Hindi Sex Kahaniya पहली फुहार
01-25-2019, 12:50 PM,
#1
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पहली फुहार


सैयां जिन मांगो, ननदी, सैयां जिन मांगो, ननदी, सेज का सिंगार रे,
अरे, सैयां के बदले, अरे, सैयां के बदले, भैया दूंगी, चोदी चूत तुम्हार रे,
अरे, दिल खोल के मांगो, अरे बुर खोल के मांगो ननदी
अरे बुर खोल के मांगो ननदी जो मांगो सो दूंगी।


सोहर (पुत्र जन्म के अवसर पर गाये जाने वाले गाने) में, सावन में भाभी के मायके में मुझे ही टारगेट किया जा रहा था, आखिर मैं उनकी एकलौती छोटी ननद जो थी।



भाभी ने मुश्कुराते हुये पूछा-

“क्यों ननद रानी, मेरा कौन सा भाई पसंद है, अजय, सुनील, रवी या दिनेश… किससे चुदवाओगी…”


मेरे कुछ बोलने के पहले ही भाभी की अम्मा बोल पड़ी-

“अरे किससे क्या… चारों से चुदवायेगी। मेरी ये प्यारी बिन्नो सबका मन रखेगी…”

और यह कहते-कहते, मेरे गोरे, गुलाबी गालों पर चिकोटी काट ली।

मैं शर्म से लाल हो गयी।

हमारी हम उमर भाभी की छोटी कजिन, चन्दा ने मुझे फिर चिढ़ाया-

“मन-मन भाये, मूड़ हिलाये, मौका मिलते ही सटासट गप्प कर लोगी, अभी शर्मा रही हो…”

तब तक चन्दा की भाभी, चमेली भाभी ने दूसरा सोहर शुरू कर दिया, सब औरतें उनका साथ दे रही थीं।




कहां से आयी सोंठ, कहां से आया जीरा,
अरे, कहां से आयी ननदी हो मेरी गुंइयां।
अरे पटना से आयी सोंठ, बनारस से आया जीरा,
अरे आज़मगढ़ से, आयीं ननदी, हो मेरी गुंइयां।
क्या हुई सोंठ, क्या हुआ जीरा,
अरे क्या हुई ननदी, ओ मेरी गुंइयां।
अरे जच्चा ने खाई सोंठ, बच्चा ने, बच्चा ने खाया जीरा,
अरे, मेरे भैय्या ने, अरे, मेरे भैय्या ने चोदी ननदी रात मोरी गुंइयां।
अरे, मेरे देवर ने चोदी ननदी, हो मेरी गुंइयां, (भाभी ने जोड़ा।)
अरे राकी ने चोदी ननदी, हो मेरी गुंइयां, (भाभी की भाभी, चम्पा भाभी ने जोड़ा।)



जब भाभी की शादी हुई थी, तब मैं 10वें में पढ़ती थी, आज से करीब दो साल पहले . पर बरात में सबसे ज्यादा गालियां मुझे ही दी गयीं, आखिर एकलौती ननद जो थी, और उसी समय चन्दा से मेरी दोस्ती हो गई थी।

भाभी भी बस… गाली गाने और मजाक में तो अकेले वो सब पर भारी पड़ती थीं। पर शुरू से ही वो मेरा टांका किसी से भिड़वाने के चक्कर में पड़ गई।


शादी के बाद चौथी लेकर उनके घर से उनके कजिन, अजय और सुनील आये (वह एकलौती लड़की थीं, कोई सगे भाई बहन नहीं थे, चन्दा उनकी कजिन बहन थी और अजय, सुनील कजिन भाई थे, रवी और दिनेश पड़ोसी थे, पर घर की ही तरह थे।

वैसे भी गांव में, गांव के रिश्ते से सारी लड़कियां बहनें और बहुयें भाभी होती हैं)। उन दोनों के साथ भाभी ने मेरा नंबर…

दोनों वैसे भी बरात से ही मेरे दीवाने हो गये थे, पर अजय तो एकदम पीछे ही पड़ा था। रात में तो हद ही हो गई, जब भाभी ने दूध लेकर मुझे उनके कमरे में भेजा और बाहर से दरवाजा बंद कर दिया। पर कुछ ही दिनों में भाभी अपने देवर और मेरे कजिन रवीन्द्र से मेरा चक्कर चलवाने के…


रवीन्द्र मुझसे 4-5 साल बड़ा था, पढ़ाई में बहुत तेज था, और खूबसूरत भी था, पर बहुत शर्मीला था। पहले तो मजाक, मजाक में… हर गाली में मेरा नाम वह उसी के साथ जोड़तीं,

मेरी ननद रानी बड़ी हरजायी,
अरे गुड्डी छिनार बड़ी हरजायी,
हमरे देवर से नैना लड़ायें,
अरे रवीन्द्र से जुबना दबवायें, अरे जुबना दबवायें,
वो खूब चुदवायें।



पर धीरे-धीरे सीरीयसली वह मुझे उकसाती। अरे कब तक ऐसे बची रहोगी… घर का माल घर में… रवीन्द्र से करवाओगी तो किसी को पता भी नहीं चलेगा।

मुन्ने के होने पर जब मैंने भाभी से अपना नेग मांगा, तो उन्होंने बगल में बैठे रवीन्द्र की जांघों के बीच में मेरा हाथ जबर्दस्ती रखकर बोला- “ले लो, इससे अच्छा नेग नहीं हो सकता…”

“धत्त…” कहकर मैं भाग गई। और रवीन्द्र भी शर्मा के रह गया।
……
मुन्ने के होने पर, बरही में भाभी के मायके से, चन्दा भी आयी थी। हम लोगों ने उसे खूब चुन-चुन कर गाने सुनाये, और जो मैं सुनाने में शरमाती, वह मैंने औरों को चढ़ाकर सुनवाये-

“मुन्ने की मौसी बड़ी चुदवासी, चन्दा रानी बड़ी चुदवासी…”


एक माह बाद जब सावन लगा तो भाभी मुन्ने को लेकर मायके आयीं और साथ में मैं भी आयी।



“अरे राकी ने चोदी ननदी, रात मोरी गुंइयां…” चम्पा भाभी जोर-जोर से गा रही थीं।


किसी औरत ने भाभी से पूछा-

“अरे राकी से भी… बड़ी ताकत है तुम्हारी ननद में नीलू…”

“अरे, वह भी तो इस घर का मर्द है, वही क्यों घाटे में रह जाय…” चमेली भाभी बोलीं-

“और क्या तभी तो जब ये आयी तो कैसे प्यार से चूम चाट रहा था, बेचारे मेरे देवर तरसकर रह जाते हैं…” चम्पा भाभी ने छेड़ा।


“नहीं भाभी, मेरी सहेली बहुत अच्छी है, वह आपके देवरों का भी दिल रखेगी और राकी का भी, क्यों…” कहकर चन्दा ने मुझे जोर से पकड़ लिया।
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01-25-2019, 12:50 PM,
#2
RE: Hindi Sex Kahaniya पहली फुहार
सोलहवां सावन, 



दूसरी फुहार




सावन में झूले पड़े


बसंती जो नाउन थी, तभी आयी। सबके पैर में महावर और हाथों में मेंहदी लगायी गयी। मैंने देखा कि अजय के साथ, सुनील भी आ गया था और दोनों मुझे देख-देखकर रस ले रहे थे। मेरी भी हिम्मत भाभियों का मजाक सुनकर बढ़ गयी थी और मैं भी उन दोनों को देखकर मुश्कुरा दी।






हम लोग फिर झूला झूलने गये। भाभी ने पहले तो मना किया कि मुन्ने को कौन देखेग। भाभी की अम्मा बोलीं कि वह मुन्ने को देख लेंगी।



बाहर निकलते ही मैंने पहली बार सावन की मस्ती का अहसास किया।





हरियाली चारों ओर, खूब घने काले बादल, ठंडी हवा… हम लोग थोड़ा ही आगे बढे होंगे कि मैंने एक बाग में मोर नाचते देखे, खेतों में औरतें धान की रोपायी कर रहीं थी, सोहनी गा रहीं थी, जगह जगह झूले पड़े थे और कजरी के गाने की आवाजें गूंज रहीं थीं।

कजरी रास्ते में ही शुरू हो गयी और मुझे और भाभी को लेकर ,




घरवा में से निकलीं ,ननद भौजइया ,जुलुम दोनों जोड़ी रे साँवरिया।

भौजी के सोहे ला ,लाल लाल सिन्दुरा,
ननद जी के रोरी रे साँवरिया।

घरवा में से निकलीं ,ननद भौजइया ,जुलुम दोनों जोड़ी रे साँवरिया।

भौजी के सोहे ला ,लाल लाल चुनरी
ननद जी के पियरी रे साँवरिया।

घरवा में से निकलीं ,ननद भौजइया ,जुलुम दोनों जोड़ी रे साँवरिया।

भौजी के सोहे ला ,सोने क कंगना
ननद जी के चूड़ी रे साँवरिया।

घरवा में से निकलीं ,ननद भौजइया ,जुलुम दोनों जोड़ी रे साँवरिया।

भौजी के हाथे ढोलक मजीरा ,

ननद गावें कजरी रे साँवरिया।

घरवा में से निकलीं ,ननद भौजइया ,जुलुम दोनों जोड़ी रे साँवरिया।

भौजी के संग है एक सजना

अरे ,ननदी के दस दस रे साँवरिया.

