Muslim Sex Stories सलीम जावेद की रंगीन दुनियाँ
04-25-2019, 11:56 AM,
#41
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मुहल्लेदारी से रिश्तेदारी तक

भाग -8



दावत के रंग


इतनी देर में देखा की दूसरे रूम से हमारी प्यारी भाभी की चूत, की चुदाई समाप्त कर विश्वनाथजी नंगे ही हमारे रूम में घुसे और मुझे महेश से चिपका देखकर बोले ' अबे किसी और का नंबर आएगा आ नही, या सारा समय तू ही इस नंद रानी को चोदता रहेगा.

महेश - नही यार विश्वनाथ भाई मैं चोद चुका, तू इसे संभाल, ये बड़ी मजेदार चीज है। अगर आज ही बाकी चूतों का स्वाद न लेना होता तो मैं इसी से चिपका रहता।

विश्वनाथजी- अच्छा ये बात है देखता हूँ कितनी मजेदार चीज है इसकी भाभी को तो अभी मैं चोदकर आ रहा हूँ वो भी बड़ी मस्त चीज है जा उसका भी मजा लेले ।

महेश – मै मानता हूँ सच में इसकी भाभी बड़ी मस्त चीज है पर उसे तो मैं मेले मे चोद चुका हूँ अब में चला इसकी मामीजी के पास।

यह कह कर महेश ने मुझ नंगधड़ंग को विश्वनाथजी की तरफ धकेला और बाहर चला गया.

विश्वनाथजी ने तुरंत मेर नंगा बदन अपनी बाहों में धर दबोचा लिया और मेरे गाल चूमने लगे। मुझे बेहद शरम आ रही थी क्योंकि कल तक तो हम सब उनके मेहमान थे और हमारी भाभीजी को चोदकर हम सब उनके साथ अपने से बड़े जैसा व्यवहार करते थे और आज उन्होंने न सिर्फ़ मुझे एक मर्द के साथ नंगा देखा बल्कि बल्कि अब वो मुझे अपनी बाहों में दबोचकर मेरा एक गाल मुँह में भर कर चूस रहे थे तभी वो मेरी दोनो चूचियों को कस कर भोंपु की तरह दबाने लगे. जिससे मुझे दर्द होने लगा और मैं सीस्या उठी तभी उन्होंने मुझे खींच कर पलंग पर लिटा दिया और वहीं ज़मीन पर पड़ा हुआ मेरी पेटिकोट उठा कर मेरी चूत पोंछ्ते हुए विश्वनाथजी बोले-

“कहो बेला मज़ा आ रहा है न ।”

और मेरे जिस्म पर छा गये। कभी मेरे गालो को चूसते, कभी मेरी चूचियाँ जोरो से दबा देते । जैसे-जैसे वो मेरे बड़ी बड़ी चूचियों की पंपिंग कर रहे था, वैसे ही उसका लण्ड खड़ा हो रहा था मानो कोई उसमें हवा भर रहा हो.

उन्होंने मेरा हाथ पकड़ कर अपने लण्ड पर रखा और मुझे लण्ड सहलाने का इशारा किया. मैंने शर्माकर अपना हाथ उसके लण्ड से हटा लिया तो उन्होंने पूछा-

“अच्छा नही लगा रहा है क्या?”

मैं इनकार करते हुए बोली –

“ नहीं ये बात नही है पर हमको शर्म आ रही है ।”

विश्वनाथजी ताज्जुब और झुँझलाहट से बोले –

“अभी तू महेश के साथ थी तब तो तुझे शर्म नहीं आ रही थी अब अचानक ये शर्म कहाँ से आ गयी?”

मैं- दरअसल आप अबतक हमसे बड़े बुजुर्ग जैसा व्यवहार करते आये थे जो कि इस माहौल मे भी बीच बीच मे याद आ जाता है। 

विश्वनाथजी हँसकर बोले-

ओहो तो ये बात है अरे वो तो हमारे दिखाने के दांत थे बेला हम तो बड़े फ़्री तबियत के आदमी हैं अगाली बार तुमको तब बुलायेंगे जब मेरी पत्नी भी यहाँ हो तब देखना ये दोनो रमेश और महेश अपनी बीबियों के साथ आयेंगे और मैं इनके सामने इनकी बीबियों को और ये मेरी बीबी को चोदेंगे। चूत और लण्ड तो होते ही मजे लेने के लिए हैं आखिर तुम भी तो इसीलिए दो दिनों से अलग अलग लण्डों से चुदकर अपनी चूत को उन लण्डों का मजा दे रही हो, तो शर्म छोड़ लण्ड सहलाओ और इस लण्ड का भी मजा लो ।”

अब मेरी झिझक एकदम दूर हो चुकी थी । मैं मजे से उनका लण्ड सहलाने लगी. जैसे-जैसे लण्ड सहला रही थी मुझे आभास होने लगा कि विश्वनाथजी का लण्ड महेश के लण्ड से करीब आधा इंच मोटा और 2 इंच लंबा है. मैने सोचा जो होगा देखा जाएगा. उनका लण्ड एक लोहे के रोड की तरह कड़ा हो गया था.

अब विश्वनाथजी ने पास पड़ा तकिया उठा कर मेरे चूतड़ों के नीचे लगाया और फिर कटोरी से ढेर सारा घी मेरी चूत के मुहाने पर लगा कर अपना लण्ड मेरी चूत के मुँह पर रख कर ज़ोर का धक्का मारा. उसका आधे से ज़्यादा लण्ड मेरी चूत में घुस गया. में सीस्या उठी. जबकि में कुछ ही देर पहले महेश से चूत चुदवा चुकी थी फिर भी मेरी चूत बिलबिला उठी.उसका लण्ड मेरी बुर में बड़ा कसा-कसा जा रहा था. फिर दुबारा ठप मारा तो पूरा लण्ड मेरी चूत में समा गया.

मैं जोरो से चिल्ला उठी 'उईईईईईई माँ, ............. दर्द हो रहा

है, प्लीज़ थोड़ा धीरे डालो , मेरी फटी जा रही है

विश्वनाथजी - अरे नहीं फटी जा रही है और न ही फ़टेगी, पहली बार मेरे लण्ड से चुदवाते समय शुरु में सब औरतों को ऐसा ही लगता है अभी मैं धीरे धीरे करुँगा, दो मिनट में नसिर्फ़ दर्द चला जायेगा बल्कि तुम्हें इतना मजा आयेगा कि और जोर से चुदवाने के लिए हल्ला मचाओगी ।”

अब वो मेरे गुदाज कन्धे पकड़ कर बारी बारी से मेरे निपल चूसते हुए धीरे-धीरे अपना लण्ड मेरी चूत के अंदर बाहर करने लगा । धीरे-धीरे मेरी बुर भी पानी छोड़ने लगी. बुर भीगी होने के कारण लण्ड बुर में करीब अंदर बाहर जाने लगा, और मुझे भी मज़ा आने लगा. और मैं चूतड़ उचकाने लगी क्योंकि वो कुछ रुक-रुक कर मुझे चोद रहा था । जब मुझसे रहा नही गया तो में खुद ही ऊपर से अपनी कमर के धक्के उसके लण्ड पर मारने लगी और बोली-

“हाय राजा इतना धीरे क्यों चोद रहे हो मेरी चूत, ज़रा जल्दी-जल्दी करो ना ।”

ये सुन विश्वनाथजी ने मुझे पलटी देकर अपने ऊपर कर लिया और कहा-

अब तू ऊपर से अपनी चूत से मेरा लण्ड चोद ।”

जब मैं ऊपर से उनके लण्ड पर बैठते हुए घस्सा मारती तो वो नीचे से ऊपर कमर उचका कर अपने लण्ड को मेरी चूत में ठाँसता था और मेरी दोनो चूचियाँ पकड़ कर नीचे की ओर खींचता था जिस से लण्ड और ज्यादा चूत के अंदर तक जा रहा था और मुझे बेइन्तहा मजा आ रहा था मैं ऊपर से खूब जोर का घिस्सा मार रही थी. इसी तरह से मेरी चूँचियाँ दबवाते खिचवाते उनका लण्ड चोदते हुए धीरे धीरे हमारी चुदाई की स्पीड बढ़ने लगी और मेरी चूँचियाँ दबाने खींचने के साथ-साथ वो उनपर मुँह भी मारता जाता था और कभी मेरे निपल अपने दाँतों से काट ख़ाता था तो कभी मेरे गालों पर चुम्मा भर लेता था.पर जब वो मेरे होंठों को चूसता तो में उत्तेजना से बेहाल हो जाती थी ।

मैं मज़े में बड़बड़ा रही थी – हाय रआज़ा बहुत मज़ा आ रहा है, और ज़ोर से चोदो चोद कर फ़ाड़ दो और बना दो मेरी चूत का भोसड़ा..............

अब उत्तेजना तो बहुत बढ़ गई थी पर शायद विश्वनाथजी ने महसूस किया कि मैं थकने लगी हूँ तो अचानक वे मुझे लिए लिए ही उठ खड़े हुए और मुझे बिस्तर पर पटक कर एक ही झटके में अपना विशालकाय लण्ड मेरी चूत में ठांस दिया और मेरी धुंआदार चुदाई करते हुए मेरी चूत की धज्जियां उड़ाने लगे। मैंने भी अपनी तरफ से नीचे से और ज़ोर ज़ोर चूतड़ उचका कर उनके लण्ड के धक्के अपनी चूत में लेने लगी । जब उसका लण्ड पूरा मेरी चूत के अंदर होता था तो में चूत को और कस लेती थी, जब लण्ड बाहर आता था तो चूत को ढीला चोद देती थी । अचानक हमारे मुँह से निकला उम्म्म्म्म्ह आआआह्ह्ह

और मेरी चूत झड़ने लगी और उसके कुछ ही धक्कों के बाद विश्वनाथजी के लण्ड ने भी धार चोद दी और वो मारे आनन्द के मेरे गुदाज जिस्म से चिपट गये ।

चुदाई प्रोग्राम रात भर इसी तरह चलता रहा और ना जाने मैं, भाभी और मामीजी कितनी बार चुदीं होंगी, पर एक अजीब बात हुई हुआ यों कि महेश को शायद मामीजी का गोरा गुदाज बदन कुछ ज्यादा ही पसन्द आया था क्योंकि वह उनके गुलाबी गुदाज बदन से देर तक खेलता रहा(जैसा कि मामीजी ने बाद में बताया) और उसने चुदाई देर से शुरु की सो जब विश्वनाथजी मुझे चोद के हटे और लगभग तभी रमेश भाभी को चोद के हटा था उस समय महेश और मामीजी धुंआदार चुदाई के बीच में थे। भाभीजी और विश्वनाथजी तो वैसे भी एक दूसरे को पसन्द करते थे सो वख़्त बरबाद न करते हुए विश्वनाथजी भाभीजी पर पिल पड़े फ़िर तुक कुछ ऐसी बनी कि विश्वनाथजी मेरे और भाभीजी बीच ही बटे रह गये और मामीजी तक पहुँच ही नहीं पाये और नशे में होने के कारण, उन्होंने ये कमी महसूस भी नहीं की। उस रात अंत में थक हारकर हम सभी यूँ ही नंगे ही सो गये.

सुबह मेरी आँख खुली तो देखा कि में नंगी ही पड़ी हुई हूँ. मैं जल्दी से उठी और कपड़े पहन कर बाहर किचन की तरफ गयी तो देखा कि भाभी भी नंगी ही पड़ी हुई हैं. मुझे मस्ती सूझी और में करीब ही पड़ा बेलन उठा कर उस पर थोडा सा आयिल लगा कर उनकी चूत में घोंप दिया. बेलन का उनकी चूत में घुसना था कि वो आआआअहह् करते हुए उठ बैठी, और बोली

' यह क्या कर रही हो'.

मैं बोली

' मैं क्या कर रही हूँ, तुम चूत खोले पड़ी थी में सोची तुम चुदासी रह गईं हो, पर चोदने वाले तो कब के चले गये, इसलिये तुम्हारी चूत में बेलन लगा दिया.

भाभी-

' तुझे तो बस चुदाई ही सूझती रहती है'.

मैंने उनकी चूत से बेलन खींच कर कहा –

' चलो जल्दी उठो, वरना चन्दू मामा मामी आ जाएँगे तो क्या कहेंगे. रात तो खूब मज़ा लिया, कुछ मुझे भी तो बताओ क्या किया?

भाभी- तूने भी तो वही किया या तू भजन कर रही थी । बाद में बात करेंगे कि किसने किससे क्या किया' कह कर कपड़े पहन ने लगी तो में मामीजी को उठाने चली गयी.

मामी भी मस्त चूत खोले पड़ी थी । मैंने उनकी चूचियों पर हाथ रख कर उन्हे हिलाया और उठाया और कहा

' मामी यह तुम कैसे पड़ी हो कोई देखेगा तो क्या सोचेगा.'

वो जल्दी से उठी और कपड़े पहन ने लगी, फिर मेरे साथ ही बाहर निकल गयी. हम तीनों लोग उठ कर जल्दी जल्दी दैनिक क्रियाओं नहाधोकर फारिग हुए ताकि रात का कोई निशान हमारे जिस्मों या कपड़ों पे ना दिखे

मैं बैठक में गयी तो देखा कि विश्वनाथजी भी बैठक में रमेश और महेश के पास ही पड़े हुए थे. विश्वनाथजी का लण्ड धोती के अन्दर खड़ा था जिससे धोती तम्बू जैसी दिख रही थी । शयद कोई चुदाई का सपना देख रहे होंगे । मुझे शरारात सूझी मैंने विश्वनाथजी कि धोती उनके लण्ड पर से हटा दी और बाहर आकर मामीजी से बोली-

“मैं और भाभी नाश्ता बनाते हैं । ये अच्छा है कि चन्दू मामाजी तो दारू की वजह से आज देर से उठेंगे आप जल्दी विश्वनाथजी और मेहमानों को जगा दें जिससे चन्दू मामाजी के उठने से पहले वो लोग भी दैनिक क्रियाओं नहाधोकर फारिग हो अपने आप को दुरुस्त कर लें जिससे चन्दू मामाजी को कोई शक न हो ।”

मामीजी समझ गयी कि मेरा इशारा हम तीनों की लाली, बिन्दी आदि के विश्वनाथजी या रमेश, महेश के जिस्मों या कपड़ों पर मिलने की तरफ़ है। वो बैठक में उन्हें जगाने गयी । मैं ौर भाभी भी तुरंत दौड़ते हुए उनके पीछे गये और उस कमरे के बाहर छुप कर देखने लगे कि देखें विश्वनाथजी को उस हाल में देख मामी जी उन्हें कैसे जगाती हैं । विश्वनाथजी चारौ खाने चित्त लण्ड खड़ा किये सो रहे थे उन्हें इस हाल में देख मामीजी जगाने में झिझकीं । सो उन्हें न जगा कर रमेश, महेश को जगाने लगीं । रमेश और महेश ने आँखें खोली तो नहाई धोई पूरे श्रंगार में मामीजी को अपने ऊपर झुकी देख आवाक रह गये । झुकी होने के कारण मामीजी की दोनों गुलाबी गोरी चूचियाँ ब्लाउज में से झाँक रहीं थीं । रमेश और महेश ने उठते उठते ऊपर से ही ब्लाउज में हाथ डाल चूचियाँ थाम लीं और उन्हें अपनी गोद मे खीचते हुए बोले –

“आओ भौजी यहां बैठो, लगता है भाईसाहब सो रहे हैं क्यों न एक राउन्ड सबेरे सबेरे हो जाय, दिन अच्छा बीतेगा। क्या ख्याल है?”

मामीजी ने नही नहीं करते हुए पीछे हटने की कोशिश की और सन्तुलन न संभाल सकने के कारण उनकी गोदमें गिर पड़ीं और रमेश और महेश के हाथ ब्लाउज में घुसे होने के कारण खिंचकर ब्लाउज की साड़ी चुटपुटिया खुल गयीं । महेश ने ब्रा का हुक खोल दिया और रमेश ने ब्रा ऊपर हटा दी । मामीजी की दोनों बड़ी बड़ी चूचियाँ थिरक कर आजाद हो गयीं । अब नजारा ये था कि रमेश और महेश ने मामीजी को गोद में बैठा रखा था, उनके ब्लाउज के दोनो पल्ले के पट खुले हुए थे और उन खुले पटों में से झांकती हलव्वी चूचियाँ में से एक रमेश और एक महेश ने थाम रखी थी और निपल चूसते हुए वे दोनों उनकी साड़ी और पेटीकोट ऊपर को चढ़ाने की कोशिश कर रहे थे मामीजी की गोरी गुलाबी मांसल पिन्डलियाँ और केले के तनों जैसी जाँघें आधी नंगी हो चुकीं थी। सकपकई मामीजी उन्हें समझाने की कोशिश कर रहीं थी,-

“अरे अरे ये क्या कर रहे हो अगर तुम्हारे भाईसाहब जाग के नीचे आ गये तो साड़ी मस्ती धरी रह जायेगी और सब चौपट हो जायेगा ।”


इस उठ पटक और आवाजों को सुनकर विश्वनाथजी जाग गये और ये नजारा देखके बोले,-

“अरे अरे ! ये क्या बेहूँदापन है लड़कों, भौजी ने रात जरा सी छूट क्या दे दी तुम लोग पजामे से ही बाहर हुए जा रहे हो। अरे ! दिन का वख्त है कुछ तो लिहाज करो । छोड़ो इन्हें ! भौजी आप इधर आ जाइये ।”

विश्वनाथजी की आवाज सुनकर रमेश और महेश के हाथ जैसे ही जरा सा ढीले पड़े मामीजी भाग कर विश्वनाथजी के पास जा बैठीं ताकि अपने कपड़े ठीक कर सकें। विश्वनाथजी ने उन्हें अपने कसरती बदन से सटा लिया और उनकी साड़ी की सिलवटों पर हाथ से झाड़ते हुए ऐसा दिखाया कि जैसे उनके कपड़े ठीक करने में मदद करना चाहते हों। मामीजी को, अपने गुदाज बदन पर, विश्वनाथजी के कसरती बदन का अहसास और आत्मीयता के बोलों ने काफ़ी राहत दी । मामीजी ने अपने कपड़े ठीक करने के लिए, विश्वनाथजी से सटे सटे ही अपनी पीछे से खुली ब्रा के सिरे पकड़ने के लिए हाथ पीछे ले गयीं।

“हद कर दी लड़कों ने, देखो तो क्या हाल कर दिया बिचारी भौजी का ।” ऐसे बड़बड़ाते हुए विश्वनाथजी ने आगे से ब्रा में उनकी चूचियों डालने का उपक्रम किया, पर जैसे ही उनके बड़े मर्दाने हाँथ में मामीजी की हलव्वी छाती आई, मामीजी ने चौंककर विश्वनाथजी की तरफ़ देखा। विश्वनाथजी के कसरती बदन में दबा मामीजी का गुदाज बदन और उनके बड़े मर्दाने हाथ में मामीजी की हलव्वी छाती, अब मामीजी और विश्वनाथजी दोनो की साँसे तेज चलने लगी थी, दोनो की नजरें मिलते ही विश्वनाथजी उखड़ी साँसों के साथ बोले-

“लड़कों का भी ज्यादा दोष नहीं है भौजी, आप हैं ही इतनी जबर्दस्त कि किसी का भी ईमान डोल जाय ।”

अब विश्वनाथजी के बदन की गर्मी से गरम होती मामीजी भी उनका लगभग सारा नाटक समझ गयीं और मुस्कुरा कर बोली-

“हटो भी विश्वनाथ लाला क्यों मस्खरी करते हो। लड़के देख रहे हैं ।”

मामीजी को मुस्कुराते देख विश्वनाथजी ने उनके बदन को और अपने जिस्म के साथ कसते और चूचियाँ सहलाते हुए कहा,-

“आप फ़िक्र न करें मैं इन्हें समझा लूँगा ।”

विश्वनाथजी का लण्ड पकड़कर मरोड़ते हुए मामीजी फ़िर मुस्कुराई-

“ तुमसे बचूँगी तब तो लड़कों से बचाओगे।”

मामीज़ी के जिस्म के जादू ने विश्वनाथजी के दिमाग की सोचने समझने की रही सही ताकत भी हर ली, उन्होंने अपने होठ मामीजी के होठों पर रख दिये और उन्हें वही लिटा दिया। उनकी साड़ी पेटीकोट पलटकर उनकी पावरोटी सी चूत मुट्ठी में दबोच ली ।

ये देखकर पहले से ही गरमाये रमेश, महेश और ज्यादा गरम हो के अपने लण्ड सहलाने लगे। तभी उनकी नजर हमदोनों( मैं और भाभी) पर पड़ी उन्होने दौड़ के हमे पकड़ के बैठक के अन्दर खींच के दरवाजा भिड़ा दिया और वहीं खड़े खड़े हमारी चूचियाँ दबाने लगे।

क्रमश:…………………
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मुहल्लेदारी से रिश्तेदारी तक

भाग -9

मामीजी का जादू



उधर विश्वनाथजी ने महसूस किया कि मामीजी की चूत बुरी तरह से गीली है इसका मतलब वो बुरी तरह से चुदासी हैं सो उन्होंने मारे उत्तेजना के मामी जी की पावरोटी जैसी चूत के मोटे मोटे होठों को अपनी बायें हाथ की उंगली और अंगूठे की मदद से फ़ैलाकर उसके मुहाने पर अपने घोड़े जैसे लण्ड का हथौड़े जैसा सुपाड़ा रखा । अब तो मामीजी के दिमाग ने भी सोचने समझने इन्कार कर दिया उनके होठों से सिसकारी निकली-

“इस्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्सी आह ।”

विश्वनाथजी ने धक्का मारा और उनका सुपाड़ा पक से मामीजी की चूत में घुस गया।

मामीजी के होठों से निकला-

“उईफ़ आह !”

तभी बैठक का दरवाजा भड़ाक से खुला और रामू ने अन्दर आते हुए कहा-

माफ़ी मालिक लोग, बड़े मालिक जाग गये हैं और मैं अभी उन्हें सन्डास भेज के आया हूँ ।”

हम सब ठगे से रह गये। रामू की आँखो के सामने रमेश के हाथ में मेरी, महेश के हाथ में भाभी की चूचियाँ, सबसे बढ़कर मामीजी की चूत में विश्वनाथजी के घोड़े जैसे लण्ड का हथौड़े जैसा सुपाड़ा । रामू ने नजरे झुका लीं और जल्दी से बाहर निकल गया अब हमें होश आया विश्वनाथजी ने जल्दी से अपने लण्ड का सुपाड़ा मामीजी की चूत से बाहर खीचा जो बोतल से कार्क के निकलने जैसी पक की आवाज के साथ बाहर आ गया। विश्वनाथजी अपनी धोती ठीक करते हुए बैठक की बाहर की तरफ़ भागे इस बीच मैं और भाभी भी जल्दी से अपने आपको छुड़ाकर अपने कपड़े और हुलिया दुरुस्त करते हुए बैठक की बाहर की तरफ़ भागे क्योंकि वैसे भी हमारे साथ ज्यादा कुछ होने नहीं पाया था सो हुलिया दुरुस्त करने में ज्यादा वख्त नहीं लगा। हमने बाहर देखा कि विश्वनाथजी रामू को फ़ुसफ़ुसाकर पर सख्ती से कुछ समझा रहे हैं उन्होंने रामूको एक सौ रुपये का नोट दिया और रामू खुशी खुशी ऊपर चन्दू मामाजी को नहाने धोने में मदद करने उनके कमरे की तरफ़ चला गया। विश्वनाथजी ने हमसे धीरे से कहा कि तुमलोग घबराना नहीं मैंने रामू का मुँह बन्द कर दिया है।

मैं और भाभी आश्वस्त हो किचन में जा कर जल्दी जल्दी चाय नाश्ता बनाने लगे। मामीजी बैठक से जल्दी से निकलकर एकबार फ़िर बाथरूम में घुस गईं और नये सिरे से अपने आपको दुरुस्तकर और कपड़े बदल कर बाहर निकली। फ़िर किचन में आकर हमारा हाथ बटाने लगीं जब चन्दू मामाजी फ़ारिग हो नहाधोकर नीचे आये तबतक विश्वनाथजी रमेश महेश भी नहाधोकर चुस्त दुरुस्त बैठक में आ बैठे थे और रात की कहानी का कोई सबूत कहीं नहीं नजर आ रहा था । सबकुछ सामान्य था। ऐसा मालूम होता था मानो रात को कुछ हुआ ही नहीं था। विश्वनाथजी-

“आइये भाई साहब खूब सोये हमलोग कब से आप के उठने की राह देख रहे थे लगता है क्या कल दारू कुछ ज्यादा हो गई।”

चन्दू मामाजी-

“ अरे नहीं दारू वारू नही दरअसल ये मेलेठेले से मै बहुत थक जाता हूँ ।”

रमेश (ने मक्ख़्न लगाया)-

“वही मैं कहूँ देखने से ये तो नहीं लगता कि भाई साहब जैसे मजबूत आदमी का दारू वारू कुछ बिगाड़ सकती है ।”

महेश ने मेरी तरफ़ देखते हुए जोड़ा-

“ठीक कहा और जहाँ तक मेले का सवाल है हमलोग किसलिए हैं हम बच्चों को मेला दिखा लायेंगे ।”

(मैं समझ गई कि साला किसी तरकीब से हमें फ़िर से चोदने की भूमिका बना रहा है।)

विश्वनाथजी-

“हाँ भाई साहब कल रात की पार्टी के लिए मेरे परिवार की गैर मौजूदगी में आपके बच्चों ने जो मदद की उसके लिए उनकी जितनी भी तारीफ़ की जाय थोड़ी है ।”

रमेश ने सबकी नजर बच्चा कर भाभी की तरफ़ आँख मारते हुए जोड़ा)-

“ हाँ भाई साहब आपका परिवार सब काम में बहुतही होशियार हैं। कभी हमारे यहाँ आइये हमे भी खातिर करने का मौका दीजिये।” हमारी तो आपकी तरफ़ आवा जाही लगी ही रहती है अबकी बार आयेंगे तो जरूर मिलेंगे। दारू वारू का तो जुगाड़ होगा या नहीं? 

चन्दू मामाजी-

“ अरे कैसी बातें करते हैं दारू वारू की कौन कमी है आप आइये तो सही ।”

(मैं समझ गई कि ये साले हमारे घर आकर भी और फ़िर अपने घर बुला के भी हमें चोदने का सिलसिला कायम करने की तरकीब लड़ा रहे हैं अब ये आसानी से हमारी चूतों का पीछा नहीं छोड़ने वाले।)

हमलोगों ने चाय नाश्ता लगा दिया. चाय नाश्ते के दौरान विश्वनाथजी भी बीच बीच में मामीजी को घूर कर देख रहे थे शायद सुबह अपने सुपाड़े से उनकी चूत का स्वाद चख लेने के बाद रात में चूक जाने की कोफ़्त से तड़प रहे थे। तभी हमारी मामीज़ी ने चन्दू मामाजी से कहा कि उनके पीहर के यहाँ से बुलावा आया है और वो दो दिन के लिए वहाँ जाना चाहती हैं. इस पर चन्दू मामाजी बोले-

“ भाई मैं तो इस मेले ठेले से काफ़ी थका हुआ हूँ और वहाँ जाने की मेरी कोई इच्छा नही है । विश्वनाथजी तो जैसे मौका ही तलाश कर रहे थे मामीज़ी के साथ जाने का, [या फिर मामी को चोदने का क्योंकि कल चोद नही पाए थे और आज सुबह उनकी शान्दार चूत मे सुपाड़ा डालने के बाद तो वो और भी उनकी चूत के लिए बेकरार हो रहे थे] तुरंत ही बोले-

“कोई बात नही भाई साहब, मैं हूँ ना, मैं ले जाऊँगा भौजी को उनके मायके और दो दिन बिठा कर हम वहाँ से वापिस यहाँ पर आ जाएँगे ।“विश्वनाथजी की यह बेताबी देख कर भाभी और मैं मुँह दबा कर हंस रहे थे. जानते थे कि विश्वनाथजी मौका पाते ही मामीज़ी की चुदाई ज़रूर करेंगे. और सच पूच्छो तो अब उनसे अपनी चूत मे सुपाड़ा डलवाने के बाद मामीजी भी ज़रूर उनसे चुदवाना चाह रही होंगी इसलिए एक बार भी ना-नुकूर किए बिना तुरंत ही मान गयी.


