Desi Sex Kahani बाली उमर की प्यास
10-22-2018, 11:35 AM,
#51
RE: Desi Sex Kahani बाली उमर की प्यास
बाली उमर की प्यास पार्ट--36

गतान्क से आगे..................

"आ गयीं दीदी?" पिंकी की नटखट आवाज़ कानो में पड़ते ही मीनू ऐसे उच्छल पड़ी जैसे उसको किसी बिच्छू ने काट लिया हो... मीनू ने रात करीब 12:30 बजे उपर कमरे में पैर रखा था....

"आ..हां.. ना..न्ना.. पेट खराब है म्‍म्मेरा... बाथरूम गयी थी... तू उठ क्यूँ गयी.. अभी तो सारी रात बाकी है...!" मीनू का साया बाहर चाँद की रोशनी में साफ साफ कांपता हुआ सा देखा जा सकता था....

"अभी तो मैं सोई ही नही हूँ दीदी... आपकी राह देख रही थी.. आप उपर कब आईं....?" पिंकी को मैने लाख समझाया था की उसको आते ही कुच्छ मत बोलना.. पर पता नही वह किस मिट्टी की बनी हुई थी....

"म्म्मैन.. त्तु.. सोई क्यूँ नही..." मीनू को उगलते बना ना निगलते... वह पिंकी के पास जाकर लेट गयी...,"तू मम्मी को नही बोलेगा ना पिंकू?" मक्खांबाज़ी शुरू...

"हे हे हे हे हे...!" हँसी पिंकी के दिल की गहराइयों से निकली थी...

"हंस क्यूँ रही है..? बता ना? मम्मी को बोलेगी क्या?" पिंकी की हँसी मीनू को सामने खड़े किसी भयंकर देत्य की हुंकार से कम नही लगी होगी.. उसका आवाज़ बैठ सी गयी..

"पहले बताओ.. लंबू से प्यार करती हो ना...?" पिंकी फोकट में ही नखरे दिखाने लगी..

"प्लीज़.. तेज़ मत बोल.. अंजू जाग जाएगी... आजा.. मेरी प्यारी पिंकू..!" ये तो होना ही था...

"पर वो तो जाग रही है... ऐसे ही आक्टिंग कर रही है सोने की... अन्जुउउ.." पिंकी ने कहकर मेरी रज़ाई खींच ली...

मैं सोने का बहाना किए रही... मेरा ख़याल था कि पिंकी मीनू से सब कुच्छ पूच्छ लेगी जो मीनू शायद मुझसे शे-अर् ना करती...

"अंजू.. ये क्या नाटक है यार.. जाग रही है तो बोल दे ना!" मीनू की सकपकाई हुई आवाज़ मेरे कानो में पड़ी तो मैं चुप ना रह सकी...,".. दीदी.. वो हम बातें कर रहे थे.. अभी तक.....!"

मीनू के पास अब कोई चारा नही बचा था.. खड़ी होकर उसने लाइट 'ऑन' कर दी... और गुम्सुम सी सिर झुकाए हमारे बीच आकर बैठ गयी...

"क्या हुआ दीदी.. तुम उदास क्यूँ हो...?" पिंकी मीनू को नाराज़ नही देख सकती थी...

"कुच्छ नही.. तुम लोग किसी को बतओगि तो नही ना....?" मीनू ने सिर झुकाए हुए ही कहा....

"नही दीदी.. आपकी कसम.. मैं किसी को नही बताउन्गि... पर बताओ ना... लंबू से प्यार..."

पिंकी की बात अधूरी ही रह गयी... मीनू ने लगभग झूमते हुए चीख कर इकरार किया...,"हाआआअन.. अब तो बस करो मेरी अम्मा!" मीनू ने कहा और आगे झुक कर अपने चेहरे को रज़ाई में च्छूपा लिया....

"पूरी बात बताओ ना दीदी...", पिंकी ने मीनू के सिर को पकड़ कर उपर उठाने की कोशिश की..,"लंबू ने तुम्हे चोद दिया क्या?"

पिंकी की इस बात पर मैं भी आस्चर्य से आँखें फाड़ कर उसके मासूमियत से भरे चेहरे को देखने लगी.. मीनू का क्या हाल हुआ होगा.. आप खुद ही अंदाज़ा लगा लो... मीनू अचानक सीधी हुई; हड़बड़कर एक नज़र मुझे देखा और फिर गुस्से और लज्जा से तमतमयी हुई पिंकी को देखने लगी... उसका मुँह अभी तक खुला हुआ था....

पिंकी मीनू की आँखों की भाषा पढ़ कर समझ गयी कि उसने कुच्छ ग़लत बोल दिया है.. थोडा सकुचा कर पिछे सरकते हुए बोली...,"क्या हो गया दीदी...?" मीनू के थप्पड़ से बचने के लिए वह पहले ही अपना बयान हाथ अपने गाल पर ले गयी थी...

"क्या हुआ की बच्ची.. कहाँ से सीखी तूने ये बात...?" मीनू अपने आवेगो को दबाती हुई बड़बड़ाई... अगर उसका 'राज' पिंकी के पास ना होता तो एक झापड़ तो पक्का था ही... पिंकी की उस बात पर...

"क्कौनसी बात दीदी...?" पिंकी सहम कर बककफूट पर आ गयी... उसका हाथ अभी तक उसके गाल की ढाल बना हुआ था....

"यही....." मीनू सच में गुस्से में थी..,"जो तूने अभी बोली थी...!"

"अच्च्छा.. ववो... वो तो मुझे खुद ही पता है... नंगे होकर प्यार करें तो यही तो बोलते हैं...!" पिंकी ने मासूमियत से जवाब दिया...

"म्मै तेरी.... हे भगवान..! कैसे सम्झाउ इस पागल को..." पिंकी के बच्पने पर मीनू ने अपना माथा पीट लिया... और फिर अचानक जाने क्या सोच कर उसकी हँसी छूट गयी...,"किसी और के सामने मत बोलना ये बात.. बहुत गंदी गाली है...!" मीनू ने पिंकी के कंधों को पकड़ कर उसको झकझोर सा दिया...

"मैं पागल हूँ क्या..? किसी और के सामने क्यूँ बोलूँगी... मैं तो बस आप ही से पूच्छ रही थी...!" पिंकी ने अपना मुँह फूला लिया..

"ना.. मुझसे भी मत करना ये बात कभी... समझ गयी मेरी लाडो!" मीनू ने उसको गले से लगा लिया...

"तो किस'से करूँ दीदी...?" पिंकी के सवाल ख़तम ही नही हो रहे थे...

"चुप हो जा मेरी अम्मा... आजा सो जा... जब तू बड़ी होकर किसी से प्यार करेगी तो सब समझ आ जाएगा... किसी से पूच्छने की ज़रूरत नही पड़ेगी.. समझी...?"

"पर मैं तो अभी से प्यार करती हूँ...!" पिंकी ने एक और गोला भटका दिया... मीनू तो बस उसको देखती ही रह गयी..,"तू? .... किस'से?"

पिंकी ने मीनू के कान में कुच्छ कहा... मुझे सुना नही.. पर मैं समझ गयी थी.....

"अच्च्छा बेटा.... इसीलिए तू बार बार पैसे देकर आने की रट लगा रही है... कहीं नही जाना तुझे... अब देती हूँ मैं तेरे को पैसे....!" मीनू गरमाई नही थी.. खाली बंदैर्घूड़की ही दे रही थी शायद....

"हुन्ह.. हूंनूः.. अब इसको भी पता चल गया होगा... आपने क्यूँ बोला...?" पिंकी अपना नीचे वाला होन्ट बाहर निकाल कर रुन्वसि सी हो गयी...

"कहाँ जाएगी अभी से प्यार करके तू..? इत्ति सी तो है... संभाल जा छ्होरी.. सँभाल जा...!" मीनू पिंकी की और आँखें निकालती हुई बोली....

"आप कर सकते हो तो मैं क्यूँ नही कर सकती... मैं क्या करूँ.. मुझे वो बहुत अच्च्छा लगता है...!" पिंकी बग़ावत पर उतर आई....

"चुप होगी तभी तो बताउन्गि... मानव मुझसे शादी करने वाला है.. अपने घर वालों को यहाँ भेजेगा....!" मीनू ने खुशी से झूमते हुए तकिया उठाकर अपनी गोद में रख लिया....

"सच!" पिंकी की आँखें चमक उठी... अपने प्यार को भूल कर 'वो' दीदी के जबातों को महसूस करती हुई बोली...

"हाँ तेरी कसम...! कितना अच्च्छा है ना 'वो'?" मीनू ने उसको कहने के बाद मेरी तरफ देखा.. मैं भी मुस्कुराती हुई उठकर बैठ गयी....

"हॅरी उस'से भी अच्च्छा है... भूल गयी हमें कितनी चीज़ें खिलाई थी शहर में... बैठकर गाड़ी में गाँव भी लेकर आया था... बेचारा...!" पिंकी तुलना पर उतर आई...,"लंबू ने तो मुझे पता है क्या बोला था शहर आते ही... 'इसको क्यूँ उठा लाए?" पिंकी ने उसकी नकल करते हुए अपनी आँखें गोल कर ली...

"हे भगवान... कौन बुद्धि देगा तेरे को...? तू और तेरा हॅरी... बस कर अब.. सो जा!"

"तुम किस'से प्यार करती हो अंजू...? तुम भी बताओ ना...?" पिंकी का ये 'वो' सवाल था जिसको मैं कभी भुला नही पाउन्गि....

मेरे होन्ट खुले के खुले रह गये... मैं अवाक सी उन्न दोनो को देखती रह गयी... अपने मंन का; अपने दिल का कोना कोना छान मारा... पर 'ऐसी' कोई तस्वीर मेरे जहाँ में आई ही नही जिसको मैं 'अपना' कह सकती... ऐसा कोई अक्स मेरे मानस पटल पर उकेरा ही नही गया था जिसको याद करके मैं 'वैसी' ही चमक अपनी आँखों में ला पाती जैसी उस वक़्त मीनू और पिंकी की आँखों में मुझे दिखाई दे रही थी... दरअसल मैने 'दिल' को टटोला तो उसको खाली पाया...

उल्टा मेरे दिल ने ही मुझसे सवाल सा किया..," प्यार? .... ये क्या होता है अंजू..!" और जवाब में मेरे अंदर के ख़ालीपन से एक टीस सी उभर कर 'दर्दनाक कसक' के रूप में मेरे चेहरे पर च्छा गयी.... एक 'आह' मेरे अंदर से निकली तो मुझे महसूस हुआ जैसे शादियों बाद मैने साँस ली हो.... पर 'वो' भी खाली ही थी.. नितांत अकेली....

"क्या हुआ अंजू?" मेरे चेहरे के भावों को पढ़ते हुए मीनू ने पकड़ कर मुझे हिलाया....

"क्कुच्छ नही..." मैने नज़रें झुका ली....

"कुच्छ तो बात है यार.. किसी ने चीट किया है क्या?" मीनू ने पूचछा...

जिसने आज तक खुद को ही छला हो.. उसके साथ कोई क्या 'चीट' करेगा..... मैं एक बार फिर अपने मंन की परतें उघेदने लगी... बचपन से आज तक.. जो कुच्छ देखा समझा है.. मैं तो उसी को 'प्यार' मानती आई थी... मैने तो आज तक यही जाना था की प्यार खाली 'करने' की चीज़ है.. मुझे नही पता था कि 'प्यार' को चेहरे के नूर और आँखों में अनोखी चमक से महसूस किया जाता है.. जैसा उन्न दोनो के चेहरो पर दिख रहा था.... मुझे कहाँ पता था कि कपड़े उतारने को 'प्यार' नही बोलते.. !

अपने रूप सौंदर्या पर गर्व करके हमेशा गर्दन ऊँची करके चलने वाली मैं अचानक उन्न दोनो के सामने खुद को तुच्च्छ और अछूत सी समझने लगी... फिर भी दिल के किसी कोने में एक इच्च्छा ज्वलंत हो रही थी... 'कोई मुझसे भी 'प्यार' करे! मैं भी किसी से 'प्यार करूँ!

"क्या हुआ? नींद में है क्या?" मीनू ने एक बार फिर मुझे हिला दिया...

"आ..आहान.. नींद आ रही है...!" मैं कुच्छ और नही बोली.....

"अच्च्छा.. चलो सो जाओ...!" मीनू बोली और लेट'ने को हुई ही थी कि वापस उठ कर बैठ गयी...,"सुन... मैं बताना भूल गयी.. पापा ने चाचा से तुम्हे कंप्यूटर क्लासस के लिए शहर भेजने को पूचछा था... उन्होने सॉफ मना कर दिया..!"

"कोई बात नही..." मैने और कोई प्रतिक्रिया नही दी...

"सुन तो.. एक बुरी खबर भी है... तुम दोनो के लिए....!" मीनू ने कहा....

"क्या है..? मेरी भी कॅन्सल हो गयी क्या?" पिंकी तुनक कर बोली....

"हाँ! चाचा कह रहे थे कि उन्होने 'गुरुकुल' में बात कर ली है.. रिज़ल्ट से पहले ही अड्मिशन चालू है.. अंजू को चाचा वहीं भेज रहे हैं दो चार दिन में... पापा कह रहे थे कि पिंकी को भी वहीं दाखिल करा देंगे.....!"

"क्या?" पिंकी गुस्से से पैर पटकती हुई बोली...,"मुझे नही जाना अभी कहीं भी... मैं च्छुतटियों का पूरा मज़ा लूँगी... पहले ही बता रही हूँ....!" पिंकी ने कहने के बाद अपनी टाँगों से मीनू को दूसरी और धकेलना शुरू कर दिया....

"मैं क्या कह रही हूँ.. पापा से बात करना...!" मीनू अपने पेट में गढ़ी हुई उसकी टाँगों को अलग हटाकर हँसती हुई बोली.....

सुबह मैं उठी तो मीनू बिस्तेर पर नही थी.. मैं हड़बड़कर उठी और तुरंत पिंकी को हिलाकर जगाया....

"क्या है.. सोने दे ना!" पिंकी नींद में ही अंगड़ाई लेती हुई सी बोली...

"मीनू...?" मैने पूचछा.....

"बाहर होगी... देख लो.. मुझे क्यूँ...?" पिंकी अचानक बोलना बंद करके झटके के साथ उठ बैठी..," कहाँ हैं दीदी?"

"वही तो मैं पूच्छ रही हूँ...? नीचे चलकर देखें?" मेरे कहने से पहले ही पिंकी बिस्तर से अलग खड़ी हो चुकी थी... उसने बाहर निकल कर बाथरूम में देखा और फिर नीचे सीढ़ियों में मुँह करके आवाज़ लगाई...,"दीदी....?"

"हां.. आ रही हूँ...!" मीनू ने नीचे से ही जवाब दिया.. कुच्छ देर बाद वह उपर ही आ गयी....

"आप फिर नीचे चले गये थे क्या?" पिंकी ने पूचछा...

"अभी तो गयी थी.. आधा घंटा पहले...." मीनू सफाई देती हुई बोली....

"झूठ.. लंबू से पूच्छून क्या?" पिंकी कहने के बाद हँसने लगी....

"मैं तेरी...." मीनू ने उसको पकड़ कर बिस्तर पर गिरा दिया और फिर हँसने लगी...,"वो तो चला भी गया...!"

"कब? मुझे 'जीजू' को बाइ बोलना था..." पिंकी वापस खड़ी होकर शरारत से मुस्कुराइ.....

"तू बहुत बोलने लगी है आजकल... तेरा इलाज करना पड़ेगा...!" मीनू गुस्सा होने का दिखावा करती हुई बोली.. पर सच तो उसका चेहरा बयान कर ही रहा था....," चल अब काम करवा दो जल्दी जल्दी... फिर अंजू को 'वहाँ' फोन करना है...! मानव ने बोला है..."

"कहाँ?" पिंकी से पहले मैं बोल पड़ी...,"उस के पास क्या?"

"हाँ... मैने मानव को बता भी दिया की तू ही उस'से बात करती है....!" मीनू बोली...

"क्यूँ?" मैने पूचछा.....

"वो कह रहा था कि तू ज़्यादा खुलकर बात कर सकती है.. फिर मैने उसको बता ही दिया....!" मीनू ने जवाब दिया...

"हुम्म.. कोई बात नही...!" मैने कहकर अपने कंधे उचका दिए और जल्दी जल्दी काम निपटाने में लग गये....

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"उसका नंबर. तो स्विच्ड ऑफ है...!" मैने अलग जाकर नंबर. ट्राइ किया और वापस आकर हताशा में अपने कंधे उचका दिए....

"दूसरे नंबर. पर ट्राइ कर ना... उसने एक और नंबर. से भी तो फोन किया था...!" मीनू याद दिलाती हुई बोली...

"हां.. पर मुझे नंबर. याद नही है....!" मैने जवाब दिया....

"अर्रे मैने इसमें 'सेव' किया था... देना एक मिनिट....!" मीनू ने मेरे हाथ से फोन लिया और और 'वो' नंबर. ढूँढ कर फोन वापस मुझे पकड़ा दिया...,"ये ले!"

"ठीक है.. मैं ट्राइ करती हूँ..." मैं फोने लेकर वापस एक तरफ चली गयी... खुशकिस्मती से नंबर. लग गया....

"हेलो...!" उधर से एक लड़की की पैनी आवाज़ आई....

"ज्जई... 'वो' है...!" मैं लड़की की आवाज़ सुनकर हड़बड़ा गयी....

"वो?... कौन 'वो'? कहाँ मिलाया है आपने?" उधर से आवाज़ आई....

"जी वो... नाम तो पता नही.. इस नंबर. पर उनसे बात हुई है पहले...!" मैने कहा...

"रॉंग नंबर....!" उसने कहते ही फोन काट दिया और एक बार फिर मेरा इंतजार कर रही मीनू और पिंकी के पास आ गयी....,"कोई लड़की थी....रॉंग नंबर. कहकर काट दिया..."

"अच्च्छा..! क्या बोला था तूने..." मीनू ने पूचछा....

"मैं क्या बोलती.. यही बोला था कि इस नंबर. पर मेरी बात हुई थी.. अब नाम तो नही ले सकती ना! उसने बताया ही नही कभी अपने मुँह से.... नंबर. तो यही था ना....?" मैने पूचछा....

"हां यार.. नो. तो पका यही था... चल छ्चोड़.. जब 'वो' फोन ही नही करता तो हमें क्या पड़ी है... हमारा पीचछा छ्छूटना चाहिए बस!" मीनू ने कहते हुए मुझसे फोन लेकर मानव को सारी बातें बता दी...

जैसे ही मीनू ने फोन काटा.. पिंकी उसके पास जाकर बोली..,"दीदी.. ववो..!"

"क्या?"

"ववो.. मैं कह रही थी की हॅरी के पैसे दे अओन क्या?" पिंकी थोड़ा हिचक कर बोली....

"ना! कोई ज़रूरत नही है.. मैं अपने आप भिजवा दूँगी.. तू ज़्यादा स्यानी मत बन...!" मीनू ने उसको झिड़कते हुए कहा....

"प्लीज़ दीदी... हम जाते ही वापस आ जाएँगे.. जाने दो ना!" पिंकी ने मीनू के कंधे पर सिर रख लिया....

"ना... कह दिया ना.. अब गुस्सा मत दिला मुझे.. बड़ी आई प्पया...!" मीनू कुच्छ और भी बोलना चाहती थी.. पर शायद उसने बोलने से पहले अपने गिरेबान में झाँक लिया....

"ये क्या बात हुई दीदी..?" पिंकी तुनक कर उस'से दूर हट गयी...,"मैने कुच्छ बोला आपको.. आप लंबू के पास नीचे चली गयी.. और.. और... आपने 'प्यार' भी कर लिया.. मुझे भी जाने दो ना...!"

"आए.. ज़्यादा बकवास की ना...... मम्मी पापा की कसम.. मुझसे बात मत करना अब...!" मीनू गुस्से में उफान सी पड़ी....

"सॉरी!" पिंकी ने नज़रें झुका ली...

मीनू का चेहरा सफेद सा पड़ गया था और वो बचाव की मुद्रा में आ गयी...,"तुम्हारी कसम यार.. ववो.. वो तो जब उसने शादी की बात करी तो मैं एमोशनल सी हो गयी थी..... तुझे जाना है तो चली जा.. पर...."

"प्लीज़ दीदी.. हम जल्दी वापस आ जाएँगे... खुश होकर जाने दो ना! अंजू को भी तो साथ लेकर जा रही हूँ मैं...!" पिंकी एक बार फिर याचना सी करने लगी...

"ठीक है... जाओ.. पर जल्दी वापस आ जाना प्लीज़...!" मीनू ने आख़िरकार वक़्त की नज़ाकत को देखते हुए हथियार डाल ही दिए....,"आकर मुझे पूरी बात बताना क्या चक्कर है ये..? और कब से है....?"

"थॅंक यू दीदी.. आइ लव यू!" पिंकी उच्छलते हुए मीनू से लिपट गयी...,"मैं सब कुच्छ बता दूँगी.. थॅंक यू... चल अंजू!"

"पिंकी तूमम्म?......... आओ!" हमें अपने सामने पाकर हॅरी हड़बड़कर कुर्सी से उठ कर खड़ा हो गया.. पर हम उसके सामने बैठे आदमी की वजह से हिचक कर दरवाजे पर ही अटक गये... पिंकी कुच्छ नही बोली...

"आओ ना.. अंदर आओ; ... कैसे आना हुआ?" हॅरी ने खड़े खड़े ही हमें दोबारा टोका...

"मैं सुबह भी आई थी.. तुम मिले ही नही...!" पिंकी सकुचते हुए बोली....

"आ.. हां.. वो आज मैं दिन भर बाहर था.. सॉरी.. बोलो..!"

पिंकी ने हमारी पीठ करके बैठे आदमी को घूर कर देखा..,"कुच्छ नही.. ऐसे ही... कुच्छ काम था...!"

"तो बोलो ना.. अंदर तो आ जाओ.. बाहर क्यूँ खड़ी हो?" हॅरी अभी तक खड़ा था...

"ओके सर.. मैं आपको बाद में फोन कर लूँगा... मेरे ख़याल से मुझे अब चलना चाहिए...!" अचानक दूसरा आदमी अपनी मौजूदगी को हॅरी की निजी जिंदगी में दखल मान कर खड़ा हुआ और हॅरी की तरफ अपना हाथ बढ़ा दिया...

"ठीक है.. मैं खुद ही आपको फोन करता हूँ...!" हॅरी टेबल के दूसरी तरफ आते हुए बोला.. आदमी को पलट'ता देख हम दरवाजे से अलग हटकर खड़े हो गये... वो आदमी हम दोनो पर सरसरी सी नज़र डालता हुआ दरवाजे से निकल गया...

"ये कौन था?" पिंकी ने उस आदमी के जाते ही हॅरी से पूचछा...

