Sex Kahani ह्ज्बेंड ने रण्डी बना दिया - Printable Version

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RE: Sex Kahani ह्ज्बेंड ने रण्डी बना दिया - sexstories - 06-19-2018

मैं पसीने से तरबतर हो गई थी कि अब मैं क्या करूँ? अभी मैं इसी उधेड़बुन में थी कि सामने से अरुण जी आते दिखाई दिए।
मैं नार्मल होने की कोशिश कर रही थी.. पर अरुण जी पास आकर बोले- आप इधर क्या कर रही हैं और आप कुछ परेशान सी दिख रही हैं? क्या बात है?
मैं बोली- व..वो.. मैं आप ही को खोज रही थी.. कहाँ थे आप?
कुछ नॉर्मल सा होते हुए मैं बोली। 
‘मैं वो थोड़ा बाहर निकल गया था.. अभी आया तो पता चला आपके हसबेंड तो मेरे साले के साथ मार्केट गए हैं.. तो मैं भी आपको ही खोजते हुए इधर ही आ रहा था.. तो आप मिल गईं। चलो चल के एन्जॉय करते हैं। तुम सबकी निगाह बचा कर मेरे कमरे में आओ.. मैं सबसे बहाना करके कि मैं बाहर जा रहा हूँ.. कमरे में ही रहूँगा। आप वहीं आओ..’
यह कहकर अरुण जी चले गए।
मैं मन ही मन बुदबुदाई- क्या निगाह बचाऊँ.. जो होना था.. वो तो हो ही चुका है.. मेरी चुदाई का लाईव शो कोई देख चुका है.. और मुझे चोदने का निमन्त्रण दे कर चला गया है। 
मैं सीधे वहाँ से चल कर अपने कमरे में पहुँच कर मुँह धोकर थोड़ा रिलेक्स हुई और कमरा खोल कर गलियारे में दोनों तरफ देख कर सीधे अरुण जी के कमरे में घुस गई, अन्दर जाते ही सबसे पहले कमरे लॉक किया और ‘की-होल’ को बन्द किया।
अरुण जी कमरे में नहीं थे, शायद बाथरूम में थे। मैं अपने सारे कपड़े निकाल कर सिर्फ ब्रा-पैन्टी में ही बिस्तर पर लेट गई और अरुण जी का इन्तजार करने लगी।
कुछ ही पलों में मेरे मन में चुदाई के सीन चलने लगे, आज मैं फिर किसी अजनबी से चुदने जा रही थी, मेरी चूत की प्यास एक बार फिर इसी बिस्तर पर अरुण जी के मोटे लण्ड से बुझेगी और आज रात उस अजनबी ने भी तो बुलाया है.. चुदने को.. ये तो मेरी किस्मत है कि मेरी चूत आज दो लौड़ों से चुदेगी।
तभी पीछे से आकर अरुण जी ने मुझे बिस्तर पर दबोच लिया तो मैं ख्यालों से बाहर निकली।
अरुण जी बोले- क्या बात है.. पूरी तैयारी से हो.. तुम कुछ ज्यादा ही गरम दिख रही हो.. तुम और तुम्हारी चूत..
इतना कहते ही उन्होंने मेरी चूत को पैन्टी के ऊपर से मसल दिया।
मेरी ‘आह..’ निकल गई।

वे मुझसे बोले- रानी.. आज तुमको चोद के अपनी रखैल बनाऊँगा.. बोलो बनोगी ना.. मेरी रखैल?
मैं मादकता से बोली- मैं तो आपके बाबूराव की दासी हूँ.. मैं तो आपके इस मस्त बाबूराव से चुदने के लिए राण्ड भी बन जाऊँगी.. आपकी रखैल भी बनूँगी.. आज मुझे ऐसा चोदो.. कि मेरी जिस्म का पोर-पोर दु:खने लगे.. पर जल्दी चोदो.. कहीं ह्ज्बेंड या कोई और आ ना जाए। 
इतना सुनते वो मुझे किस करते हुए मेरी चूचियां रगड़ते हुए मेरी चूत को मसलने लगे, मेरी चूत से गरम-गरम भाप निकलने लगी। मेरी चूत के होंठ चुदने के लिए खुलने और बंद होने लगे, मेरे शरीर में इतनी आग लगी हुई थी कि मैं बस खुल कर चुदना चाहती थी।
मुझे इस चुदासी हालत में देख कर अरुण जी समझ गए कि मैं पूरी तरह से गर्म हूँ और मुझे लण्ड चाहिए।
अरुण जी ने पैन्टी को उतार दिया, फिर मेरी चूत चाटने लगे।
मैं बोली- आह.. सीई.. उफ.. चाटो.. मेरी बुर.. मैं आपका बाबूराव चाटूंगी..
वो मेरी चूत को चाटते जा रहे थे.. कभी जीभ अन्दर.. कभी बाहर कर रहे थे.. मुझे लगा कि मेरी चूत में लाखों चीटियाँ रेंग रही हों। मेरी चूत रस से गीली हो चुकी थी और बुर में चुदाई की आग भी लग चुकी थी, मेरी चूत फुदकने लगी लण्ड खाने को।
मैं अपनी कमर उठा के चूत चटवा रही थी। मेरी चूत को जितना वो चाटते जा रहे थे.. मैं उतना ही वासना की आग में जलती जा रही थी।
अरुण बोले- भाभी आपकी फूली हुई चूत का रस पीने का मजा ही अलग है..
यह कहते हुए वे मेरी चूत को कस कर चूसने लगे।
मेरे मुँह से ‘आह.. उम्म्म… सीई.. आह आआ.. अहह.. आअहह.. उफ फफ्फ़..’ मादक सिसकारियाँ निकलने लगीं।
इसमें तो और भी ज्यादा मजा आने लगा।
अरुण जी बोले- भाभी आपकी चूत तो एकदम गीली हो चुकी है.. अब तो इसे तो लण्ड ही चाहिए।
‘हाँ मेरे राजा.. मुझे लण्ड ही चाहिए.. अब पेल दो मेरी चूत में.. अपना लण्ड..’
फिर उन्होंने मेरी टांगों को ऊपर उठा दिया और मेरे फूली हुई चूत के छेद पर अपना मोटा कड़क लण्ड रखा और ज़ोर से धक्का दे दिया।
लण्ड मेरी चूत के अन्दर एक ही बार में पूरा घुस गया।
मैं तड़पने लगी और चूत ने भलभला कर पानी छोड़ दिया पर वो बिना रुके चोदे जा रहे थे, मैं चुदती जा रही थी, वो रुकने का नाम नहीं ले रहे थे, मैं भी चाह रही थी कि वो इसी अंदाज में मुझे चोदते रहें..
एकाएक उन्होंने मेरी चूत से लण्ड निकाल कर मुझे मुँह में लेने को कहा।
मैंने मुँह खोल कर चूत के रस से भीगे हुए मस्त लण्ड को अपने मुँह में ले लिया और उसको चूसने लगी।
मैंने लण्ड की चमड़ी को अलग किया और लण्ड के सुपाड़े को चूसने लगी।
अरुण सिसकारियाँ भरने लगे, कुछ पलों के बाद मेरे मुँह से लण्ड निकाल कर दोबारा मेरी चुदाई करने लगे।
अब हम दोनों भी चुदाई में लय से लय मिला कर सुर-ताल में एक-दूसरे का साथ देकर चुदाई करने लगे, उनके धक्के तेज होने लगे थे, पूरे कमरे में बस ‘सी.. सी.. आह.. आह..’ की आवाजें सुनाई दे रही थीं।
अब उन्होंने मुझको अपने ऊपर लिया और चूत में अपने लण्ड को डाल दिया। अब मैं उनके लण्ड को अपनी चूत में लिए हुए चोद रही थी। वो भी मेरे चूतड़ों को अपने दोनों हाथों से पकड़ कर नीचे से धक्के लगा रहे थे।
काफ़ी लम्बी चुदाई के बाद मेरा शरीर अकड़ने लगा, मुझे पता चल गया कि अब मैं झड़ने वाली हूँ।
उन्होंने झटके से मुझे नीचे किया और खुद मेरे ऊपर आ गए.. और ज़ोर-ज़ोर से धक्के लगाने लगे, उन्होंने मेरे सारे बदन को जकड़ लिया और ज़ोर से धक्के लगाने शुरू कर दिए।
अब मैं भी झड़ने के करीब आ गई थी, उन्होंने मेरे दोनों चुचों को ज़ोर से पकड़ लिया और धक्के पर धक्के लगाते जा रहे थे। मैं चूत उठाए सिसकारियाँ लेते हुए भलभला कर झड़ने लगी।
मुझे झड़ते हुए देख कर अरुण जी ने धक्कों की रफ़्तार और तेज करते हुए मेरी चूत में अपने अंतिम झटके मारे और वीर्य से मेरी चूत को भर दिया। इसी के साथ उन्होंने मुझे कस कर पकड़ लिया और पूरा लण्ड चूत की जड़ तक डाल कर पड़े रहे।
दस मिनट के आराम के बाद मैं बाथरूम में फ्रेश होकर जाने के लिए तैयार हो गई। अरुण अभी भी बिस्तर पर वैसे ही मेरी बुर चोदी लण्ड लिए लेटे थे। मैं पास गई और उनके होंठों पर अपने होंठ रख कर किस कर लिया और उनके कमरे से बाहर निकल कर अपने कमरे में घुस गई।
अभी मेरे ह्ज्बेंड नहीं आए थे, मैं थोड़ी रिलेक्स होने के लिए सोने लगी। 
शाम के करीब मेरी नींद ह्ज्बेंड के जगाने से खुली। मेरे अस्त-व्यस्त कपड़ों को देखकर बोले- दरवाजा खुला छोड़ कर बेखबर सो रही हो.. कोई आकर चोद देता तो.. तुम्हारे कपड़े भी उठे हुए हैं और चूत भी खुली दिख रही है। मालूम भी है कि फूली हुई बिन बालों की चिकनी चूत को देख बड़े-बड़ों का ईमान डोल जाता है.. मेरी जान..
मैं कंटीली अदा से बोली- कौन आएगा आपके सिवा.. मैं थक गई थी और आपका इन्तजार करते हुए नींद आ गई। 
तभी ह्ज्बेंड ने मेरी फूली हुई चूत पर हाथ रख जोर से भींच लिया, मेरे मुँह से दर्द भरी चीख निकल गई।
मेरी गीली चूत में एक उंगली डाल कर बोले- तुम्हारी चूत बहुत गीली है.. मुझे चोदने का मन कर रहा है.. जल्दी से एक राउन्ड हो जाए। 
पर मेरा मन तो था नहीं.. फिर भी ना चाहते हुए उन्हें रोक नहीं पाई।
तभी ह्ज्बेंड का मुँह मेरी चूत पर आ गया और मेरी चूत की फांकों को फैला कर मेरी चूत चाटने लगे।
बोले- डार्लिंग चूत से तो वीर्य की महक आ रही है.. किसने तुम्हारे छेद में अपना वीर्य डाल दिया है?