घरवा में से निकलीं ,ननद भौजइया ,जुलुम दोनों जोड़ी रे साँवरिया।




हम लोग जहां झूला झूलने गये, वह एक घनी अमरायी में था, बाहर से पता ही नहीं चल सकता था कि अंदर क्या हो रहा है। एक आम के पेड़ की मोटी धाल पर झूले में एक पटरा पड़ा हुआ था।
झूले पे मेरे आगे चन्दा और पीछे भाभी थीं। पेंग देने के लिये एक ओर से चम्पा भाभी थीं और दूसरी ओर से भाभी की एक सहेली पूरबी थी जो अभी कुछ दिन पहले ससुवल से सावन मनाने मायके आयी थीं। चन्दा की छोटी बहन ने एक कजरी छेड़ी,


अरे रामा घेरे बदरिया काली, लवटि आवा हाली रे हरी।
अरे रामा, बोले कोयलिया काली, लवटि आवा हाली रे हरी,
पिया हमार विदेशवा छाये, अरे रामा गोदिया होरिल बिन खाली,
लवटि आवा हाली रे हरी,
भाभी ने चम्पा भाभी को छेड़ा- “क्यों भाभी रात में तो भैया के साथ इत्ती जोर-जोर से धक्के लगाती हैं, अभी क्या हो गया…”
चम्पा भाभी ने कस-कसकर पेंग लगानी शुरू कर दिया। कांपकर मैंने रस्सी कसकर पकड़ ली। 

भाभी ने चमेली भाभी से कहा- “अरे जरा मेरी ननद को कसके पकड़े रिहयेगा…” और चमेली भाभी ने टाप के ऊपर से मेरे उभारों को कस के पकड़ लिया। भाभी ने और सबने जोर से गाना शुरू कर दिया-




कैसे खेलन जैयो कजरिया, सावन में, बदरिया घिर आयी ननदी,
गुंडा घेर लेहिंयें तोर डगरिया, सावन में बदरिया घिर आयी ननदी,
चोली खोलिहें, जोबना दबइहें, मजा लुटिहें तोर संग, बदरिया घिर आयी ननदी
कैसे खेलन जैयो कजरिया, सावन में, बदरिया घिर आयी ननदी



तब तक चमेली भाभी का हाथ अच्छी तरह मेरे टाप में घुस गया था, पहले तो कुछ देर तक वह टीन ब्रा के ऊपर से ही मेरे उभारों की नाप जोख करती रहीं, फिर उन्होंने हुक खोल दिया और मेरे जोबन सहलाने मसलने लगीं।


झूले की पेंग इत्ती तेज चल रही थी कि मेरे लिये कुछ रेजिस्ट करना मुश्किल था। और जिस तरह की आवाजें निकल रहीं थी कि मैं समझ गयी कि मैं सिर्फ अकेली नहीं हूँ जिसके साथ ये हो रहा है।

कुछ देर में बिन्द्रा भाभी और चन्दा की छोटी बहन कजली पेंग मारने के काम में लगा गयीं, पर उन्होंने स्पीड और बढ़ा दी। इधर चमेली भाभी के हाथ, अब मेरे जोबन खूब खुलकर मसल, रगड़ रहे थे और आगे से चन्दा ने भी मुझे दबा रखा था। मैं भी अब खुलकर मस्ती ले रही थी।

अचानक बादल एकदम काले हो गये और कुछ भी दिखना बंद हो गया। हवा भी खूब ठंडी और तेज चलने लगी। चम्पा भाभी ने छेड़ा-
अरे रामा, आयी सावन की बाहर
लागल मेलवा बजार,
ननदी छिनार, चलें जोबना उभार,
लागें छैला हजार, रस लूटें, बार-बार,
अरे रामा, मजा लूटें उनके यार, आयी सावन की बाहर


मेरी स्कर्ट तो झूले पर बैठने के साथ ही अच्छी तरह फैलकर खुल गयी थी। तभी एक उंगली मेरी पैंटी के अंदर घुसकर मेरी चूत के होंठों के किनारे सहलाने लगी। घना अंधेरा, हवा का शोर, जोर-जोर से कजरी के गाने की आवाज। अब कजरी भी उसी तरह “खुल” कर होने लगी थी।


रिमझिम बरसे सवनवां, सजन संग मजा लूटब हो ननदी,
चोलिया खोलिहें, जोबना दबईहें, अरे रात भर चुदवाईब हो ननदी।
तोहार बीरन रात भर सोवें ना दें, कस-कस के चोदें हो ननदी।
अरे नवां महीने होरिल जब होइंहें, तोहे अपने भैया से चुदवाइब हो ननदी।


जब उंगली मेरे निचले होंठों के अंदर घुसी तो मेरी तो सिसकी निकल गयी।

अब धीरे-धीरे सावन की बूंदे भी पड़ने लगी थीं और उसके साथ उंगली का टिप भी अब तेजी से मेरी योनी में अंदर-बाहर हो रहा था। ऊपर से चमेली भाभी ने अब मेरे टाप को पूरी तरह खोल दिया था और ब्रा ने तो कब का साथ छोड़ दिया था।
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01-25-2019, 12:50 PM,
#3
RE: Hindi Sex Kahaniya पहली फुहार
किसी ने कहा कि अब घर चलते हैं पर मेरी भाभी ने हँसकर कहा कि अब कोई फायदा नहीं, रास्ते में अच्छी तरह भीग जययेंगे, यहीं सावन का मजा लेते हैं। तेज होती बरसात के साथ, मेरी चूत में उंगली भी तेजी से चल रही थी।

कपड़े सारे भीग गये और बदन पर पूरी तरह चिपक गये थे। चूत में उंगली के साथ अब क्लिट की भी अंगूठे से रगड़ाई शुरू हो गयी और थोड़ी देर में ही मैं झड़ गयी और उसी के साथ बरसात भी रुक गयी।


लौटते समय भाभी, चमेली भाभी के घर चली गयी और मैं चम्पा के साथ लौट रही थी कि रास्ते में अजय और सुनील मिले। भीगे कपड़ों में मेरा पूरा बदन लगभग दिख रहा था, ब्रा हटने से मेरे उभार, सिंथेटिक टाप से चिपक गये थे और मेरी स्कर्ट भी जांघों के बीच चिपकी थी।

चन्दा जानबूझ कर रुक कर उनसे बात करने लगी और वो दोनों बेशर्मी से मेरे उभारों को घूर रहे थे।


मैंने चन्दा से कहा- “हे चलो, मैं गीली हो रही हूं…”

चन्दा ने हँसकर कहा- “अरे, बिन्नो देखकर ही गीली हो रही हो तो अगर ये कहीं पकड़ा-पकड़ी करेंगे तो, तुम तो तुरंत ही चिपट जाओगी…”

सुनील और अजय दोनों ने कहा- “कब मिलोगी…”

मैं कुछ नहीं बोली।
चन्दा बोली- “अरे, तुमसे ही कह रहे हैं…”

हँसकर मैंने कहा- “मिलूंगी…” और चन्दा का हाथ पकड़कर चल दी।

पीछे से सुनील की आवाज सुनाई पड़ी- “अरे, हँसी तो फँसी…” 

तब तक चन्दा की आवाज ने मुझे वापस ला दिया। उसने अंदर से दरवाजा बंद कर लिया था और साड़ी उतार रही थी।

मैंने उसे छेड़ा- “क्यों मेरे चक्कर में घाटा तो नहीं हो गया…”

“और क्या, लेकिन अब तेरे साथ उसकी भरपायी करूंगी…” और उसने मेरे उभारों को फ्राक के ऊपर से पकड़ लिया। हम दोनों साथ-साथ लेटे तो उसने फिर फ्राक के अंदर हाथ डालकर मेरे रसभरे उभारों को पकड़ लिया और कसकर मसलने लगी।

“हे, नहीं प्लीज छोड़ो ना…” मैंने बोला।


पर मेरे खड़े चूचुकों को पकड़कर खींचते हुए वह बोली-

“झूठी, तेरे ये कड़े कड़े चूचुक बता रहें हैं कि तू कित्ती मस्त हो रही है और मुझसे छोड़ने के लिये बोल रही है। लेकीन सच में यार असली मजा तो तब आता है जब किसी मर्द का हाथ लगे…”

मेरी चूचियों को पूरे हाथ में लेकर दबाते हुए वो बोली कि कल मेले में चलेगी ना, देख कित्ते छैले तेरे जोबन का रस लूटेंगे। उसने मेरे हाथ को खींचकर अपने ब्लाउज़ के ऊपर कर दिया और उसकी बटन एक झटके में खुल गयीं।


“मैं अपने यारों को ज्यादा मेहनत नहीं करने देना चाहती, उन्हें जहां मेहनत करना है वहां करें…” चन्दा बोली।

उसका दूसरा हाथ मेरी पैंटी के अंदर घुसकर मेरे भगोष्ठों को छेड़ रहा था। थोड़ी देर दोनों भगोष्ठों को छेड़ने के बाद उसकी एक उंगली मेरी चूत के अंदर घुस गयी और अंदर-बाहर होने लगी।


चन्दा बोली- “यार, सुनील का बड़ा मोटा है, मैं इत्ते दिनों से करवा रही हूँ पर अभी भी लगाता है, फट जायेगी और एक तो वह नंबरी चोदू भी है, झड़ने के थोड़ी देर के अंदर ही उसका मूसल फिर फनफना कर खड़ा हो जाता है…”


उसका अंगूठा अब मेरी क्लिट को भी रगड़ रहा था और मैं मस्ती में गीली हो रही थी।


“और अजय का…” मैं अपने को पूछने से नहीं रोक पायी।

“अच्छा, तो गुड्डो रानी, अजय से चुदवाना चाहती हैं…” चन्दा ने कसकर मेरी क्लिट को पिंच कर लिया और मेरी सिसकी निकल गयी।

“तुम्हारी पसंद सही है, मुझे भी सबसे ज्यादा मजा अजय के ही साथ आता है, और उसे सिर्फ चोदने से ही मतलब नहीं रहता, वह मजा देना भी जानता है, जब वह एक निपल मुँह में लेकर चूसते और दूसरा हाथ से रगड़ते हुए चोदता है ना तो बस मन करता है कि चोदता ही रहे।

तुम्हारा तो वह एकदम दीवाना है, और वैसे दीवाने तो सभी लड़के हैं तुम पर…”

चन्दा की उंगली अब फुल स्पीड में मेरा चूत मंथन कर रही थी और उसने मेरा भी हाथ खींच कर अपनी चूत पर रख लिया था।

“और रवी तो… वह चाटने और चूसने में एक्सपर्ट है, नंबरी चूत चटोरा है, वह…”


मैं खूब मस्त हो रही थी।

मेरी एक चूची चन्दा के हाथ से मसली जा रही थी और उसके दूसर हाथ की उंगली मेरी चूत में अंदर-बाहर हो रही थी। ऐसा नहीं था कि मेरी चूत रानी को कभी किसी उंगली से वास्ता न पड़ा हो, पिछली होली में ही भाभी ने जब मेरी स्कर्ट के अंदर हाथ डालकर मेरी चूत पर गुलाल रगड़ा मसला था तो उन्होंने उंगली भी की थी

और वह तो ऐसे भांग के नशे में थीं की कैंडलिंग भी कर देतीं पर भला हो कि रवीन्द्र, उनका देवर आ आया तो, मुझे छोड़कर उसके पीछे पड़ गयीं।


पर जैसे चन्दा एक साथ, चूची, चूत और क्लिट कि रगड़ाई कर रही थी वैसे पहले कभी नहीं हुई थी और एक रसीले नशे से मेरी आँखें मुदी जा रही थीं।


चन्दा साथ में मुझे समझा भी रही थी-

“सुन, मेरी बात मान ले, यहां जमकर मजा लूट ले, देखो यहां दो फ़ायदे हैं। अपने शहर में किसी और से करवायेगी तो ये डर रहेगा की बात कहीं फैल ना जाय, वह फिर तुम्हारे पीछे ना पड़ जाय, पर यहां तो तुम हफ्ते दस दिन में चली जाओगी फिर कहां किससे मुलाकात होगी।

और फिर शहर में चांस मिलना भी टेढ़ा काम है, जब भी बाहर निकलोगी कोई भी टोकेगा की कहां जा रही हो, जल्दी आना, और फिर अगर किसी ने किसी के साथ देख लिया और घर आके शिकायत कर दी तो अलग मुसीबत, और यहां तो दिन रात चाहे जहां घूमो, फिरो, मौज मस्ती करो, और फिर तुम्हारी भाभी तो चाहती ही हैं कि तेरी ये कोरी कली जल्द से जल्द फूल बन जाये…”

