Hindi Sex Kahaniya काँच की हवेली
07-25-2018, 11:12 AM,
#21
RE: Hindi Sex Kahaniya काँच की हवेली
अपडेट 21



कुच्छ देर कल्लू खड़े खड़े उन्हे देखता रहा फिर सुगना के निकट गया, जो सभी के हँसी में शामिल हुआ ये भूल गया था कि उसने कल्लू को अपने घर बुलाया है और वो कब का आया हुआ है. - "काका...आपने मुझे बुलाया था?"

कल्लू की बात से सुगना के साथ साथ सभी का ध्यान उसकी ओर गया.

"अरे कल्लू तुम कब आए?" सुगना चौंकते हुए बोला.

"मैं निक्की जी के साथ साथ ही आया हूँ काका." कल्लू ने जवाब दिया.

"माफ़ करना कल्लू, मैं तुम्हे देख नही पाया था." सुगना झेन्प्ते हुए बोला - "पर तुम्हे हुआ क्या है? तुम शॉल ओढकर क्यों आए हो. तबीयत तो ठीक है तुम्हारी?"

सुगना की बात सुनकर चिंटू और शांता की हँसी छूट गयी. कंचन ने चिंटू को इस बात पर हल्की सी चपत लगाई और कल्लू को देखने लगी.

"थोड़ी सी बुखार है काका. सुबह तक उतर जाएगी." कल्लू ने बताया - "आप बताओ काका....मुझे क्यों बुलाया था?"

"मुखिया जी से पता चला तुम कल खाद लेने नगर जा रहे हो. सोचा था एक बोरी खाद अपने लिए भी मग़वा लूँ." सुगना ने उत्तर दिया. - "पर अब तुम बीमार हो तो जाओगे कैसे?"

"सुबह तक ठीक हो जाएगी." कल्लू ने जवाब दिया. - "कल निकलने से पहले आपसे मिल लूँगा. अब इज़ाज़त दीजिए."

"ठहरो.....कुच्छ देर बैठो. एक गिलास गरम दूध हल्दी डाल के देता हूँ....पीलो, सुबह तक बुखार उतर जाएगा." सुगना ने उसे रोकते हुए कहा. फिर कंचन को दूध गरम करने को बोला.

कुच्छ ही देर में कंचन ने गरम दूध का गिलास उसे पकड़ाया. कंचन के हाथ से गिलास लेते हुए कल्लू का हाथ ज़ोर से काँपा. एक मीठा सा दर्द उसके सीने में हुआ. इस एहसास से की कंचन उसे दूध का गिलास पकड़ा रही है....वो बुखार में होने के बाद भी रोमांचित हो उठा. उसने एक नज़र उठाकर कंचन के चेहरे को देखा फिर उसके हाथ से गिलास ले लिया.
दूध पीने तक कंचन वहीं उसके पास खड़ी रही. वो धीरे धीरे दूध को अपने हलक के नीचे उतारने के बाद खाली गिलास कंचन को पकड़ाया. दूध पीने के बाद उसकी इच्छा कुच्छ देर और वहाँ बैठने की हो रही थी. वो कुच्छ देर और कंचन को देखना चाहता था. पर घर के लोग उसे ग़लत ना समझे ये सोचकर वो उठ खड़ा हुआ. फिर सुगना से सुबह मिलने की बात कहकर बाहर निकल गया.

निक्की कुच्छ लगभग घंटा भर कंचन के घर रहने के बाद हवेली लौट आई. जब वो हवेली से निकली थी तब बेहद तनाव में थी किंतु जब वो कंचन के घर से निकली तो हर तनाव से दूर थी. जब हवेली पहुँची तब डिनर के लिए नौकरों ने खाना सज़ा दिया था. ठाकुर साहब सोफे पर बैठे उसका इंतेज़ार कर रहे थे.

निक्की के हॉल में कदम रखते ही ठाकुर साहब ने पुछा - "इस वक़्त कहाँ से आ रही हो निक्की? क्या कंचन के घर गयी थी."

"हां पापा." निक्की मुस्कुराती हुई बोली और अपनी बाहों का हार उनके गले में डाल दिया.

"तुम्हारे चेहरे की खुशी देखकर ही मैं समझ गया था, तुम कंचन के घर से आ रही हो." ठाकुर साहब उसके गाल सहलाते हुए बोले - "सब ठीक तो है वहाँ?"

"हां.....सभी ठीक हैं, शांता बुआ भी ठीक है सुगना काका की तबिया भी अच्छी है. कुच्छ भी नही बदला जैसे में 6 साल पहले देखकर गयी थी सब वैसे ही हैं." निक्की एक एक करके सबकी हाल बताने लगी - "बस चिंटू बदल गया है. पहले उसके नाक से पानी बहता रहता था और हकला के बोलता था अब तो किसी को बोलने नही देता." ये कहकर निक्की चुप हुई.

"चलो अच्छा किया तुम उनसे मिल आई." ठाकुर साहब प्यार से बोले - "आओ अब बाकी की बातें खाने के टेबल पर करेंगे."

निक्की मुस्कुराती हुई डाइनिंग टेबल की ओर बढ़ गयी. फिर अपनी कुर्शी खींचकर उसपर बैठ गयी.

"संजय" ठाकुर साहब ने पास ही खड़े एक नौकर से बोले - "रवि को बुला लाओ. उससे कहो हम खाने की मेज पर उनका इंतेज़ार कर रहे हैं."

"जी मालिक." संजय बोला और रवि के कमरे की तरफ बढ़ गया.

कुच्छ ही देर में रवि सीढ़ियाँ उतरता दिखाई दिया. उसने खाने की मेज के पास आकर मुस्कुराते हुए ठाकुर साहब को प्रणाम किया फिर एक नज़र निक्की पर डालकर उसे हेलो बोलते हुए अपनी कुर्शी खिच कर बैठ गया.

निक्की की इच्छा तो नही हो रही थी कि उसके हेलो का जवाब दे. पर ठाकुर साहब की मौजूदगी का ख्याल करके उसे ज़बरदस्ती हेलो कहना पड़ा.

नौकरों के द्वारा खाने को प्लेट्स में निकालने के बाद तीनो लोग खाने में व्यस्त हो गये. ठाकुर साहब तो बस नाम मात्र के खा रहे थे. किंतु रवि खाने के मामले में कोई समझौता नही करता था.

"आपका यहाँ मन तो लग रहा है ना रवि?" ठाकुर साहब खाने के मध्य में रवि से मुखातीब हुए.

रवि ने थाली से नज़र हटाकर ठाकुर साहब को देखा फिर मुस्कुरकर बोला - "मन क्यों नही लगेगा ठाकुर साहब. यहाँ का वातावरण तो किसी का भी मन मोह लेगा. ये जगह प्राकृतिक सुंदरता से रंगा हुआ है. और मैं प्राकृतक प्रेमी हूँ." ये कहने के बाद रवि ने निक्की की ओर देखा. फिर आगे बोला - "मुझे शहर की बनावटी सुंदरता से कहीं अधिक गाओं की नॅचुरल खूबसूरती अच्छी लगती है."

रवि की बात का अर्थ समझकर निक्की का चेहरा गुस्से से तमतमा गया. पर अपने पापा का ख्याल करके वो अपने गुस्से पर तेज़ी से नियंत्रण कर ली.

"ह्म्‍म्म.....आप ठीक कह रहे हैं." ठाकुर साहब ने रवि की बात पर सहमति जताते हुए बोले - "हमें भी ये जगह बहुत पसंद आई थी. इसीलिए हम यहीं आकर बस गये."

"तो क्या.....ये जगह आपके पुरखो की नही है?" रवि ने जिग्यासा पुछा.

"नही....!" ठाकुर साहब बोले - "हम बनारस के रहने वाले हैं. वहाँ अभी भी हमारे पुरखों की ज़मीनें हैं. हम यहाँ एक बार किसी काम से आए थे. हमें ये जगह अच्छी लगी और हमने यहाँ ज़मीन खरीद ली. फिर इस हवेली का निर्माण कराया." हवेली की बाबत बोलते हुए ठाकुर साहब का चेहरा उदास हो गया. पर रवि इसकी वजह नही जान पाया. और ना ही निक्की.

रवि के मन में एक बार आया कि वो इसका कारण पुच्छे पर इस समय ये पुछ्ना उसे उचित नही लगा. खाने के मध्य में किसी को कष्ट पहुचाने वाली बाते नही पुच्छनी चाहिए. लेकिन रवि के मन में ऐसे काई सवाल थे जिनका जवाब सिर्फ़ ठाकुर साहब दे सकते थे. उसे राधा देवी की बीमारी के संबंध में भी जो बातें बताई गयी थी वो उसके गले नही उतर रही थी.

ठाकुर साहब ने उसे बताया था कि राधा जब प्रेग्नेंट थी तभी एक दिन वो सीढ़ियाँ उतरते वक़्त फिसल गयी थी. जिसकी वजह से राधा देवी को हॉस्पिटल ले जाया गया था.

उसी हॉस्पिटल में दीवान जी की पत्नी भी बच्चे की डेलिवरी के लिए भरती थी. और दुर्भाग्यवश उसी दिन दोनो की डेलिवरी भी हुई. उस दिन दीवान जी की पत्नी ने मुर्दा बच्ची को जन्म दिया. ये खबर लेकर जब नर्स हमारे पास आई और बच्चे के मरने की बात कही तो राधा को लगा कि उसके गिरने की वजह से उसकी बेटी मर गयी. बस उस बात को वो सह ना पाई और अपना मानसिक संतुलन खो बैठी.

वो अपने विचारों से बाहर निकला तो देखा कि निक्की उसे आश्चर्य से घुरे जा रही थी. उसने झेन्प्ते हुए अपनी दृष्टि खाने की थाली पर टिका दी.

कुच्छ देर बाद खाने की मेज से सभी उठ खड़े हुए और अपने अपने रूम की तरफ बढ़ गये.

*****

दिन के 11 बजे हैं. शांता नदी जाने की तैयारी कर रही है. इस वक़्त कंचन और चिंटू स्कूल गये हुए हैं. सुगना अपने खेतों में काम करने गया हुआ है. शांता अकेली घर में बैठी उकताने की बजाए नदी में जाकर नहाना ज़्यादा बेहतर समझी. उसने अपने पहनने के लिए कपड़े निकाले और बाहर से घर का ताला लगाकर नदी के रास्ते बढ़ गयी.

गाओं के सभी औरत मर्द नदी में ही नहाया करते थे. नदी में औरतो के लिए अलग घाट थी और मर्दों के लिए अलग. औरतों के घाट के तरफ मर्द नही जाते थे और मर्द के घाट की तरफ औरतें.

शांता अभी बस्ती से निकल कर कुच्छ ही दूर चली थी कि पिछे से किसी ने उसे नाम लेकर पुकारा - "अरी ओ शांता, ज़रा धीरे चलो.....मैं भी साथ आ रही हूँ."

शांता पिछे मूडी तो देखा सुंदरी तेज़ तेज़ चलती चली आ रही है.

"अरी आराम से भाभी. इतनी भी जल्दी क्या है. मैं खड़ी तो हूँ." सुंदरी के निकट आते ही शांता सुंदरी से बोली.

"अरी बहनी, तू नही जानती.....मैं अकेली होने से कितनी डरती हूँ." सुंदरी हाफ्ति हुई बोली. - "मैं कब से सोच रही थी नदी जाऊ, पर कोई साथी नही मिल रही थी. तुम्हे जाते देखी तो भागी भागी आई."

"भाभी अभी तो दिन है.....क्या दिन के उजाले में भी डरती हो?" शांता हंसते हुए बोली और धीरे धीर पग बढ़ने लगी.
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07-25-2018, 11:12 AM,
#22
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सुंदरी भी उसके कदम से कदम मिलाती हुई चलने लगी.

"मैं दिन या रात से नही अकेलेपन से डरती हूँ पगली." सुंदरी हंसते हुए बोली.

"मैं समझी नही भाभी, क्या कहना चाहती हो?" शांता थोड़ी हैरान होकर बोली.

"बहनी, तेरी मेरी तो एक जैसी कहानी है. फिर भी तू नही समझी?" सुंदरी आश्चर्य प्रकट करती हुई बोली.

"क्यों मेरा मज़ाक उड़ा रही हो भाभी?" सुंदरी के हँसते खेलते जीवन की तुलना अपनी बेरंग ज़िंदगी से किए जाने पर वह आहत होकर बोली - "सब कुच्छ तो है तुम्हारे पास. मुखिया दद्दा जैसा प्यार करने वाला पति है, बड़ा घर है तुम्हारे पास, अनिता जैसी सुंदर और सुशील बेटी पाई हो. और क्या चाहिए तुम्हे?"

"मैं भी वही कमी महसूस करती हूँ बहिन, जो तुम महसूस करती हो." सुंदरी अचानक से गंभीर होती हुई बोली - "हां बहिन, मेरे पास सब कुच्छ होते हुए भी कुच्छ नही है. पति हैं पर सिर्फ़ दिखाने के लिए और लोगों को बताने के लिए. बेटी है पर फिर भी बांझ कही जाती हूँ." ये कहते हुए सुंदरी सिसक पड़ी.

"तो किसी डॉक्टर के पास क्यों नही जाती." शांता भावुक होकर बोली.

"डॉक्टर क्या करेगा बहिन? जब बीज ही नही बोए जाएँगे तो फल कहाँ से आएगा."

"तो क्या दद्दा से...?" शांता बोलते बोलते रुकी.

"उनसे कुच्छ नही होता बहिन, वैसे तो गाओं भर में बहुत अकड़ कर चलते हैं, पर बिस्तर पर आते ही ढीले पड़ जाते हैं." सुंदरी अपने आँसू पोछती हुई बोली. - "मुझमे और तुम में बस इतना ही फ़र्क है कि मेरा पति मेरे साथ है और तुम्हारा पति तुमसे दूर.

"तो क्या शादी से अब तक तुम......?" शांता की आँखें नम हो गयी. उसके दुख में उसे अपने दुख की परच्छाई नज़र आई. -"तुम अब तक कैसे जीती रही भाभी?"

"ना....बहिन, मैं इतनी सहनशील औरत नही हूँ." सुंदरी शांता से बोली - "शादी के एक साल तक मैं सब सहती रही. लेकिन कब तक....? आख़िर कब तक अपनी देह जलाती? कब तक दूसरे की ग़लती की सज़ा खुद को देती? मैने अपने सुख का मार्ग बहुत जल्दी ढूँढ लिया. उन दिनो बिरजू को मुखिया जी ने नया नया काम पर रखा था. एक दिन उसे किसी बहाने घर के अंदर बुलाई और कर ली मनमानी. उस दिन से लेकर आज तक वही मेरी देह को ठंडक पहुँचा रहा है."

सुंदरी के इस रहस्योउद्घाटन से शांता हैरान रह गयी. उसके बढ़ते कदम धरती पर जाम गये. वो अपने मूह पर हाथ रखे सुंदरी को किसी अजूबे की तरह देखने लगी.

उसे हैरान परेशान सा देख सुंदरी के कदम भी थम गये. लेकिन उसके मन में कोई लज्जा भाव नही आया. वो धीरे से फीकी हँसी हँसी. फिर बोली - "और क्या करती मैं. मैं भला उनकी चिंता करती भी तो क्यों? जिन्होने मेरे दुख का सामान किया. क्या मेरे पिता ने मेरा विवाह करने से पहले ये सोचा कि इस रिश्ते से मेरी बेटी का जीवन सुखमय रहेगा या नही. क्या मेरे पति ने कभी ये सोचा कि वो अपने से आधी उमर की लड़की को पत्नी बनाकर उसे सुखी रख पाएँगे या नही.