RE: Sex Kahani ह्ज्बेंड ने रण्डी बना दिया - sexstories - 06-19-2018

मेरा इतना सुनते काटो तो खून नहीं.. मैं सोचने लगी कि मैंने तो चूत को अच्छी तरह से साफ किया था.. पर कुछ घन्टों पहले ही तो अरुण जी ने चोदा था.. शायद वीर्य का कुछ अंश अन्दर रह गया हो।
मैं बात बना कर बोली- कौन चोदेगा मेरी जान.. तुम्हारे सिवा कोई चोदता तो क्या मैं बताती नहीं..
यह बोलते हुए मैं कामुक अंदाज में सिसिया दी- चाटो ना मेरी चूत..
उनके सर पर हाथ रख कर ह्ज्बेंड का मुँह चूत पर दबा दिया।
वे मेरी चूत कुत्ते की तरह चाटने लगे और मैं गर्म होने लगी, मुँह से सिसकारियाँ निकलने लगीं- आहह… आहईसी.. सीईईईई.. आह और चाटो जानू..
ह्ज्बेंड का एक हाथ मेरी चूचियों पर आ गया था, उन्होंने हल्के हाथ से सहलाते हुए चूत चाटने में मजा दुगना हो गया..
‘उफ्फ्फ..’ मेरे मुँह से ‘सी..ई..ई.. ई.ई…’ की आवाज तेज होती जा रही थी।
तभी ह्ज्बेंड ने कहा- एक बात पूछूँ जानू?
मैं बोली- इजाजत की क्या बात है.. पूछो न..
बोले- जानू.. ना तो तुम्हारी चूत पर पैन्टी थी.. और ना ही तुम्हारी चूचियों पर ब्रा.. क्या बात है मेरी जान?
मैं बहाना कर बोली- पहनी ही नहीं थी जानू.. क्या तुम कुछ शक कर रहे हो?
ह्ज्बेंड बोले- नहीं यार.. ऐसे ही मजाक कर रहा था। 
इतना कहते हुए उन्होंने मेरी चूत को जीभ से चाटना शुरू कर दिया और फिर चूमते हुए ऊपर नाभि से होते हुए मेरे दोनों स्तनों को बारी-बारी से चूसते हुए मेरे स्तनों को इस तरह मसलना और चूसना शुरू किया कि मैं चुदने के लिए मचल उठी, मैं एक हाथ बढ़ा कर उनका लण्ड पकड़ कर आगे-पीछे करने लगी।
तभी ह्ज्बेंड ने चूत के दाने को उंगली से दबाया- ओह्ह्ह्ह.. माँ.. सि..सि..सि.. हूऊ..
मेरे मुँह से यही आवाज़ निकल रही थी.. मेरी चूत से पानी निकल कर रिसने लगा.. मेरी कमर ऊपर-नीचे होने लगी, मेरी चूत के दाने को ह्ज्बेंड हल्के से रगड़ने लगे और मैं बेक़रार होने लगी..
फिर ह्ज्बेंड ने मेरी चूचियों को छोड़ कर मेरे पैरों को फैलाकर अपने लंड का सुपारा चूत के ऊपर रखा और मेरी चूत पर रगड़ने लगे..
मैं कमर उठाने लगी..- अब.. मत तड़पाओ.. मैं जल रही हूँ.. आह्ह्ह्ह..
मैं कमर ऊपर करने लगी.. चूत के छेद को लंड से लगाने लगी।
ह्ज्बेंड देव ने मेरी पनियाई हुई चूत के पानी से भीगा सुपारा और लंड को मेरी गुलाबी चूत पर लगाया और एक धक्का मार दिया।
‘आह्ह..’
और पूरा लंड एक ही धक्के में चूत में समा गया। मैं सिसियाते हुए बोली- आह.. सी.. चोदो मेरे राजा मेरे प्राणनाथ.. मजा आ गया अई.. माँ ओह..सीसीईई.. आहह..
मेरी मुँह से ऐसे शब्द सुन कर ह्ज्बेंड ने जोरदार तरीके से चुदाई शुरू कर दी।
मेरी चूत से ‘फच.. फच… फच..’ की आवाज़ आने लगी।
ह्ज्बेंड अपना पूरा लंड बाहर खींचते और एक जोरदार धक्का देकर अन्दर पेल देते। आज वे बहुत ही जबरदस्त तरीके से चोद रहे थे.. मुझे भी मज़ा आ रहा था.. इतनी जबरदस्त चुदाई हो रही थी.. जैसे ह्ज्बेंड बहुत प्यासे हों।
वैसे भी रोज चूत मारने वाला आदमी आज चार दिनों बाद बुर पेल रहा था। ह्ज्बेंड की चुदाई का मुझे भी मज़ा आ रहा था.. इतने में ह्ज्बेंड ने मुझे कसके पकड़ा और कहा- डॉली.. मैं झड़ने वाला हूँ..
इतना कहते हुए उन्होंने दस-पंद्रह धक्के तेज-तेज लगा कर मेरी चूत में वीर्य की एक तेज धार छोड़ दी। झड़ने के साथ ही मेरे चुचों पर अपना सर रख कर हाँफने लगे। मैंने भी ह्ज्बेंड के बाबूराव के गरम-गरम वीर्य को अपनी चूत में महसूस किया और मैं भी ह्ज्बेंड साथ एक बार और झड़ गई। 
आज दिन में मेरी तीन बार चुदाई हुई। अभी एक बार रात में फिर एक अंजान और गैर मर्द की बाँहों में जाना बाकी था। 
अभी तक ह्ज्बेंड का लंड मेरी चूत में ही पड़ा था और ह्ज्बेंड मेरे ऊपर ही पड़े थे। ह्ज्बेंड का लण्ड धीमे-धीमे छोटा होता जा रहा था।
मैं बोली- मेरी चूत की तो माँ चोद चुके हो.. क्या अब मेरी जान ही लोगे?
ह्ज्बेंड बोले- क्यूँ जानू?
मैं बोली- अब आप मेरे ऊपर हो.. मेरी जान निकल रही है..
तब ह्ज्बेंड- तुमने तो मुझे पूरा निचोड़ लिया है.. मैं जरा थक गया यार.. सच में तुम्हारी चूत चोदना कोई खेल नहीं है.. 
यह कहते हुए ह्ज्बेंड बाथरूम में चले गए, मैं बिस्तर पर पड़ी लेटी रही।
ह्ज्बेंड बाथरूम से बाहर आकर बोले- चलो जल्दी तैयार हो जाओ.. नीचे सभी लोग वेट कर रहे होगें.. शादी का फंक्शन शुरू हो गया है।
मैं भी फ्रेश होने बाथरूम गई और फिर एक बैगनी कलर का लहँगा.. जो शादी के लिए लाई थी.. पहन कर तैयार हो गई।
ह्ज्बेंड भी ब्लेजर जीन्स पहन कर तैयार हो गए थे।
फिर हम दोनों एक साथ बाहर आए.. बाहर शादी की सारी तैयारियाँ हो गई थीं। सभी लड़के और लड़कियाँ डान्स कर रहे थे और वह लड़का भी दिखा.. जो आज रात मेरी चूत चोदने वाला थाम वो खूब डान्स कर रहा था।
शादी का इंतजाम भी उसी होटल में था, बारात होटल के बाहर रोड से होते हुए पुन: होटल के लिए आ रही थी।
तभी उस लड़के की निगाह मेरे ऊपर पड़ी।
वह मेरी तरफ बढ़ा और मेरा हाथ पकड़ कर मुझे रिक्वेस्ट करते हुए डान्स के लिए खींचते हुए लेकर डान्स करने लगा। मैं भी उसके साथ थोड़ा डांस करने लगी। इसी दौरान उसने मेरे दूध दबाते हुए कहा- मेरी जान आज रात मेरे बाबूराव से चुदने आ रही हो ना..
मैंने बस मुस्कुराकर उससे चुदने की मौन स्वीकृति दे दी। 
उस लड़के को जब भी मौका मिलता.. भरी महफिल में कभी मेरे चूतड़ों पर कभी चुचों को दबाकर चला जाता। उसकी उस हरकतों से मैं गर्म होने लगी थी और मेरी चूत पानी छोड़ कर और मेरे चूतड़ चुदने के लिए दोनों ही मचल रहे थे।
धीमे-धीमे रात गहरी हो रही थी.. अब 11:15 का समय हो रहा थाम लोग खाने पीने में मस्त थे, मेरे ह्ज्बेंड भी अपने दोस्तों में मस्त थे। मैं दुल्हन और ह्ज्बेंड के दोस्त के घर की सभी औरतों के साथ थी..
तभी वही लड़का आया, वो मुझसे बोला- भाभी.. भैया जी आपको बुला रहे हैं।
यहाँ आप सभी को बताना जरूरी है कि होटल एक रिसार्ट किस्म का था.. वाटर पार्क.. झाड़ियाँ और बच्चों के लिए छोटा सा चिड़ियाघर भी था। काफी बड़े एरिया में था।
मैं बोली- कहाँ हैं?
तो वह बोला- उधर हैं.. 
एक झाड़ी की तरफ उसने इशारा किया।
मैं उसके साथ चल दी.. जिधर वह ले गया, उधर कोई नहीं था.. मैं डर गई कि कहीं साला अभी तो चोदना शुरू नहीं कर देगा..
मैं बोली- इधर कहाँ हैं?
बोला- शायद कमरे की तरफ चले गए हों.. उन्हें आपसे बहुत जरूरी काम था। 
मैं और आगे बढ़ती गई। शादी की तैयारी कमरे के पीछे की तरफ था। इतने में वह रूका और मुझ पर झपट पड़ा और मुझे पकड़ कर बागान की तरफ घसीटते हुए ले जाकर बोला- जान… रहा नहीं जा रहा था.. एक बार मेरा माल निकाल दो.. फिर बाद में तेरी चूत चोदूँगा.।
मैं बोली- यह क्या किया? किसी की निगाह पड़ गई होगी तो? मैंने कहा था न.. रात को तो मैं आने वाली थी न.. फिर इतनी जल्दी क्या थी?
वह बोला- मेरी जान.. जितनी जल्दी मेरे लण्ड का माल बाहर करोगी.. उतनी ही जल्दी चली जाओगी.. बात मत करो शुरू करो.. 
वो अपने पैंट की जिप खोल कर लण्ड निकाल कर हिला रहा था। मैं उसका लण्ड देख कर मचल उठी और सीधे नीचे बैठ कर मुँह में लेकर चूसने लगी। बहुत ही मस्त लण्ड था.. मजा आ गया। मैं सब कुछ भूल कर लॉलीपॉप की तरह लण्ड चूसने लगी।

वह मस्त होकर बोला- आह्ह.. साली आज रात तेरी चूत फाड़ ही दूँगा.. चूस मेरे लण्ड को.. आह्ह.. चूस मेरे लंड के सुपारे को.. साली.. आज की रात को अपनी चूत की खैर मना.. आज तेरी वो चुदाई करूँगा कि तू याद रखेगी कि किस लण्ड से पाला पड़ा है.. मेरे बाबूराव में वो ताकत है कि तू अरुण के बाबूराव या ह्ज्बेंड के बाबूराव को भूल जाएगी।
मैं बोली- हाँ.. उन सबसे तेरा लण्ड मस्त मोटा है रे..