ये कह के उसने कस के मेरी क्लिट को दबा दिया।


मैं मस्ती से कांप गयी- “पर… मैंने सुना है कि पहली बार दर्द बहुत होता है…” मस्ती ने मेरी भी शर्म शत्म कर दी थी।

“अरे मेरी बिन्नो… बिना दर्द के मजा कहां आता है, और कभी तो इसको फड़वाओगी, जब फटेगी… तभी दर्द होगा… वह तो एक बार होना ही है… आखिर तुमने कान छिदवाया, नाक छिदवायी कित्ता दर्द हुआ, पर बाद में कित्ते मजे से कान में बाला और नाक में कील पहनती हो।

ये सोचो न कि मेरी उंगली से जब तुम्हें इतना मजा आ रहा है… तो मोटा लण्ड जायेगा तो कित्ता मजा आयेगा। और अगर तुम्हें इतना डर लगा रहा है तो मैं तो कहती हूँ तुम सबसे पहले अजय से चुदवाओ, वह बहुत सम्हाल-सम्हाल कर चोदेगा…”


सेक्सी बातों और उंगली के मथने से मैं एकदम चरम के पास पहुँच गयी थी, पर चन्दा इत्ती बदमाश थी… वह मुझे कगार तक ले जाकर रोक देती और मैं पागल हो रही थी।

“हे चन्दा प्लीज, रुको नहीं हो जाने दो… मेरा…” मैंने विनती की।


“नहीं पहले तुम प्रामिस करो कि अब तुम सब शर्म छोड़कर…”
“हां हां मैं अजय, रवी, सुनील, दिनेश, जिससे कहोगी, करवा लूंगी… बस प्लीज़ रुको नहीं…” उसे बीच में रोककर मैंने बोला।


“नहीं ऐसे थोड़े ही… साफ-साफ बोलो और आगे से जैसे खुलकर चम्पा भाभी बोलती हैं ना तुम भी बस ऐसे ही
बोलोगी…” चन्दा ने धीरे-धीरे, मेरी क्लिट रगड़ते हुए कहा।


“हां… हां… हां… मैं अजय से, सुनील से तुम जिससे कहोगी सबसे चुदवाऊँगी… ओह… ओह्ह्ह्ह…” मैं एकदम कगार पर पहुँच गयी थी।


चन्दा ने अब तेजी से मेरी चूत में उंगली अंदर-बाहर करना शुरू कर दिया और मेरी क्लिट कसकर पिंच कर ली और मैं बस… झड़ती रही… झड़ती रही… मेरी आँखें बहुत देर तक बंद रहीं।


जब मेरी आँख खुली तो मैंने देखा कि चन्दा ने मुझे अपनी बाहों में भर रखा है और वह धीरे-धीरे मेरे उभारों को सहला रही है। मैंने भी उसके जोबन को जो मेरे जोबन से थोड़े बड़े थे, को हल्के-हल्के दबाने शुरू कर दिया।

थोड़ी देर में ही हम दोनों फिर गर्म हो गये। अबकी चन्दा मेरी दोनों टांगों को फैलाकर, किसी मर्द की तरह, सीधे मेरे ऊपर चढ़ गयी और मेरे सख्त मम्मों को दबाना शुरू कर दिया।

“जानती हो अब तक सबसे मोटा और मस्त लण्ड किसका देखा है मैंने…” चन्दा ने कहा।
“किसका…” उत्सुकता से भरकर मैंने पूछा।


“जानती हो अब तक सबसे मोटा और मस्त लण्ड किसका देखा है मैंने…” चन्दा ने कहा।
“किसका…” उत्सुकता से भरकर मैंने पूछा।

मेरी चूत पर अपनी चूत हल्के से रगड़ते हुये, चन्दा बोली-
“तुम्हारे कजिन कम आशिक का… रवीन्द्र का…”

“उसका… पर वह तो बहुत सीधा… शर्मीला… और तुमने उसका कैसे देखा… फिर वह मेरा आशिक कहां से हो गया…”
“बताती हूं…”
मेरी चूत की रगड़ाई अपनी चूत से करते हुए उसने बताना शुरू किया-

“तुम्हें याद है, अभी जब मैं मुन्ने के होने पे गयी थी, मैंने रवीन्द्र पे बहुत डोरे डालने की कोशिश की… मुझे लगता था कि भले ही वह सीधा हो पर बहुत मस्त चुदक्कड़ होगा, उसका बाडी-बिल्ड मुझे बहुत आकर्षक लगता था…
पर उसने मुझे लिफ्ट नहीं दी…

मैं समझ गयी कि उसका किसी से चक्कर है… पर एक दिन दरवाजे के छेद से मैंने उसे मुट्ठ मारते देखा… मैं तो देखती ही रह गयी, कम से कम बित्ते भर लंबा लण्ड होगा और मोटा इतना कि मुट्ठी में ना समाये… और वह किसी फोटो को देखकर मुट्ठ मार रहा था… कम से कम आधे घंटे बाद झड़ा होगा…
और बाद में अंदर जाकर मैंने देखा तो…

जानती हो वह फोटो किसकी थी…”
“किसकी… विपाशा बसु या ऐश की…”


मेरी आँखों के सामने तो उसकी मुट्ठ मारती हुई तस्वीर घूम रही थी।

“जी नहीं… तुम्हारी… और मुझे लगा की पहले भी वह तुम्हारी फोटो के साथ कई बार मुट्ठ मार चुका है… यहां मैं अपनी चूत लिये लिये घूम रही हूँ वहां वह बेचारा… तुम्हारी याद में मुट्ठ मार रहा… अगर तुम दे देती तो…”
मुझे याद आ रहा था कि कई बार मैं उसको अपने उभारों को घूरते देख चुकी हूँ और जैसे ही हमारी निगाहें चार होती हैं वह आँखें हटा लेता है…

और एक बार तो मैं सोने वाली थी कि मैंने पाया कि वह हल्के-हल्के मेरे सीने के उभारों को छू रहा है… मैं आँख बंद किये रही और वह हल्के-हल्के सहलाता रहा… पर उसे लगा कि शायद मैं जगने वाली हूँ तो उसने अपना हाथ हटा लिया। मुझे भी वह बहुत अच्छा लगता था।


“क्यों नहीं चुदवा लेती उससे…” मेरी चूत पर कसकर घिस्सा मारते हुये, चन्दा ने पूछा।
“आखिर… कैसे… मेरा कजिन है…” मैंने कुछ झिझकते कुछ लजाते पूछा।

“अरे लोग सगे को नहीं छोड़ते… तुम कजिन की बात कर रही हो, तुम्हें कुछ ख्याल है कि नहीं उसका, अगर कहीं इधर-उधर जाना शुरू कर दिया… कोई ऐसा वैसा रोग लगा बैठा…” चंदा ने जोर देकर समझाया।

मुझे भी उसकी बात में दम लग रहा था ,लेकिन चंदा से कैसे हामी भरती ?

चन्दा ने फिर मुझे पहली बार की तरह कगार पे ले जाके छोड़ना शुरू कर दिया, और जब मैंने खुलके कसम खाकर ये प्रामिस किया कि न मैं सिर्फ रवीन्द्र से चुदवाऊँगी बल की रवीन्द्र से उसकी भी चूत चुदवाऊँगी तभी उसने मुझे झड़ने दिया।

जब सुबह होने को थी तब जाकर हम दोनों सोये।


अगले दिन दोपहर के पहले से ही मेले जाने की तैयारियां शुरू हो गयी थीं।
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01-25-2019, 12:51 PM,
#4
RE: Hindi Sex Kahaniya पहली फुहार
चौथी फुहार











भीड़ अब और बढ़ गयी थी और गली बहुत संकरी हो गयी थी। अबकी सामने से एक लड़के ने मेरी चोली पर हाथ डाला और जब तक मैं सम्हलती, उसने मेरे दो बटन खोलकर अंदर हाथ डालकर मेरी चूची पकड़ ली थी। पीछे से किसी के मोटे खड़े लण्ड का दबाव मैं साफ-साफ अपने गोरे-गोरे, किशोर चूतड़ों के बीच महसूस कर रही थी। वह अपने हाथों से मेरी दोनों दरारों को अलग करने की कोशिश कर रहा था और मैंने पैंटी तो पहनी नहीं थी, इसलिये उसके हाथ का स्पर्श सीधे-सीधे, मेरी कुंवारी गाण्ड पर महसूस हो रहा था। तभी एक हाथ मैंने सीधे अपनी जांघों के बीच महसूस किया और उसने मेरी चूत को साड़ी के ऊपर से ही रगड़ना शुरू कर दिया था।

चूची दबाने के साथ उसने अब मेरे खड़े चूचुकों को भी खींचना शुरू कर दिया था। मैं भी अब मस्ती से दिवानी हो रही थी।
चन्दा की हालत भी वही हो रही थी। उस छोटे से रास्ते को पार करने में हम लोगों को 20-25 मिनट लग गये होंगे और मैंने कम से कम 10-12 लोगों को खुलकर अपना जोबन दान दिया होगा।


बाहर निकलकर मैं अपनी चोली के हुक बंद कर रही थी कि चन्दा ने आ के कहा- “क्यों मजा आया हार्न दबवाने में…”
बेशरमी से मैंने कहा- “बहुत…”









गन्ने के खेत में








पर तब तक मैंने देखा की गीता, पास के गन्ने के खेत में जा रही है। मैंने पूछा- “अरे… ये गीता कहां जा रही है…”


चन्दा ने आँख मारकर, अंगूठे और उंगली के बीच छेद बनाकर एक उंगली को अंदर-बाहर करते हुए इशारे से बताया चुदाई करवाने। और मुझे दिखाया की उसके पीछे रवी भी जा रहा है।

“पर तुम कहां रुकी हो, तुम्हारा कोई यार तुम्हारा इंतेजार नहीं कर रहा क्या…” चन्दा को मैंने छेड़ा।

“अरे लेकिन तुम्हें कोई उठा ले जायेगा तो मैं ही बदनाम होऊँगी…” चन्दा ने हँसते हुए मेरे गुलाबी गालों पर चिकोटी काटी।

“अरे नहीं… फिर तुम्हें खुश रखूंगी तो मेरा भी तो नंबर लगा जायेगा। जाओ, मैं यही रहूंगी…” मैं बोली।

“अरे तुम्हारा नंबर तो तुम जब चाहो तब लग जाये, और तुम न भी चाहो तो भी बिना तुम्हारा नंबर लगवाये बिना मैं रहने वाली नहीं, वरना तुम कहोगी कि कैसी सहेली है अकेले-अकेले मजा लेती है…” और यह कह के वह भी गन्ने के खेत में धंस गयी।





मैंने देखा की सुनील भी एक पगडंडी से उसके पीछे-पीछे चला गया।

गन्ने के खेत में सरसराहट सी हो रही थी।


मैं अपने को रोक नहीं पायी और जिस रास्ते से सुनिल गया था, पीछे-पीछे, मैं भी चल दी।