नही सखी, ना तो मेरे पिता ने मेरे सुख का सोचा ना मेरे पति ने. पिता को सर का बोझ उतारना था सो उतार लिए. पति को नयी नवेली दुल्हन मिली स्वीकार कर लिए.

ज़रा सोचो बहिन, अगर कोई 35 साल की औरत किसी 20 साल के लड़के से विवाह करे तो लोग कहेंगे की कैसी औरत है इस उमर में चुदने चली है. कोई वेश्या ही ऐसी घृणित कार्य करेगी, ये औरत नही औरत के नाम पर कलंक है, ऐसी औरत के साए से दूर रहना चाहिए. लेकिन यही काम कोई मर्द करे तब लोग कहते हैं वाह क्या मर्द है इस उमर में भी जवान बीवी ले आया है.
तब समाज में उसकी प्रतिष्ठा और बढ़ जाती है, बिस्तर में बीवी चाहें अंगारों पर लेट,ती हो. पर यें बाहर अपनी मूच्छे उँची करके घूमते हैं.

ज़रा अपने बारे में सोच....! तेरा पति तुम्हे छोड़ गया है, वहाँ ना जाने क्या क्या करता होगा. कभी किसी लड़की के साथ सोता होगा तो कभी किसी के साथ. और भी ना जाने कितने बुरे ऐब पाले होंगे वहाँ.
पर जिस दिन वो लौट के आएगा. ना तो तुम ये पुछोगि कि इतने दिन तुम किसके साथ सोए किसके साथ जागे. और ना ये समाज पुछेगा. लेकिन यही काम अगर तू करेगी तो हज़ार मूह एक साथ सवाल करेंगे. पति धक्के मार कर घर से बाहर निकाल देगा. सारे समाज में तुम्हारी थू थू हो जाएगी. क्योंकि तुम औरत हो."

शांता कुछ ना बोली. वह खामोशी से सुंदरी की बातों को सच्चाई की तराजू पर तौलती रही. सुंदरी के मूह से निकले एक एक बात में सच्चाई छीपि हुई थी. उसे सुंदरी से सहानुभूति हो हो चली थी.

"बोल बहनी, जो मैं झूठ बोलती हूँ तो अपनी चप्पल मेरे सर पर दे मारो." सुंदरी उसे खामोश देख आगे बोली - "मैने तो इन मर्दों की परवाह करना बंद कर दिया है. अब परिणाम जो भी हो मुझे फिक़र नही. मैं तो अपनी ज़िंदगी जी रही हूँ और ऐसे ही जियूंगी."

"पर भाभी औरत की कुच्छ मर्यादायें भी तो होती है?" शांता ने मन में उठते प्रश्न को सुंदरी के सामने रखा.

"ये भी मर्दों के बनाए हुए हैं." सुंदरी जवाब में बोली - "बहनी, हमारी विवशता यह है कि हमें मर्दों ने इतना डरा रखा है कि हम अपनी खुशी कम और उनके सम्मान की ज़्यादा सोचते हैं. सच पुछो तो हम अपने लिए जीते ही नही हैं. हमारी खुशी भी उनकी मर्ज़ी की दास है और हमारा मान सम्मान भी उनकी जागीर है. हमारा अपना कुच्छ है ही नही. ना ये समाज ना ये घर.....! हम केवल वस्तु हैं. जब जिसकी मर्ज़ी हुई उपयोग कर लिया.

मैं सच कहती हूँ बहनी, आज मेरे दिल में मुखिया जी से कहीं ज़्यादा बिरजू के लिए सम्मान है. क्योंकि मुझे अब तक जितनी भी खुशी मिली है बिरजू से मिली है, पति से सिर्फ़ दुख और झिड़की के कुच्छ ना मिला है. मैं तो कहती हूँ तू भी किसी का हाथ पकड़ ले. क्यों अपनी जवानी गला रही है? अभी भी तुझमे बहुत आकर्षण बाकी है, किसी भी मर्द का मन हिला सकती है"

"ना भाभी." सुंदरी की बात से शांता घबराकर बोली - "मुझसे ये सब ना होगा. अब थोड़ी से ज़िंदगी बची है कैसे भी काट लूँगी."

"शांता क्यों अपनी जवानी बर्बाद कर रही है उस शराबी के इंतेज़ार में. छोड़ दे उसका इंतेज़ार और थाम ले किसी का हाथ, मैं तुम्हे दूसरा विवाह करने की बात नही कह रही हूँ, सिर्फ़ किसी की बाहों में सिमट कर सुख भोगने की बात कर रही हूँ. सच बता क्या तेरा मन नही करता कि तुझे कोई प्यार करे, तेरे इन खूबसूरत होंठों का रस पीए, कोई तेरे इन नाज़ुक अंगो पर हाथ धरे" ये कहते हुए सुंदरी ने अपने एक हाथ से उसके बूब्स दबा दिए.

"भाभी.....ये क्या कर रही हो?" शांता चिहुन्क कर पीछे हटी. सुंदरी के छुने से उसके पूरे बदन में एक सनसनाहट सी भर गयी. उसकी आँखें उत्तेजना में भारी हो गयी थी. वह काँपते होंठों से शांता से बोली - "मेरे सोए अरमान ना जगाओ भाभी, मैं बदनामी से डरती हूँ. मुझसे वो सब ना होगा जो तुम कर लेती हो."


"बहनी, क्यों एक दिन की बदनामी के डर से अपनी सारी ज़िंदगी को जहन्नुम बनाती हो. अभी तुम्हारी उमर ही कितनी हुई है? तू अभी भी खूब मज़े ले सकती है. छोड़ दे दुनिया की परवाह.....जी ले अपनी ज़िंदगी. तू कहे तो मैं तेरी मदद कर दूँ. बिरजू बहुत दमदार मर्द है. उसका मर्दाना अंग बहुत शानदार है." सुंदरी ने एक आ भरी फिर बोली - "ज़ालिम क्या रगड़ता है बिस्तर पर, सखी सच कहती हूँ, जब वो देह पर चढ़कर उच्छलता है तो मैं संसार को भूल जाती हूँ. एक बार तू उसकी सेवा लेकर देख....फिर देख वो कैसे तेरी सालों की प्यास बुझता है."

शांता की आँखें नशे में लाल हो गयी. बदन में वासना लहू बनकर दौड़ उठा. शरीर इतना गरमाया कि उसकी योनि गीली हो गयी. सुंदरी की बातों से एक बार उसके विचारों में बिरजू का मजबूत शरीर घूम गया. उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे कुच्छ देर पहले जिस बूब्स को सुंदरी ने दबाया था अब उसी बूब्स पर बिरजू के हाथ रेंग रहे हों. इस एहसास से उसके विचार और गहराए.....अब उसे लगने लगा जैसे बिरजू के हाथ उसके समस्त शरीर को छु रहे हों, उसे कभी अपने बूब्स पर बिरजू के कठोर हाथों का स्पर्श महसूस होता तो कभी अपने नितंबो पर उसके हाथों की थपकी. तो कभी उसे ये लगता कि बिरजू उसे अपनी बाहों में जकड़े हुए उसके होंठो को चूस रहा है.
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07-25-2018, 11:14 AM,
#23
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शांता ने लाख प्रयास किए कि वह अपने दिमाग़ में आते बिरजू के विचारों को झटक दे. पर बिरजू उसके मस्तिष्क पर हावी होता जा रहा था.

शांता ने अपनी भारी होती पलकों को खोलकर सुंदरी पर निगाह डाली. वो हौले हौले मुस्कुरा रही थी.

"क्या हुआ बहिन, तू एकदम से चुप क्यों हो गयी." सुंदरी शांता के चेहरे पर बदलते भाव को देखती हुई बोली.

"कुच्छ नही भाभी." शांता धीरे से बोली और काँपते पैरों से नदी की ओर बढ़ गयी.

सुंदरी भी उसके बराबर चलती हुई नदी की ओर बढ़ती रही. कुच्छ ही देर में दोनो नदी पहुँच गयी. रास्ते भर सुंदरी शांता से उसी संबंध में बाते करती रही, और उसके सोए अरमान जगाती रही. किंतु नदी तक पहुँचते ही उसे चुप हो जाना पड़ा. क्योंकि नदी में पहले से कुच्छ औरतें मौजूद थी. और वो नही चाहती थी कि उसकी बातें कोई और भी सुने.

सुंदरी तो चुप हो गयी पर शांता के दिल में तूफान जगा गयी. जिस आग को शांता 10 सालों से दबा रखी थी, आज उसे सुंदरी ने हवा दे दी थी. शांता का मन अशांत हो चुका था. वो नहाते वक़्त भी सुंदरी की बातों पर विचार करती रही.

*****

ठाकुर जगत सिंग अपने कमरे में बैठे दीवान जी की राह देख रहे थे. उन्होने 5 मिनिट पहले मंगलू को उनके निवास पर बुलाने हेतु भेजा था. उनके चेहरे से बेचैनी झलक रही थी पर चिंता नाम मात्र की भी नही थी. वो कुर्सी से उठे और सिगार जलाकर खिड़की के पास खड़े हो गये और बाहर का नज़ारा देखने लगे.

उन्होने अभी सिगार का एक लंबा कस लिया ही था कि दरवाज़े से दीवान जी अंदर परविष्ट हुए. कदमों की आहट से ठाकुर साहब पलटे. दीवान जी पर नज़र पड़ी तो वापस अपनी कुर्सी पर आकर बैठ गये.

दीवान जी अभी भी खड़े थे. ठाकुर साहब के कुर्सी पर बैठते ही दीवान जी उनसे बोले - "कोई चिंता सरकार?"

"नही दीवान जी. ईश्वर की कृपा से जब से रवि आया है तब से सब कुच्छ ठीक होता रहा है. हम एक अच्छे और महत्वपूर्ण विषय पर आपके साथ बात करना चाहते हैं."

दीवान जी खड़े खड़े सवालिया नज़रों से ठाकुर साहब को देखते रहे. उनके समझ में कुच्छ भी ना आया था.

"आप बैठ जाइए." ठाकुर साहब दीवान जी को कुर्सी की ओर इशारा करके बैठने को बोले.

दीवान जी पास पड़ी कुर्सी को अपनी ओर खींचकर बैठ गये. - "आगे बोलिए सरकार. मेरे लायक जो भी सेवा हो आदेश दीजिए."

"आदेश नही दीवान जी हम आपकी राई जान'ना चाहते हैं." ठाकुर साहब सिगार का अंतिम कश लेकर उसे स्ट्रॉ में बुझाते हुए बोले - "आपको रवि कैसा लगता है?"

"रवि." दीवान जी चौंककर बोले - "आप किस संबंध में पुच्छ रहे हैं?"

"निक्की के संबंध में." ठाकुर साहब अपने मन की बात दीवान जी के सामने प्रकट किए - "हमारी निक्की के लिए रवि कैसा रहेगा? हमें उसके घर संपाति से कोई लेना देना नही, वो डॉक्टर है और अच्छे विचार रखता है. हमारे लिए यही काफ़ी है."

"सरकार, आप तो मेरे मन की बात ताड़ गये." दीवान जी खुशी से चहक कर बोले - "मुझे तो रवि उसी दिन भा गया था जब मैं उनसे देल्ही में मिला था. निकी और रवि की जोड़ी तो लाखों में एक रहेगी. बिल्कुल देर ना करें. आज ही इस संबंध में रवि से बात कर लें."

"ठीक है आज शाम को ही रवि और निक्की को बिठाकर दोनो की मर्ज़ी जान लेते हैं." ठाकुर साहब फिर से सिगार की तरफ हाथ बढ़ाते हुए बोले.

"जो आग्या." दीवान जी उठते हुए बोले.

फिर ठाकुर साहब से इज़ाज़त लेकर दरवाज़े बाहर निकले. दरवाज़े से बाहर कदम रखते ही उनकी नज़र निक्की से टकराई. वो दरवाज़े के बाहर खड़ी दीवान जी और ठाकुर साहब की बातें सुन रही थी.

वो किसी काम से ठाकुर साहब के पास आ रही थी जब दरवाज़े के बाहर से अपने और रवि के संबंध में ठाकुर साहब के मूह से कुच्छ कहते सुनकर दरवाज़े के बाहर ठिठक गयी थी. फिर कुच्छ देर उसी अवस्था में रहकर उसने सारी बातें सुन ली थी. अब जब दीवान जी ने उसे खड़े देख लिया था तो वो एकदम से शर्मा गयी और तेज़ी से अपने कमरे की ओर भाग गयी.

दीवान जी को ये समझते देर नही लगी कि निक्की इस रिश्ते के लिए राज़ी है. वो मुस्कुराते हुए अपने रास्ते बढ़ गये.

*****

निक्की सीधा अपने कमरे में आकर बिस्तर पर गिरी. फिर एक लंबी साँस छोड़ने के बाद अपने पापा और दीवान जी के मूह से सुनी बातें याद करने लगी. वो खुश थी, लेकिन उसे ये समझ में नही आ रहा था कि वो खुश क्यों है? जिस इंसान से वो अपने तिरस्कार का बदला लेना चाहती थी उसी इंसान के साथ अपने विवाह की बात सुनकर उसका मन इतना प्रसन्न क्यो हो रहा है? वह तो रवि को नीचा दिखाना चाहती थी, फिर आज क्यों उसे अपनी माँग में सजाने की सोच रही है? शायद ये रवि की अच्छाई थी जिसने निक्की के मन से सारा मैल निकाल दिया था. निक्की का मन ये जान चुका था कि रवि लाखों में एक है. जो इंसान उसके नग्न शरीर को त्याग दे वो कोई साधारण इंसान हो ही नही सकता. रवि की यही अच्छाई उसकी खुशी का कारण था. वो इस बात से आनंद महसूस कर रही थी कि रवि जैसा सभ्य पुरुष उसका पति होने वाला है.

निक्की अपने ख्यालो में रवि को बसा कर मन ही मन मुस्कुराइ फिर मन में बोली - "अब कहो मिस्टर रवि, अब मुझसे भाग कर कहाँ जाओगे? अब ऐसे बंधन में बाँधने वाली हूँ कि ज़िंदगी भर मेरे साथ रहना पड़ेगा. फिर देखना कैसे बदला लेती हूँ तुमसे. बहुत सताया है तुमने मुझे.....अब मैं सताउन्गि तुम्हे."

अगले ही पल उसके मन में विचार आया क्यों ना वो अभी उसके कमरे में जाकर उसे इस रिश्ते की बात बताए. उसे छेड़ उसे परेशान करें.

वो मुस्कुराती हुई उठी और अपने कमरे से बाहर निकल गयी. फिर अपने कददम रवि के कमरे की तरफ बढ़ाती चली गयी. कुच्छ ही देर में वो रवि के कमरे के बाहर खड़ी थी. अभी वो दरवाज़े पर दस्तक देना ही चाहती थी की उसकी नज़र दरवाज़े की कुण्डी पर गयी जो बाहर से बंद थी.

दरवाज़ा बंद देख निक्की के माथे पर शिकन उभरी. उसने अपनी घड़ी में समय देखा. इस वक़्त 5 बजे थे. वो कुच्छ देर खड़ी सोचती रही फिर सीढ़ियों से उतरती हुई हॉल में आई. उसने एक नौकर से रवि के बारे में पुछा तो पता चला कि वो अपनी बाइक से कहीं गया हुआ है.
निक्की सोच में पड़ गयी. कुच्छ दिनो से वह नोटीस कर रही थी कि रवि शाम को अक्सर हवेली से बाहर जाने लगा है. लेकिन वो कहाँ जाता था क्यों जाता था इस बात को जानने का प्रयास उसने कभी नही किया था. पर जाने क्यूँ आज उसके मन में एक अंजानी सी शंका घर करती जा रही थी.