ये देख मैं भाभी से बोली

“ भाभी विश्वनाथजी मामीजी को न चोद पाने से परेशान हैं ऐसे देख रहे थे कि मानो अभी मामीजी को चोद देंगे। चलो उनका तो जुगाड़ हो गया अब मजे से दो दिन मामीजी की चूत खूब बजायेंगे। ये बाकी दोनों भी ऐसे देख रहे हैं कि मानो मौका लगे तो अभी फिर से हम सब को चोद देंगे ।”

भाभी-

“मुझे भी ऐसा ही लग रहा है बता अब क्या किया? जाए। ”.

मैं बोली-

“किया क्या जाए, चुप रहो मौका दो, चुदवाओ और मज़ा लो'

भाभी-

“तुझे तो हर वक़्त सिवाए चुदाई के और कुछ सूझता ही नही है ।”

मैं बोली- अच्च्छा शरीफजादी, बन तो ऐसी रही ही जैसे कभी लण्ड देखा ही नहीं, चुदवाना तो दूर की बात है, चार दिनों से लोंडो का पीछा ही नही छोड़ रही और यहाँ अपनी शराफ़त की माँ चुदा रही है.'

भाभी-

अब बस भी कर मेरी माँ , मैंने ग़लती की जो तेरे सामने मुँह खोला. चुप कर नही तो कोई सुन लेगा. और इस तरह हमारी नोंक-झोंक ख़तम हुई.


अब हमारी मामी और विश्वनाथजी के जाने के बाद हमारे लिए रास्ता एक दम साफ़ था. शाम के वक़्त हम तीनो याने मैं, मेरी भाभी और रामू मेला देखने घूमने निकले. तो वहाँ रमेश और महेश मिल गये जैसे हमारा इन्तजार ही कर रहे हों। बोले – “हमने तो आपके यहाँ खूब दावत खाई चलें आज हमारे यहाँ की कमसे कम चाय ही पी लें ।”

मैंने भाभी की तरफ़ देखा और आँखों से ही पूछा कि चुदवाने का मन है क्या? भाभी ने भी आँखों ही आँखों में हामी भर दी बस हम उनके साथ चल दिये। रमेश ने रामू को एक चिट लिख कर दी और कहा-

“ इसे ले जाकर मेरे घर मेरी पत्नी को देना और चाय नाश्ता तैयार करने में उसकी मदद करना तबतक हम मेला देख के आते हैं ।”

रामू चला गया तो रमेश बोला-

“चलिये जबतक चाय बनती है आपको महेश का नया घर दिखा दें।”

हम समझ गये कि ये रामू को भगाने का तरीका था। हमारी चुदाई महेश के घर में होगी क्योंके उसकी अभी शादी नही हुई है। महेश के घर पहुँचते पहुँचते उनकी और हमारी चुदास इतनी बढ़ गयी थी कि जैसे ही महेश ने घर का ताला खोलकर हमें अन्दर बुलाकर दरवाजा अन्दर से बन्द किया कि रमेश भाभीजी से और महेश मुझसे लिपट गया दरवाजे से बैठ्क तक आते आते हम दोनो ननद भाभी को पूरी तरह नंगा कर दिया था और खुद भी नंगे हो गये थे फ़िर दोनो ने बारी बारी से हमें एक एक राउण्ड चोदा फ़िर बोले-

“चलो अब रमेश के यहाँ चाय पीते हैं।”

दो राउण्ड चुदकर हमारी चूतें काफ़ी सन्तुष्ट थी ।अलग घर बनवा लेने के बावजूद रमेश और महेश दोनों भाई साथ ही रहते थे क्योंकि महेश की अभी शादी नही हुई थी रास्ते में मैने महेश से पूछा,

“तू शादी क्यों नही कर लेता ? कब करेगा ?”

महेश-

“कोई मुझे पसन्द ही नहीं करती ।”

मैं बोली-

“क्यों तुझमें क्या कमी है?”

महेश- “तू करेगी ।”

मैं बोली-

“मैं तो कर लूँ पर मेरी जैसी चालू चुदक्कड़ से तू करेगा शादी?”

महेश- “हमारे परिवारों में तेरी जैसी चालू चुदक्कड़ ही निभा पायेंगीं ।”

मैं बोली- क्या मतलब?”

जवाब रमेश ने दिया –“मतलब तो मेरे घर पहुँचने के बाद मेरी बीबी से मिलकर ही समझ आयेगा।”

रमेश के घर पहुँचकर हमने दरवाजा खटखटाया और रामू ने होंठ पोछ्ते हुए दरवाजा खोला । हम अन्दर गये नाइटी पहने रमेश की बीबी किचन से होंठ पोछ्ते हुए निकली और बोली-

“आइये आइये।”

हम सबने देखा कि रमेश की बीबी गुदाज बदन कि मझोले कद की बड़े बड़े स्तनों और भारी चूतड़ों वाली गेहुँए रंग की औरत थी । मुझे लगा कि उसके बड़े बड़े स्तनों के स्थान की नाइटी मसली हुई है, जैसे अभी अभी कोई मसल के गया हो उसके बड़े बड़े स्तनों के निपल खड़े थे और उस स्थान की नाइटी गीली थी जैसे कोई नाइटी के ऊपर और अन्दर से अभी तक चूसता रहा हो। घर मे रामू के अलावा तो कोई मर्द या बच्चा था नहीं। तभी रामू को चाय लाने को को किचन में भेज वो हमारे पास बैठ गयी और बोली-

भाई आप लोगों कि बड़ी तारीफ़ कर रहे थे हमारे पति(रमेश) और देवर(महेश)। जिस दिन आप के यहाँ से दोनो आये खाने की मेज पर आपकी बातें करते करते इतने उत्तेजित हो गये कि खाने की मेज पर ही मुझे नंगा कर के चोदने लगे उस रात दोनो भाइयों ने मिलकर मेरी चूत का चार बार बाजा बजाया क्योंकि महेश की अभी शादी हुई नहीं है सो महेश से भी मुझे ही चुदवाना पड़ता है। वैसे आज आपको एक और काम की बात बताऊँ ये रामू भी गजब का चुदक्कड़ है मेरे पति(रमेश) ने जब इससे चाय के लिए कहलवाया तो चिट में लिखा था कि लौंडा तगड़ा लगता जबतक हम लोग आते हैं चाहो तो इस लौंडे को स्वाद बदलने के लिए आजमा के देखो। मैंने आपलोगों के आने से पहले आजमाने के लिए चुदवाया लौंडे मे बड़ी जान है। साले ने अभी रसोई में चूमाचाटी करके दुबारा मूड बना दिया था अगर आपलोग न आ गयी होती तो दूसरा राउन्ड भी हो गया होता। कभी आजमाइयेगा।”

अब मुझे होठ पोछते हुए आने, स्तनों के आस पास मसली हुई और निपल के स्थान पर गीली नाइटी सारा माजरा समझ मे आगया। फ़िर हम सब चाय पी कर घर वापस आगये।

उस रात और अगली रात हम दोनों ने रामू से चुदवाया । साले का लण्ड तो ज्यादा बड़ा नहीं है पर चोदता जबरदस्त है और जितनी बार चाहो।

तीसरे दिन विश्वनाथजी हमारी मामीजी को उनके मायके से वापस ले के आये। हमारी मामीजी बड़ी खुश थी। पूछने पर उन्होंने विश्वनाथजी की तारीफ़ करते हुए बताया कि विश्वनाथजी हमारी मामीजी को उनके मायके बड़ी सहूलियत से ट्रेन के फ़र्स्ट क्लास कूपे में ले गये थे और वैसे ही वापस भी ले के आये । चूकि हमारे बीच एक दूसरे का कोई भेद छुपा नहीं था सो कुरे दने पर मामी जी ने ये किस्सा बताया । हुआ योंकि हमारी मामी और विश्वनाथजी ट्रेन के फ़र्स्ट क्लास कूपे में चढे़ और टीटी के टिकेट चेक करके जाने के बाद विश्वनाथजी ने कूपे का दरवाजा अन्दर से बन्द कर लिया और मामी के बगल में बैठ गये।

“भौजी! उस दिन की घटना के बाद दिल काबूमें नहीं है ।” कहकर विश्वनाथजी ने उनके गुदाज बदन को अपने कसरती बदन से लिपटा लिया। मामीजी भी तो बुरी तरह से चुदासी हो ही रहीं थी और चुदने ही आयीं थीं, सो वो भी लिपट गयी । विश्वनाथजी आगे से ब्लाउज में हाथ डाल कर उनकी चूचियों सहलाने लगे, जैसे ही उनके बड़े मर्दाने हाँथ में मामीजी की हलव्वी छाती आई, मामीजी साँसें तेज होने लगीं। विश्वनाथजी के कसरती बदन में दबा मामीजी का गुदाज बदन और उनके बड़े मर्दाने हाथ में मामीजी की हलव्वी छातियाँ, अब मामीजी और विश्वनाथजी दोनो की साँसे तेज चलने लगी थी, विश्वनाथजी के बदन की गर्मी से गरम होती मामीजी ने भी धीरे से विश्वनाथजी की धोती ने हाथ डाल उनका हलव्वी लण्ड थाम लिया और सहलाने लगीं । दोनो की नजरें मिलीं और मिलते ही विश्वनाथजी उखड़ी साँसों के साथ बोले-

“भौजी, आज तो मैं उसदिन का बचा काम पूरा करके ही रहूँगा ।”

विश्वनाथजी का लण्ड पकड़कर मरोड़ते हुए मामीजी फ़िर मुस्कुराकर माहौल को सहज करते हुए पूछा-

“मतलब बचा हुआ ये विश्वनाथ लाला ?”

मामीजी को मुस्कुराते देख विश्वनाथजी ने उनके बदन को और अपने जिस्म के साथ कसते और चूचियाँ सहलाते हुए कहा,-

“हाँ।”

फ़िर उन्हें बर्थ पर लिटा उनकी साड़ी पेटीकोट पलटकर उनकी पावरोटी सी चूत मुट्ठी में दबोच ली और आगे बोले-

“ आपकी इसमें? ”

और विश्वनाथजी ने अपने होठ मामीजी के होठों पर रख दिये।

विश्वनाथजी ने महसूस किया कि मामीजी की चूत बुरी तरह से गीली है इसका मतलब वो बुरी तरह से चुदासी हैं सो उन्होंने मारे उत्तेजना के मामी जी की पावरोटी जैसी चूत के मोटे मोटे होठों को अपनी बायें हाथ की उंगली और अंगूठे की मदद से फ़ैलाकर उसके मुहाने पर अपने घोड़े जैसे लण्ड का हथौड़े जैसा सुपाड़ा रखा । मामीजी के होठों से सिसकारी निकली-

“इस्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्सी आह ।”

विश्वनाथजी ने धक्का मारा और उनका सुपाड़ा पक से मामीजी की चूत में घुस गया।

मामीजी के होठों से निकला-

“उईफ़ आह लाला ! डाल दो पूरा राजा ।”

विश्वनाथजी ने ज़ोर का धक्का मारा. उसका आधे से ज़्यादा लण्ड मामीजी चूत में घुस गया. मामीजी जैसी पुरानी चुदक्कड़ भी सीस्या उठी जबकि एक ही दिन पहले दो दो हलव्वी लण्डों (रमेश और महेश) से जम के अपनी चूत चुदवा चुकी थी उनका हलव्वी लण्ड मामीजी के भोसड़े में भी बड़ा कसा-कसा जा रहा था. विश्वनाथजी ने एक और ठाप मारा तो पूरा लण्ड अन्दर चला गया. मामीजी के होठों से निकला-

“उइस्स्स्स्स्स्स्स्स आह !

मामीजी ने अपनी दोनो सईगमर्मरी जाँघें विश्वनाथजी ने कन्धों पर रख लीं विश्वनाथजी उनकी मोटी मोटी केले के तने जैसी चिकनी गोरी गुलाबी जांघों पिण्डलियों को दोनों हाथों में दबोचने जोरजोर से सहलाने लगे । बीच बीच में मारे उत्तेजना के उनकी गोरी गोरी गुलाबी पिण्डलियों पर दॉत गड़ा देते थे । इससे उनकी चोदने की स्पीड धीमी हो जाति थी।


क्रमश:…………………
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#43
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मुहल्लेदारी से रिश्तेदारी तक

भाग -10



मामीजी का जादू


मामीजी बोलीं-

चोदो राजा फ़ाड़ दो आज मेरी चुदक्कड़ चूत ।

बस विश्वनाथजी मामीजी की हलव्वी चूचियाँ थामकर बारी बारी से निपल चूसते हुए धकापेल चोदने लगे । चूत भीगी होने के कारण लण्ड पकापक अंदर बाहर जाने लगा, और मामीजी को मज़ा आने लगा. वे चूतड़ उचका उचका के अपनी कमर के धक्के उसके लण्ड पर मारते हुए चुदवाने लगी उनकी दोनों टांगें विश्वनाथजी के कन्धों पर होने के कारण उनकी गद्देदार फूली हुयी चूत मोटी मोटी गोरी गुलाबी चिकनी जांघें भारी गद्देदार चूतड़ विश्वनाथजी के लण्ड के आस पास टकराकर डनलप के गुदगुदे गद्दे का मजा दे रहे थे और उनसे फटफट की आवाज आ रही थी। विश्वनाथजी ने दोनों हाथों से मामीजी के उछलते बड़े बड़े गोरे गुलाबी उरोजों को थामकर एकसाथ दोनों काले काले निपल होंठों में दबा लिये और उनकी नंगी नर्म चिकनी गोरी गुलाबी संगमरमरी मांसल बाहों को हाथों में दबोच कर निपल चूसने लगे ।

मामीजी के मुँह से आवाजे आ रही थीं उम्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्हआाााहहहहह

बेहद उत्तेजित होने के कारण करीब दस मिनट तक रगड़ते हुए चुदाई करने के बाद मामीजी चूत में जड़ तक विश्वनाथजी का लण्ड धँसवाकर उसे लण्ड पर बुरी तरह रगड़ते हुए झड़ने लगी। विश्वनाथजी भी मामीजी की आग हो रही चूत की गर्मी झेल नहीं पाये और उनके बड़े बड़े गुलाबी चूतड़ों को दोनो हाथों में दबोचकर अपने लण्ड पर दबाते हुए चूत की जड़ तक लण्ड धॉंसकर झड़ गये। झड़ने के बाद विश्वनाथजी ने मामी जी की टाँगें कन्धे से उतार दीं और बगल में लेट गये मामी जी उठीं और साड़ी उतार कर पेटीकोट ब्लाउज पर नाइटी डाल बाथरूम चली गयीं। जब मामीजी लौटीं तो देखा विश्वनाथजी कपड़े उतार के सिर्फ़ लुंगी पहने आँखें बन्द किये लेटे हैं मामीजी ने पेटीकोट ब्लाउज नाइटी सब उतार के टांग दिया और बिलकुल नंगी हो विश्वनाथजी के बगल में लेट गयीं और धीरे से उनकी लुंगी खोलकर उनसे लिपट गयी अबदोनों बिलकुल नंगधड़ंग एक ही बर्थ पर लिपटे पड़े थे विश्वनाथजी ने हड़बड़ा के आँखें खोल दीं बिलकुल नंगी मामी जी को बाहों मे देख उनके गुदाज मांसल बदन को अपनी भुजाओं मे कस उनकी स्तनों को अपने बालों भरे सीने मे पीसने लगे। मामी जी ने अपनी जांघों के बीच उनका हलव्वी लन्ड दबा कर मसलने लगीं ।


उस ट्रेन सफ़र में विश्वनाथजी ने तीन बार मामी जी की चूत का बाजा बजाया। मायके पहुँचकर मामीजी अपने पिताजी से मिली और उनके बगल वाले कमरे में यह कह कर ठहरीं कि अधिक से अधिक समय पिताजी के साथ ही बिताना चाहती हैं उसकमरे के बगल में बाथरूम अटैच था और बाथरूम के दूसरी तरफ़ दूसरा कमरा अटैच था जिसमें विश्वनाथजी ठहराये गये थे। दिन का अधिकतर समय मामी जी पिताजी के साथ ही बिता्ती थी। और रात को अपने कमरे में जाने के बाद अन्दर से बन्द कर बाथरूम से दूसरी तरफ़ विश्वनाथजी के कमरे में जा उनके बिस्तर में जा घुसतीं और रात भर जम के चुदवाती। दो दिन बाद वापसी के ट्रेन सफ़र में, ट्रेन के फ़र्स्ट क्लास कूपे में फ़िर से विश्वनाथजी ने तीन बार मामी जी की चूत का बाजा बजाया।

अभी हालात कुछ इस प्रकार हैं कि विश्वनाथजी और रमेश महेश ने रामू को पैसे वैसे देकर पूरी तरह पटा रखा है जब भी भैय्या गाँव से बाहर हों तो उन्हें खबर करने का काम रामू का है विश्वनाथजी रमेश या महेश मे से जिसका भी मौका लग पाये( कभी कभी तीनों ही) इस गाँव मे काम के बहाने से मामाजी के यहाँ आ कर टिक जाते हैं उस समय यदि भैय्या गाँव से बाहर हो तो भाभी के कमरे में चुदाई का जमघट लगता है और यदि मामा जी भी गाँव से बाहर हो तब तो सारे घर में चुदाई का भूचाल ही आ जाता है रामू को अपना मुँह बन्द रखने के पुरस्कार में पैसे के अतिरिक्त भाभीजी और मामीजी की चूतें बाकी के दिनों में दिन के वख्त जब भय्या और मामाजी काम पर गये हों उपलब्ध रहती हैं। मै भी अब अक्सर मामा मामी से मिलने उनके गाँव जाती हूँ यदि मौके पर विश्वनाथजी रमेश या महेश हुए तो मैं भी चुदवाकर उनके लण्डों का खूब मजा लेती हूँ नहीं तो अपना रामू का लण्ड तो रहता ही है।

जिन दिनों भय्या और मामाजी घर पर होते हैं और अगर उन दिनों मैं भी पहुँच जाती हूँ तो रामू की खूब ऐश रहती है। मैं जान बूझकर मेहमानो वाले कमरे में सोती हूँ जिसमें बाथरूम अटैच है बाथरूम के दूसरी तरफ़ रामू का कमरा अटैच है । रात में जब भय्या भाभी और मामाजी मामीजी अपने अपने कमरों में होते हैं मैं चुपके से बाथरूम के रास्ते रामू के कमरे में घुस जाती हूँ वो अपने बिस्तर में मेरा इन्तजार कर रहा होता है 

क्योंकि जब मैं बिस्तर में घुस उससे चिपटती हुँ तो वो भी चादर के नीचे पूरी तरह नंगा होता है और उसका फ़ौलादी लण्ड पहले से ही टन्नाया होता है फ़िर मैं मनमाने ढ़ंग से खुल के चुदवाती और पूरी रात उसके जवान नंगे बदन से चिपट के सोती हूँ। अगर कही भैया बाहर गये हों तब तो रामू एक तरफ़ मुझे और दूसरी तरफ़ भाभी जी को लिटा के दोनो की एक एक चूची थाम के सोता है।

उन दिनों मामी जी देर तक सोती हैं इसका भी एक कारण है जो पहले मुझे नहीं मालूम था वो ये कि सुबह जब भय्या और मामाजी काम पर चले जाते थे तो मामीजी ऊपर से आवाज देती-

“रामू जरा यहाँ आ।”

मामीजी की आवाज ऊपर से सुनते ही किचन में भाभीजी की मदद करता रामू तुरन्त भागता हुआ ऊपर चला जाता। ये रोज का किस्सा था । मुझे कुछ शक हुआ तो आज मैं पीछे पीछे गयी और मैंने छिपके देखा-

रामू ऊपर उनके कमरे में पहुँच के बोला-

“जी मालकिन।”

पट लेटी मामीजी बिस्तर में लेटे लेटे ही बोली-

“आगया बेटा चल जरा दबा दे बदन में बड़ा दर्द है।”

रामू उनकी संगमरमरी टांगों को दोनो तरफ़ फ़ैलाकर उनके बीच बैठ मालिश करने और दबाने लगा । रामू के अभ्यस्त हाथों की मालिश से धीरे धीरे मामीजी का पेटीकोट ऊपर सरकने लगा धीरे धीरे रामू के हाथों के कमाल ने मामीजी का पेटीकोट पूरी तरह ऊपर सरकाकर उनके संगमरमरी चूतड़ तक नंगे कर दिये। रामू उनके दोनो पैरों के बीच आगे बढ़ आया था । अब रामू के हाथ मामीजी की कमर और चूतड़ों की मालिश कर रहे थे । मैने देखा कि लुंगी मे रामू का लण्ड तंबू बना रहा है और उनके चूतड़ों से टकरा रहा है। तभी मामीजी बोली –

“पूरे बदन की मालिश कर जरा जोर से दबा बेटा पूरा बदन बदन दुख रहा है।”

“जी मालकिन।”

रामू ने लुंगी उतार फ़ेकी उसका लण्ड बुरी तरह फ़नफ़ना रहा था रामू ने ऊपर कुछ नहीं पहना था अत: वो पूरी तरह नंगधड़ंग था । मामी के चूतड़ो पे बैठ के वो उनका ब्लाउज उनके कन्धों से खीचने लगा ब्लाउज उतर गया इसका मतलब मामीजी ने बटन पहले ही से खोल रखे थे। साफ़ नजर आ रहा था कि ये इन दोनो का रोज का धन्धा है। अब नंगधड़ंग रामू उनके ऊपर लेट गया और बगलों से हाथ डाल के वो मामीजी की चूचियाँ दबाते हुए उनके चूतड़ों पे लण्ड रगड़ रहा था । मैं चुपके से जा के भाभी को भी बुला लाई। थोड़ी देर बाद रामू मामी जी के ऊपर से उठा और मामी जी चित्त हो कर लेट गई और बोली- “शाबाश बेटा बस अब सामने से भी दबा दे ।”

“जी मालकिन।”

रामू फ़िर उनकी टाँगों के बीच आया और अपना हथौड़े सा सुपाड़ा उनकी फ़ूली हुई चूत के मुहाने पर लगाकर ठाप मारा और पूरा लण्ड ठोककर मामीजी के ऊपर लेट कर उनकी बड़ी बड़ी चूचियाँ दबाते हुए धकापेल चोदने लगा। घमासान चुदाई के बाद जब झड़े तो मामीजी बोली-

तूने मुझे सब गन्दा कर दिया चल अब नहला के साफ़ कर।”

“ठीक है मालकिन।”

और दोनो नंगधड़ंग बाथरूम मे चले गये वहाँ रामू ने मामीजी को मामीजी ने रामू को साबुन लगाया इस सब मे रामू का लण्ड फ़िर खड़ा हो गया और रामू मामी जी को झुका के साबुन लगे लण्ड से चोदने लगा मामीजी बोलीं –

“ये क्या कर रहा है।”

रामू ने जवाब दिया-

“चूत के अन्दर साबुन लगा के साफ़कर रहा हूँ मालकिन।”

अब हम भी बाहर निकल आये भाभीजी साड़ी पेटिकोट उठा के बोली –

“मेरी भी गन्दी है साबुन लगा के साफ़कर दे न ।”

फ़िर क्या था उसी बाथ रूम मे रामू ने हम सबकी चूत मे अपने लण्ड से साबुन लगा लगा के चोदते हुए साफ़ की। उस दिन के बाद से रामू हमसे इतना खुल गया है कि कि यदि घर में भय्या और मामा जी न हो तो मन करने पर सारे कमरों के बिस्तरों के अलावा बरान्डा, बाथरूम, रसोई, खाने कि मेज पर, कहीं खड़े तो कहीं बैठकर कही झुका के जहाँ जैसे बन पड़े मुआ मन करने पर कही भी पकड़ के चूत का बाजा बजाने की कोशिश का इजहार करता है क्यों कि उसे पता है कि हम बुरा नही मानेंगे । हम तीनों भी रामू से इतना खुल गये हैं कि घर में भय्या और मामा जी न होने का पूरा फ़ायदा उठाते हुए उसकी इच्छा मान ही लेते हैं वो भी हम तीनों का इशारा समझता है ।

इस उत्तेजक कहानी के कहने सुनने के बीच तरुन और बेला ने बुरी तरह से चुदासे हो एक दूसरे के कपड़े नोच डाले थे। तभी तरुन ने बेला को वही सोफ़े पे पटका तो बेला ने अपनी संगमरमरी टांगे उठा दी। तरुन ने उसकी मांसल जांघें थाम अपना हलव्वी लण्ड एक ही झटके मे उसकी पावरोटी सी बुरी तरह पनिया रही रसीली चूत में ठाँस दिया और धकापेल चोदते हुए बोला –“ तो क्या इरादा है अगर महेश से शादी करो तो बताओ तेरे बापू (बल्लू चाचा) से बात करूँ?”

बेला (चूतड़ उछालकर चुदाते हुए)–“हाय राजा नेकी और पूँछ पूँछ?