एक जगह थोड़ी सी जगह थी और वहां से बैठकर साफ़-साफ़ दिख रहा था।

चन्दा को सुनील ने अपनी गोद में बैठा रखा था और चोली के ऊपर से ही उसके जोबन दबा रहा था। चन्दा खुद ही जमीन पर लेट गयी और अपनी साड़ी और पेटीपेट को उठाकर कमर तक कर लिया। मुझे पहली बार लगा की साडी पहनना कित्ता फायदेमंद है।


उसने अपनी दोनों टांगें फैला लीं और कहने लगी- “हे जल्दी करो, वो बाहर खड़ी होगी…”


सुनील ने भी अपने कपड़े उतार दिये। उफ… कित्ता गठा मस्कुलर बदन था, और जब उसने अपना… वाउ… खूब लंबा मोटा और एकदम कड़ा लण्ड… मेरा तो मन कर रहा था कि बस एक बार हाथ में ले लूं।

सुनील ने उसकी चोली खोल दी और सीधे, फैली हुई टांगों के बीच आ गया।


उसके लण्ड का चूत पर स्पर्श होते ही चन्दा सिहर गयी और बोली- “आज कुछ ज्यादा ही जोश में दिख रहे हो क्या मेरी सहेली की याद आ रही है…”


“और क्या… जब से उसे देखा है मेरी यही हालत है, एक बार दिलवा दो ना प्लीज…” सुनील अपने दोनों हाथों से चन्दा के मम्मे जमकर मसल रहा था।


चन्दा जिस तरह सिसकारी भर रही थी, उसके चेहरे पे खुशी झलक रही थी, उससे साफ लग रहा था की उसे कितना मजा आ रहा था। मेरा भी मन करने लगा कि अगर चन्दा की जगह मैं होती तो…


सुनील अपना मोटा लण्ड चन्दा की बुर पर ऊपर से ही रगड़ रहा था और चन्दा मस्ती से पागल हो रही थी- “हे डालो ना… आग लगी है क्यों तड़पा रहे हो…”

सुनील ने उसके एक निपल को हाथों से खींचते हुए कहा-

“पहले वादा करो… अपनी सहेली की दिलवाओगी…”


चन्दा तो जोश से पागल हो रही थी और मुझे भी लगा रहा था कि कितना अच्छा लगता होगा। वह चूतड़ उठाती हुई बोली-


“हां, हां… दिलवा दूंगी, चुदवा दूंगी उसको भी, पर मेरी चूत तो चोदो, नशे में पागल हुई जा रही हूं…”


सुनील ने उसकी दोनों टांगों को उठाकर अपने कंधे पर रखा और उसकी कमर पकड़कर एक धक्के में अपना आधा लण्ड उसकी चूत में ठेल दिया। मैं अपनी आँख पर यकीन नहीं कर पा रही थी, इतनी कसी चूत और एक झटके में सिसकी लिये बिना, लण्ड घोंट गयी।


अब एक हाथ से सुनील उसकी चूची मसल रहा था, और दूसरे से उसकी कमर कसकर पकड़े था।
थोड़ी देर में ही, चन्दा फिर सिसकियां लेने लगी-


“रुक क्यों गये… डालो ना प्लीज… चोदो ना… उहुह… उह्ह्ह…”



सुनील ने एक बार फिर दोनों हाथ से कमर पकड़कर अपना लण्ड, सुपाड़े तक निकाल लिया और फिर एक धक्के में ही लगभग जड़ तक घुसेड़ दिया। अब लगा रहा था कि चन्दा को कुछ लग रहा था।


चन्दा- “उफ… उह फट गयी… लग रहा है, प्लीज, थोड़ा धीरे से एक मिनट रुक… हां हां ऐसे ही बस पेलते रहो हां, हां डालो, चोद दो मेरी चूत… चोद दो…”


चन्दा और सुनील दोनों ही पूरे जोश में थे। सुनील का मोटा लण्ड किसी पिस्टन की तरह तेजी से चन्दा की चूत के अंदर-बाहर हो रहा था।

चन्दा की मस्ती देखकर तो मेरा मन यही कह रहा था कि काश… उसकी जगह मैं होती और मेरी चूत में सुनील का ये मूसल जैसा लण्ड घुस रहा होता… थोड़ी देर में सुनील ने चन्दा की टांगें फिर से जमीन पर कर दीं और वह उसके ऊपर लेट गया, उसका एक हाथ, चन्दा के चूचुक मसल रहा था और दूसरा उसकी जांघों के बीच, शायद उसकी क्लिट मसल रहा था।

चन्दा का एक चूचुक भी सुनील के मुँह में था।


अब तो चन्दा नशे में पागल होकर अपने चूतड़ पटक रही थी। उसने फिर दोनों टांगों को उसके पीठ पर फंसा लिया। मैं सोच भी नहीं सकती थी कि चुदाई में इत्ता मजा आता होगा, अब मैं महसूस कर रही थी कि मैं क्या मिस कर रही थी।


सटासट, सटासट… सुनील का मोटा लण्ड… उसकी चूत में अंदर-बाहर… चन्दा का शरीर जिस तरह से कांप रहा था उससे साफ था कि वो झड़ रही है।


पर सुनील रुका नहीं, जब वह झड़ गई तब सुनील ने थोड़ी देर तक रुक-रुक कर फिर से उसके चूचुक चूसने, गाल पर चुम्मी लेना, कसकर मम्मों को मसलना रगड़ना शुरू कर दिया और चन्दा ने फिर सिसकियां भरना शुरू कर दिया।


एक बार फिर सुनील ने उसकी टांगों को मोड़कर उसके चूतड़ों को पकड़ के जमके खूब कस के धक्के लगाने शुरू कर दिये। क्या मर्द था… क्या ताकत… चन्दा एक बार और झड़ गयी।


तब कहीं 20-25 मिनट के बाद वह झड़ा और देर तक झड़ता रहा। वीर्य निकलकर बहुत देर तक चन्दा के चूतड़ों पर बहता रहा। अब उसने अपना लण्ड बाहर निकाला तब भी वह आधा खड़ा था।


मैं मंत्रमुग्ध सी देख रही थी, तभी मुझे लगा कि अब चन्दा थोड़ी देर में बाहर आ जायेगी, इसलिये, दबे पांव मैं गन्ने के खेत से बाहर आकर इस तरह खड़ी हो गई जैसे उसके इंतेजार में बोर हो रही हूं।


चन्दा को देखकर उसके नितंबों पर लगी मिट्टी झाड़ती मैं बोली- “क्यों ले आयी मजा…”

“हां, तू चाहे तो तू भी ले ले, तेरा तो नाम सुनकर उसका खड़ा हो जाता है…” चन्दा हँसकर बोली।

“ना, बाबा ना, अभी नहीं…”

“ठीक है, बाद में ही सही पर ये चिड़िया अब बहुत देर तक चारा खाये बिना नहीं रहेगी…” साड़ी के ऊपर से मेरी चूत को कसके रगड़ती हुई वो बोली, और मुझे हाथ पकड़के मेले की ओर खींचकर, लेकर चल दी। 
मेले में गीता के साथ पूरबी, कजरी और बाकी लड़कीयां फिर मिल गयीं।



चन्दा ने आँखों के इशारे से पूछा तो गीता ने उंगली से दो का इशारा किया। मैं समझ गयी कि रवी से ये दो बार चुदा के आ रही है।


पूरे मेले में खिलखिलाती तितलियों की तरह हम लोग उड़ते फिर रहे थे।

हम लोगों ने गोलगप्पे खाये, झूले पर झूले, हम लोगों का झुंड जिधर जाता, पूरे मेले का ध्यान उधर मुड़ जाता और फिर जैसे मिठाई के साथ-साथ मक्खियां आ जाती हैं, हमारे पीछे-पीछे, लड़कों की टोली भी पहुँच जाती।


और दुकानदार भी कम शरारती नहीं थे, कोई चूड़ी पहनाने के बहाने जोबन छू लेता तो कोई कलाई पकड़ लेता। और लड़कीयों को भी इसमें मजा मिल रहा था, क्योंकी इसी बहाने उन्हें खूब छूट जो मिल रही थी।

थोड़ी देर में मैं भी एक्सपर्ट हो गई। दुकानदार के सामने मैं ऐसे झुक जाती कि उसे न सिर्फ चोली के अंदर मेरे जोबन का नजारा मिल जाता बल्की वह मेरे चूचुक तक साफ-साफ देख लेता। 
उसका ध्यान जब उधर होता तो मेरी सहेलियां उसका कुछ सामान तो पार ही कर लेतीं, और मुझे जो वो छूट देता वो अलग।

हम ऐसे ही मस्ती में घूम रहे थे।
पूरबी ने गाया-






अरे मैं तो बनिया यार फँसा लूंगी,
अरे जब वो बनिया चवन्नी मांगे,
अरे जब वो बनिया चवन्नी मांगे, मैं तो जोबना खोल दिखा दूंगी।
अरे मैं तो बनिया यार फँसा लूंगी, दूध जलेबी खा लूंगी
अरे जब वो बनिया रुपैया मांगे,
अरे जब वो बनिया रुपैया मांगे, मैं तो लहंगा खोल दिखा दूंगी।


गुदने वाली के पास भी हम लोग गये और मैंने भी अपनी ठुड्डी पे तिल गुदवाया।

तभी मैंने देखा कि बगल की दुकान पे दो बड़े खूबसूरत लड़के बैठें हैं, खूब गोरे, लंबे, ताकतवर, कसरती, गठे बदन के, उनकी बातों में मेरा नाम सुन के मेरा ध्यान ओर उनकी ओर लग गया।

“अरे तुमने देखा है, उस शहरी माल को, क्या मस्त चीज है…” एक ने कहा।

“अरे मैं, आज तो सारा मेला उसी को देख रहा है, उसकी लम्बी मोटी चूतड़ तक लटकती चोटी, जब चलती है तो कैसे मस्त, कड़े कड़े, मोटे कसमसाते चूतड़, मेरा तो मन करता है, कि उसके दोनों चूतड़ों को पकड़कर उसकी गाण्ड मार लूं… एक बार में अपना लण्ड उसकी गाण्ड में पेल दूं…” दूसरा बोला।


“अरे मुझे तो बस… क्या, गुलाबी गाल हैं उसके भरे-भरे, बस एक चुम्मा दे दे यार, मन तो करता है कि कचाक से उसके गाल काट लूं…” पहला बोला।
दूसरा बोला- “और चूची… ऐसी मस्त रसीली कड़ी-कड़ी चूचियां तो यार पहली बार देखीं, जब चोली के अंदर से इत्ती रसीली लगती हैं तो… बस एक बार चोदने को मिल जाय…”


शायद किसी और दिन मैं किसी को अपने बारे में ऐसी बातें बोलती सुनती तो बहुत गुस्सा लगता, पर आज ये सबसे बड़ी तारीफ लग रही थी… और ये सुनके मैं एकदम मस्त हो गयी। 