RE: Sex Kahani ह्ज्बेंड ने रण्डी बना दिया - sexstories - 06-19-2018

इधर मेरी चूत रानी पानी छोड़ रही थी, मेरी पैन्टी गीली हो रही थी, मैं मदहोश हो रही थी, मुझे लग रहा था कि चाहे जो हो जाए मैं चुद कर ही जाऊँगी यहाँ से। 
अब मेरी चूत पानी छोड़ चुकी थी और मेरा चूत रस बह रहा था। लण्ड चूसते हुए मैं एक हाथ से उसके अंडकोषों को सहलाने के साथ रह-रह कर उनको दबा भी देती थी..। मैं पूरा लण्ड से मुँह से निकाल कर बोली- मेरी चूत के मालिक, रात को तो चोदना ही.. पर उससे पहले एक बार अपना लण्ड मेरी चूत में अभी ही डाल दो।
वह बोला- आह्ह.. साली.. चूस.. मुझे तेरे मुँह में ही झड़ना है.. ले जल्दी से.. नहीं तो अभी कोई आ जाएगा।
मैं बोली- आने दो.. मुझे डर नहीं.. जब तक तीन-चार धक्के मेरी चूत में तुम्हारे लण्ड से नहीं लगवा लूँगी.. मानूंगी नहीं..
वह बोला- साली तू औरत है.. या सेक्स की भूखी है?
मैं बोली- एक बार मेरी ले लो.. ताकि मुझे भी तसल्ली हो जाए.. और तेरे लण्ड का स्वाद भी मेरी चूत को मिल जाएगा। फिर चाहे तुम मेरे मुँह में ही झड़ जाना।
वह बोला- ठीक है.. खड़ी हो साली..
यह कह कर मुझे आगे की तरफ झुका कर मेरा लहँगा उठाकर मेरी पैन्टी को निकाल कर अपनी जेब में रख लिया।
बोला- जान यह अब मेरे पास रहेगी।
यह कहते हुए मेरी चूत पर लण्ड लगा कर एक ही बार में पूरी ताकत लगा कर मेरी पनियाई हुई चूत में अपना लण्ड पेल दिया।
मेरे मुँह से सिसकारियाँ छूटने लगीं- उफ़्फ़ फफ्फ़.. अहह सीयह..
‘आह्ह.. ले साली.. मेरा पूरा लंड खा गई है.. तेरी फूली चूत.. मेरी रानी..’
मैं तेज़ी से चूतड़ आगे-पीछे करने लगी- चोद मुझको.. मेरी चूत का बाजा बजा दे.. आह्ह..
इतना सुनते ही उसने धक्के तेज़ कर दिए और मुझे चोदने लगा।
‘उहह.. अहह.. साले.. तेरा लंड मेरी बच्चेदानी से टकरा रहा है.. उफफ फफ्फ़.. अहह..।’
मैं सीत्कार करती रही और 20-25 धक्कों के बाद मेरी चूत से लण्ड निकाल कर मेरी मुँह में दे दिया।
मैं तड़फ कर रह गई.. चूत के पानी से भीगा रस मुँह से चाटने लगी।
तभी उसके लण्ड ने पिचकारी निकाली.. जो सीधे मेरे मुँह के अन्दर चली गई। वो अपना वीर्य छोड़ने लगा.. उसका लण्ड वीर्य का मोटा फव्वारा छोड़ रहा था। मैंने उसके सारे रस को निगल कर.. लण्ड को चाट कर साफ कर दिया।
वह लण्ड को सीधे अपनी पैन्ट में डाल कर बोला- अपना नम्बर दे.. मैं कॉल करूँगा कि तुमको कहाँ आना है। 
मेरा नम्बर लेकर बोला- मजा आया?
मैं बोली- बहुत पर प्यासी हूँ.. और चोद जाओ ना..
पर वह मेरी बात को अनसुना करके चला गया.. मैं प्यासी ही रह गई..
अपनी प्यासी चूत पर हाथ फेर कर मन मार कर कपड़े ठीक करके चल दी। 
मेरी चूत में आग लगी थी मुझसे चला नहीं जा रहा था, मेरा एक-एक पग रखना मुश्किल हो रहा था, बस मेरे मन में यह लग रहा था कि कोई यहीं मुझे दबोच ले.. और जी भर कर मुझे चोद दे।
मेरे अन्दर शर्म खत्म हो चुकी थी.. बस चूत की आग और एक मोटा लण्ड चाहिए है.. यही याद था।
तभी बगल से मुझे अरुण जी की आवाज सुनाई दी- इधर कहाँ से आ रही हो?
मैं सकपका गई.. मेरे चेहरे का रंग उड़ने लगा।
जल्दबाजी में मैं बोली- बस ऐसे ही थोड़ा मन घबरा रहा था.. तो इधर टहलने चली आई.. आप?
‘मैं कमरे से आ रहा हूँ..’ अरुण जी बोले। 
वे इतना कहते हुए मेरे पास आ गए और बोले- जान बल खा रही हो.. और तुम्हारे बदन से सेक्स की महक आ रही है.. क्या इरादा है?
मैं बोली- अगर मेरे इरादे में अपने इरादे का साथ दें.. तो मैं आप पर मर जाऊँ..
यह कह कर मैं अरुण जी से कस के लिपट गई और बोली- जान.. मेरा तो चुदने का इरादा है..
तभी अरुण जी ने मेरे लहंगे में हाथ डाल कर चूत को पकड़ा और आश्चर्य चकित होकर बोले- तुम बिन पैन्टी के.. और वो भी गीली चूत.. क्या बात है?
मैं बोली- बस इसे लण्ड चाहिए.. यही बात है.. ले चलो और मुझे चोदो.. चाहे कुछ भी हो.. पर मुझे चोद दीजिए।
अरुण जी बोले- अभी नहीं.. कोई आवश्यक काम है.. कल जरूर करूँगा।
यह कहते हुए उन्होंने मेरी चूत में दो उंगलियाँ पेल दीं और दोबारा आगे-पीछे करके बाहर कर लीं.. और बोले- चलो जयमाला का कार्यक्रम खत्म होने वाला है, 12:45 शादी का प्रोग्राम शुरू होगा।
यह कह कर अरुण जी चल दिए।
मैं भी पहुँची और थोड़ी रस्म अदाएगी करके मैं ह्ज्बेंड को खोजने लगी, ह्ज्बेंड मिल गए.. वे अपने दोस्तों के साथ थे..
मुझे देखते ही बोले- अरे डॉली.. क्या बात है?
मैं बोली- मेरे सर में दर्द है।
यह बहाना करके मैं कमरे में आराम करने के लिए जाने को बोली।
ह्ज्बेंड ने खाना पूछा.. मैंने ‘हाँ’ में सर हिलाया।
ह्ज्बेंड बोले- ठीक है जाओ आराम करो.. मैं तो नहीं आ पाऊँगा.. मुझे तो शादी के मण्डप में बैठना है.. लेकिन तुम भी कुछ समय के लिए शादी के मण्डप में आ जाना.. नहीं तो हो सकता है कि मेरे दोस्त के घर वालों को बुरा लगे।
मैं ‘हाँ’ बोल कर सीधे कमरे में जाकर बिस्तर पर लेट कर कुछ पल पहले जो वासना का खेल खेलकर आई थी.. उसे याद करने लगी।
क्या मजेदार लण्ड था.. क्या तगड़ा मर्द था.. पर साले ने मेरे तनबदन में आग लगा कर छोड़ दिया।
बेदर्दी साला.. हरामी.. मेरी चूत की आग मुझे जला रही है..
मेरे तन पर कपड़े भारी लग रहे थे, मैं सारे कपड़े निकाल कर एक लाल रंग का नाईट ड्रेस पहन कर चूत और चूचों को मसलने लगी। तभी दरवाजे पर खटखट की आवाज हुई।
कौन होगा इस वक्त? यही सोचते हुए मैंने थोड़ा दरवाजा खोलकर देखा.. 
‘अरुण जी, अरे आप इस टाईम?’
वो बोले- तुम्हारी चूत की आग बुझाने चला आया। मुझसे तुम्हारी हालत देखी नहीं गई।
मैं इतना सुनते ही वहीं उनसे लिपट कर बोली- हाँ जान.. मेरी चूत को चुदाई चाहिए.. चोद दो साली को.. अपने लण्ड से.. मेरी जान.. तृप्त कर दो मुझे..
अरुण जी मुझे गोद में उठाकर बेड पर ले जाकर पटक कर मेरे ऊपर छा गए। अब मुझे उस पल का इन्तजार था.. जब उनका लण्ड मेरी चूत में घुस जाए.. क्यूँ कि मुझे फोरप्ले नहीं चाहिए था.. सीधे चुदाई ही चाहिए थी।
शायद अरुण जी को भी जल्दी थी, अरुण ने एक हाथ से मेरे चूचों को भींचा और एक हाथ से मेरी बुर पकड़ कर मसकते हुए बोले- मेरी जान.. आज एक जल्दी वाला राऊंड हो जाए.. क्यूँकि नीचे भी बहुत काम है।
मैं बोली- हाँ.. मुझे भी जल्दी वाला ही चाहिए।

मेरी नाईटी को ऊपर चढ़ाकर अरुण ने लण्ड मेरी चूत के मुँह पर रख कर दो बार ऊपर से ही रगड़ कर एक ही झटके से लण्ड को मेरी चूत में पेल दिया और मेरी सिसकारियाँ निकलने लगीं, मैं ‘आहह.. उह्ह.. आहह..’ कर रही थी।
मेरी सिसकियों के साथ अरुण का हाथ मेरे चूचियों को जोर से दबाने लगा, मैं भी अरुण के लण्ड पर चूत उछाल कर चुदने लगी।
धीरे-धीरे अरुण मेरी चूचियाँ मसकते हुए ‘गचा-गच..’ लण्ड मेरी चूत में पेलते जा रहे थे, मेरी चूत से ‘फच-फच’ की आवाजें आती रहीं।
मेरी चूत लण्ड खाती जा रही थी।
‘ऊऊहह.. उईई.. ओम्मम्मम्मा.. आआहह.. और पेलो.. चोदो मुझे.. मारो मेरी चूत.. आह.. सीउई.. मैं गईई..’