"था कोई.. तुम छ्चोड़ो ना.. अपनी बताओ.. कैसे आना हुआ..." हॅरी ने उसकी बात को टालते हुए कहा..,"बैठो तो पहले..!"

"नही बताओ.. ये तुम्हे 'सर' क्यूँ कह रहा था.. ?" पिंकी अंदर जाकर कुर्सी पर बैठ गयी.. मैने भी अपने लिए कुर्सी ढूँढ ली..

हॅरी वापस जाकर हमारे सामने बैठ गया....,"हा हा हा... क्यूँ? मुझे कोई 'सर' नही बोल सकता क्या?"

"पर ये तो तुमसे काई साल बड़ा था ना?... और पैसे वाला भी लग रहा था.." पिंकी जाने क्या बात लेकर बैठ गयी....

"अच्च्छा जी.. आज के बाद मुझे कोई सर बोलेगा तो मैं उसको मना कर दूँगा.. अब खुश?" हॅरी मज़ाक मज़ाक में उसकी बात को टालते हुए बोला,"अब तो बता दो, आज फिर....? हे हे हे"

"नही!" पिंकी तुनक कर बोली...

"तो फिर?" हॅरी उसका लहज़ा सुनकर संजीदा हो गया...

"ये लो तुम्हारे पैसे!" पिंकी ने अपने साथ लाए पैसे टेबल पर पटक दिए...

"पैसे? कौँसे पैसे यार?" हॅरी अचंभित सा हो गया...

"मुझे नही पता.. दीदी ने देने को बोला था... ऐसे किसी के पैसे नही रखते.. शहर में तुमने इतना खर्चा किया.. दीदी बोल रही....." पिंकी बोलती ही जा रही थी की हॅरी ने अजीब सी नज़रों से उसकी और देखते हुए उसको बीच में ही टोक दिया...,"क्क्या.. तो क्या मैं इतना भी नही कर सकता...?"

"क्यूँ? तुम क्यूँ करोगे ....? तुम कोई मुझसे प्या...." शुक्रा है पिंकी को बोलते बोलते ही समझ में आ गया 'वो' क्या बोलने वाली थी.. वा आधी बात को अपने अंदर ही पी गयी....,"ववो.. कल पापा मुझे 'गुरुकुल' में छ्चोड़ कर आने वाले हैं... !"

"अच्च्छा... अब तुम गुरुकुल में पढ़ोगी.. वेरी गुड!" हॅरी ने जवाब दिया...

"इसमें वेरी गुड क्या है..? हॉस्टिल में रहना पड़ेगा हमें!" पिंकी तुनक कर बोली...

"हां तो अच्च्छा ही है ना!" हॅरी ने मुस्कुराते हुए कहा तो पिंकी ने आँसू टपकाने शुरू कर दिए..,"इसके सामने मेरी बे-इज़्ज़ती क्यूँ कर रहे हो? सीधे सीधे बोल दो ना कि तुम मुझसे प्यार नही करते...!"

पिंकी के मुँह से सीधी और सटीक बात सुनकर हॅरी सकपका सा गया..," ययए.. ये तुम.. ये क्या बात हुई यार?"

"और नही तो क्या? बोलो!"

हॅरी ने हड़बड़ाहट में मेरी तरफ देखा और फिर झेंपटा हुआ सा बोला,"मैं क्या बोलूं यार?"

"यही कि मुझसे प्यार करते हो या नही...!" सुबक्ती हुई पिंकी ने बुरा सा मुँह बनाकर पूचछा ....

शायद हॅरी की झिझक का कारण मैं ही थी..," तुम्हे पता भी है तुम क्या बोल रही हो..? ऐसी बातें ऐसे पूछ्ते हैं क्या?"

"क्यूँ? 'प्यार' करना कोई गंदी बात थोड़े ही है.. और कैसे बोलते हैं बोलो?"

"हां.. मेरा मतलब नही पर... म्‍मैइन तुमसे अकेले में बात करना चाहता हूँ.." हॅरी मेरी और देख कर पिंकी से बोला... मैने पिंकी की और देखा और उठने लगी.. पर पिंकी ने मेरा हाथ पकड़ लिया..,"अकेले में क्यूँ? क्या करोगे तुम?"

"क्या? म्‍मैइन क्या करूँगा...? बस बात ही....... और क्या?" हॅरी का चेहरा देखने लायक था...

"तो इसके सामने ही कर लो.. इसको सब पता है...!" पिंकी दनादन बोले जा रही थी....

"क्यूँ दिमाग़ की दही कर रही हो यार.. क्या पता है इसको?.. साफ साफ बोलो ना...!"

"नही.. पहले तुम बताओ मुझसे प्यार करते हो या नही... बस!"

"अब.. अब मैं तुम्हे क्या कहूँ?"

"इसका मतलब तुम मुझसे प्यार नही करते.. तो उस दिन क्यूँ..? तुम्हे देख लूँगी मैं.. चल अंजू!" पिंकी कुर्सी से खड़ी हो गयी..

"सुनो तो...!" हॅरी ने जैसे ही कहा.. मैने पिंकी का हाथ पकड़ लिया...

"छ्चोड़ो मेरा हाथ.. मुझे नही सुन'ना कुच्छ..!" पिंकी ने अपना हाथ च्छुदाने की कोशिश की.. पर च्छुदा नही पाई.. शायद 'वो' 'कोशिश' सिर्फ़ हॅरी को दिखाने के लिए ही कर रही थी.....

"हाँ.. मैं तुमसे प्यार करता हूँ.. पर मुझे नही पता था कि तुम भी....!" हॅरी ने मेरे सामने ही बोल दिया.... और उठ कर इस तरफ आने लगा....

"मैं नही करती तुमसे प्यार? अपने पैसे पाकड़ो और...." पिंकी की बात अधूरी ही रह गयी.. जैसे ही हॅरी ने उसका हाथ थामा.. वह थर थर काँपने लगी...

"मुझे विश्वास नही हो रहा पिंकी कि मैं तुम्हारे मुँह से ये सब सुन रहा हूँ.. जिस बात को मैं साल भर से तुम्हे बोलना चाहता था.. तुमने ऐसे बोल दिया जैसे 'प्यार' कोई बच्चों का खेल हो.. मैं इसीलिए हड़बड़ा गया था.... तुम्हारी कसम.. जब से मैने तुम्हे देखा है.. खास तौर से उस दिन जब..." हॅरी ने बात बीच में ही छ्चोड़ दी... ," हां.. मैं तुमसे प्यार करता हूँ..!"

पिंकी अपनी मोटी मोटी आँखें पूरी खोल कर हॅरी की आँखों में देख रही थी.. उसके रुकते ही वह बोल पड़ी..," मैं कल हॉस्टिल में चली जाउन्गि.. तुम्हे बुरा नही लग रहा....?"

"ववो.. एक मिनिट बाहर जाओगी प्लीज़..." हॅरी ने मुझसे कहा..... मैं तुरंत खड़ी हो गयी...

"न्न्नाही.. एक मिनिट...!" पिंकी की साँसें भारी हो चली थी और गालो पर अचानक च्छा गयी लाली उसके नाम को सार्थक करने लगी थी.. 'गुलबो'!... मैने पलट कर उसकी ओर देखा...

"मुझे अकेली छ्चोड़कर मत जाओ!" पिंकी सहमी हुई सी बोली...

"प्लीज़ यार... बस 2 मिनिट..!" हॅरी ने एक बार फिर कहा तो मैं उन्न दोनो को अकेला छ्चोड़ कर कमरे से बाहर आकर खड़ी हो गयी.....

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पिंकी करीब 15 मिनिट बाद बाहर आई.. मैं उत्सुकता से उसके बाहर आने का इंतजार कर रही थी.... वा नज़रें झुकाए मुझसे आगे जाकर खड़ी हो गयी,"चलो जल्दी...!"

"क्या हुआ?" मैने उसके पास जाकर उसका हाथ पकड़ लिया और उसके साथ साथ मकान से बाहर निकलती हुई बोली....

"कुच्छ नही...!" पिंकी ने बात को टालने की कोशिश की.. पर उसकी आवाज़ चाहक चाहक कर बता रही थी कि कुच्छ तो हुआ है....

"आए प्लीज़.. बता ना..! मुझसे क्यूँ च्छूपा रही है?" मैने एक बार फिर कोशिश की....

"मुझे शर्म आ रही है..." पिंकी लाजाते हुए बोली और अपना हाथ झटक लिया....

"प्लीज़.. बता दे ना.. मेरी भी तो कितनी बातें पता है तुझे....!"

"पहले बता.. मुझे नही चिडाएगी ना...?"

"तेरी कसम! मैं क्यूँ चिड़वँगी..?"

"मीनू को भी नही बताओगि!"

"हां.. नही बताउन्गि किसी को भी.. तेरी कसम...!" मैं व्याकुल हो चुकी थी...

"उसने..." बोलते हुए पिंकी गड़गड़ा उठी..,"उसने मेरी क़िस्सी काट ली...!" पिंकी ने कहते ही अपना चेहरा हाथों में च्छूपा लिया....

"फिर?" मैं उतनी ही व्याकुलता से बोली...

"फिर क्या?... बस!" पिंकी ने कहा....

"बस?" मैने आस्चर्य से पूचछा....

"हां.. बस! ये कम है क्या?" पिंकी मन ही मन नाच सी रही थी....

"नही पर.... क्या सच में उसने और कुच्छ नही किया...?"

"वह और कुच्छ भी करना चाहता था.. पर मैने करने नही दिया.... हे हे हे.." पिंकी हँसने लगी...

"क्या?"

"कह रहा था कि बस एक बार अपने होंटो पर होन्ट रखने दो... मुझे शर्म आ रही थी.. मैने करने नही दिया....!" पिंकी बोलते हुए लजा गयी....

"तो... 'वो' 'क़िस्सी' कहाँ पर दी उसने?" मैं हताश होकर बोली....

"यहाँ!" पिंकी ने अपने होंटो के बिल्कुल पास गाल पर उंगली लगा कर बताया और बुरी तरह झेंप गयी.....

"धात तेरे की... फिर इतनी देर से भाव क्यूँ खा रही थी...मैं तो समझी कि पता नही क्या हो गया...?" मैने निराशा से कहा....

"वो मुझसे प्यार करता है.. ये कोई छ्होटी बात है क्या?"

मैं निरुत्तर हो गयी.......

क्रमशः..........................
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10-22-2018, 11:36 AM,
#52
RE: Desi Sex Kahani बाली उमर की प्यास
बाली उमर की प्यास पार्ट--37

गतान्क से आगे..................

"क्या हुआ?" मुझे अचानक बज़ुबान होते देख पिंकी ने चाहक कर पूचछा...

"कुच्छ नही.. तूने चलने की तैयारी कर ली...?" मैने बात बदल दी....

"हाँ.. दीदी ने सारा सामान पॅक कर दिया होगा.. क्यूँ?" पिंकी ने जवाब देकर सवाल किया....

"बस ऐसे ही... कल से तो हम हॉस्टिल में रहेंगे.. 'दिल' तो लग जाएगा ना वहाँ?" मैने यूँही पूचछा

"हाँ.. दिल लगने में क्या दिक्कत है... हम दोनो तो साथ रहेंगे ही..." पिंकी के कहते कहते ही उनका घर आ गया था...

मीनू दरवाजे पर ही इंतजार करती मिली...,"मम्मी पापा आ गये..सुनो! मैने पापा को ये बोला है कि तुम दोनो शिखा के घर गये हो.. समझ गये ना?"

"हाँ ठीक है.. ये लो! पाकड़ो अपने पैसे...!" पिंकी ने मुट्ठी में दबाकर रखे नोट मीनू को पकड़ा दिए...

"क्या हुआ? अब भी नही मिला क्या?" मीनू ने पूचछा...

"मिला था.. उसने लिए ही नही...!" पिंकी चटखारा सा लेकर बोली...

"बेशर्म.. तू देती तो वो लेता कैसे नही... भूखी कहीं की..." मीनू ने कहा और पैसे पकड़ लिए...

"मैं चलती हूँ दीदी... अपना सामान रख लूँ... सुबह जल्दी निकलना है...!" मैने उदास मन से कहा....

"चल ठीक है.. आ..आ.. एक मिनिट.. सुन?" मीनू ने मुझे वापस बुलाया....

"हाँ दीदी..?"

"ववो.. अब वो आदमी फोन तो उठा ही नही रहा.. क्या करें?" मीनू ने पूचछा...

"छ्चोड़ो ना.. जब फोन उठा ही नही रहा तो हमें क्या दिक्कत है.. अपना पीचछा तो छ्छूट गया ना!" मैने कहा....

"नही.. मेरा मतलब... तेरे जाने के बाद उसके फिर फोन आने शुरू हो गये तो मैं क्या करूँगी.. यही सोच रही थी...!" मीनू बोली....

"आप मानव के पास फोन कर देना.. अब मैं क्या बताऊं दीदी..?" मैने हाथ मलते हुए कहा.....

मीनू ने मायूसी में सिर हिलाया...,"चल ठीक है... कुच्छ हुआ तो मैं तुझे बता दूँगी..."

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***********

घर जाकर मैने सीढ़ियाँ चढ़ते हुए जैसे ही एक मर्दाना आवाज़ सुनी.. मेरा दिल दहल गया! आवाज़ सुन्दर की थी.. एक पल को तो मेरे दिमाग़ में वापस भागने का ख़याल आया था.. पर ये सोचकर कि अपने ही घर से कब तक भागूंगी.. मैने वापस नीचे जाकर मम्मी को आवाज़ दी..,"मुमययययययी!" मुझे पापा था पापा घर पर नही होंगे.....

मम्मी ने सीढ़ियों से झँकते हुए मुझे घूरा...,"उपर आ तू, कमिनि!"

मैने डरते डरते 'ना' मैं सिर हिला दिया.. मुझे मम्मी से नही सुन्दर से डर लग रहा था..,"एक बार नीचे आ जाओ!"

"तू आ रही है या मैं नीचे आकर तेरी धुनाई करूँ..?" मम्मी ने और भी गुस्से मैं कहा..

"पर मम्मी...!" मैं बोलती बोलती बीच में ही बंद हो गयी और सहमी हुई धीरे धीरे सीढ़ियाँ चढ़ने लगी...

"हराम-जादि ... क्यूँ हमारी नाक कटाती फिर रही है.. घर में भी नही टीका जाता तुझसे..." मम्मी सीढ़ियों में आकर खड़ी हो गयी थी.. जैसे ही मैं उनकी पहुँच में आई.. वो मुझे बालों से पकड़ कर खींचते हुए उपर ले गयी... मम्मी शायद भूल गयी थी कि नाक काटने की 'ये' कला मैने उनसे ही सीखी थी...

पर मैं सुन्दर के कारण चुपचाप खड़ी रही... सुन्दर बाहर ही चारपाई पर बैठा हुआ मुझे घूर रहा था...उसके सिर पर पट्टी बँधी हुई थी..."मैने तो तेरी शर्म कर ली चाची.. वरना अब तक तो मैं इसकी गांद मार लेता साली की...!"

"बता.. क्या चक्कर है तेरा उस 'लुच्चे' संदीप के साथ...,"मम्मी उसकी बातों को अनसुना करते हुए मुझ पर बरस पड़ी... ज़्यादा जवानी चढ़ आई है क्या?.......... बोल.. बोलती क्यूँ नही... आने दे तेरे पापा को.. आज तेरी खैर नही...!" मम्मी अनाप शनाप बके जा रही थी...

मेरे कानो पर जू तक ना रैंग्ती अगर सुन्दर वहाँ नही होता... सिर्फ़ सुन्दर के कारण ही मैं चुप थी... मैं सिर झुकाए खड़ी रही...

"देख लो चाची.. कितनी भोली बनकर खड़ी है अब... जैसे इसको तो कुच्छ पता ही ना हो इन बातों का... वहाँ तो 'रंडियों' की तरह संदीप के साथ... मैं तो कहता हूँ मेरी मान ही लो चाची... कल ही लेकर आ जा इसको खेतों में..." सुन्दर ने कहा और हाथ बढ़कर मुझे पकड़ने की कोशिश की.. मैं तुरंत पीछे हट गयी...

"देखता हूँ कब तक फड़फड़ाएगी तू.. तेरे बाप के आने का टाइम हो रहा है वरना अभी पकड़ कर चो... बेहन्चोद ने मेरा सिर फोड़ दिया... " सुन्‍दर ने मुझे घूरते हुए कहा और फिर मम्मी की ओर देखने लगा..," तेरे कहने से रुका हूँ चाची... अब बोल जल्दी.. मुझे जाना भी है.....!"

"थोड़े दिन रुक जा सुन्दर.. आजकल टाइम नही लगता..." मम्मी ने बेशर्मी से कहा...

"मैं तेरी नही इसकी बात कर रहा हूँ.. सोच लेना.. बाद में मत कहना कि बताया नही था.. छ्चोड़ूँगा नही इसको मैं चोदे बिना..." सुन्दर जाता जाता जाने क्या क्या बक गया.....

" क्या है ये सब...? शर्म तो आती नही तुझे...? कुच्छ तो सोचा होता अपने बारे में...!" सुन्दर के जाते ही मम्मी का लहज़ा नरम पड़ गया....

"मैं भी बहुत पछ्ता रही हूँ मम्मी.. आइन्दा कुच्छ ग़लत नही करूँगी.. आपकी कसम..!" मैने दबे स्वरों में कहा....

"आइन्दा नही करूँगी कुच्छ...!" मम्मी ने मुँह बनाकर मेरी नकल उतारी..,"अब ये तुझे छ्चोड़ेगा तब ना... कल से मेरे पिछे पड़ा है.. कह रहा है नही तो पूरे गाँव में उड़ा देगा बात... बता अब मैं क्या बोलूं इसको.." मम्मी ने कहा और टॅपर टॅपर आँसू बहाने लगी.....

मैं बहुत कुच्छ बोलना चाहती थी.. पर 'वो जैसी भी थी.. मा थी मेरी.. बिना कुच्छ बोले मैने उनको चारपाई पर बिठाया और उनके आँसू पौच्छने लगी... जाने क्या सोच कर उन्होने मुझे गले से लगा लिया... शायद जवानी में की गयी ग़लतियों का 'जुंग' लगा पानी अब जाकर अपनी बेटी के लिए उनकी आँखों से निकला था.... बेटी, जिसको उन्होने अपने जैसी ही बना दिया.. समय से भी पहले! शायद उन्हे इस बात का बखूबी अहसास भी हो चला था.... पर अब पछ्तये होत क्या......

अगली सुबह पिंकी के पापा ही हम दोनो को लेकर गुरुकुल के लिए निकल लिए थे... 'वहाँ' जाकर उन्होने हमारे दाखिले की सभी फॉरमॅलिटीस पूरी की और ऑफीस में बैठे एक क्लर्क ने हमारे अड्मिशन की रसीद समेत छत्रावास के नियम क़ानूनो से भरा एक पर्चा हमें पकड़ा दिया...

"देखो बेटी..." चाचा पर्चे में से पढ़ पढ़ कर हमें समझाने लगे..," इस चारदीवारी के अंदर ही तुम्हे अब रहना है... इसके अंदर ही तुमहरा स्कूल, हॉस्टिल, खेलने का मैदान और खाने का मेस वग़ैरह है.. तुम्हे यहाँ पढ़ने और खेलने के अलावा कोई काम नही.. मंन लगाकर पढ़ना.. ठीक है...?" चाचा बोलते ही जा रहे थे कि पिंकी अचानक रोने लगी....

"धात पागल.. रो क्यूँ रही है..? अंजलि भी तो तेरे साथ है ना...?" चाचा ने उसको लड़ाते हुए कहा...

"पर मम्मी... मम्मी के बिना मेरा दिल कैसे लगेगा पापा..! मेरा दिल नही लगेगा यहाँ...!" पिंकी सुबक्ते हुए बोली....

"तू तो पागल है एकदम... देख तेरे जैसी कितनी लड़कियाँ हैं यहाँ... जिधर देखो उधर लड़की.. इन्न सबकी क्या मम्मिया नही हैं.. बस.. चुप कर.. सबके साथ प्यार से रहना और मॅन लगाकर पढ़ना... अपने आप दिल लग जाएगा...! अंजू को ही देख ले.. ये भी तो नही रो रही..." चाचा उसको प्यार करते हुए बोले....

"आप फिर कब आओगे...?" पिंकी ने अपने आँसू पौछ्ते हुए पूचछा....

"बेटी.. हफ्ते में एक बार ही मिल सकते हैं यहाँ... मैं हर रविवार को आ जाया करूँगा.. तेरी मम्मी को भी साथ ले अवँगा... यहाँ बस वही 2 आकर मिल सकते हैं जिसका फोटो यहाँ लगा हो.. इनके रिजिस्टर में... ओह्ह तेरे की... अंजू! फोटो लाई है मम्मी पापा का.... यहाँ चाहिए था.....!" चाचा ने अफ़सोस सा जताते हुए पूचछा....

"कोई बात नही चाचा.. आप अपना ही लगा देना..!" मैं बोल ही रही कि अचानक गुरुकुल में एक जाने पहचाने चेहरे को देख कर मैं चौंक पड़ी... 'वही' प्रिन्सिपल मेडम एक लड़की के साथ हम'से थोड़ी दूर एक लड़की के साथ खड़ी बातें कर रही थी... उसकी नज़र मुझ पर ही थी......

"फोन देना चाचा एक बार....!" मुझे मीनू को इस बारे में बताना उचित लगा... चाचा से फोन लेकर में धीरे धीरे टहलती हुई उनसे थोड़ी दूर आ गयी...

"हेलो!" मीनू की आवाज़ घर वाले फोन पर उभरी....

"मैं हूँ दीदी,.. अंजू!" मैने जल्दी जल्दी में कहा....

"अच्च्छा.. पहुँच गये क्या?" मीनू ने पूचछा...

"हाँ.. दाखिला भी हो गया... सुन.. 'वो' प्रिन्सिपल मेडम गुरुकुल में आई हुई हैं... उनकी लड़की शायद यहीं पढ़ती है....!" मैने बताया...

"तो..? उसका क्या है?" मीनू ने फिर पूचछा....

"पता नही.. पर मानव को ये बात बता देना.. शायद कुच्छ काम आ जाए.. बस इसीलिए किया था... अब रखती हूँ.. चाचा जा रहे हैं..." मैने कहा और फोन काट दिया.....

"ठीक है ना बेटी... आराम से रहना और मन लगाकर पढ़ाई करना... मैं यहाँ तुम दोनो के नाम से 'खर्चा' जमा करवा रहा हूँ... चाहिए तो यहाँ आकर ले लेना...." मेरे फोन रखते ही चाचा मेरे पास आकर मुझे समझाने लगे....

हम दोनो ने सहमति में सिर हिलाया.. चाचा उसके बाद एक खिड़की पर जाकर खड़े हो गये..,"इनका हॉस्टिल का कमरा बताना भाई...!" चाचा ने अंदर बैठे क्लर्क को पर्चियाँ देकर पूचछा...