वह बेचैनी से हॉल में टहलती हुई एक ही बात सोचती जा रही थी - 'कहीं रवि का किसी लड़की के साथ कोई चक्कर तो नही चल रहा है? लेकिन उसे ऐसा करने की ज़रूरत ही क्या है. अगर वो सच में औरत की कमी महसूस करता होता तो वो मेरे पास आता. मैं तो उसके लिए हर घड़ी उपलब्ध थी. मुझे ठुकराकर उसे कहीं और भटकने की ज़रूरत क्या है?

"कुच्छ भी हो सकता है निक्की." उसके मन ने धीरे से सरगोशी की - "मिज़ाज़ और मौसम के बदलते देर नही लगती. तू इस तरह आँख मुन्दे पड़ी रहेगी तो ऐसा ना हो कि पक्षी दाना कहीं और चुग जाए. तुम्हे सच्चाई का पता लगाना ही होगा कि वो शाम को कहाँ जाता है? कहीं ऐसा ना हो कि वो तेरे सामने साधु का ढोंग करता हो और बाहर भँवरा बनकर गाओं के फूलों का रस चूस्ता फिरता हो."

इस विचार के साथ ही निक्की का चेहरा सख़्त हो उठा. वह तेज़ी से हवेली से बाहर निकली. फिर अपनी जीप में बैठ कर जीप को घाटियों की ओर भागती चली गयी.
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07-25-2018, 11:14 AM,
#24
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अपडेट 24

रवि पिछ्ले 25 मिनिट से झरने के निकट पत्थरों पर बैठा कंचन का इंतेज़ार कर रहा था.

कल वो इसी जगह मिलने की बात कहकर गयी थी. पर रवि को इंतेज़ार करते लगभग आधा घंटा बीत जाने के बाद भी वो अभी तक नही आई थी.

रवि उल्लू की तरह गिरते झरने को टकटकी लगाए घुरे जा रहा था. उसके मानस्पटल पर कभी रोमीयो, कभी फरहाद तो कभी मजनू और रांझा की अनदेखी ताश्वीरें घूम रही थी. इसलिए नही की वो अपनी तुलना उन महान प्रेमियों से कर रहा था, बल्कि इसलिए की आज सही मायने में उनके दर्द का एहसास उसे हुआ था.

आज उसने जाना था कि जुदाई क्या होती हा?, तन्हाई में बैठकर अपने सनम का इंतेज़ार करना क्या होता है? आज वो ये जान गया था कि क्यों प्यार करने वाले अपने कपड़े फाड़ लेते हैं?. क्यों पागलों की तरह गलियों में घूमते हैं? क्यों तन्हाई में बैठकर पत्थरों पर सर पटकते हैं?

क्योंकि आज उसे भी प्यार हो गया था. आज उसे भी किसी का इंतेज़ार करना पड़ रहा था.

उसने आज से पहले किताबों में, फिल्मों में और दोस्तों से इन महान प्रेमियों के बारे में बहुत कुच्छ देखा सुना और पढ़ा था. लेकिन कभी उनके सच्चे प्यार की तड़प को महसूस नही कर सका था. उसे महसूस होता भी तो कैसे? बिना जले जैसे जलन का ग्यान नही होता. वैसे ही बिना प्यार किए प्यार की तड़प का एहसाह नही होता. इस बात पर किसी शायर ने कहा है.

"वही महसूस करते हैं खलिश दर्द ए मोहब्बत की.
जो अपने से बढ़कर किसी को प्यार करते हैं."

आज उसे भी उस दर्द से दो चार होना पड़ गया था. वो पत्थरों पर बैठा कभी अपने बाल नोच रहा था तो कभी झुँझलाकर पिछे देखता जा रहा था.

इस बार भी वो झंझलाहट से भरकर अपनी गर्दन जैसे ही पिछे घुमाया उसकी आँखें खुशी से चमक उठी. उसे कंचन गिरती पड़ती पत्थरों से बचती बचाती अपनी औउर आती दिखाई दी. वो खुशी से पत्थरों पर खड़ा हो गया और कंचन को देखने लगा.

कंचन नीले रंग की सलवार कमीज़ पहनी हुई थी. उन कपड़ों में बहुत सुंदर लग रही थी. दुपट्टा गले से लिपटकर पिछे झूल रहा था. टाइट कुरती में उसके पर्वत शिखर अपनी आकर में साफ़ दिखाई पड़ रहे थे.

कंचन हाफ्ति हुई रवि के पास आकर खड़ी हो गयी. फिर रवि को देखकर धीरे से मुस्कुराइ.

"क्या टाइम हो रहा है?" रवि ने अपनी कलाई में बँधी घड़ी कंचन को दिखाते हुए पूछा. - "पिछ्ले आधे घंटे से पागलों की तरह यहाँ बैठा तुम्हारा इंतेज़ार कर रहा हूँ. तुम्हे तो मेरी कोई फिक़र ही नही है. क्या यही प्यार है तुम्हारा." रवि के शब्दों में ना चाहते हुए भी क्रोध समा गया था.

कंचन रवि के मूह से निकले कठोर शब्दों से सहम गयी. उसने सोचा भी नही था कि यहाँ आते ही उसे अपने साजन से ऐसी झिड़की सुनने को मिलेगी. जब वो घर से निकली थी तब दिल में हज़ारों उमंगे थी, रास्ते भर चहकति हुई, मन में हज़ार अरमान सजाती हुई आई थी. पर यहाँ आते ही उसके मन में अरमानो के जितने भी फूल खिले थे वो सब एक झटके में मुरझा गये. वो धीमे स्वर में रवि से बोली -"ग़लती हो गयी साहेब. मुझे माफ़ कर दो. बुआ ने किसी काम से रोक लिया था." ये कहते हुए कंचन की गर्दन शर्मिंदगी से नीचे झुक गयी.

कंचन का उतरा हुआ चेहरा देखकर रवि को अपनी भूल का एहसाह हुआ. उसका सारा गुस्सा एक पल में गायब हो गया. उसका मन ये सोचकर ग्लानि से भर गया कि बिना कारण जाने उसने कंचन को डाँट पिला दी.

वह धीरे से कंचन के पास आया.

कंचन अब भी गर्दन झुकाए खड़ी थी.

उसने अपने हाथ से उसकी ठोडी को छुआ और उसका चेहरा उपर उठा लिया. कंचन की आँखें गीली हो चली थी. उसकी पलकों के बीच मोती जैसी दो बूंदे चमक उठी थी. उसकी आँखों में आँसू देखकर रवि खुद से झल्लाया. दिल में आया अपनी इस ग़लती पर अपना सर पत्थरों पर मार दे. उससे ऐसी नादानी हुई कैसे? वह उसकी आँखों से आँसू पोछ्ता हुआ बोला - "मुझे माफ़ कर दो कंचन, मैं आइन्दा तुमपर कभी गुस्सा नही करूँगा. प्रॉमिस. तुम चाहो तो मैं अपनी इस ग़लती के लिए कान पकड़कर उठक बैठक लगा सकता हूँ. पर प्लीज़ मुझे माफ़ कर दो और एक बार प्यार से मुस्कुरा दो."

रवि की इन बातों से कंचन सच में मुस्कुरा उठी. उसके अंदर की सारी पीड़ा क्षन्भर में दूर हो गयी. वह अपनी झिलमिलाती आँखों से रवि का चेहरा ताकने लगी. फिर याचनपूर्ण लहजे में बोली - "साहेब, मुझे कोई भी कष्ट दे देना, पर मुझसे कभी अलग मत होना. मैं आपके बगैर जी नही सकूँगी."

"तो क्या मैं जी सकूँगा तुम्हारे बगैर?" रवि ने ये कहते हुए उसके माथे को चूम लिया. - "आओ....वहाँ बैठते हैं."

रवि ने अपने बाईं और खड़े एक विशाल पेड़ की ओर इशारा किया फिर उसका हाथ पकड़कर उस और बढ़ता चला गया. पेड़ के नीचे एक बड़ा सा समतल पत्थर बिच्छा हुआ था. पत्थर इतना बड़ा था कि 3 आदमी आराम से सो सकते थे. पत्थेर से दो कदम आगे गहरी खाई थी. रवि पेड़ की जड़ से पीठ टिका कर बैठ गया. कंचन उससे थोड़ी आगे होकर बैठी और वहाँ से दूर तक फैली फूलों की घाटी को देखने लगी.

वैसे तो कंचन पहले भी इस खूबसूरती को देख चुकी थी. पर आज उसके देखने में अंतर था. आज उसे इन हसीन वादियों में प्यार का रंग घुला हुआ दिखाई पड़ रहा था. वह जिधर भी नज़र घुमाती सभी पेड़, पत्ते, पौधे, फूल उसे हँसते खिलखिलाते नज़र आ रहे थे.

सूरज क्षितिज की ओर बढ़ रहा था. वातावरण में लालिमा फैलती जा रही थी. सांझ की लालिमा से यह घाटी और भी सुंदर होती जा रही थी.

कंचन सब कुच्छ बिसार कर खोई हुई थी. उसे यह भी होश नही था कि उसके पिछे बैठा रवि उसे कब से एक टक देखे जा रहा है.

रवि भी उसके सुंदर मुखड़े को देखते हुए सब कुच्छ भुला बैठा था. तभी कंचन उसकी ओर पलटी.

रवि को यूँ अपनी ओर देखते पाकर उसकी आँखों में शर्म उभर आई. वो धीरे से शरमा कर बोली - "क्या देख रहे हो साहेब?"

"वही जो तुम देख रही हो." रवि ने उसके चेहरे पर अपनी निगाह जमाए हुए कहा.

"मैं तो इस घाटी की सुंदरता देख रही थी." कंचन मुस्कुराइ - "लेकिन आप तो....!" उसने बात अधूरी छोड़ दी और अपनी नज़रें नीची कर ली..

"तो मैने ग़लत क्या बोला है. मैं भी तो सुंदरता ही देख रहा था."

"धत्त....!" कंचन शरमाई.

"सच कहता हूँ कंचन. तुम्हारी जैसी सुंदर लड़की सारे संसार में ना होगी." रवि उसकी सुंदरता में खोता हुआ बोला.

"आप 1 नंबर के झूठे हैं." कंचन अपनी खूबसूरत आँखें रवि के चेहरे पर टिकाकर बोली - "मैं जानती हूँ मैं ज़्यादा सुंदर नही हूँ. मैं तो निक्की जितनी भी सुंदर नही हूँ. और शहर में तो मुझसे भी सुंदर - सुंदर लड़कियाँ रहती होंगी. कभी कभी मैं सोचती हूँ आप शहर जाकर मुझे भूल तो नही जाएँगे."

"आहह....ये तुमने क्या कह दिया कंचन? तुम्हे ऐसा क्यों लगता है कि मैं तुम्हे छोड़ दूँगा?" रवि खिसक कर उसके समीप जाता हुआ बोला - "क्या तुम्हे मुझपर भरोसा नही है? यदि ऐसा है तो फिर मैं तब तक शहर नही जाउन्गा. जब तक तुम्हे अपनी पत्नी ना बना लूँ. अब तुमसे शादी करने के बाद तुम्हे अपने साथ लेकर ही शहर जाउन्गा."

"लेकिन मा जी?" क्या उनके बगैर शादी करेंगे आप?

"मा को भी यहीं बुला लेता हूँ." रवि उसके गालो को थाम कर बोला.

रवि की बातों से कंचन का चेहरा खिल गया. उसने अपना सर रवि के कंधे पर रख कर अपनी आँखें बंद कर ली.
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07-25-2018, 11:14 AM,
#25
RE: Hindi Sex Kahaniya काँच की हवेली
रवि ने एक हाथ से कंचन का कंधा थाम लिया और दूसरे हाथ से उसके बालों को सहलाता रहा. उसे अपनी किशोरवस्था के वो पल याद आने लगे जब उसके दोस्त उसका मज़ाक उड़ाया करते थे. वह अपने अकेले पन से कितना घबराया घबराया रहता था. तब उसने कभी नही सोचा था कि कोई लड़की उससे भी प्यार कर सकती है. कोई उसकी भी दीवानी हो सकती है. लेकिन आज किस्मत ने कंचन से उसको मिलाकर उसकी सारी शिकायतों को दूर कर दिया था. कभी कभी उसे लगता था वो कोई गहरी नींद सो रहा है, अभी आँख खुलेगी और सब कुच्छ ख़त्म हो जाने वाला है.

उसे कंचन पर बेहद प्यार आ रहा था. वह खुद को उसके प्यार का ऋणी समझ रहा था. उसने कंचन को देखा. वह अभी भी आँखें बंद किए हुए उसके कंधे पर सर रखे पड़ी थी.

उसने प्यार से उसके सर को चूम लिया.

चुंबन के एहसास से कंचन का ध्यान भी भंग हुआ. शायद वो भी किसी विचारों में लीन थी. वह धीरे से बोली - "साहेब, मा जी कब आएँगी?"

"आज ही मैं उन्हे फोन करके सब कुच्छ बता देता हूँ. और उन्हे यहाँ आने के लिए आग्रह करता हूँ." रवि उसके गालों को सहलाते हुए बोला - "उनके आते ही हम जल्द से जल्द विवाह सुत्र में बँध जाएँगे."

"मा जी. मुझ जैसी गाओं की लड़की को अपनी बहू तो स्वीकार करेंगी ना?" कंचन ने फिर से चिन्तीत होकर कहा.

"तुम मा की चिंता क्यो कर रही हो? वो पुराने ज़माने की संस्कारों वाली औरत हैं. उन्हे ज़्यादा तड़क भड़क पढ़ी लिखी हाइ प्रोफाइल लड़की नही चाहिए. उन्हे तुम्हारी जैसे सुशील शर्मीली संस्कारों वाली बहू चाहिए. उन्हे अपनी बहू में सिर्फ़ 2 गून चाहिए. पहला वो लड़की घर के लोगों की इज़्ज़त करे, दूसरा घर का काम करे, ठीक से घर का ख्याल रखे और अपने हाथों से खाना बनाकर उन्हे खिलाए. मा हमेशा अपने हाथों से खाना बनाकर खाती आई हैं. उन्हे अपनी बहू के हाथ से खाना खाने का बहुत शौक है. बस . अब इतना तो तुम्हे आता ही होगा?" ये कहकर उसने कंचन को देखा.

कंचन ने हां में सर हिला दी. पर अंदर ही अंदर उसे रोना आ रहा था. उसने अपनी सारी उमर चिंटू के साथ खेलने कूदने में बीताई थी. कभी कभार ही घर का कोई काम करती थी. और रही बात खाना बनाने की तो उसे सिर्फ़ चाय के अतिरिक्त कुच्छ भी ना आता था. रवि की बातें सुनकर वह चिंता से भर उठी थी. दिल कर रहा था अभी भाग कर घर जाए और बुआ से खाना बनाना सीखे.

"अरे हां.....!" अचानक रवि चौंक कर कहा - "खाने से मुझे याद आया. गाओं की लड़कियाँ जब अपने साजन से मिलने आती है तो साथ में उनके खाने के लिए हलवा, पूरी.....नही पूरी नही, खिचड़ी......नही खिचड़ी भी नही.........हां याद आया खीर.......खीर लेकर आती हैं. तुम लेकर नही आई?"