RE: Sex Kahani ह्ज्बेंड ने रण्डी बना दिया - sexstories - 06-19-2018

मेरी चूत ने पानी छोड़ दिया, मैं कस कर लिपट गई और मेरे बदन और चूत की गरमी पाकर अरुण भी मेरी चूत में अपना पानी डाल कर शान्त हो गए।
तभी दरवाजे पर दस्तक हुई और हम दोनों नंगे ही उछल कर बिस्तर से नीचे आ गए।
पता नहीं कौन होगा?
एक अंजान से भय से एक-दूसरे का मुँह देखते हुए बोले- अब क्या करें?
मैं नाईटसूट को नीचे करके अरुण जी को विन्डो पर लगे परदे के पीछे छिपने को बोल कर दरवाजा खोलने चली गई। मैंने जैसे ही दरवाजा खोला.. सामने वही लड़का था। मेरे तो होश ही उड़ गए.. अब क्या करूँ?
अन्दर अरुण.. सामने यह खड़ा है..
मेरे मुँह से बोल ही नहीं फूट रहा था। एक तो मेरी चूत से अरुण का वीर्य बहकर मेरी जाँघों तक आ गया था और वीर्य की एक भीनी सी महक आ रही थी।
मैं डर गई.. कहीं इसे भी यह महक ना मालूम चले.. नहीं तो क्या कहूँगी.. कि कौन चोद रहा था।
एक और डर लग रहा था.. कि कहीं ये अरुण के सामने ही मेरे साथ कुछ करने ना लगे। 
वह आगे बढ़ा.. तभी मुझे ख्याल आया कि यह तो मेरे और अरुण के सम्बन्ध को जानता है कि अरुण मुझे चोदते हैं। पर अरुण जी नहीं जानते हैं कि इससे भी मेरा कोई सम्बन्ध है। किसी तरह मैं इसे बता दूँ कि अरुण कमरे में ही हैं.. नहीं तो मैं अरुण की निगाहों में गिर जाऊँगी। 
मैं तुरन्त बोली- आप कौन..? क्या काम है?
यह कहते हुए उस लड़के से सट कर एक ही सांस में बोल गई कि अन्दर अरुण जी हैं.. कोई हरकत मत करना.. वो अभी-अभी मुझे चोद चुके हैं।
इतना सुनते वह एक कुटिल मुस्कान बिखेरते हुए बोला- पूजा दी ने आपको बुलाने भेजा था..
दोस्तो.. आप सोच रहे होंगे कि अब यह कौन है.. पूजा दुल्हन की सहेली थी जो मुझसे भी घुल-मिल गई थी।
उसने बात पलटी कर जानबूझ कर पूजा का नाम लिया था।
मैं बोली- चलो.. मैं अभी आती हूँ। 
पर वह जानबूझ कर भी मुझे परेशान करने के मकसद से बोला- भाभी जी कुछ स्मेल सी आ रही है.. अजीब सी?
यह कहते हुए वो कमरे में सूंघने की सी हरकत करते हुए इधर-उधर देखते हुए परदे की तरफ आगे बढ़ गया।
वो बोला- भाभी.. क्या आपको नहीं आ रही है?
मैं बोली- कैसी महक? मुझे तो नहीं आ रही..
मैं उसके करीब को गई.. कहीं वह सचमुच में वो परदा न हटा दे जिसके पीछे अरुण खड़े थे।
शायद उसका मक्सद अरुण को डराना ही था.. वो परदे के पास जाकर पलटा और मेरे करीब आकर बड़ी धीमी आवाज में बोला- बड़ी भारी चुदक्कड़ हो.. साली थोड़ा मेरे साथ बाहर तक आ..
मैं उसके साथ तक दरवाजे के पास गई.. पर वह बाहर निकल कर मुझे इशारे से गलियारे में बुलाने लगा।
मैं एक बार कमरे में देख कर बाहर निकली.. तभी उस लड़के ने मुझे पकड़ कर अपनी बाँहों में भर कर.. एक हाथ को मेरी चूत पर रख कर.. एक उंगली मेरी चूत में पेल कर बाहर निकाला और अरुण के वीर्य और मेरे रज से सने हाथ को सूँघते हुए बोला- इस महक ने मुझे पागल कर दिया है.. मन हो रहा है कि अभी गिरा को तेरे को चोद दूँ। 
मैं बोली- अभी जा.. बाद में आना.. नहीं तो अरुण जी क्या सोचेगें। 
वह मुझे अपनी बाँहों में कसते हुए बोला- तुझे क्या सोचने की पड़ी है! अरुण भी तुझे चोदकर जान गए होंगे कि बहुत बड़ी छिनाल है।
यह कहते हुए उसने कस कर मेरी चूचियों और चूत को दबा कर कहा- तू यहीं झुक जा.. मैं एक बार लण्ड तेरी चूत में पेल कर ही जाऊँगा.. नहीं तो मैं नहीं जाऊँगा। 
मैं बोली- प्लीज कोई देख सकता है.. और अन्दर अरुण जी हैं.. वे क्या सोचेगें कि तुम्हारे साथ नाइट ड्रेस में कहाँ चली गई.. कहीं वे बाहर झांकने न आ जाएँ। यदि उन्होंने देख लिया तो?
वह बोला- चाहे जो हो जाए.. मैं बिना तेरी चूत में लण्ड डाले नहीं जाऊँगा..
यह कहते हुए वो मुझे झुकाकर जबरिया मेरी प्यारी चूत में लण्ड पेलने लगा।
अरुण के पानी से भीगी चूत में अपना लण्ड लगा कर एक ही झटके से लण्ड मेरी चूत में पेल दिया, मैं सिसिया कर रह गई ‘आहआह..हसीसी..’ 
वह मेरी चूत का बाजा बजाते हुए लण्ड चूत में पेलता जा रहा था। फिर वो लण्ड को पूरा बाहर खींच कर मेरी चूत पर रगड़ने लगा.. तभी एकाएक अपने लंड को चूत पर रख एक झटके में अन्दर घुसेड़ दिया।
‘उई माँ..’ मैं चीख पड़ी, ‘उईइ माँ.. मर गई रे.. उई उई उईईई.. कितना मस्त लौड़ा है तेरा.. मेरी जान..’
वो एक हाथ से मेरी चूचियों को दबाए जा रहा था और एक हाथ से मेरी कमर पकड़ कर शॉट लगा रहा था। मेरी चूत पर उसने 7-8 शॉट मार कर लण्ड चूत से खींच कर पैंट में अन्दर करके चल दिया।
वो जाते-जाते बोला- तैयार हो जा मुझसे चुदने के लिए.. 
मैं मन ही मन साले को गाली दे रही थी- हरामी को तड़पाने में जाने क्या मिलता है? फिर एक बार तड़पा कर चल दिया।
तभी मुझे अरुण का ध्यान आया और मैं जल्दी से अन्दर आकर दरवाजा बन्द करके पलटी, तभी अरुण जी परदे से बाहर निकल कर बोले- यार मुझे लगा कि हम पकड़े गए.. पर बच गए.. नहीं तो आज मेरी वजह से तुम्हारी इज्जत चली जाती। 
मैं बोली- तो अब तो जल्दी करो.. कोई और आ जाए.. आप फ्रेश होकर यहाँ से निकलो।
अरुण सीधे बाथरूम में जाकर बाहर फ्रेश होकर निकल गए। अरुण के जाने के बाद मैं दरवाजा बंद करके बाथरूम में गई और अपनी मुनिया को रगड़ कर साफ करके और जांघ को साफ किया।
चूत साफ करते मुझे करन्ट सा लगा.. साली फिर गरम हो गई थी।
अपने हाथ से चूत के लहसुन को रगड़कर मन मार कर बाहर चली आई इस आस में.. कि अभी फिर चुदेगी.. चुदाई से चूत फूल चुकी थी।
आज सुबह से मेरे साथ क्या हो रहा था.. न चाहते मेरी चूत चुदना चाहती थी और मुझे कोई ना कोई चोद ही रहा था। 
मैं बहुत थक चुकी थी.. मुझे आराम की सख्त जरूरत थी.. इसलिए मैं सीधे बिस्तर पर जा कर सो गई और अपनी चुदाई को याद करते हुए मुझे नींद आ गई।
ना जाने मैं कब तक सोती रही। मेरी नींद तब खुली.. जब ह्ज्बेंड ने मुझे कॉल करके नीचे शादी में आने को बोला।
मेरा मन नहीं हो रहा था.. फिर भी मुझे जाना तो था ही.. तो मैं मन मार कर उठकर तैयार होने बाथरूम चली गई।
मुझे बहुत तेज शूशू आई थी.. मैं नाईटी उठाकर चूतड़ और चूत खोल कर वहीं जमीन पर बैठ कर तेज धार के साथ शूशू करने लगी।
शूशू करते हुए मैंने अपनी चूत पर हाथ रखा तो मुझे उस लड़के के लण्ड से चूत लड़ाने की बात सोच कर मेरी चूत खुलने और बंद होने लगी।
मैं पूरे हाथ की गदोरी में चूत भरकर मसकते हुए खुद से बोली- मेरी रानी.. अभी तुम्हारी गरमी निकल जाएगी.. मत घबराओ.. अभी तुझे वो जवान मर्द चोदकर शान्त कर देगा। 
फिर मैं मुँह-हाथ धोकर बाहर आकर तैयार हो कर शादी के मंडप में बैठने चल दी, वहाँ जाकर औरतों की तरफ बैठ गई।
दूसरी तरफ लड़के और लड़की पक्ष के लोग बैठे थे.. जिसमें मेरे ह्ज्बेंड और अरुण जी एक साथ बैठे थे और वह लड़का तो मेरे सामने ही बैठा था। मुझे शादी में बैठे अभी 30 मिनट ही हुए थे और रात के 2:30 हो चले थे। 
तभी मेरे मोबाईल पर काल आई नम्बर अनजाना था.. मैं फोन उठाया.. तो उधर से सिर्फ इतनी सी आवाज आई ‘चल आ जा.. तेरी बुर चोद दूँ..’ इतना कह कर कॉल कट गई। 
यह कौन था.. मैं सोचते हुए सामने देखने लगी.. तो वह लड़का कहीं नहीं दिखा। मैं समझ गई कि ये वही है।
फिर मैं.. पूजा जो मेरे पास बैठी थी.. से बोली- पूजा यार मेरी तबियत कुछ ठीक नहीं लग रही है.. मैं आराम करने जा रही हूँ।
ह्ज्बेंड को भी मैंने इशारे से बोल दिया और चल दी।
मैं जैसे ही ग्राउंड से होते हुए फस्ट फ्लोर पर पहुँची कि मेरे साइड का दरवाजा खुला और किसी ने मुझे अन्दर खींच लिया।
कमरे में घुप्प अंधेरा था।
यह शख्स कौन है.. किसने मुझे खींचा.. अंधेरे में कुछ नहीं दिख रहा था और ना ही मैं कुछ समझ ही पा रही थी कि कौन हो सकता था।
मैं सोचने लगी कि चली कहाँ थी.. और अटक कहाँ गई, चुदने किससे जा रही थी पहुँच कहीं और गई।
मैं डरते हुए और कांपती आवाज से बोली- कक्ककौन.. हहहै.. छोछोछोचचड़ो.. येएएए.. क्या..कककर.. रहे हो..!
मैं हाथ-पाँव चलाने लगी.. पर उस व्यक्ति की मजबूत पकड़ और उसकी बाँहों में बस छटपटा कर रह गई।
मैं अंधेरे में उस आदमी के सीने पर हाथ मारती जा रही थी.. पर उसे कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा था तो मैं कोशिश करना छोड़ कर में शान्त हो गई।
उसी वक्त वो आदमी मेरे होंठों को अपने मुँह में भर कर चूसने लगा.. मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूँ.. पर उसकी बाँहों की गरमी और उसका फौलादी बदन सीने के बालों को छूने से मुझे चुदास चढ़ने लगी।
पर यह है कौन.. अगर मैं इसके साथ बिना कुछ जाने करूँगी.. तो ठीक नहीं रहेगा।
मैं एक बार फिर हिम्मत करके पूछ बैठी- आआप ककौन हैं.. मुमुझे छोड़डड दो.. प्लीज.. मैं आपकी पैर पड़ती हूँ। 


RE: Sex Kahani ह्ज्बेंड ने रण्डी बना दिया - sexstories - 06-19-2018

तभी उसने रौबीली और मर्दाना आवाज में बोला- साली.. मेरे पैर नहीं लण्ड पकड़ जिससे तुझे और मुझे सुकून मिलेगा।
यह कहते हुए वह मुझे उठाकर बिस्तर पर पटक कर मेरे ऊपर चढ़कर मुझे अपने गिरफ्त में लेते हुए बोला- थोड़ा सा मेरा साथ दो और मुझसे चुदाकर चली जा.. मुझको भी जल्दी है.. घिस नहीं जाएगी तेरी बुर.. मेरा लण्ड जाने से..
मैं बोली- मैं तो आपको जानती भी नहीं और मैं आपके साथ क्यूँ करूँ यह सब?
वो बोला- तो नहीं मैं करूँगा तुम्हारे साथ तेरी चुदाई..
वो कपड़ों के ऊपर से ही मेरी चूचियाँ दबा रहा था, मेरे होंठों को दाँतों से काट रहा था।
तभी मेरा हाथ उसकी कमर की तरफ गया, मैं चौंक उठी.. वो तो ऊपर से नीचे तक पूरा नंगा था।
मैं बोली- छी:.. तुम बहुत गंदे हो।
वह बोला- तुम तो अच्छी हो..
और वो मेरा हाथ पकड़ कर अपने बाबूराव पर ले गया और लण्ड मेरे हाथ में पकड़ा दिया। मैं फिर चौंक उठी.. यह तो बहुत बड़ा मोटा और हब्शी किस्म का बाबूराव था।
मेरा तो मन डोल गया.. मैंने उसे कस कर पकड़ लिया और शरीर को ढीला छोड़ कर चुदने के लिए समर्पित कर दिया। 
वो मुझे चूमते हुए मेरा लहँगा ऊपर कर के चूत पर हाथ लगा कर बोला- आहा.. साली.. तू तो पहले से ही पैन्टी उतार कर तैयार है।
मैं बोली- मैंने तो यूं ही पैन्टी नहीं पहनी.. पर तुम तो पहले से बिना कपड़ों के तैयार बैठे हो।
बोला- तेरे से ज्यादा जल्दी मेरे को है.. प्यार-व्यार बाद में फिर कभी.. अभी डायरेक्ट चुदाई होगी।
यह कहते हुए उसने बाबूराव मेरी चूत पर लगाया। 
तभी मैं बोली- एक बार अपना लण्ड तो चुसा दे.. फिर चोदना।