"हुम्म.. पिंकी मलिक.. रूम नंबर. 13 और आ..आ..आ.. अंजलि रूम नंबर. 44!" क्लर्क ने पर्चियाँ वापस बाहर कर दी....

"पर.. भाई साहब.. ये दोनो बहने हैं... इनको तो एक ही कमरा देना चाहिए था..." चाचा थोड़े चिंतित होकर बोले....

"कोई बात नही चाचा.. बाद में अड्जस्ट हो जाएँगी.. आप चिंता मत करो..!" अंदर से आवाज़ आई...

चाचा थोड़े मायूस से लगने लगे..," कोई बात नही बेटी... अपनी मेडम को बोलकर इकट्ठी हो जाना.. ठीक है ना... चलो तुम्हारा सामान रखवा देता हूँ....

चाचा हमें लेकर हॉस्टिल के गेट पर पहुँचे ही थे कि वहाँ बैठी एक अधेड़ उम्र की महिला ने उन्हे रोक दिया...," आप वापस जाइए...!"

"पर.. पर मैं इनका सामान तो ढंग से रखवा देता एक बार...!" चाचा ने कहा...

"आदमी हॉस्टिल के अंदर अलोड नही हैं.. आप वापस जाइए.. यहाँ लड़कियाँ बहुत हैं... अपने आप रखवा देंगी सामान...!" महिला ने चाचा को सॉफ मना कर दिया....

"कोई बात नही बेटी.. 2 दिन बाद ही तो रविवार है.. अब तुम जाओ.. मैं चलूं अब?"

"मम्मी को ले आना पापा.. और मीनू को भी...!" पिंकी एक बार फिर रोने लगी थी....

"बस चुप कर अब.. ले आउन्गा.. एक दो दिन में तो तेरा यहाँ इतना मंन लग जाएगा कि तू हमें याद भी नही करेगी..." चाचा की आँखें भी नम होने को थी.. उन्होने हम दोनो के सिर पर हाथ रखा और मुड़कर जाने लगे...

जब तक चाचा आँखों से औझल नही हो गये.. पिंकी रॉनी सूरत बनाए वहीं खड़ी रही...

"चलें उपर...?" मैने पिंकी के कंधे पर हाथ रखा....

पिंकी ने अपना सिर हिलाया और सामान उठा लिया....

"ओये होये.. नयी चिड़िया... कौनसा घौसला है...?" हम उपर पहुँचे ही थे कि एक लड़की ने इसी जुमले से हमारा स्वागत किया था...

"क्क्या?" हम समझ नही पाए..

"सब समझ जाओगी कन्याओ.. चिंता मा कुरूव!" लड़की ने अट्टहास सा करते हुए पिंकी के गाल को उमेथ दिया..,"कमरा नंबर. कौनसा है लाडो?"

"13 और 44!" जवाब मैने दिया...

"गयी भैंस पानी में... 44 किसका है?" उसने हंसते हुए पूचछा...

"मेरा..." मैं उसकी और गौर से देखती हुई बोली....

"तू तो गयी.. सुन.. जाते ही सीमा मेडम के चरणों में गिर जाना.. हो सकता है तुझ पर रहम आ जाए.. वरना तो तेरी खैर नही.. खैर मुझे क्या.. 13 इधर, 44 उधर.. भगवान तुम दोनो का भला करे...! लड़की ने कहा और नीचे भाग गयी....

उसकी बातें सुन कर हमें डर सा लगने लगा था...,"चल.. पहले तेरा सामान रखवा देती हूँ...!" मैने कहा और हम दोनो 13 नंबर. कमरे की और चल पड़े....

दरवाज़ों पर लिखे अधलिखे नंबर. पढ़ते पढ़ते हम दोनो जाकर रूम नंबर. 13 के सामने खड़े हो गये.. जैसे ही हमने कमरे के अंदर झाँका; वहाँ पहले से ही डेरा जमाए बैठी लड़कियों ने हमें ऐसे घूरा जैसे हम किसी दूसरे ग्रह से उतर कर अचानक वहाँ टपक पड़े हों....

"हाँ! क्या है?" एक मोटी सी थुलथुली लड़की हमें अपने कमरे के सामने खड़े देख कर गुर्राय...

पिंकी तो उसी पल सहम सी गयी थी.. जवाब देने की हिम्मत मैने ही की..," हमारा नया दाखिला हुआ है...!"

"तो?" उस लड़की के साथ ही एक और लड़की दरवाजे तक आई और अपने कूल्हे मतकाते हुए बोली..,"आरती उतारनी है क्या?" उनकी आवाज़ रुला देने वाली थी...

"नही वववो... ये कमरा मिला है.. इसीलिए...!" मैने हड़बड़ते हुए आधी अधूरी बात कही...

"यहाँ एक ही बिस्तर खाली है.. दूसरा मैने अपनी बेहन के लिए रोक रखा है.. वो कुच्छ दिन बाद आएगी यहाँ... चलो जाओ.. किसी और कमरे का नंबर. ले लो...!" लड़की ने जैसे हमें दुतकार सा दिया...

"नही नही.. यहाँ तो पिंकी को ही रहना है.. मुझे तो 44 मिला है...!" मेरा भी दिल सा बैठा जा रहा था...

"क्या? .... 44!" लड़की कहकर मूडी और अंदर वाली लड़कियों के साथ खिलखिलाकर हंस पड़ी...," बेचारी!"

"कोई बात नही.. एक को रहना है तो आ जाओ.. रख लो सामान अंदर.. रखने दो यार पुष्पा...!" अंदर बैठी लड़कियों में से एक ने मोटी लड़की को कहा...

वो लड़की अब तक हंस रही थी..,"अर्रे.. रख लो.. मैं कब मना कर रही हूँ... मुझे तो इस 44 वाली की दया आ रही है.. बेचारी.. हे हे हे हे...!"

पिंकी ने नज़रें उठाकर मेरी आँखों में देखा... मैने अपना सामान बाहर ही रख दिया और पिंकी के साथ अंदर आ गयी...

कमरे में कुल मिलकर 6 तख्त थे... चारों कोनो पर उन्न चार लड़कियों ने कब्जा जमाया हुआ था... बीच वाले 2 ही खाली थे... मैने कुच्छ सोच कर जैसे ही दीवार के साथ वाले तख्त के पास पिंकी का सामान रखवाया तो पुष्पा बरस पड़ी..,"ज़्यादा स्यानी मत बन.. चुपचाप वो दूसरा तख्त ले ले.. मैने बताया था ना.. यहाँ मेरी बेहन आएगी...!"

हम में से कोई कुच्छ नही बोला.. हुमने चुपचाप जाकर दरवाजे के ठीक सामने वाले तख्त पर बिस्तर लगाना शुरू कर दिया... अलमारी भी हमें ऐसी मिली जिस पर कुण्डी तक नही थी... पर क्या करते...? वो सब पुरानी खिलाड़ी थी और हमें तब तक हॉस्टिल के 'असली' नियम पता नही थे...

जैसे तैसे करके मैने पिंकी का सामान सेट करवाया और हम दोनो बाहर निकल आए.... पिंकी अब तक जाने कैसे अपने आपको रोके हुए थी.. जैसे ही वा बाहर निकली.. फुट फुट कर रोने लगी..," मैं नही रहूंगी यहाँ... मुझे घर जाना है...!"

"बस कर पिंकी.. चिंता मत कर.. हम मेडम से इनकी शिकायत करेंगे.. चुप हो जा अब.. मेरी तो सोच.. मुझे तो '44' मिला है... यहाँ ऐसा हाल है तो 'वहाँ' क्या होगा... चल.. मेरा सामान रखवा दे एक बार... फिर सीमा मेडम से बोल कर हम दोनो कमरा बदल लेंगे...!" मैने पिंकी को दिलासा देने की कोशिश की....

"नही.. पहले मुझे घर फोन करना है...!" पिंकी अब तक बिलख रही थी....

"ठीक है.. आजा.. नीचे एस.टी.डी. देखी थी मैने.. तू चुप तो हो जा..!" मैने अपना सामान उठाया और पिंकी का हाथ पकड़ कर वापस नीचे आ गयी....

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"यहाँ तो ताला लगा है...!" एस.टी.डी. के सामने जाते ही पिंकी ने कहा....

"तू ठहर एक मिनिट... मैं पूछ्ति हूँ...!" मैने पिंकी से कहकर अपना सामान नीचे रखा और मुड़कर पास से गुजर रही एक लड़की को टोका,"दीदी.. ये कब खुलेगी...?"

"लड़की ने मेरी तरफ सरसरी नज़र से देखा और चलते चलते ही बोली...,"नयी आई है क्या?"

"हां दीदी...!" मैं पिंकी को वहीं छ्चोड़ कर उसके साथ साथ चलने लगी...

"ये नही खुलती... ये हमेशा बंद ही रहती है..." शुक्र था वो लड़की कम से कम मेरी बात सुन तो रही थी.. चलते चलते ही...

"क्यूँ?" मैं उसका पीचछा करती रही...

"एक लड़की भाग गयी थी यहाँ से...अपने आशिक के साथ... बाद में पता चला उनकी गुटरगूं एस.टी.डी. पर ही होती थी.. तब से बंद है.. मोबाइल पर भी बॅन है..."

"हमें घर पर एक फोन करना था... अब कैसे करें...?" मैने हताश होकर पूचछा...

"2 रास्ते हैं... या तो प्रिन्सिपल मेडम के पास जाओ या फिर 44 नंबर. में.. चल अब.. बहुत हो गया...!" लड़की ने मुझे लगभग दुत्कार्ते हुए कहा...

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"चल पिंकी.. ऑफीस में चलते हैं..!" मैने अपना सामान वहीं छ्चोड़ा और पिंकी का हाथ पकड़ कर ऑफीस में ले गयी....

"मे आइ कम इन, मॅ'म!" मैने ऑफीस के बाहर से ही पूचछा....

प्रिन्सिपल मॅ'म फोन पर ही लगी हुई थी.. करीब 5 मिनिट बाद उन्होने फोन रखा और हमारी सुध ली..,"क्या है बेटा..?" उनकी आवाज़ बड़ी मधुर थी..

"जी.. मॅ'म.. ववो.. हमें घर पर फोन करना था....!" मैने पिंकी के साथ अंदर घुसकर कहा...

"कब आए हो घर से....?"

"जी आज ही.. हमारा नया दाखिला हुआ है....!" मैने जवाब दिया....

"ऐसी क्या बात रह गयी.. घर से सारी बातें करके आनी चाहिए थी ना...?"

"ज्जई.. लेकिन.. वो इसके रूम वाली लड़कियाँ अच्छि नही हैं...!" मैने झट से कह दिया....

प्रिन्सिपल आँखें बंद करके शुरू हो गयी..," बुरा जो देखन मैं चला; बुरा ना मिल्या कोए... जो मॅन झाँका आपनो; मुझसे बुरा ना कोए...!!! बेटी.. बुराई बाहर नही हमारे अपने अंदर होती है.. हमारे चारों और का वातावरण हमारी परच्छाई मात्र है.. हम जैसा व्यवहार दूसरो के साथ करेंगे, वैसा ही दूसरे हमारे साथ करेंगे... अपने आपको अच्च्छा बनाओ.. दुनिया खुद-ब-खुद अच्छि दिखने लगेगी.. समझी! बुराई उन्न लड़कियों में नही.. खुद हमारे अंदर है.. ये मान कर चलो और अपने अंदर की बुराई को जड़ समेत उखाड़ फैंको.. फिर देखो.. दुनिया कितनी सुंदर है.. आआहा...!"

"पर मॅ'म.. हम तो आज ही आए हैं.. उन्होने आते ही लड़ाई वाली बातें करनी शुरू कर दी... हमने तो कुच्छ कहा भी नही था...." मैने कह तो दिया.. पर इसके साथ ही प्रिन्सिपल मॅ'म का सत्संग एक बार फिर शुरू हो गया..

"यही तो! ये दुर्भावना लेकर ही तो हम अपने इर्द गिर्द दुश्मन खड़े कर लेते हैं.. क्यूँ नही कहा तुमने कुच्छ.. कहना चाहिए था ना... माफी माँग लेते... अब तुम कहोगी की हमारी ग़लती ही नही थी तो माफी किस बात की... यहीं तो आज कल के बच्चे भूल कर जाते हैं... गाँधी जी का सहिष्णुता, प्रेम और अहिंसा का पाठ क्या सिखाता है बोलो... अहिंसा परमो धर्मा! प्रेम ही ईश्वर है बेटी.. लड़ाई वाली बातें क्या होती हैं..बोलो! गुस्से के गरम लोहे पर विनम्रता का ठंडा पानी डालो.. कोई गाली दे तो मुस्कुरकर निकल जाओ.. कोई थप्पड़ मारे तो अपना दूसरा गाल भी आगे कर दो.. गाँधी जी ने यही सिखाया है ना...?"

अफ.. झेलने की भी कोई हद होती है.. मेरी सारी हदें पार हो गयी थी.. दिल में तो आ रहा था कि आगे बढ़कर 'ये' चाँते वाला एक्सपेरिमेंट मॅ'म पर ही कर के देख लूँ.. मैं थोड़ा झल्ला कर बोली..," पर मॅ'म.. उनको भी सिख़ाओ ना यही बातें... आप हमें एक फोन कर लेने दो बस!"

"मेरे पास एक यही काम बचा है कि मैं दिन भर आप लोगों के फोन करवाती रहूं.. है ना..?" मॅ'म की सहिष्णुता मेरे एक कटाक्ष के साथ ही जाने कहाँ चली गयी थी..," छुट्टी के बाद आना.. चलो अब!"

मैं मायूसी से पिंकी के साथ बाहर आ गयी.. बाहर आते ही पिंकी बोली..,"मेडम जी कितने प्यार से समझाती है ना?"

मैं पिंकी को घूरते हुए झल्ल्ल कर बोली...,"तू समझ गयी ना सब कुच्छ?"

"हां!" पिंकी ने अपनी गर्दन हिलाते हुए स्वीकार किया...

"तो अब तो फोन करने की कोई ज़रूरत नही होगी..? अब तो तू समझ ही गयी है..." मैने व्यंग्य किया..

सुनते ही पिंकी का चेहरा लटक गया..,"नही.. फोन तो करना है.. मैं उस कमरे में नही रहूंगी...!"

"44 नंबर... चल वहीं देखते हैं कौनसी एस.टी.डी. है....?" मैने अपना सामान उठाते हुए कहा और हम वापस उपर चल पड़े.....

क्रमशः.....................
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10-22-2018, 11:36 AM,
#53
RE: Desi Sex Kahani बाली उमर की प्यास
बाली उमर की प्यास पार्ट--38

गतान्क से आगे..................

दूसरी तरफ के कमरे 21 नंबर. से शुरू होकर 40 नंबर. तक थे और उसके तुरंत बाद वाले कमरे पर '44' लिखा हुआ था... कमरा सबसे आख़िर वाला था... बाहर से ही कमरे के अंदर झाँकते ही मुझे लगा कुच्छ ग़लती हो गयी... 'वो' कमरा बाकी कमरों से लगभग दुगना बड़ा था...

दरवाजे के ठीक सामने दूसरी तरफ की दीवार के साथ 2 तख्त जोड़कर उनका डबल बेड सा बनाया गया था जो उस वक़्त खाली पड़ा था... उसके साथ ही एक टेबल और 2 कुर्सियाँ रखी थी... सामने वाले दूसरे कोने में गॅस चूल्हा रखा था.. खिड़कियों पर पर्दे झूल रहे थे... कुल मिलकर 'वो' कमरा दूसरे कमरों की तरह 'घौसला' नही था..

मैं बाहर से ही पीछे वापस पलट गयी...," ये हमारा कमरा नही है... उपर होगा शायद..."

"पर 44 तो इसी पर लिखा हुआ है...?" पिंकी ने एक बार फिर दरवाजे के उपर लिखे नंबर. पर निगाह डाली...

"ये स्टाफ का कमरा होगा... हमारा कमरा उपर मिलेगा.. चल आ!" मैं कहकर चलने ही लगी थी की तभी सामने से आ रही एक साँवली सी मगर सुंदर नयन नक्स वाली लड़की ने हमें टोक दिया," क्या ढूँढ रहे हो..?"

"ववो.. एक फोन करना है...! किसी ने बताया था यहाँ....!" पिंकी की बात पूरी भी नही हुई थी कि उस लड़की ने हमें टोक दिया...,"आ जा अंदर.. ये सामान तो रख आती... इसको क्यूँ ढो रही है साथ साथ...?"

मुझे जवाब देने का मौका नही मिला.. वो लड़की अंदर जा चुकी थी...

हम जैसे ही उसके पिछे कमरे में घुसे.. मैने अचरज से दरवाजे वाली दीवार के साथ एक 'वैसा' ही 'बेड' लगा देखा... बेड पर एक लड़की पेट के बल तकिये में मुँह दबाए लेती थी और उसके पास बैठी शरीफ सी दिखने वाली एक दूसरी लड़की बड़ी तन्मयता से उसके पाँव दबा रही थी... हमें देखने के बाद भी वा चुपचाप अपने काम में लगी रही....

"थोड़ी उपर आजा यार.. जांघें दुख रही हैं.. बीच से रगड़ दे ज़रा सी..." लेटी हुई लड़की ने उनीनदी आवाज़ में कहा...

"सीमा दीदी... इनको एक फोन करना है...!" हमारे साथ अंदर गयी लड़की ने कुच्छ देर रुक कर कहा और फिर सीधी गॅस चूल्‍हे के पास जाकर चूल्‍हे पर पतीला रख दिया....

सीमा नाम था लेटी हुई लड़की का... कुच्छ देर वा चुपचाप ऐसे ही पड़ी रही.. फिर ज़रा सा चेहरा उठाकर हाथ आगे किया और हमें 3 उंगलियाँ दिखाते हुए बोली...,"एक मिनिट के 3 रुपए; वो भी इनकमिंग के... यहाँ से सिर्फ़ मिस कॉल जाएगी.. सिर्फ़ लोकल... अगर अलग जाकर 'यार' से बात करने है तो एक मिनिट के 10 रुपए... यहीं बैठकर स्पीकर ऑन करके करेगी तो पहले पाँच मिनिट फ्री और फिर 3 रुपए.. बोल!"

"पर बाहर तो कम लगते हैं...!" नादान पिंकी शायद 'ब्लॅक' का मतलब नही जानती थी...

"तो साली...यहाँ क्या अपनी...?" गुस्से से अचानक उबाल सी पड़ी सीमा ने जबाड़े को भींच कर बोलते हुए जैसे ही अपना चेहरा उपर किया... हम दोनो एक दूसरे को देख कर चौंक पड़े..,"अंजलि .. है ना?"

"हां...!" सकपकते हुए मेरे मुँह से निकला.. मुझे नही पता था कि वा मेरा नाम कैसे जानती है...

"सामान कहाँ है तेरा...?" उसने मेरी आँखों में देखते हुए पूचछा...

"यहीं है...ये रहा... !" मैने बाहर की ओर हाथ से इशारा किया....

"बस बहुत हो गया...!" सीमा ने उसके पैर दबा रही लड़की से कहा और उठकर बैठ गयी...,"इसका सामान अंदर रखवा दे..!" और फिर मुझे देख कर बोली..,"यही कमरा मिला है ना?"

"हां!" मैं अभी तक उसकी रौबदार आवाज़ को अपने मंन से निकाल नही पाई थी....

"सुन ज्योति!... चाय बनाकर एक बार सारे हॉस्टिल में घूम आ... जितनी नयी लड़कियाँ आई हैं.. सबको खाने के बाद यहाँ आने की बोल कर आ जाना....!" सीमा ने कहा...

"ठीक है दीदी...!" ज्योति ने कहा और चाय को गिलासों में डालने लगी...

मैं और पिंकी एक दूसरी को आँखों ही आँखों में देख अचंभित से हो रहे थे..अब तक जिसने भी सुना था, हमारे मन में 44 नंबर. को लेकर ख़ौफ़ ही पैदा किया था.. पर यहाँ तो 'गंगा' हमें उल्टी ही बहती मिली... इतना शानदार बड़ा कमरा और दूसरे कमरों की बजाय लड़कियाँ मेरे समेत सिर्फ़ 4... 13 नंबर. की तरह यहाँ किसी ने खम्खा की चिक्चिक भी नही की.. उल्टा मेरा सामान भी 'उस' लड़की ने अपने आप ही रख दिया था...

पिंकी ने मेरे पेट में उंगली मार कर मेरा ध्यान अपनी और खींचा और फिर आँखों ही आँखों में मुझे बाहर चलने का इशारा किया...

"मैं एक मिनिट में आई दीदी...!" मुझे सीमा को बताना ही ठीक लगा...

"हां हाँ.. जाओ घूम लो..! यहाँ किसी लड़की से डरने की ज़रूरत नही है.. कोई कुच्छ कहे तो अपना रूम नंबर. बता देना बस..." सीमा ने मुझ पर ध्यान दिए बिना ही कहा...

"तू फोन तो कर लेती...?" मैने बाहर आते ही पिंकी को बोला....

"क्यूँ कर लूँ? मैं कोई पागल हूँ क्या जो उसको इतने ज़्यादा पैसे दूँगी.. 2 दिन में पापा आ ही जाएँगे... पर तुझे तो बहुत अच्च्छा कमरा मिल गया अंजू.. तू मुझे भी अपने साथ रख ले ना?"

"मैं भी यही सोच रही थी.. वैसे भी ये तो काफ़ी बड़ा कमरा है.. तू चिंता मत कर.... मैं बात करके देखूँगी.. तुझे एक बात का पता है?" मैने उसको शंतवना देने के बाद कहा...

"क्या? कौनसी बात?" पिंकी ने पूचछा...

"आज मैने स्कूल वाली प्रिन्सिपल मेडम को यहाँ देखा था... इसी लड़की के साथ खड़ी थी.. शायद इसकी मम्मी होगी 'वो'?... उसने भी मुझे देखा था...!"

मेरी बात सुनते ही पिंकी कुच्छ उदास सी हो गयी...," अच्च्छा! उसने इसको कुच्छ बता दिया तो?"

"क्या?"

"वही.. स्कूल वाली बात.." पिंकी ने मुरझाए चेहरे से ही कहा...," ये तो पूरे हॉस्टिल में बता देगी फिर...!"

"देखा जाएगा... अभी से क्यूँ चेहरा लटका रही है.... !" मेरे मन में कुच्छ और ही चल रहा था उस वक़्त...

"मुझे उसकी ये बात बड़ी गंदी लगी... फोन सुन'ने के पैसे लेती है.. और वो भी इतने ज़्यादा... और अलग जाकर बात करने के इतने ज़्यादा पैसे क्यूँ?" पिंकी अभी तक सीमा के अनोखे 'त्र्रिफ प्लान' में ही चक्कर काट रही थी....