पूरे मेले में हम लोगों की टोली ने धमाल मचा रखा था।

जो जो चीजे मैंने कभी देखी भी नहीं थी , सिर्फ पढ़ी थीं ,सुनी थीं वो सब , और सब से बढ़ के फुल टाइम मस्ती ,

जितना मैं चंदा से खुली थी , अब उतना ही गीता , पूरबी ,कजरी और गाँव की बाकी लड़कियों से भी ,

गीता ने पूरा किस्सा सुनाया मुझे चटखारे लेकर कैसे रवी ने उसके साथ , एक नहीं दो बार ,

पूरबी ने भी पूरे डिटेल में गन्ने के खेत के मजे के बारे में बताया।

और भीड़ भी इतनी की कहाँ कौन क्या कर रहा है , कोई देख नहीं सकता था ,सब अपने अपने में मगन थे।

टोलियां बन बिगड़ रही थीं , कभी किसी के साथ कोई किसी दूकान पे तो कोई किसी के साथ , और थोड़ी देर में फिर हम मिल जाते , आसमान में बनते बिगड़ते रंगीले बादलों के साथ।

हाँ ,जिधर हम जाते , लड़कों की टोली भी पीछे पीछे , और एक से एक कमेंट ,और उस से भी ज्यादा तीखे शोख जवाब भी मिलते , गीता और कजरी की ओर से और अब , मेरी भी जुबान खुल गयी थी , गाने से लेकर खुल के मजाक करने में।

मैं और चंदा मेले में घूम रहे थे की पीछे से सुनील कुछ इशारा कर के ,चंदा को बुलाया।

" बस पांच मिनट में आ रही हूँ , कुछ जरूरी काम है " वो मुझसे बोली , लेकिन मैं तो सुनील के इशारे को देख ही चुकी थी। हँसते हुए मैंने छेड़ा ,

" अरे जाओ न , और वैसे भी यहाँ आस पास कोई गन्ने का खेत तो है नहीं जो तुझे ज्यादा टाइम लगे। "

जोर से एक हाथ मेरी पीठ पे पड़ा और खिलखिलाती चंदा ने बोला , " बहुत देर नहीं है , जल्द ही तुझे भी गन्ने के खेत में लिटाउंगी , सटासट सटासट लेगी न अंदर तो, और वैसे भी गन्ने के खेत के अलावा भी यहाँ आस पास बहुत जगहे हैं मजा लेंने की , कित्ता भी चीखो,बोलो कुछ पता नहीं चलने वाला। "
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01-25-2019, 12:51 PM,
#5
RE: Hindi Sex Kahaniya पहली फुहार
उधर सुनील बैचैन हो रहा था।

चंदा रानी अपने मोटे मोटे चूतड़ मचकाती उधर चल दीं।

थोड़ा दूर से कुछ लाउडस्पीकर की आवाजें आ रही थीं ,गाने की , लेकिन आवाज साफ नहीं थी।

मैं थोड़ा उधर मुड़ी तो देखा की नौटंकी का बैनर दूर से नजर आ रहे थी।

दो तीन नौटंकी वालों के टेंट उधर लगे थे , नीलम नौटंकी कंपनी कानपुर , शोभा थियेटर।

मैं उधर बढ़ गयी , और अब गाने की आवाज साफ सुनाई दे रही थी ,

और एक जगह से थोड़ा थोड़ा स्टेज दिख भी रहा था ,







लड़ाई लो अंखिया हो लौंडे राजा , लड़ाई लो
सास गयीं गंगा , ननद गयी जमुना ,


लड़ाई लो अंखिया हो लौंडे राजा , लड़ाई लो

तबतक स्टेज के नीचे से किसी लड़के ने दस का नोट दिखाया ,

उसने दो बार अपने भारी उभार मचकाए और झुक कर , अपनी पूरी गहराइयाँ उसे दिखाते , रूपया ले लिया , फिर अपने होंठों से चूम कर , आँखों से लगा कर , पहले तो अपनी बहुत ही लो कट चोली में रखने का उपक्रम किया , फिर उसे हारमोनियम मास्टर के पास रख दिया।

जोर का चक्कर मार के वो फिर उस लड़के के सामने , जिसने पैसा दिया था , उसका नाम पूछा और गाया ,

रानी पर वाले बाबू साहब का , प्यारी प्यारी पब्लिक का शुक्रिया अदा करती ,अदा करती , अदा करती हूँ।
साथ में नगाड़े वाले ने तीन बार नगाड़े पर जोरदार टनक दी।

और गाना फिर शुरू हो गया ,

लड़ाई लो अंखिया हो लौंडे राजा , लड़ाई लो
दबाई दो छतियां हो लौंडे राजा ,लड़ाई लो अंखिया हो लौंडे राजा , लड़ाई लो

और दो हाथों ने जबरदस्त जोर से मेरी छाती दबा दी।


उन हाथों को मैं भूल सकती थी क्या , और कौन चंदा।

बिना उसका हाथ हटाये ,स्टेज पर चल रहा नाच देखते मैं बोली ,

" तू दबवाय आई न , यार से अपने "
"एकदम खूब दबवाया , लेकिन देख एक बिचारा तेरा दबाने के लिए बेचैन खड़ा है। अब तू भी दबवा ही ले यार " चंदा ने मेरे कान में फुसफुसाया।

मैंने कनखियों से देखा ,जिधर चंदा ने इशारा किया ,


अजय एक दम नदीदे लड़के की तरह , जैसे होंठों से लार टपक रही हो।


सब लोग स्टेज पर नाच देखने में मगन थे और वो , उसकी निगाहें चिपकी हुयी थी मुझसे , बल्कि साफ कहूँ तो मेरे उभारों से। चुनरी थोड़ी सरक गयी थी और उभार काफी कुछ दिख रहे थे। लो कट होने से गहराई भी , बस अजय की निगाह वहीँ डूबी हुयी थी।

मेरा तन मन दोनों सिहर गया , ये लड़के भी और ख़ास तौर से ये अजय न ,

मेरे नए नए आये जोबन और कड़े हो गए।

चंदा ने अजय को टोका ,

" हे क्या देख रहे हो। "

बिचारा अजय जैसे उसकी चोरी पकड़ी गयी हो , एकदम खिसिया गया।

कुछ तो नहीं। धीमे से बोला।

" कुछ तो देख रहे थे ,जरूर " अब मैं भी उसकी रगड़ाई में शामिल हो गयी थी।

साथ ही चूनर अड्जस्ट करने के बहाने से उसे गोरी गोरी गुदाज गोलाइयों का के पूरा दर्शन भी दे दिया।

उसकी हालत और खराब ,

" इस बिचारे की क्या गलती , देखने लायक चीज हो तो कोई भी देखेगा ही ," चंदा ने पाला बदल लिया और अजय के बगल में खड़ी होगयी लेकिन फिर उसने अजय को चिढ़ाया ,

' सिर्फ देखने लायक है या कुछ और भी ,.... "

जवाब नाचने वाली की ओर से आया ,




लड़ाई लो अंखिया हो लौंडे राजा , लड़ाई लो
दबाई दो छतियां हो लौंडे राजा ,लड़ाई लो अंखिया हो लौंडे राजा , लड़ाई लो

अरे उठायी लो टंगिया , सटाय दो , घुसाय दो , धँसाय दो


और उस के साथ वो जिस तरह की आवाजें निकाल रही थी टाँगे उठाये थी , कुछ कल्पना के लिए बचा नहीं था।


बात अजय ने बदली ,

"हे निशाना लगाने चलोगी।"


और जवाब चंदा ने दिया ,

" जानती है , अजय का निशाना एकदम पक्का है चूकता नहीं। "

लेकिन अजय ने मुझसे बोला , " लेकिन कई बार नहीं भी लगता। "

भीड़ का एक धक्का आया , नौटंकी में घुसने वालों का ,

और चंदा थोड़ा पीछे रह गयी।

मैंने अजय का हाथ पकड़ लिया और मौके का फायदा उठा के , थोड़ा सट के धीमे से बोली ,

" क्या पता, लग गया हो और ,… तुम्हे पता न चला हो। "

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01-25-2019, 12:51 PM,
#6
RE: Hindi Sex Kahaniya पहली फुहार
पांचवी फुहार
















बात अजय ने बदली ,

"हे निशाना लगाने चलोगी।"


और जवाब चंदा ने दिया ,

" जानती है , अजय का निशाना एकदम पक्का है चूकता नहीं। "

लेकिन अजय ने मुझसे बोला , " लेकिन कई बार नहीं भी लगता। "

भीड़ का एक धक्का आया , नौटंकी में घुसने वालों का ,

और चंदा थोड़ा पीछे रह गयी।

मैंने अजय का हाथ पकड़ लिया और मौके का फायदा उठा के , थोड़ा सट के धीमे से बोली ,

" क्या पता, लग गया हो और ,… तुम्हे पता न चला हो। "
………




निशाना चूक न जाए।






बड़ी हिम्मत कर के अजय ने अपना हाथ मेरी कमर पे रख के मुझे और अपने पास खींच लिया।

लेकिन सामने पूरबी कजरी और रवी दिखाई दिए और उसने झट से हाथ हटा लिया।

हम लोग निशाने वाले की दूकान के सामने थे और चंदा भी हमारे साथ आ गयी थी।
पूरबी ,कजरी और गीता के साथ रवी ,दिनेश और एक दो लड़के और थे।

दस निशाने सही लगाने पर दस निशाने और फ्री लगाने को मिलते।

लड़के अजय को लेकर उकसाने लगे। मैं एकदम अजय के साथ ही खड़ी थी ,आलमोस्ट चिपकी सी। चंदा हम दोनों के पीछे और उसकी कमेंट्री चालू थी ।

" निशाना असली ,ठीक बगल में हैं " चंदा ने मेरी ओर इशारा करके अजय को छेड़ा।

अजय ने मुस्कारते हुए शूट करना शुरू किया और देखते देखते दस के दस एकदम सही ,

अब चंदा मेरे पीछे पड़ गयी , अब तेरा नंबर। और उसके साथ पूरबी ,कजरी ,गीता सब,…

मैं लाख मना करती रही लेकिंन अजय ने शॉटगन मुझे पकड़ा दी , और जैसे ही मैंने पकड़ा ,पूरबी और चंदा दोनों मिल के ,

" देखा अजय ने पकड़ाया तो कैसे झट से पकड़ लिया। " पूरबी ने छेड़ा।

" अरे अजय का माल है , तो पकड़ लिया उस ने प्यार से , और क्या। " चंदा क्यों मौका छोड़ती।

" सिर्फ अजय का पकड़ेगी या बाकी लोगों का भी " सुनील अब पीछे पड़ा।

" तेरी सहेली का निशाना तो वैसे ही गजब का है ,मेले में डेढ़ सौ लोग घायल हो चुके हैं। " रवी ने चंदा को सुनाया।

सब कमेंट मुझे अच्छे लग रहे थे और मैंने निशाना लगाया ,

दस में दस मेरे भी।


सब लड़कियों ने खूब जोर की ताली बजायी , और ये तय हुआ की हम दोनों का मुकाबला होगा।


" ऐसे नहीं , जो हारेगा , वो मिठायी खिलायेगा ," पूरबी और कजरी बोलीं।

अजय ने झट मान लिया।

और हम दोनों के मुकाबले के चक्कर में अच्छी
पहला राउंड बराबर रहा , दस मेरे दस अजय के।

दूसरे राउंड में फिर ९ मेरे लेकिन अजय के दो निशाने चूक गए , और मैं तो नजदीक से देख रही थी , जान बूझ के उसने आखिरी दो शॉट गलत मारे थे।

लड़कियों ने शोर से आसमान गूंजा दिया ,लेकिन ये तो मैं जानती थी की सच में कौन जीता।

और जिस तरह से अजय ने मुझे देखा , मेरी आँखों में झांक के , मैं हार गयी और उसका हाथ दबा के मैंने अपनी हार कबूल कर ली।

इसके बाद फिर सब लोग अलग थलग ,


चंदा सुनील के साथ ,

अजय भी कुछ लड़कों के साथ ,

मैं कुछ देर पूरबी और कजरी के साथ , इधर उधर मस्ती से ,....