तरुन –“पर पहले मुझे टीना भाभी की दिलवा।”

बेला –“जब तू कहे।

क्रमश:…………………






मुहल्लेदारी से रिश्तेदारी तक भाग -11 


एक दिन मैं रामू से चुदवा के अपने कमरे मे वापस जा रही थी कि तभी दरवाजे की घंटी बजी । देखा तो विश्वनाथ जी थे । अंदर आते ही आसपास किसी को ना देख मुझे गोद मे उठा लिया फिर मुझे गोद मे लिए लिए ही दरवाजा बंदकर मुझे मेरे कमरे मे लाकर बिस्तर पर पटक दिया । दरवाजा पंड कर मेरी नाइटी नोच कर फेक दी अब मैं सिर्फ काली ब्रा पैंटी मे अपने बिस्तर ओर पड़ी थी मैं समझ गयी की अब मेरी चूत की खैर नहीं । अभी अभी रामू से चुदवा के फारिग होने के कारण मैं बिलकुल मूड मे नहीं थी । मैंने बहाना किया की आज मेरे बदन मे बहुत दर्द है मामा जी नहीं हैं आप मामी जी को जम के चोद सकते हो पर मखमली गहरे लाल रंग की चादर पर सिर्फ काली ब्रा पैंटी मे लेटी गोरी चिट्टी गुदाज लड़की को वो किसी कीमत पर छोड़ना नहीं चाहते थे । पास की मेज से तेल की शीशी उठाते हुए बोले -'अच्छा किया बता दिया, उसे भी चोद लूँगा पहले तेरी मालिश कर तेरा बदन दर्द तो दूर कर दूँ ।' 




जब मामा और भैया घर पर नहीं होते तो रामू एक तरफ़ मुझे और दूसरी तरफ़ भाभी जी को लिटा के दोनो की एक एक चूची थाम के सोता है।

उन दिनों मामी जी देर तक सोती हैं इसका भी एक कारण है जो पहले मुझे नहीं मालूम था वो ये कि सुबह जब भय्या और मामाजी काम पर चले जाते थे तो मामीजी ऊपर से आवाज देती-

“रामू जरा यहाँ आ।”

मामीजी की आवाज ऊपर से सुनते ही किचन में भाभीजी की मदद करता रामू तुरन्त भागता हुआ ऊपर चला जाता। ये रोज का किस्सा था । मुझे कुछ शक हुआ तो आज मैं पीछे पीछे गयी और मैंने छिपके देखा-

रामू ऊपर उनके कमरे में पहुँच के बोला-

“जी मालकिन।”

पट लेटी मामीजी बिस्तर में लेटे लेटे ही बोली-

“आगया बेटा चल जरा दबा दे बदन में बड़ा दर्द है।”

रामू उनकी संगमरमरी टांगों को दोनो तरफ़ फ़ैलाकर उनके बीच बैठ मालिश करने और दबाने लगा । रामू के अभ्यस्त हाथों की मालिश से धीरे धीरे मामीजी का पेटीकोट ऊपर सरकने लगा धीरे धीरे रामू के हाथों के कमाल ने मामीजी का पेटीकोट पूरी तरह ऊपर सरकाकर उनके संगमरमरी चूतड़ तक नंगे कर दिये । रामू उनके दोनो पैरों के बीच आगे बढ़ आया था । अब रामू के हाथ मामीजी की कमर और चूतड़ों की मालिश कर रहे थे । मैने देखा कि लुंगी मे रामू का लण्ड तंबू बना रहा है और उनके चूतड़ों से टकरा रहा है। तभी मामीजी बोली –

“पूरे बदन की मालिश कर जरा जोर से दबा बेटा पूरा बदन बदन दुख रहा है।”

“जी मालकिन।”

रामू ने लुंगी उतार फ़ेकी उसका लण्ड अंडरवियर मे बुरी तरह फ़नफ़ना रहा था रामू ने ऊपर कुछ नहीं पहना था अत: ऊपर से वो पूरी तरह नंगधड़ंग था । साफ़ नजर आ रहा था कि ये इन दोनो का रोज का धन्धा है। अब नंगधड़ंग रामू उनके ऊपर लेट गया और बगलों से ब्लाउज़ मे हाथ डाल के वो मामीजी की चूचियाँ दबाते हुए उनके चूतड़ों पे लण्ड रगड़ रहा था ।साफ़ नजर आ रहा था कि ये इन दोनो का रोज का धन्धा है। मैं चुपके से जा के भाभी को भी बुला लाई । थोड़ी देर बाद रामू मामी जी के ऊपर से उठा और मामी जी चित्त हो कर लेट गई और बोली- “शाबाश बेटा बस अब सामने से भी दबा दे ।”

“जी मालकिन।”

मामी की जांघों पे बैठ के वो लेट सा गया और उनका ब्लाउज उनके कन्धों से खीचने लगा ब्लाउज उतर गया इसका मतलब मामीजी ने बटन पहले ही से खोल रखे थे ब्रा तो अंदर थी ही नहीं । रामु ने मामीजी की बायीं चूँची को थाम उसपे हपक़्क़ के मुंह मारा और निपल को होठों में दबा के जोर से चूसा तो मामी की सिसकी निकला गयी। फिर दोनों हाथों में उनकी बड़ी बड़ी चूचियों को दोनों हाथों में थाम बुरी तरह दबाने मसलने और पागलों की तररह चूसने भभोड़ने लगा। 



रामू फ़िर उनकी टाँगों के बीच आया उनकी मोटी गदराई जांघो पिंडलियों पर चूमने चाटने और मुंह मारने लगा फिर जब बरदास्त के बाहर हो गया तो उनका लाल कच्छा उतार के फेक दिया और अपना हथौड़े सा सुपाड़ा उनकी फ़ूली हुई चूत के मुहाने पर लगाया मामी जी ने अपने दाहिने हाथ से अपनी चूत के होठ और पुत्तियां फैलायीं और बायें हाथ में उसका लंड थाम अपनी पुत्तियों पर रगड़ने और सिसकारी भरने लगी। फिर उन्होंने उसका हथौड़े सा सुपाड़ा अपनी पुत्तियों बीच रखा और रामु ने धीरे धीरे दबाकर पूरा लण्ड मामीजी छूट में ठोक दिया। मामीजी ने दोनों टाँगे हवा में उठा दीं और रामू उनके ऊपर लेट कर उनकी बड़ी बड़ी चूचियाँ दबाते हुए धकापेल चोदने लगा। 




घमासान चुदाई के बाद जब झड़े तो मामीजी बोली-

तूने मुझे सब गन्दा कर दिया चल अब नहला के साफ़ कर।”

“ठीक है मालकिन।”और दोनो नंगधड़ंग बाथरूम मे चले गये वहाँ रामू ने मामीजी को मामीजी ने रामू को साबुन लगाया इस सब मे रामू का लण्ड फ़िर खड़ा हो गया और रामू मामी जी को झुका के साबुन लगे लण्ड से चोदने लगा मामीजी बोलीं –

“ये क्या कर रहा है।”

रामू ने जवाब दिया-

“चूत के अन्दर साबुन लगा के साफ़कर रहा हूँ मालकिन।”

अब हम भी बाहर निकल आये भाभीजी साड़ी पेटिकोट उठा के बोली –

“मेरी भी गन्दी है साबुन लगा के साफ़कर दे न ।”

फ़िर क्या था उसी बाथ रूम मे रामू ने हम सबकी चूत मे अपने लण्ड से साबुन लगा लगा के चोदते हुए साफ़ की। उस दिन के बाद से रामू हमसे इतना खुल गया है कि कि यदि घर में भय्या और मामा जी न हो तो मन करने पर सारे कमरों के बिस्तरों के अलावा बरान्डा, बाथरूम, रसोई, खाने कि मेज पर, कहीं खड़े तो कहीं बैठकर कही झुका के जहाँ जैसे बन पड़े मुआ मन करने पर कही भी पकड़ के चूत का बाजा बजाने की कोशिश का इजहार करता है क्यों कि उसे पता है कि हम बुरा नही मानेंगे । हम तीनों भी रामू से इतना खुल गये हैं कि घर में भय्या और मामा जी न होने का पूरा फ़ायदा उठाते हुए उसकी इच्छा मान ही लेते हैं वो भी हम तीनों का इशारा समझता है ।

इस उत्तेजक कहानी के कहने सुनने के बीच तरुन और बेला ने बुरी तरह से चुदासे हो एक दूसरे के कपड़े नोच डाले थे। तभी तरुन ने बेला को वही सोफ़े पे पटका तो बेला ने अपनी संगमरमरी टांगे उठा दी। तरुन ने उसकी मांसल जांघें थाम अपना हलव्वी लण्ड एक ही झटके मे उसकी पावरोटी सी बुरी तरह पनिया रही रसीली चूत में ठाँस दिया और धकापेल चोदते हुए बोला –“ तो क्या इरादा है अगर महेश से शादी करो तो बताओ तेरे बापू (बल्लू चाचा) से बात करूँ?”

बेला (चूतड़ उछालकर चुदाते हुए)–“हाय राजा नेकी और पूँछ पूँछ?

तरुन –“पर पहले मुझे टीना भाभी की दिलवा।”

बेला –“जब तू कहे।

क्रमश:…………………
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04-25-2019, 11:57 AM,
#44
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दुलारा भतीजा
भाग -1

शोभा के अलावा घर के दूसरे लोग अलग अलग समय पर अपने अपने कमरों में सोने के लिए चले गए थे. शोभा और कुमार इस वक्त गोपाल और पद्मा के घर पर आये हुये थे. गोपाल कुमार का बङा भाई था. घर में, गोपाल, गोपाल के दिवंगत मझले भाई विजय का एक पन्द्रह साल का लड़का अजय भी था. अजय अपने ताऊ ताई के रहता था और उन्हें अपने माँ बाप की तरह मानता था। उस वक्त सब लोग एक हत्या की कहानी पर आधारित जो इस फिल्म देख रहे थे. आम मसाला फिल्म की तरह इस फिल्म में भी कुछ कामुक दृश्य थें. एक आवेशपूर्ण और गहन प्यार दृश्य आते ही अजय कमरें को छोड़ कर जा चुका था. गोपाल और पद्मा दृश्य के आते ही और लड़के के कमरा छोड़ने के कारण जम से गये थे. घर के ऊपर और सब सोने के कमरें थे और और शाम को जब से ये लोग आये थे, कोई भी ऊपर नहीं गया था. नौकर सामान लेकर आया था और गोपाल, कुमार शराब के पैग बना रहे थे. महिलायें भी इस वक्त उनके साथ बैठ कर पी रही थी. हालांकि परिवार को पूरी तरह से बड़े बूढ़ों की रूढ़िवादी चौकस निगाहों के अधीन रखा गया था. बड़ों के आसपास होने पर महिलायें सिंदूर, गले का हार और साड़ी परंपरागत तरीके से पहनती थी. कुमार के बड़े भाई होने के नाते, शोभा के लिए, गोपाल भी बङे थे और वह अपने सिर को उनकी उपस्थिति में ढक कर रखती थी. लेकिन चूंकि, दोनों कुमार और गोपाल बड़े शहरों में और बड़ी कंपनियों में काम करने वाले है, सो उनके अपने घरों में जीवन शैली जो बड़े पैमाने पर उदार है. शोभा और पद्मा दोनो हो बङे शहरों से थी अतः उनके विचार काफी उन्मुक्त थे. दोनों महिलायें हमेशा नये फैशन के कपङे पहन कर ही यात्रा करती थी, खासकर जब घर के माता ताऊ साथ नहीं होते थे. हालांकि, दोनों की उम्र में दस साल का अंतर है, पद्मा अपनी वरिष्ठता का उपयोग करते हुए घर में नये फैशन की सहमति बनाती थी. इस प्रकार, गहरे गले के बिना आस्तीन वाले खुली पीठ के ब्लाउज, स्तनों ऊपर को उठा कर दिखाने वाली ब्रा, मेकअप का उपयोग होता था. हालांकि, यह स्वतंत्रता केवल छुट्टियां व्यतीत करते समय के लिये ही दी गई है. सामान्य दिनचर्या में ऐसी चीजों के लिये कोई जगह नहीं थी. वे अक्सर सेक्स जीवन की बातें आपस में बाटती थीं और यहाँ से भी दोनों में काफी समानतायें थीं. दोनों ही पुरुष बहुत प्रयोगवादी नहीं थें और सेक्स एक दिनचर्या ही था. लेकिन अगली पीढ़ी का अजय बहुत अलग था. वह एक और अधिक उदार माहौल में, भारत के बड़े शहरों में बङा हुआ था. अजय वास्तव में, काफी कुछ ही खेलों में भाग लेने के कारण एक चुस्त शरीर के साथ एक दीर्घकाय युवा था. लड़का बड़ा हो गया था और बहुत जल्द ही अब एक पुरुष होने वाला था. ये बात भी शोभा ने इस बार नोट की थी. फिल्म में प्रेम दृश्य आने पर वह कमरा छोड़कर गया था इसी से स्पष्ट था उसें काफी कुछ मालूम था. बचपन में गर्मीयों की छुट्टी अजय शोभा के यहां ही बिताता था. एक छोटे लड़के के रूप में शोभा उसको स्नान भी कराती थी. कई बार कुमार की कामोद्दीपक उपन्यास गायब हो जाते थे वह खोजने पर वह उनको अजय के कमरे में पाती थी. इस बारे में सोच कर ही वह कभी कभी उत्तेजित हो जाती थी पर अजय के एक सामान्य स्वस्थ लड़का होने के कारण वह इस बारे में चुप रही. अजय के कमरा छोडने के फौरन बाद, गोपाल और पद्मा भी थकने का बहाना बना कर जा रहे थे. हालांकि, वे दोपहर में भोजन के बाद अच्छी तरह से सो चुके थे. शोभा को कोई संदेह ना था कि ये क्या हो सकता है. पद्मा से उसकी नजरें एक बार मिली थी. पर पद्मा बिना कुछ जताये सीढ़ियों पर पति के पीछे चल दी. कुमार कब कमरा छोड़ कर गये ये उसको ज्ञात नहीं था पर जब अचानक उसकी आंख खुली तो ऊपर के कमरे से जबर्दस्त आवाजें आ रही थी. शराब का नशा होने के बाद भी वह गोपाल और पद्मा के कमरें से आती खाट की आवाज से जानती थी के इस वक्त गोपाल अपनी पत्नी को चोदने में व्यस्त हैं. किन्तु उसे पक्का नहीं था कि क्या वे ठीक से कमरे का दरवाज़ा बंद करने में विफल रहे या क्या शोर ही इतना ऊंचा था. लेकिन वह पद्मा की मादक आहें सुन सकती थी जो इस वक्त गोपाल से चुदने के कारण "हां जी हां जी हां! हां, ऊई माँ, हाय हाय मर गयी" के रूप में निकल रहीं थीं. फिर उसने एक लम्बी आह सुनी. शायद गोपाल चुदाई खत्म करके अपना वीर्य अपनी पत्नी में खाली कर चुका था. फिल्म का असर गोपाल पद्मा पर काफी अच्छा रहा था. फिल्म के उस प्रेम दृश्य में आदमी उस औरत को जानवरों की तरह चौपाया बना कर चोद रहा था. अपने कॉलेज के दिनों में शोभा ने इस सब के बारें में के बारे में अश्लील साहित्य में पढ़ा था और कुछ अश्लील फिल्मों में देखा भी था लेकिन अपने पति के साथ कभी इस का अनुभव नहीं किया. इस विषय की चर्चा अपने पति से करना उसके लिये बहुत सहज नहीं था. उनके लिए सेक्स शरीर की एक जरूरी गतिविधि थी. शोभा ने अपने आप को चारों ओर से उसके पल्लू से लपेट लिया. इन मादक आवाजों के प्रभाव से उसे एक कंपकंपी महसूस हो रही थी. इस वक्त वह सोच रही थी कि क्या अजय ने अपने माता ताऊ की आवाजें सुनीं होंगी? और कुमार, वह कहां हैं? शोभा को नींद आ रही थी और उसने ऊपर जाकर सोने का निर्णय लिया. सीढ़ियों से उपर आते ही, अचानक उसने अपने आपको ऊपर के कमरों की बनावट से अपरिचित पाया. वजह, इस घर में गोपाल नव स्थानांतरित हुये थे. जैसे ही वह सीढ़ियों से ऊपर आयी उसने खुद को कई सारे दरवाजों के सामने पाया. दो दरवाजे खुले थे और वे शयन कक्ष नहीं थे. तीन कमरों के दरवाजों को बंद किया था, और उन में से एक उसका और कुमार का था जब तक वो लोग वहां रहने वाले थे. परन्तु कौनसा दरवाजा उसका है?
अगर गलती से उसने गोपाल और पद्मा क कमरा खोल दिया तो क्या होगा. इस बात कि कल्पना मात्र से ही उसको और नशा चढने लगा. अपनी कामुक कल्पना पर खुद ही मुस्कुरा के झूम सी उठी थी वो. अब जल्दी से जल्दी वो अपने बिस्तर तक पहुंचना चाहती थी. अपनी चूत में उठती लहरों को शान्त करना उसके लिये बहुत जरूरी हो गया था. दरवाजों के सामने खडे होकर शोभा, कुछ देर पहले आती आवाजों से अन्दाजा लगाने की कोशिश कर रही थी कि वो कहां से आ रही थी. काफी देर के बाद खुद हो सन्तुष्ट करके उसने एक दरवाजे को हल्के से खोला. अन्दर से कोई आवाज नहीं आई. कमरे में झांक कर देखा तो बिस्तर पर एक ही व्यक्ति लेटा हुआ था. निश्चित हि यह गोपाल और पद्मा का कमरा नहीं था. अन्दर घुसते हे वो बिस्तर के पास पहुंची और चद्दर उठा कर खुद को दो टांगो के बीच में स्थापित कर लिया. आज रात कुमार के लिये उसके पास काफी प्लान थे. शीघ्र ही शोभा ने उस सोये पडे कुमार के पैजामे के नाड़े को खोल लिया. पता नहीं क्युं पर, आज उसे कुमार का पेट
काफी छरहरा लगा, परन्तु ये तो अभी अभी शुरु की हुयी जिम क्लास का नतीजा भी हो सकता है. जैसे ही शोभा ने कुमार के पेट को चूमा एक हाथ ने उसका सिर पकड लिया.झाटों के घुंघराले बालों को एक तरफ करते ही उसके रसीले होंठों को थोडा मुरझाया हुआ सा लन्ड मिल गया. अपने होंठों को गोल करके शोभा ने चूम लिया. उसकी आंखें आश्चर्य से तब फैल गयी जब तुरन्त ही लन्ड ने सर उठाना शुरु कर दिया. सामान्य तौर पर उसके पति के लन्ड से ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती थी. चाहें वो उस पर अपने हाथों का प्रयोग करे या कि जिसम के किसी और हिस्से का. धीरे धीरे ऊपर नीचे कर गुदाज हथेली से सहलाते हुए सोये पड़े कुमार को आज वो पूरा आनन्द देना चाहती थी ताकि लन्ड अपन पूरा आकार पा सके और फिर वो जी भर कर उस पर उछल उछल कर सवारी कर सके। शोभा के सिर पर एक हाथ धीरे से मालिश कर रहा था. शोभा को अगला आश्चर्य तब हुआ जब लन्ड से उसका पूरा हाथ भर गया और आश्चर्यचजनक रूप से जो लन्ड आज तक उसके हाथ में आसानी से समा जाता था आज उसका सुपाड़ा बाहर निकल आया था. लेकिन जब छाती के एकदम छोटे और कम बाल उसके हाथ में आये तब उसके दिमाग को एक झटका लगा. किन्तु इसी समय उस लेटे हुये व्यक्ति की कमर ने एक ताल में उछलना शुरु कर दिया था. इतना सब कुछ, एक साथ उसके लिये काफी असामान्य था. शोभा ने हाथ बढा कर बिस्तर के पास रखी लैम्प तक पहुँचने की कोशिश की. ठीक उसी वक्त एक और हाथ भी लैम्प लिए आगे बढ रहा था. और चूंकि तकिये पर सिर होने के कारण अजय लैम्प के पास था और शोभा लन्ड थामे पैरों की तरफ़ होने के कारण उस तक आसानी से नहीं पहुंच सकती थी. अतः अजय ने ही पहले लैम्प का स्विच दबाया. अजय के लिये तो ये सब एक सामान्य सेक्सी सपना ही था जिसमे हर रात वो एक गुदाज हथेली को अपने लन्ड पर महसूस करता था. लेकिन आज जब वो गुदाज हथेली उसके लन्ड पर कसी तो उसे कुछ नया ही मजा आया और इसी वजह से उसकी आंखें खुल गयी. इस वक्त अजय के हाथ एक औरत के सिर पर थे और अपने धड़ पर भारी गरम स्तन वो आराम से महसूस कर सकता था. उसे पता था कि यह एक सपना नहीं हैं. लाइट चालू करते ही उसने वहां अपनी शोभा चाची को देखा. चाची के कपडे पूरी तरह से अस्त व्यस्त थे.चाची उसकी दोनों टांगों के बीच में बैठी हुई थी. उनकी साड़ी का पल्लू बिस्तर पर बिछा हुआ था. लो कट के ब्लाउज से विशाल स्तनों के बीच की दरार साफ दिख रही थी और चाची की गुदाज हथेली उसके लण्ड के रस से सनी हुई थी. अजय और चाची ने सदमे भरी निगाहों से एक दूसरे को देखा. पर किशोर अवस्था कि सैक्स इच्छाओं और वासना से भरे अजय के दिमाग ने जल्दी ही निर्णय ले लिया. आखिरकार उसकी चाची ने खुद ही कमरे में प्रवेश किया था और अब वो उसके लन्ड को मुँह से चूम भी चुकी थी. निश्चित ही चाची ये सब करना चाहती थी.
अजय ने वापस अपना हाथ शोभा चाची के सिर पर रख कर उनके मुंह में लन्ड घुसेडने का प्रयास किया. चाची अब तक अपने हाथ को उसके लन्ड से अलग कर चुकी थीं और सीधे बैठने की कोशिश कर रही थीं. इस जोर जबरदस्ती में अजय का फुंफकार मारता लन्ड शोभा के सिर, बालों और सिन्दूर से रगड खा के रह गया. अपना लक्ष्य चूक जाने से अजय का लन्ड और भी तन गया और उसके मुंह से एक आह सी निकली. "चाची, आप क्यूं रूक गए?". शोभा ने अपनी आँखें बंद किये हुये ही जवाब दिया "बेटा गलती हो गई. मुझे नहीं पता था कि यह तुम्हारा कमरा है". चाची की हालत इस वक्त रंगे हाथों पकडे गये चोर जैसी थी और वो लगभग गिड़गिड़ा रही थीं. धीरे से उन्होनें अपनी आंखें खोल कर अपने सामने तन कर खडे हुये उस शानदार काले हथौङे को देखा जो इस वक्त उनके गाल, ठोड़ी और होंठों से रगड खा रहा था. मन्त्रमुग्ध सी वो उस मर्दानगी के औजार को देखती ही रह गयीं. क्षण भर के लिये शोभा के दिमाग में पद्मा का विचार आया. अगर अजय के ताऊ गोपाल का लन्ड भी अजय के जैसा शान्दार है तो पद्मा वास्तव में भाग्यशाली औरत है. परन्तु शीघ्र ही अपने मन पर काबू पाते हुये उन्होंने दुबारा संघर्ष की कोशिश की. अजय अब तक उनके कंधों के आसपास अपने पैर कस कर शोभा को उसी स्थिति में जकड चुका था. उन पैरों कि मजबूत पकड़ के बीच में शोभा चाची के दोनो स्तन अजय के शरीर से चिपके हुये थे. शोभा चाची ने नीचे झुककर देखा तो ब्लाउज का लो कट गला, दो भारी स्तनों और उनके बीच की दरार का शानदार दृश्य भतीजे अजय को दिखा रहा था. चाची का गले का हार इस वक्त उनके गले से लटका हुआ दो बङी बङी गेंदों के बीच में झूल रहा था. चाची ने तुरन्त ही हार को वापिस से ब्लाउज में डाला और वहीं पास पडे साड़ी के पल्लू से खुद को ढकने की कोशिश की. तब तक अजय के हाथ उनके मोटे मोटे उरोजों को थाम चुके थे. दोनों हाथों से उसने चाची के उरोजों को बेदर्दी से मसल दिया. उसकी उंगलियां चाची के निप्पलों को खोज रही थीं. "बेटा, ये तुम क्या कर रहे हो? अपनी चाची के बड़े बड़े स्तनों को हाथ लगाते शरम नहीं आती तुम्हें?" शोभा चाची ने उसे डांटते हुए कहा. "मुझे सिर्फ आप चाहिये. क्या शरम, कैसी शरम. कमरे में तो आप आई हैं. और फिर आपने मुझे कभी नन्गा नहीं देखा क्या? मैंने भी आपको कई बार नन्गा देखा है जब आप नहा कर बाथरूम से निकलती थी. आप ज्यादातर बाथरूम से सिर्फ तौलिया लपेटे ही बाहर आ जाती थी और फिर कपडे मेरे सामने ही पहनती थी" अजय ने चाची को याद दिलाया. "फिर मुझे नहलाते समय भी तो आप मेरे लन्ड को अपने हाथों से धोती थी. "तब तो आप को कोई परेशानी नहीं थी". "वो कुछ और बात थी", अपनी आंखों के आगे नाचते उस शानदार माँसपिन्ड के लिये अपनी वासना को दबाती हुयी सी शोभा चाची बडबडाई. चाची ने धक्का दे कर अजय कि टांगों को अपने कंधे से हटाया और खुद बिस्तर के बगल में खङी हो गईं. चाची की उत्तेजना स्वभाविक थी. भारी साँसों के कारण ऊपर नीचे होते उनके स्तन, गोरे चेहरे और बिखरे हुए बालों पर लगा हुआ अजय के लण्ड का चिकना द्रव्य, और पारंपरिक भारतीय पहनावा उनके इस रूप को और भी गरिमामय तरीके से उत्तेजक बना रहा था. किन्तु अब भी वो सामाजिक और पारिवारिक नियमों के बंधनों को तोड़ना नहीं चाहती थी. उनकी आंखों के सामने अपनी पूरी जिन्दगी में देखा सबसे विशालकाय लन्ड हवा में लहरा रहा था.

अजय उठा और चाची के खरबूजे जैसे स्तनों पर हाथ रख दिया. चाची ने उसकी कलाई पकड़ कर उसे रोकने की कोशिश की. किन्तु यहां भी यह सिर्फ दो विपरीत लिंगो का एक और शारीरिक संपर्क ही साबित हुआ. अजय ने अपना दूसरा हाथ चाची की कोमल नाभी के पास फिराते हुए कहा. "चाची, आ जाओ ना". अजय की आवाज में घुली हुई वासना में उन्हें अपने लिये चुदाई का स्वर्ग सुनाई दे रहा था. अपने घुटनों में आई कमजोरी को महसूस कर शोभा ने वहां से जाना ही उचित समझा. वो एक पल के लिये आगे झुकी और अजय के माथे पर चुंबन दिया. शायद चाची उसको शुभरात्रि कहना चहती थी. पर इस सब में उनका पल्लू गिर गया और अजय को अपनी आंखों के ठीक सामने ब्लाउज के अन्दर से निकल पङने को तैयार दो विशाल, गठीले बड़े बड़े स्तन ही दिखाई दिये. चाची के पसीने से उठती हुई मादक खूशबू उसे पागल कर रही थी. उसका किसी भी औरत के साथ ये पहला अनुभव था. कांपते हुए हाथों से उसने शोभा चाची के स्तनों को एक साइड से छुआ और शोभा के मुहं से एक सीत्कार सी निकल गयी. नौजवान अजय ने अपनी चाची के गुब्बारे कि तरह फूले हुये उन स्तनों को दोनो हाथों में थाम रखा था और उसके अंगूठे चाची के निप्पलों को ढूंढ रहे थे. चाची के ब्लाउज के पतले कपड़े के नीचे ब्रा की रेशमी लैस थी. अजय बिना कुछ सही या गलत सोचे पूरी तन्मयता से अपनी ही चाची के शरीर को मसल रहा था. ब्लाउज इस वक्त शोभा चाची की पसीने से भीगी बाहों से चिपक कर रह गया था. उत्तेजना के मारे बिचारे अजय की हालत खराब हो रही थी. उसके दिल की धडकन एक दम से तेज हो गई थी और गला सुख रहा था. अब शोभा चाची भी गरम होने लग गयी थीं. चाची ने दोनों हाथों से अजय के सिर को पकड कर चेहरे को अपने उरोजों के पास खींचा. शोभा को भी चूत के साथ साथ अपने बड़े बड़े स्तनों में भी दर्द महसूस होने लगा. बिचारे उसके स्तन अभी तक ब्रा और ब्लाउज की कैद में थे. शोभा ने अजय के सिर से हाथ हटा ब्लाऊज के सारे हुक खींच कर तोड़ डाले. ब्लाउज के खुलते ही चाची के दोनों स्तन पतली सी रेशमी ब्रा से निकल पडने को बेताब हो उठे. हुक टूटने की आवाज सुनकर अजय ने सिर उठाय़ा और छोटी सी रेशमी ब्रा में जकड़े शोभा के दोनों कबूतरों को निहारा. ये दृश्य अजय जैसे कामुक लङके को पागल करने के लिये काफी था. शोभा की ब्रा का हुक पीछे पीठ पर था पर अजय इन्तजार नहीं कर सकता था. दोनों हाथों से खींच कर उसने शोभा की ब्रा को ऊपर सरकाया और फ़ड़फ़ड़ाकर आजाद हुये दोनों बड़े बड़े थिरकते गोरे गुलाबी स्तनों को दबोच मुँह मारने और चूमने लगा. शोभा ने किसी तरह खुद पर काबू करते हुये जल्दी से अपन ब्लाऊज बदन से अलग किया

इस बीच अजय ने भी आगे बढ़ते हुये चाची के आगे को तने थिरकते बड़े बड़े स्तनों के ऊपर मुँह मार मार के चुम्बनों की बारिश सी कर दी. चाची ने अजय के सिर को अपने दोनों स्तनों के बीच में दबोच लिया. इस समय चाची अपना एक घुटना बिस्तर पर टेककर और दूसरे पैर फर्श पर रख कर खडी़ हुई थीं. अजय होंठों से चाची के स्तनों पर मालिश सी कर रहा था. "चाची!" अजय फुसफुसाया.