"तू समझी नही पिंकी.. ये सब ब्लॅक का चक्कर है.. हॉस्टिल में मोबाइल अलोड नही है.. पर इसको कुच्छ ज़्यादा ही छ्छूट मिली हुई है शायद... इसके पास मोबाइल होगा तो लड़कियाँ फोन करने इसके पास आ जाती होंगी.. ये गुरुकुल की एस.टी.डी. बंद होने का फ़ायडा उठा रही है... लड़कियाँ अपने अपने यारों से अकेले में जाकर बात करती होंगी... इसीलिए इसने उनके रेट ज़्यादा कर रखे हैं... कह नही रही थी.. सामने यार से बात करो तो 5 मिनिट फ्री.. ये भी साथ में मज़े लेती होगी उनके....!" मैने विस्तार से समझाया.. पर शायद पिंकी के भेजे में एक ही बात आई उस वक़्त..

" मुझे भी हॅरी का नंबर. लाना चाहिए था.." पिंकी मन मसोस कर बोली...

"चल छ्चोड़... आजा.. मैं तेरे लिए सीमा से बात करके देखती हूँ...!" मैने कहा और हम वापस कमरे की ओर चल पड़े....

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"देख ले... इन्न लड़कियों की तरह मेरे सारे काम कर सकती है तो आजा...!" सीमा ने मेरी बात सुन'ते ही प्रतिक्रिया दी... वह कमरे में अकेली ही बैठी थी...

"सारा काम मतलब....?" मेरे होन्ट खुले के खुले के खुले रह गये...

"सारा काम मतलब सारा काम.... सोच लो!" सीमा ने गौर से पिंकी को उपर से नीचे तक देखा....

"तो क्या.. मुझे भी....!" पिंकी को यहाँ लाने की बात तो मैने दिल से ही निकाल दी थी... अगर 'वो' 'हां' बोलती तो मुझे भी नही रहना था वहाँ...

"तुझे किसी ने बोला है क्या..? तू तो स्पेशल सिफारिश पर आई है इस कमरे में... तू जो मर्ज़ी ऐश कर यहाँ... समझ गयी.." सीमा ने मेरा कंधा थपथपाया...

"मैं कर लूँगी दीदी.. सारा काम...... मैं उस कमरे में नही रहना चाहती.. पता नही कैसी कैसी लड़कियाँ हैं 'वहाँ'?" पिंकी ने कहा तो मैने उसको घूर कर देखा.. पर उसके मन में शायद उस कमरे से पिच्छा च्चुदाने के अलावा और कुच्छ नही था...," मुझे भी यहीं बुला लो आप!"

सीमा उसकी बात सुनकर मुस्कुराइ और तकिये के नीचे से अपना मोबाइल निकाल कर उसको दे दिया..,"ले कर ले फोन... ज़्यादा टाइम मत लगाना...!"

"पर मैं ज़्यादा पैसे नही दूँगी...!" पिंकी ने मुँह बना लिया...

सीमा भी उसके उलाहना सा देने वाले अंदाज को सुनकर मुस्कुरा कर रह गयी..,"साइड वाले कमरे में आरती बैठी होगी... उसको भेज दे एक बार...!"

"आरती कौन दीदी?" पिंकी ने पूचछा....

"वो.. जो मेरी मालिश कर रही थी... देखी थी ना?"

"हां.." पिंकी ने कहा और मोबाइल लिए लिए ही बाहर निकल गयी...

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"हां दीदी... " एक मिनिट बाद ही आरती हमारे कमरे में थी....

"आ.. आन... आरती.. तू ऐसा कर रूम बदल ले.. उस लड़की के साथ...!" सीमा ने थोड़ा हिचक कर कहा...

सुनते ही आरती का चेहरा उतर गया..,"पर... पर क्यूँ दीदी..?"

"क्यूँ चिंता करती है यार.. तू मेरी खास सहेली है.. तू तो कहीं भी आराम से रह लेगी... उसको 'सेट' करना है थोड़े दिन..." सीमा ने कहते हुए उसकी और आँख दबाई..," जब भी अखिलेश का फोन आएगा, मैं बुला लिया करूँगी तुझे.. बहुत काम कर लिया तूने यार.. अब ऐश कर...!"

"थॅंक यू दीदी..." आरती के होंटो पर मुस्कुराहट तार गयी..,"कौनसा रूम है उसका...?"

"13 नंबर..." मैने बताया...

"तो.. सामान रख लूँ वहाँ.. अभी?" आरती ने खुश होकर पूचछा...,"उसका सामान यहाँ रख देती हूँ..."

"तू क्यूँ रखेगी.. 13 नंबर. की लड़कियों को बोल दे.. ना सुने तो यहाँ भेज देना... रंडियों के सब राज़ जानती हूँ मैं...!" सीमा ने तभी मुझे अपने 'कुत्तिपने' का परिचय दे दिया था...

इस बात को जानकार हमें बड़ा गर्व हुआ था कि हमें रात को खाने की बेल लगते ही दूसरी लड़कियों की तरह घी का डिब्बा उठाकर नीचे नही भागना पड़ा... ज्योति जाकर हमारा खाना ले आई और सब्ज़ी में तड़का लगाकर हमारे पास लाकर रख दिया... हालाँकि वह खुद भी हमारे साथ बैठकर खा रही थी.. पर खाने से ज़्यादा उसको सीमा की ज़रूरतों का ख़याल रखना पड़ रहा था... खाने के दौरान उसको बीच में कयि बार सीमा के कहने पर उठना पड़ा था....

खैर जो भी हो.. हॉस्टिल का पहला दिन अपने आप में काफ़ी रोमांचक रहा... हर तरफ लड़कियाँ ही लड़कियाँ.. लड़ाकू और फ्रेंड्ली.. भोली और चालू... सुन्दर और बदसूरत.. लंबी और छ्होटी; गौरी और काली कलूटी.. हर लड़की का अलग स्वाभाव.. हर लड़की के अलग तेवर...

मुझे खाना खाने से पहले लग रहा था कि मैं बिल्कुल ठीक जगह पर आ गयी हूँ.. यहाँ मैं 'लड़कों' को भूल कर अपनी पुरानी ग़लतियों को सुधार सकती हूँ... पर 'ये' भी मेरी ग़लतफहमी ही निकली... खाने के तुरंत बाद जैसे जैसे हमारे कमरे में अजीब सी नज़रों से हमें घूरती हुई सहमी खड़ी नयी नयी लड़कियों का जमघट लगना शुरू हुआ.. मुझे अहसास होने लगा था कि 'पिंकी' बहुत ग़लत जगह पर आ गयी है....

खाने के बाद सीमा ने कुल्ला किया और वापस बिस्तेर पर बैठते हुए एक एक करके सारी लड़कियों पर निगाह डाली..," एक.. दो.. तीन.. चार.. पाँच.. च्छे:.. सात... बाकी कहाँ हैं...?"

"यही सब है दीदी... आज इतनी ही आई हैं...!" ज्योति ने सीमा को बताया...

"गान्डू समझ रखा है क्या?" सीमा ने 'वो' तेवर दिखाने शुरू कर दिए जिसकी वजह से सब लड़कियाँ दिन में '44' नंबर. सुनकर मुझे बेचारी कहकर हंस रही थी...," मैने रिजिस्टर चेक किया था.. आज 9 आई हैं...!"

"हाँ.. पर 2 तो ये हैं ना..." ज्योति ने हमारी ओर इशारा किया...

"ओह्ह हाँ... मैं तो भूल ही गयी थी... कोई बात नही.. तुम में से शिल्पा कौन है...?" सीमा ने लड़कियों की तरफ अपना सवाल फैंका...

"ज्जई...मैं हूँ...!" एक लड़की बाकी लड़कियों से अलग आकर बोली... सातों लड़कियों में से बस उसी में थोडा आत्मविश्वास झलक रहा था... बाकी सभी इस तरह लाइन में सीमा के सामने खड़ी थी जैसे कोई भारी ग़लती करने के बाद प्रिन्सिपल के सामने सज़ा भुगतने को तैयार खड़ी हों...

"हुम्म.. प्रिन्सिपल तुम्हारी क्या लगती है यार?" सीमा ने पूचछा...

"ज्जई.. ववो मेरी भाभी की रिश्तेदारी में हैं...!" शिल्पा ने जवाब दिया...

"हूंम्म... " सीमा ने सिर हिलाया...,"कोई बाय्फ्रेंड वग़ैरह बनाया है या नही अब तक..?" सीमा ने बत्तीसी निकाल कर पूचछा तो पहले उस लड़की ने आसचर्या से सीमा की ओर देखा और फिर अपना सिर झुका लिया..."नही..."

"चल कोई बात नही... कोई दिक्कत हो तो मुझे बता देना.. बाद में बुलाकर बात करूँगी... जा.. अब ऐश कर...! वैसे मेडम मुझे बहुत अच्छे से जानती हैं..." सीमा ने जैसे ही अपनी बात पूरी की.. शिल्पा गहरी साँस लेकर कमरे से निकल गयी....

शिल्पा के जाते ही सीमा दिन की तरह उल्टी होकर लेट गयी...," आ.. थोड़ी देर मेरी कमर दबा दे यार..." सीमा ने पिंकी की ओर इशारा किया.. पिंकी ने भावुक सी होकर मेरी ओर देखा और सीमा के पास जाकर बैठ गयी.. सच कहूँ तो उस वक़्त मुझे उस पर बड़ी दया आई थी.....

"वेलकम टू गुरुकुल...!" सीमा शुरू हो चुकी थी..,"मुझे कौन कौन जानती हैं.?"

लगभग सभी लड़कियों ने अपने हाथ उपर उठा कर स्वीकार किया कि इस कमरे में आने से पहले ही उन्हे सीमा के रौब का पता चल चुका था... सिर्फ़ एक लड़की को छ्चोड़ कर... दबे से शब्दों में उसने थोड़ा आगे निकल कर सवाल किया,"तुम सीमा हो क्या?"

"आगे आ पहले तू.. फिर बताती हूँ कि 'तुम' और 'आप' में क्या फ़र्क़ होता है.. बोलने की तमीज़ नही है क्या तुझे..?" सीमा गरज कर बोली....

"एम्म...मेरा मतलब वही था दीदी.. आअप..." लड़की के चेहरे पर आतंक सा झलक गया...

"चुप कर बदतमीज़.. थोबड़ा फोड़ दूँगी तेरा... क्या नाम है...?" सीमा के लहजे पर उसकी मिमियाहट सुनकर भी फ़र्क़ नही पड़ा था...

"ज्जई.. सुनयना... सीमा दीदी ऐसे ही निकल गया था.. सॉरी..!" लड़की इतनी सहम गयी थी कि उसने हाथ उठाकर अपने कान पकड़ लिए....

"तुझसे तो मैं बाद में नीपतूँगी... जा.. मेस में जा और सलीम से एक 'खीरा' माँग कर ला....!" सीमा ने आदेशात्मक लहजे में कहा....

"ज्जई.. क्या?" सुनयना ने या तो नाम ढंग से नही सुना था.. या फिर 'ववो' 'खीरा' मंगवाने का मतलब समझ गयी थी...

"खीराआ!" सीमा ने लगभग चिल्लाते हुए दोहराया," उसको बोलना लंबे वाला दे दे... समझ गयी अब!"

"ज्जई.. जाती हूँ... पर सलीम का तो मुझे पता नही कौन है..." लड़की ने डरते डरते अपनी बात कही....

"मेस में मिलेगा लूँगी बाँधे... 20-22 साल का लड़का है.. चल भाग अब...!" सीमा ने कहा और उसके बाहर निकलते ही पिंकी पर झल्ला उठी..,"ऐसे दबाते हैं क्या कमर.. तुझसे नही होगा.. जा आरती को बुलाकर ला.. वो सिखाएगी तुझे...!"

मेरा पिंकी से ध्यान हट गया था.. सीमा के कहते ही मैने पिंकी की ओर देखा.. ऐसा लग रहा था जैसे 'वो' मन ही मन रो रही हो... सीमा के कहते ही वह बाहर भाग गयी....

पिंकी के बाहर जाते ही सीमा उठकर बैठ गयी.. मुझे नही पता था कि क्या होने वाला है... सीमा कुच्छ देर एक एक लड़की के चेहरे को गौर से निहारती रही.. फिर खंगार कर उसने बोलना शुरू किया..," एक एक करके आगे आती जाओ और अपने और अपने बाय्फरेंड्स के नाम बताओ!"

सीमा के ऐसा कहने पर लड़कियाँ बगलें झाँकने लगी.. किसी में आगे बढ़ने की हिम्मत नही हो रही थी...

"बाहर से जैसा दिखता है.. वैसा नही है ये गुरुकुल... जैल है जैल... अंदर आ गये तो साल भर तक इस ऊँची चारदीवारी में क़ैद... घर जाने की सोचना भी मत... 'लड़कों' के तोते में 'वो' मैला कुचैला सलीम 'सलमान ख़ान' जैसा लगने लगता है... 'यहाँ के 'कुत्ते' देखकर मुँह में पानी आ जाता है... या फिर 'सनडे' को मिलने आने वाले लड़कियों के भाइयों पर ही लाइन मारने का दिल करता है.... पर 'वो' भी यहाँ किस काम के... बाहर वो तुम्हे याद करके अपना हिलाते रहेंगे... यहाँ तुम 'बैंगन' ढूँढती फ़िरोगी... घर वालों को कुच्छ बोल कर यहाँ से जाने की सोचोगी तो प्रिन्सिपल मेडम उन्हे ऐसा पानी पिलाएँगी कि उनको 'तुम' ही ग़लत लगने लगोगी... क्या फयडा?

यहाँ की सब लड़कियों की हर ज़रूरत का ख़याल मुझे ही रखना पड़ता है... लड़कियों को अपने 'ग्रेड कार्ड' घर पहुँचने से रोकने हों तो मेरे पास आती हैं... अपने यार के पास फोन करना हो तो 'वो' मेरे पास आती हैं... यार के साथ रात भर बाहर रहना हो तो 'वो' मेरे पास आती हैं.... 'हॉस्टिल' में ही कुच्छ 'इंतज़ाम' करना हो तो मेरे पास आती हैं... सबकी ज़िम्मेदारी मुझपर है.. बेशक हर काम की फीस लगती है.. पर मैं भी क्या करूँ.. 'उपर' जो देना पड़ता है.. मैं घर से तो नही दे सकती ना....! पर इतना याद रखो.. '44' नंबर. की पर्मिशन के बगैर इस हॉस्टिल में कभी कुच्छ नही होता... तुम समझ रही हो ना?" सीमा कहकर उनकी ओर देखने लगी....

लड़कियाँ चुप चाप खड़ी थी... सीमा का लहज़ा ऐसा था कि अगर कोई लड़की कुच्छ बोलना भी चाह रही होगी तो बोलने की हिम्मत नही हुई होगी...

"एक लड़की ने मेरी शिकायत कर दी थी पिच्छले साल... लड़कियों से पूच्छ लेना उसके साथ क्या हुआ? मुझे दोस्ती करना भी पसंद है और दुश्मनी करना भी... मर्ज़ी तुम्हारी है.... सीमा बोल ही रही थी कि आरती अंदर आते हुए बोली..,"कुच्छ काम है दीदी..?"

"नही.. बैठ जाओ!.. ववो.. लड़की कहाँ रह गयी...पिंकी?" सीमा ने पूचछा...

"ववो.. बाहर खड़ी है दीदी.. रो रही है..!" आरती के कहते ही मैं उठकर खड़ी हो गयी...,"मैं बाहर जाउ दीदी?"

"नही.." सीमा ने आँखों ही आँखों में मुझे बैठने का आदेश दिया.. उसकी बातें सुनकर मेरे मन में भी उसके नाम की दहशत सी बैठ गयी थी.. मैं फिर भी कुच्छ बोलने को हुई कि सीमा बोल पड़ी...,"जा आरती..बुला कर ला उसको अंदर..!" और फिर मुझसे बोली..,"अभी उस'से बात मत करना... ऐसे उसके आँसू पौछ्ति रहोगी तो दिल कैसे लगेगा उसका?"

मैं चुपचाप वापस बैठ गयी... कुच्छ देर बाद आरती पिंकी के साथ अंदर आई तो उनके साथ सुनयना भी थी.. हाथ में 'खीरा' च्छुपाए हुए... पिंकी सिसकियाँ भरते हुए आई और आते ही अपने बिस्तर पर दूसरी और मुँह करके लेट गयी....

"इतनी देर कैसे हो गयी तुझे... 'ट्राइ' करके लाई है क्या?" सीमा ने सुनयना से कहा और भद्दे से ढंग से दूसरी लड़कियों की और देख कर हँसने लगी.. मुजरिमों की तरह हमारे सामने खड़ी लड़कियाँ भी सीमा की बात का मतलब समझ कर अपने मुँह पर हाथ रख कर घुटि हुई हँसी हँसने से अपने आपको रोक ना सकी...

"ववो.. सलीम नही मिला था दीदी...!" सुनयना शर्मिंदा सी होकर बोली...

"तुम सब समझ गयी या कुच्छ और सम्झाउ?" सीमा ने सुनयना को नज़रअंदाज करके लड़कियों से सवाल किया....

सब लड़कियों के एक साथ सिर हीले.. पर आवाज़ किसी लड़की की नही निकली...

"ठीक है.. जिस लड़की को मुझसे दोस्ती करनी है.. वो सब इधर आ जाओ.. बाकी वहीं खड़ी रहो..." सीमा ने जैसे ही उंगली से कोने की तरफ इशारा किया... पूरा का पूरा झुंड कोने में जाकर सीमा की उंगली की नोक पर सिमट सा गया.... सीमा खिलखिला कर हँसने लगी...

"गुड.. अब काम की बातें करें...? जान पहचान तो करनी ही पड़ेगी ना...?" सीमा ने कहा और रहस्यमयी अंदाज से उनकी और देखने लगी... किसी की ज़ुबान तक ना हिली...

"बोलती क्यूँ नही! तैयार हो ना?" सीमा ने इस बार ज़रा गरज कर पूचछा तो एक साथ 7 सुर सुनाई दिए..,"जी सीमा दीदी!"

"दरवाजा बंद कर दो ज्योति...!" सीमा के कहते ही ज्योति खड़ी हुई और दरवाजा बंद कर दिया....

"झूठ मत बोलना मेरे सामने.. नही तो यहीं कपड़े उतरवा लूँगी... तुम में से 'टांका' किस किस का टूट गया है...?" सीमा ने पूचछा...

कसम से.. मैं भी सीमा की बात का मतलब नही समझी थी.. झुंड में खड़ी लड़कियों में से एक दो लड़कियों की पूच्छने की हिम्मत हुई..," क्या दीदी?"

"तुम तो मुझे बिल्कुल बेशर्म बना कर छ्चोड़ॉगी.. सीधे सीधे बोलना पड़ेगा क्या? जीस्कि सील टूट चुकी है.. वो इधर आ जाओ.. जल्दी करो.. नही तो मैं कपड़े निकलवाना शुरू कर दूँगी..."

लड़कियाँ सकपका कर कभी हमारी ओर कभी एक दूसरी की ओर देखने लगी.. पर वहाँ से हिली कोई नही... सीमा ने कुच्छ देर तक घूर्ने के बाद उनमें से एक लड़की की और इशारा किया..,"इधर आ.. सलवार निकाल अपनी...!"

लड़की का चेहरा एकदम लाल हो गया.. वह झट से बाकी लड़कियों से अलग जाकर सिर झुका कर खड़ी हो गयी...,"टूट... गयी है दीदी...!"

उसके ऐसा कहते ही सुनयना और 1 और लड़की ने पाला बदल लिया... अब दोनो तरफ तीन तीन लड़कियाँ खड़ी थी....

"तुम्हारा बॅंड नही बजा है क्या अभी?" सीमा ने बाकी तीन में से एक प्यारी सी लड़की की ओर उंगली करके पूचछा...

"क्क्या दीदी.. मैं समझी नही हूँ आपकी बात..!" लड़की घबरा कर बोली....

"साली.. नाटक करती है...! अपनी चूत में लिया है क्या कभी?" सीमा अपने चेहरे के तेवर ख़ूँख़ार करती हुई जबड़ा भींच कर बोली...

लड़की की नज़रें लज्जा के मारे ज़मीन में गड़ गयी... धीरे धीरे उसके कदमों में हरकत हुई और अब अनुपात 4:2 का हो गया....

पिंकी ने अचानक करवट बदल ली.. उसके आँसू सूख चुके थे.. बड़े गौर से वह अब 'वहाँ' हो रहा तमाशा देख रही थी.. शायद 'वह' शुक्र माना रही होगी कि उसके साथ ऐसा कुच्छ नही हुआ......

क्रमशः............................
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Reply
10-22-2018, 11:36 AM,
#54
RE: Desi Sex Kahani बाली उमर की प्यास
बाली उमर की प्यास पार्ट--39

गतान्क से आगे..................

"तो तुम दो रह गयी... अब भी सोच लो.. मैने पहले ही बहुत टाइम दे दिया है तुम दोनो को.. बाद में ये मत कहना कि सीमा दीदी ने ये क्या किया.. एक मिनिट और दे रही हूँ...!" सीमा ने दूसरी तरफ रह गयी दोनो लड़कियों को घूरते हुए कहा...

पर उन्न लड़कियों की ज़ुबान ने कोई हरकत नही की.. वो ऐसे ही सिर झुकाए खड़ी रही.. हां! एक दूसरी के पिछे छिप्ने की कोशिश में दोनो पिछे दीवार की तरफ खिसकती जा रही थी... सीमा द्वारा दिए एक मिनिट में और कुच्छ नही हुआ.. सिवाय उनके कोने में जाकर एक दूसरी से चिपक कर खड़े होने के....

सीमा दीवार घड़ी की तरफ लगातार ऐसे घूर रही थी जैसे कोई रॉकेट छ्चोड़े जाने का काउंटडाउन चल रहा हो... सीमा के अलटिमेटम के बाद जैसे ही सेकेंड वाली सुईन ने एक चक्कर पूरा किया.. सीमा बोली..,"ज्योति.. 'टाइगर' निकाल कर ला...!"

"जी दीदी...!" ज्योति थोड़ी सकुचा कर बोली और खड़ी होकर अलमारी की तरफ लपकी...

"मम्मी कसम दीदी जी.. मैने आज तक कुच्छ नही किया... मुझे छ्चोड़ दो...! कास्साम से दीदी जी.. मैने कभी ग़लत बात नही....." सीमा के मुँह से 'टाइगर' निकाल कर लाने की बात सुन एक लड़की ने फूट फूट कर रोना शुरू कर दिया...

"चुप!" सीमा ने लड़की को जैसे ही घूरा... उसका बात उसके हलक में अटक कर रह गयी..," अभी मैने तेरा पकड़ा ही क्या है जो इतनी...!"

सीमा कुच्छ कह ही रही थी कि ज्योति 'टाइगर' छुपा कर लाई और सीमा को पकड़ा दिया...

