. मैं भी आपसे चुदने को तड़प रही हूँ। 
तभी चाचा बोले- बहू छत पर अंधेरा है कोई आ गया तो भी हम दोनों को देख नहीं पाएगा.. हम लोग पूरी तरह तो नहीं ऊपरी तरह से तो मजा ले सकते हैं। प्लीज बहू साथ दो ना.. मैं हूँ ना..
अब मैं भी चाचा के सीने की गरमी पाकर चिपक गई। 
‘बहू तुम मेरे लण्ड को तो चूस ही सकती हो..’
‘जी बाबू जी.. लेकिन एक बार आप मेरी बुर चूस दो.. कोई आ जाए.. इससे पहले मैं मजा ले लूँ.. आप तो अपना काम कर चुके हो..’
मेरा इतना कहना था कि चाचा मेरी जाँघों के बीच मुँह डाल कर मेरी मुनियाँ को चाटने लगे। अपनी चूत चाचा की जीभ का स्पर्श पाकर मैं गनगना उठी, मेरे मुँह से सिसकारी फूट पड़ी- आई सीईईई.. ईईईई..
चाचा मेरी बुर की फांकों को फैलाकर मेरी चूत चाटने लगे। वे अपनी जीभ और होंठों से मेरी चूत के अंदरूनी हिस्से को चूसते हुए चाचा मुझे थोड़ी ही देर में जन्नत दिखाने लगे। मैं भी कमर उठाकर सब कुछ भूल कर अपनी चूत फैलाकर चटवाने लगी। 
तभी चाचा मेरी चूत पीना छोड़कर खड़े होकर अपना हलब्बी लण्ड निकाल कर मुझसे बोले- बहू अब तुम इसकी सेवा कर दो..
मैं भी उठकर चाचा के लण्ड को मुँह में लेकर सुपारे पर जीभ फिराने लगी।
चाचा मेरे सर को पकड़ कर मेरे मुँह में सटासट लण्ड आगे-पीछे करते हुए मेरे मुँह की चुदाई करते रहे और मैंने जी भर कर चाचा के लण्ड को चूसा। 
फिर चाचा ने मुझे वहीं दीवार के सहारे झुकाकर बोले- रानी अब चूत मार लेने दो.. रहा नहीं जाता।
‘नहीं.. अभी नहीं.. आप तो अपना माल गिरा लोगे.. और मैं प्यासी रह जाऊँगी.. अभी यह समय बुर मारने का नहीं है।’
‘अरे मेरी जान.. मैं पूरी तरह से नहीं कह रहा.. बस थोड़ा रगड़ आनन्द लेने को ही तो कह रहा हूँ.. और मेरे खयाल से तुम भी लेना चाहती हो.. क्यों ना सही कहा ना?’
‘जी आप बिल्कुल सही कह रहे हैं.. पर कोई आ सकता है..’
चाचा बोले- अगर कोई आया तो मैं यहीं रह जाऊँगा.. और तुम आगे बढ़ जाना..’ 
मेरी तरफ से कोई उत्तर न पाकर चाचा ने पीछे मेरी मिनी स्कर्ट उठा कर लण्ड मेरी चूत पर लगा दिया। अब वे एक हाथ से कूल्हों को और चूचियों मसल रहे थे और दूसरे हाथ से चूतड़ों की दरार और चूत पर लण्ड का सुपारे को दबाते हुए रगड़ने लगे।
चाचा के ऐसा करने से मैं तड़प कर सीत्कार उठी- अह्ह ह्ह्ह्ह्ह ह्ह्ह.. स्स्स्स्स स्स्स्स्स्स.. उम्म्म्म.. आहह्ह्ह.. सीईईई..
मैं सीत्कार हुए सिसक रही थी और चाचा मेरे चूत और गाण्ड वाले हिस्से को लंड से रगड़ते जा रहे थे। मैं बैचेन होकर चूतड़ पीछे करके लण्ड को अन्दर लेना चाहती थी ‘जल्दी करो ना चाचा.. कोई आ जाए.. इससे पहले आप मेरी चूत में एक बार लण्ड उतार कर मुझे मस्ती से सराबोर कर दो..’
मेरा इतना कहना सुनते ही चाचा ने मेरे कूल्हे को पकड़ कर मेरी बुर के छेद पर लण्ड लगा कर.. एक जोरदार धक्का मारा।
‘आहह्ह्ह.. माआआ.. अहह.. मररररर गई.. आपके लण्ड ने तो मेरी बच्चेदानी को ठोकर मार दी रे.. आहह्ह्ह..’ 
इधर लण्ड चूत में और उधर किसी की आहट लगी.. पर चाचा ने एक और शॉट लगा दिया.. और मैं आहट पर ध्यान ना देकर चूत पर लगे शॉट को पाकर.. फिर सीत्कार उठी- उईईई माँ.. आह्हह ह्हह.. सीईईई ईईईई.. आहह्ह्ह.. 
अब वो आहट मेरे करीब होती जा रही थी।
‘चचाचा.. ककोई.. आ रहा है..?’ 
चूत में ही लण्ड डाले हुए चाचा ने उधर देखा जिधर वह साया था और चाचा मेरे कान में फुसफुसा कर बोले- कौन हो सकता है बहू?