कंचन की मुसीबत और बढ़ गयी एक तो वो पहले इस चिंता से परेशान थी कि उसे खाना बनाना नही आता, अब रवि के लिए रोज़ खीर बनाकर कैसे लाएगी?

उसके समझ में नही आ रहा था कि वो रवि को क्या जवाब दे. अगर वो ये कहती है कि कल खीर बनाकर लाएगी तो उसे रोज़ ही खीर लाना पड़ेगा. और अगर ये कहती है कि उसे खीर बनाना नही आता तो कहीं रवि नाराज़ ना हो जाए.

"क्या सोच रही हो?" रवि ने उसे टोका. "तुम्हे खीर तो बनाना आता है ना? मुझे बचपन से ही खीर बहुत पसंद है."

"हां आता है साहेब, मैं कल आपके लिए खीर बनाकर लाउन्गि." कंचन बोल तो दी. पर बोलने के बाद गहरी चिंता में पड़ गयी. - "साहेब, अब मैं घर जाउ? बुआ ने जल्दी घर आने को कहा था."

रवि ने कंचन को देखा. उसके चेहरे पर परेशानी के भाव थे, पर वो उसका सही कारण नही जान सका. उसने मुस्कुरा कर कहा - "ओके. लेकिन कल जल्दी आना और खीर लाना मत भूलना."

"जी." कंचन ने हामी में सर हिलाया. फिर जाने के लिए उठ खड़ी हुई.

रवि भी जूते पहनकर खड़ा हो गया. फिर साथ साथ दोनो उपर आने लगे. अचानक रवि ने कंचन से कहा - "अरे ये तो ग़लत बात हो गयी, हमारी प्रेम की पहली मुलाक़्क़त पूरा होने को है और हमने एक दूसरे को कोई निशानी तक नही दी."

"निशानी?" कंचन चौंक कर पलटी. उसने सवालिया नज़रों से रवि को देखा.

"मैने किताबों में पढ़ा है, प्रेम की पहली मुलाक़ात में प्रेमी एक दूसरे की किस करके प्रेम की निशानी देते हैं, चुंबन के बिना प्रेम अधूरा माना जाता है. लेकिन हमने तो किस किया ही नही"

कंचन रवि की बात से शरमा गयी. और नीचे देखने लगी.

"क्या हुआ?" रवि उसके चेहरे को दोनो हाथों से भर कर उपर उठाते हुए पुछा. - "अगर तुम्हारी इच्छा ना हो तो कोई ज़बरदस्ती नही."

कंचन को लगा अगर आज उसने इनकार किया तो कहीं ऐसा ना हो उसके प्रति रवि का प्रेम कम हो जाए. - "मैने मना कब किया है साहेब." ये कहकर उसने शर्म से अपनी आँखें बंद कर ली.

रवि ने उसके चेहरे को देखा, जहाँ शरम के साथ समर्पण का भी बहुत गहरा छाप चढ़ा हुआ था. उसने अपना चेहरा झुकाया और कंचन के काँपते होंठो पर अपने होंठों को रख दिए.

कंचन का पूरा शरीर काँप गया. वह रवि की बाहों में सिमट सी गयी.

रवि ने एक लंबा चुंबन लेने के बाद उसके होंठों से अपने होंठ अलग किए. फिर कंचन की आँखों में झाँका. उसकी आँखों में शर्म और उतेज्ना से लाल हो गयी थी.

"अब मिलन पूरा हुआ." रवि मुस्कुरकर कहा. "अब तुम घर जा सकती हो."

कंचन कुच्छ देर भारी पलकों से रवि को देखती रही फिर एकदम से मूडी और अपने रास्ते भागती चली गयी.

रवि उस और मूड गया जिधर उसकी बाइक थी. वह जैसे ही अपनी बाइक के पास आया. उसके पैरो तले से ज़मीन निकल गयी.

निक्की अपनी जीप में बैठी उसका इंतजार कर रही थी. जिस जगह रवि और कंचन खड़े होकर किस कर रहे थे. वो जगह जीप से ज़्यादा दूर नही थी. वहाँ से थोड़ा नीचे उतरते ही निक्की उन्हे साफ देख सकती थी.

रवि बाइक तक आया. फिर निक्की को देखा. उसकी आँखें शोला उगल रही थी. चेहरा गुस्से से फट पड़ने को तैयार था.
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07-25-2018, 11:14 AM,
#26
RE: Hindi Sex Kahaniya काँच की हवेली
अपडेट 25



रवि उसकी आग उगलती आँखें और गुस्से से भरी सूरत देखकर समझ गया कि निक्की ने उसे कंचन के साथ देख लिया है.

इस तरह अपनी चोरी पकड़े जाने से उसकी सिट्टी-पिटी गुम हो गयी थी. लेकिन उसने अपनी घबराहट निक्की पर ज़ाहिर नही होने दिया. उसने लापरवाही से निक्की को देखते हुए कहा - "निक्की जी, आप यहाँ, इस वक़्त?"

"मुझे आप मत कहो." निक्की गुस्से से चीखी. - "जब मैं तुम्हे पसंद ही नही तो फिर ये झूठे सम्मान किस लिए?"

उसके गुस्से को देखकर रवि हैरान रह गया. उसने सोचा भी नही था कि निक्की उसपर इस तरह भड़क सकती है. लेकिन वो उसके गुस्से की परवाह किए बिना बोला - "मैं कुच्छ समझा नही."

"नही समझे?" निक्की व्यंग से मुस्कुराइ. फिर उसी कुटिलता के साथ बोली - "अगर तन्हाई में छुप्कर पाप करना ही था तो मुझे ठुकराकर मेरा अपमान किस लिए किया था?"

"क्या बकवास कर रही हो तुम?" रवि की सहनशक्ति जवाब दे गयी. वह अपने स्थान से खड़े खड़े चीखा.

निक्की की बातों का मतलब समझते ही उसे तेज़ गुस्सा आया था. उसे इस बात का गुस्सा नही था कि निक्की ने उसे चरित्रहीन कहा था, उसे गुस्सा इस बात का था कि निक्की ने उस मासूम, दिल की भोली, बेकसूर कंचन के दामन पर कीचड़ उछाल्ने की कोशिश की थी. जो उसकी दोस्त भी थी.

"अगर ये बकवास है तो तुम दोनो यहाँ अकेले में क्या कर रहे थे?" निक्की ने चुभती नज़रों से उसे घूरा.

"मैं तुम्हारे किसी भी सवाल का जवाब देने के लिए विवश नही हूँ." रवि ने उसे दो टुक जवाब दिया और बाइक की तरफ मूड गया.

"ये क्यों नही कहते, तुम्हारे पास सफाई देने के लिए शब्द ही नही बचे हैं." निक्की ने उसे मुड़ते देख खीजकर कहा.

उसकी बातों से चिढ़कर रवि पलटा. पर गुस्से की अधिकता में कुच्छ कह नही पाया. बस दाँत पीस कर रह गया. द्वेष भावना से पीड़ित नारी को कोई समझाए भी तो कैसे. उनके अक़ल पर ऐसा पत्थेर पड़ा होता है कि लाख कोशिश कर लो पर वो पत्थेर नही हटा-ती. उसने चुप रहने में ही अपनी भलाई समझी.

रवि एक व्यंग भरी मुस्कुराहट निक्की पर छोड़ता हुआ वापस अपनी बाइक की ओर बढ़ गया.

निक्की रवि के इस उपेक्षित (नेग्लिजेंट्ली) व्यवहार को सह ना सकी. वह गुस्से से जीप से उतरी और लपक कर उस तक पहुँची. - "मैं पूछती हूँ.....ऐसा क्या है कंचन में जो मुझमें नही? क्या मैं सुंदर नही? क्या मैं जवान नही? देखो मुझे और बताओ. क्या कमी है मुझमें?" ये कहते हुए निक्की ने उसके सामने अपनी छातियाँ तान दी.

उसके ऐसा करने से सफेद टीशर्ट में कसे उसके बूब्स अपने पूरे आकार का प्रदर्शन कर उठे.

ना चाहते हुए भी रवि की निगाहें उसके पर्वत की तरह उठे बूब्स पर चली गयी. उसके उभरे हुए बूब्स को अपनी आँखों के इतने समीप महसूस कर रवि का पूरा शरीर सिहर उठा. पर दूसरे ही पल उसने अपनी नज़रों को बूब्स से हटा लिया.

"तुम में सबसे बड़ी कमी यह है कि तुम वासना से पीड़ित लड़की हो." रवि ने निक्की की आँखों में तैरती वासनात्मक लहरों को देखते हुए कहा - "तुम अपनी तुलना कंचन से कर भी कैसे सकती हो?"


"मैं वासना से पीड़ित हूँ तो तुम क्या हो? तुम भी तो कुच्छ देर पहले किसी की गर्म बाहों में पड़े हुए थे." निक्की जलकर बोली - "तुम मेरे सामने साधु बनते हो और मेरी पीठ पिछे अइय्यासियाँ करते हो. क्या मैं नही जानती?"

"बंद करो अपनी ये बकवास." रवि गुस्से से चीखा. - "मुझपर ना सही पर थोड़ा बिसवास कंचन पर तो रखो."

"वो तो भोली है तुम्हारी बातों में आ गयी होगी. लेकिन इतना याद रखो....तुमने मुझे ठुकराकर किसी और को अपनाया तो मैं तुम्हे चैन से रहने नही दूँगी." निक्की अपने दाँत चबाते हुए बोली.

रवि के प्रति उसकी तड़प अब केवल शारीरिक सुख भर का नही रह गया था. अब वो रवि को अपने पति के रूप में हासिल करना चाहती थी. लेकिन आज रवि का झुकाव खुद की बजाए कंचन की ओर देखकर वह गुस्से से भर उठ थी.

वो खुद को कंचन के मुक़ाबले हर दृष्टि से बेहतर समझती थी. कंचन ना तो उसकी जितनी पढ़ी लिखी थी, ना ही उसकी जितनी धनी थी, ना उसका घर उसके घर से बड़ा था, ना वो निक्की से अच्छे कपड़े पहनती थी, ना तो निक्की से बेहतर बात करने का ढंग जानती थी. रवि उसका मेहमान था उसके घर रहता था उसका ख़ाता था. फिर भी वो उसके बजाए कंचन से प्यार करता था. निक्की का अहंकारी नारी स्वाभाव इसी बात से दुखी था.

वो कंचन को अपना दुश्मन नही समझ रही थी, लेकिन वो इस बात को सह नही पा रही थी कि जो कंचन सदा उसकी मोहताज रही, जिस कंचन को उसने झोपडे से उठाकर हवेली में स्थान दिया. जिसके साथ उसने अपनी थाली बाटी, जिसके लिए उसने हर फ़र्क को मिटाया, आज वही कंचन उस पर भारी पड़ रही थी. उसका अभिमानी मन इसी बात से आहत था.

रवि ने उससे अधिक उलझना ठीक नही समझा. वो पलटा और अपनी बाइक पर जा बैठा.

"कहाँ जा रहे हो?" निक्की उसकी कलाई पकड़कर गुर्राई.

"तुम्हे रात यही गुजारनी हो तो शौक से गुजारो. मैं अपने रास्ते चला." वह बोला और बाइक की चाभी घुमाया.

"तुम ऐसे नही जा सकते." निक्की फुफ्कारी.

"तो....?" रवि ने आश्चर्य से घूरा.

"तुम्हे मुझे भी होठों पर वैसा ही किस करना होगा जैसा तुमने कंचन को किया था." ये कहते हुए निक्की ने अपने होंठों को उसके होंठों के करीब ले गयी.

"हरगिज़ नही." रवि ने इनकार में अपनी गर्दन हिलाई.

"रवि." निक्की किसी नागिन की तरह फुफ्कारी. - "मैं अपनी कसम खाकर कहती हूँ. अगर तुमने मुझे किस ना किया तो मैं अभी इसी वक़्त अपनी जीप सहित इस पहाड़ी से नीचे कूद जाउन्गि."

"मज़ाक बंद करो और घर चलो." रवि ने विचलित होकर कहा. उसे निक्की के चेहरे की सख्ती अंदर तक हिला गयी थी.

"तुम्हे लग रहा है मैं मज़ाक कर रही हूँ." निक्की दाँत पीसती हुई बोली. उसकी आँखों के शोले भड़क उठे - "तो ठीक है, अगर तुम मेरी बातों की सच्चाई परखना ही चाहते हो तो एक क़दम यहाँ से आगे बढ़कर दिखाओ. मैं अगर इस पहाड़ी से ना कूदी तो मैं ठाकुर जगत सिंग की बेटी नही." वो चट्टान की तरह ठोस शब्दों में बोली - "लेकिन याद रखो रवि. तुम्हे अपनी इस भूल पर ज़िंदगी भर अफ़सोस होगा. क्योंकि मैं मज़ाक नही करती."

रवि सर से पावं तक काँप गया. उसने ध्यान से निक्की को देखा. निक्की इस वक़्त बेहद गुस्से में थी. उसकी आँखों में गुस्से के साथ साथ एक गहरे दर्द की परत भी चढ़ि हुई थी. रवि मनोचिकित्सक (साइकॉलजिस्ट) था उसे समझते देर नही लगी कि निक्की को अगर उसने और आहत किया तो ये सचमुच में अपनी जान दे देगी.

प्यार में अपमानित स्त्री, काम-अग्नि में जलता देह कुच्छ भी कर सकता है. वो एक बार पहले भी निक्की का नाज़ुक मौक़े पर तिरस्कार कर चुका था. रवि नही चाहता था कि उसकी एक भूल से कोई बड़ी आफ़त उसके गले पड़े. उसकी ग़लती से निक्की को कुच्छ हुआ तो वो ठाकुर साहब को क्या जवाब देगा? क्या बीतेगी ठाकुर साहब पर जब उन्हे ये मालूम होगा कि जिस इंसान को वो डॉक्टर जानकार अपनी पत्नी का इलाज़ कराने लाए थे उसने खूनी बनकर उन्ही की बेटी का खून कर दिया.

रवि इस एहसास से पुनः काँप उठा. उसने विवशता से अपने होंठ चबाने शुरू कर दिए. उसे अपने बचाव का कोई भी मार्ग दिखाई नही दे रहा था.

उसने निक्की को देखा वो अभी भी उसके सर पर सवार थी. वो अपनी जलती हुई आँखों से उसे घुरे जा रही थी.

"ठीक है." रवि बुझा बुझा सा बोला - "लेकिन इसके बाद तुम कोई भी बहस नही करोगी और सीधा हवेली लौट जाओगी?"

"मुझे मंज़ूर है." निक्की अपने होंठों पर विजयी मुस्कुराहट लाते हुए बोली.

रवि ने जवाब में अपने होंठ उसकी ओर बढ़ा दिए. निक्की ने उसके गर्दन को पिछे से पकड़ा और अपने होंठों को उसके होंठों से मिला दिया. फिर किसी पके हुए आम की तरह उसके होंठों को चूसने लगी. रवि के पूरे शरीर में तेज़ सनसनाहट भरती चली गयी. निक्की के शरीर की गर्मी उसके मूह के रास्ते उसके शरीर में उतरने लगी. उसकी आँखें नशे में बंद होने लगी. उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे वो किसी और ही दुनिया में पहुँच गया हो.

निक्की होंठ चूसने के मामले में महारत रखती थी. वो उसी प्रकार धीरे धीरे उसके होंठों को चुस्ती रही. फिर पूर्ण तृप्ति के बाद वो रवि से अलग हुई.