"हाँ बेटा," शोभा ने जवाब देते हुये उसके गालों को प्यार से चूम लिया.

आज से पहले भी ना जाने कितनी बार शोभा ये शब्द अजय को बोल चुकी थी उसकी इकलौती चाची के रुप में. पर आज ये सब बिलकुल अलग था. आज की बातों में सिर्फ सेक्स करने को आतुर स्त्री-पुरुष ही तो थे. अजय ने जब अपने खुरदुरे हाथों से चाची की नन्गी पीठ को स्पर्श किया तो शोभा चाची एक दम से चिहुंक पङी. आज से पहले कभी उन्होने अपने बदन पर किसी एथलीट के हाथों को महसूस नहीं किया था. परन्तु अब शोभा खुद भी अपने भतीजे के साथ जवानी का ये खेल बन्द नहीं करना चाहती थी. अपने शरीर पर अजय के गर्म होंठ उनको एक मानसिक शान्ति दे रहे थे.

" रूक जा अजय बेटा, , हमें ये सब नहीं करना चाहिए" चाची फुसफुसाई.

"लेकिन मैं तो बस आपको किस ही तो कर रहा हूं. अजय के मुहं से उत्तेजना भरा जवाब निकला.


क्रमश:………………
Reply
04-25-2019, 11:57 AM,
#45
RE: Muslim Sex Stories सलीम जावेद की रंगीन दुन�...
दुलारा भतीजा
भाग -2


चाची उसके स्वर में कंपकपीं साफ सुन सकती थीं. अजय ने शोभा चाची के दोनों विशाल गुम्बदों पर अपने होंठ रगड़ते हुये एक हाथ से उनकी पीठ और गर्दन सहलाना जारी रखा. इधर चाची ने भी अजय के सीने पर हाथ फिरते हुये उसके बलशाली युवा बदन को परखा. जैसे ही चाची ने अजय की कमर और फिर उसके नीचे एकदम कसे हुये नितंबों का स्पर्श किया, अजय के फूले हुये लन्ड का विशाल सुपाङा उनके पेट से जा लगा.
चाची के मुहं से एक सिसकारी छूट गयी. "क्या हुआ, चाची?" अजय ने पूछा.

"कुछ नहीं" चाची ने अजय से खुद को छुड़ाने कि कोशिश करते हुये कहा.

चाची को पता था कि अब स्थितियां काफी खतरनाक हो चली हैं. उन्हें इस कमरे में आना ही नहीं चाहिये था. अजय को दूर धकेल कर चाची कमरे से बाहर जाने की कोशिश करने लगी. पर अजय ने चाची के दोनों भारी गुदाज चूतङों को अपने पन्जों में दबाते हुये चाची को अपनी तरफ खींचा और फिर अपने होंठों को चाची के तपते पेट से सटा दिया. चाची तो जैसे उत्तेजना के मारे कांप ही गयी. अजीब सी दुविधा में फंस गयी थी बिचारी शोभा. शरीर अजय की हर हरकत का जवाब दे रहा था और मन अब भी इसे एक पाप कह रहा था. अपने पति के भतीजे के साथ चुदाई पारिवाइक और सामाजिक हदों के बाहर थी. अजय ने चाची की साड़ी को खीन्च कर उनके बदन से अलग कर दिया और अपना चेहरा चाची के पेटीकोट की दरार में घुसेङ दिया. सामान्यतः हिन्दुस्तानी औरतें जब पेटिकोट पहनती हैं तो जहां पेटीकोट के नाङे में गाँठ लगाई जाती है वहां पर एक छोटी से दरार रह जाती है और औरतों के अन्दरुनी अंगों का शानदार नजारा कराती है. दोस्तों, आप लोगो ने भी कई बार अपने घर की औरतों को कपङे बदलते देखा होगा और इस सब से भलीभांति परिचित होंगे. अजय के एक ही चुम्बन से शोभा की तो जैसे जान ही निकल गयी. चाची का पेटीकोट अब उसके रास्ते का रोङा बन रहा था.
शोभा कराही "अजय, ये तू क्या कर रहा हैं, बेटा? ये क्या हो गया है तुझको?"
उधर अजय को पेटीकोट की गाँठ मिल गयी थी जिसे उसने एक ही झटके में खींच दिया. चाची का पेटीकोट खुलकर अब उनके कूल्हों पर आ गया था. अजय ने आगे बढ़ते हुये अपनी उन्गलियों को उन्के विशाल संगमरमरी नितंबों पर फिराते हुये चाची का पेटीकोट नीचे सरका दिया. पेटीकोट अब चाची के पैरों के पास घेरा बनाये पङा था और वो खुद सिर्फ एक लो कट की ब्रा और पतली सी पैन्टी में अपने भतीजे अजय के सामने खङी थी. अजय के होठों ने तुरन्त ही चाची की केले के तने जैसी मांसल जांघों के बीच में अपनी जगह बना ली. जानवरों की तरह चाची की गदराई जांघों को चाट रहा था वो । अब शोभा चाची की सहनशक्ति जवाब दे चुकी थी. दोनों टागें फ़ैला कर चाची खुद ही बिस्तर पर लेट चुकी थीं. अजय, चाची की टागों के बीच में बैठा हुआ था और उसका मुंह शोभा चाची की मखमली मांसल जांघों के अन्दर घुसा हुआ था. शोभा के हाथ अब भी अजय के कन्धों और नितम्बों पर घूम रहे थे. उनका अब अपने दिलोदिमाग पर कोई काबू नहीं रह गया था. अजय के हाथ अब उनकी रेशमी पैन्टी से जूझ रहे थे. शोभा चाची अब भी अजय के लन्ड को छूने से बच रही थीं. लन्ड को अपने हाथों से छूने भर का मतलब खुद को पूरी तरह से अजय के हाथों सुपुर्द कर देना था.

अजय के बचपन कि यादें, जब कितनी ही बार चाची ने उसे अपने साथ ही नहलाया था, हाथों से मल मल कर उसका पूरा बदन और उसका लन्ड साफ़ किया था, रह रह कर उनके दिमाग में घूम रही थीं. और यही सब अब भी उनको अजय के सामने पूर्ण समर्पण से रोक रहे थे. अजय सिर्फ़ एक नौजवान मर्द ही नहीं उनका अपना भतीजा भी था. लेकिन अजय तो इस वक्त सिर्फ़ उस चालीस साल कि औरत के भरे पूरे गरम जिस्म और उससे उठती खूश्बू से पागल हुआ जा रहा था. "बेटा रुक जाओ." चाची बुदबुदाई.
"क्यूं चाची, आपको अच्छा नहीं लग रहा क्या?"
अजय ने पूछा.
"बहुत ज्यादा अच्छा लग रहा है, मेरे लाल. इसीलिये कह रही हूं, रुक जा. इसके आगे ना मैं रुक पाऊंगी ना तू.” चाची बोली. चाची ने अजय के बांह पकड़ने के लिये हाथ बढ़ाया लेकिन गलती से उनकी उन्गलियां अजय के लन्ड को छू गयीं. चाची का पूरा बदन थरथराया और अजय के मुहं से भी आह सी निकली "चाची, देखो मेरा ये कितना बड़ा हो गया है आपको देख कर."
शोभा चाची का दहिना हाथ खुद बा खुद ही उस विशालकाय लन्ड के चारों तरफ़ लिपट गया. लन्ड पर अभी भी अजय का चिकना पानी लिपटा हुआ था. " अजय ये इतना पानी....?" चाची के शब्द गले में ही रह गये कि अजय ने जवाब भी दे दिया. "सिर्फ़ आपको देख कर".
अजय ने एक बार चाची की नाभि के पास चूमा और करवट बदलते हुये खुद चाची के अधनन्गे बदन के पास जाकर लेट गया. चाची ने दुबारा से अजय के सख्त लन्ड को अपनी मुठ्ठी में भर लिया. तभी अचानक से एक विचार उनके दिमाग में आया. अगर वो अपने हाथों से अजय को सिर्फ़ मुठ्ठ मार कर झड़ा दे तो फ़िर वह शान्त हो जायेगा और वो भी वहां से जा पायेंगी. हांलाकि उनकी खुद की चूत में इस वक्त आग लगी हुई है लेकिन वो तो कुमार के पास जाकर जमकर चुद सकती है. लेकिन इससे पहले की चाची ये सब सोच पाती अजय उनके ऊपर चढ़ चुका था. चाची के तपते हुये ज़िस्म पर अपना आधिपत्य जमाते हुये अजय ने चाची के बड़े बड़े स्तनों को दोनों हाथों से दबोच लिया. अजय के वीर्य से भरे हुए दोनो टट्तें और लम्बे मूसल सा लन्ड शोभा चाची के पेट से जा भिड़े. अजय पूरी ताकत से चाची की बड़ी बड़ी हलव्वी चूचियों को निचोड़ ने में व्यस्त था. शोभा के बदन में एक अलग ही आनन्द की लहर उठ रही थी. अपने ही जवान भतीजे को अपने बड़े बड़े स्तनों से इतना दुलार करते देख वो कराह पड़ी "आ~ह अजय बेटा, तुझे चाची के ये चाहिये ? इतने पसन्द हैं ये तुझे?".
अजय ने कोई जवाब नहीं दिया. उसका ध्यान तो सिर्फ़ चाची की ब्रा को खींच कर उनके जिस्म से अलग करने पर था. ब्रा कि इलास्टिक को खींच कर नीचे किया तो भरे हुये वो दोनों खरबुजे के आकार के उरोज पूरी तरह से आजाद हो गये.
अजय ने देखा कि चाची के दोनों बड़े बड़े थिरकते गोरे गुलाबी स्तन दबाने मसलने से लाल हो गये थे मारे उत्तेजना के दोनों भूरे निप्पल लम्बे और कड़क हो गये थे. अजय झुका और अपने होठों को चाची के बड़े बड़े स्तनों पर टिका दिया. उत्तेजना में कई बार अजय ने शोभा के स्तनों पर जगह जगह काट ही लिया. अजय के लन्ड से गाड़ा चिकना द्रव्य निकल कर चाची के पेट पर जमा हो रहा था. चाची ने हाथ आगे बढ़ा कर अजय के लन्ड को अपनी कोमल हथेलियों में समा लिया. जवान भतीजे का
जन्गली लन्ड ठीक उनके पालतू कुत्ते के टौमी के लन्ड के समान ही लाल और गरम था जो उन्होनें दो दिन पहले ही अपने हाथ में लिया था. शोभा ने हाथ में आये अजय के तन्नाए पुरुषांग को धीरे धीरे दुहना चालू किया.

"म्मह... चाचीईई" अजय अपने निचले होंठ को दांतों के बीच दबा के चीखा. चाची के नरम हाथ अपने कड़क लन्ड पर पा कर जानवर हो गया था वो. एक ऐसा जानवर जिसको सिर्फ़ एक ही चीज काबू में कर सकती थी. घनघोर चुदाई. बिल्कुल जानवरों की तरह जोर जोर से कमर हिला रहा था मानो की चाची की मुठ्ठी नहीं कोई मखमली चूत हो. "धीरे बेटा धीरे. कोई जल्दी नहीं है. चाची है ना." ममतामयी सांत्वना दी चाची ने अजय को. कुछ जादू था इन शब्दों में कि अजय तुरन्त ही सुस्त पड़ गया. उसके लन्ड ने भी वीर्य की पिचकारी छोड़ दी थी जो ठीक चाची की पैन्टी पर ही जाकर लगी. चाची की चूत का पानी और अजय का वीर्य मिलकर कुछ
अलग ही मस्त खूश्बू पैदा कर रहे थे. चाची ने अजय को धक्का दिया और बिस्तर पर बैठ गयीं. अब किसी सामाजिक और पारिवारिक बन्धन को तोड़ना बाकी नहीं था. जो होना था वो कब का हो चुका था. चाहे सही हो या गलत यहां तक आकर वापिस लौटने की इच्छा या शक्ति दोनों में से किसी के पास नहीं थी. और फ़िर शोभा ने हाथ पीछे ले जाकर बाधा बन रही उस कमबख्त ब्रा को भी खोल कर बिस्तर से दूर उछाल दी. और खुद अजय की टांगों के बीच आकर उसके लन्ड पर झुक गयीं. अजय अब भी अपने आधे मुरझाये लन्ड को सहला रहा था. शायद अपनी प्यारी चाची के लिये ही तैयार कर रहा था. "अपने लन्ड से मत खेलो अजय. छोड़ो उसको. वो अब मेरा है. जो करना है मैं करूंगी." एक हाथ से कमर पर जमी पैन्टी को पकड़ कर थोड़ा नीचे घुटनों तक सरका दिया और बाकी का काम अपने पन्जों और एड़ियों पर सुपुर्द कर के अपने दोनों हाथों को अजय के लन्ड की सेवा में लगा दिया. चाची ने अजय के खुले नल की तरह लन्ड को मांसल रेशमी जांघों के बीच दबाकर मसलना सहलाना शुरु कर दिया. पहले ही स्पर्श से अजय सिसक उठा "चाचीईईईईईई".
एक बार फ़िर से मैदान में आ गया था अजय का छोटू. इधर चाची अपने भतीजे के इस महान हथियार का जायज़ा लेने में जुटी हुईं थीं उधर अजय की बेचैनी बढ़ती ही जा रही थी. अपने दोनों हाथों को चाची के विशाल नितंबों को दबोच कर अपनी कमर हिला हिला कर उनकी मखमली जांघों को ही चोदने लग गया. "ए अजय" चाची के मुहं से गुर्राहट सी निकली "मैं कर रही हूं ना.
चुपचाप पड़े रहो, नहीं तो चाची चली जायेगी". बिचारे अजय ने कमर को तो रोक लिया लेकिन किसी प्राकृतिक प्रतिक्रिया के वशीभूत होकर अपना सर ज़ोर ज़ोर से इधर उधर पटकने लगा. भई, किसी ना किसी चीज को तो हिलना ही था. सिर उठा कर नीचे देखा की चाची क्या कर रही है. हे भगवान! अब तक देखी किसी भी ब्लू फ़िल्म और उसके सपनों से भी ज्यादा सेक्सी था
ये तो. बिखरे हुये लम्बे काले बाल, गले से लटका हुआ हार और उसके ठीक पीछे उछलते हुए दो बड़े बड़े भारी कटीले स्तन . मानो पके हुये आमों की तरह अभी कोई बस चूस ले. चाची और उनकी सांत्वना देती मुस्कुराहट. कुल मिला कर अजय के लिये तो वो एक देवी जैसी थी. एक ऐसी वासना की देवी जो आज उसके कुमारत्व को छीनकर उसे पूर्ण पुरुष बना देगी.

शोभा चाची का एक हाथ अजय के बाल भरे सीने पर घूम रहा था तो दूसरे ने उन्गलियों से लन्ड को थाम रखा था. कुछ देर पहले का खुद का विचार कि अजय को एक बार मुठ्ठ मार कर वो चली जायेगी उन्हें अब बेमानी लग रहा था. आखिर कैसे छोड़ कर जायेगी अपने प्यारे भतीजे को ऐसी तड़पती हालत में. और खुद उसकी चूत में जो बुलबुले उठ रहे है उसका एक मात्र समाधान भी अजय का ये बलशाली चर्बीदार लन्ड ही था.

चाची अब फ़ाईनल राउन्ड की तैयारी में थीं. वासना और वास्तविकता के बीच फ़र्क करना बहुत जरुरी था. कमरे के अधखुले दरवाजे से किसी भी व्यक्ति के अन्दर आने का जोखिम तो था ही. पर देह की सुलगती प्यास में दोनों दीन दुनिया से बेखबर हो चुके थे. चाची पूरी तरह से अजय के ऊपर आ चुकी थीं. अजय तो बस जैसे इसी मौके की तलाश में था. तुरन्त ही उसके हाथों ने आगे बढ़कर चाची के विशाल थनों को दबोच लिया. एक स्तन की निप्पल को होठों मे दबा वो चाची की जवानी का रस पीने में मश्गूल हो गया तो दूसरी तरफ़ चाची ने भी खुद को अजय के ऊपर ठीक से व्यवस्थित करते हुये अपने हाथों से अजय के विशाल हथौड़े जैसे लन्ड को लार टपकाती गुलाबी चूत का रास्ता दिखाया. जैसे ही चूत की मुलायम पन्खुड़ियों ने अजय के पौरुष को अन्दर समाया,
अजय हुंकारा "आह!. बहुत गरम है चाची आपकी चूत, मैं झड़ जाऊंगा". "हां मेरे लाल, सब्र रख, कुछ नहीं होगा" बरसों से इसी तरह अजय को कदम कदम पर हिम्मत बधांती आई थी शोभा.
"अब चोद अपनी चाची को चोद दे आज मुझे,. इस लन्ड को मार मेरी चूत में." अजय का हौसला बढ़ाने के लिये शोभा ने उसे ललकारा. अजय ने चाची की विशाल गोल चूतड़ को हथेली मे दबाया और चल पड़ा पुरुषत्व के आदिम सफ़र पर. अजय की कमर के लयबद्ध वहशी धक्कों के साथ उसका लन्ड चाची की रिसती चूत में अन्दर बाहर होने लगा. "हां चाची, ले लो मुझे. मेरा लन्ड सिर्फ़ आपका है. मैं अपना पानी आपकी चूत में भर देना चाहता हूं. आह! आह! चाची!" अजय चीख पड़ा. शोभा समझ गयी कि अजय की इन आवाजों से कोई न कोई जाग जायेगा.
चाची ने तुरन्त ही अपने रसीले होंठ अजय के होठों पर रख दिये. "म्ममह" अजय चाची के मुंह मे कराह रहा था. "खट खट" अचानक ही किसी ने कमरे का दरवाजा खटखटाया "बेटा, सब ठीक तो है ना?" पद्मा का स्वर सुनाई दिया. शायद उसे कुछ आवाजें सुनाय़ी दे गई थी और चिन्तावश वो अजय को देखने उसके कमरे के दरवाजे तक चली आईं थीं. कमरे के अन्दर आना पद्मा ने दो महीने पहले ही छोड़ दिया था जब एक रात गलती से वो उसके कमरे में घुस आई थी और उस वक्त अजय पूरे जोश के साथ मुठ्ठ मारने में लगा हुआ था. ताई और भतीजे की आंखें मिलते ही पद्मा बिना कुछ कहे उलटे पांव वापिस लौट गयी और फ़िर अजय से इस बारे में कभी जिक्र भी नहीं किया. किन्तु उसके बाद अजय के साथ ऐसे किसी भी हादसे से वो बचती थी.


पार्ट -3

"हां - ताई, सब - ठीक - है" हर शब्द के बीच में विराम का कारण चाची की फ़ुदकती चूत थी जो शोभा को रुकने ही नहीं दे रही थी. शोभा के दिमाग में हर सम्भावित खतरे की तस्वीर मौजूद थी पर वो तो अपनी चूत के हाथों लाचार थी. दो क्षण रुकने के बाद चाची फ़िर से शुरु हो गयीं.
अजय अभी तक झड़ा नहीं था. शोभा ने तो सोचा था कि नौजवान है जल्दी ही पानी निकाल देगा लेकिन अजय तो पहले ही दो बार लन्ड का तेल निकाल चुका था. पहली बार चाची के कमरे में आने के ठीक पहले और दूसरी बार खुद चाची के हाथों से. जो भी हो पर शोभा चाची का अजय के लन्ड पर कूदना नहीं रुका. अपनी चिकनी चूत के भीतर तक भरा हुआ अजय का लन्ड अन्दर गहराईयों को अच्छे से नाप रहा था. दोनों ने ही कामासन में बिना कोई परिवर्तन किये एक दूसरे को चोदना बदस्तूर जारी रखा. फ़िर पहली बार शोभा चाची को अपनी चूत में एक सैलाब उठता महसूस हुआ. जबर्दस्त धड़ाके भरा उत्तेजनात्मक चरम सीमा था. चाची के मुहं से घुटी घुटी आवाजें निकल रही थी. होठों के किनारे से निकल कर थूक गर्दन तक बह आया था. ये निषिद्ध सेक्स के आनन्द की परम सीमा थी. जिस भतीजे को खुद पाल पोस कर बड़ा किया है आज उसी के कुमारत्व को लेने क सौभाग्य भी उनको प्राप्त हुआ था. और क्या पुरुष था उनका भतीजा, अजय. निश्चित ही आने वाले समय में कई सौ चूतों को पावन करने का अवसर उसे मिल सकता है. अचानक कमरे का दरवाजा खुला. पद्मा दरवाजे की आड़ लेकर ही खड़ी हुई थी. "बेटा, सबकुछ ठीक है ना, मुझे फ़िर से आवाजें सुनायी दी थी." शायद पद्मा ने कुछ भी देखा नहीं था. अजय फ़िर से मुठ्ठ मार रहा है और ये उसी की आवाजें है, यही सोचकर पद्मा अन्दर नहीं आई. "कुछ नहीं ताई". अजय को तो सिर्फ़ अपनी चाची की पनीयाई चूत से मतलब था. चाची को बिस्तर पर पटक कर वो खुद उनके ऊपर चढ़ गया.
"रुको, बेटा"
चाची ने रोका उसे.
चाची ने पैर के पास पड़ी अपनी पैन्टी को उठाकर पहले अजय के लन्ड को पोंछा और फ़िर अपनी चूत से रिस रहे रस को भी साफ़ किया. काफ़ी देर हो गयी थी गीली चुदाई करते हुये. शोभा अब उसके सुखे लन्ड को अपनी चूत में महसूस करना चाहती थी.
लेकिन शोभा चाची ने शायद यहां कुछ गलती कर दी. अजय को बच्चा समझ कर उन्होनें लन्ड से चिकना पानी साफ़ किया था. परन्तु जब अजय ने एक ही झटके में पूरा का पूरा लन्ड चाची की चूत में घुसेड़ा तो वो जैसे चूत के सारे टान्के खोलता चला गया. सात इन्च लम्बे और चार इन्च मोटे हथियार से और क्या उम्मीद की जा सकती है. उन्हें समझ में आ गया कि वास्तव में वो चिकना द्रव्य कितना जरूरी था. अजय का लन्ड किसी मोटर पिस्टन की भांति चाची कि चूत पर कार्यरत था. अजय के हर धक्के के साथ ही चाची की जान सी निकल रही थी. पूरा शरीर, स्तन, दिमाग यहां तक की आखें भी झटकों की ताल में हिल रहे थे. अजय की तेजी और बैल जैसी ताकत का मुकाबला नहीं था. नाखूनों को भतीजे के कन्धों पर गड़ा कर आखें बन्द कर ली. किसी भी चीज पर ध्यान केन्द्रित नहीं कर पा रही थी चाची इस समय. हर एक मिनट पर आते उत्तेजनात्मक चरम सीमा से चूत में सैलाब सा आ गया था. अजय को सिग्नल करने के इरादे से चाची ने कई बार अजय के सीने पर दांत गड़ाए, अपनी जाँघों से उसकी कमर को भी जकड़ा, लेकिन इससे तो अजय की उत्तेजना में और वृद्धि हो गई. आखिरकार चन्द वहशी धक्कों के पश्चात अजय ने भी चरम शिखर को प्राप्त कर लिया. "चाची, चाची..हां चाची, मेरा निकल रहा है. आ~प के~की ~ में आ~ह." शुरुआती स्खलन तीव्र किन्तु छोटा था. लेकिन उसके बाद तो जैसे वीर्य की बाढ़ ही आ गयी. शोभा ने अजय को अपने बदन से चिपका लिया. वीर्य की हर पिचकारी के बाद वो अपन भतीजे के नितम्बों को निचोड़ती. कभी अजय के टट्टों को मसलती कभी उसकी पीठ पर थपकी देती. अजय का बदन अभी तक झटके ले रहा था. "श्श्श्श. हां मेरे लाल. घबरा मत मैं हूं यहां पर. तेरी चाची है ना तेरे लिये". अजय ने भी चाची के दोनो स्तनों के बीच अपना सिर छुपा लिया. जब दोनों शांत हुये तो चाची को याद आया कि कहां तो उनका अजय को सिर्फ़ मुठ्ठ मारने में मदद करने का इरादा था और कहां इस समय उनका जवान भतीजा उन्हें अपने नीचे दबाये वीर्य की अन्तिम बूंद तक उनकी कोख में उड़ेल रहा है. खुद की चिकनी जाँघों पर गरमा गरम लावा और कुछ नहीं बल्कि अजय का वीर्य और उनकी चूत का मिल जुला रस था. चाची का नशा अब तक उतर चुका था और जो भूल वो दोनों कर चुके थे उसको सुधारा नहीं जा सकता था. अपने ही भतीजे के भारी शरीर के नीचे दबकर चाची के अंग अंग में एक मीठा सा दर्द हो रहा था, लेकिन अब वहां से जाना जरुरी था. अजय को धकेल कर साइड से सुलाया और अपने कपड़े ढूढ़ने लगीं. अबकी बार चाची को सही दरवाजे का पता था. बिस्तर के पास पड़ा हुया अपना पेटीकोट उठा कर कमर तक चढ़ाया, साड़ी को इकठ्ठा कर के बदन के चारों तरफ़ शॉल की
तरह लपेट लिया. ब्लाऊज के कुछ बटन अजय की खींचातानी से टूट गये थे फ़िर वैसे ही एक हाथ से साड़ी पकड़े और दुसरे से ब्रा, पैंटी और पेटीकोट का नाड़ा दबाये चाची कमरे से बाहर निकल गईं. अपने कमरे का दरवाजा बन्द करते वक्त उन्हें पद्मा के कमरे के दरवाजे के धीरे से बन्द होने की आवाज सुनाई दी. लेकिन ये सब सोचने का समय कहां था. उनकी चूत से तो झरना सा बह रहा था. आज की चुदाई ये साबित करने के लिये काफ़ी थी कि ४० की उमर में भी उनकी जवानी ढली नही थी या शायद आज तक उनकी जवानी को जी भर के लूटने वाला उनके पास नहीं था.
क्रमश:………………
Reply
04-25-2019, 11:57 AM,
#46
RE: Muslim Sex Stories सलीम जावेद की रंगीन दुन�...
दुलारा भतीजा
भाग -3


शोभा ने सारे कपड़े दरवाजे के पास ही छोड़ दिये उनको सवेरे भी देखा जा सकता है. पेटीकोट से अपनी जांघों और चूत को पोंछा और झट से नाईटी पहन कर कुमार के साथ बिस्तर में घुस गयीं. कुमार से आज रात दूर रहना बहुत जरूरी था. ऊपर से नीचे तक अजय के थूक, पसीने और वीर्य से सनी हुई वो इतनी रात में नहाने भी नहीं जा सकती थीं. जवान भतीजे से चुदने के बाद अपने पति को छुने में भी उन्हें गलत महसूस हो रहा था. कुमार पूरी तरह से सो नहीं रहा था, बीवी के कमरे में आने की आहट पाकर वो जाग गया "कुछ सुना तुमने, शोभा".
“क्या?” शोभा का दिल धड़का।
"भैया और भाभी इस उमर में भी कितने जोश से एक दूसरे को चोद रहे थे."