मैं बोली- चाचा घर में दो ही लोग हैं.. एक जेठ जी.. दूसरे आज मैंने एक नया नौकर रखा है.. इन्हीं दोनों में से कोई हो सकता है। वैसे भी चाचा चाहे जो भी हो.. पर आपकी चुदाई में खलल डाल दिया है। 
तभी उस शख्स ने आवाज दी- डॉली तुम कहाँ हो.. इतने अंधेरे में तुम छत पर क्या करने आई.?
‘यह तो जेठ जी की आवाज है..’ मैं हड़बड़ा कर थोड़ा आगे हुई और सटाक की आवाज के साथ चाचा का लण्ड चूत से बाहर हो गया।
‘जी.. मैं यहाँ हूँ.. अभी आई..’ 
लेकिन मुझे चाचा ने पकड़ कर एक बार फिर मेरी चूत में लण्ड घुसा दिया और शॉट लगाने लगे। जैसे उनको जेठ से कोई मतलब ही ना हो।
उधर जेठ जी मेरी तरफ बढ़ने लगे, इधर चाचा मेरी चूत में लण्ड डाले पड़े थे। 
मैं कसमसाते हुए बोली- चाचा छोड़ो..
‘मेरी जान, मैं तो छोड़ ही दूँगा.. पर वादा करो.. रात में मेरी मरजी से सब कुछ होगा..’
‘हाँ हाँ हाँ.. आप अभी तो जाओ..’
‘लो.. मैं जा रहा हूँ..’ ये कहते हुए मेरी चूत पर चाचा ने दो कड़क शॉट लगाकर लण्ड को बुर से खींच लिया और अंधेरे में गायब हो गए। 
इधर जेठ जी मेरे करीब आ चुके थे.. चाचा ऐसे समय पर मुझे छोड़ कर हटे कि मैं अपनी चूत को ढक भी नहीं पाई थी कि जेठ जी मेरे पास आ गए।
मैंने चारों तरफ निगाह दौड़ाई पर चाचा अंधेरे की वजह से कहीं नजर नहीं आ रहे थे। 
जेठ मेरे करीब आकर मुझे इस हाल में देख कर कुछ कहने ही जा रहे थे कि मैं जेठ को खींच कर उनके होंठों को किस करने लगी। 
मैं यह सब मैंने जानबूझ किया क्योंकि मैं ऐसा नहीं करती और जेठ बोल पड़ते तो चाचा को शक हो जाता.. जो कि वो भी अभी छत पर ही थे। 
मैं किस करते हुए बोली- मैंने आपको सरप्राइस देने के लिए ऐसा किया है.. मैं कैसी लगी.. वैसे भी आपकी चुदाई पाकर मेरी मुनिया आजकल कुछ ज्यादा ही मचल रही है और खुली छत पर आपकी याद में मुझे यह सब करना अच्छा लग रहा था।
तभी जेठ मेरी चूत को अपने हाथ भींच कर बोले- तू कहे तो जान अभी तेरी चुदाई शुरू कर दूँ?
मैंने कहा- अभी नहीं.. क्योंकि नीचे संतोष है और हम लोगों को भी चलना चाहिए। 


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हम दोनों नीचे आ गए, नीचे संतोष खाना बना रहा था और कुछ ही देर में पति भी आ गए।
हम सबने एक साथ खाना खाया और फिर सब लोग सोने चल दिए। 
मैं जब हाल की लाईट बंद करने गई.. तो जेठ ने मुझसे कहा- मैं इन्तजार करूँगा।
मैं बोली- नहीं.. आज आपके भाई मूड में हैं और मैं कोई रिस्क नहीं लेना चाहती। अब सब कुछ दोपहर में होगा.. सबके जाने के बाद..
और मैं अपने बेडरूम में चली गई और जाकर पति से चिपक गई।
मेरे ऐसा करने से पति समझ गए कि मैं चुदाई चाह रही हूँ। 
वह बोले- जान चूत कुछ ज्यादा मचल रही हो तो चोद देते हैं… नहीं तो मैं बहुत थक गया हूँ.. सोते हैं।
मैं बोली- नहीं जानू.. मैं तो आपके लिए यह सब कर रही थी कि आपको मेरी चुदाई का मन होगा।
मैंने भी ज्यादा प्रेस नहीं किया.. क्योंकि आज रात मुझे चाचा से चूत चुदानी है.. चाहे जो हो जाए। 
इसलिए सबका सोना जरूरी था। करीब आधी रात को मैं उठी और बेडरूम की लाईट जलाकर देखा कि पति बहुत गहरी नींद में थे। मैं लाईट बंद करके बाहर निकल आई और हॉल में मद्धिम प्रकाश में मैंने टोह लिया.. जेठ के कमरे से भी कोई आहट नहीं मिली।
अब मैं पैर दबाकर सीधे छत पर पहुँच कर सारे कपड़े निकाल कर वहीं दीवार पर रख दिए और मैं दीवार फांद कर उस पार बिल्कुल नंगी अंधेरे में चलती हुई चाचा के कमरे तक पहुँची।
मैंने जैसे ही रूम खोलना चाहा.. किसी ने मुझे दबोच लिया और एक हाथ से मेरे मुँह को दाबकर वह मुझे खींचकर छत के दूसरी छोर पर ले जाकर बोला- मैं तुम्हारे मुँह को खोल रहा हूँ.. अगर तुम चिल्लाई, तो बदनामी भी तुम्हारी होगी। 
वह बात भी सही कह रहा था मैं बिलकुल नंगी किसी दूसरे की छत पर क्या कर रही हूँ.. मेरी हया और हालत इस बात की चीख-चीख कर गवाही दे रही थी कि मैं चुदने आई हूँ। 
तभी उसने मुझसे कहा- तुम इस हाल में उस कमरे में क्या करने जा रही थीं?