"इसको पहचानती हो ना?" सीमा ने 'टाइगर' को बिस्तेर पर सीधा खड़ा करके पूचछा और मुस्कुरा कर लड़कियों के चेहरों को पढ़ने लगी....

मुझे लगता है कि सबका वही हाल हुआ होगा जो 'टाइगर' को देख कर मेरा हुआ था... 'उस' को नज़र भर कर देखते ही मेरे बदन के 'उस' हिस्से में अचानक चीतियाँ सी रेंगने लगी.. ज़्यादा देर तक उस पर नज़रें गड़ाए भी ना रह सकी.. 'डर' था कहीं दूसरी लड़कियाँ मेरी ललचाई नज़रों को पढ़ ना लें....

दरअसल 'टाइगर' 20 रुपए वाली 'मोमबत्ती' था जो सीमा (शायद) की अद्भुत और बेजोड़ कारीगरी का सबूत बनकर हमारी नज़रों के सामने 'तना' हुआ खड़ा था... बड़े ही सुन्दर वास्तु-कौशल का परिचय देते हुए 'उस' मोमबत्ती को लगभग 8 इंच लंबे और इतनी ही गोल परिधि वाले 'लिंग' में बदल दिया गया था.. 'टाइगर' की मंडी भी एकदम लिंग के सूपदे की तरह लग रही थी; बाकी हिस्से से थोड़ी 'मोटी' और आगे थोड़ा पैनापन लिए हुए... मुझे तो वो एकदम सुन्दर के लिंग का हू-बहू 3डी मॉडल लगा था.. बस नीचे लटकने वाले 'गोलों' की जगह मोमबत्ती का स्टॅंड ज्यों का त्यों छ्चोड़ दिया गया था.. 'वो' भी शायद इसीलिए छ्चोड़ा गया होगा कहीं बदहवासी में 'टाइगर' अंदर ना खो जाए....

विडंबना कि उस घड़ी में भी कमरे में मौजूद हर लड़की रह रह कर तिरछि नज़रों से 'टाइगर' को निहारने का लालच छ्चोड़ नही पा रही थी... पर कुच्छ बोलने का साहस भी कोई नही कर पा रही थी....

"इधर आ..!" सीमा ने तीखे तेवरों से सुनयना को उंगली से अपने पास आने का इशारा किया.. बेढंगे कदमों से हड़बड़ाहट में चलकर सुनयना सीमा के पास आकर खड़ी हो गयी...,"ज्जजई... जी क्या दीदी जी?"

"बोलती क्यूँ नही...?...मेरी तरफ देख! जानती है ना इसको...?" सीमा ने गुर्रकार पूचछा...

"आ.हाआँ दीदी जी.. पता है...?" सुनयना की इस बार नज़रें चुराने की भी हिम्मत नही हुई....

"तो बताती क्यूँ नही...? बोल जल्दी.. इसका नाम बता...!"

"ज्जई.. ये 'वो' है...!" सुनयना ने नज़रें झुका कर झुरजुरी सी ली....

"वो क्या तेरी...." सीमा ने शब्दों को चबाते हुए कहा और फिर तैश में बोली..," खीरे को यहाँ रख दे.. साथ में लेकर सोने का इरादा बना लिया है क्या?"

सीमा के कहते ही खीरा सुनयना के हाथों से छ्छूट कर फर्श पर गिर पड़ा...

"ले.. पकड़ इसको.. हाथ में लेकर पहचान ले.." सीमा ने 'टाइगर' उठाकर झिझक रही सुनयना की मुथि में पकड़ा दिया..," ज़्यादा टाइम वेस्ट मत कर.. मुझे और भी काम हैं.. सामने करके नाम बता इसका.. नही तो..."

"ज्जई.. Pप्पेनिस!" सुनयना ने आख़िरकार बोल ही दिया...

"ज़्यादा अँग्रेजन मत बन.. हिन्दी में समझा दे.. वरना इसको तेरे 'वहाँ' घुसे..."

सीमा ने अपनी धमकी पूरी भी नही की थी कि लड़खड़ाती हुई ज़ुबान से सुनयना ने बोल ही दिया...," ज्जई.. लिंग!"

"चल उधर हट.. तेरे बस का कुच्छ नही है.. मुझे पता चल गया तू गंडवी है एक नंबर. की...सस्सली शरमाती है...." सीमा ने उसके हाथ से 'टाइगर' छ्चीन लिया....,"तू आ.. क्या नाम है तेरा..?" सीमा ने उसी ग्रूप से एक और लड़की को बुलाकर 'टाइगर' उसके हाथ में थमा दिया...,"बता.. क्या नाम है..?"

लड़की को जल्दी पिच्छा च्छुड़वाना था शायद... बेचारी ने 'टाइगर' हाथ में लेते ही ऊँचा उठाया और झट से बोली...,"लौदा.....!"

मैं उसके बेबकीपाने पर अचरज से उसकी ओर देख ही रही थी की सीमा ज़ोर ज़ोर से हंसते हुए बिस्तर पर लोटपोट होने लगी.. उसके साथ ही ज्योति और आरती भी खिलखिला उठी थी.... मेरी समझ में माजरा आया नही था.. नाम पूचछा था.. अगली ने नाम बता दिया.. हँसने वाली क्या बात है इसमें....!

जी भर कर उसकी रॉनी सूरत को देख कर पेट पकड़ कर हंस रही सीमा थोड़ी देर बाद कुच्छ शांत हुई और बोली..,"मैने तेरा नाम पूचछा था चूतिया..." और कमरे में ठहाका गूँज उठा....

"ज्जई नही दीदी.. मैने समझा आप... मेरा नाम तो धीरज है...!" लड़की की सूरत देखते ही बन रही थी....

सीमा की हँसी अब तक बंद नही हुई थी...,"ठीक है.. अब इसका नाम बता..!" सीमा ने हंसते हंसते दूसरी लड़कियों की और देखा...

इस बार धीरज की आवाज़ से 'वो' जोश' गायब था जो उसने 1 मिनिट पहले दिखाया था..,"ज्जई.. इसका नाम.. लौदा है...!"

"चल शाबशह.. पूरे नंबर. दिए तुझे... ऐसे ही बेबाक रहना.. नही तो दुनिया मा चोद देगी तेरी...." सीमा ने उसके हाथ से लौदा ले लिया... और दूर सहमी खड़ी लड़कियों की और देख कर बोली..,"तुम्हे मैं कुच्छ नही कह रही.. डरो मत! मज़ा लेना है तो खड़ी रहो.. जाना है तो बोल दो...!"

दोनो में से कोई कुच्छ नही बोली.. एक बार एक दूसरी की आँखों में देखा और फिर से सिर झुका लिया....

"जल्दी बोलो.. मज़े लेने हैं या जाना है..?" सीमा ने एक बार फिर पूचछा...

"जाना है दीदी...!" एक ने बोल ही दिया...

"और तुम्हे...?" सीमा ने दूसरी की ओर देखा...

"मुझे भी.. अगर आप जाने दो तो...." आवाज़ में घबराहट सी लिए दूसरी लड़की के मुँह से निकला....

"मैं ही तो बोल रही हूँ... पर ध्यान रखना... कल को मुझसे काम भी पड़ेगा... आज के बाद इस कमरे में पैर रख दिए तो टांगे तोड़ दूँगी...!"

"मैं नही जा रही दीदी...!" दूसरी लड़की ने एकदम से अपनी बात बदल दी...

"ठीक है..." सीमा मुस्कुराते हुए बोली और फिर पहली लड़की की ओर देखा..,"तू?"

लड़की ने गर्दन ना में हिलाई और अपना सिर झुका लिया....

"शाबाश...!" सीमा ने कहा और दूसरी 'टीम' में से तीसरी लड़की को आगे बुलाया....

"ले पकड़!" सीमा ने उसके हाथों में टाइगर पकड़ा दिया...,"चल नाम बता..!"

"जी.. मेरा.. या इसका..?" लड़की ने संभाल कर बोला....

"अच्च्छा.. तुम तो बहुत स्मार्ट हो यार..!" सीमा ने व्यंगात्मक लहजे में कहा और फिर बोली..," अपना और इसका नाम साथ साथ बता... और कुच्छ नही बोलना... समझ गयी ना....?"

"ज्जई..."

"तो बता ना फिर...?"

लड़की ने नज़रें झुका ली...," जी.. कामना.." और थोड़ा रुक कर बोली...,"लौदा!"

"ये नही.. ये तो बता दिया इन्न दोनो ने.. कोई दूसरा नाम बता...!" सीमा आसानी से किसी का पिच्छा नही छ्चोड़ना चाहती थी...

कामना के चेहरे पर मायूसी और कामुकता; दोनो का आवरण था...," लंड!"

"किसने बताया...?" सीमा ने पूचछा....

"ज्जई.... बस ऐसे ही.. एक दीवार पर लिखा देखा था...!"

"क्यूँ.. तेरा यार चूतिया है या गूंगा.. उसने नही बताया...?"

"जी..." लड़की पानी पानी हो गयी...,"उसने भी बाद में बताया था.. एक बार..."

"चल छ्चोड़... काम क्या है इसका... ये बता...!" सीमा बोली..

कामना अपनी मुथि में 'टाइगर' को कसकर भींचे खड़ी थी...,"ज्जई.. सेक्स करते हैं..!"

"याररररर... फिर अँग्रेज़ी... मैने हॉस्टिल में आज तक इतनी शर्मीली लड़कियाँ नही देखी... कैसे रहोगी यहाँ... परसों तो इतनी देर में एक लड़की ने अपनी चूत में घुसा कर भी देख लिया था.... लगता है तुम्हे मुझे ही ये सब सिखाना पड़ेगा...!" सीमा ने कहते हुए उन्न लड़कियों को कसा और फिर सबसे पिछे छिप्कर खड़ी लड़की का रुख़ किया..,"आगे आजा यार... शर्मा मत.. अभी तो बहुत कुच्छ बाकी है...!"

लड़की सीमा की बात का मतलब समझ गयी और आगे आकर बिना कहे ही कामना के हाथ से 'टाइगर' झपट लिया.....

"क्या नाम है तेरा?"

"ज्जई.. प्रमिला..!" लड़की बिना झिझक के बोली...

"और ये तूने हाथ में क्या पकड़ लिया प्रमिला!" सीमा अपनी आवाज़ को हद से भी ज़्यादा मीठी करके बोली और बत्तीसी निकाल दी....

"ज्जई.. लोला!" प्रमिला धीरे से बुदबुदाई....

"थोड़ी तेज बोल यार..."

"जी लोल्ला!" प्रमिला ने कहा और शरमाते हुए भी मुस्कुरकर सीमा को खुश करने की कोशिश की....

"क्या करते हैं इसका.. ये भी बता दे अब!" सीमा ने चटखारा लिया....

"मैं बता दूँ तो आप गुस्सा तो नही करोगी ना...दीदी?" प्रमिला ने सीमा को मक्खन सा लगाते हुए कहा...

"लो बोल... अरे मैं ही तो पूच्छ रही हूँ मेरी भोली भली छम्मक छल्लो.. मैं क्यूँ गुस्सा करूँगी भला... चल बता.. पुच्च्च.."

"इसको अपनी चूत में लेते हैं दीदी...!" प्रमिला ने बिना हिचकिचाए बड़ी हिम्मत करके बोल दिया....

"अच्च्छा...." सीमा खुश होकर बोली..,"शाबाश... फिर क्या करते हैं..?" सीमा आलथी पालती मारकर बैठ गयी....

"फिर.. दीदी....." प्रमिला शायद समझ गयी थी कि सीमा इतनी जल्दी किसी को नही छ्चोड़ने वाली... जाने कैसे हिम्मत करके उसने पहली बात बोल दी थी.... अब की बार उसकी आवाज़ में थोड़ी हिचकिचात सी लगी...,"फिर.. इसको आगे पिछे करते हैं दीदी...!"

"ओह तेरी तो.. अभी से ही तू पिछे भी करने लगी..." सीमा कहकर हँसी तो सबने उसकी ताल से ताल मिलाकर हँसना शुरू कर दिया.... चाहे किसी की बात समझ में आई हो या नही.. पर मैं अब भी नही हँसी थी... मुझे सबकुच्छ बड़ा वाहयात सा लग रहा था....

"नही दीदी.. मेरा मतलब.... ऐसे.." प्रमिला ने अपनी जांघों के बीच सलवार के उपर 'टाइगर' को रखा और उसको उपर नीचे करके दिखाते हुए अपनी बात पूरी की..," आगे पिछे करते हैं....!"

जी भर कर हंस लेने के बाद जैसे ही सीमा चुप हुई.. कमरे में सन्नाटा च्छा गया.. सबके होन्ट वापस सील गये...," फिर क्या होता है...?"

"ज्जई.. क्या?" प्रमिला को इतने सवालों की उम्मीद नही थी....

"अरी आगे पिछे करते हैं.. फिर.. आगे बता?" सीमा ने समझाया....

"ज्जई.. फिर बच्चे हो जाते हैं...!" प्रमिला ने शॉर्टकट दे मारा...

"क्यूँ? तू तेरे बाप ने ऐसे ही 'लॉल्ले' से पैदा की थी क्या..?" सीमा ने एक बार फिर बकवास सा डाइलॉग मारा और लड़कियों ने उस'से पहले ही हँसना शुरू कर दिया....

"दीदी.. मेरा मतलब 'असली' वाले से करते हैं तब...!" प्रमिला झेंप कर बोली....

"कितने असली लिए हैं तूने....?" सीमा ने तुरंत अगला सवाल दाग दिया...

प्रमिला ने सकपका कर सीमा को देखते हुए कुच्छ कहना चाहा ही था कि दरवाजे पर खटखट हुई....

"ला इसको इधर दे...!" सीमा ने प्रमिला के हाथ से 'टाइगर' लिया और तकिये के नीचे छिपा लिया...," आराम से बैठ जाओ सब.. वहाँ..!" सीमा ने दूसरे बेड की और इशारा किया जहाँ पिंकी लेटी थी... मैं तो पिंकी को भूल ही गयी थी.. अब देखा तो पाया 'वो' तो कंबल में घुसी सो रही थी...

ज्योति ने दरवाजे पर जाकर सीमा की ओर देखा और उसके इशारा करने पर कुण्डी खोल दी... मैं देख कर हैरान रह गयी.. लड़कियों के होस्टल में लड़का भी आ सकता है?

"सीमा में'शाब... बड़ी मेडम आ रही हैं.. यही बताने आया था...!" लड़के ने कहा और अपनी बत्तीसी निकाल दी....

"ठीक है.. कोई बात नही... मॅ'म के जाने के बाद आना एक बार.. समझ गये ना..!" सीमा ने बैठे बैठे कहा....

"हे हे हे... कुच्छ काम है क्या में'शाब!" लड़का जांघों के बीच अपनी लूँगी के उपर ही खुजाता हुआ बोला....

"तेरी गांद में ये दे दूँगी ज़्यादा बोला तो...!" सीमा ने 'टाइगर' निकाल कर उसको डराया.. और गुस्सा सा करती हुई बोली...,"ज़्यादा मत बोला कर तू...!"

"हे हे हे..." लड़के पर सीमा की बातों से कोई फ़र्क नही पड़ा.. शायद उसकी आदत हो गयी होगी...,"आ जाउन्गा मेम'शाब... बताओ ना.. मुझे कुच्छ करना है क्या?" लड़के के हाथ अभी तक अपनी लूँगी पर ही थे और नज़रें एक एक करके सारी लड़कियों को देखते हुए मुझ पर आकर टिक गयी थी.....

"तू जाता है या....." सीमा ने कहा और अजीब से ढंग से हँसने लगी...

"बाइ मेम'शाब... मैं आ जाउन्गा.. हे हे हे...!" लड़के ने कहा और बाहर चला गया....

"हम जायें क्या दीदी...?" यूयेसेस लड़के के जाते ही एक लड़की खड़ी हो गयी....

"क्यूँ?" सीमा ने उसको घूरा...

"नही.. ववो.. बड़ी मेम आ रही हैं ना.. इसीलिए पूच्छ रही थी...!"

"तो क्या हो गया..? तुम मेरे पास हो यार... ये गुरुकुल मेरे बाप का है...." सीमा ने छाती चौड़ी करके बताया... "अगर तुम मेरे साथ हो तो किसी से डरने की ज़रूरत नही.... समझी!"

"जी दीदी जी..." एक साथ सभी लड़कियों ने संगीतमय ढंग से गुनगुनाते हुए कहा... लगता है अब सब अच्छे से समझ गयी थी....

gataank se aage..................
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10-22-2018, 11:36 AM,
#55
RE: Desi Sex Kahani बाली उमर की प्यास
बाली उमर की प्यास पार्ट--40

गतान्क से आगे..................

"चल अब दरवाजा बंद कर दे.. हो गया 'पोपो' का राउंड!" बड़ी मॅ'म के जाते ही सीमा ने ज्योति की ओर इशारा किया... दरअसल प्रिन्सिपल मॅ'म आई थी... उनके आते ही पिंकी और सीमा को छ्चोड़ कर हम सब बिस्तर से उठ खड़ी हुई थी... मॅ'म ने अंदर आते ही सीमा की और देख कर पूचछा था," सब ठीक है ना बेटी..?" और जवाब में सीमा की मुस्कुराहट देख कर चली गयी थी....

"चलो, आ जाओ!" दरवाजा बंद होते ही सीमा ने लड़कियों को अपने पास बुला लिया... सीमा की पूचहताच्छ से बची हुई दोनो लड़कियाँ बाकी चारों के पिछे छिप कर खड़ी हो गयी...

"अब इसका डेमो कौन दिखाएगा?" सीमा ने 'टाइगर' हवा में लहराते हुए लड़कियों से सवाल किया...

हर बार की भाँति लड़कियाँ इस बार भी एक दूसरी का चेहरा देखने लगी... किसी के मुँह में शब्द नही थे...

अचानक सीमा का ध्यान कोने में खड़ी एक दूसरी के कानो में ख़ुसर फुसर कर रही लड़कियों पर पड़ा...,"तुम वहाँ क्यूँ खड़ी हो अभी भी.... आगे आ जाओ अब!"

"नींद आ रही है दीदी... हम जायें क्या?" दोनो में से एक लड़की मिमिया कर बोली...

"कहा ना आगे आ जाओ.. तुम तो मेरी नर्मी का नाजायज़ फ़ायडा उठाने लगी हो.. यहाँ आओ चुपचाप.. हां... " सीमा के बोलना शुरू करते ही दोनो लड़कियाँ आगे सरक कर बाकी चारों के साथ खड़ी हो गयी थी... उनके सामने आते ही सीमा ने बोलने वाली लड़की की तरफ 'टाइगर' बढ़ा दिया...,"ले पकड़ इसको!"

'टाइगर' को अपनी तरफ बढ़ता देख 'वो' लड़की फड़कते हुए इस तरह पिछे हटी मानो 'टाइगर' सचमुच का टाइगर हो...,"कास्साम से दीदी जी.. मैने कुच्छ नही किया...!" लड़की रोनी सूरत बना कर दो कदम पिछे हटी और अपने हाथों को कमर के पिछे छिपा कर 'टाइगर' को टुकूर टुकूर देखने लगी.... तभी दरवाजे पर दस्तक हुई... सीमा अपना हाथ वापस खींच कर ज्योति से बोली..,"खोलना.. सलीम आया होगा..!"

'वो सलीम ही था... जिस अंदाज में गया था.. उसी में प्रकट हुआ... बत्तीसी निकाले हुए.. अपने हाथ को 'लूँगी' पर टिकाए हुए...," मैं आ गया मेम'शाब!"

सीमा ने उसकी बात का कोई जवाब दिए बिना 'टाइगर' वापस लड़की की ओर बढ़ा दिया..,"ले! पकड़ती है या असली वाला टाइगर पकदाउ?"

सलीम की मौजूदगी में कमरे में मौजूद हर लड़की असहज हो गयी थी.. यहाँ तक की मैं भी... जहाँ पहले लड़कियों की नज़र ज़्यादातर समय 'टाइगर' पर ही टिकी हुई थी.. वहीं अब ज़्यादातार लड़कियाँ कनखियों से असली 'टाइगर' वाले सलीम की ओर देख देख कर लजा सी रही थी...

लड़की शायद सीमा की धमकी का मतलब समझ गयी थी.. काँपते हाथ को आगे लाकर उसने 'टाइगर' को अपने अंगूठे और एक उंगली से ऐसे पकड़ा जैसे हम लड़कियाँ 'उसे' किए हुए 'नॅपकिन' को पकड़ कर 'वहाँ' से हटती हैं.... नज़रें ज़मीन में गड़ाए वा 'टाइगर' को अपने शरीर से ज़्यादा से ज़्यादा दूर रखने की कोशिश में हाथ को उपर ही उठाए हुए थी....

"क्या हुआ? डर लग रहा है क्या? अच्छि तरह मुट्ठी में पकड़ इसको...!" सीमा हंसते हुए भी गरज कर बोली....

"मुझे... मुझे घिन आ रही है दीदी जी..." लड़की ने सहमी हुई नज़रें उपर उठाकर सीमा को याचना की दृष्टि से देखा....

"अच्च्छा!" सीमा कटाक्ष सा करती हुई बोली...,"घिन आ रही है तुझे... तुझे पता है 'ये' हॉस्टिल की 'जान' है... कल को तू ही इसको 5 मिनिट के लिए माँगने आएगी..." सीमा ने गुर्रटे हुए कहा.... और फिर बोली...,"चलो अभी जाओ.. बाकी बातें कल सुबह करूँगी.... तू यहीं रुकना अभी...!" सीमा ने उस लड़की को वहीं रोक लिया जिसने 'टांका' टूट'टने की हामी भरी थी.....

बाकी लड़कियों ने राहत की साँस ली और एक एक करके कमरे से बाहर निकल गयी.... सलीम का हाथ अपनी लूँगी से हट नही पा रहा था... वह भूखी नज़रों से कभी मुझे और कभी उस लड़की को देखने लगा....

"हां.. अब बता.. क्या नाम है तेरा?" सीमा ने अपने सामने सहमी खड़ी लड़की से पूचछा....

"ज्जई.. स्वेता!"

"हुम्म.. और तेरा टांका कैसे टूटा?" सीमा ने नाम सुनते ही अगला सवाल कर डाला....

"ज्जजई..." लड़की ने हड़बड़कर पहले सलीम की और देखा ओर फिर सीमा की और देख कर अपना सिर झुका लिया....

"इस'से शरमाने की ज़रूरत नही है... ज़्यादा शरमाएगी तो इसकी लूँगी उतरवा दूँगी तेरे सामने... समझी!" सीमा ने धमकी सी दी....

"ज्जई.. दीदी.. आप अकेले में कुच्छ भी पूच्छ लो... प्लीज़.. रिक्वेस्ट है!" लड़की घिघिया कर बोली....