वह कुछ नहीं बोला, पता नहीं क्यूँ.. मैं सारी हदें पार करके एक अजनबी से चुदवाने के लिए तड़पने लगी, किसी गर्म और चुदासी कुतिया जैसी मेरी हालत हो रही थी।
तभी उसने मेरी चूत की फाँकें अलग कर दीं।
जैसे ही उसने अपने लण्ड का सुपाड़ा मेरी चूत पर लगाया.. तो मैंने कमर उठा कर सुपाड़ा अन्दर लेना चाहा। कमर उठने के साथ ही उसने एक झटके में ही तमाम लण्ड मेरी चूत में घुसा दिया। 
एक पल के लिए तो मुझे लगा कि दर्द के मारे मेरी जान ही निकल जाएगी। मैं चिल्लाने लगी, ‘ओहहहऽऽऽ हायऽऽऽ अहऽऽऽऽऽ मर गई.. मैं तो आज नहीं बचूँगी.. आज तो ये हरामी मुझे मार ही डालेगा.. हायऽऽऽ प्लीज़ ज़रा धीरे-धीरे तो डालना। साले यह तेरा लण्ड है कि गधे का.. हरामी…
मेरे मुँह से गाली निकलने लगीं।
मेरी गाली साथ ही वह एक झटके से लण्ड बाहर खींचता और वापस मेरी चूत में घुसा देता।
‘हायऽऽऽ प्लीज़ ज़रा धीरे-धीरे तो चोद ना।’
पर वह अपनी धुन में चुदाई करते जा रहा था.. जैसे उसे कुछ सुनाई ही ना दे रहा हो और मैं भी बस चुदना चाहती थी।
जल्दी से जल्दी मैं भी अपनी मंजिल पाना चाहती थी क्यूँकि उसकी चुदाई की जल्दबाजी देख कर लग रहा था जैसे वो कभी भी मेरी चूत को अपने पानी से भर सकता है।
तभी उसने मेरी चूचियों को हाथ में ले लिया और अब वो मेरे निप्पलों को मसलते और चूसते हुए ‘गचागच..’ लण्ड चूत में पेलता जा रहा था।
मैं उसकी चुदाई में इतनी मस्ती में हो गई कि खुद पर काबू नहीं रख सकी और अपने जिस्म की गर्मी निकालने के लिए कमर उठा-उठा कर चुदवाने लगी।
‘हाय आहहसीई.. आह.. गई.. मेरे राजा आआहह.. सीसीई.. आह.. अब मेरा निकलने वाला है.. आहहह.. आसीसीईईई.. आह.. मेरा तो पानी छूट गया.. ऊऊहहहऽऽऽ मेरे आआहह.. सीसीईईई.. ररसऱर..’
उसे एहसास हुआ कि मेरा माल खल्लास हो रहा है… मैं झड़ रही हूँ।
फिर क्या उसने भी चोदने की रफ्तार तेज़ कर दी और चिल्लाते हुए बोला- साली कुतिया.. ले.. अब तो तेरा दिल भर गया ना.. ले.. अब.. मैं भी अपना पानी छोड़ता हूँ आहाहा.. ओहहऽ सीसीई हायऽऽऽ मेरी रानी.. आहह सीय मज़ा आ गया।
फिर उसने मेरी चूत में अपना गाढ़ा माल छोड़ दिया।
उसने मेरी चूत को अपने गरम वीर्य से भर दिया और निढाल होकर मेरे बदन पर पसर गया।
करीब 5 मिनट तक वो सांड की तरह ऐसे ही मेरी चूत और बदन पर लदा रहा.. फिर उतर कर बोला- अब तुम जा सकती हो.. और चुदना हो तो रुक सकती हो.. क्यूँकि तुम्हारा बदन और चूत बहुत मस्त है.. एक बार में मन नहीं भरा मेरी चुदक्कड़ रानी..
मैं बोली- नहीं.. मैं नहीं रुक सकती.. क्यूँकि मेरे ह्ज्बेंड मुझे खोज रहे होंगे..
मैं बहाना करके अपना लहँगा सही करके वैसे ही चुदी हुई बुर लेकर जाने को हुई.. तो एक बार मैंने फिर उससे पूछा- क्या मैं जान सकती हूँ.. मेरी बुर चोदने वाला और इस दमदार लण्ड का मालिक कौन है? 
वह बोला- मैं बुर पेलता हूँ और तुम्हारे जैसी औरतों को खुश करता हूँ.. मुझे देख कर और मेरा नाम जान कर क्या करोगी?
मैं बोली- अगर मेरा फिर तुमसे चुदने का मन हुआ तो मेरी इच्छा कैसे पूरी होगी?
वह बोला- जान तुम दिल से याद करना.. मैं तुम्हें चोद दूँगा.. जैसे मैंने कुछ देर पहले अभी चोदा है।
‘पर मैं तो तुमको दिल से चाहूँगी कैसे.. तुम्हें तो मैं जानती भी नहीं हूँ.. फिर तुम कैसे मेरी चूत से लण्ड लड़ाते हुए मेरी बुर का बाजा बजा डोगे?’
वह बोला- पर तुम चूत चुदाने ही जा रही थी न.. और चूत चुदाने के लिए उतावली थी.. इसलिए मैंने चोद दिया। और अब तुम निकल लो.. नहीं कोई भी मेरे रूम में आ सकता है। 
उसने दरवाजा खोल कर बाहर देख कर मुझे रूम से निकाल कर रूम बंद कर लिया। पर मेरे लिए हजारों सवाल छोड़ गया.. यह कौन था और कैसे जान रहा था कि मैं चुदने जा रही थी। 
यह मेरे साथ हो क्या रहा है.. ऐसे तो मैं बदनाम हो जाऊँगी.. कहीं वह लड़का और यह आदमी दोनों आपस में मिले तो नहीं हैं। मुझे पता लगाना है.. यही सोचते हुए मैंने अपने फोन पर आए हुए कॉल को रिडायल कर दिया.. यह देखने के लिए कॉल करने वाला था? 
‘हैलो कौन..?’ 
उधर से गाली भरी आवाज सुनाई दी- साली छिनाल.. कहाँ चूत मरा रही थी। मैं कब से वेट कर रहा हूँ कुतिया.. जल्दी आ.. मैं फोर्थ फ्लोर पर हूँ।
‘अभी आई..’ कह कर मैं तुरन्त लिफ्ट की तरफ गई। शुक्र था लिफ्ट फस्ट फ्लोर पर ही थी। मैं सीधे फोर्थ फ्लोर पर पहुँची.. पर वहाँ वह दिखाई नहीं दिया। 


RE: Sex Kahani ह्ज्बेंड ने रण्डी बना दिया - sexstories - 06-19-2018

मैं इधर-उधर देखते हुए फोन करने ही वाली थी कि मुझे उस लड़के की आवाज सुनाई दी- चल इधर आ जा।
मैंने देखा तो वो आवाज 403 नम्बर के कमरे से आई थी। मैं सीधे उसके कमरे में घुस गई। उसने रूम बंद करते हुए मुझे बाँहों में भरते हुए पूछा- अब तक कहाँ थी.. मैं कब से तेरी बुर चोदने का वेट कर रहा हूँ और कब से मेरा लण्ड तुम्हारे चूत तेरी चूत में जाने का इन्तजार कर रहा है..। 
मैं उसी की बात सुन रही थी.. पर मैं यह अंदाज नहीं लगा सकी कि जिसने मुझे अभी-अभी अपने सांड जैसे लण्ड से चोदा है.. ये दोनों मिले हुए हैं क्या? 
तभी उसने मेरा लहँगा पकड़ा और खोलने लगा।
मैं बोली- नीचे मैं बिल्कुल नंगी हूँ।
वो बोला- ठीक है पैन्टी निकालने का झंझट खत्म।
उसने मेरा लहँगा झट से खोल कर निकाल दिया.. मेरी चूत और जाँघ पर हाथ फिराने लगा। मेरे अन्दर एक अजीब सी बेचैनी समा गई.. क्यूँकि रज वीर्य से मेरी जाँघ भीगी हुई थी और वह सब उसके हाथ में लग गया। उसने हाथ को नाक तक ले जाकर सूँघ कर बोला- तू तो पक्की छिनाल निकली.. किससे चुद कर आ रही है? 
‘मैं चुद कर नहीं आ रही.. कोई ने मुझे जबरिया उठाकर मेरी चूत में लण्ड पेल दिया.. इसी लिए आने में देरी हुई। कौन था.. मैं नहीं जानती और यही तो मैं भी जानना चाहती हूँ कि वो कौन था? कहीं तुमने ही तो उसको मुझे चोदने के लिए नहीं भेजा था?
वह बोला- नहीं यार.. मैं क्या जानूँ.. चुद कर तुम आ रही हो.. तुमसे कहाँ मिला वह?
मैं बोली- वह रूम नम्बर 107 में था। मैं तुम्हारे पास आ रही थी.. उसने मुझे कमरे में खींच कर मेरी बुर को पेल दिया। वह एकदम सांड जैसा था और लण्ड भी साले का एकदम गदहे जैसा था। 
तभी वह बोला- उस कमरे में तो लड़के के चाचा रूके हैं। वो पहलवानी करते हैं कसरती बदन है उनका..
‘हाँ हाँ.. सही कहा तुमने.. बिल्कुल ऐसा ही आदमी था वह..’ मैं बोली।
फिर अनूप खुश होते हुए बोला- चलो अच्छा ही हुआ मुझे ताजी चुदी हुई बुर जिसमें वीर्य भरा हो.. जीभ से चाटकर साफ करने बड़ा मजा आता है।
अनूप इसी लड़के का नाम है.. 
यह कहते हुए वो मुझे घुमाकर मेरी चूतड़ सहलाने लगा। मैंने पीछे मुड़ कर देखा तो वो बड़ी बेशर्मी से मेरे वीर्य लगे नंगे चूतड़ों को घूर रहा था और पहली बार.. कोई मेरी वीर्य से भीगी चूत और चूतड़ों को अपनी जीभ से चाटने जा रहा था।
उसने बोला- सच में बड़ी मस्त चूत और गाण्ड है तेरी..
और उसने जैसे ही मेरी चूतड़ों पर अपने होंठ लगाए.. मेरा जिस्म.. मेरा मन.. मेरी चूत.. सब झनझना उठे। 
वह बेतहाशा यहाँ-वहाँ बिना रूके चूमता ही जा रहा था। उसने अपने दोनों हाथ मेरे नंगे चूतड़ों पर रख कर छितराते हुए मेरी गाण्ड और बुर के छेद और जाँघों पर लगे रज और वीर्य को चाटने लगा।
उसके इस तरह से चाटने से मेरी योनि से पानी रिस कर बह निकला, मैं एक बार फिर चुदने के लिए तड़फने लगी। उसके इस तरह चाटने से मेरा अब खड़ा होना मुश्किल हो गया। 
मैं सिसियाते हुए बोली- आह..सी.. जान.. मुझे लिटाकर मेरी गाण्ड और मेरी चूत चाटो.. मुझसे अब खड़ा नहीं रहा जाता। 
उसने तुरन्त मुझे बिस्तर पर पेट के बल लिटा कर मेरी चूतड़ों को ऊपर उठाते हुए.. अपनी जीभ मेरी बुर के ऊपर रख कर चाटने लगा। उसकी इस हरकत से मेरी चूत की बैचैनी बढ़ उठी। उसने मेरी योनि की पंखुड़ियों को अपने होंठों में दबा लिया और बड़ी बेदर्दी से चूसने लगा। मेरी चूत और गाण्ड की तड़प चुदाने के लिए तड़फने लगी। वो अपने दोनों हाथों से मेरी चूचियाँ मसकते हुए.. मेरी गाण्ड के छेद और कभी चूत को.. कुत्ते की तरह चाटता जा रहा था। 
मेरे मुँह से ‘आआह.. आहआ… आहआह.. ईईसीआह.. की आवाजें निकलने लगीं।
मैं बोली- जान अब रहा नहीं जा रहा है। अब लण्ड पेल दो मेरी गाण्ड में..
इतना सुनना था कि वह मेरी गाण्ड मारने के लिए लण्ड पर थूक लगा कर मेरी गाण्ड के छेद पर सुपारा रगड़ने लगा। अब मुझसे बर्दास्त करना मुश्किल होने लगा और मैं सिसियाते हुए बोली- आहसी.. आहहह ऊऊऊआह.. डाल दो ना..
उसने लण्ड रगड़ते हुए पूछा- कहाँ?
मैं बोली- मेरी गाण्ड में डाल दो..
इतना सुनते ही उसने एक तेज शॉट मारा और अपना आधा बाबूराव अन्दर डाल दिया।
मैं मजे ले कर बोली- आह्ह.. गाण्ड मार कर तो तूने मस्त कर दिया।
तभी उसने दूसरा शॉट लगा कर अपना पूरा लिंग मेरे अन्दर डाल दिया।
मेरे मुँह से, ‘आआआह्ह्ह.. ऊहऊऊऊसी..आह..’ निकल गई। 
फिर लगातार ‘गचागच..’ लण्ड पेलता रहा.. बड़ी बेदर्दी के साथ गाण्ड मारता रहा.. मैं मेरी गाण्ड मराती रही.. बिना कुछ कहे बिना सुने.. वो लण्ड पेलता रहा, उसके हर शॉट पर मेरी ‘आह’ निकल जाती। अनूप के हर शॉट पर.. मेरी चूत भी मस्त होकर पानी-पानी हो गई। उसने अपने धक्कों की स्पीड और भी तेज कर दी। मैं आनन्द के सागर में गोते लगाते हुए मजे से गाण्ड उचका-उचका कर मराती जा रही थी।
तभी अनूप चीखते हुए, ‘आह्ह्ह्ह्ह्.. सीसी..आह.. मेरा गया तेरी गाण्ड में..’
और उसने ढेर सारा गरम-गरम पानी मेरी गुदा में छोड़ते हुए कस कर मेरी चूचियां पकड़ कर और लण्ड जड़ तक पेल कर हाँफते हुए झड़ने लगा। 
अनूप के लण्ड से चूत लड़ाने वाली हूँ आप लोग अपने लण्ड को पकड़ कर बैठ जाइए ताकि मेरी चूत को याद करके मुठ्ठ मार सको.. पर पानी छोड़ते समय मेरी बुर को याद करके ही पानी (वीर्य) निकालना और निकालते समय ऐसा सोचना कि मेरी चूत में ही अपना पानी डाला हो।