मैं हकलाते हुए बोली- कुछ नहीं.. आप मुझे जाने दो प्लीज.. 
‘मैं जाने दूँगा तुमको.. जब तुम यह बता दोगी कि तुम यहाँ क्या करने आई थीं.. कमरे में चाचा जी हैं और तुम उस कमरे में क्यों जा रही थीं?
मैंने बहुत मिन्नतें कीं.. पर उस शख्स ने मेरी एक ना सुनी।
अंत में मुझे बताना पड़ा कि मैं यहाँ चुदने आई थी चाचा से.. 
यह जान कर उसने मुझे बाँहों में भर लिया और बोला- उस बुढ्ढे के साथ अपनी जवानी क्यों बरबाद कर रही हो मेरी जान.. तुम्हारी जवानी मेरे जैसे मर्दों के लिए है।
‘पर आप ने कहा था.. कि आप मुझे जाने दोगे..’ 
मैंने ये कहते हुए भागना चाहा.. लेकिन उसने मुझे पकड़ कर बिस्तर पर पटक दिया और मेरे ऊपर चढ़कर बोला- आपके जैसा माल पाकर छोड़ने वाला बहुत बड़ा बेवकूफ ही होगा और तुमको एतराज भी क्या है.. जब कि तुम एक बुड्ढे से चूत मराने आई थी और तुम्हारा तो भाग्य ही है कि यहाँ एक जवान गबरू मर्द से पाला पड़ गया। 
लेकिन मेरा वजूद यह करने को मना कर रहा था.. मैं छटपटाती रही.. पर वह मेरे ऊपर पूरा हावी था। उसके सामने मेरी एक नहीं चली और मैं उसकी बाँहों और छाती में छटपटा कर रह गई।
‘आप कौन हो और यहाँ छत पर क्या कर रहे हो..?’
‘मैं किराएदार हूँ और यहाँ तुम्हारा इन्तजार कर रहा था..’ 
‘क्क्या..क्या मतलब आपका..? मेरा इन्तजार?’
‘हाँ जान.. मैं तुम्हारा ही इन्तजार कर रहा था.. मैं तुम्हारी और चाचा की सारी बातें सुन चुका था.. आज मैं यहाँ सो रहा हूँ। चाचा को पता भी नहीं है।’
मैं उसकी बात सुनकर अवाक रह गई।
तभी उसने मेरी चूचियों को मुँह में भर लिया और चूसने लगा।
‘आआआअह्ह ह्ह्ह… प्लीज मत करो.. मुझे जाने दो..’ 
पर वह मेरी बात सुन ही नहीं रहा था। मुझे वहीं बाँहों में कस कर मेरे होंठ चूसने लगा.. मेरी नंगी चूचियाँ दबाने लगा और उसकी हरकतों से मैं भी पागल होने लगी। 
मैं कब तक अपनी इच्छाओं का गला घोंटती.. आखिर आई तो थी चुदाने ही.. लण्ड बदल गया.. तो क्या हुआ.. चूत यही है.. और लण्ड… लण्ड होता है। मैं अपनी कामवासना में पागल हो रही थी। मेरी चूत से पानी निकल रहा था और एक अजनबी मेरी दोनों चूचियों को बारी-बारी से मसल रहा था और चूस रहा था।
मैं उसकी दूध चुसाई से पागल सी हो गई और उसका एक हाथ पकड़ कर अपनी चूत पर ले गई और उसी के साथ सीत्कार उठी ‘आहह्ह्ह् सीईईई..’ 
उसने भी मेरी चूत को मुठ्ठी में भींच लिया ‘आहह्ह्ह्.. आया मजा ना जान.. तुम जाने को कह रही थीं।’ 
वो अपने तौलिए को खोल चुका था और मेरे हाथ को ले जाकर अपने लण्ड पर रख दिया। जैसे ही मेरा हाथ उसके लण्ड को छुआ.. मैं चौक गई.. बहुत अजीब तरह का लण्ड था.. सुपारा बहुत ही मोटा था.. जैसे कुछ अलग से लगा हो। यह तो मेरी बुर में जाकर फंस जाएगा और खूब चुदाई होगी। मैं उस अजनबी की बाँहों को पाकर.. चुदने को बेकरार हो रही थी। यही हाल उसका भी था.. वह भी मेरी चूत को जल्द चोद लेना चाहता था। 
मैं बड़बड़ाते हुए बोलने लगी- ओह.. आहह्ह्ह.. अब अपनी भाभी को चोद दे.. अब नहीं रुका जा रहा.. अपने लण्ड को मेरी चूत में घुसा दे.. पेल दे अपने लंड को मेरी चूत में.. प्लीज़ अब चोदो ना..
तभी वह मेरी टांगों के बीच आ गया और अपने लण्ड का सुपारा मेरी चूत के मुँह पर रख कर धक्का लगाने लगा।
लेकिन उसके लण्ड का सुपारा बहुत मोटा था। सही से मेरी चूत में जा ही नहीं रहा था।
मैंने खुद ही अपना हाथ ले जाकर चूत को छितरा कर उसके लण्ड के सुपारे को बुर की दरार में लगा कर जैसे ही कमर उठाई.. वह मेरा इशारा समझ गया।
उसने मेरी चूत पर एक जोर का शॉट खींच कर लगाया। उसका लण्ड मेरी चूत को चीरता हुआ लण्ड अन्दर घुसता चला गया.. मेरी चीख निकल गई।
मेरी चीख इतनी तेज थी रात सन्नाटे को चीरती दूर तक गई होगी। उसने भी घबड़ाहट में एक शॉट और लगा दिया और पूरा लण्ड चूत में समा गया। 
मैं कराहते हुए बोली- हाय.. मैं मर गई.. आहह्ह्ह..