"आप पद्मा भाभी और भाई साहब की बात कर रहे हैं? वो तो मैने सुना, काफ़ी देर हो गई ना उनको खत्म करके तो."
शोभा ने धड़कते दिल से पूछा. कहीं अजय और उसकी चुदाई का शोर उसके पति ने ना सुन लिया हो. अपनी और अजय की जन्गली चुदाई ने दोनों को ही दीन दुनिया भूला दी थी.
"कहां बहुत देर पहले? अभी दो मिनट पहले ही तो खत्म किया है. दो घन्टे से चल रही थी चुदाई. कल दोनों शायद देर से ही उठेंगे।”
शोभा चाची के तो होश ही गुम हो गये. वास्तव में उसके पति ने चाची भतीजे की चुदाई की आवाजें सुनी थी. किस्मत ही अच्छी है कि कुमार उन आवाजों को पद्मा और गोपाल की मान बैठा था. प्रार्थना कर रही थीं कि बस अब पतिदेव चुप होकर सो जायें कि तभी कुमार का हाथ उनकी चूतड़ पर आ गया. "बड़ी देर कर दी जानेमन, सो गयीं थीं क्या?" चाची की नाईटी को ऊपर करते हुए कमर तक नंगा किया. "आज उस फ़िल्म में देखा, कैसे उस आदमी ने उस हिरोईन को पीछे से चोदा."
चाची थोड़ा सा कसमसाई. पर कुमार चाचा का हाथ उनकी टांगों के बीच में घुस चुका था.
कुमार ने शोभा की एक टांग को घुटनों से मोड़ कर अलग कर दिया. पेट के बल लेटी शोभा की चूत को कुमार के लन्ड ने ढूंढ ही लिया. शोभा चाहकर भी कुमार को रोक नहीं सकती थी. कुमार ने दोनो हाथों से अपनी पत्नी की फ़ूली हूई गान्ड को दबोचा और एक ही झटके में अपना पाँच इंच का लन्ड उनकी चूत में पेल दिया. अब आश्चर्यचकित होने की बारी कुमार की थी. चूत को अन्दर से तर पाकर उसके मुहं से निकला "अरे! तुम भी गीली हो, शायद उस फ़िल्म का ही असर है". बिचारे को क्या पता था की उसका लन्ड इस वक्त उसके खुद के भतीजे के बनाये हुये दरीया में गोते लगा रहा है. शोभा ने उसे चुप करने के उद्देश्य से अपने दोनों को पीछे ले जाकर कुमार की चूतड़ को जकड़ा और उसे अपने करीब खींचा.
कुमार को तो जैसे मनचाहा आसन मिल गया था. बिना रुके ताबड़ तोड़ धक्के लगाने लगा. शोभा चाची भी फ़िर से उत्तेजित हो चली थीं. एक ही रात में दो अलग अलग मर्दों से चुदने के रोमान्च ने ग्लानि को दबा दिया. सही गलत की सीमा तो वो पहले ही लांघ चुकी थीं. कुमार ने अब चूतड़ को छोड़ शोभा चाची के ऊपर झुकते हुये उनके मुम्मे दोनों हाथ में भर लिये. शोभा चाची की गान्ड को अपनी कमर से चिपका कर कुमार जोर जोर से उछलने लगा.
"पता है, भाभी कितना चीख चिल्ला रही थी. भैया तो शायद जानवर ही हो गये थे. आज मैं भी तुमको ऐसे ही चोदूंगा". शर्म और उत्तेजना की मिली जुली भावना ने चाची के दिलोदिमाग को अपने काबू में कर लिया था. कुछ ही क्षणों में कुमार के लण्ड ने उलटी कर दी. कुमार का वीर्य अपने भतीजे के वीर्य से जा मिला. शायद इसी को पारिवारिक मिलन कहते है. अजय के विपरीत कुमार का हर झटका पहले के मुकाबले कमजोर था और वीर्य की पिचकारी में भी वैसा दम नहीं था. आखिर ४० पार कर चुके मर्द की भी अपनी सीमा होती है. चाची की चूत में से सिकुड़ा हुआ लन्ड अपने आप बाहर निकल आया और कुमार तुरन्त ही दूसरी तरफ़ करवट बदल कर सो गया. थोड़ी देर पहले अजय तो उनको जमकर चोदने के बाद भी छोड़ नहीं रहा था. खैर, एक ही रात में दो अलग अलग मर्दों से दबोचे और चोदे जाने के कारण चाची का जिस्म थक कर चूर हो चुका था. लेकिन ये भी सच है कि आज जीवन में पहली बार
उनको मालूम हुआ था कि चुदाई में तृप्ति किसे कहते हैं. सोने के लिये करवट बदला तो दरवाजे के पास अन्धेरे में उनको अजय का साया दिखाई दिया. हो सकता है ये उनका वहम था या कि फ़िर चुदाई का शोर सुनकर अजय जाग गया और कौतूहलवश झांकने चला आया. फ़िर कमरे का दरवाजा हल्के से बंद हुआ और शोभा चाची भी सपनों के संसार में खो गयीं.
अपने जेठ के घर में पूरी रात किसी रन्डी की तरह चुदने के बाद अगली सुबह शोभा चाची उठीं तो उनके पूरे बदन में मीठा मीठा दर्द हो रहा था. कमरे में कोई नहीं था. कुमार कभी के उठ कर बड़े भाई के साथ सुबह की सैर के लिये जा चुके थे और शोभा हैंग ओवर (शराब पीने के कारण अगली सुबह व्यक्ति का सिर दुखता है, इसी को हैंग ओवर कहते है.) की वजह से सिर को दबाये चादर के नीचे बिस्तर में लेती हुईं थीं. थोड़ा सामान्य हुईं तो पिछली रात की बातें याद आने लगीं. कि कैसे गलती से वो अपने जवान भतीजे के कमरे में घुस कर उसके कुंवारे लन्ड को चूस रही थीं. फ़िर किस तरह से अजय की ताकत और सैक्स में उसकी नितान्त अनुभवहीनता ने उन्हें भी अपना गुलाम बना लिया था. कैसे अजय के लन्ड पर चढ़ कर घनघोर चुदाई का आनन्द उठाया था और उन दोनों की आवाजें सुनकर पद्मा भाभी खुद अजय के दरवाजे तक ही चली आयी थीं. इसी रात, जीवन में पहली बार पतिदेव ने
भी पीछे से चूत मारी थी. अजय के बारे में सोचते ही शोभा चाची की चूत में खुजली सी मचने लगी. दोनों मर्दों और खुद का पानी उनकी चूत में से बहकर बिस्तर पर फ़ैल गया था. तभी उन्हें याद आया कि ये तो गोपाल और पद्मा का घर है और उन्हें अब तक उठ जाना चाहिये था. रात में जो कुछ भी हुआ वो अब उतना गलत नहीं लग रहा था. शायद उनके भाग्य में ही अपने भतीजे को एक कुंवारे लड़के से मर्द बनाने का सौभाग्य लिखा था. कमरे में बिखरे हुये कपड़े इकट्ठे करते शोभा चाची को अब सब कुछ सामान्य लग रहा था. खैर, अब उनको एक संस्कारी बहु की तरह नीचे रसोई में जाकर पद्मा भाभी का हाथ बटाना था. हालांकि अजय से चुदने के बाद अगली ही सुबह उसकी ताई समान ताई से आंखें मिलाना थोड़ा अस्वभाविक था. उधर ये शन्का भी कि शायद पद्मा ने कल रात को दोनों को संभोग करते देख लिया था
चाची के मन में डर पैदा कर रही थी. शोभा रसोई में घुसी तो पद्मा सब के लिये चाय बना रही थी. "गुड माँर्निंग, दीदी!", "मैं कुछ मदद करूँ?" "
ओह, गुड माँर्निंग शोभा. अरे, कुछ खास नहीं, हो गया सब. तुम आराम कर लेती ना. कल रात को तो बड़ी मेहनत कर रही थीं." पद्मा ने जवाब दिया.
शोभा तो जड़वत रह गई. कहीं पद्मा भाभी ने सच में उसे अजय के साथ रन्ग रेलियाँ मनाते देख तो नहीं देख लिया या वो सिर्फ़ अन्दाजा लगा रही हैं और उनका इशारा कुमार और उसकी चुदाई की तरफ़ था. जो भी हो आखिर इन लोगो की आवाजें
भी तो पूरे घर में सुनाई दे रही थीं. "आप भी तो कल रात खूब पसीना बहा रही थीं",
शोभा ने मुस्कुराने की चेष्टा की. आम हिन्दुस्तानी घरों में जठानी और देवरानी में
इस तरह का सैक्स संबंधी वार्तालाप काफ़ी सामान्य है. चाय में शक्कर डालते हुये
पद्मा के हाथ रुक गये. "मैं क्या कर रही थी?" पद्मा ने पूछा. "भाभी, हम दोनों ने आप लोगों की आवाजें सुनी थीं" शोभा ने पद्मा के कन्धे पर हाथ रखते हुये कहा. "मैं अपने पति के साथ थी" पद्मा ने फ़िर से चाय के बर्तन में शक्कर डालते हुए कहा. शोभा का चेहरा लाल हो गया और दिल हथौड़े की तरह बजने लगा. गले में कुछ चुभ सा रहा था शायद, बड़ी मुश्किल से बोल पाई "मैं भी तो अपने पति के साथ ही थी".
"हाँ, आखिरकार". पद्मा ने कन्धे से शोभा का हाथ झटकते हुये कहा.
शोभा चुपचाप सिर झुकाये प्लेट में बिस्किट लगाने लगी. कहां कल कि रंगीन रात और कहां सवेरे सवेरे ये सब बखेड़ा. लेकिन जो भी हो सामना तो करना ही पड़ेगा.

"सो, कैसा रहा सब कुछ."
पद्मा ने सामान्य बनते हुये पूछा. "दीदी, कल शाम को शराब पीने के बाद, इतनी सैक्सी फ़िल्म देख कर हम सब ही थोड़ा थोड़ा बहक गये थे"
कहते हुये शोभा के हाथ काँप रहे थे. कल रात की याद करने भर से शोभा की चूत में गीलापन आ गया.
"वो सब तो ठीक है, लेकिन तुमने मेरी बात का जवाब नहीं दिया. कल रात को मजा आया कि नहीं."
पद्मा तो जैसे जिद पर ही अड़ गयी. "पता नहीं आप को इस सब में क्या मजा आ रहा है, हम लोगों की ये कोई सुहागरात तो थी नहीं"
शोभा थोड़ा शरमाते हुए बोली.
"उसके लिये तो थी"
आखिरकार पद्मा ने कह ही डाला. अब शक की कोई गुन्जाईश नहीं थी की पद्मा ने कल रात शोभा को अपने भतीजे के कमरे में देख लिया था. "दीदी, ये सब गलती से हुआ"
अब शोभा भी टूट गई. दिल जोरो से धड़क रहा था और तेजी से चलती सांसो से सीना भी ऊपर नीचे हो रहा था. शर्म के मारे दोनों गाल लाल हो गये थे बिचारी के. "इतनी देर हो गई थी कि तुम खुद को रोक भी नहीं सकती थीं?"
शोभा से किसी जज की तरह सवाल पूछा पद्मा ने. उसके भतीजे को बिगाड़ने का अपराध जो किया था शोभा ने.
"नहीं दीदी, जब मुझे पता चला कि....." "क्या पता चला तुम्हें?" पद्मा का स्वर तेज हो चला. "दीदी, पता नहीं कैसे आपको बताऊँ? लेकिन जैसे ही मैने उसको महसुस किया मैं समझ गयी कि ये कुमार तो नहीं हैं. किन्तु आपका भतीजा तो रुकने को ही तैयार नहीं था." कहते हुये शोभा ने पद्मा का हाथ पकड़ लिया. डर रही थी कि कहीं पद्मा घर में महाभारत ना करा दे.
पद्मा ने शोभा के हाथ को दबाते हुये सयंत स्वर में पूछा. "कैसे महसूस किया तुमने उसे?".
कम से कम इतना जानने का अधिकार तो उसका था ही कि उसके भतीजे के साथ क्या हुआ था. अगर उसकी देवरानी ने जान बूझ कर अजय को उकसाया था तो ये एक अक्षम्य अपराध था.
"मैनें तो सिर्फ़ वही किया जो में कुमार के साथ करती हूं". पद्मा के कन्धे पर सर रखते हुये शोभा बोली.
"हां तो ऐसा क्या किया तुमने कि तुमको मालूम पड़ गया कि ये कुमार नहीं अजय है और फ़िर भी तुम खुद को संभाल नहीं पाईं? मुझे तो कुछ भी समझ में नहीं आ रहा".
शोभा की समझ में आ गया की पद्मा को रोकना मुश्किल है. उसने सब कुछ बताने का निश्चय कर लिया. वो बोली "दीदी, उसका वो इतना लम्बा और तगड़ा था और इतनी जल्दी खड़ा हो गया था की वो कुमार का तो हो ही नही सकता था. मैने उसे रोकने की बहुत कोशिश की पर अजय बुरी तरह से उत्तेजित था." "तुमने उसे रोकने की कोशिश की, कैसे?"
पद्मा ने फ़िर से सवाल दाग दिया.
"वैल, मैनेअपने को उससे छुड़ाया और वहां से उठ गई",
शोभा के मुहं से तुरन्त ही निकल गया.
"ओ गॉड, तो क्या अजय से तुम लिपट गई थी?" अब पद्मा की चूत में पानी बहने लगा. अब पद्मा की चूत में पानी बहने लगा. एक औरत, उनकी देवरानी, कल रात अपने ही भतीजे से लिपटी थी.
"उसने मुझे दबोच लिया था ।"
पद्मा ने अविश्वास से शोभा की तरफ़ देखा.
"कमरे में अन्धेरा था. मुझे लगा की कुमार सो रहे हैं. तो बाकी दिनों की तरह ही में अजय की चादर में घुस कर जल्दी मचाने लगी. नशे में तो मैं थी ही और आपकी और भाई साहब की चुदाई की आवाजों ने मेरा दिमाग खराब कर दिया था." शोभा ने भी पूरे वाकिये को रसीला बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. "एक झटके में ही वो लन्ड फ़ूलकर इतना बड़ा हो गया था कि मैं तुरन्त ही समझ गई कि ये कुमार नहीं हैं."
" क्या इतना बड़ा है अजय का लन्ड ?"
पद्मा ने पूछा. किन्तु तुरन्त ही उसे अपनी गलती का एहसास हो गया. उसे ऐसा सवाल नहीं पूछना चाहिये था. अजय बचपन से अपने ताऊ ताई के साथ एक ही कमरे में सोता आया था. जब वो तेरह साल का हुआ तो एक दिन पद्मा को उसके बिस्तर में कुछ धब्बे मिले. उस दिन से उसने अजय का दूसरे कमरे में सोने का इन्तजाम कर दिया और साथ ही उसे नहलाना और उसके कपड़े बदलना भी बन्द कर दिया. उसके बाद पद्मा कभी भी अपने बेटे समान भतीजे को नग्नावस्था में ना देख सकी. पर आज वो सब कुछ जानना चाहती थी. शोभा ने भी पद्मा के व्यवहार में आये परिवर्तन को तुरन्त ही जान लिया.
"शायद अजय को ये सब अपने ताऊ से मिला है. कुमार का लन्ड तो काफ़ी पतला और छोटा है, अजय अपनी उम्र के हिसाब से काफ़ी तगड़ा है. गजब की ताकत है उसमें" अपने नये प्रेमी की प्रशन्सा करने से ही शोभा के होंठ सूख गये.
"आओ, बैठ कर बात करते हैं" शोभा का हाथ पकड़ कर पद्मा उसे हॉल में ले आई. अपनी गलती पता चलने पर भी तुमने उसे रोका नहीं?"
"दीदी, जब तक में कुछ समझ पाती काफ़ी देर हो चुकी थी, मैने लाईट जलाने की कोशिश की तो उसने अपने लन्ड से मेरे हाथ में झटके मारना शुरु कर दिया. मुझे लगा कि शायद वो कोई सपना देख रहा है पर जैसे ही वो जागा, बिल्कुल पागल ही हो गया. और फ़िर उसने मुझे भी अपने वश में कर लिया, "मैं कुछ न कर सकी दीदी, आई एम सॉरी".

"और फ़िर, तुम भी उसके साथ शुरु हो गईं? है ना?"
इस वक्त पद्मा की चूत में बुलबुले से उठने लगे. जब शोभा ने बताया कि अजय का लन्ड कितना बड़ा है तो उसकी अजय के बारे में और जानने की इच्छा बढ़ गई. लेकिन खुद को चरित्रहीन साबित किये बगैर ये सब पूछ पाना भी जरा मुश्किल था.

"मैने उसे रोकने की कोशिश की थी, लेकिन मैं उससे से दूर नहीं जा पाई. इतने सालों तक अपने हाथों से खिला पिला कर, नहला कर उसे बड़ा किया है मैनें. मेरे मन ने कहा कि बाकी सब की तरह ये भी उसकी ज़रूरतों का एक हिस्सा है. जब उसने मेरे बड़े बड़े स्तनों को दबाया तो मुझे लगा कि अगर मेरा सगा भतीजा मेरा भी दूध पी ले तो क्या हर्ज है". पद्मा के स्तनों में लहर सी उठ रही थी तो दिमाग में अपनी बहन जैसी देवरानी के लिये ईर्ष्या. अपना हाथ शोभा के स्तनों पर रख कर उसके एक निप्पल को मसलते हुये पूछ बैठी, "क्या अजय ने इनको भी चूसा था?" शोभा ने पद्मा के कन्धे से सिर हटा कर उसकी आंखों में झांका.
पद्मा की आंखों में पछतावे के आंसू थे जैसे कुछ खो गया हो. बीती रात खुद की जगह शोभा को अजय के ज्यादा करीब पाने का दर्द भरा था उसके दिल में. उधर, अपने प्यारे भतीजे की करतूत के बारे में उसकी ताई को बताने का शोभा का उत्साह दुगुना हो गया था. "दीदी, अजय जोर जोर से मेरे स्तनों को पकड़ कर मसल रहा था. मैं रुक ही नहीं पाई. ब्लाऊज को फ़टने से बचाने के लिये ही मैनें उसे खोल दिया." शोभा ने अपना एक हाथ पद्मा के ब्लाऊज में डाल दिया और उन्गलियों से उसकी तनी हुयी निप्पल को मसलने लगी. "अपना अजय अब उतना छोटा नहीं रहा. घोड़ों के जैसी ताकत है उसमें. अगर गोपाल भाई साहब भी ऐसे ही हैं तो आप वास्तव में बहुत लकी हैं." शोभा ने बात खत्म करते हुए कहा. मगर पद्मा का दिमाग तो किसी और ही ख्याल में डूबा हुआ था. जैसा शोभा ने बताया अगर वो सब सच है तो अजय अपने ताऊ से कहीं आगे था. शोभा ने पद्मा के गले में हाथों को डाल कर अपने गाल पद्मा के गालों से सटा दिये. पद्मा के पूरे शरीर में बिजली सी दौड़ गई. शोभा के लिये अब उसकी भावनायें मिली जुली थी. एक और तो वो शोभा की आभारी थी कि उस जैसी सैक्स में अनुभवी औरत ने अजय की यौन जरुरतों को पूरा किया दूसरी और मन में एक ईर्ष्या का बीज भी था कि अजय को इस सब के लिये किसी दूसरी औरत का सहारा लेना पड़ा जबकि वो खुद उसके लिये ये सब कर सकती थी.
दोनों औरतें चुप थीं. शोभा के हाथ पद्मा के बदन पर रेंग रहे थे और पद्मा अपने बदन में उठती सैक्स तरंगों को अच्छे से महसूस कर सकती थी. लेकिन अजय और उसके ताऊ की तुलना के बारे में वो कुछ नहीं बोल सकती थी. शोभा ने ही बातचीत में आये गतिरोध को तोड़ा. "एक बार जब में उसके ऊपर चढ़ी तो अजय के लन्ड ने यहां तक जगह बना ली." अपने पेट पर नाभी के पास हाथ से इशारा करते हुये उसने पद्मा को दिखाया. "मैनें तो सोचा था कि एक बार अजय को मुठ मार के झड़ा दूंगी तो चली जाऊंगी. लेकिन पता नहीं कब मैं अपने होश खो बैठी और अजय के ऊपर जाँघ चढ़ा बैठी। उसके बाद अजय ने अपने आप वो तगड़ा लन्ड पूरा का पूरा मेरी चूत में डाल दिया. देखो यहां तक" अजय की प्रशन्सा करना अब शोभा को अच्छा लग रहा था. (पाठकों को याद होगा कि शोभा ने अपने हाथ से अजय के लन्ड को अपनी चूत का रास्ता दिखाया था, बिचारे १९ साल के कुंवारे अजय को क्या मालूम की औरत की चूत में लन्ड कहां डालना होता है. पद्मा से ये सब तथ्य छिपाना जरूरी था.) पद्मा ने शोभा की आंखों में देखा. ये औरत कुछ ही घन्टे पहले उनके भतीजे अजय के ऊपर चढ़ी हुई थी.


क्रमश:………………
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दुलारा भतीजा
भाग -4



शोभा की चूत में भरा हुआ अजय के लन्ड का चित्र पद्मा के दिमाग में अपने आप बन गया. शोभा ने अजय का कुमारत्व छीन कर उसे बच्चे से जवान मर्द तो बना ही दिया था. अजय की जिन्दगी में किसी दूसरी औरत का साया पाकर उसका मन शोभा के लिये जबरदस्त जलन से भर गया. शोभा को खुद से दूर करके पद्मा उठी और रसोई में चली गयी.
शोभा की आंखों में देख कर ना तो वो अपनी जलन को जाहिर करना चाहती थी और ना ही अजय के लिये अपने दिमाग में चलते आज रात के प्लान के बारे में उसे कुछ भनक पड़ने देना चाहती थी. अपने अजय को वो किसी के साथ भी नहीं बांट सकती थी. अगर अजय को किसी औरत का साथ ही चाहिये था तो वो साथ पद्मा का ही होना चाहिये था किसी और का नहीं. जिन निपल्लों को अजय ने चूसा वो उसकी ताई के ही होने चाहिये थे और उसके औजार ने शोभा की जो चूत मारी थी वो अब सिर्फ़ पद्मा की होनी चाहिये थी. कम से कम इस वक्त वो अजय के पुरुषत्व को छुना चाहती थी. उसे अपने करीब महसूस करना चाहती थी. खुद की चूत से जो पानी बह कर जांघों तक पहुंच गया था और अब वो पद्मा को आज रात तक चैन नहीं लेने देगा. हे भगवान, क्या क्या सोच रही है पद्मा? अजय के साथ हमबिस्तर होकर वो उसे वापिस पा लेगी. पद्मा की लम्बी चुप्पी ने शोभा पर कुछ और ही असर किया. शायद पद्मा इस पूरे प्रकरण से काफ़ी आहत हुई थी और शोभा से फ़िर कभी बात ही नहीं करेगी. कहीं पद्मा ने सब कुछ उसके पति को बता दिया तो गजब ही हो जायेगा. पूरे परिवार में दरार पड़ जायेगी.
देर रात १० बजे. शोभा और कुमार घर छोड़ कर जा चुके थे. कुमार ने ऑफ़िस का कुछ जरूरी काम बता वहां से विदा ली. सवेरे जब चाय बना कर उसने सब को आवाज लगाई तो शोभा सबसे आखिर में पूरी तरह से तैयार हो कर डाईनिंग टेबिल पर आई थी. तब तक अजय अपने कॉलेज के लिये निकल चुका था. पूरे दिन के लिये अपनी सहेली के घर जाने का बहाना बना कर निकल गयी और फ़िर पद्मा के सामने नहीं आई. पद्मा को मालूम था कि असली वजह शोभा और उसके बीच सवेरे चला लम्बा वार्तालाप था.पद्मा अपने कमरे में बैठी कुछ सोच रही थी. गोपाल सो रहे थे. आज का पूरा दिन मानसिक और शारीरिक उथल पुथल से भरा रहा था. पद्मा ने आज पूरे दिन अजय पर नज़र रखी थी. अजय दिन भर अपनी पैंट के उभार को ठीक करता रहा था. बिचारा अपनी प्यारी चाची को ढूंढ रहा था. बोलना चाहता था कि वो उनसे कितना प्यार करता है. लेकिन उसकी प्यारी चाची तो कब की उसे छोड़ कर जा चुकी थीं. जब बार बार अजय किसी ना किसी बहाने से शोभा के बारे में पूछता तो पद्मा का दिल जल उठता. अजय को सिर्फ़ उसके बारे में ही सोचने का हक था. काश, उसने अजय को नहलाना बन्द नहीं किया होता तो जो सब शोभा ने किया वही सब वो खुद भी करती थी. उसका बेटा आज अपनी चाची का नहीं बल्कि उसका दिवाना होता था. अपने ही भतीजे के बारे में उसके कामुक विचार विकराल रुप धारण कर चुके थे. तेज होती सासें, पैरों के बीच अजय के लन्ड को महसूस करने की चाह और जबरदस्त तने हुये निप्पल सब कुछ वास्तविक था. और एक वास्तविकता ये भी थी कि वो अजय की ताई थी. ममता और वासना की मिली जुली भावनाओं से पद्मा के दिमाग में हलचल सी मची हुई थी. लेकिन जल्द ही वासना ने प्रेम के साथ मिल कर सब कुछ अपने काबू में कर लिया. दिमाग अब सिर्फ़ अजय के शरीर के बारे में सोचने लगा. आखिर कैसा होगा अजय का हथियार? लम्बा या मोटा? शोभा क्यूं कह रही थी की अजय बिल्कुल अलग है?
या शायद अजय में वहीं जन्गली जानवर है जिसे सैक्स के समय हर औरत अपने सहचर में पाना चाहती है? इन सब विचारों से पद्मा का शरीर कांप रहा था. अब निर्णय की घड़ी पास ही थी. पद्मा अजय के कमरे मे दबे पांव घुसी. आज रात अपने बच्चे को पास से देखना चाहती थी. अजय के बिस्तर के किनारे पर लेटी हुई पद्मा, उसके नन्गे जिस्म को निहार रही थीं. अजय गहरी नींद में था. और पद्मा की आंखों में दूर दूर तक नींद का नामोनिशान नहीं था. निषिद्ध सैक्स और अजय के लिये मन में घर कर चुकी वासना ने उन्हें सोने ही नहीं दिया था.