RE: Sex Kahani ह्ज्बेंड ने रण्डी बना दिया - sexstories - 06-19-2018

कुछ देर बाद अनूप मेरी गुदा से लण्ड निकाल कर बगल में लेट कर बातें करते हुए मेरी चूत सहलाने लगा, उसने कहा- रानी, तुम्हारी गाण्ड मारने में मजा आ गया.. बड़ी प्यारी और सुन्दर है तुम्हारी गाण्ड..
मैं बोली- मुझे भी तुमसे अपनी गान्ड मरा कर मजा आ गया.. तुम ने गाण्ड की प्यास तो बुझा दी पर मेरी चूत प्यासी है।
अनूप बोला- जान, लण्ड तुम्हारी चूत की प्यास बुझाए बिना कहाँ भागा जा रहा है।
अनूप एक हाथ से चूत.. दूसरे हाथ से मेरी चूचियों की मालिश कर रहा था। मेरी बुर तो पहले से प्यासी थी.. उस पर अनूप का मेरे बदन और बुर पर हाथ लगाना.. आग में घी का काम कर रहा था।
मैं भी अनूप का लण्ड हाथों में लेकर मुठियाने लगी और अनूप की छाती पर हाथ फिराते हुए चुदने के लिए यानी बुर मरवाने के लिए तड़फने लगी।
तभी मुझे एक आईडिया आया कि क्यूँ न अनूप का लण्ड मुँह लेकर चूसूँ.. और चाटूँ.. ताकि अनूप लण्ड जल्द से जल्द गरम होकर खड़ा हो जाए और मेरी चूत की चुदाई शुरू हो सके।
मैं अनूप के ऊपर चढ़ गई और चूमते हुए नीचे लण्ड पर पहुँच कर लण्ड को सीधे मुँह में भर लिया, अनूप के लण्ड पर लगे अपनी गाण्ड के रस और वीर्य को चाटने लगी।
फिर मैं जीभ से उसके सुपारे को चाटते हुए कभी पूरा लण्ड मुँह में भर लेती.. कभी सुपारे को चाटती।
मेरा ऐसा करना रंग लाया और अनूप का लण्ड पूरा टाइट हो कर एक डंडे के जैसा हो गया पर मैंने बाबूराव को चाटना नहीं छोड़ा।
इधर अनूप का हाथ मेरी चूतड़ और जांघ से होते हुए मेरी बुर को मसक रहा था।
फिर अनूप मेरे मुँह से लण्ड निकाल कर मुझे अपने ऊपर खींच कर.. मेरे होंठ को मुँह में लेकर.. चूसते हुए मेरे पूरे नंगे बदन को सहलाते हुए.. मेरी चूचियाँ भींचता.. तो मेरे मुँह से सिसकारी फूट पड़ती।
मैं कस कर उससे लिपटकर चूत उसकी जाँघों पर रगड़ते हुए.. सिसकारियाँ लेने लगीं, ‘आईई ईईई.. और ज़ोर से.. दबा छातियाँ.. मेरे राजा मेरी चूत और गाण्ड के मालिक.. ले..
मैं मस्ती में सिसियाते हुए उसके होंठों पर होंठ रख कर किस करने लगी।
अनूप मेरे जीभ को मुँह में लेकर चूसते हुए एक उंगली मेरी चूत में पेल कर आगे-पीछे करने लगा..
तभी उसने एकाएक मुझे नीचे लेटाकर मुँह चूत पर रख कर मेरी बुर को चाटने लगा।
जैसे एक कुत्ता एक कुतिया की चूत चाट कर उस कुतिया को गर्म कर देता है.. वैसे ही अनूप मेरी चूत चाट कर मेरी चूत को गर्म करने लगा था।
मैं अनूप की बुर चटाई से जन्नत की सैर करने लगी, मैं पूरे तेज-तेज स्वर में सिसकारियाँ लेते हुए अपनी चूत चुसवाती जा रही थी। नीचे से अपने चूतड़ों को भी उठाए जा रही थी।
‘ज़ोर से और जोर से आईई.. ई हिस्स्स्स..’ करते हुए चूत चटाई की मस्ती में अपने दाँतों से अपने होंठों को भींच रही थी। एक हाथ से अनूप का सर और एक हाथ से अपनी चूचियाँ दबाते हुए बोली- अब नहीं रहा जाता.. पेल दे.. चोद दे.. मेरी बुर को.. मेरी चूत में डाल दे बाबूराव.. और मेरी भोसड़ी को फाड़ दे..
इतना सुनते ही अनूप मेरे ऊपर चढ़ कर अपने मोटे लण्ड को मेरी चूत के मुँह पर रख कर अपने लण्ड का सुपारा रगड़ने लगा, उसके लण्ड की रगड़ाई से मैं मस्ती और मदहोशी की आवाज़ में सिसकियां लेकर बोली- आह्ह.. डार्लिंग जल्दी करो ना.. डाल दो ना.. मेरी चूत में अपना बाबूराव.. और बुझा दो मेरी चूत की आग..
तभी उसने एक जोरदार धक्के के साथ लण्ड को मेरी चूत में घुसेड़ दिया और जोरदार शॉट पर शॉट लगा कर मेरी चूत की जबरदस्त चुदाई चालू कर दी।
मैं अनूप की चुदाई की गुलाम हो कर चूत उठा-उठा कर ठुकवाने लगी। हर धक्के हर शॉट.. पर मैं चूत उठाकर और सिसियाकर ‘ओह्ह.. आह्ह्ह.. इश्ह्हह्ह्ह.. कम आन.. यससस.. सी फ़क मी..’ कहते हुए अनूप के लण्ड का स्वागत करती। 
तभी अनूप ने चुदाई का आसन बदलते हुए मुझे ऊपर ले लिया और मैं चुदाई के नशे में अनूप के लण्ड पर चूत रगड़ने लगी।
मैं चुदाई का आनन्द उठाते हुए चरम सुख पाने के लिए ‘सटासट..’ लण्ड पर चूत पटकते हुए मुँह से बकने लगी- आअहह अहह.. अहहा.. सईईई.. आई.. मैं गइ सईईइईई.. आह्ह्ह मेरा निकलने वाला है..
तभी मेरी चूत का लावा फूट पड़ा और मैं चूत लण्ड पर दाबे हुए झड़ने लगी। मुझे झड़ता महसूस कर अनूप तुरन्त मुझे नीचे लिटाकर और जल्दी तेज़ी से चोदने लगा।
मेरा काम हो गया और मैं अनूप की बाँहों में ढीली पड़ने लगी लेकिन अनूप तो जोश में मेरी चूत पर ताबड़तोड़ झटके लगाते रहे।
अनूप मेरी चूत तब तक चोदते रहे.. जब तक उनका पानी निकलने को नहीं हुआ और कुछ ही पलों में अनूप ‘अह सस सईईइईई.. आह्ह्ह..’ करते हुए और कस कर मेरे होंठों को चूसते हुए मेरी चूत में लण्ड अन्दर तक डालकर वीर्य चूत में गिराते हुए झड़ने लगे। 
यह कहानी अक्टूबर 2010 की है.. मैं जब मथुरा से वापिस वाराणसी आई तब की है। यह कहानी मेरे ह्ज्बेंड की फैमिली से है, मेरे ह्ज्बेंड के बड़े पिता जी के लड़के की है.. जो लखनऊ में बीडीओ के पद पर थे.. पर जब उनकी बीवी का देहान्त हो गया था.. तो उन्होंने अपनी पोस्टिंग बनारस करा ली थी, वे हमारे ही घर पर रह कर काम कर रहे थे।


RE: Sex Kahani ह्ज्बेंड ने रण्डी बना दिया - sexstories - 06-19-2018

बीवी के न रहने से उनकी सेक्स की भूख बढ़ गई थी। वह हमेशा मुझे घूरते रहते और वह अपने कमरे में मुठ्ठ मार कर वीर्य अपने अंडरवियर गिरा कर छोड़ देते थे।
यह उनका हमेशा का काम हो गया था। जब भी मैं उनके कमरे की साफ सफाई करती.. तो अक्सर उनकी गीली चड्डी मिलती और मैं भी उसे सूँघकर देखती.. पर मेरे दिल में जेठ जी के प्रति कभी गलत भावना या उनसे चुदने का ख्याल नहीं रखती.. मैं यह सोचकर रह जाती कि बेचारे को हाथ से करने के सिवा और क्या कर सकते हैं।
मेरी उनके प्रति सहानभूति थी।
वे कभी मुझसे बोलते नहीं थे, मैं चाय नाश्ता उनके रूम में ही पहुँचा देती और खाना भी वो कमरे में ही खाते थे.. पर जब भी मैं किसी काम से जाती.. तो वह मुझे चोर निगाहों से देखते रहते थे। 
जब से मैं मथुरा से जमकर चुदवा कर आई थी.. मेरे शरीर में एक बदलाव आ गया था और मेरा फिगर पहले से भी अच्छा हो गया था। खासकर मेरे चूतड़.. जो कि किसी को भी अपना दीवाना बना डाले।
मेरे ससुराल आते ही मुझे इतना लण्ड मिल गया कि मैं मथुरा से आने के बाद ह्ज्बेंड से रोज चुदाई करवाती थी क्योंकि मेरी बुर को लण्ड खाने की आदत पड़ गई थी।
मैं अब ज्यादा गौर करने लगी कि जेठ जी का अब कुछ ज्यादा ही सेक्सी और रोमान्टिक हो रहे थे, अब वो कभी भी मौका देखकर मेरे कमरे में तांक-झाँक करते रहते।
कई बार मुझे लगा कि वे मुझे चुदते हुए देखते हैं.. पर मेरे पास कुछ सबूत नहीं था। जब भी मैं रात को सेक्स करती.. तो मुझे ना जाने क्यों महसूस होता कि जेठ जी देख रहे हैं और मेरे अन्दर उत्तेजना बढ़ जाती और मैं खूब खुल कर चिल्ला कर चुदने लगती।
एक दिन की बात है, मैं कमरे में कपड़े बदल कर रही थी और मुझे आहट सी लगी कि कोई मुझे देख रहा है।
उस वक्त घर में मेरे और जेठ के अलावा कोई नहीं था।
जैसे ही मुझे लगा कि सच में कोई है.. मेरा रोम-रोम गनगना उठा।
उस समय मैं ब्रा-पैन्टी में थी और शरीर में वैसलीन का बॉडी लोशन लगा रही थी।
मुझे थोड़ी शरम भी आ रही थी.. मैं उस वक्त अगर शरीर ढकती या पलटती तो जेठ जी समझ जाते कि मैं जान गई हूँ, इसलिए मैं जो कर रही थी.. उसी तरह करती रही ताकि उनको पता ना चले कि मैं समझ गई हूँ कि कोई देख रहा है।
मैं जेठ जी को लज्जित नहीं करना चाहती थी।
मैंने लोशन लगाते हुए थोड़ा तिरछी होकर देखा.. तो मैं शरमा उठी दरवाजे को थोड़ा खोलकर जेठ जी कमरे में मुझे देखते हुए अपना लण्ड बाहर निकाल कर हिला रहे थे।
मेरा विश्वास पक्का हो गया कि जेठ जी की नीयत मेरे पर ठीक नहीं है क्योंकि जेठ जी अपनी बहू को नंगी हालत में देखकर अपने मन में मुझे चोदने का ख्याल रखकर लण्ड पकड़ कर मेरी बुर चोदने का सोच कर मुट्ठ मार रहे थे। पर मैं बार-बार जेठ जी को अपनी भावनाओं में नहीं लाना चाहती थी। 
मेरी भी सोच जवाब दे गई.. जब जेठ जी मेरे विषय में सोचकर लण्ड हिला सकते हैं.. तो मैं क्यों नहीं और मैं तो चूत, फ़ुद्दी, बुर के लिए तरसते जेठ की मदद कर रही हूँ।
जेठ जी को लण्ड हिलाते देखकर मेरी भी वासना हिलोरें मारने लगी।
क्योंकि मेरी आदत भी अलग-अलग मर्दों के लण्ड से चुदने की पड़ गई थी और मैं जब से मथुरा से आई हूँ.. मुझे केवल ह्ज्बेंड के लण्ड से चुद कर संतोष करना पड़ रहा था।
जेठ जी का लण्ड मेरे ह्ज्बेंड के लण्ड जैसा बड़ा था.. पर मोटा कुछ अधिक था, उनके लण्ड का सुपारा काफी फूला हुआ था।
जेठ जी का लण्ड देखकर मेरी चूत ने पानी छोड़ दिया और फिर मैं जानबूझ कर और ज्यादा दिखाते हुए अपने जिस्म में लोशन लगाने के साथ साथ अपनी बुर की फांकों में और चूचियों में लोशन रगड़ कर चूत की मालिश करती रही।
मैं जितना जेठ को चूत दिखाना चाह रही थी उतनी अधिक मेरी चूत चुदने के लिए व्याकुल हुई जा रही थी। मैं चुदाई की वासना के नशे में अपनी पैन्टी नीचे खिसका कर चूत को नंगी करके लोशन लगाते हुए पीछे से झुककर अपनी बुर दिखाने के साथ मैं पनियाई हुई बुर को मसक देती थी। उधर जेठ जी मुठ्ठ मारे जा रहे थे.. वे इस बात से बेखबर लग रहे थे कि मैं जानबूझ कर सब दिखा रही हूँ।
अब मेरी चूत खुद चुदना चाहती थी.. मैं गरम होती जा रही थी। एक बार तो मुझे महसूस हुआ कि मैं जाकर जेठ जी का खुद ही लण्ड पकड़ कर कह दूँ कि हिलाना छोड़ो.. और मेरी बुर आपके सामने खुली पड़ी है.. अपना बाबूराव डाल कर.. इसकी फांकों में अपने बाबूराव का सुपारा फंसाकर.. अपनी गरमी मेरी चूत में डाल दो।
पर मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी।