वह मेरी कराह देख कर काफी देर तक चूत में लण्ड डाले पड़ा रहा।
मुझे ही कहना पड़ा- चोदो ना.. मेरी चूत.. बहुत उछल रहे थे.. क्या हुआ..? 
मेरी बात सुन कर उसने धीरे-धीरे धक्के लगाने शुरू कर दिए। मुझे मज़ा आने लगा और मैं भी अपने चूतड़ों को हिला-हिला कर उसका साथ देने लगी। मेरे मुँह से बड़ी ही मादक आवाजें निकल रही थीं।
मैं सिसकारी लेकर कहने लगी- आहह्ह्ह सीईईई.. उफ्फ्फफ्फ.. आहह्ह्ह् सीईईई प्लीज़.. ज़ोर से धक्का लगाओ और मेरी चूत का जम कर बाजा बजाओ।
उसके मोटे लण्ड का सुपारा मेरी बुर में पूरा कसा हुआ जा रहा था।
मेरे मुँह से ‘स्स्स्स्स आह.. आहह्ह्ह् ईईईसीई..’ जैसी मादक आवाजें निकल रही थीं। वह मेरी चूत पर खींच-खींच कर शॉट लगा कर मेरी चुदाई करता जा रहा था।


RE: Sex Kahani ह्ज्बेंड ने रण्डी बना दिया - sexstories - 06-19-2018

मैं उसके शॉट और उसके मजबूत लण्ड की चुदाई पाकर झड़ने के करीब पहुँच गई। मैं चूतड़ उठा-उठा कर उसके हर शॉट को जवाब देने लगी। वह अपनी स्पीड और बढ़ा कर मेरी चूत चोदने लगा।
‘आहह्ह उईईई.. न.. ईईईई.. स.. ईईईई मम्म्मग्ग्ग्ग्गईईईई.. आहह्ह्ह..’ 
उसके हर शॉट पर मेरी चूत भलभला कर झड़ने लगी ‘आहह्ह्ह्.. मेरा हो गया.. तेरा लण्ड मस्त है रे.. मेरी चूत तू अच्छी तरह से बजा रहा है.. आहह्ह्ह् सीईईई..’
वह भी तीसेक शॉट मार कर अपने लण्ड का पानी मेरी बुर की गहराई में छोड़ने लगा।
वह भी 20-25 शॉट मार कर अपने लण्ड का पानी मेरी बुर की गहराई में छोड़ने लगा.. जिस तरह दाने-दाने पर खाने वाले का नाम लिखा होता है.. उसी तरह हर चूत पर चोदने वाले का नाम लिखा होता है। 
अब आप ही खुद देखो.. आई थी किससे चुदने.. और चुद किससे गई..
यह भी बिल्कुल सही होता है जिसके भाग्य में जो लिखा होता है.. वह मिलता ही है.. मेरी मुनिया के भाग्य में एक अजनबी का लण्ड लिखा था.. जो उसे मिला। 
अब मैं आपको आगे की कहानी बताती हूँ।
उस रात उसने मेरी चूत का जम कर बाजा बजाया और मैं भी खुलकर उसका साथ देकर खूब चुदी.. ना उसने मुझे जाने दिया और ना ही मेरी चूत को उससे अलग होने का मन हुआ। 
मैं सारा डर निकाल कर छत पर पूरी रात चुदती रही.. लण्ड और चूत एक लय में ताल मिला कर चुदते रहे.. उसने आखरी बार मेरी गाण्ड को बजाया.. मैं पूरी तरह उसकी होकर चूत और गाण्ड में लण्ड लेती रही। उस रात भोर तक उसने तीन बार मेरी चुदाई की..
मैं पूरी तरह उसके वीर्य से नहाकर.. चूत जम कर मरवा कर.. छत से नीचे चली आई और मैं सीधे बेडरूम में जाकर बाथरूम में घुस गई और अपने बदन पर लगे वीर्य को साफ करके मैं पति के बगल में सो गई।
मेरी नींद पति के जगाने पर खुली, फिर मैंने बाथरूम जाकर नहाकर कपड़े पहन लिए। तब तक पति और जेठ नाश्ता कर चुके थे। मैं भी चाय पीकर पति के ऑफिस जाने के लिए तैयारी में हाथ बंटाने लगी।
तभी पति ने कहा- रात में मेरी नींद खुली.. तुम नहीं थीं.. कहाँ चली गई थीं?
पति के ऐसा पूछने पर मैं सकपका गई।
अब क्या जबाब दूँ.. लेकिन मैंने बात को बनाकर जबाब दे दिया- मुझे नींद नहीं आ रही थी.. इसलिए मैं छत पर चली गई थी और वहीं जमीन पर लेट गई थी.. क्यों कोई काम था क्या? 
‘नहीं काम नहीं था.. बस नींद खुली तो तुमको ना साथ पाकर पूछ लिया।’
‘ओह जनाब का इरादा क्या है.. कहीं यह तो नहीं कह रहे हो कि मैं चुदने चली गई थी। आप तो मेरी चूत देखकर बता देते हो कि चुदी है या नहीं.. देखो चुदी है या नहीं..’