"सलीम!" सीमा ने सलीम की ओर देख कर उसका नाम पुकारा....

"जी.. मेम'शब.. खोल दूँ क्या?" सलीम अब भी ऐसे ही बत्तीसी निकाले अपनी लूँगी के उपर से खुरच रहा था 'अपने' टाइगर को.....!"

लड़की सलीम की बात सुनकर घबरा गयी और झट से उसने उगल दिया....,"ज्जई.. वो... स्कूल में हो गया था एक बार...!"

"पूरी बात बताने का इरादा है या सिर्फ़ टाइम वेस्ट कर रही है मेरा...!" सीमा को इतनी सी बात से शांति नही हुई...

"ज्जई.. बता रही हूँ..." स्वेता ने बेचारा सा मुँह बनाकर सलीम की ओर देखा...,"पिच्छले साल स्कूल में हेडमास्टर ने...." स्वेता की ज़ुबान बीच में ही अटक गयी......

"ओह तेरी तो.. मास्टर से मज़े ले लिए... जवान था क्या?" सीमा ने चटखारा लेकर पूचछा तो स्वेता ने 'ना' में गर्दन हिला दी....

"तो?" सीमा ने फिर पूचछा....

"40.. 50 साल का..." श्वेता ने दबे सुर में बताया.....

"क्या बात है... बुड्ढे ने तुझे फँसाया या तूने बुड्ढे को...!" सीमा हँसती हुई बोली..... श्वेता के लब हिल नही पाए....

"मैं आख़िरी बार पूच्छ रही हूँ... वरना...." सीमा ने गुर्रटे हुए कहा और ज्योति और आरती से बोली..,"तुम लोग बाहर जाओ.. लगता है सलीम की लूँगी उतरवानी ही पड़ेगी.....!"

"नही दीदी जी.. बता रही हूँ ना... उसने हमें देख लिया था.... क्लास रूम में..." स्वेता के बताते बताते ज्योति और आरती बाहर जा चुकी थी...!"

"दरवाजा बंद कर ले सलीम..." सीमा ने सलीम को कहा और फिर मुझे देख कर बोली..," तुम्हे भी जाना है तो जाओ बेशक...!"

"नही ठीक है दीदी..." मैने फीकी सी मुस्कान सीमा की ओर फैंकी...

"उतार दूं मेम'शब!" सलीम की उत्सुकता देखते ही बन रही थी.....


क्रमशः...............................
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10-22-2018, 11:36 AM,
#56
RE: Desi Sex Kahani बाली उमर की प्यास
बाली उमर की प्यास पार्ट--41

गतान्क से आगे..................

"चुप करके कोने में खड़ा हो जा..!ये सुना रही है शायद.." सीमा ने सलीम को डांटा और श्वेता की ओर मुँह करके बोली,"सुना रही है ना?"

"ज्जई.. दीदी जी..!" श्वेता ने एक बार और कोने में जाकर खड़े हो गये सलीम से नज़रें चार की ओर सिर झुका कर बोली..,"सिर्फ़.. इश्स लड़के को तो भेज दो.. प्लीज़!"

"क्यूँ.. फिर क्या हो जाएगा..?" सीमा गुर्रकार बोली...

"प्लीज़ दीदी.. इसके सामने बहुत शर्म आ रही है...!" श्वेता ने अनुनय की...

"अच्च्छा.. बुड्ढे के सामने नही शरमाई.. इश्स छ्होकरे से शर्मा रही है तू?" सीमा व्यंगया करते हुए बोली....

"पर दीदी... ववो...!" श्वेता जो कुच्छ कहना चाहती थी.. सीमा के बोलते ही उसके हलक में ही घुट कर रह गया..,"सीधे तरेके से सुना दे.. वरना.. तुझे पता है मैं क्या करूँगी...!"

"ववो.. उसने हमें क्लासरूम में अकेले देख लिया था दीदी...!" श्वेता के पास और कोई चारा भी ना था....

"किसके साथ? और क्या करते देख लिया था...? शॉर्टकट मत मार खुल के बता पूरी बात...!" इस बार सीमा ने इस तरह बोला जैसे उसने अपना आपा खो दिया हो...

"ज्जई.. मीना के साथ देख लिया था.. रिसेस में...!" श्वेता ने हुलक में अटका थूक गटका...

"मीना?.. वो लड़की थी क्या?" सीमा ने गौर से पूचछा..

"ज्जई....!" श्वेता इतना बोल कर चुप हो गयी...

"अरी फिर क्या हुआ... फुल स्टॉप मत कर.. क्या कर रहे थे.. तुम वहाँ...?" सीमा ने मस्ता कर कहा,"देख.. यहाँ सारी लड़कियाँ अपनी बात शेर करती हैं मुझसे.. घबरा मत.. और सलीम तो बड़े काम का लड़का है.. इसकी तो चिंता ही छ्चोड़ दे... चल बोल.. क्या कर रहे थे तुम दोनो...?"

"ज्जई.. कुच्छ नही.. मीना ने ही बोला था मुझसे...!" श्वेता अब तक खुलकर बता नही पा रही थी...

"क्या?"

"ववो.. उसने दरवाजा बंद करके.... नही दीदी.. सलीम को बाहर निकाल दो पहले...!" श्वेता कसमसा कर बोली...

"सलीम... लूँगी उतार दे अपनी.. पहले इसकी शर्म खोलनी ज़रूरी है.. तुझसे शर्मा रही है ये...!" सीमा ने सलीम की ओर चेहरा घुमा कर कहा...

"नही दीदी.. प्लीज़.. ववो.. " अब की बार श्वेता इस'से ज़्यादा बोल पाती.. इस'से पहले ही सलीम की लूँगी उसके कंधे पर थी... शवेता ने एक पल के लिए घबराकर सलीम की जांघों के बीच झटके खा रहे काले, मूसल से लिंग को देखा और घबरा कर अपनी आँखें बंद कर ली.... सुन्दर के बाद मैने पहली बार इतना मोटा लिंग देखा था... मैं चाहकर भी उसको निहारते रहने का लालच छ्चोड़ नही पाई... सलीम लिंग को अपनी मुथि में पकड़ कर खड़ा हो गया....

"अब बोल.. बता रही है या सलीम को 'कुच्छ' करने को कहूँ....

"बता रही हूँ दीदी.. हम दोनो आपस में चिपक कर बैठे थे.. दरवाजा बंद करके..." श्वेता ने अब तक अपनी आँखें नही खोली थी....

"चिपक कर कैसे? आख़िरी बार बोल रही हूँ.. ये शर्म तुझे आज फिर चुदवा कर छ्चोड़ेगी सलीम से...!.. खुल के बोल सबकुच्छ.. अब की बार मुझे बोलना पड़ा तो मैं सलीम से बात करूँगी... समझ गयी!"

"ज्जई.. हमने स्कर्ट पहनी हुई थी... उसने कहा कि देख तुझे कितने मज़े आएँगे.. कहकर उसने दरवाजा बंद किया और मेरी शर्ट के बटन खोल कर मेरी... 'इनको' पीने लगी... मैने एक दो बार मना किया.. फिर मुझे मज़े से आने लगे... थोड़ी देर बाद उसने मेरी स्कर्ट उपर उठा कर 'वहाँ' उंगली से च्छेदना शुरू कर दिया...." श्वेता ने बोला बंद करके एक लंबी साँस ली.. और फिर शुरू हो गयी...

जैसे जैसे वा बोलती जा रही थी.. सलीम के लिंग में और अधिक तनाव आता जा रहा था....," उसने मुझे अपने 'वहाँ' उंगली घुसाने को कहा और फिर कहकर आगे पिछे करवाने लगी... तभी हेडमास्टर ने दरवाजा खटखटाया.. हम दोनो डर गये... हमने अपने बटन बंद किए और दरवाजा खोल दिया... सामने सर खड़े थे..."

"हूंम्म.. पर तुम दोनो फँसी कैसे... बटन ढंग से बंद नही किए थे क्या?" सीमा उसकी बात में पूरा इंटेरेस्ट ले रही थी....

"ज्जई.. ववो तो कर लिए थे दीदी... पर हेडमास्टर ने डाँटकर पूचछा तो मीना ने बोल दिया....!" श्वेता ने आँखें खोल कर सीमा की ओर देखा....

"क्या बोल दिया?.. ये भी तो बता!" सीमा ने पूचछा...

"यही कि हम दोनो ग़लत काम कर रहे थे....!" श्वेता ने नज़रें झुका ली....

"हेडमास्टर ने पूचछा नही क्या कि कौनसा ग़लत काम?" सीमा ने पूचछा....

"ज्जई.. ववो.. तो मीना ने अपने आप ही बता दिया था.... बिना पूच्छे ही...!" श्वेता ने बताया...

"क्या बता दिया था अपने आप.. मुझे भी तो बता ना...!" सीमा बोली...

"ज्जई.. यही कि हम दोनो एक दूसरी की.." श्वेता की ज़ुबान लड़खड़ा सी गयी थी और उसके गोरे गोरे कमसिन गालों पर लाली छा गयी...," हम दोनो एक दूसरी की चूत में उंगली......!"

"अर्रे वाह.. मीना तो बड़ी दिलेर निकली.. फिर क्या हुआ?" सीमा ने चटखारा लेकर पूचछा....

"फिर... फिर हेडमास्टर ने हमें ऑफीस में बुला कर डांटा और मीना से 'वो' सब कुच्छ लिखवा लिया जो हम कर रहे थे...."

"वेरी स्मार्ट! चल बोलती रह... तुझसे नही लिखवाया था क्या?" सीमा ने प्ूवच्छा...

"ज्जई.. बोला तो था.. पर मैने लिखा नही....!" श्वेता नज़रें नही मिला पा रही थी अब....

"फिर?"

"फिर सर ने कहा की उसी कागज पर नीचे उन्हे दोनो के घर वालों के साइन चाहियें...!" श्वेता असहज सी हो गयी थी...

"हूंम्म.. ब्लॅकमेलिंग का मामला बनता था उस पर... चल छ्चोड़.. आगे बता.. बड़ी मजेदार कहानी है यार.... फिर तुमने क्या किया...?" सीमा बोली....

"फिर मीना ने कहा की छुट्टी के बाद दोनो सर से रिक्वेस्ट करेंगे... मैं बहुत डरी हुई थी.. पर उसने कहा कि वह 'सर' को मना लेगी...!" श्वेता फिर चुप हो गयी....

"फिर क्या हुआ.. छुट्टी के बाद चोदा होगा उसने तुम दोनो को...!" सीमा ने मज़े लेते हुए पूचछा....

"नही.. मुझे सिर्फ़...... नंगी किया था यूयेसेस दिन...!" श्वेता झुरजुरी सी लेकर बोली...," मीना को.... किया था...!"

"तेरे सामने ही..?" सीमा का हाथ उसकी गोद में रखे तकिये के नीचे चला गया... और नज़रें सलीम के 'तँटानाए' हुए लिंग पर.... जहाँ मेरी भी नज़र ठहरी हुई थी... वो श्वेता की बातें बड़ी ध्यान से सुनते हुए अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहा था....

"हाँ!" श्वेता ने सिर हिलाकर जवाब दिया....

"क्यूँ चूतिया बना रही है यार... तुझे नंगी कर लिया.. और कुच्छ किया भी नही..." सीमा विचलित सी होती जा रही थी....

"अगले दिन किया था.. उस दिन तो सिर्फ़ रास्ता बनाया था....!" श्वेता भोलेपन से बोली...

"कैसे? बता ना फिर?" सीमा ने उत्सुकता से पूचछा...

"पहले 'तेल' में उंगली डुबोकर....... धीरे धीरे अंदर की थी... बाद में अंगूवथे से.....!" श्वेता सकुचा कर बोली....

"मज़ा आया था तुझे?"

सीमा ने पूचछा तो श्वेता ने 'ना' में गर्दन हिला दी....

"झूठ बोलती है.. अभी सलीम से करके दिख्वाउ 'मज़े' आते हैं या नही...?" सीमा एक बार फिर गुर्राय....

"आए थे.. थोड़े थोड़े..." श्वेता घिघिया कर बोल उठी....

"और क्या क्या हुआ था उस दिन...?" सीमा ने आगे पूचछा....

"मेरी.... छातियो को हथेली में लेकर धीरे धीरे मसला था पहले.. फिर इनको चूसा था..."

"फिर?"

"फिर 'अपना' निकाल कर दिखाया और मेरे हाथ में पकड़ा दिया...." श्वेता थोड़ी हिचक के बाद बोली...

"कैसा था...?"

"गरम गरम था दीदी...!" श्वेता की झिझक खुलती जा रही थी...

"अरे गरम तो होता ही है.. कितना बड़ा था?" सीमा झल्लते हुए बोली....

श्वेता ने झिझकते हुए कनखियों से 'सलीम' के फंफंते लिंग पर निगाह डाली और फिर थोड़ा रुक कर बोली..,"इतना नही था दीदी... इस'से छ्होटा था....!"

"अच्च्छा.. फिर?" सीमा सलीम की और देख कर हंसते हुए बोली....

"फिर मुझे नीचे बैठकर मेरे मुँह में डाला था...!"

"बोलती रह ना.. हर लाइन के बाद टोकना पड़ेगा क्या?"

"उन्होने मेरे शरीर की बहुत प्रसंशा की थी दीदी... मुझे पूरी नंगी करके मुझे हर जगह हाथ लगा कर देखा था... फिर मेरी छातियो को चूस्ते हुए उन्होने उंगली 'वहाँ' घुसाने की कोशिश की थी... मुझे बहुत दर्द हुआ तो 'उसने' मीना को अलमारी से तेल निकालने को कहा....."

"क्यूँ.. गीली नही हुई थी क्या?" सीमा उसको टोक बिना ना रह सकी...

"हो गयी थी.. फिर भी दर्द हो रहा था....." श्वेता ने रुककर सीमा की ओर देखा और फिर अपने आप शुरू हो गयी...," फिर उन्होने मेरी चूत में तेल ही तेल लगा दिया और उसकी मालिश सी करते हुए अचानक उंगली में चूत में घुसा दी..." श्वेता की आँखों में तैरने लगे वासना के लाल डोरे और उसकी बदल गयी भाषा बता रही थी कि 'वा' अब गरम हो चुकी है....," पहले बहुत दर्द हुआ था.. पर धीरे धीरे सारा दर्द ख़तम हो गया और 'अजीब' से मज़े आने लगे.... बाद में उन्होने उंगली निकाल कर मेरी चूत में अपना अंगूठा घुसा दिया... करीब पाँच मिनिट तक वो अंगूठे से ही करते रहे और बोले की 'तू' एक दो दिन में तैयार हो जाएगी... रात में खुद करना ऐसे...."

"फिर?"

"तब तक मीना ने अपने आप ही पूरे कपड़े निकल लिए थे.... उसके बाद उन्होने मीना की जमकर चुदाई की.. मेरे सामने ही......अयाया!" श्वेता की सिसकी निकल ही गयी....

"तेरा चूतिया बना गये वो.. मीना और हेडमास्टर मिले हुए थे पक्का.." सीमा हंसते हुए बोली.... और फिर चुप होने के बाद पूचछा,"तेरी चुदाई हुई या नही?"

"हुई थी दीदी... 3-4 दिन बाद उन्होने मेरी भी मीना की तरह चुदाई की... इतने दिन तक वो रोज मेरी चूत में रास्ता बनाते रहे....!"

"अब सच सच बता... मज़े आए थे ना तुझे....?" सीमा ने पूचछा....

"बहुत आए थे दीदी.. कसम से...!" श्वेता तड़प कर बोली...

"फिर कभी किया किसी और ने या....?" सीमा ने पूचछा....

"सर ने ही दो तीन बार किया था दीदी.. उसके बाद हमारे पेपर शुरू हो गये....!" श्वेता की आँखों में दोबारा मज़े ना ले पाने की कसक सॉफ झलक रही थी...

"आज फिर लेने हैं क्या? सलीम के साथ...!" सीमा उसकी और आँख मारते हुए बोली...

श्वेता की नज़र सीधी सलीम के लिंग पर टिक गयी.. कुच्छ देर टुकूर टुकूर उसको देखते रहने के बाद मन मसोस कर बोली..,"नही दीदी.. ये तो बहुत मोटा है.. इतनी जगह नही है मेरी चूत में...!"

उसकी बात सुनकर सीमा हँसने लगी..," अर्रे.. जगह तो 'लंड' अपने आप बना लेता है.. तेरा हेडमास्टर तो चूतिया था जो तीन दिन लगाए.... चल छ्चोड़.. आज से तू मेरी दोस्त है... मैं रास्ता बनवावँगी तेरी चूत में... अब देर बहुत हो गयी है... एक दो दिन सब्र कर ले.. ठीक है ना...?"

"ठीक है दीदी... ववो.. एक बात कहनी थी..." श्वेता थोड़ी सकुचा कर बोली....

"बोल ना यार...!" सीमा के होंतों पर अब भी मुस्कुराहट तार रही थी.....

"ववो.. 'टाइगर' ले जाउ क्या?"

"हा हा हा हा... ये ले...!" सीमा ने हंसकर कहा और 'टाइगर' उसकी ओर बढ़ा दिया...," जा मज़े कर!"

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"मेरा क्या होगा मेम'शब...? ये तो खड़ा का खड़ा रह गया...." सलीम ने श्वेता के जाते ही अपना 'लिंग' हाथ में पकड़ लिया.....

"साले.. ये फ्री का माल नही है... मैं पालती हूँ इसको... चल दरवाजा बंद कर दे..." सीमा ने कहा और मेरे सामने ही अपने कपड़े उतार कर खूँटि पर टाँगने लगी....

"घुसा दूँ क्या मेम'साब?" सलीम ने बिना हिचकिचाए दरवाजे बंद करके अपने लिंग पर 'बिस्तर' के कोने से कॉंडम निकाला और अपने 'लिंग' पर चढ़ा उपर चढ़ते ही 'कुतिया' की तरह झुकी हुई सीमा के पिछे पोज़िशन ले ली.... जैसे ही वह सीमा की ओर बढ़ा था.. मैं वहाँ से उठकर पिंकी के पास आकर लेट गयी थी... मेरा इतना बुरा हाल हो चुका था कि बयान नही कर सकती.....

"तू बोलता बहुत है... अब क्या हरी झंडी देख कर.... आआआआअहह!" सीमा ने बात अधूरी छ्चोड़कर कामुकता भरे लहजे में लंबी सिसकारी ली....,"एक दम पूरा नही कुत्ते... कितनी बार.... सम्झाउ तेरे को.. पहले आराम से थोड़ा थोड़ा किया कर... अया.. हाआँ.. ऐसे.... आह मरी राआअम....."

सलीम ने अपने दोनो हाथ सीमा के नितंबों पर टीका दिए और उन्हे फैलाकर आगे पिछे होता हुआ धीरे धीरे अपनी स्पीड बढ़ने लगा... अचानक उसकी गर्दन मूडी और नज़रें सीधी मुझ पर टिक गयी... एक पल को तो मैने हड़बड़कर नज़रें चुरा ली थी... पर ज़्यादा देर तक 'कॉम्क्रीडा का लुत्फ़ उठाने से खुद को वंचित ना रख सकी.... सलीम के चेहरे की खुशी देखते ही बन रही थी.... मैने समझने में देर नही लगाई कि ये 'उसका' रोज़ का काम होगा....

मुझ पर चिरपरिचित सुरूर छाता चला गया... पिंकी के साथ पड़ा दूसरा कंबल औधते ही मैने सलवार का 'नाडा' चटकाया और सलीम की आँखों में आँखें डाले 'उंगली' अपनी 'कामरस' से तार हो चुकी 'योनि' में घुसा दी... इसके साथ ही उत्तेजना के मारे मेरे नितंब उपर उठ कर थिरकते हुए ये बयान करने लगे कि 'उंगली' से काम नही चलेगा....

थोड़ी देर पहले अगर सीमा ने सलीम को ये नही बोला होता कि 'तू' फ्री का माल नही है तो हालत ऐसी हो चुकी थी की अब तक तो सलीम के सामने 2-2 ऑप्षन होते... सलीम की नज़रों से लग भी रहा था कि 'वो' मुझ पर लट्तू है.... पर मैं मन मसोस कर रह गयी....

'सस्सला 'टाइगर' भी उधर चला गया...' मन ही मन खुद की किस्मत को कोसते हुए मैने 'योनि' के लिए छ्होटी पड़ रही उंगली के साथ उसके 'साथ वाली' को भी अंदर घुसेड दिया.... पर 'वो' बात थी ही नही...

होती भी कैसे? मेरे सामने चंद कदम की दूरी पर 'खुला दरबार' चल रहा था और मुझे खाली उंगली से काम चलना पड़ रहा था.... पर मैं लगी रही.. अधखुली आँखों से सीमा की योनि में दनादन धक्के लगा रहे सलीम को घूरते हुए....

दोनो को जमकर सिसकियाँ लेते देखने की वजह से मेरा एक बार में उस दिन मन नही भरा.... मैं लगी रही... आख़िरी बार जब सलीम दहाड़ कर सीमा के उपर गिरा तो मेरा तीसरी बार निकला था....'फिर भी मेरा तन बेचैन था....

"आज इतनी जल्दी कैसे निकल गया तेरा....?" सीमा बिस्तर पर उल्टी पड़ी पड़ी सिसकियाँ लेती हुई बोली....

"ये लड़की बड़ी सेक्सी है मेम'शाब... एक बार इसकी भी दिलवा दो ना...!" सलीम ने अपना लिंग सीमा की योनि से निकाल कर उस पर से कॉंडम हटाया और कोने में पड़े तौलिए से लिंग को पौंचछते हुए कहा.....

उस वक़्त मैने यही सोचा था कि काश सीमा उसकी बात पर गौर करके मुझ पर रहम कर ले... पर सीमा ने उसको झिड़क दिया...," ज़्यादा बे-ईमान बनेगा ना तो तेरी.... चल अब यहाँ से.. दो चार दिन में श्वेता की दिलववँगी.. जी भर कर तड़प लेने दे उसको अभी... आज वालियों में से एक और मान जाएगी.. मुझे लगता है!"

मुझे बड़ी हैरत हो रही थी.. मुझ पर इतना दुलार न्योचछवर करने वाली 'सीमा' ने मेरी मर्ज़ी तक नही पूछि.. जबकि 'वो' औरों को मानने की बात कर रही थी.... आख़िरकार मैने मौन तोड़ ही दिया...

"कर लेने दो दीदी... मेरा भी बहुत मन कर रहा है आपको देख कर...!"

"पहले किया है कभी...?" सीमा ने पूचछा....

"उस वक़्त 'ना' करना मुझे बेवकूफी लगी... कहीं मुझे भी 4-5 दिन के लिए 'टाइगर' से ट्रैनिंग देने की बात कहकर टाल ना दे...,"हाँ.. किया है दीदी...!" मैने झट से कह दिया....,"इतने ही मोटे से किया है..!"