मैं वासना के नशे में जलते हुए बुर को मसकते हुए दरवाजे की तरफ घूमकर बुर को रगड़ने लगी। ऐसा करने से मेरी चिकनी बुर पूरी तरह जेठ के सामने थी।
मैंने कनखियों से देखा.. तो जेठ जी की लण्ड हिलाने की स्पीड बढ़ गई थी और वह बस ‘सटासट’ सोटते हुए लण्ड पर मुठ्ठ मार रहे थे। मैं गरम और चुदासी चूत लेकर मुठ्ठ मारते देखने के सिवा कर भी क्या सकती थी।
मैंने अपनी ब्रा के हुक को खोल कर अपनी चूचियों को आजाद कर दिया। एक हाथ से मैं अपने कलमी आमों पर लोशन की मालिश करते हुए दबाकर वासना को कम करना चाहती थी। साथ ही दूसरे हाथ से अपनी चूत को मसल रही थी और बाहर मेरे जेठ जी मेरे जिस्म.. चूत और गान्ड को देखते हुए अपने लण्ड को कुचलते हुए अपना लावा निकालना चाहते थे।
वह वासना के नशे में चूर होकर बस अपना वीर्य निकाल कर शान्त होना चाहते थे।
मैं उनकी मदद करते हुए चूत को चौड़ा करते हुए बुर की गुलाबियत को पूरी तरह दिखाते हुए मालिश कर रही थी। मैं यह भी दिखाना चाहती थी कि आपके भाई की चुदाई से मेरी गरमी शान्त नहीं होती.. मुझे लण्ड की जरूरत है। 
और तभी मेरी निगाह दरवाजे पर पड़ी.. जेठ जी का लण्ड वीर्य उगलने लगा था। जेठ जी सिसिया रहे थे- आहह.. सी.. डॉली.. आह.. चुद जा मेरे बाबूराव से.. आह.. सीई.. आह.. डॉली..
वे झड़ रहे थे.. जबकि उनकी आवाज मुझे सुनाई दे रही थी।
वे सब भूल कर बस अपना पूरा वीर्य दरवाजे पर गिराकर चले गए।
शायद यह सब वह उत्तेजना में बोल गए थे।
मैं भी आखरी बार अपनी चूत को मसक कर पैन्टी-ब्रा और कपड़े पहन कर सारी घटना को बैठ कर याद कर रही थी।
तभी मुझे बाहर जेठ के पुकारने की आवाज आई। 
मैं कपड़े ठीक करके बाहर गई, जेठ जी अपने कमरे में थे, उनके कमरे का दरवाजा खुला था।
मैंने अन्दर जाकर पूछा- कोई काम है क्या?
भाई साहब बोले- डॉली, मुझे एक कप चाय बना दो..
मैंने एक बात पर ध्यान दिया कि कुछ देर पहले जो भाई साहब मुझे देख कर कर रहे थे। ऐसा जेठ जी से बात करते कुछ जाहिर नहीं हो रहा था।
मैं बोली- जी भाई जी..
और मैं जैसे ही कमरे के बाहर निकलने के लिए घूमी… जेठ जी की फिर आवाज आई- सुनो.. एक कप नहीं.. दो कप बनाना।
मैं बोली- भाई जी.. कोई और आने वाला है क्या?
बोले- नहीं.. क्यों?
‘आप दो कप के लिए बोले.. तो मैंने सोचा कि कोई आने वाला होगा।’
जेठ जी बोले- तुम मेरे साथ चाय नहीं पी सकती क्या.. जब से आपकी जेठानी का देहान्त हुआ.. मैं अकेले ही पीता और खाता आ रहा हूँ.. अगर तुमको बुरा ना लगे.. तो मेरे साथ बैठ कर कुछ देर चाय के लिए ही साथ दे दो..
‘नहीं भाई साहब.. आप ऐसा क्यों बोल रहे हैं।’
मैं फिर चाय बनाने चली गई और दो कप चाय लेकर जेठ जी के कमरे में गई, एक कप उनको देकर मैं एक कप लेकर सोफे पर बैठ गई।
तभी जेठ अपने चाय का कप लेकर मेरी बगल में बैठ गए।
आज पहली बार जेठ के व्यवहार में बदलाव देख रही थी, जब से वह मेरे यहाँ रह रहे थे.. कभी ठीक से बात भी नहीं करते थे.. पर आज अकस्मात मेरे बगल में बैठ गए।
‘क्या हुआ डॉली.. बुरा तो नहीं लग रहा है?’
‘किस बात का बुरा भाईसाहब?’
‘यही.. जो मैं बिना पूछे आपकी बगल में बैठ गया।’
मैं शरमाते हुए बोली- नहीं.. 
और जेठ जी चाय पीते हुए धीरे से अपना एक हाथ मेरे पीछे कर मेरी कमर और चूतड़ों के पास रख कर हल्के से मेरी कमर को दबा कर हाथ वहीं रखकर रूक-रूक कर सहला देते।
जेठ जी के ऐसा करने से मैं पानी-पानी हो रही थी.. पर मैं जानबूझ कर अंजान बनी रही। 
तभी जेठ ने पूछा- तुम्हारा और रंगीला का मथुरा का टूर कैसा रहा?
मैं बोली- बहुत बढ़िया रहा.. भाई साहब..
‘बहुत समय लगा दिया तुम लोगों ने..’
‘जी भाईसाहब.. कुछ काम भी था उनका..’
‘एक बात कहूँ.. बुरा न मानना..’
‘बोलिए..’
‘तुम्हारे जैसी बीवी पाकर रंगीला का मन तो आने का कर ही नहीं रहा होगा..’ 
ऐसा कहते वक्त जेठ जी ने अपना पैर मेरे पैर से सटा दिया।
एक तो कुछ देर पहले ही जो कुछ जेठ ने किया था.. उससे तो मेरी चूत गर्म थी ही.. उस पर से जेठ की हरकतें मेरे रोम-रोम में सेक्स का रोमांच पैदा कर रही थीं। मुझे लगा कि अगर मैं हटी नहीं.. तो मैं खुद जेठ जी की गोद में जा बैठूंगी।


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चाय खत्म हो चुकी थी और मैं कप लेकर उठने लगी.. तभी जेठ जी ने मेरा हाथ पकड़ कर मुझे उठने से रोक लिया।
‘क्या हुआ.. क्यों जा रही हो.. क्या मुझ अकेले को अकेला छोड़ कर जा रही हो.. कुछ देर और बैठो ना..’
और मुझे जबरिया अपने पास बैठा लिया।
मैं भी विरोध न करते हुए बैठ गई। 
‘डॉली अब मेरा कौन है.. वाईफ के बाद तुम ही तो हो..’
यह दो-अर्थी बात जेठ जी ने बोली थी।
इस बात से वे मेरी तरफ से अपनी नीयत साफ कर चुके थे.. पर मैं जानबूझ कर भी उनकी बात का मतलब नहीं समझना चाह रही थी। 
मैं बोली- यह क्या कह रहे भाई साहब.. मैं भाभी जी की जगह कहाँ ले सकती हूँ? भाई साहब मैं समझ सकती हूँ कि आपका दु:ख.. आप अपनी दूसरी शादी कर लीजिए.. मैं आपको बना खिला तो सकती हूँ.. पर और काम तो आपकी वाईफ ही कर सकती है।
मैंने भी यह बात जानबूझ कर कह दी।
‘नहीं.. डॉली.. मैं अब शादी नहीं करूँगा.. वैसे भी तुम तो हो ही..’
‘मेरे होने ना होने क्या.. मैं तो आपका हर काम तो कर सकती हूँ.. पर ‘वो’ काम..’
मैंने जानबूझ कर बात अधूरी छोड़ दी। 
‘कौन सा काम? जो तुम नहीं कर सकती… बोलो डॉली?’
‘आप खुद समझदार हैं.. समझ लीजिए..’
‘अगर वो काम भी तुम कर दो तो.. क्या फर्क पड़ेगा..’
यह कहते हुए जेठ जी ने मेरी जाँघों पर हाथ रख दिए और थोड़ा दबाकर बोले- तुम भी तो बड़ी खूबसूरत हो..
‘मेरी खूबसूरती तो आपके भाई के काम आएगी.. आपके नहीं..’
मैं कहते हुए एक झटके से उठ कर उनके कमरे से भाग गई और पीछे जेठ भी लपके।
मैं अपने कमरे तक पहुँच पाती.. उसके पहले मुझे जेठ ने दबोच लिया और एक हाथ मेरे चूतड़ों और एक हाथ से मेरी चूची को पकड़ने के बहाने दबाते हुए बोले- तुम क्यों नहीं कर सकती? 
मैं खुद को छुड़ाने को जितना छटपटाती.. उतना ही वह मेरे जिस्म को दबोच रहे थे। वह मेरे जिस्म के लगभग सारे हिस्सों को स्पर्श करते हुए बोले- डॉली.. सच बताओ.. हर काम तुम कर रही हो तो ‘वह’ क्यों नहीं?
मैं बोली- मैं आपकी बहू हूँ.. छोटे भाई की बीवी हूँ.. कोई जेठ अपनी बहू को छूता तक नहीं है और आप तो..
मैंने फिर बात को अधूरा छोड़ दिया। 
‘बोलो डॉली.. मैं तो.. क्या?’
‘मैं नहीं जानती.. छोड़ो मुझे..’
‘नहीं.. पहले बोलो..’