‘नहीं जान.. मुझे भरोसा है.. जब भी कोई तेरी चूत लेगा या तुम्हारा दिल किसी पर आ गया और तुम चुदा लोगी तो मुझे बता दोगी। मेरे तुम्हारे बीच छुपा ही क्या है।’
इस बात पर मैं और पति एक साथ हँस दिए। 
फिर पति ने कहा- मुझे कुछ काम से इलाहाबाद जाना है.. मैं भाई साहब को ऑफिस का काम देखने के लिए साथ लेकर जा रहा हूँ.. हो सकता है.. कि आने में रात हो जाए..
यह कहते हुए पति और जेठ जी चले गए.. मैं रात भर तबीयत से चुदी थी.. मेरी चूत फुलकर कुप्पा हो चुकी थी.. मुझे थकान महसूस हो रही थी इसलिए मैं भी नाश्ता करके और संतोष को काम समझा कर बेडरूम में आराम करने चली गई।
घर में मेरे और संतोष के सिवा कोई भी नहीं था.. इसी लिए मैंने एक शार्ट स्कर्ट पहन ली.. ऊपर एक बड़े गले का टॉप डाल कर.. बिस्तर पर लेटकर.. रात भर हुई चुदाई के विषय में सोचते हुए मुझे नींद आ गई। 
मेरी नींद संतोष के जगाने से खुली ‘मेम साहब आप खाना खा लो..’ 
मैंने बेड पर लेटे हुए ही घड़ी देखी.. दो बज रहे थे। तभी मेरा ध्यान संतोष के पहने तौलिए पर गया.. तौलिए के अंदर उसका लण्ड का उभार साफ दिख रहा था। संतोष का लण्ड इस टाईम पूरे उफान पर था। इसका मतलब संतोष यहाँ मेरे कमरे में काफी समय से था और इसने कुछ देखा जरूर है। मैं भी आजकल पैन्टी नहीं पहनती थी.. एक तो मेरी स्कर्ट भी जाँघ को पूरी तरह ढकने में सक्षम नहीं थी। 
तभी मैंने गौर किया कि संतोष की निगाहें मेरी जाँघ के पास ही है- और उसका लण्ड तौलिए में उठ-बैठ रहा है। मैं अपने एक पैर को मोड़े हुए थी..
शायद इसी वजह से मेरी चूत या चूतड़ दिख रहे हों। मैंने एक चीज पर और गौर किया कि वह केवल तौलिए में था। शायद नीचे अंडरवियर भी नहीं पहने हुए था और वो ऊपर बनियान भी नहीं पहने था।
तभी मैं संतोष से पूछ बैठी- क्या तुम नहा चुके हो संतोष?
‘ज..ज्ज्ज्जी मेम्म्म.. स्स्स्साह्ह्हब..’ 
संतोष का खड़ा लण्ड देखने से मेरी चूत एक बार फिर चुदने को मचल उठी और मैं ‘तबियत ठीक नहीं है’ का बहाना करके बोली- संतोष तुम खा लो.. मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं है.. मैं नहीं खाऊंगी।
‘क्या हुआ.. मेम साहब आपको..?’ 
‘बदन में बहुत दर्द है संतोष..’
‘क्या मैं दवा ला दूँ?’ 
‘नहीं रे..’ मैं अगड़ाई लेते हुए बोली।
‘दवा की जरूरत नहीं.. फिर क्या चाहिए मेम?’
‘तेरा लण्ड..’ मेरे मन में आया ऐसा कह दूँ..
‘नहीं रे.. तू जा.. खाकर सो जा.. थक गया होगा।’
बोला- मैं क्या कर सकता हूँ.. मेम साहब आपके लिए और आप दवा नहीं लोगी तो ठीक कैसे होगी? 
‘मेरे बदन का पोर-पोर दु:ख रहा है.. आहह्ह्ह्.. कोई मालिश कर देता तो कुछ राहत मिलती।’ 
कुछ देर चुप रहने के बाद वह बोला- आप कहें तो मैं कर दूँ मालिश?’
‘तुमको करना आता है.. क्या रे?’
“हाँ मेम साब.. मैं बहुत बढ़िया मालिश करता हूँ।’ संतोष चहकते हुए बोला। 
‘चल तब तू ही कर दे.. पर बिस्तर पर नहीं.. चादर गंदी हो जाएगी। वहाँ हाल में लगी चौकी पर एक दूसरी चादर बिछा.. मैं वहीं आती हूँ।’ 
संतोष ने जल्दी से एक चादर लेकर चौकी पर डाल दी।

मैं धीमे-धीमे चलते हुए चौकी पर लेटने से पहले अपने टॉप को निकाल कर केवल ब्रा और स्कर्ट में लेट गई। मेरी ब्रा में कसी चूचियों को देख कर संतोष एकटक मुझे देखने लगा। 
‘क्या देख रहे हो संतोष.. जल्दी से मेरी मालिश कर.. मेरा अंग-अंग टूट रहा है रे..’ 
मेरा इतना कहना था कि संतोष दौड़कर गया और तेल की शीशी ले आया और मुझसे बोला- मेम साहब सबसे ज्यादा दर्द कहाँ है?