निक्की के अलग होते ही रवि ने नशे में बंद होती अपनी भारी पलकें खोलकर उसे देखा. उसके चेहरे में जीत की खुशी थी तो वहीं उसके होंठ अपनी कामयाबी पर गर्व से मुस्कुरा उठे थे.

रवि की गर्दन शर्म से झुक गयी. वह कुच्छ देर यूँही उसके चेहरे को देखता रहा. निक्की उसे देखकर मुस्कुराती रही. रवि ने उसकी ओर से अपनी गर्दन घूमाकर बाइक को एक जोरदार किक मारी. अभी वो आगे बढ़ना ही चाहता था कि निक्की की आवाज़ उसके कानो से टकराई. - "ठहरो."

"अब क्या हुआ?" रवि ने सवालिया नज़रों से उसे घूरा.

"तुमने ये तो बताया ही नही कि किसका स्वाद-सुगंध अच्छा था? इस शहरी गुलाब का या उस पहाड़ी फूल का?" निक्की के होठों पर मुस्कुराहट थी.

रवि उसकी ओर देखकर व्यंग से मुस्कुराया. फिर बोला - "शहर के गमलों में खिलने वाले किसी भी फूल में वो सुगंध कहाँ? जो पहाड़ी के आँचल पर खिले फूलों में होती है?"

उसकी इस कटाक्ष (इनसिन्युयेशन) से निक्की का पूरा शरीर अपमान से सुलग उठा. लेकिन इससे पहले कि वो रवि को कोई जवाब देती. रवि एक झटके से आगे बढ़ चुका था. निक्की गुस्से से उसे जाते हुए देखती रही.
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07-25-2018, 11:14 AM,
#27
RE: Hindi Sex Kahaniya काँच की हवेली
अपडेट 26

कंचन जब तक अपने घर पहुँची, सांझ ढल चुकी थी. सांता बुआ ने रात का खाना पकने के लिए मिट्टी के चूल्‍हे में आग लगा चुकी थी.

सुगना अभी भी घर नही लौटा था. चिंटू शायद अंदर पढ़ाई कर रहा था.

कंचन शांता को ढूँढती अंदर रसोई तक आई. शांता पतीले में चावल पकने के लिए पानी भर रही थी. उसने शांता को पुकारा - "बुआ....आज क्या बना रही हो खाने में?"

कंचन की आवाज़ से शांता ने पलटकर उसे देखा. उसकी आँखों में अभी भी वही सवाल था. साथ ही चेहरे पर थोड़ी बेचैनी भी व्याप्त थी. - "क्यों पुच्छ रही है? तुम्हे तो मेरे हाथ का बना हर चीज़ अच्छा लगता है?"

"बुआ....!" कंचन अपनी उंगलियों में दुपट्टा घूमाते हुए बोली - "बुआ आज खीर बनाओ ना. मेरा मन आज खीर खाने का हो रहा है."

"खीर...?" शांता ने आश्चर्य से उसे देखा - "लेकिन खीर के लिए सामान कहाँ है?"

"तो ले आओ ना बुआ. जो सामान चाहिए. आज मेरा बड़ा मन हो रहा है...." कंचन तपाक से बोली. और फिर अपनी उग्लियों में दुपट्टा घुमाने लगी.

शांता ने हैरानी से कंचन को देखा. आज उसे कंचन कुच्छ अज़ीब सी लग रही थी. इतनी बेचैनी खाने के लिए उसके मन में कभी नही होती थी. जो बना के दे दिया वो खा लेती थी. पर आज जाने क्यों वो खीर खाने के लिए इतनी ज़ोर दे रही है?

शांता मन में सोचने लगी - अभी इसकी उमर ही कितनी हुई है, सिर्फ़ शरीर से बड़ी हुई है. अक़ल तो अभी भी बच्चों जितनी ही है. शायद इसने किसी के घर में खीर बनते देखा हो. और इसका खीर खाने का मन मचला हो. -"आज तुझे खीर खाने की इतनी अधिरता क्यों है भला? शांता ने पुछा.

"बहुत दिन हो गये हैं ना इसलिए....!" कंचन भोलेपन से बोली - "क्या....नही बनाओगी बुआ?"

"बनाउन्गि कैसे नही. तू जो इतनी प्यार से बोल रही है." शांता ने मुस्कुराते हुए कहा - "कुच्छ चीज़ें बताती हूँ....उसे बनिये की दुकान से लेती आ."

कंचन ने हां में गर्दन हिलाई. फिर शांता की बताई चीज़ों को याद कर तेज़ी से आँगन के दरवाज़े से बाहर निकल गयी. तब तक शांता दूसरे कामो में व्यस्त हो गयी.

लगभग 30 मिनट बाद कंचन लौटी. उसके हाथ में थेले भर का सामान था. उसे देखकर शांता की आँखें हैरत से चौड़ी हो गयी. - "इतना सारा क्या उठा लाई तू?"

शांता ने तो उसे एक दिन का सामान लाने को कहा था. पर कंचन तो दूर की सोच कर गयी थी और पूरे हफ्ते भर का सामान उठा लाई थी. वो बुआ से बोली - "अभी ले आई तो अच्छा किया ना बुआ." फिर कभी खाने का मन हुआ तो?"

"तो तब ले आती." शांता ने थेले का सामान जाँचते हुए कहा. - "अब ये रखे रखे खराब नही हो जाएँगा?"

कंचन खामोश हो गयी. अब वो कैसे समझाती बुआ को कि उसे अब रोज़ ही खीर खाने का मन होने वाला है.

उसे उदास देख सांता बोली - "अच्छा ही किया बेटी जो तू ले आई. रोज़ रोज़ दुकान जाने से समय हर्ज़ होता है. अब जब भी तेरा मन खीर खाने का करे मुझे बता देना मैं बना दिया करूँगी."

शांता कंचन से थेला लेकर उससे सामान निकालने लगी. उससे कभी कंचन की उदासी नही देखी जाती थी. बिन मा की लड़की को वो उदास देख भी कैसे सकती थी. बचपन से ऐसे ही उसकी ज़रा ज़रा सी बातों का ख्याल करती आई थी. जैसे वो उसी की कोख से जन्मी हो. शांता कभी कभार चिंटू पर बरस पड़ती थी तो कभी उसकी शरारत पर मार भी देती थी, पर कंचन को कभी भूल से भी नही डाँट'ती थी. आज भी वो उसके उदास चेहरे को देख तड़प उठी थी.

कंचन अभी भी शांता के पिछे खड़ी उसे सामान निकालते देख रही थी.

शांता ने उसे खड़ा देखा तो मुस्कुराकर बोली - "बेटी...मैं खीर बना दूँगी. थोड़ी देर तक तू चिंटू के साथ बैठकर पढ़ाई कर. खीर बनते ही मैं तुम्हे बुला लूँगी."

"मैं तुम्हे खीर बनाते देखना चाहती हूँ बुआ." कंचन ने आग्रह किया. - "खीर कैसे बनाई जाती है.....मैं सीखना चाहती हूँ."

"क्यों सीखना चाहती है?" शांता ने पुछा - "क्या तुम्हे ये लगता है मैं तुम्हे फिर कभी खीर बनाकर नही खिलाउन्गि?."

"ऐसी बात नही है बुआ. मैं अब घर के सारे काम सीखना चाहती हूँ. तुमने तो मुझे अभी तक कुच्छ भी नही सिखाया." कंचन ने शिकायत की.

उसे सच में इस बात का दुख था कि बुआ ने उसे कभी घर का कोई काम करने नही दिया. खाना बनाना नही सिखाया. कुच्छ नही तो खीर ही बनाना सीखा देती. कम से कम वो अपने हाथों से बनाई खीर तो रवि को खिला सकती थी.

वहीं शांता खड़े खड़े उसे हैरत से देखे जा रही थी. उसे आज कंचन के स्वाभाव में काफ़ी परिवर्तन दिखाई दे रहा था. पहले खीर खाने के लिए उतावलापन और अब घर के कामो के प्रति लगाव....."कुच्छ तो हुआ है इसे." वह मन में सोची.

"ये तुम्हे अचानक से घर के कामों को सीखने का मन क्यों हुआ?" शांता ने मुस्कुराते हुए पुछा.

"जो ना सीखी तो......जब मैं ससुराल जाउन्गि तब मेरी सास मुझे डाँट नही लगाएगी? कहेंगी नही कि....मुझे घर का कोई काम नही आता."कंचन बिना रुके कहती रही. - "तब तुम्हारी कितनी बदनामी होगी बुआ? फिर सास मुझे घर से भी निकाल देंगी. इसलिए अब मैं रोज़ आपके साथ खाना बनाना सीखूँगी और घर के दूसरे काम भी."

भोली कंचन की भोली बातें सुनकर एक ओर जहाँ शांता मंद मंद मुस्कुरा रही थी तो वही दूसरी ओर इस बात से चकित भी थी कि आज कंचन को इतनी सारी बातें कहाँ से सीखने को मिल गयी. पहले तो ये कभी इस तरह की बातें नही करती थी

"क्यों हंस रही हो बुआ.?" शांता को हँसते देख कंचन के चेहरे पर लाज की लाली फैल गयी.

"ऐसे ही." शांता ने मुस्कुराकर जवाब दिया. फिर उसके झुके चेहरे को ठोडी से पकड़कर उठाते हुए आगे बोली. - "वो सब तो ठीक है, मैं तुम्हे सब सिखा दूँगी. पर तुम्हारे मन में ये सास का डर भरा किसने?"

कंचन के आगे रवि का चेहरा घूम गया. पर बुआ से उसके बारे में कह ना सकी. लाज की गठरी बनी खामोशी से शांता को देखती रही.

"ठीक है रहने दे मत बता. आ मेरे साथ बैठ, तुझे आज खीर बनाकर दिखाती हूँ. फिर अपनी ससुराल में बनाना अपनी सास के लिए." शांता ये कहते हुए कंचन का हाथ पकड़कर चूल्‍हे तक ले गयी. फिर उसे एक एक करके सारी विधि बताने लगी और कंचन उसके बताए अनुसार खीर बनाने लगी.

कंचन पूरे ध्यान से शांता की बताई बातों को मन में उतारती रही. कंचन इस काम में ऐसी खोई कि चिंटू के बार बार बुलाने पर भी उसके पास नही गयी. रोज़ इस वक़्त वो चिंटू को पढ़ाती थी, पर आज उसने भाई की तरफ देखा तक नही.

अंततः ! कंचन की मेहनत पूरी हुई और उसकी मीठी खीर बनकर तैयार हुई.

इतने में सुगना भी लौट आया था. आँगन में पावं धरते ही खीर की सुगंध उसकी नाक से टकराई.

"ओह्ह्ह......तो आज घर में खीर बनाई जा रही है." सुगना नाक सूंघते हुए चूल्‍हे तक आया. -"बड़ी अच्छी सुगंध आ रही है."

"सुगंध कैसे नही आएगी भैया. कंचन के हाथ का बना जो है." शांता ने पानी का लौटा सुगना को देते हुए कहा.

"क्या.....!" सुगना का मूह से खुशी से भरा स्वर निकला. उसने कंचन को देखा जो होठों में मुस्कुराहट और आँखों में शर्म लिए पिता की ओर देखे जा रही थी. - "ये जान कर तो मेरी भूख दुगुनी हो गयी है. मैं खाना तो थोड़ी देर में खाउन्गा.....पर अभी थोड़ी सी खीर कटोरी में ले आ. ज़रा देखूं तो मेरी बेटी ने कैसी खीर बनाई है."

सुगना के कहने की देरी थी और कंचन खीर निकालने दौड़ पड़ी. रसोई से कटोरी लाकर उसमे खीर भरी और सुगना को पकड़ा दी. फिर सुगना के खाने के बाद अपनी प्रसंसा सुनने के लिए पास ही खड़ी हो गयी.

सुगना ने चम्मच से खीर उठाकर अपने मूह में लिया. फिर अपनी जीभ चलाते हुए उसने कंचन को देखा जो टकटकी लगाए उसी को देख रही थी. उसके मन में हज़ारों शंकाए थी......जाने बापू को खीर कैसी लगी होगी. कहीं ऐसा ना हो बापू नाराज़ हो जायें. लेकिन अगले ही पल उसकी सारी शंकाए बेजान साबित हुई.....जब उसकी नज़र सुगना के होंठों पर फैलती मुस्कुराहट पर पड़ी.

"बापू बताओ ना खीर कैसी लगी?" कंचन से और ना रहा गया. उसके मन में अपनी मेहनत का परिणाम जान'ने की उत्सुकता चरम पर थी.

"स्वादिष्ट....बेहद स्वादिष्ट !" सुगना गदगद होकर बोला - "मुझे तो बिस्वास ही नही हो रहा है कि मेरी बेटी इतनी अच्छी खीर बना सकती है."

कंचन भाव-विभोर हो गयी. अपने बापू के मूह से अपने हाथ से बनाई खीर की प्रसंसा सुनकर उसका रोम रोम पुलकित हो उठा. मन मयूर की तरह नाचने को हुआ. पर पिता का ध्यान करके अपनी खुशी अपने दिल में दबा गयी.

उसकी खुशी केवल इसलिए नही थी कि उसने अच्छी खीर बनाई थी और उसके पिता ने उसकी सराहना की थी. उसकी खुशी का कारण था रवि.....! वो ये सोचकर खुश हो रही थी कि कल वो अपने प्रीतम को अपने साहेब को अपने हाथों से खीर बनाकर खिला सकेगी. उसके मूह से अपने लिए सच्ची प्रसंसा सुनेगी. उसे इस बात की खुशी थी कि अब वो रवि को अपना सकेगी. कहने को तो उसने सिर्फ़ खीर बनानी सीखी थी....पर कोई उसकी नज़र से देखे तो जान पाए कि उसकी उस खीर में कितनी भावनाएँ छिपि हुई थी.

*****


रवि जब हवेली पहुँचा तो निक्की भी उसके पिछे पिछे हवेली में दाखिल हुई.

हॉल में ठाकुर साहब के साथ दीवान जी बैठे हुए थे. वे आपस में कुच्छ बातें कर रहे थे जब रवि ने उन्हे हाथ जोड़कर ग्रीट किया.

रवि और निक्की को एक साथ बाहर से आते देख ठाकुर साहब की आँखें खुशी से मुस्कुरा उठी. - "आओ रवि, हम तुम्हारा ही इंतेज़ार कर रहे थे. तुमसे कुच्छ आवश्यक बातें करनी है." ठाकुर साहब रवि से संबोधित हुए.

रवि की आँखें आश्चर्य से सिकुड गयी. पास ही खड़ी निक्की की ओर नज़र घूमी तो उसके होंठों पर एक विषैली मुस्कान थिरकते पाया. उसने फिर से अपनी नज़रों का रुख़ ठाकुर साहब के चेहरे पर किया. उनके चेहरे पर गहरे संतोष का भाव था. रायपुर आने के बाद आज पहली बार उसने ठाकुर साहब को इतना प्रसन्न देखा था. लेकिन उनके संतोष का कारण उसकी समझ से परे था.

क्रमशः...............................................
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07-25-2018, 11:15 AM,
#28
RE: Hindi Sex Kahaniya काँच की हवेली
अपडेट 27

रवि जब हवेली पहुँचा तो निक्की भी उसके पिछे पिछे हवेली में दाखिल हुई.

हॉल में ठाकुर साहब के साथ दीवान जी बैठे हुए थे. वे आपस में कुच्छ बातें कर रहे थे जब रवि ने उन्हे हाथ जोड़कर नमस्ते किया.