थोड़ी देर के लिये पद्मा की आंख भी लग गयी. अचानक, बिस्तर के हिलने और कराहने की आवाजों से पद्मा जाग गयी. आंखें जब अन्धेरे की अभ्यस्त हुयीं तो देखा कि अजय चादर के अन्दर हाथ डाले किसी चीज को ज़ोर ज़ोर से हिला रहा था. अजय, कमरे में अपनी ताई कि मौजूदगी से अनभिज्ञ मुट्ठ मारने में व्यस्त था. शायद अजय कल की रात को सपनों में ही दुहरा रहा था. "आह, चाचीईईई" अजय की कराह सुनकर पद्मा को कोई शक नहीं रह गया कि अजय के दिमाग में कौन है. शोभा के लिये उनका मन घृणा से भर उठा. आखिर क्यूं किया उसने ऐसा? आज उनका लाड़ला ठीक उनके ही सामने कैसा तड़प रहा है. और वो भी उस शोभा का नाम ले कर. नहीं. अजय को और तड़पने की जरुरत नहीं है. जनम नहीं दिया तो क्या हुआ फ़िर भी यहां पर मैं उसकी ताई हूं उसकी हर ज़रुरत को पूरा करने के लिये. अजय के लिये उनके निर्लोभ प्रेम और इस कृत्य के बाद में होने वाले असर ने क्षण भर के लिये पद्मा को रोक लिया. अगर उनके पति अजय के ताऊ को कुछ भी पता चल गया तो? कहीं अजय ये सोचकर की उसकी ताई कितनी गिरी हुई औरत है उन्हें नकार दे तो? या फ़िर कहीं अजय जाकर सब कुछ शोभा को ही बता दे तो? तो, तो, तो? बाकी सब की उसे इतनी चिन्ता नहीं थी. और अपने खुले विचारों वाले पति को वो सब कुछ खुद ही बता कर समझा सकती थी कि अजय की जरुरतों को पूरा करना कितना आवश्यक था. नहीं तो जवान लड़का किसी भी बाजारु औरत के साथ आवारागर्दी करते हुये खुद को किसी भी बिमारी और परेशानी में डाल सकता था. पता नही कब, लेकिन पद्मा चलती हुई सीधे अजय की तरफ़ बिस्तर के पास जाकर खड़ी हो गईं. अजय ने भी एक साये को भांप लिया. तुरन्त ही समझ गया की ये शख्स कोई औरत ही है और पक्के तौर पर घर के अन्दर से ही कोई ना कोई है. क्या उसकी प्यारी शोभा चाची लौट कर आ गयीं हैं? क्या चाची भी उससे इतना ही प्यार करती है जितना वो उनसे? रात अपना खेल खेल चुकी थी. उसकी बिस्तर की साथी उसके पास थीं. अपने लन्ड पर उसकी पकड़ मजबूत हो गयी. बिचारा कितना परेशान था सवेरे से. दसियों बार मुत्ठ मार मार कर टट्टें खाली कर चुका था. लेकिन अब उसकी प्रेमिका उसके पास थी. और वो ही उसको सही तरीके से शान्त कर पायेंगी.
पद्मा कांपते कदमों से अजय कि तरफ़ बढ़ी. सही और गलत का द्वंद्ध अभी तक उसके दिमाग में चल रहा था. डर था कि कहीं अजय उससे नफ़रत ना करने लगे. तो वो क्या करेगी? कहीं वो खुद ही अपने आप से नफ़रत ना करने लगे. इन सारे शकों के बावजूद भतीजे को चोदने का ख्याल पद्मा अपने दिल से नहीं निकाल पाई. चादर के अन्दर हाथ डाल कर लन्ड के ऊपर जमे अजय के हाथों को अपने दोनो हाथों से ढक लिया. अब जैसे जैसे अजय लन्ड पर हाथ ऊपर नीचे करता पद्मा का हाथ भी खुद बा खुद उपर नीचे होता. "चाची" अजय फ़ुसफ़ुसाया. अपना हाथ लन्ड से अलग कर पद्मा के हाथों को पूरी आजादी दे दी उस शानदार खिलौने से खेलने की. अपने सपनों की मलिका को पास पाकर अजय का लन्ड कल से भी ज्यादा फ़ूल गया. पद्मा ने अजय के लन्ड पर उन्गलियां फ़िराईं तो नसों में बहता गरम खून साफ़ महसूस हुआ.
आंखे बन्द करके पूरे ध्यान से उस महान औजार को दोनो हाथों से मसलने लगी. पद्मा के दिल से आवाज आई कि ये अजय का लन्ड कभी उसका हिस्सा था. इतना कठोर, इतना तगड़ा, अपने ही पानी से पूरी तरह से तर ये जवानी की दौलत उसकी अपनी थी. इससे पहले अपनी जिन्दगी में उन्होनें कभी ऐसे किसी लन्ड को हाथ में नहीं लिया था. पता नहीं अजय के जन्म से पहले उसकी माँ ने क्या खाया था कि आज उसका लन्ड अपने ताऊ चाचा से भी कहीं आगे था.
अपने ही ख्यालों में डूबी हुई उस ताई को ये भी याद नहीं रहा कि कब उनकी मुट्ठी ने अजय के लन्ड को कसके दबाकर जोर जोर से दुहना चालू कर दिया. लन्ड की मखमली खाल खीचने से अजय दर्द से कराह उठा. हाथ बढ़ा कर अजय ने पद्मा की अनियंत्रित कलाई को थामा. पद्मा ने दूसरे हाथ से अजय का माथा सहलाया. खुद को घुटनों के बल बिस्तर के पास ही स्थापित करती हुई पद्मा ने लन्ड को मुठियाना चालू रखा. अजय के चेहरे से हटा अपने हाथ को पद्मा ने अब उसके सीने पर निप्पलों को आनन्द देने के काम में लगा दिया.
"हाँ आआआआहहहह". शरीर पर दौड़ती जादुई उन्गलियों का असर था ये. और ज्यादा आनन्द की चाह में अजय बेकरारी में अपनी कमर हिलाने लगा. अजय के हाथ पद्मा के कन्धों पर से होते हुए स्तनों को थामकर उन्हें अपने पास खीचने लगे. अन्धेरी रात में अजय उस मादा शरीर को अपने पूरे बदन पर महसूस करना चाहता था. लेकिन उसकी प्रेमिका ने तो पूरे कपड़े पहने हुये है. अजय की उत्तेजना अपने चरम पर थी. उधर पद्मा ने भी शरीर को थोड़ा और झुकाते हुए अजय के खड़े लन्ड तक पहुंचने की चेष्टा की. जो शोभा ने किया वो वह भी कर सकती है. तो क्या हुआ अगर लन्ड चूसने का उसका अनुभव जीरो है, भावनायें तो प्रबल हैं ना. एक बार के लिये उसे ये सब गलत लगा लेकिन फ़िर शोभा का ख्याल आते ही नया जोश भर गया. अगर उसने आज अजय का लन्ड नहीं चूसा तो वह कल फ़िर से इस आनन्द को पाने के लिये शोभा के पास जा सकता है. नहीं. नहीं. आज किसी भी कीमत पर वो अपने लाड़ले के दिलो दिमाग से शोभा की यादें मिटा देगी चाहे इसके लिये उन्हें कुछ भी क्युं ना करना पड़े. अजय अब अपनी सहचरी का चेहरा देखना चाहता था. वहीं चेहरा जो कल रात किसी देवी की मूर्ति की तरह चमक रहा था. हाथ बढ़ाकर बिस्तर के पास की लैम्प जलाई तो लम्बे बालों मे ढका चेहरा आज कुछ बदला हुआ लगा. ये उसकी चाची तो नहीं थीं. पद्मा ने अपना चेहरा अजय की तरफ़ घुमाया
“ताई ?”
लड़के के चेहरे पर दुनिया भर का आश्चर्य और डर फ़ैल गया. अजय जल्दी से अपनी चादर की तरफ़ झपटा. पद्मा समझ गईं अभी नहीं तो कभी नहीं वाली स्थिति आ खड़ी हुई है. अगर उन्होनें वासना और अनुभव का सहारा नहीं लिया तो इस मानसिक बाधा को पार नहीं कर पायेंगी और फ़िर अजय भी कभी उनका नहीं हो पायेगा. लन्ड पर तुरन्त ही झुकते हुये पद्मा ने पूरा मुहं खोला और अजय के तन्नाये पुरुषांग को निगल लिया. पद्मा के होंठ लन्ड के निचले हिस्से पर जमे हुये थे. मुहं के अन्दर तो लार का समुन्दर सा बह रहा था. आखिर पहली बार कोई लन्ड यहां तक पहुंचा था. लन्ड चुसाई करते हुए भी पद्मा के दिल में सिर्फ़ एक ही जज्बा था कि वो अजय को सैक्स के चरम पर अपने साथ ले जायेगी जहां ये लड़का सब कुछ भूल कर बस उन्हीं को चोदेगा.दो मिनट पहले के मानसिक आघात के बाद जो लन्ड थोड़ा नरम पड़ गया था वो फ़िर से अपने शबाब पर लौट आया. पद्मा के लम्बे बाल अजय की जांघों और पेट पर बिखर कर अलग ही रेशमी अहसास पैदा कर रहे थे. पिछली रात से बहुत ज्यादा अलग ना सही लेकीन काफ़ी मजेदार था ये सब. अजय ने भी अब सब कुछ सोचना छोड़ कर पद्मा के सिर को हाथों से थाम लिया और फ़िर कमर हिला हिला कर उनके मुहं को चोदने लगा. अजय का नियंत्रण खत्म हो गया. वो अभी झड़ना नहीं चाहता था परन्तु पद्मा का मखमली मुहं, वो जोश, वो गर्मी और मुहं से आती गोंगों की आवाजों से आपा खो कर उसका वीर्य बह निकला.
"ताई ताई" अजय सीत्कारा "रुको, रुको.. रुक जाओ" अजय चिल्लाया. पद्मा सब समझ गई. अजय छूटने वाला था. लन्ड की नसों मे बहते वीर्य का आभास पाकर पद्मा ने अपना मुहं हटाय़ा और गुलाबी सुपाड़े में से वीर्य की धार छूट पड़ी. पद्मा ने दोनो आंखें बन्द कर लीं. पद्मा का हाथ अजय के वीर्य से सना हुआ था. "बर्बाद" एक ही शब्द पद्मा के दिमाग में घूम रहा था. अभी तक झटके लेते लन्ड को पद्मा ने निचोड़ निचोड़ कर खाली कर दिया. लड़के के मुहं से कराह निकली
" ताई ताई, ये आपने क्या कर दिया?"
"वहीं, जो मुझे बहुत पहले कर देना चाहिये था" पद्मा ने जवाब दिया "तुमको मेरी जरूरत है. ना कि किसी चाची या किसी भी ऐरी गैरी लड़की या औरत की, तू सिर्फ़ मेरा है" उनके वाक्यों में गर्व मिश्रित अधिकार था.
अजय ने बिस्तर पर एक तरफ़ हटते हुये अपनी ताई के लिये जगह बना ली. पद्मा भी अजय के पास ही बिस्तर पर लेट गयी. खुद को इस तरह से व्यवस्थित किया की अजय का चेहरा ठीक उनके स्तनों के सामने हो और लन्ड उनके हाथ में. नाईट गाऊन के सारे बटन खोल कर पद्मा ने उसे अपने बदन से आज़ादी दे दी. अजय की आंखों के सामने ताई की नन्गी भरी पूरी जवानी बिखरी पड़ी थी. जबसे सैक्स शब्द का मतलब समझने लगा था उसकी ताई ने कभी भी उसे अपने इस रूप का दर्शन नहीं दिया था. हां चाची के साथ जरूर किस्मत ने कई बार साथ दिया था. अजय का सिर पकड़ पद्मा ने उसे अपने बड़े बड़े गोरे गुलाबी उरोजों में छिपा लिया. अजय थोड़ा सा कुनमुनाया.
"श्श्श्श". "मेरे बच्चे, तेरे लिये तेरी ताई ही सब कुछ है. कोई चाची या कोई भी दूसरी औरत मेरी जगह नही ले सकती. समझे?"
अजय के होठों ने अपने आप ही ताई ताई के निप्पलों को ढूंढ लिया. ताई के दोनों निप्पल बुरी तरह से तने हुये थे. शायद बहुत उत्तेजित थी. अपने भतीजे के लिये उसकी ताई ने इज्जत की परवाह भी ना की. अजय का मन पद्मा के लिये प्यार और सम्मान से भर गया. ताई भतीजे एक दूसरे से बेल की तरह लपटे पड़े थे. अजय का एक पांव पद्मा की कमर को जकड़े था तो हाथ और होंठ ताई के सख्त हुये मुम्मों पर मालिश कर रहे थे. लन्ड में भी धीरे धीरे जान लौटने लगी. पर दिन भर का थका अजय जल्दी ही अपनी ताई के आगोश में सो गया.
पद्मा थोड़ी सी हताश तो थी किन्तु अजय की जरुरतों को खुद से पहले पूरा करना उनकी आदत में था. खुद की टांगों के बीच में आग ही लगी थी पर अजय को जन्मजात अवस्था में खुद से लिपटा कर सोना उसे सुख दे रहा था. थोङी देर में पद्मा भी नींद के आगोश में समा गयी. जो कुछ भी उन दोनों के बीच हुआ वो तो एक बड़े खेल की शुरुआत भर था. एक ऐसा खेल जो इस घर में अब हर रात खेला जाने वाला था.
आधी रात के बाद अजय की नींद खुली। पिछले चौबीस घन्टों में अपने ही घर की दो सीधी सादी दिखने वाली भद्र महिलाओं के साथ हुये उसके अनुभव को याद करके अजय का लन्ड फ़िर तेजी से सिर उठाने लगा. बिस्तर पर उसकी ताई जन्मजात नन्गी अवस्था में उसकी बाहों में पड़ी हुयीं थीं. अजय की तरफ़ ताई की पीठ थी। ताई के कड़े निप्पलों को याद करके अजय का हाथ अपने आप ही पद्मा के बड़े बड़े स्तनों पर पहुंच गया. हथेली में एक स्तन को भर कर अजय हौले हौले से दबाने लगा. शायद ताई जाग जाये और क्या पता खुद को चोदने भी दे. आज की रात वो किसी औरत के जिस्म को बिना चोदे रह नहीं पायेगा. अजय ने धीरे से ताई की तरफ़ करवट बदलते हुये अपना लन्ड उनके भारी नितंबों की दरार में घुसेड़ दिया. अपनी चूतड़ पर दबाब पाकर पद्मा की आंखें खुल गईं.
"अजय, ये क्या कर रहे हो?", पद्मा बुदबुदाईं.

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दुलारा भतीजा
भाग -5



बिचारा अजय क्या बोलता की ताई मैं तुम्हे चोदना चाहता हूं. क्या कोई भी ये बात कभी भी अपनी ताई से कह पायेगा?
नहीं ना?
अजय ने जवाब में अपने गरम तपते होंठों से पद्मा के कानों को चूमा. बस. इतना करना ही काफ़ी था उस उत्तेजना से पागल हुई औरत के लिये. पद्मा ने खुद पेट के बल लेटते हुये अजय के हाथों को खींच कर अपनी झांटो के पास रखा और एक पैर सिकोड़ कर घुटना मोड़ते हुये उसे अपनी बुरी तरह गीली हुई चूत के दर्शन कराये. अजय ने ताई की झांटो भरी चूत पर उन्गलियां फ़िराई. परन्तु अनुभवहीनता के कारण ना तो वो उन बालों को अपने रास्ते से हटा पा रहा था ना ही चूत में अन्दर तक उन्गली करने का साहस कर पा रहा था. समस्या को तुरन्त ही ताड़ते हुये पद्मा ने अजय की उन्गलियो को अपने हाथों से चूत के होठों से छुलाया. फ़िर धीरे से अजय की उन्गली को गीली चूत के रास्ते पर आगे सरका दिया. जहां पद्मा को स्वर्ग दिख रहा था वहीं अजय ये सोच कर परेशान था की कहीं उसकी कठोर उन्गलियां उसकी प्यारी ताई की कोमल चूत को चोट ना पहुंचा दे. अजय शायद ये सब सीखने में सबसे तेज था. थोडी देर ध्यान से देखने के बाद बुद्धीमत्ता दिखाते हुये उसने अपनी उन्गली को चूत से बाहर खींच लिया. अब अपनी मध्यमा (बीच की सबसे बड़ी उन्गली) को चूतड़ के छेद के पास से कम बालों वाली जगह से ठीक ऊपर की तरफ़ ठेला. चूत के इस हिस्से में तो जैसे चिकने पानी का तालाब सा बना हुआ था. इस तरह धीरे धीरे ही सही अजय अपनी ताई की खुजली दूर करने लगा.
पद्मा सिसकी और अपनी टांगों को और ज्यादा खोल दिया. साथ ही खुल गई चूत की दीवारें भी. अब एक उन्गली से काम नही चलने वाला था. अजय ने कुहनियों के बल ताई के ऊपर झुकते हुये एक और उन्गली को अपनी साथी के साथ चूत को घिसने की जिम्मेदारी सौंप दी.
"आह, मेरे बच्चे", अत्यधिक उत्तेजना से पद्मा चींख पड़ी. बाल पकड़ कर अजय का चेहरा अपनी तरफ़ खींचा और अपने रसीलें गरम होंठ उसके होठों पर रख दिये.
आग में जैसे घी ही डाल दिया पद्मा ने. अजय ने आगे की ओर बढ़ते हुये ताई की जांघों को अपने पैरों के नीचे दबाया और फ़ुंकार मारते लन्ड से चूत पर निशाना लगाने लगा. अजय के शारीरिक बल और प्राकृतिक सैक्स कुन्ठा को देख कर पद्मा को शोभा की बात सच लगने लगी. नादान अजय के लन्ड को जांघों के बीच से हाथ डाल कर दबोचा और खाल को पीछे कर सुपाड़े को अपनी टपकती पावरोटी सी फ़ूली चूत के मुहांने पर रख दिया. कमर हिला हिला कर खुद ही उस कड़कड़ाते लन्ड को चूत रस से सारोबार करने के बाद फ़ुसफ़ुसाई "अब डाल न अन्दर इसे ।".
एक बार भी दिमाग में नहीं आया की ये कर्म अजय के साथ उनके एक नये रिश्ते को जन्म दे देगा. अब वो सिर्फ़ अजय की ताई नहीं बल्कि प्रेमिका, पत्नी सब कुछ बन जायेंगी. अजय ने ताई के मुम्मों को हथेलियों में जकड़ा और एक ही झटके में अपने औजार को ताई की पनियाती चूत में अन्दर तक उतार दिया.
"ओह ताई ताईआआ", "तुम्हारी बहुत गरम है अन्दर से" दोनों आंखे बन्द किये हुए चूत में लन्ड से खुदाई करने लगा. स्तनों को छोड़ अजय ने ताई की भरी हुई कमर को पकड़ा और अपनी तरफ़ खींचा कि शायद और अन्दर घुसने को मिल जाये. पद्मा का अपना कोई बच्चा नहीं था जो कुछ था वो अजय था उसके ताऊ के सामान्य लन्ड से इतने सालों तक चुदने बाद पद्मा की चूत अब भी काफ़ी टाईट बनी हुई थी. अजय का लन्ड आधा ही समा पाया था उस गरम चूत में.
"आह बेटा, चोद मुझे जोर जोर से, फ़क मी", पद्मा गिड़गिड़ाई. अपनी ताई के मुहं से ऐसे वचनों को सुनकर अजय पागल हो गया.
"हां, हां, हां. बेटा, रुक मत ।",
पद्मा आनन्द कराह रही थी. आज तक उनके पति ने कभी भी उनकी चूत को इस तरह से नहीं भरा था. सबकुछ काफ़ी तेजी के साथ हो रहा था और पद्मा अभी देर तक इन उत्तेजना भरे पलों का मजा उठाना चाहती थी. खुद को कुहनियों पर सम्भालते हुये पद्मा ने भी अजय के लन्ड की ताल के साथ अपने कुल्हों को हिलाना शुरु कर दिया. एक दूसरे को पूरा आनन्द देने की कोशिश में दोनो के मुहं से घुटी घुटी सी चीखें निकल रही थीं. "हां, लो और लो ताई, " लन्ड को पद्मा की चुत पर मारते हुये अजय बड़बड़ा रहा था.
अचानक पद्मा ने अपनी गति बढ़ा दी. अजय का लन्ड खुद को सम्भाल नहीं पाया और चूत से बाहर निकल कर ताई की गोल चूतड़ पर थपकियां देने लगा. "हाय, नो नो, अजय बेटा इधर आ,
प्लीईईईज" "ले भर ना इसे" पद्मा कुतिया की तरह एक टांग हवा में उठा कर कमर को अजय के लन्ड पर पटकती हुई मिन्नतें करने लगी.
लेकिन अजय का मन अब इस आसन से भर गया था. अब वो चोदते वक्त अपनी शयनयामिनी का चेहरा और उस पर आते जाते उत्तेजना के भावों को देखना चाहता था. ताई को अपने हाथों से करवट दे पीठ से बल पलटा और दोनों मोटी मोटी मांसल जाघों को अलग करते हुये उठा कर अपने कन्धों पर रख लिया. हजारों ब्लु फ़िल्मों को देखने का अनुभव अब जाकर काम आ रहा था. परन्तु एक बार फ़िर से ताई के अनुभवी हाथों की ज़रुरत आन पड़ी थी. पद्मा ने बिना कहे सुने ही तुरन्त लन्ड को पकड़ कर चूत का पावन रास्ता दिखाया और फ़िर अजय की कमर पर हाथ जमा एक ही धक्के में लन्ड को अपने अन्दर समा लिया.
अजय ने ताई के सुन्दर मुखड़े की तरफ़ देखा. गोरा चिकना चेहरा, ताल के साथ दबाने मसलने से लाल हो रहे थिरकते बड़े बड़े गोरे उरोज और उनके बीच में से उछलता हार नाईट लैम्प की मद्दम रोशनी में दमक रहे थे. उत्तेजना से फ़ुदकती चूत में अजय का लन्ड अन्दर बाहर हो रहा था और ताई किसी रन्डी कि तरह चीखने को विवश थी. "हांआआआआ, हां बेटाआआआ" "उंफ़, आह, आह, हाय राम मर गई".
मन ही मन सोचने लगी की शायद अजय के साथ में भी जानवर हो गयी हूं. अपने ही हाथों से अपने भतीजे की पीठ, कुल्हों और टांगो पर ना जाने कितनी बार नाखून गड़ा दिये मैनें.
अजय ने आगे झुक कर ताई के एक निपल को मुहं में दबा लिया. एक साथ चुदने और चुसे जाने से पद्मा खुद पर नियंत्रण खो बैठी. बड़े बड़े गोरे गुलाबी स्तनों के ऊपर अजय ने दांत गड़ा कर चाहे अपना हिसाब किताब पूरा कर लिया हो पर इससे तो पद्मा की चूत में कंपकंपी छूट गयी. पद्मा को अपनी चूत में हल्का सा बहाव महसूस हुआ. अगले ही क्षण वो एक ज्वालामुखी की तरह फ़ट पड़ी. ऐसा पानी छूटा की बस "ओह अजय, मेरे लाल, मैं ताई गई बेटा, आआआआहा".
पद्मा के गले से निकली चीख घर में जागता हुआ कोई भी आदमी आराम से सुन सकता था. पूरी ताकत के साथ अपने सुन्दर नाखून अजय के नितम्बों में गड़ा दिये.
पद्मा ने अजय को कस कर अपने सीने से लगा लिया. लेकिन अजय तो झड़ने से कोसों दूर था.
पद्मा ताई खुद थोड़ा सम्भली तो अजय से बोली "श्श्श्श्श बेटा, मैं बताती हूं कैसे करना है". पद्मा को अपनी बहती चूत के अन्दर अजय का झटके लेता लन्ड साफ़ महसूस हो रहा था. अभी तो काफ़ी कुछ सिखाना था इस नौजवान को. जब अजय थोड़ा सा शांत हुआ तो पद्मा ने उसे अपने ऊपर से धक्का दिया और पीठ के बल उसे पलट कर बैठ गईं. अजय समझ गया कल रात में चाची को अपने भतीजे के ऊपर सवारी करते देख ताई भी आज वहीं सब करेंगी. लेकिन अजय को इस सब से क्या मतलब उसे तो बस अपनी गरम गरम रॉड को किसी चिकनी चूत में जल्द से जल्द पैवस्त करना था. पद्मा ने अजय को एक बार भरपूर प्यार भरी निगाहों से देखा और फ़िर उसके ऊपर आ गईं. एक हाथ में अजय का चूत के झाग से सना लन्ड लिया तो सोचा की इसे पहले थोड़ा पोंछ लूं. अजय की छाती पर झुकते हुये उसकी छाती, पेट और नाभी पर जीभ फ़िराने लगी. खुद पर मुस्कुरा रहीं थीं कि सवेरे मल मल कर नहाना पड़ेगा. दिमाग ने एक बात और भी कही कि ये सब अजय के ताऊ से सवेरे आंखे मिलाने से पहले होना चाहिये. पद्मा ने बिस्तर पर बिखरे हुये नाईट गाऊन को उठा कर अजय के लन्ड को रगड़ रगड़ कर साफ़ किया. अपने खड़े हथियार पर चिकनी चूत की जगह खुरदुरे कपड़े की रगड़ से अजय थोड़ा सा आहत हुआ. हालांकि
लन्ड को पोंछना व्यर्थ ही था जब उसे ताई की रिसती चूत में ही जाना था. सवेरे से बनाया प्लान अब तक सही तरीके से काम कर रहा था. अजय को अपना सैक्स गुलाम बनाने की प्रक्रिया का अन्तिम चरण आ गया था. पद्मा ने अजय के लन्ड को मुत्ठी में जकड़ा और घुटनों के बल अजय के उपर झुकते हुये बहुत धीरे से लन्ड को अपने अन्दर समा लिया. पूरी प्रक्रिया अजय के लिये किसी परीक्षा से कम नहीं थी.
"हां ताई, प्लीज, जोर जोर से...ओह"
चिल्लाता हुआ अजय ताई की चूत भरे जा रहा था. जब अजय का लन्ड उसकी चूत की गहराईओं में खो गया तो पद्मा सीधी हुई. अजय के चेहरे को हाथों में लेते हुये उसे आदेश दिया "अजय, देख मेरी तरफ़". धीरे धीरे एक ताल से कमर हिलाते हुये वो अजय के लन्ड की भरपूर सेवा कर रही थीं. उस तगड़े हथियार का एक वार भी अपनी चूत से खाली नहीं जाने दिया. वो नहीं चाहती थी की अजय को कुछ भी गलत महसूस हो या जल्दबाजी में लड़का फ़िर से सब कुछ भूल जाये. "मै कौन हूं तेरी?" चुत को अजय के सुपाड़े पर फ़ुदकाते हुए पूछा. " ताई " अजय हकलाते हुये बोला. इस रात में इस वक्त जब ये औरत उसके साथ हमबिस्तर हो रही है तो उसे याद नहीं रहा की ताई किसे कहते है.
" ताई इतने सालों से तेरी हर जरूरत को पूरा करती आई है. है कि नहीं?" पद्मा ने पासा फ़ैंका. आगे झुकते हुये एक ही झटके में अजय का पूरा लन्ड अपनी चूत में निगल लिया.
"आआआआआह, हां ताई ताई, सब कुछ !" अजय हांफ़ रहा था. उसके हाथों ने ताई की चिकनी गोल चूतड़ को पकड़ कर नीचे की ओर खींचा.
"आज से तुम अपनी शारीरिक जरूरतों के लिये किसी भी दूसरी औरत की तरफ़ नहीं देखोगे. समझे?" अपने नितंबों को थोड़ा ऊपर कर दुबारा से उस अकड़े लन्ड पर धम्म से बैठ गईं.
"उउउह्ह्ह्ह, नो, नो, आज के बाद मुझे किसी और की जरुरत नहीं है." कमर ऊपर उछालते हुये ताई की चूत में जबर्दस्त धक्के लगाने लगा.
अजय के ऊपर झुकते हुये पद्मा ने सही आसन जमाया. "अजय, अब तुम जो चाहो वो करो. ठीक है" पद्मा की मुस्कुराहट में वासना और ममता का सम्मिश्रण था. अजय ने सिर उठा कर ताई के निप्पलों को होठों के बीच दबा लिया. पद्मा के स्तनों से बहता हुआ करन्ट सीधा उनकी चूत में पहुंचा. हांलाकि दोनों ही ने अपनी सही गति को बनाये रखा. जवान जोड़ों के विपरीत उनके पास घर की चारदीवारी और पूरी रात थी.
पद्मा ने खुद को एक हाथ पर सन्तुलित करते हुये दूसरे हाथ से अपनी चूचीं पकड़ कर अजय के मुहं में घुसेड़ दी. अजय ने भी भूखे जानवर की तरह बेरहमी से उन दो सुन्दर गुलाबी स्तनों का मान मर्दन शुरु कर दिया. ताई के हाथ की जगह अपना हाथ इस्तेमाल करते हुये अजय ने दोनों निप्पलों को जोर से उमेठा.
अब पद्मा ने आसन बदलते हुये एक नया प्रयोग करने का मन बनाया. अजय की टांगों को चौड़ा करके पद्मा उनके बीच में बैठ गयीं. एक बार के लिये अजय का लन्ड चूत से बाहर निकल गया परन्तु अब वो अपने पैरों को अजय की कमर के आस पास लपेट सकती थी. जब अजय भी उठ कर बैठा तो उसका लन्ड खड़ी अवस्था में ही ताई के पेट से जा भिड़ा. पद्मा ने नज़र नीची करके उस काले नाग की तरह फ़ुंफ़कारते लन्ड को अपनी नाभी के पास पाया. २ सेकेन्ड पहले भी ये लन्ड यहीं था लेकीन उस वक्त यह उनके अन्दर समाया हुआ था. अजय की गोद में बैठ कर पद्मा ने एक बार फ़िर से लन्ड को अपनी चूत में भरा. चूत के होंठ बार बार सुपाड़े के ऊपर फ़िसल रहे थे. अजय ने घुटनों को मोड़ कर उपर ऊठाने का प्रयत्न किया किन्तु ताई के भारी शरीर के नीचे बेबस था.
"ऊईईई माआआं" पद्मा सीत्कारी. अजय की इस कोशिश ने उनको उठाया तो धीरे से था पर गिरते वक्त कोई जोर नहीं चल पाया और खड़े लन्ड ने एक बार फ़िर ताई की चूत में नई गहराई को छू लिया था. पद्मा ने उसके कन्धे पर दांत गड़ा दिये उधर अजय भी इस प्रक्रिया को दुहराने लगा. पद्मा ने अजय का कन्धा पकड़ उसे दबाने की कोशिश की. इतना ज्यादा आनन्द उसके लिये अब असहनीय हो रहा था. ताई भतीजे की ये सैक्सी कुश्ती सिसकियों और कराहों के साथ कुछ क्षण और चली.
पसीने से तर दोनों थक कर चूर हो चूके थे पर अभी तक इस राऊंड में चरम तक कोई भी नहीं पहुंचा था. थोड़ी देर रुक कर पद्मा अपने लाड़ले भतीजे के सीने और चेहरे को चूमने चाटने लगी. अजय को अपने सीने से लगाते हुये पूछा, "शोभा कौन है तुम्हारी?".
"कौन?" इस समय ऐसे सवाल का क्या जवाब दिया जा सकता था? अजय ने एक जोरदार धक्का मारते हुये कहा.
"कोई नहीं, राईट?" पद्मा ने भी अजय के धक्के के जवाब में कमर को झटका दे उसके लन्ड को अपनी टाईट चूत में खींच लिया. ताई के जोश को देख कर बेटा समझ गया कि शोभा जो कोई भी हो अब उसे भूलना पड़ेगा.
"उसका काम था तुम को मर्द बना कर मेरे पास लाना. बस. अब वो हमेशा के लिये गई. समझ गये?" पद्मा के गुलाबी होंठों पर जीत की मुस्कान बिखर गई.
इतनी देर से चल रहे इस चुदाई कार्यक्रम से अजय के लन्ड का तो बुरा हाल था ही पद्मा कि चूत भी अन्दर से बुरी तरह छिल गय़ी थी. शोभा सही थी. उसके भतीजे ने जानवरों जैसी ताकत पाई है. और ये अब सिर्फ़ और सिर्फ़ उसकी है. अजय को वो किसी भी कीमत पर किसी के साथ भी नहीं बाटेगी.
"अजय बेटा. बस बहुत हो गया. अब झड़ जा. ताई कल भी तेरे पास आयेगी" पद्मा हांफ़ने लगी थी. अजय का भी हाल बुरा था. उसके दिमाग ने काम करना बन्द कर दिया था. समझ में नहीं आ रहा था कि क्या जवाब दे. बस पद्मा के फ़ुदकते हुये मुम्मों को हाथ के पंजों में दबा कमर उछाल रहा था.
"ऊहहहहहहहहहह! हां! ऊइइइ ताई ताईआआ!" चेहरे पर असीम आनन्द की लहर लिये पद्मा बिना किसी दया के अजय के मुस्टंडे लन्ड पर जोर जोर से चूत मसलने लगी. "आ आजा बेटा, भर दे अपनी ताई को", अजय को पुचकारते हुये बोली.
इन शब्दों ने जादू कर दिया. अजय रुक गया. दोनों जानते थे कि अभी ये कार्यक्रम काफ़ी देर तक चल सकता है लेकिन उन दोनों के इस अद्भुत मिलन की साथी उन आवाजों को सुनकर गोपाल किसी भी वक्त जाग सकते थे और यहां कमरे में आकर अपने ही घर में चलती इस पाप लीला को देख सकते थे. काफ़ी कुछ खत्म हो सकता था उसके बाद और दोनों ही ऐसी कोई स्थिति नहीं चाहते थे. अजय ने धक्के देना बन्द कर आंखे मूंद ली. लन्ड ने गरम खौलते हुये वीर्य की बौछारे ताई की चूत की गहराईयों में उड़ेल दी. "ओह" पद्मा चीख पड़ी.
जैसे ही वीर्य की पहली बौछार का अनुभव उन्हें हुआ अपनी चूत से अजय के फ़ौव्वारे से लन्ड को कस के भींच लिया. अगले पांच मिनट तक लन्ड से वीर्य की कई छोटी बड़ी फ़ुहारें निकलती रहीं. थोड़ी देर बाद जब ज्वार उतरा तो पद्मा उसके शरीर पर ही लेट गय़ीं. भारी भरकम स्तन अजय की छातियों से दबे हुये थे. अजय ने पद्मा के माथे को चूमा और गर्दन को सहलाया.
" ताई ताई, मैं हमेशा सिर्फ़ तुम्हारा रहूंगा. तुम जब चाहो जैसे चाहो मेरे संग सैक्स कर सकती हो, आज के बाद मैं किसी और की तरफ़ आंख उठा कर भी नहीं देखूंगा", अजय ने अपनी ताई ताई, काम क्रीड़ा की पार्टनर पद्मा को वचन दिया. पद्मा ने धीरे से सिर हिलाया. अजय आज के बाद उनकी आंखों से दुनिया देखेगा. एक बार फ़िर अजय को सब कुछ सिखाने की जिम्मेदारी उनके ऊपर थी. और अब उन्हें भी सैक्स में वो सब करने का मौका मिलेगा जो उनके पति के दकियानूसी विचारों के कारण आज तक वह करने से वंचित रहीं. अजय को फ़िर से पा लेने की सन्तुष्टी ने उनके मन से अपने कृत्य की ग्लानि को भी मिटा दिया था. पद्मा ने अजय के मोबाईल में सवेरे जल्दी उठने का अलार्म सेट किया ताकि अपने पति से पहले उठ कर खुद नहा धो कर साफ़ हो सकें. मोबाईल साथ ले अजय के होठों पर गुड नाईट किस दिया और अपने कमरे में चली गयी.