‘हर जगह है रे.. तू सब जगह मालिश कर दे.. अच्छा रूक मैं ब्रा भी निकाल दूँ.. नहीं तो तेल लग जाएगा।’ 
और मैं ब्रा खोल कर निकाल कर संतोष को देते बोली- ले.. इसे उधर रख दे। 
मैं एकदम लापरवाह बन रही थी.. जैसे संतोष की मौजूदगी से और मेरी नंगी चूचियों से कोई फर्क नहीं पड़ता है। मैं पेट के बल लेट गई. संतोष अब भी वैसे ही खड़ा था। 
‘कर ना मालिश!’ 


RE: Sex Kahani ह्ज्बेंड ने रण्डी बना दिया - sexstories - 06-19-2018

तभी संतोष का हाथ मेरी पीठ पर पड़ा मेरा शरीर गनगना उठा। वह धीमे से हाथ चलाते हुए मालिश करने लगा। वह मेरी पूरी पीठ पर हाथ फिराते हुए मालिश करने लगा।
जब मैंने देखा कि वह मेरे पीठ और कमर के आगे नहीं बढ़ रहा है.. तो मैं बोली- संतोष मेरे पैर और जाँघ में भी मालिश कर न.. 
तभी वह अपने हाथ पर ढेर सारा तेल लेकर धीरे-धीरे मेरे पैरों की ओर से जाँघों तक मालिश करता रहा।
मैं बोली- संतोष तू मेरे लिए कुछ गलत तो नहीं सोच रहा है.. मालिश पूरी तरह नंगे होकर ही कराई जाती है।
‘नहीं मेम..’
‘फिर तू इतना काहे डर रहा है.. मेरे पूरे शरीर की मालिश कर ना..’ 
मेरा इतना कहना था कि वह मेरी जाँघों से होता हुआ स्कर्ट के नीचे से ले जाकर मेरे चूतड़ और बुर की दरार.. सब जगह हाथ ले जाकर मुझे मसलने लगा। 
काफी देर तक मेरी जाँघों और चूतड़ों पर मालिश करता रहा। संतोष के हाथ से बार बार चूतड़ और बुर छूने से मेरी चुदास बढ़ गई और मैं मादक अंगड़ाई लेते हुए सिसकने लगी।

‘आहह्ह्ह उउईईईईई आहह..’
‘क्या हुआ मेम साहब?’
‘कुछ नहीं संतोष.. मेरे बदन में दर्द है इसी से कराह निकल रही है।’ मैं यह कहते हुए पलट गई।
अब मेरी चूचियाँ और नाभि संतोष की आँखों के सामने थे, वह मालिश रोक कर एकटक मुझे देख रहा था। 
‘संतोष मालिश करो ना आहह्ह्ह..’ और मैंने संतोष का हाथ खींच कर अपनी छाती पर रख दिया। 
‘इसे मसलो.. इसमें कुछ ज्यादा दर्द है.. संतोष आई ईईईई.. सीईईई..’ 
संतोष मेरी छातियों को भींचने लगा, मैं सिसकती रही और अब संतोष की भी सांसें कुछ तेज हो चुकी थीं।
संतोष का एक हाथ मेरी चूचियों पर था.. दूसरा मेरी नाभि और पेट पर घूम रहा था। 
संतोष मेरी चूचियों की मालिश में इतना खो गया था कि उसका तौलिया खुल गया था और उसमें से उसका लण्ड बाहर दिख रहा था। 
मैं संतोष का एक हाथ अपनी जाँघ पर रख कर उसे दबाने को बोली और मैंने अपने हाथ को कुछ ऐसा फैला दिया कि संतोष का लण्ड मेरे हाथ से टच हो।
अब मैंने आँखें मूंद लीं, मेरे मुँह से सिसकारी फूट रही थीं।
अब संतोष कुछ ज्यादा ही खुल के मालिश कर रहा था। 
सन्तोष मेरे उरोजों की मालिश में इतना मस्त हो गया था कि उसका तौलिया खुल कर उसमें से उसका लंड बाहर झांक रहा था। 
मैंने सन्तोष का एक हाथ अपनी जाँघ पर रखा और उसे दबाने को कहा। साथ ही मैंने अपना हाथ कुछ ऐसा फैला दिया कि सन्तोष का लंड मेरे हाथ से छुए।
अब मेरे मुख से सिसकारी फूट रही थी, मैंने आँखें बंद लीं, और संतोष भी ज्यादा ही खुल कर मालिश करने लगा था। 
मैंने अपना हाथ धीमे धीमे संतोष के लण्ड के करीब करते हुए लण्ड से सटा दिया, संतोष के लण्ड का सुपारा मेरे हाथ से छू रहा था, मैं आँखें मूँदे हुए संतोष के सुपारे को स्पर्श कर रही थी।
संतोष मेरे बदन की गर्मी पाकर कर बेहाल होते हुए मेरी चूचियों और नाभि के साथ चूत के आसपास के हिस्से पर हाथ फिरा कर मालिश कर रहा था।
तभी मैंने अपना एक हाथ ले जाकर संतोष के हाथ पर रख कर उसको अपने पेट से सहलाते हुए स्कर्ट के अंदर कर दिया।
जैसे ही संतोष का हाथ मेरी चूत पर पहुँचा, मेरी सिसकारी निकल गई- आहह्ह्ह संतोष यहाँ मालिश कर… यहाँ कुछ ज्यादा ही दर्द है!