रवि और निक्की को एक साथ बाहर से आते देख ठाकुर साहब की आँखें खुशी से मुस्कुरा उठी. - "आओ रवि, हम तुम्हारा ही इंतेज़ार कर रहे थे. तुमसे कुच्छ आवश्यक बातें करनी है." ठाकुर साहब रवि से संबोधित हुए.

रवि की आँखें आश्चर्य से सिकुड गयी. पास ही खड़ी निक्की की और नज़र घूमी तो उसके होंठों पर एक विषैली मुस्कान थिरक्ते पाया. उसने फिर से अपनी नज़रों का रुख़ ठाकुर साहब के चेहरे पर किया. उनके चेहरे पर गहरे संतोष का भाव था. रायपुर आने के बाद आज पहली बार उसने ठाकुर साहब को इतना प्रसन्न देखा था. लेकिन उनके संतोष का कारण उसके समझ से परे था.

"बैठो रवि. खड़े क्यों हो?" ठाकुर साहब रवि को खड़ा देख बैठने का इशारा किए.

"जी धन्यवाद." रवि ठाकुर साहब को उत्तर देकर धीमे कदमो से चलते हुए सोफे पर जाकर बैठ गया. फिर सवालिया नज़रों से ठाकुर साहब की ओर देखा - "कहिए मुझसे किस समबन्ध में बात करना चाहते थे आप?" रवि ने पुछा.. उसके चेहरे पर निक्की के साथ हुई झड़प का तनाव अभी भी फैला हुआ था.

"बात आप ही से संबंधित है रवि." ठाकुर साहब बोले - "आप जब से इस हवेली में आए हैं. हमारे लिए हर चीज़ शुभ होती जा रही है. सच कहूँ तो अब हमें ऐसा लगने लगा है जैसे हमारी हर खुशी आपसे होकर ही जाती है"

"मैं कुच्छ समझा नही....? आप कहना क्या चाहते हैं?" रवि चौंकते हुए कहा.

"रवि बात यह है कि.....!" ठाकुर साहब बात अधूरी छोड़कर अपने स्थान से उठ खड़े हुए. फिर चहलकदमी करते हुए एक स्थान पर खड़े हो गये और कुच्छ सोचने लगे.

उन्हे खड़ा होता देख दीवान जी भी सोफा छोड़ दिए. लेकिन रवि अपनी जगह बैठा ठाकुर साहब की ओर देखता रहा. ठाकुर साहब उसकी ओर पीठ किए खड़े थे और उनके दोनो हाथ पिछे बँधे हुए थे.

"दर-असल....हम निक्की का विवाह करना चाहते हैं." ठाकुर उसी अवश्था में खड़े खड़े बोले. वो जो कुच्छ भी कहना चाहते थे उसके लिए सीधे मूह रवि से बात करना उन्हे सहज नही लग रहा था.

"ये तो बहुत खुशी की बात है ठाकुर साहब." रवि जबर्जस्ति मुस्कुराने की कोशिश करते हुए कहा. उसने एक सरसरी निगाह निक्की पर डाली जो उसी की ओर देख रही थी.

"आप ठीक कह रहे हैं रवि." ठाकुर साहब रवि की तरफ पलटकर बोले - "ये वाक़ई खुशी की बात है, लेकिन हमारी खुशी अभी अधूरी है, ये तभी पूरी होगी जब इसमे आपकी मर्ज़ी भी शामिल हो जाएगी."

"म....मेरी मर्ज़ी?" रवि हकलाया. - "मैं कुच्छ समझा नही. आप किस मर्ज़ी की बात कर रहे हैं?"

"रवि, हमे ज़्यादा घुमा फिरकर बात करना नही आता." ठाकुर साहब रवि की घबराहट को नज़र-अंदाज़ करते हुए बोले - "असल बात यह है कि हम निक्की के लिए आपकी रज़ामंदी चाहते हैं. हमें निक्की के लिए जैसा वर चाहिए था वो सारे गूण आप में हैं. सच तो यह है रवि कि जिस दिन आपने राधा के सामने दामाद होने का नाटक किया....उसी दिन से हम भी आपको दामाद के रूप में देखने लगे हैं. अब अगर आपको ऐतराज़ ना हो तो, हम इस रिश्ते को पक्का करना चाहते हैं."

रवि सोच में पड़ गया ! उसने सोचा भी नही था कि ठाकुर साहब उसे इस तरह लपेटे में लेंगे. रवि असमंजस में पड़ गया. वो ठाकुर साहब को सब के सामने ना कहकर उनका अपमान नही करना चाहता था. और हां वो कह नही सकता था.

"क्या हुआ रवि? किस सोच में पड़ गये?" अचानक ठाकुर साहब की आवाज़ से रवि चौंका. ठाकुर साहब की नज़रें उसपर गढ़ी हुई थी.

"ठाकुर साहब, मैं आप सब की बहुत इज़्ज़त करता हूँ, प्लीज़....मेरी बात का बुरा मत मानीएगा." रवि ने नम्र स्वर मे ठाकुर साहब से कहा -"मैं इस वक़्त आपके इस सवाल का जवाब नही दे सकता. मेरी कुछ मजबूरियाँ हैं. मुझे थोड़ा वक़्त चाहिए." उसने एक सरसरी सी निगाह निक्की पर डालकर आगे बोलने लगा - " फिलहाल मैं आपसे एक बात की इज़ाज़त चाहता हूँ. मैं अपनी मा को यहाँ बुलाना चाहता हूँ....अगर आप लोगों को कोई परेशानी ना हो तो?"

"कोई बात नही रवि, हमें कोई जल्दी नही है. आप ठीक से विचार कर लीजिए फिर हमें बता दीजिएगा?" ठाकुर साहब उसकी झेंप मिटाते हुए बोले - "अब रही बात आपकी माताजी के आने की तो उन्हे ज़रूर बुलाए....उनसे मिलने की इच्छा तो हम भी रखते हैं. उनसे मिलकर हम बेहद खुश होंगे."

"आपका धन्यवाद....ठाकुर साहब." रवि ने खड़ा होते हुए कहा - "मैं कल ही मा को फोन करके यहाँ बुला लेता हूँ."

"रवि बाबू." अचानक से दीवान जी बोले - "मैं दो एक दिन में किसी काम से शहर जाने वाला हूँ. अगर आप उचित समझे तो आपकी माताजी मेरे साथ ही आ जाएँगी. मेरे होते उन्हे कोई परेशानी भी नही होगी."

"इससे अच्छी बात और क्या होगी दीवान जी. उनके अकेले आने को लेकर मैं चिंतित था. पर अब मेरी चिंता दूर हो गयी." रवि ने दीवान जी का आभार प्रकट किया.

"ठीक है रवि, अब आप जाइए आराम कीजिए. अब हम इस संबंध में आपकी माताजी के आने के बाद ही बात करेंगे." ठाकुर साहब रवि से बोले.

"जी...बहुत अच्छा, नमस्ते." रवि हाथ जोड़ते हुए ठाकुर साहब और दीवान जी को प्रणाम किया. फिर एक नज़र निक्की पर डालकर सीढ़ियों की तरफ बढ़ गया.

"आपको क्या लगता है दीवान जी? क्या रवि इस रिश्ते के लिए हां कहेगा?"" रवि के जाने के बाद ठाकुर साहब सोफे पर बैठते हुए दीवान जी से पुच्छे.

"वो हां नही कहेगा पापा !" दीवान जी से पहले निक्की बोल पड़ी.

निक्की की बात पर दीवान जी और ठाकुर साहब एक साथ चौंक कर उसकी तरफ पलटे. दोनो की नज़रें एक साथ निक्की के चेहरे पर पड़ी. उसके चेहरे पर उदासी के घने बादल मंडरा रहे थे. वो बेबसी से अपने होंठों को काट रही थी.

निक्की की ऐसी हालत देखकर दोनो ही भौचक्के से रह गये. निक्की अपने होंठों को चबाते हुए आगे बोली - "रवि की पसंद मैं नही हूँ पापा. उसकी पसंद कंचन है." इतना कहकर निक्की ने अपनी गर्दन घुमा ली. जैसे उसे भय था कि कहीं उसकी आँखें पीड़ा से ना छलक पड़े. वो अपने पिता को अपने आँसू नही दिखाना चाहती थी.

"ये तुम क्या कह रही हो निक्की?" ठाकुर साहब घायल नज़रों से निक्की की ओर देखते हुए बोले.

"यही सच है पापा, इसे स्वीकार कर लीजिए. रवि से अब इस समबन्ध में बात करना बेकार है. उसके सपने उसके अरमान.....इस हवेली में रहने वाली निक्की के लिए नही, उस झोपडे में रहने वाली कंचन के लिए हैं." ये कहते हुए निक्की का स्वर भारी हो गया. उसे अपने आँसू छुपाना मुश्किल जान पड़ने लगा. - "मैं अपने कमरे में जा रही हूँ पापा." निक्की बोली और तेज़ी से सीढ़ियों की तरफ बढ़ गयी.

ठाकुर साहब और दीवान जी पत्थेर की मूर्ति बने उसे जाते हुए देखते रहे.

"ये सब अचानक क्या हो गया दीवान जी?" होश में आते ही ठाकुर साहब दीवान जी से बोले - "हमारे पिछे इतना सब कुच्छ होता रहा और हमें इसकी खबर ही ना हुई."

"इसका ग्यान तो मुझे भी नही था सरकार....पर आप निश्चिंत रहें. बात अभी भी बन सकती है." दीवान जी ठाकुर साहब को दिलाषा देते हुए बोले - "बस मुझे इस वक़्त निक्की बेटा से मिलने की इज़ाज़त दीजिए. मैं पहले उनके दिल का हाल जान लूँ."

"जाइए.....दीवान जी, जाकर निक्की को देखिए. मेरी तो कुच्छ भी समझ में नही आ रहा है. पता नही क्यों खुशी हमें रास नही आती." ठाकुर साहब हताश होकर बोले.

"मेरे होते....इस बार खुशी दरवाज़े से नही लौटेगी सरकार....! आप हिम्मत ना हारें." दीवान जी ने उन्हे फिर से आश्वासन दिया - "मैं पहले निक्की बेटा से मिल लूँ फिर आप से बात करता हूँ." इतना कहकर दीवान जी निक्की के कमरे की तरफ बढ़ गये.

दरवाज़े पर पहुँचकर दीवान जी ने धीरे से दरवाजे को हाथ लगाया तो दरवाज़ा खुलता चला गया. दीवान जी की नज़र अंदर पहुँची. निक्की बिस्तर पर औंधे मूह पड़ी हुई थी.

"निक्की बेटा." दीवान जी दरवाज़े से ही बोले. उनकी आवाज़ से निक्की पलटी, दरवाज़े पर खड़े दीवान जी पर नज़र पड़ी तो बिस्तर पर उठकर बैठ गयी.

"निक्की बेटा....हमें बताइए.....पूरी कहानी बताइए.....आपके, रवि और कंचन के बीच जो कुच्छ भी है वो सब हमें बताइए." दीवान जी अधिरता के साथ बोले.

"वे दोनो एक दूसरे से प्यार करते हैं अंकल...." निक्की दीवान जी की ओर देखकर भारी स्वर में बोली - "मैं अपनी आँखों से उन दोनो का मिलन देख चुकी हूँ."

"पर तुम क्या चाहती हो बेटा?" दीवान जी निक्की के सर पर हाथ फेरते हुए बोले - "कोई कुच्छ भी चाहे....पर होगा वही जो तुम चाहोगी. ये मेरा वचन है." अचानक दीवान जी की आवाज़ में कठोरता उभरी.

निक्की ने आश्चर्य से दीवान की ओर देखा. उनकी बूढ़ी आँखों में भी इस वक़्त चिंगारी दहक उठी थी. निक्की उनकी आँखों में झाँकते हुए धीरे से बोली - "मैं कंचन का बुरा नही चाहती अंकल.....पर मैं रवि के बगैर नही जी सकती. शुरू में मैं रवि को पसंद नही करती थी पर पता नही क्यों मैं जितना उससे दूर होने की कोशिश करती.....वो मुझे उतना ही मेरे करीब महसूस होता. धीरे धीरे मैं कब उससे प्यार करने लगी मैं नही जान पाई. इसका एहसास मुझे उस दिन हुआ जब आपके और पापा के मूह से रवि से अपनी विवाह की बात सुनी. पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी. रवि किसी और का हो चुका था."

"उसे तुम्हारा ही होना है निक्की" दीवान जी निक्की के सर को अपने पेट से सटा कर उसके बालों को सहलाते हुए बोले. - "वो किसी और का हो ही नही सकता. मैं उसे किसी और का होने नही दूँगा." दीवान जी जबड़े भिचकर बोले.

"अंकल....." निक्की दीवान जी के गुस्से से भरे शब्द सुनकर काँप उठी. -" क्या आप.....कंचन को हानि पहुँचाएंगे. वो मेरी दोस्त है.....इसमे उसका कोई कुसूर नही, वो तो ये भी नही जानती कि मैं रवि से प्यार करती हूँ."

निक्की के मूह से सहमा सा स्वर सुनकर दीवान जी मुस्कुराए. - "आप चिंता मत कीजिए निक्की बेटा. हम भी कंचन का बुरा नही चाहते.....और उसका बुरा करने की तो हम सोच भी नही सकते. पर कुच्छ ऐसा ज़रूर करेंगे कि....रवि कंचन को छोड़कर आपके पास चला आए."

"क्या ये संभव है अंकल....?" निक्की ने आश्चर्य से दीवान जी की और देखा. - "रवि कंचन से बहुत प्यार करता है. वो उसे कभी नही छोड़ेगा."

"आप उसकी चिंता मत करो बेटा....!" दीवान जी धीरे से मुस्कुराए. फिर निक्की का चेहरा अपने हाथों में लेकर उसकी आँखों में झाँकते हुए बोले - "बस आप एक वादा करो कि जब तक हम शहर से नही लौट आते.....तब तक आप अपनी ओर से कोई भी कदम नही उठाएँगे. जो कुच्छ रवि और कंचन के बीच चल रहा है चलने दीजिए. आप सिर्फ़ मुक्दर्शक बने देखते रहिए."

"ठीक है अंकल...." निक्की ने दीवान जी की बात पर हामी भरी - "आप जैसा कहते हैं मैं वैसा ही करूँगी. मैं आपके शहर से लौट के आने तक कुच्छ नही करूँगी. पर आप जल्दी लौटकर आईएगा."

"बिल्कुल बेटा.....सिर्फ़ तीन चार दिन लगेंगे मुझे. लेकिन एक और बात का भी ध्यान रखें. इस कमरे में आपके और मेरे बीच जो भी बातें हुई....उसके बारे में मालिक को मत बताना." दीवान जी ने सरगोशी की - "अगर मालिक पूछें तो आप कह देना.....जिसमें रवि और कंचन की खुशी है उसी में आपकी भी खुशी है. आप उनके रिश्ते से खुश हैं. मालिक तो पहले से ही बहुत दुखी हैं.....आपके दुख की भनक भी उन्हे लगी तो वे टूट जाएँगे. आप सदा उनके सामने मुस्कुराते रहिएगा."

"जी....समझ गयी अंकल..." निक्की ने सहमति में अपनी गर्दन हिलाई.

"ओके बेटा....अब मैं चलता हूँ. अपना ख्याल रखना." ये कहकर दीवान जी निक्की के कमरे से बाहर निकल गये.
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07-25-2018, 11:15 AM,
#29
RE: Hindi Sex Kahaniya काँच की हवेली
अपडेट 28

रवि अपने कमरे में बैठा गहन विचारों में डूबा हुआ था. उसके समझ में नही आ रहा था कि......मा के आने के बाद वो ठाकुर साहब को क्या जवाब देगा. ठाकुर साहब की आशायें उसके साथ जुड़ी हुई थी. वो किस प्रकार उन्हे मना कर सकेगा. वे बेचारे पहले ही एक लंबे अरसे से पत्नी के दुख से पीड़ित हैं...उन्हे कितना कष्ट होगा जब वो निक्की के साथ विवाह से इनकार करेगा?.