क्रमश:………………
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04-25-2019, 11:57 AM,
#49
RE: Muslim Sex Stories सलीम जावेद की रंगीन दुन�...
दुलारा भतीजा
भाग - 6



उस रात के बाद पद्मा के जीवन में एक नया परिवर्तन आ गया. अपने अजय के साथ संभोग करते समय हर तरह का प्रयोग करने की छूट थी जो उनका उम्रदराज पति कभी नहीं करने देता था. हालांकि दैनिक जीवन में दोनों काफ़ी सतर्क ताई भतीजे की तरह रहते थे. दोनों के बीच बातचीत में उनके सैक्स का जिक्र कभी नहीं आता था. पद्मा ने अजय के व्यवहार में भी बदलाव महसूस किया. अजय पहले की तुलना में काफ़ी शान्त और समझदार हो गया था. सबकुछ अजय के बेडरूम में ही होता था और वो भी रात में कुछ घन्टों के लिये.
पद्मा ही अजय के बेडरूम में जाती थी जब उन्हें महसूस होता था की अजय की जरुरत अपने चरम पर है. बाकी समय दोनों के बीच सब कुछ सामान्य था या यूं कहें की दोनों और ज्यादा करीब आ गये थे. हाँ, अजय के कमरे में दोनों के बीच दुनिया की कोई तीसरी चीज नहीं आ सकती थी. अजय और पद्मा यहां वो सब कर सकते थे जो वो दोनों अश्लील फ़िल्मों में देखते और सुनते थे. एक दूसरे को सन्तुष्ट करने की भावना ही दोनों को इतना करीब लाई थी.

इस सब के बीच में फ़िर से शोभा चाची का आना हुआ. काफ़ी दिनों से कुमार अपने बड़े भाई के घर जाना चाहता था और शोभा इस बार उसके साथ जाना चाहती थी. पिछली बार शोभा ने कुमार को वहां से जल्दी लौटने के लिये जोर डाला था और कुमार बिचारा बिना कुछ जाने परेशान सा था कि अचानक से शोभा का मूड क्यूं बिगड़ गया. खैर अब सब कुछ फ़िर से सामान्य होता नज़र आ रहा था. उधर शोभा अपने घर लौटने के बाद भी अजय को अपने दिमाग से नहीं निकाल पाई थी. अजय के साथ हुये उस रात के अनुभव को उसने कुमार के साथ दोहराने का काफ़ी प्रयत्न किया परन्तु कुमार में अजय की तरह किशोरावस्था की वासना और जानवरों जैसी ताकत का नितान्त अभाव था. कुमार काफ़ी पुराने विचारों वाला था. शोभा को याद नहीं कि कभी कुमार ने उसे ढंग से सहलाया और चाटा हो. लेकिन अजय ने तो उस एक रात में ही उसके पेटीकोट में घुस कर सूंघा था. क्या पता अगर वो अजय को उस समय थोड़ा प्रोत्साहन देती तो लड़का और आगे बढ़ सकता था. चलो फ़िर किसी समय सही....शोभा पद्मा के घर में फ़िर से उसी रसोईघर में मिली जहां उसने अजय के साथ अपनी रासलीला को स्वीकारा था. अजय एक मिनट के लिये अपनी चाची से मिला परन्तु जल्द ही शरमा कर चुपचाप खिसक लिया था. अभी तक वो अपनी प्रथम चुदाई का अनुभव नहीं भूला था जब उसकी चाची ने गरिमापूर्ण तरीके से उसे सैक्स जीवन का महत्वपूर्ण पाठ पढ़ाया था. "सो, कैसा चल रहा है सब कुछ",
शोभा ने पूछा."क्या कैसा चल रहा है?" पद्मा ने शंकित स्वर में पूछा.
अपनी और अजय की अतरंगता को वो शोभा के साथ नहीं बांट सकती थी."वहीं सबकुछ, आपके और भाई साहब के बीच में.." शोभा ने पद्मा को कुहनी मारते हुये कहा. दोनों के बीच सालों से चलता आ रहा था इस तरह का मजाक और छेड़खानी."आह, वो", पद्मा ने दिमाग को झटका सा दिया. अब उसे बिस्तर में अपने पति की जरुरत नहीं थी. अपनी शारीरिक जरुरतों को पूरा करने के लिये रात में किसी भी समय वो अजय के पास जा सकती थी. अजय जो अब सिर्फ़ उनका भतीजा ही नहीं उनका प्रेमी भी था."दीदी, क्या हुआ?" शोभा के स्वर ने पद्मा के विचारों को तोड़ा."नहीं, कुछ नहीं. आओ, हॉल में बैठ कर बातें करते हैं".
साड़ी के पल्लू से अपने हाथ पोंछती हुई पद्मा बाहर हॉल की तरफ़ बढ़ गई. हॉल में इस समय कोई नहीं था. दोनों मर्द खाने के बाद अपने अपने कमरों मे सोने चले गये थे और अजय का कहीं अता पता नहीं था. दिन भर में अजय ने सिर्फ़ एक बार ही अपनी चाची से बात की थी और पहले की तुलना में काफ़ी सावधानी बरत रहा था. उसके हाथ शोभा को छूने से बच रहे थे और ये बात शोभा को बिल्कुल पसन्द नहीं आई थी. पद्मा सोफ़े पर पसर गई और शोभा उसके बगल में आकर जमीन पर ही बैठ गयी."आपने जवाब नहीं दिया दीदी."
"क्या जवाब?" पद्मा झुंझला गयी. ये औरत चुप नहीं रह सकती. "मुझे अब उनकी जरुरत नहीं है" फ़िर थोड़ा संयन्त स्वर में बोली. "क्यूं?" शोभा ने पद्मा के चेहरे को देखते हुए पूछा. "क्या कहीं और से...?" शोभा के होठों पर शरारत भरी मुस्कान फ़ैल गई. पद्मा शरमा गई. "क्या कह रही हो शोभा? तुम्हें तो पता है कि मैं गोपाल को कितना प्यार करती हूं. तुम्हें लगता है कि मैं ऐसा कर सकती हूं?" "हां तुमने जरूर ये कोशिश की थी" पद्मा ने बात का रुख पलटते हुये कहा. अजय और शोभा के संसर्ग को अभी तक दिमाग से नहीं निकाल पाई थी. चूंकि अब वो भी अजय के युवा शरीर के आकर्षण से भली भांति परिचित थी अतः वो इसका दोष अकेले शोभा को भी नहीं दे सकती थी. लेकिन अजय को अब वो सिर्फ़ अपने लिये चाहती थी. शोभा पद्मा के कटाक्ष से आहत थी. खुद को नैतिक स्तर पर पद्मा से काफ़ी छोटा महसूस कर रही थी."आप जैसा समझ रही हैं वैसा कुछ भी नहीं था मेरे मन में. हां उसके कमरे में गलती से में घुसी जरूर थी फ़िर अपने ही भतीजे को तड़पते देख उसकी जरुरत को पूरा करने की भावना में बह मैनें ये सब किया था।"
वो पद्मा के सामने सिर झुकाये बैठी रही. पद्मा ने अपना हाथ शोभा के कन्धे पर रखते हुये कहा "हमने कभी इस बारे में खुल कर बात नहीं की ना?"
"मुझे लगा आप मुझसे नाराज है. इसी डर से तो में उस दिन चली गई थी" शोभा बोली.
"लेकिन मैं तुमसे नाराज नहीं थीं."
शोभा के कन्धे पर दबाव बढ़ाते हुये पद्मा ने कहा.
"फ़िर आप कुछ बोली क्यूं नहीं""मैं उस वक्त कुछ सोच रही थी और जब मुड़ कर देखा तो तुम जा चुकी थीं. अब मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं है. इस उम्र के बच्चों को ही अच्छे बुरे की पहचान नहीं होती और फ़िर तुम उसके कमरे में गलती से ही घुसी थीं. अजय को देख कर कोई भी औरत आकर्षित हो सकती है"."हां दीदी, मैं भी आज तक उस रात को नहीं भूली. उसकी वो ताकत और वो जुनून मुझे आज भी रह रह कर याद आता है. कुमार और मैं सैक्स सिर्फ़ एक दुसरे की जरूरत पूरा करने के लिये ही करते हैं." "अजय ने मेरी बरसों से दबी हुई इच्छाओं को भड़का दिया है और ये अब मुझे हमेशा तड़पाती रहेंगी. लेकिन जो हुआ वो हुआ. उस वक्त हालात ही कुछ ऐसे थे. अब ये सब मैं दुबारा नहीं होने दूंगी. शोभा के स्वर में उदासी समाई हुई थी. मालूम था की झूठ बोल रही है. उस रात के बारे में सोचने भर से उसकी चूत में पानी भर गया था. पद्मा ने शोभा की ठोड़ी पकड़ कर उसका चेहरा ऊपर उठाया, बोली "उदास मत हो छोटी, अजय है ही ऐसा. मैनें भी उसे महसूस किया है. सच में एक एक इन्च प्यार करने के लायक है वो".
शोभा पद्मा के शब्दों से दंग रह गयी,"क्या कह रही हो दीदी ?" पद्मा को अपनी गलती का अहसास हो गया. कुछ भावनाओं में बह कर पाप का राज संगी पापी के संग बांटने के लिए उसने शोभा को उसके और अजय के बीच बने नये संबंधों का इशारा ही दे दिया था. शोभा ने पद्मा को हाथ पकड़ कर अपने पास खींचा और बाहों में भर लिया. "क्या हुआ था दीदी" शोभा की उत्सुकता जाग गयी."मैं नहीं चाहती थी अजय मेरे अलावा किसी और को चाहे. पर उसके मन में तो सिर्फ़ तुम समाई हुयीं थी.""तो, आपने क्या किया?""उस रात, तुम्हारे जाने के बाद मैं उसके कमरे में गई, बिचारा मुट्ठ मारते हुये भी तुम्हारा नाम ले रहा था. मुझसे ये सब सहन नहीं हुआ और मैनें उसका लन्ड अपने हाथों में ले लिया और फ़िर...." पद्मा अब टूट चुकी थी. शोभा के हाथ पद्मा की पीठ पर मचल रहे थे. जेठानी के बदन से उठती आग वो महसूस कर सकती थी.
"क्या अजय ने आपके बड़े बड़े ये (स्तन) भी चूसे थे?" बातों में शोभा ही हमेशा बोल्ड रही थी."हां री, और मुझे याद है कि उसने तुम्हारे भी चूसे थे." पद्मा ने पिछले वार्तालाप को याद करते हुये कहा. उसके हाथ अब शोभा के स्तनों पर थे. अपनी बहन जैसी जेठानी से मिले इस सिग्नल के बाद तो शोभा के जिस्म में बिजलियां सी दौड़ने लगीं. पद्मा भी अपने ब्लाऊज और साड़ी के बीच नन्गी पीठ पर शोभा के कांपते हाथों से सिहर उठी. दोनों औरतों को कोई गुमान नहीं था. ना तो पद्मा को आज तक ऐसा आर्गैज्म आया था ना ही शोभा को. लेकिन शोभा के उछलते चूतड़ों की बढ़ती गति और सिकुड़ते फ़ैलते चूत के होठों को देखकर अनुमान लगाया जा सकता था कि अब क्या होने वाला है. जब शोभा की चूत की दीवारों से पानी छूटा वो जैसे अन्दर ही अन्दर पिघल गई वो. थोड़ी देर में शोभा सुस्त हो कर पद्मा के ऊपर ही गिर पड़ी. इस शक्तिशाली ओर्गैज्म ने उसके शरीर से पूरी ताकत निचोड़ ली थी. अब दोनों ही औरते एक दूसरे के रस से लथपथ हुई पड़ी थीं.
शोभा पद्मा के शरीर पर से उतर कर जमीन पर उसके बाजु में आ गयी और उसकी तरफ़ चेहरा कर लेट गयी.
"आपमें और मुझमें कोई मुकाबला नहीं है दीदी." शोभा बुदबुदाई. "जैसे अजय आपका है वैसे ही मैं भी आपकी ही हूं. आप हम दोनों को ही जैसे मर्जी चाहे प्यार कर सकती है. अगर ये सब मुझे आप से ही मिल जायेगा तो मैं किसी की तरफ़ नहीं देखूंगी" कहते हुये शोभा ने अपनी आंखें नीची कर ली.
शोभा के बोलों ने पद्मा को भी सुधबुध दिलाई को वो दोनों इस वक्त हॉल में किस हालत में है. कुशन, कपड़े और फ़र्नीचर, सब बिखड़ा पड़ा था. इस हालत में तो दुबारा पहले की तरह कपड़े पहन पाना भी मुश्किल था. पद्मा ने शोभा की चूतड़ पर थपकी दी और बोली,
"छोटी, हम दोनों को अब उठ जाना चाहिये. कोई आकर यहां ये सब देख ना ले".
"म्म्मं, नहीं", शोभा ने बच्चों की तरह मचलते हुये कहा। पद्मा ने समझा बुझा कर उसे अपने से अलग किया. हॉल में बिखरे पड़े अपने कपड़ों को उठा कर साड़ी को स्तनों तक लपेट लिया और ऊपर अपने कमरे की राह पकड़ी. जाती हुई पद्मा को पीछे से देख कर शोभा को पहली बार किसी औरत की मटकती चूतड़ का मर्दों पर जादुई असर का अहसास हुआ.
पद्मा ने पलट कर एक बार जमीन पर पसरी पड़ी शोभा पर भरपूर नज़र डाली और फ़िर धीमे से गुड नाईट कह ऊपर चढ़ गई.



शोभा की आंखें थकान और नींद से बोझिल हो चली थी और दिमाग अब भी पिछले २-३ महीनों के घटनाक्रम को याद कर रहा था. अचानक ही कितना कुछ बदल गया था उसके सैक्स जीवन में.
पहले अपने ही भतीजे अजय से अकस्मात ही बना उसका अवैध संबंध फ़िर पति द्वारा संभोग के दौरान नये नये प्रयोग और अब बहन जैसी जेठानी से समलैंगिक सैक्स. किसी मादा शरीर से मिला अनुभव नितांत अनूठा था पर रात में इस समय बिस्तर में किसी पुरुष के भारी कठोर शरीर से दबने और कुचले जाने का अपना अलग ही आनन्द है. काश अजय इस समय उसके पास होता. किस्मत से एक ही बार मौका मिला था उसे परन्तु पद्मा तो हर रात ही अजय से चुदने का लुत्फ़ लेती होगी. आज अजय मिल जाये तो उसे काफ़ी कुछ नया सिखा सकती है. अजय अभी नौजवान है और उसे बड़ी आसानी प्रलोभन देकर अपनी चूत चटवाई जा सकती है. फ़िर वो पद्मा के मुहं की तरह ही उसके मुहं पर भी वैसे ही पानी बरसायेगी. मजा आ जायेगा.
पता नहीं कब इन विचारों में खोई हुई उसकी आंख लग गयी. देर रात्रि में जब प्यास लगने पर उठी तो पूरा घर गहन अन्धेरे में डूबा हुआ था. बिस्तर के दूसरी तरफ़ कुमार खर्राटे भर रहे थे. पानी पीने के लिये उसे रसोई में जाना पड़ेगा सोच कर बहुत आहिस्ते से अपने कमरे से बाहर निकली. सामने ही अजय का कमरा था. हे भगवान अब क्या करे. पद्मा को वचन दिया है कि कभी अजय की तरफ़ गलत निगाह से नहीं देखेगी. पर सिर्फ़ एक बार दूर से निहार लेने से तो कुछ गलत नहीं होगा. दिल में उठते जज्बातों को काबू करना जरा मुश्किल था.
सिर्फ़ एक बार जी भर के देखेगी और वापिस आ जायेगी. यही सोच कर चुपके से अजय के कमरे का दरवाजा खोला और दबे पांव भीतर दाखिल हो गई. कमरे में घुसते ही उसने किसी मादा शरीर को अजय के शरीर पर धीरे धीरे उछलते देखा. पद्मा के अलावा और कौन हो सकता है इस वक्त इस घर में जो अजय के इतना करीब हो. अजय की कमर पर सवार उसके लन्ड को अपनी चूत में समाये पद्मा तालबद्ध तरीके से चुद रही थी. खिड़की से आती स्ट्रीट लाईट की मन्द रोशनी में उसके उछलते चूंचे और मुहं से निकलती धीमी कराहो से पद्मा की मनोस्थिति का आंकलन करना मुश्किल नहीं था.
"कुतिया, अभी अभी मुझसे से चुदी है और फ़िर से अपने भतीजे के ऊपर चढ़ गई" मन ही मन पद्मा को गन्दी गन्दी गालियां बक रही थी शोभा. खुद के तन भी वही आग लगी हुई थी पर मन तो इस जलन से भर उठा कि पद्मा ने उसे अजय के मामले में पछाड़ दिया है. उधर पद्मा पूरे जोशोखरोश के साथ अजय से चुदने में लगी हुई थी. रह रहकर उसके हाथों की चूड़ियां खनक रही थी. गले में पड़ा हार भी दोनों स्तनों के बीच उछल कर थपथपा कर उत्तेजक संगीत पैदा कर रहा था और ये सब शोभा की चूत में फ़िर से पानी बहाने के लिये पर्याप्त था. पहले से नम चूत की दीवारों ने अब रिसना चालू कर दिया था. आभूषणों से लदी अजय के ऊपर उछलती पद्मा काम की देवी ही लग रही थी. शोभा को अजय का लन्ड चाहिये था. सिर्फ़ पत्थर की तरह सख्त अजय का मासपिण्ड ही उसे तसल्ली दे पायेगा. अब यहां खड़े रह कर इनकी काम क्रीड़ा देखने भर से काम नहीं चलने वाला था.
शोभा मजबूत कदमों के साथ पद्मा की और बढ़ी और पीछे से उसका कन्धा थाम कर अपनी और खींचा. हाथ आगे बढ़ा शोभा ने पद्मा के उछलते कूदते स्तनों को भी हथेलियों में भर लिया. कोई और समय होता तो पद्मा शायद उसे रोक पाती पर इस क्षण तो वो एक चरम सीमा से गुजर रही थी. अजय नीचे से आंख बन्द किये धक्के पर धक्के लगा रहा था. उसे ताई के दुख रहे मुम्मों का कोई गुमान नहीं था. इधर पद्मा को झटका तो लगा पर इस समय स्तनों को सहलाते दबाते शोभा के मुलायम हाथ उसे भा रहे थे. कुछ ही क्षण में आने वाली नई स्थिति को सोचने का समय नहीं था अभी उसके पास. शोभा को बाहों में भर पद्मा उसके सहारे से अजय के तने हथौड़े पर कुछ ज्यादा ही जोश से कूदने लगी.
"शोभा--आह--आआह", पद्मा अपनी चूत में उठती ऑर्गैज्म की लहरों से जोरो से सिसक पड़ी।
वो भी थोड़ी देर पहले ही अजय के कमरे में आई थी. शोभा की तरह उसकी चूत की आग भी एक बार में ठंडी नहीं हुई थी और आज अजय की बजाय अपनी प्यास बुझाने के उद्देश्य से चुदाई कर रही थी. अजय की जब नींद खुली तो ताई बेदर्दी से उसके फ़ूले हुये लण्ड को अपनी चूत में समाये उठक बैठक लगा रही थी. कुछ ना कर पाया लाचार अजय. आज रात अपनी ताई की इस हिंसक करतूत से संभल भी नहीं पाया था कि दरवाजे से किसी और को भी कमरे में चुपचाप आते देख कर हैरान रह गया. पर किसी भी तरह के विरोद्ध की अवस्था में नहीं छोड़ था आज तो ताई ने.
"शोभा तुम्हें यहां नहीं आना चाहिये था, प्लीज चली जाओ." पद्मा अनमनी सी बोली थी. शोभा के गदराये बदन को बाहों में लपेटे पद्मा उसकी हथेलियों को अपने दुखते स्तनों पर फ़िरता महसूस कर रही थी. लेकिन अपने भतीजे के सामने.. नहीं नहीं. रोकना होगा ये सब. किन्तु किशोर अजय का लण्ड तो ताई के मुख से अपनी चाची का नाम सुनकर और ज्यादा कठोर हो गया.
पद्मा ने शोभा को धक्का देने की कोशिश की और इस हाथापाई में शोभा के बदन पर लिपटी एक मात्र रेशमी चादर खुल कर गिर पड़ी. हॉल से आकर थकी हुई शोभा नंगी ही अपने बिस्तर में घुस गई थी. जब पानी पीने के लिये उठी तो मर्यादावश बिस्तर पर पड़ी चादर को ही लपेट कर बाहर आ गई थी. शोभा के नंगे बदन का स्पर्श पा पद्मा के तन बदन में बिजली सी दौड़ गई. एकाएक उसका विरोध भी ढीला पड़ गया. अजय के लण्ड को चोदते हुये पद्मा और कस कर शोभा से लिपट गई. नीचे अजय अपनी ताई की गीली हुई चूत को अपने लण्ड से भर रहा था शोभा के मन में डर पैदा हो गया कि कहीं अजय उसकी चूत भरने से पहले ही झड़ ना जाये उसने ऊपर से दाहिना हाथ आगे बढ़ा हथेली को संभोगरत ताई भतीजे के मिलन स्थल यानि पद्मा की चूत के पास फ़सा दिया. किसी अनुभवी खिलाड़ी की तरह शोभा ने क्षण भर में ही पद्मा के तने हुये चोचले को ढूंढ निकाला और तुरंत ही चुटकी में भर के उस बिचारी को जोरों से मसल दिया. लण्ड पर चाची की उन्गलियों का चिर परिचित स्पर्श पा अजय मजे में कराहा,
"चाचीईईईई".
"हां बेटा", शोभा चाची ने भी नीचे देखते हुये हुंकार भरी.