तब तक मैंने एक किताबों की दुकान देखी और रुक गयी ,

जमीन पर बिछा के , ढेर सारी ,
किस्सा तोता मैना , सारंगा सदाब्रिज , आल्हा , बेताल पच्चीसी ,सिंहासन बत्तीसी , शादी के गाने ,



तब तक मैंने एक किताबों की दुकान देखी और रुक गयी ,

जमीन पर बिछा के , ढेर सारी ,
किस्सा तोता मैना , सारंगा सदाब्रिज , आल्हा , बेताल पच्चीसी ,सिंहासन बत्तीसी , शादी के गाने ,

मैं झुक के पन्ने पलट रही थी, पता ही नहीं चला कैसे टाइम गुजर रहा था , तब तक जोर से नितम्बो पे किसी ने चिकोटी काटी , और बोला तुम दोनों मिल के ये कौन सी किताब पढ़ रहे हो।

और मेरी निगाह बगल की ओर मुड़ गयी।
अजय हलके हलके मुस्कराता हुआ ,

और फिर मेरी निगाह उस किताब की ओर पड़ गयी, जिसकी ओर चंदा इशारा कर रही थी।

असली कोकशास्त्र , बड़ी साइज ,८४ आसन ,सचित्र।

मैं गुलाल हो गयी , और अजय बदमाशी से मुस्करा रहा था।

" सही तो कह रही हूँ , साथ साथ पढ़ लो तो साथ साथ प्रैक्टिस करने में भी आसानी होगी। "

मैं उसे मारने दौड़ी तो वो एक दो तीन , और मेले की भीड़ में गायब।

लेकिन मेरी पकड़ से कहाँ बाहर आती

आखिर पकड़ लिया , लेकिन उसी समय कामिनी भाभी और दो चार भाभियाँ मिल गयीं , और वो बच गयी।

बात बातें करते हम लोग मेले के दूसरी ओर पहुँच गए थे।
वहां एक बहुत संकरी गली सी थी , दुकानों के बीच में से। और मेला करीब करीब खत्म सा हो गया था वहां , पीछे उसके खूब घनी बाग़,

तभी मैंने देखा दो लड़कियां निकलीं , उसी संकरी गली में से , खिलखिलाती , खूब खुश और उसके पीछे थोड़ी देर बाद दो लड़के।

मैंने शक की निगाह से चंदा की ओर देखा तो उसने मुस्कराते हुए सर हिलाके हामी भरी।

फिर इधर उधर देख के फुसफुसाते हुए मेरे कान में कहा ," यही तो मेले का मजा है। अरे गन्ने के खेत के अलावा भी बहुत जगहें होती हैं ,उस के पीछे कुछ पुराने खँडहर है , जिधर कोई आता जाता नहीं है , सरपत और ऊँची ऊँची मेंडे फिर पीछे बाग़ और सीवान है। "

पूरबी चूड़ी की एक दूकान से इशारे कर के मुझे बुला रही थी , और मैं उसके पास चली गयी।

वहां कजरी भी थी और दोनों उस दूकान दार से खूब लसी थीं ,
मैं भी उन की छेड़छाड़ में शामिल हो गयी। वहां से फिर मैं चंदा को ढूंढने निकली , तो उस ओर पहुँच गयी जहां दुकानो के बीच की वो संकरी सी गली , एक एक करके कोई उसमें जा सकता था ,

तभी अचानक भगदड़ मची , खूब जोर की , कोई कहता लड़ाई हो गयी , कोई कहता सांप निकला।

सब लोगों की तरह मैं भी भागी , और भीड़ के एक रेले के धक्के के साथ मैं भी ,

कुछ देर में जब मैं रुकी तो मैंने देखा की मैं उसी संकरी गली के अंदर हूँ.
,
मैं आगे बढती रही , वह आगे इतनी संकरी होगयी थी की तिरछे हो के ही निकला जा सकता था ,रगड़ते दरेरते।

मैं अंदर घुस गयी , और थोड़ी देर बाद एक दम खुली जगह , ज्यादा नहीं , १००- २०० फीट।

उसमें कुछ पुराने अध टूटे कमरे , और खूब ऊँची मेड जिस पे सरपत लगी थी और उस के पार वो घनी बाग़।

बाहर से एक बार फिर मेले का शोर सुनाई देने लगा था।

मैं एकदम अकेली थी वहां।

आसमान में काले बादल भी घिर आये थे , काफी अँधेरा हो गया था।


और जब मैं वापस निकलने लगी तो , रास्ता बंद।


दो मोटे तगड़े मुस्टंडे , उस संकरे रास्ते को रोक के खड़े थे।

मेरी तो घिघ्घी बंध गयी।

अगर मैं चिल्लाऊं तो भी वहां कोई सुनने वाला नहीं थी।

उन में से एक आगे बढ़ने लगा , और मैं पीछे हटने लगी।

दूसरा रास्ता घेरे खड़ा था।

मैं आलमोस्ट उस खँडहर के पास पहुँच गयी।

वह कुछ बोल नहीं रहे थे पर उनका इरादा साफ था और मैं कुछ कर भी नहीं सकती थी।

" तेरी सोन चिरैया तो आज लूटी , कोई चाहने वाला लूटता पहली फुहार का मजा लेकिन यहाँ ये दो ,"

कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था।

तबतक एकदम फिल्मी हीरो की तरह , अजय

और पहली बार मैंने नोटिस किया , उसकी चौड़ी छाती , खूब बनी हुयी मसल्स ,कसरती देह , ताकत छलक रही थी।

और अब उसके आगे तो दोनों जमूरे एकदम पिद्दी लग रहे थे।

उसने उन दोनों को नोटिस ही नहीं किया , और सीधे आके मेरा हाथ पकड़ के बोला ,

" अरे हम सब लोग तुमको ढूंढ रहे हैं , चलो न "

मैंने अपना सर उसके सीने पे रख दिया। 

मजा झूले पे ,








" अरे हम सब लोग तुमको ढूंढ रहे हैं , चलो न "

मैंने अपना सर उसके सीने पे रख दिया।
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01-25-2019, 12:52 PM,
#7
RE: Hindi Sex Kahaniya पहली फुहार
थोड़ी देर में हम लोग फिर मेले की गहमागहमी के बीच , वहीं मस्ती ,छेड़छाड़। और पूरा गुट ।

गीता ,पूरबी ,कजरी , चंदा , रवि ,दिनेश और सुनील।


एक बड़ी सी स्काई व्हील के पास।

" झूले पे चढ़ने के डर से भाग गयी थी क्या " पूरबी ने चिढ़ाया।

" अरे मेरी सहेली इत्ती डरने वाली नहीं है , झूला क्या हर चीज पे चढ़ेगी देखना ,क्यों हैं न " चंदा क्यों पीछे रहती द्विअर्थी डायलॉग बोलने में।

और अब झूले वाले ने बैठाना शुरू किया ,मुझे लगा मैं और चंपा एक साथ बैठ जायंगे , लेकिन जैसे ही चंदा बैठी , धप्प से उसके बगल में सुनील बैठ गया।

और अब मेरा नंबर था लेकिन जब मैं बैठी तो देखा , की सब लड़कियां किसी न किसी लड़के के साथ ,और कोई नहीं बची थी मेरे साथ बैठने के लिए।

बस अजय , और वो झिझक रहा था।

झूलेवाले ने झुंझला के उससे पूछा , तुम्हे चढ़ना है या किसी और को चढाउँ ,बहुत लोग खड़े हैं पीछे।

मैंने खुद हाथ बढ़ा के अजय को खीँच लिया पास में।

चंदा और सुनील अगली सीट पे साफ दिख रहे थे। चंदा एकदम उससे सटी चिपकी बैठीं थी और सुनील ने भी हाथ उसके उभारों पर , और सीधे चोली के अंदर
और झूला चलने के पहले ही दोनों चालू हो गए।

सुनील का एक हाथ सीधे चंदा की चोली अंदर , जोबन की रगड़ाई ,मसलाई चालू हो गयी और चंदा कौन कम थी , वो भी लिफाफे पे टिकट की तरह सुनील से चिपक गयी।

और झूला चलते हुए इधर उधर जो मैंने देखा तो सारी लड़कियों की यही हालत थी।

मैं पहली बार जायंट व्हील पे बैठी थी और जैसे ही वो नीचे आया, जोर की आवाज उठी , होओओओओओओओओओओ हूऊऊओ

और इन आवाजों में डर से ज्यादा मस्ती और सेक्सी सिसकियाँ थीं।


डर तो मैं भी रही थी ,पहली बार जायंट व्हील पे बैठी थी और जैसे ही झूला नीचे आया मेरी फट के , … मैं एकदम अजय से चिपक गयी।

लेकिन एक तो मैं कुछ शर्मा रही और अजय भी थोड़ा ज्यादा ही सीधा , झिझक रहा था की कहीं मैं बुरा न ,

लेकिन फिर भी जब अगली बार झूला नीचे आया , डर के मारे मैंने आँखें मिची , अजय ने अपना हाथ मेरे कंधे पर रख दिया।
अब मैं और उहापोह में उसके हाथ को हटाऊँ या नही। अगर न हटाऊं तो कहीं वो मुझे ,…

हाथ तो मैंने नहीं हटाया ,हाँ थोड़ा दूर जरूर खिसक गयी , बस अजय ने हाथ हटा लिया।

अब मुझे अहसास हुआ , कितनी बड़ी गलती कर दी मैंने। एक तो वो वैसे ही थोड़ा ,बुद्ध और सीधा ऊपर से मैं भी न ,

फिर बाकी लड़कियां कित्ता खुल के मजे ले रही थीं , चंदा के तो चोली के आधे बटन भी खुल गए थे और सुनील का हाथ सीधा अंदर , खुल के चूंची मिजवा रही थी। और मैं इतने नखड़े दिखा रही थी। क्या करूँ कुछ समझ में नहीं आ रहां था ,खुद तो उससे खुल के बोल नहीं सकती थी।