"जो भी हो.....!" रवि . में बड़बड़ाया. - "मैं कंचन के साथ अन्याय नही कर सकता. निक्की अमीर बाप की बेटी है. उसके लिए आसानी से अच्छे रिश्ते मिल जाएँग. लेकिन कंचन...? वो झोपडे में रहने वाली एक ग़रीब किसान की बेटी है. पर यहाँ बात सिर्फ़ अमीरी ग़रीबी की भी नही है. कंचन मुझसे प्यार करती है. दिन रात एक ही सपना देखती है......मैं उसे अपनी दुल्हन बनाकर अपने घर ले जाउन्गा. निक्की के लिए तो मैं सिर्फ़ एक ज़िद हूँ. लेकिन कंचन के लिए उसकी ज़िंदगी.

दुनिया इधर की उधर हो जाए पर मैं कंचन का साथ नही छोड़ूँगा. हां...ठाकुर साहब का दिल ज़रूर दुखेगा. पर वे समझदार इंसान हैं मेरी भावनाओं को समझ जाएँगे. अब मुझे सिर्फ़ मा को मनाना है"

उसने तय कर लिया था कि वो कंचन के लिए ज़रूरत पड़ी तो मा का भी विरोध करेगा. वैसे उसे अपनी मा पर पूरा भरोसा था कि वो उसकी खुशियों के विरुद्ध नही जाएगी.

कंचन की याद आते ही उसके होंठो पर मुस्कुराहट फैल गयी. उसकी प्यारी सूरत का स्मरण होते ही उसकी सारी चिंताए दूर हो गयी. मस्तिष्क का सारा भार उतर गया. वो कंचन की यादों में खोता चला गया.

*****

दिन के 1 बजे थे. शांता अपनी धुन में नदी की ओर जाने वाली कच्ची और उबड़ खाबड़ पगडंदियों पर चली जा रही थी. वो इस वक़्त अपने भैया सुगना के लिए खाना पहुँचाने खेत गयी थी. उसे खाना खिलाने के बाद अब वो नदी की ओर जा रही थी.

शांता रोज़ इसी वक़्त सुगना के लिए खाना लेकर खेत जाती थी. पर आज उसने खेतों में थोड़ा काम भी कर लिया था. सिर्फ़ एक घंटे की मेहनत ने उसे पूरी तरह थका डाला था. वो पसीने से तर-बतर हो चुकी थी. ऐसी स्थिति में घर जाने से पहले उसने नदी में जाकर स्नान करना उच्छित समझा.

वो किसी गहरी सोच में गुम रास्ते में चली जा रही थी कि तभी उसके कानो से एक मर्दाना स्वर टकराया. वह आवाज़ की दिशा में मूडी. जैसे ही उसकी नज़र आवाज़ देने वाले पर पड़ी उसके दिल की धड़कने बढ़ गयी. जाने क्या बात थी कि उसे देखते ही शांता सिहरन से भर गयी थी.

"अच्छा तो तू है" शांता ने अपनी सांसो को काबू में करते हुए कहा - "पापी बिरजू, क्या ऐसे आवाज़ देते हैं किसी को? तूने तो मुझे डरा ही दिया था."

"ग़लती हो गयी बुआ. वैसे जा कहाँ रही हो?" बिरजू ने अपने काले दाँत दिखाते हुए हंसा.

"तुम्हे उससे क्या लेना देना? मैं कहीं भी जाउ.तू क्यूँ पुछ रहा है?" बुआ ने सवाल किया.

"इसलिए बुआ कि अगर हमारी मंज़िल एक है तो क्यों ना हम साथ साथ चलें." बिरजू ने दो अर्थी शब्दो में कहा.

"तुझ जैसे पापी के संग से मैं अकेली भली" शांता उसे अज़ीब सी नज़रों से देखते हुए बोली.

"मैने ऐसा क्या किया है बुआ जो तुम मुझे पापी कह रही हो?" बिरजू उसके निकट पहुँचता हुआ बोला. -"ना तो मैने तुम्हे कभी छेड़ा है....ना परेशान किया है, ना कभी तुमसे कुच्छ गंदा बोला है और ना ही कभी तुम्हारे शरीर को छुआ है. फिर क्यों मुझे पापी कहती हो?" बिरजू ने शांता के शरीर को उपर से नीचे तक घूरा.

शांता उसकी कामुक नज़रों की चुभन अपने बदन पर महसूस करके हौले से थर-थारा उठी. बिरजू की प्यासी नज़रों को अपने नाज़ुक अंगो पर थिरकते देख उसके बदन में तेज़ सनसनाहट भरती चली गयी. उसे वो पल याद आ गये जब वो बिरजू के एहसास मात्र से गीली हुई थी. कितना उन्मादी पल था वो. कैसी मस्ती में डूब गयी थी वो. आज फिर वैसा ही खुमार धीरे धीरे उसपर हावी होता जा रहा था. उसकी पलकें नशे से भारी होने लगी थी.

शांता ने अपनी भारी होती पलकें खोलकर बिरजू की ओर देखा. फिर बोली - "सबसे पहले तो तू मुझे बुआ मत कहा कर......! सिर्फ़ 3 साल छोटा है तू मुझसे."

"तो क्या कहूँ? शांता कहूँ...?" बिरजू ने शांता के बदलते हाव भाव को देखते हुए कहा.

वो एक पक्का शिकारी था. उसने शांता की आँखों में फैलती वासनात्मक लहरों को देख लिया था. उसके बदन में बढ़ती गर्मी को वो महसूस करने लगा था. उसे शांता के दिल में उठती चिंगारी को थोड़ी और हवा देने की ज़रूरत थी. फिर उस चिंगारी को शोला बनते देर नही लगना था. वो ये भी जान गया था कि शांता उसके बातों का विरोध भले ही करे.....पर हो-हल्ला नही करेगी.

"जो जी में आए कह.....पर बुआ मत कहा कर." शांता काँपते स्वर में बोली.

"तो ठीक है शांता.....अब बता दो....कहाँ जा रही हो?" बिरजू ने कामुक स्वर में कहा.

"तू आख़िर चाहता क्या है ये बता?" शांता उसकी आँखों में झाँकते हुए बोली.

"चाहता तो बहुत कुच्छ हूँ....पर जो भी तुम खुशी से दोगि मैं ले लूँगा.....शांता." वह ढिठई के साथ बोला. उसने शांता शब्द पर फिर से ज़ोर दिया.

शांता सर से पावं तक काँप गयी. उसे बिरजू के साहस पर आश्चर्य हुआ. पर जाने क्यों उसे बिरजू पर गुस्सा नही आया..उसने बिरजू की आँखों में झाँका, वहाँ उसे वासना के अतिरिक्त कुच्छ भी नज़र ना आया. वह कुच्छ ना बोली. बस स्तब्ध होकर बिरजू के चेहरे को देखती रही. उसका दिल ज़ोरों से धड़क रहा था. बिरजू की आँखों की तपिश वो अपने अंदर महसूस करने लगी थी.

तभी, अचानक वो हुआ जिसकी कल्पना शांता ने नही की थी. बिरजू ने उसे एक हाथ से गर्दन से पकड़ा और उसके होंठो पर अपने होंठ रख दिया.

शांता.....अवाक ! ये सब कुछ इतना जल्दी हुआ था कि उसे कुच्छ भी समझ में नही आया था. बिरजू उसके होंठों को कुचलना आरंभ कर चुका था.

शांता छटपटाई !

इससे पहले कि वो कुच्छ और कर पाती. बिरजू ने एक और कहर ढाया. अपना एक हाथ उसके बूब्स पर रखकर दबा दिया.

शांता का शरीर ही नही उसकी आत्मा तक काँप उठी. वासना की तेज़ लहर उसके शरीर में बिजली की गति से फैल गयी. पर उसका विरोध अब भी जारी था. शांता पूरी शक्ति लगाकर उससे छूटने का प्रयास कर रही थी.....किंतु बिरजू के मजबूत हाथों की पकड़ से खुद को आज़ाद नही कर पा रही थी.

बिरजू ने उसके होंठ चूसना और बूब्स दबाना जारी रखा. बिरजू के कठोर हाथों का स्पर्श अब उसे गरमाने लगी थी. अब उसके होंठ भी बिरजू के होंठों से जुड़ने लगे थे. उसका विरोध अब दिखावा मात्र का रह गया था. बिरजू ने अपने दूसरे हाथ को गर्दन से हटाकर उसके नितंबो पर रख दिया और उसे अपनी कमर से सटा लिया. शांता उससे सॅट-ती चली गयी. बिरजू उसके नितंबो को मसल्ने और दबाने लगा.

बिरजू के होंठ अब उसके गर्दन और छाती के आस-पास घूमने लगे थे. शांता के मूह से आनंद मिश्रित सिसकारी फूटने लगी थी. बिरजू के हाथ उसके समस्त अंगो को टटोलने में लगे हुए थे. शांता की आँखें कब की बंद हो चुकी थी. शांता बिरजू के छेड़छाड़ से सूखे पत्ते की तरह उड़ती जा रही थी.

बिरजू ने अब देर करना उचित नही समझा. उसने अपने दोनो हाथों को शांता के नितंबो पर रखा और उसे उपर उठा लिया. उसे अपने हाथों में उठाए हुए वह झाड़ियों की तरफ बढ़ गया. बिरजू ने उसे लिए हुए ज़मीन पर लंबा होता चला गया. बिरजू ने उसे लिटते ही अपना एक हाथ उसकी जांघों पर रख दिया.

सहसा ! शांता की चेतना लौटी !

उसने बिरजू को एक तेज़ धक्का दिया और झट से खड़ी हो गयी.

बिरजू ने आश्चर्य से उसे देखा.

शांता अपनी उखड़ी साँसों को नियनतरित करने का प्रयास कर रही थी. उसकी आँखें नशे की खुमारी से लाल और भारी हो गयी थी.

"क्या हुआ शांता?" बिरजू ना खुशमाद भरे स्वर में पुछा.

"म......मैं ये नही कर सकती बिरजू." वह लड़खड़ाती आवाज़ में बोली.

"क्यों.....? क्या दिक्कत है?" बिरजू ने अधीर होकर पुछा.

"मैं इस वक़्त....दिन के उजाले....इस तरह खुले में ये नही कर सकती. मुझे माफ़ कर दो." शांता बोली और बिरजू के उत्तर की प्रतीक्षा किए बगैर तेज़ी से नदी की ओर भागती चली गयी.

बिरजू अपनी मुत्ठियाँ भिचता हुआ उसे जाता देखता रहा. वो चाहता तो उसके साथ ज़ोर ज़बरदस्ती कर सकता था. पर उसे शांता को प्यार से ही हासिल करना था.

शांता नदी पहुँची. उसने आनन फानन में अपने कपड़े उतारे और नदी में कूद गयी. वह छाती भर पानी में खड़ी होकर अपने जलते बदन को ठंडा करने का प्रयास करने लगी. वह पानी के नीचे सिर्फ़ पेटिकोट पहनी हुई थी.

शांता अपने बदन को सहलाते हुए अपने अंगो को छेड़ने लगी. उसका एक हाथ उसके बूब्स को कस रहा था तो दूसरा उसकी योनि द्वार में दस्तक दे रहा था.

शांता की बेचैनी बढ़ती ही जा रही थी. उसने अपने हाथ की उंगलियों से अपनी योनि को कुरेदना शुरू किया. बरसो से प्यासी उसकी योनि छुने मात्र से ही पिघल गयी.

शांता स्खलन चाहती थी. उसके शरीर में जो आग इस वक़्त लगी हुई थी...वो स्खलन के बिना शांत होने वाली नही थी. उसने देर ना करते हुए अपनी एक उंगली योनि के अंदर डाल दी. उंगली योनि में प्रवेश करते ही उसके मूह से आनंद भरी हल्की सी चीख निकल गयी.. साथ ही उसकी आँखें मस्ती में बंद होती चली गयी.

आँखें बंद होते ही उसके मानस्पटल पर बिरजू की तश्वीर उभरी. शांता के हाथ और तेज़ी से हरकत में आए. उसने अपनी दूसरी उंगली को भी योनि द्वार के अंदर थेल दिया. फिर उंगली की रफ़्तार बढ़ाई. उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे उसकी योनि पर बिरजू के हाथ मचल रहे हों. कुच्छ ही देर में उसका बदन थर-थाराया... फिर एक जोरदार चीख के साथ उसका यौवन रस योनि के रास्ते बहकर पानी में मिल गया. वह हाफ्ति हुई नदी की सतह से जा मिली.
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07-25-2018, 11:15 AM,
#30
RE: Hindi Sex Kahaniya काँच की हवेली
अपडेट 29

इस वक़्त दिन के तीन बजे हैं. शांता अपने कमरे में बिछि चारपाई पर लेती गहन चिंता में डूबी हुई है. शांता की सोच का आधार वो हादसा है जो बिरजू के साथ नदी के रास्ते में पेश आया था.

वह सोच रही थी कि आज वो कैसे बहक गयी. वो इतनी बेबस कैसे हो गयी कि बिरजू जैसा बदनाम इंसान उसके अंगो को छुता रहा....मसलता रहा और वो उसका विरोध तक ना कर सकी. वो इतनी कमज़ोर तो पहले ना थी.....फिर आज वो इतनी कमज़ोर कैसे हो गयी कि एक पराया इंसान उसके साथ मनमानी करता रहा और वो उसे मनमानी करने देती रही."

शांता बुरी औरत नही थी. वह एक अच्छे चरित्र की महिला थी. उसने अपनी जवानी के दिनो में भी कभी ऐसा घृणित काम नही किया था, यही कारण था कि आज की घटना को याद करके उसकी आत्मा लाहुलुहान हुई जा रही थी. पर इसमे उसका कोई दोष नही था. आख़िर वो भी हाड़ माँस की बनी हुई थी. भावनाए उसकी भी मचलती थी. वह भी किसी को पा लेना चाहती थी. उसका शरीर भी किसी मर्द के शरीर के नीचे दबकर पीसना चाहता था. ये प्राकृतिक ज़रूरत थी....इसमे उसका वश नही था.

शांता पिच्छले 8 सालों से शारीरिक सुख से वंचित थी. एक युवा शरीर आख़िर कब तक भूखा रह सकता था. उसे कभी ना कभी तो टूटना ही था.

वह 28 साल की थी जब उसका पति उसे छोड़ गया था. उसका व्याह पड़ोस के गाओं में रहने वाले दिनेश चौधरी से हुआ था. उस वक़्त दिनेश की माली हालत बहुत अच्छी थी. शांता के साथ साथ सुगना भी इस रिश्ते से प्रसन्न था.