क्रमश:………………
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04-25-2019, 11:58 AM,
#50
RE: Muslim Sex Stories सलीम जावेद की रंगीन दुन�...
दुलारा भतीजा
भाग -7




पद्मा की चूत अजय के मोटे लण्ड के कारण चौड़ी हुई पड़ी थी और शोभा भी उसे बख्श नहीं रही थी. रह रह कर बार बार चूत के दाने को सहला छेड़ रही थी. पद्मा बार बार अजय की जांघों पर ही कमर को गोल गोल घुमा और ज्यादा उत्तेजना पैदा करने की कोशिश कर रही थी. पद्मा तो पहले से ही चरम सीमा के करीब थी , सो शोभा की इस हरकत से जल्दी ही झड़ने लग़ी “शोभा~आआआआआ”
शोभा तुरन्त समझ गयी कि पद्मा झड़ गयी है। उसने पद्मा के कंधे को छोड़ अपना हाथ उसकी बाहों के नीचे फ़सा दिया और बलपूर्वक पद्मा को अजय के ऊपर से उठाने लगी. दिमाग चलाते हुये उसने तुरंत ही अपने दुसरे हाथ की पांचों उंगलियों को एक साथ कर पद्मा की झड़ती रिसती चुत में घुसेड़ दिया. परंतु शोभा की उन्गलियां अजय के लण्ड की भांति गीली और चिकनी नहीं थी अतः पीड़ा की एक लहर उसके चेहरे पर फ़ैल गई. अजय भी गुर्रा पड़ा. वो झड़ने की कगार पर ही था कि उसकी चाची ने ताई की चूत को लण्ड पर से हटा लिया था. अब उसका पानी भी वापिस टट्टों में लौट गया था. शोभा ने पद्मा को खींच कर जमीन पर गिरा दिया और खुद उसके ऊपर आ गई. औरतों के बीच चलते इस मदन-युद्ध को पीछे से देख अजय भौंचक्का रह गया. दोनों ही उसे प्यारी थी. खुद के आनन्द के लिये वो किसी एक को भी छोड़ने को तैयार नहीं था. अपनी चाची के पुष्ट भारी स्तनों और फ़ुदकती चूत की तस्वीर उसके दिमाग में अब भी ताजा थी जिसे याद कर वो रोज ही मुट्ठ मारता था. उसकी ताई भी रोज रात को उसे स्त्री शरीर का सुख देती थी. दोनों ही औरतों से उपेक्षित अजय ने अपने बेबस तेल पिये लण्ड को मुट्ठी में भर लिया.


अजय के सामने ही शोभा पद्मा को अपने नीचे दबा एक हाथ से उनकी चूत में पांचों उन्गलियां घुसाये दे रही थी और दूसरे से पद्मा के बड़े बड़े स्तनों को निचोड़ रही थीं. चाची के होंठ पद्मा ताई के होंठों से चिपके हुये थे और जीभ शायद कहीं ताई के गहरे गले में गोते लगा रही थी. आंख के कोने से शोभा चाची ने अजय को लन्ड मुठियाते देखा तो झटके से जेठानी की चूत को छोड़कर अजय की कलाई थाम ली. अजय का हाथ उसके लन्ड पर से खींच कर चाची पद्मा के कानों मे फ़ुसफ़ुसाई "दीदी, देखो हमारा अजय क्या कर रहा है?"
इस प्रश्न के साथ ही शोभा ने पद्मा और अपने बीच में चल रहा अजय का विवाद भी जैसे निपटा दिया. और यही तो उन दोनों के बीच चले लम्बे समलैंगिक संभोग का भी आधार था. जिस्मों की उत्तेजना में कुछ भी स्वीकार कर लेना काफ़ी आसान होता है. हां, अपने भतीजे के सामने पद्मा पूरी तरह से चरित्रहीन साबित हो चुकी थी परन्तु जब उसने शोभा के हाथ को अजय के विशालकाय लण्ड को सहलाते देखा तो उसे शोभा में अपनी प्रतिद्वंद्धी नहीं, बल्कि अजय को उसके ही समान प्यार करने वाली एक और ताई/चाची दिखाई दी. अजय हालांकि रोज अपनी ताई को चोदता था और इस तरह से उसकी शारीरिक जरुरतें सीमा में रहती थी. किन्तु ताई सिर्फ़ रात में ही उसके पास आती थीं. उसके बेडरूम के बाहर वो सिर्फ़ उसकी ताई थीं. अपनी ताई के जाने के बाद ना जाने कितनी ही रातों को अजय ने चाची के बारे बारे में सोच सोच कर अपना पानी निकाला था. अन्जाने में ही सही, एक बार तो चाची की चूत के काफ़ी नजदीक तक उसके होंठ जा ही चुके थे और दोनों ही औरतों ने अपने जिस्म से उसके लण्ड की जी भर के सेवा भी की है. वो भी उन दोनों के इस कृत्य का बदला चुकाने को उत्सुक था. पर किससे कहे, दोनों ही उससे उम्र में बड़ी होने के साथ साथ पारिवारिक परम्परा के अनुसार सम्मानीय थी. दोनों ही के साथ उसका संबंध पूरी तरह से अवैध था. अपने दिल के जज्बातों को दबाये रखने के सिवा और कोई चारा नहीं था उसके पास. इसीलिये जब उसकी चाची ने मात्र एक चादर में लिपट कर उसके कमरे में प्रवेश किया था और अपने भारी भारी स्तनों को ताई के कन्धे से रगड़ना शुरु किया तो वो उन पर से अपनी नज़र ही नहीं हटा पाया था। शोभा की नाजुक उन्गलियां अजय के तने हुये काले लन्ड पर थिरक रही थीं तो बदन पद्मा के पूरे शरीर से रगड़ खा रहा था. दोनों ही औरतों के बदन से निकले मादा खुश्बू अजय को पागल किये जा रही थी. पद्मा ने जब अजय को शोभा के नंगे शरीर पर आंखें गड़ाये देखा तो उन्हें भी अहसास हुआ कि अजय को भरपूर प्यार देने के बाद भी आज तक उसके दिल में अपनी चाची के लिये जगह बनी हुई है. दोनों औरतों के बदन के बीच में पद्मा की चूत से निकलता आर्गैज्म का पानी भरपूर चिकनाहट पैदा कर रहा था.
"देखो दीदी" शोभा ने अजय के फ़ूले तने पर नजरें जमाये हुए कहा. कुशल राजनीतिज्ञ की तरह शोभा अब हर वाक्य को नाप तोल कर कह रही थी. पद्मा को बिना जतलाये उसे अजय को पाना था. अजय को बांटना अब दोनों की ही मजबूरी थी और उसके लिये पद्मा की झिझक खत्म करना बहुत जरूरी था.
"कैसा कड़क हो गया है?" पद्मा के चूतरस से सने उस काले लट्ठ को मुट्ठी में भरे भरे ही शोभा धीरे से बोली.
पद्मा के गले से आवाज नहीं निकल पाई.
“हम इससे अपनी चूत चुसवाना चाहते थे.” शोभा बोली.शोभा ने चेहरा पद्मा की तरफ़ घुमाया और अपने होंठ पद्मा की रसीली चूत के होंठों पर रख दिये. पद्मा के चूत को चूसते हुये भी उसने अजय के लण्ड को मुठियाना जारी रखा. नजाकत के साथ अजय के सुपाड़े पर अंगूठा फ़िराने लगी.
"चाचीईईईईई", अजय ने सिसक कर झटका दिया और ताई के चूतरस से चिकना लण्ड चाची के हाथ से छुट गया। अंगूठे की सहलाहट दबाव से लण्ड में खून का दौड़ना तेज हो गया था और वो बुरी तरह बौखला रहा था। अजय घूम के चाची के पीछे जा पहुँचा । ताई की चूत पर झुकी होने के कारण चाची के शानदार संगमरमरी गुदाज भारी भारी गोल चूतड़ ऊपर को उठे थे और उनके नीचे उनकी पावरोटी सी चूत अपने मोटे मोटे होठ खोले अजय के लण्ड को आमन्त्रित सा कर रही थी। एक अरसा हुआ जब अजय के लण्ड ने इस चूत का स्वाद एक बार चखा था अब अजय कुछ सोच पाने की हालत में नहीं था उसने अपना फ़ौलादी लण्ड उस पावरोटी सी चूत के मोटे मोटे होठों के बीच रखकर धक्का मारा और उसका लण्ड बुरी तरह से गीली चूत में एक ही धक्के मे समूचा अन्दर चला गया।
शोभा की चूत को जैसे ही अपना मनपसन्द लण्ड मिला उसकी कमर यन्त्रवत चूत को लण्ड पर उछालने लग़ी शोभा आगे सरक आई और खुद को कुहनियों पर व्यवस्थित करते हुये होंठों को पद्मा के उरोजों पर पर जमा दिया. इस समय शोभा की गीली टपकती चूत अजय के प्यासे लण्ड से दनादन चुद रही थी. अपने प्लान की कामयाबी से जेठानी पद्मा का ध्यान बटाने के लिये शोभा ने अपना ध्यान पद्मा के ऊपर लगा दिया. पद्मा के चेहरे के पास जा शोभा ने उनके गालों को चूमा. पद्मा ने भी जवाब में शोभा के दोनों होठों को अपने होठों की गिरफ़्त में ले लिया. दोनों औरते फ़िर से एक दूसरे में तल्लीन हो गईं. अजय ने अपने दोनो हाथों से शोभा चाची की गुदाज सगंमरमरी जाघें दबोच लीं और उनके भारी भारी गद्देदार चूतड़ों पर धक्का मारमारकर उनके गुदगुदेपन का आनन्द लेते हुए चाची की पावरोटी सी चूत को अपने फ़ौलादी लन्ड से चोदे जा रहा था.
अजय ने सिर उठा कर देखा तो उसकी ताई और चाची जैसे किसी दूसरे ही संसार में थी. आज की रात तीनों ही प्राणी एकाकार हो गये थे. अजय ने जब ये दृश्य देखा तो मारे जोश के उसने शोभा चाची के दोनों नितम्बों को और कस के जकड़ लिया. वो चाची की चूत से बहते झरने से वो अपने प्यासे लन्ड की प्यास बुझा लेना चाहता था और शोभा चाची ये होने नहीं दे रही थीं. क्योंकि बीच बीच में वो छिटक कर चूत हटा लेती थी फ़िर थोड़ी देर तक तड़पाने के बाद चूत को अजय के लन्ड के हवाले कर देती ।
पद्मा आंखों के कोनों से पद्मा ने शोभा के मोटे मोटे बड़े बड़े स्तनों को झूलते देखा. थोड़ा सा उठ कर उसने दोनों हाथों से शोभा के उछलते स्तनों को सहार दिया। मन शोभा के लिये कृतज्ञ था कि उसने उसे अजय के और करीब ला दिया है. अजय जो इतनी देर से अपनी आंखों के सामने अपनी ताई और चाची की उत्तेजक हरकतें देख रहा था, अब और सक्रिय हो उठा. थोड़ा सा आगे हाथ बढ़ाकर उसने दोनों हाथों से शोभा के उछलते स्तनों को दबोच लिया. अजय के हाथ अपने बड़े बड़े स्तनों पर पड़ते ही शोभा कराह उठी.

क्षण भर के लिये दोनों को छोड़ शोभा बिस्तर के सिरहाने पर जा कर बैठ गयी. पद्मा "शोभा? तुम किधर जा रही हो?", अजय जल्दी ही झड़ने वाला था वो भी उसी समय बोला “ चाची? कहाँ हो?” दोनो ये पल शोभा के साथ बांटना चाहते थे.
"आपके और अपने लिये इसको कुछ सिखाना बाकी है.." शोभा ने अपनी जीत पर मन ही मन खुश हो जवाब दिया. जब अजय ने शोभा को ये कहते सुना तो वो चौंका. निश्चित ही दोनों औरते उसके ही बारे में बातें कर रही थी.

शोभा पद्मा को वही छोड़ अजय के चेहरे के पास जाकर होंठों पर किस करने लगी. दोनों ही एक दूसरे के मुहं में अपना अपना रस चख रहे थे. "अजय चलो.. गेट रैडी..वर्ना ताई, ताई नाराज हो जायेंगी". शोभा ने अजय का ध्यान उसकी दोबारा से प्यासी हुई ताई की तरफ़ खींचा. अजय एक बार को तो समझ नहीं पाया कि चलने से चाची का क्या मतलब है. उसकी ताई तो यहीं उसके पास है.शोभा ने अजय को इशारा कर बिस्तर पर एक तरफ़ सरकने को कहा और पद्मा को खींच कर लिटा लिया. अजय से अपना ध्यान हटा शोभा ने जेठानी के स्तनों पर अपने निप्पलों को रगड़ा और धीरे से उनके होंठों के बीच अपने होंठ घुसा कर फ़ुसफ़ुसाई,"अब उसे मालूम है कि हम औरतों को क्या पसन्द है. आपको बहुत खुश रखेगा." कहते हुये शोभा ने जेठानी को अपनी बाहों में भर लिया. अजय अपनी चाची के पीछे लेटा ये सब करतूत देख रहा था. लन्ड को पकड़ कर जोर से चाची कि चूतड़ की दरार में घुसाने लगा, बिना ये सोचे की ये कहां जायेगा. दिमाग में तो बस अब लण्ड में उठता दर्द ही बसा हुआ था. किसी भी क्षण उसके औजार से जीवनदाय़ी वीर्य की बौछार निकल सकती थी. घंटों इतनी मेहनत करने के बाद भी अगर मुट्ठ मार कर पानी निकालना पड़ा तो क्या फ़ायदा फ़िर बिस्तर पर दो-दो कामुक औरतों का. शोभा ने गर्दन घुमा अजय की नज़रों में झांका फ़िर प्यार से उसके होंठों को चूमते हुये बोली, "बेटा, मेरे नहीं, ताई के ताई के. शोभा को अजय के लण्ड का सुपाड़ा अपनी चूतड़ के छेद पर चुभा तो था पर इस वक्त ये सब नये नये प्रयोग करने का नहीं था.
रात बहुत हो चुकी थी और शोभा एवं अजय अभी तक ढंग से झड़े नहीं थे. उस्के लिए ताई का थक के सोना जरूरी था अजय ने ताई के चेहरे की तरफ़ देखा. पद्मा की आंखों में शर्म और वासना के लाल डोरे तैर रहे थे. ताई, जो उसकी रोजाना जरुरत को पूरा करने का एक मात्र सुलभ साधन थी पद्मा ने हाथ बढ़ा अजय के चेहरे को सहलाया
"आ जा बेटा?".
अपनी ताई से किये वादे को निभाने के लिये अजय शोभा से अलग हो गया.
शोभा ने राहत की सांस ली. अजय उठ कर पद्मा के ऊपर चढ गया. इस तरह पद्मा अब अपनी देवरानी और भतीजे के नंगे जिस्मों के बीच में दब रही थी. शोभा के चेहरे पर अपना गोरा चेहरा रगड़ते हुये बोली "शोभा, तुम हमें कहां से कहां ले आई?".
"कोई कहीं नहीं गया दीदी. हम दोनों यहीं है.. आपके पास". कहते हुये शोभा ने अपने निप्पलों को पद्मा के निप्पलों से रगड़ा.
"हम तीनों तो बस एक-दूसरे के और करीब आ गये हैं." शोभा ने अपनी उन्गलियां पद्मा के पेट पर फ़िराते हुये गीले चूत-कपोलों पर रख दीं. "आप तो बस मजे करो.." शोभा की आवाज में एक दम से चुलबुलाहट भर गई. आंख दबाते हुये उसने अजय को इशारा कर दिया था.
पद्मा ने अजय के गरम बदन को महसूस किया. अजय ने एक हाथ पद्मा की कमर पर लपेट कर ताई को अपनी तरफ़ दबाया. यहां भी अनुभवहीन किशोर का निशाना फ़िर से चूका. लन्ड सीधा पद्मा की चूतड़ के सकरे रास्ते में फ़िसल गया.
"उधर नहीं". पद्मा कराही. अपना हाथ पीछे ले जा कर अजय के सिर को पकड़ा और उसके गालों पर एक गीला चुम्बन जड़ दिया. आज रात एक पारम्परिक भारतीय घर में जहां एक दूसरे के झूठे गिलास में कोई पानी भी नहीं पी सकता था सब कुछ उलट पलट गया था. लण्ड और चूतों का रस सभी सम्भावित तरीकों से मिश्रित थे.
शोभा अजय की ओर मुँह कर पद्मा के चेहरे के दोनों तरफ़ अपने घुटने रखकर इस तरह से बैठ गई कि उसकी चूत पद्मा के होठों से छूने लगी जैसे पद्मा से अपनी चूत चुसवाना चाहती हो । शोभा दोनों के साथ आज रात एकाकार हो गई थी. विचारों में खोई हुई पद्मा को पता ही नहीं चला कि कब शोभा ने उसकी टांगें उठा कर अजय के कन्धों पर रख दीं और उसकी मोटी मोटी जांघों के बीच हाथ डालकर हाथकर अजय के सख्त लन्ड को पकड़ लिया था और सहलाने लगी. उसकी खुद की चूत में अभी तक हल्के हल्के झटके आ रहे थे. शायद अजय के द्वारा की अधूरी चुदाई के बाद कहीं ज्यादा संवेदनशील हो गई थी. आज रात दुबारा अजय का लन्ड उसकी चूत पायेगी या नहीं। सिर्फ़ सोचने मात्र से ही लिसलिसा जाती थी. दिमाग को झटका दे शोभा ने अजय तेल पिये लट्ठ को पद्मा की रिसती चूत के मुहं पर रखा.
"अब डाल", अजय के चेहरे की ओर देखती शोभा बोली जो इस समय अपने बिशाल लण्ड को ताई की चूत में गुम होते देख रहा था.
"आह. बेटा धीरे...शोभा आह", पद्मा चित्कारी. चूत की निचली दीवारों से सरकता हुआ अजय का लन्ड ताई के गर्भाशय के मुहांने को छू रहा था. इतने सालों की चुदाई के बाद भी पद्मा की चूत में ये हिस्सा अनछुया ही था. अजय के साथ संभोग करते समय भी उसने कभी इस आसन के बारे में सोचा नहीं था. कृतज्ञतावश पद्मा शोभा चूत पर चुम्बन बरसाने लगी. इस आसन में अजय के हर धक्के के साथ पद्मा के चूतड़ ऊपर उठकर चूत के साथ एक लाइन में होने के कारण लण्ड के आसपास कराकर गुदगुदे गद्दे का मजा दे रहे थे। अजय दनादन धक्को मार रहा था उसे भरोसा नहीं था कि वो पूरी रात में एक बार भी झड़ भी पायेगा या नहीं, पूरे वक्त तो शोभा के इशारों पर ही नाचता रहा था. अजय ने ताई के एक चूंचे को हाथ में कस के दबा लिया. पद्मा को अपने फ़ूले स्तनों पर अजय के कठोर हाथ सुहाने लगे. वो अपना दूसरा स्तन भी अजय के सुपुर्द करना चाहती थी. शरीर को हल्का सा उठा अजय को दूसरा हाथ भी इस्तेमाल करने के लिये उकसाया. अजय ने तुरन्त ही ताई के बदन के उठे बदन के नीचे से दूसरा हाथ सरका के दूसरे चूंचे को दबोच लिया . अब दोनों ही चूंचे अजय के पंजों में जकड़े हुये थे और वो उनके सहारे शरीर के निचले हिस्से को ताई की चूत पर जोर जोर से पटक रहा था. अजय के जबड़े भींच गये. शोभा की नज़रें उसी पर थी. पद्मा के ऊपर चेहरा आगे कर दोनों एक दूसरे को चूमने लगे. पद्मा ने गर्दन मोड़ कर अपने सिर के पीछे चलती चाची भतीजे की हरकत को देखा और उसने अपने होंठों को शोभा की चूत पर टिका दिया. तीनों अब बिना किसी भेद-भाव के साथ चुमने चाटने लगे. अजय के होठ चाची के होठों से नीचे गरदन पर सरकते हुए नीचे चाची के थिरकते हुए बड़े बड़े स्तनों पर आ टिके। अब अजय हाथों से ताई के बड़े बड़े स्तनों को गूथ कर लालकर रहा था और चाची के उछलते दूधिया उरोजों पर मुँह मार रहा था। 
उत्तेजना से बौखलाये अजय का बलशाली पुरुषांग पद्मा की चूत को रौंद उसके होश उड़ाये दे रहा था।
अजय की हालत भी खराब थी. हे भगवान, ये चाची चोदने की सब कलाओं में पारंगत है. प्रणय क्रीड़ा के चरम पर खुद को महसूस कर अजय लण्ड को जोर जोर से मशीनी पिस्टन की भांति ताई की चिकनी चूत में भरने लगा. पद्मा खजुराहों की किसी सुन्दर मूर्ति के जैसी बिस्तर पर भतीजे और देवरानी के बीच पसरी पड़ी थी. गोरा गदराया शरीर अजय के धक्कों के साथ बिस्तर पर उछल रहा था.
पद्मा की चूत भतीजे के द्वारा चुद रही थीं चूचियां का मर्दन होरहा था और शोभा की चूत और चूचियां चूसी जा रही थी. शोभा ने अजय के लण्ड के साथ तालमेल बैठा लिया था. जब अजय का लन्ड ताई की चूत में गुम होता ठीक उसी समय शोभा अपनी चूचियों को बारी बारी से अजय के होंठों में दे देती. फ़िर जैसे ही अजय लन्ड को बाहर खींचता, वो भी अपनी चूची छुड़ा लेती। अजय तड़पकर रह जाता। चूत की दिवारों पर घर्षण से उत्पन्न आनन्द, लाल सुर्ख क्लिट से निकलते बिजली के झटके और अजय के हाथों में दुखते हुये बड़े बड़े स्तन, कुल मिलाकर अब तक का सबसे वहशीयाना और अद्भुत काम समागम था ये पद्मा के जीवन में.
अगले कुछ ही धक्कों के बाद दोनों अपने चरम सीमा के पास पहुंच गये. अब किसी भी क्षण वो अपनी मंजिल को पा सकते हैं. पहले पद्मा की चूत का सब्र टूटा. अजय के गले में "म्म्म." की कराह के साथ ही पद्मा ने शोभा की चूत को होठों मे दबा लिया. अजय के हाथों ने पहले से ही दुखते पद्मा के स्तनों पर दवाब बढ़ा दिया. जैसे ही उसे लन्ड में कुछ बहने का अहसास हुआ, उसने लन्ड से पद्मा की चूत पर कहर बरसाना शुरु कर दिया. बेतहाशा धक्कों के बीच पद्मा के गले से निकली घुटी हुई चीखें सुन नही सकता था. आर्गैज्म के बाद आते हल्के हल्के झटकों के बाद दिमाग सुन्न और शरीर निढाल हो गया. मानो किसी ने पूरी ऊर्जा खींच कर निकाल ली हो. परन्तु अभी तक अजय का लण्ड तनिक भी शिथिल नहीं हुआ था. बार बार धक्के मार कर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा था. शोभा रुक कर ये सब देख रही थी. बिचारा, अब ताई की झड़ती झटकती चूत उसे झेल नहीं पा रही थी. अजय ने ताई की चूत को आखिरी झटके तक तक आराम से चूत में धक्के मार मार के झड़ने दिया. अजय आनन्द के मारे कांप रहा था. उत्तेजना से भर कर अपने दांत शोभा चाची के सुन्दर नरम कंधों में गड़ा दिये. जब ताई की चूत में कोई हरकत न रही तो ताई की चूत में से अजय ने लन्ड के साथ चूत से बाहर निकाल लिया । जिससे "पॉप" की आवाज आयी। थकान से चूर होकर पद्मा बेसुध सो गयी।

क्रमश:………………
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