आखिर में मैंने एक ही सांस में बोल दिया- आपकी नीयत अपने छोटे भाई की बीवी पर खराब हो गई है.. जो नहीं होना चाहिए!
‘नहीं डॉली.. ऐसी बात नहीं है.. मैं तुमको चाहता हूँ.. प्यार करता हूँ.. नहीं तो भला आज तक कभी भी मैंने तुमको कुछ बोला.. और कहा?’
मैं बोली- सभी मर्द ऐसे ही कहते हैं.. आज तक आपने मुझे कुछ दिया?
‘मैंने कई बार सोचा कि तुम्हें कुछ दूँ डॉली.. पर मैंने सोचा कि कहीं तुम गलत ना समझो।’ 
मैं अब भी उनकी बाँहों की पकड़ में थी। वे कहते हुए मेरे होंठों को अपने होंठों में भर के किस करने लगे।
मैं बोली- प्लीज.. ऐसा मत करो..
पर वह मेरी छाती और चूतड़ों को मसकते हुए किस करते रहे।
मेरी साँसें अकुला उठीं.. उनकी हरकतें मेरी चुदने की चाहत को भड़का रही थीं।
जेठ का हाथ और मेरी बुर की चुदाई.. जेठ के लण्ड से.. यह सब सोचते महसूस करते हुए मेरी बुर पानी-पानी हो रही थी।
फिर भी मैं सती सावित्री बनते हुए मैंने जेठ से अपनी चूत को बचाने की कोशिश का ड्रामा करे जा रही थी।
मेरी जाँघों में जेठ का लण्ड खड़ा होकर ठोकर मार रहा था और जेठ बिना मेरी इजाजत के मेरे जिस्म से खेल रहे थे।
तभी जेठ का हाथ मेरी बुर पर पहुँच गया और जेठ ने मेरी बुर को हाथ में भरकर भींच लिया और मेरे मुँह से एक मादक सिसकी निकल गई- आहसीईई.. भाई साहब.. यह क्या कर रहे हैं छोड़डड दीजिए.. आह..सीई.. मैं आपके भाई की पत्नी हूँ और मैं भी तो तुम्हारे ह्ज्बेंड का बडा भाई हूँ।
‘मेरी भी वासना है.. कितने दिन तेरी पैन्टी पर मुठ्ठ मार कर शान्त करूँ.. मेरी जान..’
और तभी दरवाजे की घन्टी बज उठी.. हम दोनों चौंक कर अलग हुए। इस टाइम कौन होगा? मैं जैसे ही जेठ के बाहुपाश से छूटी.. सीधे अपने कमरे की तरफ भागी और अन्दर जाकर मैंने दरवाजा बंद कर लिया। 
जेठ जी मेन गेट खोलने चले गए.. मैंने अन्दर पहुँच कर कपड़े और चेहरे को ठीक किया.. फिर बाहर की आहट लेने लगी।
तभी मुझे ह्ज्बेंड की जेठ जी से बात करने की आवाज सुनाई दी। मैं सीधे जाकर बिस्तर पर लेट गई ताकि लगे कि मैं आराम कर रही थी.. ऐसा ना लगे कि मैं उनके बड़े भाई से बुर चुदाने की कोशिश कर रही थी।
मैं नहीं चाहती थी कि मेरे ह्ज्बेंड को मेरे और जेठ के बीच जो हुआ.. या होगा.. उसका पता चले।
तभी ह्ज्बेंड ने दरवाजे पर दस्तक दी। 
मैं नहीं चाहती थी कि मेरे ह्ज्बेंड को मेरे और जेठ के बीच जो हुआ या होगा.. उसका पता चले। तभी ह्ज्बेंड ने दरवाजे पर दस्तक की। मैंने उठकर दरवाजा खोला.. सामने ह्ज्बेंड खड़े थे.. मैं मुस्कुरा कर बगल को हो गई और जैसे ही ह्ज्बेंड अन्दर आए.. मैंने दरवाजा बंद कर दिया और उनसे लिपट गई।
मेरी चूत तो पहले से ही जेठ जी के छूने और रगड़ने से गरम थी.. मुझे चुदाई की चाहत हो रही थी। मैं उन्हें किस करते हुए उनका लण्ड पैंट के ऊपर से दबाने लगी। 
‘अरे मेरी जान.. बड़ी सेक्सी मूड में हो.. क्या बात है?’ 
मैं बोली- जानू.. मुझे बड़ी चुदास लग रही है.. एक बार मेरी बुर पर चढ़ाई कर दीजिए और कस कर मेरी बुर चोद दो.. जानू..
ह्ज्बेंड बोले- डॉली यह मथुरा नहीं है.. यह घर है और भाई जी बाहर बैठे हैं। यह सब काम अभी नहीं हो सकता और अभी रात में तेरी चूत को दो बार चोदा है न.. और अभी दोपहर में ही तुम फिर चुदासी हो उठीं.. 
मैं उन्हें कैसे समझाती कि यह मेरी चूत की चुदास आपके भाई साहब की ही देन है.. पर मैं बात बना कर बोली- जानू.. जब से मथुरा से आई हूँ.. मेरी चुदने की इच्छा बढ़ती जा रही है.. मैं क्या करूँ.. मेरी क्या गलती है.. तुम तो जानते हो.. वहाँ कितने लोगों के साथ एक ही दिन में मेरी बुर चुद जाती थी और अब तो केवल आप ही चोद रहे हो शायद एक से अधिक मर्द से चुदने कि आदत पड़ गई है.. आपकी चूत को.. इसी लिए इस टाईम मेरी चूत की चुदास बढ़ गई है।
‘मत घबराओ मेरी जान.. आज रात मैं जम कर चोदूँगा और देखो अभी भाई जी बाहर बैठे हैं.. मुझे जाना भी है.. बस तुम जल्दी से लन्च करा दो और वादा करता हूँ कि रात में तुम्हारी चूत की सारी गरमी अपने लण्ड से चोदकर निकाल दूँगा।’
यह कहते हुए ह्ज्बेंड मुझे अलग करके कपड़े निकाल कर फ्रेश होने बाथरूम में चले गए।


RE: Sex Kahani ह्ज्बेंड ने रण्डी बना दिया - sexstories - 06-19-2018

मैंने रसोई में जाने के लिए जैसे ही दरवाजा खोला.. सामने जेठ जी बैठे दिखाई दिए।
मेरा जेठ जी से सामना होते ही मुझे शरम आ गई और मैं निगाह नीचे किए हुए रसोई में चली गई, मैंने खाना गरम करके खाने की टेबल पर लगा दिया।
मैंने नोटिस किया कि जेठ की निगाहें अब भी मेरे जिस्म का मुयायना कर रही थीं।
तभी ह्ज्बेंड भी बाहर आ गए और एक साथ सब बैठ कर लन्च करने लगे।
मैं और ह्ज्बेंड एक तरफ थे और जेठ जी सामने बैठे थे और जेठ जी इस मौके का भी पूरा फायदा उठा रहे थे। वह टेबल के नीचे मेरे पैर से पैर सटाकर सहलाने लगे और मैं उनकी इस हरकत से डर रही थी कि कहीं ह्ज्बेंड को पता ना चल जाए.. इसलिए मैं बिलकुल शांत दिखना चाह रही थी..
पर जेठ की ढिठाई कुछ ज्यादा ही बढ़ गई थी, इतना सब हो जाने पर भी मैं जेठ जी से चुदना नहीं चाहती थी.. भले मेरी चूत में गैर का लण्ड लेने की इच्छा बढ़ रही थी.. परन्तु मैं अपनी ईज्जत घर में नीलाम नहीं करना चाहती थी.. बाहर अगर कोई चोदता है.. तो उससे कोई लेना-देना नहीं रहता.. बस चूत चुदाओ और वह अपने रास्ते.. मैं अपने.. पर यहाँ तो जेठ की नीयत मेरे पर ठीक नहीं थी।
पता नहीं कब से.. पर उनकी हिम्मत कभी नहीं हुई लेकिन इस सबका कारण मैं थी.. मैंने क्यों उनको अपने जिस्म को देखने दिया.. क्यों मैंने अपना बदन नहीं ढका.. और फिर मैं भी तो वासना के नशे में चूर हो कर उनकी हरकतों का कोई विरोध नहीं कर पाई।
जेठ जी तो वाईफ के न रहने के बाद से अब तक बेचारे चूत के लिए तरस रहे थे, पता नहीं कितनी बार मुझे चुदते देख कर या मेरी कल्पना करके मेरे नाम की मुठ मार चुके होगें.. पर कभी मेरे साथ छेड़खानी नहीं की थी।
इसमें जेठ जी का दोष नहीं है.. उनको भी एक जनाना जिस्म और चूत की जरूरत है.. पर मैं अपनी चूत कैसे दे सकती हूँ। यह काम मैं नहीं कर सकती.. मेरी कल्पना को शायद ह्ज्बेंड ने ताड़ लिया था।
ह्ज्बेंड बोले- क्या हुआ.. किस सोच में डूबी हो.. हम लोग खाना खा चुके हैं.. और तुम अभी वैसे ही बैठी हो।
मैं हकलाते हुए बोली- ककक..कुछ.. नननन..हहीं.. बस ऐसे ही.. 
और मैं खाना खत्म करके बर्तन लेकर रसोई में चली गई, फिर साफ-सफाई करके मैं बेडरूम में आकर लेट गई, ह्ज्बेंड पहले से ही बिस्तर पर लेटे थे, मैं उनके बगल में लेट गई।

कुछ देर बाद ह्ज्बेंड ने कहा- ज्यादा मन हो रहा है चुदने का?
मैं जानबूझ कर बोली- कुछ खास नहीं..
वह बोले- लेकिन तुम खाने के दौरान गहरी चिंता में थीं.. बताओ क्या बात है?
मैं बोली- कुछ नहीं..
तब ह्ज्बेंड बोले- मुझे पता है.. 
ह्ज्बेंड के इतना कहते ही मैं कांप गई.. क्या पता है.. कहीं मेरे और जेठ के बीच की बात तो नहीं?
मैं- क्या पता है आपको?
‘यही कि तुम्हारी इतनी चुदाई हो चुकी है कि तुम्हारी चुदने की इच्छा बढ़ गई है।’ 
मैंने सिर्फ ‘हाँ’ मैं सर हिला दिया और ह्ज्बेंड मुझे सहलाते हुए मेरे लहंगे को ऊपर उठाकर मेरी चूत सहलाते हुए मेरी पैन्टी को नीचे करके मेरी चूत पर मुँह लगा कर मेरी बुर चूसने लगे।
मेरी तपती चूत पर ह्ज्बेंड का मुँह पड़ते मेरी ‘आह.. उफ.. सीसी ईई..’ निकलने लगी।
कुछ देर तक मेरी चूत को पीने के बाद बोले- डॉली.. तुम्हारी चूत तो चुदने के लिए उतावली हो रही है।
ह्ज्बेंड ने मेरी पैन्टी पैर से बाहर निकाल दी और बोले- जान… अभी मैं तुम्हारी चूत में लण्ड घुसाकर कुछ राहत दे देता हूँ.. पर पूरी चुदाई रात में करूँगा। 
ह्ज्बेंड ने मेरी बुर पर अपना सुपारा रख कर एक जोर का शॉट मारा और लण्ड पूरा चूत के अन्दर एक ही शॉट में घुसता चला गया।
ह्ज्बेंड अपना पूरा लण्ड मेरी बुर में डाल करके शॉट पर शॉट देने लगाने लगे।
मैं ‘आहहह आहहहह.. सिईईईई.. आहहह..’ करने लगी।
अभी आठ-दस शॉट दिए.. तभी ह्ज्बेंड का फोन बज उठा और ह्ज्बेंड ने लण्ड बुर से बाहर खींचकर फोन उठा कर ‘हैलो’ कहा और फोन रख कर बोले- डॉली मुझे जाना है.. तुम आराम करो.. कुछ राहत तो मिल ही गई होगी। 
मैं बोली- आपका लण्ड जाने के बाद मेरी बेचैनी और चूत की प्यास और बढ़ गई है.. मेरी चुदाई पूरी करो.. ऐसे प्यासी पत्नी को छोड़ कर नहीं जाया जाता। मेरी चूत चुदने के लिए फड़फड़ा रही है। ऐसे में किसी ने मेरी वासना का नाजायज फायदा उठा लिया तो..
मेरी बात को ह्ज्बेंड ने मजाक में ले लिया और बोले- तब तो मेरी प्यासी रानी की चूत की प्यास बुझ जाएगी और रात मुझे तुम्हारी चूत मारने की मेहनत कम करनी पड़ेगी मेरी जान..
ह्ज्बेंड हँसते हुए चले गए और मेरी चूत चुदने के लिए चुलबुलाती रह गई।
ह्ज्बेंड के जाने के बाद मैं वैसे ही बिस्तर पर पड़ी रही, कुछ देर बाद मुझे नींद आ गई और मैं सो गई।
जब मेरी नींद खुली तो मुझे ध्यान आया कि मैं वैसे ही सो गई हूँ.. जिस हालत में ह्ज्बेंड चूत में लण्ड घुसाकर गए थे.. बिलकुल खुली चूत..
मैं अपनी प्यारी चूत को अपने हाथों से मसकते हुए ‘आहसीईई..’ कह कर उठी और बाथरूम चली गई। मैं फ्रेश होकर आई तो मैं अपनी पैन्टी खोजने लगी.. लेकिन मेरी पैन्टी कहीं दिख ही नहीं रही थी।
आखिर मेरी पैन्टी गई कहाँ.. यहीं तो ह्ज्बेंड ने निकाल कर फेंकी थी।
काफी खोजने पर भी नहीं मिली.. तो मैं फिर यूँ ही चाय बनाने चली गई। यह सोच कर कि शायद ह्ज्बेंड मुझे सताने के लिए साथ ले गए हों..

मैं जेठ जी के और अपने लिए चाय बना कर जेठ जी को देने उनके कमरे में गई। मैंने जैसे ही दरवाजा खोला तो देखा कि जेठ जी कमरे में सोए हुए थे, उनको सोया हुआ देख कर मैंने कमरे में चारों तरफ नजर दौड़ाई पर मेरी पेंटी यहाँ भी नहीं दिखी।
मैंने टेबल पर ट्रे रख कर जेठ जी को आवाज दी।
मेरी आवाज सुनकर जेठ जी चौंकते हुए उठ बैठे।
मैंने कहा- आप बहुत सो रहे हैं।
‘नहीं यार, बस थोड़ी नीद आ गई और सो तो तुम भी रही थी!’
‘आप फ्रेश होकर आइए और चाय पी लीजिए, नहीं तो चाय ठंडी हो जाएगी।’


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