विवाह के कुच्छ ही दिनो बाद दिनेश एक साथ कयि बुरी आदतों का शिकार हो गया. शराब के साथ साथ बाहरी औरतों का स्वाद भी लेने लगा. एक बार इन चीज़ों में जो डूबा तो उसे काम-काज का भी होश नही रहा. नतीज़ा ये निकला कि उसकी माली हालत बिगड़ने लगी. देखते ही देखते साल दो साल के अंदर उसके पास कुच्छ भी नही बचा. ना घर ना कारोबार. लेकिन शराब की आदत अब भी बनी हुई थी. घर की बिगड़ती हालत और पति की आदतों से तंग आकर शांता अपने भाई के घर चली आई. शांता के घर छोड़कर जाने के बाद दिनेश भी उसके पीछे पीछे अपनी ससुराल आ धमका और वहीं रहने लगा. लेकिन ससुराल में भी उसकी आदत नही सुधरी. यहाँ भी शराब और औरतों का रस्पान करता रहा. सुगना उसकी आदतों से परिचीत था पर बेहन का ख्याल करके वह भी ज़्यादा नही बोलता था. पर एक दिन उसकी और दिनेश की जमकर लड़ाई हो गयी. परिणामस्वरूप सुगना ने उसकी जी भर पीटाई कर दी. सरे आम हुई अपनी पीटाई से आहत होकर दिनेश शांता को छोड़कर चला गया. वो जाने से पहले शांता को ये कहकर गया कि अब वो कभी लौटकर नही आएगा. लेकिन उस वक़्त शांता ने उसकी बातों को गंभीरता से नही लिया. उसे लगा सांझ ढले तक जब दिनेश का गुस्सा और नशा उतरेगा तो वो घर लौट आएगा. पर ऐसा हुआ नही. उस दिन का गया दिनेश आज तक लौटकर नही आया था. कोई नही जानता था कि वो कहाँ गया? और कब आएगा?. वो ज़िंदा भी है या नही ये भी एक रहस्य बना हुआ था. शांता पिच्छले 8 सालों से विधवाओं जैसी ज़िंदगी जी रही थी. जब दिनेश शांता को छोड़कर गया तब चिंटू 2 साल का था और शांता 28 साल की थी.

28 साल की भरी जवानी में पति के बगैर जीना क्या होता है ये शांता ही जानती थी. उसने एक एक दिन बिस्तर पर किस तरह गुज़ारे थे....ये कोई उसकी जैसी औरत ही समझ सकती है. वह मजबूत इरादों वाली औरत थी. लेकिन पिच्छले कुच्छ दिनो से वह खुद को बहुत कमज़ोर समझने लगी थी. शायद बढ़ती उमर के साथ उसका अकेलापन अब उसे और तड़पाने लगा था.

शांता अपने इन्ही विचारों में गुम थी कि अचानक किसी के पुकारने की आवाज़ से वह चौंकी. उसकी नज़र दरवाज़े की ओर उठी तो वहाँ कंचन को खड़ा पाया. उसके चेहरे पर उलझन के भाव थे. उसकी आँखों में एक सवाल था और होंठ कुच्छ कहने के लिए फद्फडा रहे थे. - "क्या हुआ कंचन? कोई परेशानी है? कुच्छ चाहिए तुम्हे? यहाँ आओ." शांता ने एक साथ कयि प्रश्‍न पुच्छ डाले.

कंचन भीतर आई. फिर बुआ को देखकर धीरे से मुस्कुराकर बोली - "बुआ, तुम कहीं जाने वाली हो इस वक़्त?"

"नही तो. क्यों पुच्छ रही है? क्या कोई काम था?" शांता चारपाई पर उठकर बैठते हुए बोली.

"तुम कहती थी ना बुआ....मैं कभी घर पर नही रहती इसलिए तुम कहीं जा नही पाती हो. अभी मैं घर पर हूँ....तुम्हे इस वक़्त कहीं जाना हो तो जा सकती हो." कंचन किसी नन्हे बचे की तरह मासूमियत के साथ बोली.

उसकी बातों से शांता के होंठ मुस्कुरा उठे. वह प्यार से कंचन को देखते हुए बोली - "नही बेटी मैं कहीं नही जा रही. मैं बहुत थक चुकी हूँ इसलिए आराम करना चाहती हूँ. तुम जाकर अपने कमरे में आराम करो. मैं इस वक़्त कहीं नही जाना चाहती."

शांता की बातों से कंचन का चेहरा उतर गया. कंचन के उतरे चेहरे पर शांता की नज़र पड़ी. पर इस वक़्त शांता अलग ही चिंता में डूबी हुई थी. कंचन के चेहरे पर छाई उदासी को वो नही देख पाई. वह वापस चारपाई पर लेट गयी.

कंचन कुच्छ देर यूँही व्याकुलता के साथ खड़ी सोचती रही फिर एक नज़र शांता पर डालकर बाहर निकल गयी. बाहर बरामदे में आकर वो बेचैनी से टहलने लगी. रह रहकर उसकी नज़र मिट्टी की दीवार पे तंगी घड़ी की ओर जा रही थी. घड़ी की सुइयों की खट्ट-खट्ट.....उसके सीने में दस्तक देकर उसके दिले की धड़कानों को बढ़ाती जा रही थी.

उसे 5 बजे रवि से मिलने जाना था. वह रवि को आज अपने हाथों से बनाई खीर खिलाना चाहती थी. पर समस्या यह थी कि शांता के होते वो खीर नही बना सकती थी. यदि शांता ने उसे खीर बनाते देख लिया तो तरह तरह के सवाल पुच्छने लगेगी. किंतु खीर तो उसे बनाना ही था. बिना खीर के वो रवि से मिलने नही जा सकती थी.

कंचन इसी उधेड़बुन में बरामदे के चक्कर काट'ती रही. कुच्छ देर बाद वो फिर से शांता के कमरे के दरवाज़े तक गयी. उसने अंदर झाँका. शांता आँखें बंद किए चारपाई पर एक और करवट लिए सो रही थी. शांता को सोता देख कंचन के दिमाग़ में तेज़ी से विचार कौंधा. उसने धीरे से शांता के रूम का दरवाज़ा भिड़ा दिया फिर खीर बनाने की सारी सामग्री निकाल कर आँगन में आ गयी. कुच्छ ही देर में उसने चूल्हा भी जला लिया. जब तक चूल्‍हे में आग पकड़ती तब तक वह दूसरे कार्यों में लग गयी. उसने तय कर लिया था कि शांता के जागने से पहले ही वह खीर बना लेगी. वह तेज़ी से अपने हाथ चला रही थी. साथ ही मन ही मन यह प्रार्थना करती जा रही थी कि आज उसकी बुआ को कुम्भकर्न की नींद लग जाए. और 5 बजे से पहले उसकी आँख ना खुले.

लगभग 1 घंटे की मेहनत के बाद कंचन ने खीर बना ली. फिर उसने खीर को एक छोटे से बर्तन में रखकर बाकी सारे बर्तन धोने बैठ गयी. ताकि बुआ को ये पता ना चले कि उसने खीर बनाई है.

सारे काम निपटने के बाद उसने घड़ी में टाइम देखा 4:15 बज चुके थे. शांता अभी भी गहरी नींद सो रही थी. उसने आँगन में आकर आकाश की ओर देखा. आकाश की और नज़र जाते ही उसका दिल धक्क सा कर उठा. आकाश से सुर्य गायब हो चुका था. और उसकी जगह काले बादलों ने अपनी चादर फैलानी शुरू कर दी थी.

कंचन परेशान हो गयी. अभी रवि से मिलने जाने में 45 मिनिट का समय बाकी था. अगर उससे पहले वर्षा शुरू हो गयी तो उसे बड़ी परेशानी होने वाली थी. वह असहनी भाव से आकाश को देखती रही. खीर बनाने के बाद जो खुशी उसके चेहरे पर छाई थी अब वो छ्ट चुकी थी, अब उसकी जगह उदासी के बादल छाने लगे थे. कंचन उदास मन से बरामदे में आई और बेचैनी के साथ टहलने लगी. रह रहकर उसकी नज़र घड़ी की ओर जाती. आज घड़ी की सूइयां भी जैसे थम सी गयी थी.

कंचन एक बार फिर आँगन में मौसम का हाल देखने गयी. आकाश की ओर देखते ही उसका मुख सुखकर पतला हो गया. आकाश में लहराते काले बादल और भी घने हो गये थे. वह सोच में पड़ गयी - "अब मुझे साहेब से मिलने चले जाना चाहिए....कहीं ऐसा ना हो बारिस शुरू हो जाए.....और बारिस की शोर से बुआ जाग जाए. ऐसी हालत में बुआ मुझे घर से बाहर जाने नही देगी. हां यही ठीक रहेगा....इससे पहले की बारिस शुरू होकर मेरी भावनाओ पर पानी फेरे मैं इसी वक़्त निकल जाती हूँ."

कंचन तेज़ी से किचन तक आई. पहले उसने खीर का डब्बा उठाकर अपने दुपट्टे के अंदर छुपाया. फिर शांता के कमरे के अंदर निगाह डाली. शांता अभी भी सो रही थी. कंचन ज्यों का त्यों दरवाज़ा धीरे से बंद करके आँगन में आ गयी. चिंटू खेलने बाहर गया हुआ था. कंचन आँगन के दरवाज़े को धीरे से भिड़ा कर तेज़ी से घाटी की ओर जाने वाले रास्ते पर बढ़ गयी.

कुच्छ ही देर में कंचन उस स्थान पर पहुँच गयी जहाँ वह रोज़ रवि से मिला करती थी. वह झरने के किनारे स्थित उसी पत्थेर पर बैठ गयी जिसपर रोज़ ही बैठकर गिरते झरने को देखा करती थी. उसके बदन में इस वक़्त गुलाबी रंग की कुरती और उसी रंग की पाजामी थी. उसके हाथों में खीर का वही डब्बा था जिसे वा रवि के लिए घर से लेकर आई थी.

कंचन पत्थेर पर बैठी बार बार पिछे मुड़कर देखती जा रही थी. उसे रवि का बेसब्री से इंतेज़ार था. बार बार वह खीर के डब्बे को देखती और मंद मंद मुस्कुराती. साथ ही ये भी सोचती जा रही थी कि पता नही उसका बनाया खीर रवि को पसंद आएगा भी या नही. खीर बनाने के बाद कंचन ने उसे चखा था. उसकी बनाई खीर रात में बुआ के निर्देश पर बनाई खीर जितनी स्वदिस्त नही लगी थी. जल्दबाज़ी में कंचन से खीर उतनी अच्छी नही बन सकी थी.....जितनी अच्छी रात वाली खीर थी.

खीर के साथ साथ एक और चिंता कंचन को परेशान किए जा रही थी. उसकी दूसरी चिंता आकाश में मंडराते काले बादल थे जो तेज़ी के साथ वातावरण को अपनी चपेट में लेटे हुए उसे भयानक रूप प्रदान करते जा रहे थे. तेज़ हवाओं की साय साय और मौसम के बदलते तेवर से कंचन का नन्हा सा दिल बैठा जा रहा था.

अभी वह गर्दन उठाए आकाश में उड़ते बादलों को देख ही रही थी कि वर्षा की दो मोटी बूंदे उसके चेहरे पर आकर गिरी. फिर देखते ही देखते बूँदा- बाँदी भी शुरू हो गयी.

कंचन जहाँ खड़ी थी उससे थोड़ी दूर खोहनुमा बड़ा सा पत्थेर था. पत्थेर इतना बड़ा था कि उसके नीचे दर्ज़नो आदमी बारिस से अपना बचाव कर सकते थे. कंचन का मन उस पत्थर की आड़ में जाने को हुआ पर अगले ही पल इस विचार ने उसके पावं रोक दिए कि अगर इस वक़्त साहेब आ गये और उसे ना देख पाए तो कहीं ऐसा ना हो कि साहेब निराशा में वापस लौट जाएँ. वे तो यही समझेंगे कि बारिस की वजह से कंचन आई नही होगी. ऐसे में उसका मिलन साहेब से नही हो सकेगा.

कंचन वहीं खड़ी रही. उसने पत्थेर की शरण लेने का विचार त्याग दिया.

बारिश की बूंदे अब तेज़ होने लगी थी. कंचन को खीर की चिंता हुई, कहीं ऐसा ना हो बारिस में भीगकार उसका खीर ठंडा हो जाए. उसने अपना दुपट्टा गले से उतारकर खीर के डब्बे को अच्छी तरह से लपेटने लगी. फिर एक नज़र रास्ते की ओर डालकर उसी पत्थेर पर उकड़ू बैठ गयी. वह खीर के डब्बे को अपनी कोख में छुपाये हुए थी. उसे खुद के भीगने की चिंता नही थी....उसे चिंता थी तो खीर की. उसे ये भी चिंता नही थी कि इस तरह भीगने से वो बीमार पड़ सकती है.....उसे चिंता थी तो इस बात की कि कहीं भीगने से खीर ठंडा ना हो जाए......कहीं खीर के ठंडा होने से उसका स्वाद ना बिगड़ जाए. कहीं साहेब ये ना कह दे कि कंचन तुम्हे खीर बनाना नही आता. उसे इस वक़्त खुद से ज़्यादा खीर की चिंता थी. वह उसी प्रकार बैठी बारिस में भीगति रही.

वर्षा अपने पूरे यौवन पर पहुँच चुकी थी. मूसलाधार बारिस और बहती तेज़ हवाओं की साईं साईं से वातावरण संगीतमय हो उठा था. लेकिन बारिस का यह संगीत इस वक़्त कंचन को बिल्कुल भी अच्छा नही लग रहा था. वह तो बारिस की ठंड और तेज़ हवाओं के थपेड़ों से मरी जा रही थी. हवाओं के साथ पानी की छीटें जब उसके शरीर से आकर टकराते तो उसे ऐसा प्रतीत होता मानो किसी ने उसके शरीर में एक साथ सैंकड़ो सुई चुभो दी हों. उसका शरीर ठंड से सिकुड़ता जा रहा था. पूरे बदन में तेज़ कंपकंपी सी हो रही थी. दाँत ऐसे बज रहे थे जैसे वे अभी जबड़े से निकलकर बाहर आ जाएँगे.

पूरे एक घंटे तक कंचन उसी पत्थेर पर बैठी भीगति बारिस की मार सहती रही. एक घंटे तक वर्षा धरती को जलमग्न करने के बाद चली गयी. बारिस के रुकते ही कंचन काँपते पैरों के साथ खड़ी हुई. फिर आँखों में अपने साहेब को देखने की आस लिए उस रास्ते की तरफ निगाह डाली, जिस और से रवि आने वाला था. पर रवि दूर दूर तक कहीं दिखाई नही दिया. उसकी आँखें पीड़ा से गीली हो गयी. उसका साहेब अभी तक नही आया था.

एक तो बारिस की मार, उसपर रवि का ना आना. कंचन को अंदर तक पीड़ा पहुँचती चली गयी. वह काफ़ी देर तक टक-टॅकी लगाए उसी रास्ते की और देखती रही. उसका मन निराशा से भरता जा रहा था. उसे लगने लगा था कि उसके साहेब अब नही आएँगे. वे इतनी बारिस में यहाँ आने की मूर्खता नही दिखाएँगे. साहेब उसकी तरह दीवाने नही हैं जो ऐसे मौसम में उससे मिलने आएँगे. पर दूसरा मन ये कह रहा था कि साहेब ज़रूर आएँगे. वो तुमसे प्यार करते हैं, वो तुम्हे इस तरह नही सता सकते, तू थोड़ा इंतजार कर वो ज़रूर आएँगे.

कंचन अपने गीले वस्त्रो में चिपकी पुनः उसी पत्थेर पर बैठ गयी. सर को घुटनों पर रखा और सिसक पड़ी. उसे इस वक़्त ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने उसका सब कुच्छ छीन लिया हो.......जैसे वो पूरी तरह से लूट चुकी हो.......उसे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे वो बीच सागर में अकेली किसी नाव में बैठी डूब रही हो पर कोई उसे बचाने वाला नही. कंचन ठंड से कांपति सिसकती रही.
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