लेकिन सब कुछ अपने आप हो गया ,एकदम नेचुरल।

झूले की रफ्तार एकदम से तेज होगयी और मैं डर के अजय के पास दुबक गयी ,मैंने अपना सर उसके सीने में छुपा लिया , और अब जब उसने अपना हाथ सपोर्ट देने के लिए जैसे , मेरे कंधे पे रखा।

ख़ुशी से मैंने उसे मुस्करा के देखा और अपनी उंगलिया उसके हाथ पे रख के दबा दी।

और जब झूला नीचे आया तो अबकी सबकी सिसकियों में मेरी भी शामिल थी।

मैं समझ गयी थी ,हर बार लड़का ही पहल नहीं करता ,लड़की को भी उसका जवाब देना पड़ता है।

और अगर अजय ऐसा लड़का हो तो फिर और ज्यादा , आखिर मजा तो दोनों को आता है। फिर कुछ दिन में मैं शहर वापस चली जाउंगी , फिर कहाँ , और आज यहाँ अभी जो मौक़ा मिला है वैसा कहाँ ,… फिर




उसका हाथ पकड़ के मैंने नीचे खींच लिया सीधे अपने उभार पे , और हलके से दबा भी दिया।

और जैसे अपनी गलती की भरपाई कर दी हो , अजय की ओर मुस्करा के देखा भी।

फिर तो बस , उसकी शैतान उंगलियां ,मेरे कड़े कड़े किशोर उभारों के बेस पे , थोड़ी देर तो उसने बस जैसे थामे रखा ,फिर अपनी हथेली से हलके दबाना शुरू किया। हाथ का बेस मेरे निपल से थोड़े ऊपर , मैं साँस रोक के इन्तजार कर रही थी अब क्या करेगा वो ,

कुछ देर उसने कुछ नहीं किया , बस अपनी हथेली से हलके हलके दबाता , मेरी गोलाइयों का रस लेता , वो अभी खिली कलियाँ जिसके कितने ही भौंरे दीवाने यहाँ इस मेले में टहल रहे थे। पतली सी टाइट चोली से उसके हाथ का स्पर्श अंदर तक मुझे गीला कर रहा था।

मन तो मेरा कर रहा था बोल दूँ उससे जोर से बोल दूँ ,यार रगड़ दो मसल मेरे जोबन ,जैसे खुल के बाकी लड़कियां मजे ले रही हैं ,

पर ये साल्ली शरम भी न ,

लेकिन अबकी जब झूला नीचे आया तो बस मैंने अपनी हथेली उसकी हथेली के ऊपर रख के खूब जोर से दबा दिया , और उस प्यासी निगाह से देखा , जैसे सावन में प्यासी धरती काले बादलों की ओर देखती है।

और धरती की तरह मेरी भी मुराद पूरी हुयी।

अजय ने खूब जोर से मेरे जोबन दबा दिए।

इत्ता भी सीधा नहीं था वो , अब हलके हलके रगड़ मसल रहा था , और थोड़ी ही देर में दूसरा उभार भी उसके हथेली की पकड़ में ,

मेरी सिसकियाँ और चीखें और लड़कियों से भी अब तेज निकल रही थीं।

पहली बार मुझे ये मजा जो मिल रहा था , प्यार से कोई मेरे उभारों को सहला दबा रहा था , मसल रहा था ,रगड़ रहां था ,मीज रहा था।

और मैं भी उतने ही प्यार से , दबवा रही थी , मसलवा रही थी , रगड़वा रही थी ,मिजवा रही थी।

मैं आलमोस्ट उसके गोद में बैठी हुयी थीं ,मेरा एक हाथ जोर से उसके कमर को पकडे हुआ था , जैसे अब वही मेरा सहारा हो , आलमोस्ट कम्प्लीट सरेंडर।
अब मेरी सारी सहेलियां जिस तरह से खुल के अपने यारों के साथ मजा ले रही थीं ,उसी तरह


लेकिन अजय तो अजय ,उसकी उँगलियाँ हथेलियाँ अभी भी चोली के ऊपर से ही चूंची का रस ले रही थीं।

दो बटन तो मेरे पहले ही खुले थे , मेरी गोलाइयाँ , गहराइयाँ सब कुछ उसे दावत दे रही थीं लेकिन ,....

पर मेरे लिए चोली के ऊपर से भी जिस तरह से वो जोर जोर से दबा रहा था वही पागल करने के लिए बहुत था। अब मुझे अंदाज हो रहा था जवानी के उस लज्जत का जिसे लूटने के लिए सब लड़कियां कुछ भी , कभी गन्ने के खेत में तो कभी अपने घर में ही ,


उसकी डाकू उँगलियों ने हिम्मत की अंदर घुसने की , मैंने बहुत जोर से सिसकी भरी , जब उसके ऊँगली के पोर मेरे निपल से छू गए।

जैसे खूब गरम तवे पे किसी ने पानी के छींटे दे दिए हों


अंगूठा और तर्जनी के बीच वो मटर के दाने ,

लेकिन तबतक झूला धीमा होना शुरू हो गया था और उसने हाथ हटा लिया।


झूले के रूकने पे अजय ने मेरा हाथ पकड़ के उतारा और एक बार फिर उसकी हथेली मेरे उभारों पे रगड़ गयी।

वो बेशर्मों की तरह मुझे देख के मुस्करा रहा था , लेकिन मैं ऐसी शरमाई की , हिरनी की तरह अपने सहेलियों के झुण्ड से दूर।
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01-25-2019, 12:52 PM,
#8
RE: Hindi Sex Kahaniya पहली फुहार
अरे अरे अरे ना ना ना...
आज रपट जाएँ तो हमें ना उठैइओ
आज फिसल जाएँ तो हमें ना उठैइओ
हमें जो उठैइओ तो - 2, खुद भी रपट जैययो

हा खुद भी फिसल जैययो
आज रपट हा हा आज रपट जैययो तो हमें ना उठैइओ




बरसात में थी कहा बात ऐसी पहली बार बरसी बरसात ऐसी - 2
कैसी यह हवा चली, पानी में आग लगी, जाने क्या प्यास जगी रे
भीगा यह तेरा बदन, जगाए मीठी चुभन
नशे में ज़ूमे ये मन रे, कहा हू मैं मुझे भी यह होश नही
हा हा हो हो - 2, (आज बहक जाए तो होश ना दिलाईयो - 2)
होश जो दिलाईयो तो - 2, खुद भी बहक जैययो
आज रपट हा हा आज रपट जैययो तो हमें ना उठैइओ

(बादल में बिजली बार बार चमके
दिल में मेरे आज पहली बार चमके) - 2
हसीना डरी डरी, बाहों में सिमट गयी, सीने से लिपट गयी रे
तुझे तो आया मज़ा, तुझे तो आई हसीन, मेरी तो जान फसी रे
जानेजिगर किधर चली नज़र चुराके
हा हा हो हो - 2, (बात उलझ जैययो तो आज ना सुल्झैयो - 2)
बात जो सुल्झैयो तो - 2, खुद भी उलझ जैययो
आज रपट हा हा आज रपट जैययो तो हमें ना उठैइओ...



बदल से छम छम शराब बरसे सावरी घटा से शबाब बरसे-2
बूँदों की बजी पायल, घटा ने छेडी ग़ज़ल, ये रात गयी मचल रे
दिलों के राज़ खुले, फ़िज़ा में रंग घुले, जवां दिल खुलके मिले रे
होना था जो हुआ वही अब डरना क्या
हा हा हो हो - 2, (आज डूब जाए तो हमे ना बचाईयो - 2)
(हमे जो बचाईयो तो - 2), खुद भी डूब जैययो
आज रपट हा हा आज रपट जैययो तो हमें ना उठैइओ
आज फिसल जाएँ तो हमें ना उठैइओ, (हा हा हो हो - 2)
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01-25-2019, 12:52 PM,
#9
RE: Hindi Sex Kahaniya पहली फुहार
छठवीं फुहार ,










उसकी डाकू उँगलियों ने हिम्मत की अंदर घुसने की , मैंने बहुत जोर से सिसकी भरी , जब उसके ऊँगली के पोर मेरे निपल से छू गए।

जैसे खूब गरम तवे पे किसी ने पानी के छींटे दे दिए हों


अंगूठा और तर्जनी के बीच वो मटर के दाने ,

लेकिन तबतक झूला धीमा होना शुरू हो गया था और उसने हाथ हटा लिया।


झूले के रूकने पे अजय ने मेरा हाथ पकड़ के उतारा और एक बार फिर उसकी हथेली मेरे उभारों पे रगड़ गयी।

वो बेशर्मों की तरह मुझे देख के मुस्करा रहा था , लेकिन मैं ऐसी शरमाई की , हिरनी की तरह अपने सहेलियों के झुण्ड से दूर।

कुछ दूर जाकर मैं ऐसे ही मेले में इधर उधर टहलती रही , लेकिन मन में तो बस अजय का हाथ ,



मेले में



कुछ देर कभी चूड़ियों की दूकान पे तो कभी कहीं कुछ देर इधर उधर घूमने के बाद मैं उधर पहुँच गयी जहाँ मेरी सहेलियां खड़ी थी। शाम करीब करीब ढल चुकी थी , नौटंकी और बाकी दुकानों पे रौशनी जल गयी थी। बादल भी काफी घिर रहे थे।

जब मैंने अपनी सहेलियों की ओर निगाहें डाली तो वहां उनके साथ कई लड़के खड़े थे, जब मैं नजदीक गई तो पाया कि चन्दा के साथ सुनील, गीता के साथ रवी और कजरी और पूरबी के साथ भी एक-एक लड़का था। अजय अकेला खड़ा था।

गीता ने अजय को छेड़ा- “अरे… सब अपने-अपने माल के साथ खड़े हैं… और तुम अकेले…”

मैंने ठीक से सुना नहीं पर मैं अजय को अकेले देखकर उसके पास खड़ी हो गयी और बोली- “मैं हूँ ना…”

सब हँसने लगे, पर अजय ने अपने हाथ मेरे कंधे पर रखकर मुझे अपने पास खींच लिया और सटाकर कहने लगा- “मेरा माल तो है ही…”

थोड़ा बोल्ड बनकर अपना हाथ उसकी कमर में डालकर, मैं और उससे लिपट, चिपट गयी और बोली- “और क्या, जलती क्यों हो, तुम लोग…”



चन्दा मुझे चिढ़ाते हुए, अजय से बोली- “अरे इतना मस्त, तुम्हारा मन पसंद माल मिल गया है, मुँह तो मीठा कराओ…”

“कौन सा मुंह… ऊपर वाला या नीचे वाला…” छेड़ते हुए गीता चहकी।

“अरे हम लोगों का ऊपर वाला और अपने माल का दोनों…” चन्दा मुश्कुरा के बोली।

एक दुकान पर ताजी गरम-गरम जलेबियां छन रहीं थीं। हम लोग वहीं बैठ गये।


सब लोगों को तो दोने में जलेबियां दीं पर मुझे उसने अपने हाथ से मेरे गुलाबी होंठों के बीच डाल दी। थोड़ा रस टपक कर मेरी चोली पर गिर पड़ा और उसने बिना रुके अपने हाथ से वहां साफ करने के बहाने मेरे जोबन पे हाथ फेर दिया। हम लोग थोड़ा दूर पेड़ के नीचे बैठे थे। उसका हाथ लगाते ही मैं सिहर गयी।