"चल तू जा अभी.. मैं इस'से बात करके बताउन्गि...!" सीमा ने मेरी बात का कोई जवाब देने की बजाय सलीम को 'वहाँ' से तरका दिया...

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"ये कौन है...?" सीमा ने सलीम के जाते ही मुझे अपने पास बुलाकर साथ लेट'ने को कह दिया...

"ये... ये पिंकी है दीदी.. बहुत अच्छि है और बहुत प्यारी भी...!" मैने खुश होकर बताया....

"ये भी कर लेती है क्या? मुझे तो बहुत नादान लगती है....!" सीमा ने कंबल में लिपटी मस्ती से सो रही पिंकी पर निगाह डाली....

"आप ठीक कह रहे हो दीदी.. ये तो बहुत ही नादान है.. अभी तो सीखने लगी है बातें...!" मैने कहा....

"सुन.. तू बुरा मत मान'ना... मुझे पता था तेरा बहुत दिल कर रहा होगा.. पर तेरे लिए सलीम ठीक नही है... इसीलिए मैने मना कर दिया....."

"कोई बात नही दीदी.." मैने मन मसोस कर कहा.... मेरे बदन में भड़की हुई आग 'सलीम' के जाने के साथ ही ठंडी होती चली गयी थी....

"बुरा मान मत कर... तुझे नही पता मैने तेरे लिए क्या सोच रखा है.... मस्ती करनी है ना?" सीमा ने पूचछा.....

मैं बिना कुच्छ बोले उसकी बात का मतलब समझने के लिए उसकी आँखों में झँकति रही....

"बोल ना... मज़े करने हैं तो बोल...!" सीमा ने मेरी च्चती पर हाथ रख कर उसको हल्का सा दबा दिया... मैं कसमसा उठी..,"हाँ!"

"बस 2 दिन रुक जा.... हॉस्टिल से बाहर चलकर मज़े करेंगे... एक से एक स्मार्ट लड़के के साथ... सलीम को छ्चोड़!"

"पर आप कह रहे थे कि बाहर तो जा ही नही सकते... फिर..."

"भूल जा सब कुच्छ.. मैं साथ हूँ तो कुच्छ भी हो सकता है... तू देखना मैं तुझे कितने मज़े कराती हूँ....!"

"पर.. वो तो आप बोल रहे थे कि पैसों में होता है...!" मैने अपनी शंका उसको बताई.. मेरे पास पैसे थे भी तो नही....!

"तू छ्चोड़ ना यार.. बोल कितने पैसे चाहियें तुझे... मैं देती हूँ... यहाँ में लड़कियों से फोन सुन'ने के पैसे इसीलिए लेती हूं ताकि 'ये' लड़कियाँ' मुझे अच्छि 'ना' माने... फिर प्राब्लम होती है.. दबदबा रखने में.. हे हे हे.. वैसे मैं इतनी बुरी नही हूँ... लाख रुपए तो अभी भी मेरी अलमारी में रखें हैं.. तुझे जब चाहियें बता देना...!"

मैने सीमा की ओर मुस्कुरकर देखा.. उसके यही एक बात कहने से मुझे 'वो' बहुत अच्छि लगने लगी थी.....," आपकी मम्मी हमारे गाँव के पास वाले गाँव में प्रिन्सिपल हैं...." मैने मुस्कुराते हुए ही कहा.....

"मेरी मम्मी..." सीमा ने एक बार चौंक कर मुझे देखा और फिर बोली..,"अच्च्छा... तुमने उनको दिन में देख लिया होगा... है ना?"

"हाँ.. वो आपसे बात कर रही थी... मेरे बारे में उन्होने ही बोला था क्या? ध्यान रखने को....?" मैने पूच्छ ही लिया....

"नही नही.. उन्होने कुच्छ नही कहा था ऐसा... बस तुम मुझे बहुत अच्छि लगी और मैने ऑफीस में जाकर क्लर्क को बोल दिया....!"

"सच बताओ ना दीदी...?" मुझे उसकी बात पर विश्वास नही हुआ था....

"अरे सच यार.. तेरी कसम... देख तू कितनी सेक्सी है.. तेरे जैसी लड़की पूरे हॉस्टिल में नही आई आज तक...!" कहकर एक बार फिर उसने मेरे उपर आकर मेरे उभारों पर हाथ फेरा और खिलखिला कर हँसने लगी... मैं अजीब सी नज़रों से उसको देखती रही.. मुझे पूरा विश्वास था कि मामला कुच्छ और ही है.....

"सुन... तू 'ये'... सलीम वाली बात का जिकर किसी से मत करना.. समझ गयी ना.. सबको इस बात का पता नही है....!" सीमा मेरे उपर से हट'ती हुई बोली...

"ठीक है दीदी...!" और मैं क्या कहती!

"चल अब... अपनी बात सुना... किसने किया तेरे अंदर.. पहली बार....!" सीमा मुझे छेड़ती हुई बोली....

मुझे पहली बार के अपने प्रणय मिलन को सीमा के साथ शे-अर करने में कोई बुराई नही लगी... मैने दिल खोल कर पूरे चटखारे ले लेकर उसको बात बताई और फिर हम दोनो सो गये... साथ साथ ही.....!

क्रमशः......................
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10-22-2018, 11:37 AM,
#57
RE: Desi Sex Kahani बाली उमर की प्यास
बाली उमर की प्यास पार्ट--42

गतान्क से आगे..................

"हॅपी ब'डे!" सुबह सोते हुए अचानक पिंकी ने अंजलि को पकड़कर झकझोर सा दिया... देर रात तक जागने रहने के कारण अंजलि जागने के बाद भी उनीनदी सी थी...,"उन्ह.. क्या है? थोड़ी देर और सोने दे ना...!" उसने कसमसा कर कहा.....

"अरे.. आज तेरा ब'डे है.. चल उठ जल्दी...!" पिंकी ने अंजलि की नींद तोड़ने के लिए उसके पेट पर अपनी कोहनी रख कर दबा दी...

"ऊई मम्मी... क्या करती है यार...?" अंजलि ने च्चटपटा कर उसकी कोहनी हटाई और बैठ कर अपनी आँखें मसल्ने लगी...

"कितने साल की हो गयी तू?" पिंकी ने पूचछा...

"अठारह की... क्यूँ?" अंजलि ने उसको अपनी उमर बता कर पूचछा....

"कुच्छ नही.. बस ऐसे ही पूचछा है..." पिंकी ने कहा और मुस्कुरा दी...

"ये कहाँ गयी...?" अंजलि ने अपनी साइड में खाली बिस्तेर देख कर पूचछा...

"पता नही... यहीं होगी बाहर... तुझे पता है.. सुबह सारी लड़कियों को ग्राउंड में इकट्ठा करते हैं... हमें कोई जगाने ही नही आया... तू सो रही थी, इसीलिए मैं भी नही गयी...!" पिंकी ने बताया...

"पिंकी!" अंजलि ने उसकी बात सुन'ने के बाद कहा..,"यार, मुझे भी बहुत बुरा लगा था जब उसने तुझे कमर दबाने को कहा... हम अपना कमरा चेंज कर लेंगे...!"

"तो क्या हो गया.. मुझसे बड़ी हैं.. एक आध बार काम बोल भी देंगी तो कर दूँगी... वैसे ये कमरा सब कमरों से अच्च्छा है... मैं इस कमरे में नही होती तो मेरे साथ भी दीदी कल ऐसा ही करती ना...?" पिंकी ने मन मसोस कर कहा....

"तू तो सो गयी थी ना...?" अंजलि ने हैरत से पूचछा.....

"हां... सुबह मैं बाहर निकली तो कल वाली लड़कियों में से एक ने बताया कि उनके साथ बहुत बेकार बातें की थी दीदी ने... 'वो' नही रहेगी यहाँ.... ऐसा बोल रही थी... एक बात पूच्छून...?"

"हाँ... पूच्छ...!"

"तुम वो... वो डाइयरी क्यूँ लिख रही हो?" पिंकी ने पूचछा तो अंजलि के होश उड़ गये...

"सीसी..कौनसी डाइयरी?"

"वही.. जो तेरे बॅग में रखी है... तेरा सामान निकाल कर अलमारी में रख रही थी तो मुझे मिली..."

"त्त..तूने 'वो' पढ़ ली?" अंजलि हड़बड़ा गयी...

"थोड़ी सी पढ़ी थी... तुमने उसमें पता नही कैसी कैसी गंदी बातें लिख रखी हैं... मैने बीच में ही छ्चोड़ दी...." पिंकी मुस्कुरकर बोली...

"मैं बताउन्गि तुझे...! कहाँ है मेरी डाइयरी...." अंजलि तुनक सी गयी....

"मैने च्छूपा दी.. बाद में पढ़ कर दूँगी.... हे हे हे..."

"देख.. चुपचाप 'वो' डाइयरी दे दे... वरना मैं...." अंजलि अपनी बात पूरी करती.. उस'से पहले ही दरवाजे पर एक लड़की आकर खड़ी हो गयी...,"पिंकी कौन है.. उसके गार्डियन आए हैं नीचे....!"

"पर... पापा तो कल आने थे..." पिंकी कहकर उठी और खुशी से झूमते हुए अपनी चप्पल ढूँढने लगी....

"रुक.. मैं भी तो आ रही हूँ...!" पिंकी को बाहर भागते देख अंजलि भी झट से उठी और अपना मुँह धोने लगी....

"आ जाओ.. मैं नीचे ही हूँ..." पिंकी ने एक पल ठिठक कर कहा और फिर भाग गयी....

*********************************8

"तुम...?" हॅरी को सामने पाकर पिंकी का बुरा हाल हो गया था.. गेस्ट रूम में हॅरी कुर्सी पर बैठा हुआ उसको देख कर मुस्कुरा रहा था...,"क्यूँ? तुम्हे खुशी नही हुई?"

"न्नाही.. ववो.. मैं तो बस... तुम मुझसे मिलने कैसे आ गये... यहाँ तो मम्मी पापा ही मुझसे मिल सकते हैं बस... और आज तो सॅटर्डे है... आज के दिन भी मिल सकते हैं क्या?" पिंकी हड़बड़ा कर बोली....

"मैं तो किसी और काम से आया था... प्रिन्सिपल मेडम से मिलने... सोचा... तुमसे भी मिलता चलूं...!" हॅरी प्यार से उसके चेहरे को निहारता रहा..,"आओ बैठो ना...!"

आअस्चर्य और झिझक के मिले जुले भाव पिंकी के चेहरे पर देखे जा सकते थे.. तभी अंजलि भागती हुई गस्ट रूम में घुसी और हॅरी को वहाँ पाकर वापस पलट गयी....

"म्‍मैइन.. 2 मिनिट में आ जाउ?" पिंकी हॅरी के सामने खुद को रात के कपड़ों में देख शर्मा रही थी....

"नही.. अभी तो मुझे जल्दी है... तुम बस दो मिनिट बैठ जाओ...!" हॅरी ने उसको अपने पास आने का इशारा किया....

"ऐसे ही जाना था तो मुझे क्यूँ बुलाया यहाँ....?" पिंकी ने मुँह बना लिया...

"एक 'किस' लेने के लिए... दे दो ना?" हॅरी शरारत करता हुआ बोला....

हॅरी के मुँह से सीधी बात सुनकर शर्म से पिंकी के गाल गुलाबी हो गये...," ऐसी बात मत करो.. मैं चली जाउन्गि..." पिंकी अपनी झिझक च्छुपाने के लिए उसकी तरफ कमर करके खड़ी हो गयी....

हॅरी चुपके से उठा और दरवाजा बंद करके वहीं अपनी कमर सटा कर खड़ा हो गया,"ऐसे कैसे चली जाओगी... एक 'किस' तो तुम्हे देनी ही पड़ेगी आज!"

बंद कमरे में एक बार फिर हॅरी के सामने खुद को पाकर पिंकी का कुँवारा यौवन मचल उठा... नज़रें उठाकर उसने क्षण भर के लिए हॅरी से नज़रें चार की और फिर उसके लब थिरक उठे...,"ंमुझे जाने दो ना... डर लग रहा है.. कोई आ जाएगा...."

"तुम इधर तो आओ एक बार..." हॅरी ने उसकी और अपने हाथ फैलाए...

पिंकी ने छलक्ते यौवन को संभालने की कोशिश करते हुए एक हाथ छातियो को च्छूपाते हुए अपने चेहरे पर रखा और नज़रें झुकाए हुए रेंगती हुई सी उसके पास जा पहुँची..,"क्क्या?"

"एक बार अपने होंटो पर होन्ट रखने दो ना जान!" हॅरी ने उसकी कलाई को पकड़ कर अपनी तरफ खींच लिया.... प्रतिरोध की गुंजाइश ही नही बची थी... पिंकी का बदन हॅरी की बाहों के दायरे में सिमटा हुआ था... हॅरी के दोनो हाथ पिंकी की कमर पर थे और पिंकी के दोनो हाथ लज्जा वश अपनी और हॅरी की छाती के बीच...

"नही.. होंटो पर नही प्लीज़... मुझे..!" अपनी उखड़ी साँसों को नियंत्रित करने की कोशिश करते हुए पिंकी ने अपना चेहरा उठा कर आँखें बंद कर ली... भला ये रज़ामंदी नही तो और क्या था... हॅरी ने उसको आगे कुच्छ बोलने ही नही दिया और थोड़ा झुक कर पिंकी के रसीले आधारों पर अपने होन्ट टीका दिए...

"अया..." पिंकी बावली सी होकर कराह उठी... हॅरी के हाथ जैसे ही नीचे सरकते हुए उसके नितंबों पर जाकर टीके.. काम तृष्णा बुझाने की ललक ने पिंकी को अपनी आइडियां उपर उठा अपने हाथों की दीवार को दोनो के बीच से अलग करके हॅरी के गालों को थाम लेने पर राज़ी कर ही लिया.... अपनी उभरती हुई चूचियो को हॅरी के सीने में धंसता हुआ पाकर पिंकी का रोम रोम दाहक उठा... नितंबों पर हॅरी के हाथों की जकड़न ने ऐसी आग लगाई की पिंकी सिसक उठी... उसके ऐसा लगा जैसे यही जन्नत है... नितंबों, चूचियो और आधारों के स्पर्श का असर जाने कैसे पिंकी की योनि तक जाकर उसको पिघलने लगा...

पूरे 2 मिनिट तक पिंकी के मन-बदन को झकझोर कर रख देने वाले अहसास के बाद जैसे ही हॅरी उस'से अलग हुआ, पिंकी अजीब सी नज़रों से उसको देखने लगी.. मानो पूच्छ रही हो,"रुक क्यूँ गये?"

"तुम कितनी मीठी हो पिंकी? मैं इस चूमबन को जिंदगी भर नही भुला पाउन्गा... तुम्हे कैसे लगा...?" हॅरी ने पूचछा तो पिंकी जैसे होश में आई... शरमाई और घबराई हुई सी पिंकी ने एक बार फिर नजरारें चुरा ली...,"अब तुम चले जाओगे क्या?"

"हां.. जाना पड़ेगा.. यहाँ तुम्हारे साथ तो नही रह सकता ना...? मौका मिलते ही फिर आउन्गा...!"

"कब?" पिंकी के सवाल में कुच्छ ऐसा भाव था.."जल्दी आना!"

"जल्द ही... मैं तो यहाँ आता रहता हूँ...!" हॅरी ने दरवाजा खोल दिया...,"कोई प्राब्लम हो तो बता देना...!"

"अपना... अपना नंबर. दे दो ना... मैं फोन करूँगी...!" पिंकी अब भी चेहरा झुकाए बोल रही थी.. नज़रें मिलना उसको दुश्वार लग रहा था...

"नंबर...?... अच्च्छा लिख लो... फोन तो करोगी ना...?" हॅरी मुस्कुरकर बोला....

"हां... एक दीदी के पास मोबाइल है.. उस'से मिस कॉल करूँ तो तुम कर लेना...!" पिंकी ने हॅरी से पेन लेते हुए अपने हाथ पर नंबर. लिख लिया....

"तुम उसका ही नंबर. दे दो.. मैं खुद कर लूँगा...."

"मेरे पास नंबर. नही है उसका... मैं शाम को फोन करूँगी...!"

"ठीक है.. अब मैं चलूं...?" हॅरी ने वापस जाकर अपना बॅग उठाया....

पिंकी ने सकुचते हुए हॅरी को देखा और फिर अपनी गर्दन हिला दी... हॅरी के जाने के बाद भी काफ़ी देर तक वह गुमसूँ सी उस जगह को देखती रही जहाँ वो कुच्छ देर पहले अपने 'यार' की बाहों में थी....

"अयाया!" पिंकी ने काफ़ी देर बाद एक लंबी साँस ली और ग्वेस्टर्म से निकल गयी....

***********************************************************

"ययए किसलिए आया था...? क्या बात हुई?" अंजलि उसका चेहरा पढ़ने की कोशिश करती हुई बोली....

"ये.. बड़ी मॅ'म को जानता है... उसी के पास आया था...!" पिंकी की आँखें चमक उठी...

"तुझसे क्या कह रहा था... क्या बात हुई..? तुमने दरवाजा क्यूँ बंद किया था एक बार...?" अंजलि अधीर हो रही थी.. कुच्छ मसालेदार सुन'ने को...

"कुच्छ नही.. उसने ही किया था जान बूझ कर.. 'क़िस्सी' माँग रहा था..."

"फिर.. तूने दी या नही..."

"ले ली उसने... मैं तो मना कर रही थी.. वो माना ही नही..." पिंकी शर्मा गयी...

"कहाँ पर?" अंजलि खुश होकर हंस दी...

"आए... तुम पिंकी हो ना?" दरवाजे से अचानक अंदर आई सीमा कुच्छ हड़बड़ी में लग रही थी....

"आ...हां दीदी!" पिंकी अचानक संभलते हुए बोली....

"तुमने पहले क्यूँ नही बताया यार...!" सीमा उसके पास आकर उसकी कमर पर हाथ रख कर बैठ गयी....

"बताया तो था दीदी.. पर क्यूँ पूच्छ रही हो?" पिंकी ने अचकचा कर पूचछा...

"तुम तो मेडम की ख़ासमखास लगती हो यार... मेडम ने तुम्हारा खास ध्यान रखने को बोला है....!"

"अच्च्छा... ववो.. हॅरी ने बोला होगा...!" पिंकी खुशी से झूम उठी...

"नही.. हॅरी कौन? मुझे तो मेडम ने बुलाकर बोला है!" सीमा सफाई देती हुई बोली....

"आपको नही दीदी.. हॅरी ने बड़ी मॅ'म को बोला होगा.. मेरा ध्यान रखने को...!"

"हूंम्म.. अब मुझे आरती को वापस बुलाना पड़ेगा... तुम दोनो अड्जस्ट कर लॉगी ना उसके साथ...?" सीमा ने दोनो की ओर बारी बारी से देखते हुए सवाल किया...

"हाँ.. पर उसको क्यूँ बुला रही हो.. '13' नंबर. वालियों ने टिकने नही दिया क्या उसको..!" अंजलि ने सवाल किया....

"अरे 13 नंबर. वालियों की.... मुझे अपने लिए भी तो चाहिए ना काम करवाने के लिए... तुम दोनो को तो कह नही सकती...!" सीमा मुस्कुरकर बोली और फिर अंजलि का हाथ पकड़ लिया..,"आज चलना है क्या..?"

"कहाँ?" अंजलि ने पूचछा तो पिंकी भी गौर से सीमा की ओर देखने लगी....

"वहीं यार... बोला था ना कल...!"

"पर कल तो चाचा जी आने वाले हैं..... आज कैसे?"

"कहाँ जा रहे हो.. मुझे भी तो बताओ ना...?" पिंकी ने उत्सुक होकर पूचछा...

"अरे सुबह तक वापस आ जाएँगे.. चिंता मत कर तू... आज खास प्रोग्राम है... चलना है तो बोल.... एक और लड़की चल रही है...?!" सीमा पिंकी के सवाल को नज़रअंदाज करते हुए बोली....

"मैं आपको थोड़ी देर मैं बता दूँगी दीदी...!" अंजलि असमन्झस में पड़ गयी थी...

"ठीक है... सोच कर बता देना... पर ऐसा मौका फिर नही आएगा..." सीमा ने कहा और अपने बालों को झटकती हुई कमरे से बाहर चली गयी....

"कहाँ जा रही है..? मुझे भी तो बता ना?" पिंकी जान'ने को व्याकुल हो उठी....

"किसी को बताएगी नही ना तू?" अंजलि ने पूचछा....

"आज तक बताई है कोई बात?" पिंकी ने अंजलि को घूरा....

"नही पर.... 'वो' ये मुझे हॉस्टिल से बाहर घुमा कर लाने की बोल रही है... रात को...!" अंजलि ने बता ही दिया....

"तू पागल हो गयी है क्या? रात को हॉस्टिल से बाहर... वो भी 'ऐसी लड़की के साथ... क्या पता कहाँ फँसा देगी तुझको...!" पिंकी ने गुस्से से अंजू को लताड़ सी लगाई....

"ऐसा कुच्छ नही होगा... रात रात की तो बात है.. सुबह तक वापस आ जाउन्गि मैं...!" अंजलि ने समझाने की कोशिश की....

"पर क्यूँ जा रहे हो... ये तो बताओ.. मैं भी चालूंगी...!"

"तू नही पागल... ना!"

"क्यूँ? तुम जा रही हो तो मैं क्यूँ नही.. मैं भी चालूंगी तेरे साथ...!"

"समझा कर यार... आज मैं जाकर देख लेती हूँ... फिर कभी चल पड़ना...." अंजलि ने समझाने की कोशिश की....

"पर.. जा क्यूँ रही है तू...?"

"ववो.. वो घूम फिर कर आ जाएँगे बस... और कुच्छ नही...!" अंजलि ने सकपकाकर बात बनाई....

"नही.. मैं तुझे अकेले नही जाने दूँगी....!" पिंकी आड़ गयी..,"तू जाएगी तो मैं भी जाउन्गि.... बस!"

"वो तू सीमा से पूचछा... लेकर तो उसको ही जाना है ना?" अंजलि झल्ला उठी....

**********************************************************

"दीदी... मैं भी चलूं क्या...? तुम लोगों के साथ घूमने...." सीमा के आते ही पिंकी ने सवाल किया....

सीमा कुच्छ देर पिंकी की ओर देखते हुए कुच्छ सोचती रही और फिर 'ना' में गर्दन हिला दी....,"ना! तुझे नही जाना...!"

"पर क्यूँ दीदी? अंजलि भी तो जा रही है...." पिंकी बिगड़ कर बोली....

"तुझे नही जाना.. कह दिया ना... बाद में देखूँगी कभी....!" सीमा ने दो टुक जवाब दे दिया....

"ववो.. एक फोन करना है दीदी... कर लूं क्या?" पिंकी ने हताश होकर अपनी बात बदल दी....