संतोष का लण्ड बाहर आकर फुफकार रहा था, मैं अभी भी आँखें बंद किए हुए थी।
अब संतोष का हाल बुरा हो चुका था, वह अब पूरी तरह मेरे शरीर के उस हिस्से को रगड़ रहा था और अपने लण्ड को भी मेरे शरीर के कुछ हिस्सों पर दबा देता।
संतोष की वासना जाग चुकी थी, वह मेरी चूत को मुठी में भर कर दबा देता और कभी मेरी चूचियों को भींचता!
संतोष अब यह सब खुलकर कर रहा था।
तभी संतोष ने मेरे स्कर्ट को खींचकर निकाल दिया, अब मैं मादर जात नंगी थी अपने नौकर के सामने और नौकर भी पूरा नंगा हो चुका था।
संतोष मेरी चूत पर तेल गिरा कर मालिश करते हुए कभी एक अंगुली अंदर सरका देता और कभी फांकों को रगड़ रहा था।
मैं चुपचाप लेट कर संतोष के हाथ का मजा ले रही थी और संतोष भी मेरे जिस्म को देख कर बहक चुका था। वह नौकर और मालिक के रिश्ते को भूल चुका था, यही हाल मेरा भी था, मैं भी सब कुछ भूल आगे की एक नई चुदाई का इन्तज़ाम कर चुकी थी।
संतोष के हाथ मेरे शरीर पर फ़िसलने लगे, उसकी हरकतें मुझे उत्तेजित करने के लिए काफी थी, मुझे स्वयं ही चुदने की बेचैनी होने लगी।
जैसे ही वो मेरे चेहरे की ओर आया, मैंने ही पहल कर दी… उसके लण्ड को अपनी एक अंगुली से दबा दिया, मैं यह जाहिर नहीं करना
चाह रही थी कि मैं कुछ और चाहती हूँ!
मैं इतनी जल्दी नौकर की बाहों में समाना भी नहीं चाह रही थी, मेरा इरादा बस उसे आगे होने वाली चुदाई के लिए तैयार करना था।
पर मैं संतोष का साथ पाक फ़िसल रही थी।
तभी संतोष ने मेरी बुर की फांकों को मुठ्ठी में भर कर दबाया और मेरे मुख से एक तेज सिसकारी निकली- आहह्ह्ह उईईईई सीईई…
संतोष- क्या हुआ मैम… दर्द कुछ ज्यादा है क्या?
मैं कुछ नहीं बोली।
तभी मुझे महसूस हुआ कि मेरी चूत पर जैसे कोई गर्म-गर्म सांस छोड़ रहा हो, मैंने थोड़ी आँख खोल कर देखा…
यह क्या?
संतोष तो मेरी चूत के बिल्कुल करीब है और मेरी चूत चाटने जा रहा है!
मैंने अनजान बन कर आँखें मूँद ली।
और तभी बाहर से बेल बज उठी, मैं चौंक कर बोली- संतोष कौन होगा? मैं अंदर जा रही हूँ, तुम कपड़े ठीक करो और जाकर देखो कि कौन है!
मैं वहाँ से नंगी हालत में ही रूम में भागी, रूम में पहुँच कर मैं दरवाजे को बंद करके दरार में आँख लगा कर देखने लगी कि कौन है।
तब तक संतोष भी कपड़े सही करके दरवाजा खोलने गया।
जब वह हाल में पहुँचा तो उसके साथ एक हट्टा कट्टा मर्द साथ आया जिसे वह सोफे पर बैठने को बोल कर किचन में गया और पानी का गलास भर कर उस अजनबी के सामने रख कर कुछ कहा और फिर मेरी तरफ बढ़ा।
मैं दरवाजे से हट गई, संतोष अंदर आकर बोला- मैम, वह आप से मिलने आया है, अपना नाम बबलू बताया है और बोला आप से ही
काम है।
मैं बोली- मैं तो उसे जानती तक नहीं… कौन है, कहाँ से आया है और क्या काम है?
‘वह कह रहा था कि यही बगल में रहता है, आप उसे जानती हो यही बोला’
मैंने इसके आगे कुछ और बोलना ठीक नहीं समझा, मैंने एक चीज ध्यान दी संतोष की नजर झुकी थी।
‘संतोष, तुम एक काम करो, उसे बोलो कि वेट करे, मैं आती हूँ।’
‘और एक बात संतोष… तुम्हारे हाथों में जादू है रे… मेरे बदन का सारा दर्द दूर कर दिया रे तूने- मुझे नहीं पता था कि तू मसाज भी कर लेता है!


RE: Sex Kahani ह्ज्बेंड ने रण्डी बना दिया - sexstories - 06-19-2018

मेरे इतना कहने से संतोष एक बार फिर मेरी चूचियों और चूत को घूर रहा था, मैं अब भी नंगी थी।
वह कुछ देर घूरता रहा और जैसे जाने को हुआ, मैंने बुलाया उसे- संतोष सुन तो जरा यहाँ आ!
और करीब वह मेरे से बिल्कुल सटकर खड़ा हो गया, मैंने उसके हाथ को ले जाकर चूत पर रख दिया और बोली- थोडी दर्द यहाँ रह गई है रे!