एक जलेबी अपने हाथों में लेकर मैंने उसे ललचाया- “लो ना…” और जब वो मेरी ओर बढ़ा तो मैंने जलेबी अपने होंठों के बीच दबाकर जोबन उभारकर कहा- “ले लो ना…”

अब वो कहां रुकने वाला था, उसने मेरा सर पकड़ के मेरे होंठों के बीच अपना मुँह लगा के न सिर्फ जलेबी का रसास्वादन किया बल्की अब तक कुंवारे मेरे होंठों का भी जमकर रस लिया और उसे इत्ते से ही संतोष नहीं हुआ और उसने कसके मेरे रसीले जोबन पकड़ के अपनी जीभ भी मेरे मुँह में डाल दिया।

“हे क्या खाया पिया जा रहा है, अकेले-अकेले…” चन्दा की आवाज सुनकर हम दोनों अलग हो गये।
रात शुरू हो गयी थी। हम सब घर की ओर चल दिये।

रास्ते में मैंने देखा कि पूरबी उन दोनों लड़कों से, जो मेरी “रसीली तारीफ” कर रहे थे, घुल मिलकर बात कर रही थी। गीता ने बताया कि वे पूरबी के ससुराल के हैं और बल्की उसके ससुराल के यार हैं।


रात शुरू हो चुकी थी , और साथ कजरारे मतवारे बादल के छैले ,बार बार चांदनी का रास्ता रोक लेते , बस झुटपुट रोशनी थी , और कभी वो भी नहीं /

दूर होते जा रहे मेले में गैस लाइट ,जेनरेटर सब की रौशनी थी , और वहां बज रहे गानों की आवाजें दूर तक साथ आ रही थीं।

सुबह मेरी सहेलियां सब एक साथ थीं और गाँव के लडके पीछे ,

लेकिन अभी ,कभी लडकियां एक साथ तो कभी कुछ अपने यार के साथ भी , ख़ास तौर से पगडंडी जहाँ संकरी हो जाती थी ,या दोनों ओर आम के बाग़ या गन्ने के खेत होते , बस गुट
बनते बिगड़ते रह रहे थे।
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01-25-2019, 12:52 PM,
#10
RE: Hindi Sex Kahaniya पहली फुहार
चंदा मेंरा हाथ पकड़ कर चल रही थी , क्योंकि बाकी के लिए तो ये जानी पहचानी डगर थी लेकिन मैं तो पहली बार ,


कुछ ही दूर पे पीछे पीछे अजय और सुनील ,कुछ बतियाते चल रहे थे।

पूरबी , कजरी ,गीता सब आगे आगे।


" धंस गयल, अटक गयल ,सटक गयल हो ,

रजउ , धंस गयल, अटक गयल ,सटक गयल हो ,"


मेले में से नौटंकी के गाने की आवाज आई , और चंदा ने मुझे चिढ़ाते ,मेरे कान में फुसफुसा के बोला ,

" कहो , धँसल की ना ?"

" जाके धँसाने वाले से पूछो न। " उसी टोन में मैंने आँखे नचा के पीछे आ रहे , अजय की ओर इशारा कर के बोला।

" सच में जाके पूछूं उससे ,मेरी सहेली शिकायत कर रही है ,क्यों नहीं धँसाया। " चंदा बड़ी शोख अदा से सच में , पीछे मुड़ के वो अजय की ओर बढ़ी।

" तेरी तो मैं , … " कह के मैंने उसकी लम्बी चोटी का परांदा पकड़ के खींच लिया और मेरा एक मुक्का उसकी गोरी खुली पीठ पे।

चंदा भी , मुड़के मेरे कान में हंस के हलके से बोली , " जब धँसायेगा न तो जान निकल जायेगी ,बहुत दर्द होता है जानू,… "

" होने दे यार ,कभी न कभी तो दर्द होना ही है।" एक बेपरवाह अदा से गाल पे आई एक लट को झटक के मैं बोली।

चांदनी भी उस समय बादलों के कैद से आजाद हो गयीं थी।
अमराई से हलकी हलकी बयार चल रही थी।

और पूरबी ने जैसे मेरी चंदा की बात चीत सुन ली और एक गाना छेड़ दिया , साथ में गीता और कजरी भी।


तानी धीरे धीरे डाला ,बड़ा दुखाला रजऊ ,

तानी धीरे धीरे डाला ,बड़ा दुखाला रजऊ ,

सुबह से ये गाना मैंने मेले में कितनी बार सूना था , तो अगली लाइन मैंने भी मस्ती में जोड़ दी।


बचपन में कान छिदायल ,तनिक भरे का छेद

मत पहिरावा हमका बाला , बड़ा दुखाला रजउ।
,
मस्त जोबनवा चोली धयला ,गाल तो कयला लाल ,

गिरी लवंगिया , बाला टूटल , बहुत कईला बेहाल।


और फिर पूरबी , कजरी ,सब ने आगे की लाइने जोड़ी

अरे अपनी गोंदिया में बैठाला ,बड़ा दुखाला रजऊ।

तानी धीरे धीरे डाला ,बड़ा दुखाला रजऊ ,

लौटते समय लड़कियां ज्यादा जोश में हो गयी थी।

एक तो अँधेरे में कुछ दिख नहीं रहा था साफ साफ ,कौन गा रहा है , सिरफ परछाइयाँ दिख रही थीं। हवा तेज चल रही थी। दूसरे मेले की मस्ती के बाद हम सब भी काफी खुल गए थे

सब कुछ तो ले लेहला गाल जिन काटा ,कजरी ने शुरू किया। वो सब काफी आगे निकल गयी थीं।

पीछे से मैंने भी साथ दिया , लेकिन मुझे लगा ,चंदा शायद , और मैंने बाएं और देखा तो , वास्तव में वो नहीं थीं।

तब तक मुझे गाल पे किसी की अँगुलियों का अहसास हुआ और कान में किसी ने बोला ,

" ऐसा मालपूआ गाल होगा तो , न काटना जुल्म है। "

अजय पता नहीं कब से मेरे बगल में चल रहा था लेकिन गाने की मस्ती में ,

मेरे बिना कुछ पूछे उसने पीछे इशारा किया ,

एक घनी अमराई में , दो परछाइयाँ ,लिपटी, चंदा और सुनील।

सुनील के घर का रास्ता यहाँ से अलग होता था।

बाकी लड़कियों भी एक एक करके ,

कुछ देर में में सिर्फ मैं अजय और चंदा रह गए , मैं बीच में और वो दोनों ओर , फिर चंदा की छेड़ती हुई बातें।


चंदा एक पल के लिए रुक गयी , किसी काम से।

चंदा एक पल के लिए रुक गयी , किसी काम से।
अजय का घर भाभी के घर से सटा हुआ ही था।


जब वो मुड़ने लगा तो हँसकर मैंने कहा- “आज तुमने मुझे जूठा कर दिया…”

शैतानी से मेरी जांघों के बीच घूरता हुआ वो बोला- “अभी कहां, अभी तो अच्छी तरह हर जगह जूठा करना बाकी है…”

मैंने भी जोबन उभारकर, आँख नचाते हुए कहा- “तो कर ले ना, मना किसने किया है…”
"और मान लो मना कर दो तो" वो बोला।


अजय भी अब एकदम ढीठ हो गया था ,खुल के मेरी आँखों में आँखे डाल के बोल रहा था। घर से रौशनी छन छन के आ रही थी।



" तो मत मानना ,.... । कोई जरूरी है तुम हर बात मानों मेरी। " हिम्मत कर के मैं बोली और तब तक चंदा आगयी थी उसके साथ घर में घुस गयी।

चन्दा घर जाने की जिद करने लगी और मुझसे कहने लगी की, मैं भी उसके साथ चलूं। मुझे भी उससे कुछ सामान लेना था, गानों की कापी , जिसमें सोहर ,बन्ना , से लेकर गारी तक। लेकिन मैं अकेले कैसे लौटती, ये सवाल था।

तभी अजय दरवाजे पे नजर गया।

चन्दा ने उससे बिनती की- “अजय चलो ना जरा मुझे घर तक छोड़ दो…”
पर अजय ने मुँह बनाया और कहने लगा कि उसे कुछ जरूरी काम है।

मैंने बहुत प्यार से कहा- “मैं भी चल रही हूँ और फिर मैं अकेले कैसे लौटूंगी, चलो ना…”
खुशी की लहर उसके चेहरे को दौड़ गयी- “हां, एकदम चलो ना मैं तो आया ही इसीलिये था…”


चम्पा भाभी, जो मेरी भाभी के साथ किसी और काम में व्यस्त थीं, ने भी उससे कहा कि वह हमारे साथ चल चले। भाभी ने मुझसे कहा कि सब लोग पड़ोस में रतजगे में जायेंगे इसलिये मैं जब लौटूं तो पीछे वाले दरवाजे से लौटूं और बसंती रहेगी वह दरवाजा खोल देगी।


हम तीनों चन्दा के घर के लिये चल दिये। चन्दा ने अजय को छेड़ा-

“अच्छा, मैं कह रही थी तो जनाब के पास टाइम नहीं था, और एक बार इसने कहा…”


“आखिर ये मेरा माल जो है…” और अजय ने मुझे कस के पकड़ लिया।

और मैंने भी उसकी बांहो में सिमटते हुए, चन्दा को छेड़ा- “मुझे कहीं कुछ जलने की महक आ रही है…”
चन्दा बोली- “लौटते हुए लगता है इस माल का उद्घाटन हो जायेगा, डरना मत मेरी बिन्नो…”
“यहां डरता कौन है…” जोबन उभारकर मैंने कहा।

चन्दा के यहां से हम जल्दी ही लौट आये। रात अच्छी तरह हो गयी थी। चारों ओर, घने बादल उमड़ घुमड़ रहे थे। तेज हवा सांय-सांय चल रही थी। बड़े-बड़े पेड़ हवा में झूम रहे थे, बड़ी मुश्किल से रास्ता दिख रहा था।


मैंने कस के अजय की कलाई पकड़ रखी थी। पता नहीं अजय किधर से ले जा रहा था कि रास्ता लंबा लग रहा था। एक बार तेजी से बिजली कड़की तो मैंने उसे कस के पकड़ लिया।


हम लोग उस अमराई के पास आ आ गये थे जहां कल हम लोग झूला झूलने गये थे। हल्की-हल्की बूंदे पड़नी शुरू हो गयी थीं।


अजय ने कहा- “चलो बाग में चल चलते हैं, लगता है तेज बारिश होने वाली है…” और उसके कहते ही मुसलाधार बारिश शुरू हो गयी। मेरी साड़ी, चोली अच्छी तरह मेरे बदन से चिपक गये थे। 
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