संतोष ने भी मौके का पूरा फायदा उठाया, उसने कसकर मेरी चूत को दबाकर चूत की दरार में एक अंगुली डाल दी।
‘आहह्ह्ह सीईईई… संतोष जाओ तुम चाय बनाओ… मैं आती हूँ!’ कहते हुए चूत पर से संतोष का हाथ हटा कर शरीर पर लगे तेल को साफ करने बाथरूम चली गई।
मैं सीधे बाथरूम में जाकर शावर चला कर मस्ती से अपने शरीर और चूत पर साबुन लगा कर मल मल कर धोने के बाद नंगी ही बेडरूम में आकर शीशे के सामने खड़े होकर मैं अपने नंगे बदन को निहारने लगी।
तभी मुझे ध्यान आया कि कोई मेरा इन्तजार कर रहा है!
मैं पहले से ही संतोष से मालिश करा कर पूरी गर्म थी, मुझे चुदाई चाह रही थी, संतोष से बूर और चूचियाँ मसलवा कर मेरे ऊपर वासना हावी हो चुकी थी, मैं दरवाजे से उस हट्टे कट्टे इन्सान को पहले ही देख कर मस्त हो गई थी।
तभी मेरे दिमाग में एक शरारत आई कि क्यों न थोड़ा और मजा लूँ!
मैंने अपनी चिकनी चूत पर एक बहुत ही छोटी स्कर्ट पहन कर और ऊपर एक बिना बांह की बनियान पहन ली।
मैंने अपनी आदत के अनुसार ब्रा पहनी लेकिन पेंटी नहीं पहनी।
मेरी स्कर्ट जो मेरी जांघ नहीं ढक सकती थी, बिना पेंटी के चूत दिखाने को काफी थी।

मैं तैयार होकर बाहर आई तो देखा कि वह चाय पी रहा था।
मैं नमस्ते कह कर उसके सामने बैठ गई।
एक झलक में लगा कि मैंने कहीं देखा है इसे पर मुझे याद नहीं आया।
‘कहिये क्या काम है आपको?’
वह इधर उधर देखकर बोला- चूत का रसपान करने आया हूँ।
मैं उसकी बात सुनकर चौंक गई, कहाँ मैं इसे रिझाने आई थी, कहाँ यह खुला आमंत्रण!
लेकिन सीधे सीधे ऐसी बात बोलने की इसकी हिम्मत कैसे हुई, मैं थोड़ा गुस्से में चौंकने का अभिनय करके बोली- क्या? आप इतनी गन्दी बात और बिना डरे मेरे ही घर में बैठ कर कर रहे हो? आपकी इतनी हिम्मत?
तभी वह फिर बोला- हाँ जान, मैं यहाँ सिर्फ आपकी चूत चोदने आया हूँ, आपकी चाहत मुझे यहाँ खींच लाई है, मैं आपकी जवानी का रस पीने आया हूँ।
उसने दूसरी बार खुली चुदाई की बात बोल कर मेरी बोलती ही बंद कर दी, इस तरह बिना डरे अगर यह खुली चुदाई की दावत दे रहा है मेरे ही घर में बैठकर… तो जरूर कुछ बात है।
मैं फिर भी गुस्से में उसके ऊपर बिफर पड़ी, चल उठ यहाँ से भाग… तेरी इतनी हिम्मत? मेरे सामने इतनी बेहूदगी!
मैं कहते हुए उठ खड़ी हो गई, वह मेरे साथ ही उठ गया पर उसके चेहरे को देखकर नहीं लग रहा था कि वह मेरी बातों से डरा हो या कुछ ऐसा नहीं दिखा।
बल्कि वह एक झटके से मेरे करीब आकर, मुझे बाहों में भर कर मेरी चूचियों को भींच कर मेरे होटों का रसपान करने लगा।
घबराना उसे चाहिए… घबरा मैं रही थी!
अगर संतोष ने देख लिया तो क्या सोचेगा कि मैं कितनी गन्दी हूँ।
मैं उसकी बाहों से छूटने के लिए छटपटाने लगी पर उसने एक हाथ मेरी स्कर्ट डाल कर मेरी खुली चूत को भींच लिया।
तभी मुझे संतोष के आने की आहट हुई और मैं उससे बोली- छोड़ो… मेरा नौकर आ रहा है, मुझे ऐसे देखेगा तो क्या समझेगा!
मेरा इतना कहना था कि उसने मुझे छोड़ दिया और जाकर निडरता से सोफे पर बैठ गया।
मैंने उससे पूछा- आप इतनी गन्दी बात बोल रहे हो, वो भी एक अनजान घर में आकर और एक अनजान औरत के सामने… आपकी हिम्मत यह सब बोलने की कैसे हो गई, आप मुझे समझ क्या रहे हो, मैं लास्ट वार्निंग देती हूँ, चले जाओ नहीं तो अपने पति को फ़ोन करती हूँ।
तभी वह बोला- जी डार्लिंग, बड़े शौक से फ़ोन करना, लेकिन जरा आप अपने नौकर को बुला देती!
मैंने आवाज लगा कर संतोष को बुलाया।
संतोष जैसे ही आया, वह बोला- तुम बाहर दुकान से यह सामान लेकर आओ!
उसके पास एक लिस्ट थी जिसे उसने संतोष को थमा दिया और कुछ पैसे भी।
मैं बैठी देखती रही, तभी संतोष चला गया।
यह क्या… मुझे संतोष को जाने नहीं देना चाहिए था।
जिसकी हिम्मत इतनी है कि मेरे से गन्दी और खुली चुदाई की बात कर रहा है वह अकेले में क्या करेगा।
मैं यही सोच ही रही थी कि तभी वह एक झटके से उठ कर मेरे करीब आया, मुझे अपनी गोद में उठा लिया और मुझे बेडरूम को ओर ले चला।


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