"ले मार ले...बाहर जाकर बात कर ले... किसी को बोल मत देना ये बात.. सीक्रेट है.... समझ गयी?" सीमा ने कहकर उसकी तरफ मोबाइल उच्छाल दिया... पिंकी फोन लेकर बाहर निकल गयी....

"तूने इसको क्यूँ बताया यार...!" सीमा पिंकी के जाते ही अंजलि पर गुस्सा करती हुई बोली.....

"ये किसी को कुच्छ नही बताएगी दीदी.. इसके पास पहले के भी मेरे कयि राज हैं.. आप चिंता मत करो... और फिर इसको तो बताना ही पड़ता ना... इसको तो पता लगना ही था....!" अंजलि ने जवाब दिया.....

"ऐसे कैसे पता लगता.. मैं इसको कोई बहाना करके रात को दूसरे कमरे में सुला देती... उसके बाद हमें निकलना था... आइन्दा किसी को भी ऐसे मत बताना...!" सीमा तुनक कर बोली...

"ठीक है दीदी.. आगे से मैं ध्यान रखूँगी...." अंजलि ने कहा और फिर पूचछा....,"कितने बजे जाना है...?"

"10 बजे के बाद!" सीमा ने टका सा जवाब दिया.....

***************************************

"मत लेकर जाओ मुझे.... मैने हॅरी को बोल दिया... कल 'वो' मुझे लेकर जाएगा...!" अकेली होते ही पिंकी ने अंजू पर ताना सा मारा....

"क्या? तू रात को उसके साथ जाएगी..." अंजलि उच्छल सी पड़ी...,"पर वो कैसे लेकर जाएगा तुझे...?"

"मुझे नही पता.... मैने आज रात के लिए बोला था.. उसने कल का वादा किया है.. आज वो फ्री नही है...!"

"पर हॉस्टिल से कैसे लेकर जाएगा तुझे?"

"क्यूँ.. जब सीमा लेकर जा सकती है तो 'वो' क्यूँ नही... वो' बड़ी मॅ'म को जानता है.. उसको बोल कर ले जाएगा....!"

"और.... और 'वो' तुझसे 'प्यार' करने लगा तो?" अंजलि ने कहकर बत्तीसी निकाल दी....

"ऐसे कैसे कर लेगा 'प्यार'... शादी से पहले मैं ऐसा वैसा कुच्छ नही करने वाली...!" पिंकी ने कहा और शर्मा गयी....

"तो तू उस'से शादी करेगी?"

"और नही तो क्या?.. मीनू लंबू से करेगी तो उसको मेरी भी सेट्टिंग करवानी पड़ेगी...!" पिंकी ने तुरुप का पत्ता फैंका....

*********************************

रात करीब 10 बजे जैसे ही सीमा अंजलि और श्वेता को लेकर खेल के मैदान वाले पिच्छले गेट पर पहुँची.. गेट्कीपर ने बिना कुच्छ बोले चुपके से दरवाजा खोल दिया... बाहर थोड़ी ही दूर एक गाड़ी पहले ही उनके इंतजार में खड़ी थी...

"हाई जानेमन!" सीमा के अगली सीट पर बैठते ही ड्राइवर ने कहा तो सीमा ने उसकी तरफ झुक कर उसके होंटो को चूम लिया...,"चलो जल्दी... सुबह तक वापस भी आना है"

क्रमशः......................
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10-22-2018, 11:37 AM,
#58
RE: Desi Sex Kahani बाली उमर की प्यास
बाली उमर की प्यास पार्ट--43

कामुककहानियाँब्लॉगस्पॉटडॉटकॉम
गतान्क से आगे..................

काफ़ी देर बाद जब गाड़ी शहर से भी गुजर गयी तो अंजलि से रहा ना गया," हम जा कहाँ रहे हैं दीदी...?"

"क्यूँ चिंता करते हो यार... आज की रात तुम दोनो कभी भूल नही पाओगेई... सारी रात मस्ती होगी.. देखना" सीमा ने मुड़कर पिछे देखते हुए कहा...,"एक बात तो बता... जब तू संदीप से चुद रही थी तो सुन्दर से क्या दिक्कत थी तुझे.. उसका भी ले लेती...!"

एक अंजान लड़के के सामने सीमा के मुँह से ऐसी बात सुनकर अंजलि सकपका गयी.. काफ़ी देर तक तो उस'से कुच्छ बोला ही नही गया...जब सीमा ने उसको एक बार फिर टोका तो वह हड़बड़ा कर बोली," ये क्या बात कर रही हो दीदी...?"

"अरे इस'से मत शर्मा... मस्त लड़का है ये.. कभी इसके नीचे आकर देखना... "सीमा अभी कुच्छ बोल ही रही थी कि लड़के ने उसको टोक दिया..,"एक बार फोन कर ले.... अभी अंदर जाना है कि नही... पहुँच तो गये.."

"ओह्ह... मोबाइल रह गया यार... अपना फोन निकाल कर दे एक बार.. ज्योति को बोल देती हूँ.. च्छूपा कर रख देगी...! सीमा ने अपनी जेबों में हाथ मारते हुए कहा और लड़के का फोन लेकर अपने मोबाइल पर फोन करके ज्योति को समझा दिया....

"आ गये हम... आ जाएँ क्या?" ज्योति को फोन करने के बाद सीमा ने दूसरा नंबर. मिला कर पूचछा....

"हां... मकान के सामने सड़क पर ही खड़े हैं...!" सीमा ने सामने वाले की बात का जवाब दिया.....

"2....... देख कर पागल हो जाएगा तू........ ओके.. हम आ रहे हैं...!" सीमा ने फोन पर कहा और फिर उसको वापस करती हुई बोली..,"चल.. सब ठीक है....!"

********************************************

सीमा ने मकान के बाहर से ही उस लड़के को वापस भेज दिया और दोनो को लेकर मकान में घुस गयी... अंजलि का दिल अब घबरा रहा था... हॉस्टिल से निकलते हुए जहाँ उसके रोमांच की कोई सीमा नही थी.. वहीं अब सीमा और उस लड़के की अजीब और निचले दर्जे की बातें सुन सुन कर उसके कान खड़े हो गये थे.... उसको लग रहा था कि उसने आकर ठीक नही किया...,"यहाँ तो कोई नही लग रहा दीदी... आप तो कह रहे थे कोई प्रोग्राम है...

"पूरी बारात से चुदेगि क्या तू? अंदर तो चल एकबार...!" सीमा ने बत्तीसी निकाल कर कहा....

"हाई सीमा... ये....नयी लड़कियाँ हैं क्या?"...अंदर घुसते ही उनको एक लड़की सिगरेट सुलगए हुए उनका इंतजार करती हुई मिली...

"हां.. एक दम फर्मफ़रेश!" सीमा कहकर अंजलि के गालों पर हाथ फेरती हुई हँसी और फिर शांत होकर पूचछा..,"बॉस कहाँ हैं..?"

"ऑफीस में ही बैठे हैं... तुम लेकर चलो इनको... मैं भी आती हूँ..." लड़की ने कहा और वहाँ से चली गयी....

"यहाँ.. यहाँ कुच्छ ग़लत तो नही होगा ना दीदी...!" श्वेता ने सवाल किया...

" कहा ना फिकर मत करो... ये हॉस्टिल नही; मस्ती का अड्डा है....आओ मेरे साथ...!" सीमा ने सहमी हुई श्वेता का हाथ पकड़ा और अंजलि को साथ आने का इशारा करके उपर चढ़ने लगी.....

सीमा उन दोनो को लेकर दूधिया प्रकाश में नहा रहे एक बड़े से कमरे में लेकर चली गयी... कमरे का फर्निचर आलीशान था... बीचों बीच लगे बिस्तर के पास ही चार गद्दे वाली कुर्सियाँ और उनके बीच एक टेबल रखी थी....

सीमा जाते ही अपनी शर्ट के बटन खोल कर कुर्सी पर पसर गयी..और ..,"आओ बैठो... शुरू करते हैं...मस्ती.." सीमा ने कहा और कहते ही टेबल पर रखी बोतल का ढक्कन खोलने लगी....

"ययए क्या है दीदी...शराब है क्या?" श्वेता ने घबराई आँखों से सीमा की ओर देखा....

"अरे... इसी के बाद तो प्रोग्राम शुरू होगा.. इसके बिना क्या मज़ा...." सीमा ने हंसते हुए कहा और चार में से तीन गिलास सीधे कर लिए....

"वापस चलो ना दीदी... हमें यहाँ अच्च्छा नही लग रहा सच में... आप तो अपने दोस्तों से मिलने लाई थी ना...?" अंजलि ने शंका से सीमा को घूरा....

"डॉन'ट वरी यार... सब आ जाएँगे धीरे धीरे... लो.. एक एक मारो तब तक..." सीमा ने गिलास उनकी ओर सरका दिए....

"नही दीदी.. ये सब तो आदमी पीते हैं... मैं नही पियूंगी..." गिलास अपनी तरफ बढ़ता देख श्वेता अचकचा सी गयी....

"क्यूँ...? आदमियों की गांद में क्या ज़्यादा दम होता है... ये देख मैं पी गयी.. चल उठा और सटाक जा इसको...!" सीमा ने आदेशात्मक लहजे में कहा....

"नही दीदी.. मुझसे नही पी जाएगी... आप जल्दी वापस चलो हॉस्टिल में...." अंजलि के मंन की बात श्वेता ने ही कह दी.....

"कल वाली बात भूल गयी क्या? मुझसे दोस्ती तोड़ रही है तू... तुझे पता नही कि मैं और क्या क्या कर सकती हूँ..... चल पी इसको...
"तू पी तो एक बार.. उल्टी होगी तो मैं देख लूँगी.... चल उठा और दवाई समझ कर पी जा... अंजलि... गिलास उठा ना यार.. ये क्या है?"

अंजलि कुच्छ देर हैरत से सीमा को देखती रही.. फिर अचानक खड़ी हो गयी...,"चलो दीदी यहाँ से अभी के अभी.. हमें नही करना कुच्छ भी यहाँ...!"

"अच्च्छा! तू तो बहुत बोलने लगी यार... नीचे बैठ जा... मुझे मजबूर मत कर वरना यहाँ तुम्हारा गॅंग रेप हो जाएगा... चार चार लोग जब एक साथ चोद्ते हैं तो जान भी निकल सकती है...समझी...,"सीमा आँखें तरेरने लगी थी अब," पिच्छले साल एक लड़की ने हॉस्टिल से आकर ऐसे ही ड्रामा किया था यहाँ... साली की लाश भी नही मिली आज तक... पोलीस आज तक यही समझ रही है कि वो अपने यार के साथ भाग गयी कहीं... भलाई इसी में है की गिलास उठाओ और मस्ती करो जमकर...! आज की रात नैतिकता भूल जाओ"

सीमा के धमकी देने मात्र से ही अंजलि और श्वेता दोनो थर थर काँपने लगी थी..,"प्लीज़ दीदी.. ऐसा कुच्छ मत करवाना.. मैं मर जाउन्गि...!" श्वेता ने तो हाथ जोड़ लिए....

"मैं क्या बोल रही हूँ.. गिलास उठाओ मस्ती करो... चलो.. अब पी भी लो यार.. मेरा दूसरा भी हो गया...." सीमा ने कुत्सित सी हँसी हंसते हुए दोनो को देखा तो कोई भी कुच्छ बोल ना सकी... दोनो ने खड़े खड़े ही अपने गिलास उठाए और नाक सिकोड कर एक ही साँस में दोनो ने गिलास खाली कर दिए...

"शाबाश.. बैठ जाओ... मैं फोर्स नही करना चाहती यार... फोर्स करने से मज़ा खराब हो जाता है... आओ बैठो... एंजाय करो...!" सीमा ने हंसकर कहा और अगले पैग तैयार करने लगी....

"पर दीदी... हॉस्टिल में कब चलेंगे वापस...?" अंजलि ने डरते डरते पूचछा....

"अभी पूरी रात बाकी है यार... क्यूँ फिकर करती हो.. मैं हूँ ना साथ में... लो.. ये खाओ.. जी ठीक हो जाएगा...." सीमा ने प्लेट उनकी और सरका दी.....

************

"बस दीदी जी.. प्लीज़... 2 बार पी ली मैने.. और ले ली तो सच में ही मर जाउन्गि.... प्लीज़..." श्वेता की आँखों से आँसू निकल आए...

"ओके... अब तुम्हारी मर्ज़ी... मैं तो पियूंगी जी भर कर... तब तक तुम कपड़े निकाल कर फैंक दो अपने....!" सीमा ने मस्ती में अपनी कमीज़ उतारी और ब्रा के हुक खोलने लगी....

सीमा की हालत देखकर दोनो विचलित सी होती जा रही थी..,"पर.. दीदी.. आपने तो कहा था कि..."

"सब आ जाएँगे यार... बस आने ही वाले हैं.. तुम कपड़े तो निकालो अपने.. बार बार बोलनी पड़ती है तुमको बात... सुनता नही है क्या?"

सीमा की इस आवाज़ के बाद दोनो में इतना साहस नही था कि 'वो' कुच्छ और बोल पाती... दोनो खड़ी हुई और झिझकते हुए एक दूसरी से मुँह फेर कर अपने कपड़ों को बदन से अलग करने लगी..... कुच्छ ही देर बाद दोनो निर्वस्त्र कुर्सी पर बैठकर सहमी हुई एक दूसरी को देख रही थी...

तभी वही लड़की कमरे में घुसी और सीमा के कान के पास मुँह लाकर कुच्छ बोला... मोरनी जैसे कान रखने वाली अंजलि भी बात का पूरा मतलब नही समझ पाई.. पर बोलते हुए लड़की ने उसी की ओर इशारा किया था....

"कल तक कैसे रुकेंगे यार यहाँ... किसी और दिन का प्रोग्राम रख लो.....!" सीमा ने लड़की की तरफ देखते हुए कहा....

"पर बॉस ने बोला है... तुम बात कर लो...!" लड़की ने कहा....

"ठीक है.. तौलिया देना लाकर...!" सीमा उठ खड़ी हुई...

लड़की बाथरूम से तौलिया निकाल कर लाई और सीमा ने उस'से लेकर अपने कंधों पर डाल लिया...."तुम यहीं रहना तब तक....!"

"मनीषा आई हुई है.... उसको भेज देना.. मुझे अभी कुच्छ काम है....!" लड़की ने कहा और कुर्सी पर बैठ कर लज्जा से सकूचाई और भय के मारे काँप सी रही लड़कियों को घूर्ने लगी.....

इधर आ एक बार...!" सीमा अचानक ठिठक कर दरवाजे पर रुकी और इशारे से उस लड़की को बाहर अपने पास बुलाया....

"हां..?" लड़की ने बाहर आकर सीमा से पूचछा....

"डॉली..! तेरा दिमाग़ खराब है क्या? इनके सामने मनीषा का नाम क्यूँ लिया?" सीमा गुस्से से उस लड़की को झिदक्ति हुई बोली...

"पर हुआ क्या, ये तो बता..." डॉली बात को समझ नही पाई थी..

"ये अंजलि है ना..." सीमा ने बाहर से ही अंजलि की ओर उंगली से इशारा किया..," मनीषा के गाँव की ही है... वो इसके सामने कैसे आएगी......?"

"ओह.. पर मुझे पता नही था यार... कोई बात नही.. पूछेगि तो मैं बोल दूँगी की मैं किसी और मनीषा की बात कर रही थी...." लड़की ने जवाब दिया....

"कोई ज़रूरत नही है... मैं मनीषा से पूच्छ लेती हूँ.. अगर उसको कोई दिक्कत होगी तो मैं किसी और लड़की को मनीषा बनाकर भेजती हूँ.....कहाँ है वो?" सीमा ने डॉली से पूचछा....

"चल ठीक है... जल्दी भेजना... वो नीचे 4 नो. में बैठी है शायद" डॉली ने कहा और वापस पलट गयी....

*****************************************************

"कोई दिक्कत है क्या?" लड़की ने मुस्कुरकर अंजलि और श्वेता के सामने बैठते हुए पूचछा....

"ववो.. हम कपड़े पहन लें क्या?" अंजू ने थोड़ा झिझकते हुए पूचछा....

"क्यूँ? शर्म आ रही है क्या?" लड़की ने कहा और खिलखिला कर हंस पड़ी... अंजू और श्वेता ने प्रतट्युत्तर में अपनी पलकें झुका ली....

"यार.. ऐश ही तो करने आई हो... आज की रात सब कुच्छ भूल कर एंजाय करो...यूँ घुट कर बैठने से क्या होगा... ये सब तुम्हे रोज रोज नही मिलेगा....बाकी तुम्हारी मर्ज़ी...!" डॉली का इतना कहना था कि दोनो ने उठकर फटाफट वापस अपने कपड़े डालने शुरू कर दिए....

डॉली कुच्छ देर उनको आस्चर्य से देखती रही... अचानक उसने अपना मोबाइल निकाला और एक नंबर. लगा लिया....

"हां.. बोल डॉली!" उधर से आवाज़ आई....

"बॉस.. ये लड़कियाँ तो मेरे सामने ही शर्मा रही हैं... बाकी सब कैसे करेंगी... सीमा ने अच्छे से ट्रेंड नही किया लगता है इनको...!"

"चल मैं बात करता हूँ...! सीमा को भेज मेरे पास!" बॉस ने कहा और लड़की के जवाब देने से पहले ही फोन काट दिया...

***********************

"मनीषा... तू तो पूरे एक साल बाद आई है... आज कैसे?" सीमा सीधी मनीषा के पास जाकर मुस्कुराते हुए बोली....

"बस ऐसे ही... कुच्छ काम था...!" मनीषा ने उसको टाल सा दिया....

"ववो.. तेरे गाँव की एक लड़की आई हुई है.... उपर मत जाना तू!" सीमा ने मनीषा को सचेत किया....

"मेरे गाँव की?" मनीषा थोड़े अचरज से सीमा की आँखों में झाँकते हुए बोली..,"कौन?"

"अंजलि..!"

"क्ककयाअ? अंजू?... वो यहाँ कैसे आई...?" मनीषा अचानक उच्छल सी पड़ी....

"मेरा केस है... क्यूँ? तेरी कुच्छ लगती है क्या?" मनीषा के चेहरे पर अचानक उभरे भावों ने सीमा को विचलित सा कर दिया था.....

"क्कहाँ है वो?" मनीषा का चेहरा लाल होने लगा था....

"यार परेशान मत हो.. उसको तेरे बारे में कुच्छ पता नही लगेगा.... मैं सब संभाल......" सीमा की बात अधूरी ही रह गयी.... मनीषा ने गुस्से से तमतमते हुए दोनो हाथों में उसका गला दबोच लिया..,"जान से मार दूँगी तुझे... है कहाँ 'वो' जल्दी बता..."

"छ्चोड़ यार.. सच में मार देगी क्या? उपर है.. स्टूडियो वाले कमरे में...!" सीमा ने बड़ी मुश्किल से अपना पीछा छुड़ाया.. मनीषा उसको छ्चोड़ते ही कमरे से बाहर भागी....

***************************

"म्म्मMअनिशाआ तूमम?" मनीषा को अपने सामने खड़ी देख अंजलि बुरी तरह से सकपका गयी.. इस'से पहले कि वो कुर्सी से उठकर कुच्छ और बोल पाती.. एक झन्नाटे दार थप्पड़ ने उसके गालों पर अपनी उंगलियों की छाप छ्चोड़ दी....

"तुझे मैने मना किया था ना.... ऐसे चक्करों से दूर रहने को बोला था ना.. ?क्यूँ आई है यहाँ...?" इसके साथ ही मनीषा ने एक और तमाचे के साथ उसका दूसरा गाल भी लाल कर दिया...

"म्‍म्माइन.. मुझे तो सीमा यहाँ....!" अंजलि को ठप्पाड़ों से ज़्यादा चुभन मनीषा की अंगारे उगलती आँखों की हो रही थी... मनीषा बोलने लगी तो वह बीच में ही रुक गयी....

**************
"आ जाउ सर..?" सीमा ने दरवाजे पर खड़े हो कर पूचछा....

"एक मिनिट...!" बॉस ने कहकर फोन लगाया...," प्रेम! अजय को लेकर उपर चले जाओ.. मनीषा के तेवर ठीक नही लग रहे... देखना कोई गड़बड़ नही होनी चाहिए......"

"हां.. आ जाओ!" बॉस ने सीमा को अंदर बुलाया.. सीमा के कमरे में आने के बाद भी वह 'बॉस' को देख नही पा रही थी... उन्न दोनो के बीच अंधेरे की एक काली चादर पसरी हुई थी.....

"वो.. डॉली कह रही है कि लड़कियाँ झिझक रही हैं... क्या बात है...?" बॉस ने सीमा के आते ही सवाल किया....

"ववो... क्या है सर.. की दोनो लड़कियाँ नयी हैं.. कल ही हॉस्टिल में आई थी.... थोड़ा टाइम तो लगेगा ना....!" सीमा ने जवाब दिया....

"इनको अच्छे से गरम करके लाना था ना यार... खैर.. कैसे भी इनके कपड़े निकलवा कर कुच्छ शॉट्स ले लो... उसके बाद कहीं नही जाएँगी ये..."

"वो तो मैने निकलवा दिए थे.. 2-2 पैग भी पीला दिए... पर सुनील नही आया है अभी तक... मैं उसी का वेट कर रही हूँ.... ववो मनीषा को पता नही क्या प्राब्लम हो गयी अचानक.. अंजलि का नाम सुनते ही भड़क गयी..." सीमा ने कहा....

"हां... वो तो मैं देख ही रहा हूँ...? उसको अंजलि के पास भेजा किसने?!" बॉस ने सिगरेट सुलगाते हुए पूचछा....

"म्‍मैइन उसको मना करने ही गयी थी... पर वो तो अपने आप ही उपर भाग गयी... उसकी कुच्छ लगती तो नही है ना ये?" सीमा ने जवाब देकर पूचछा....

बॉस ने सीमा की बात टाल दी....,"तुम कल अंजलि को लेकर रेस्ट हाउस पहुँच जाओ...एक मिनिस्टर का ऑर्डर है.. कल रात का...! उसको कोई ऐसी ही पटाखा लड़की चाहिए... 50000 आज ही तुम्हे दे देता हूँ.. बाकी बाद में कर लेंगे...!"

"पर सर...... मुझे नही लगता कि आज बिना कुच्छ किए 'वो' वापस आने को राज़ी होगी... कपड़े उतारने में ही इतना टाइम लगा दिया.....

**********************************

"पर दीदी...आप यहाँ कैसे आई...?" अंजलि सहमी हुई सी मनीषा के सामने खड़ी अपने गालों को सहला रही थी.....

"वो सब बाद में बताउन्गि.... चलो मेरे साथ....!" मनीषा ने हड़बड़ी में अंजलि का हाथ पकड़ लिया.....

"कहाँ लेकर जा रही हो...? बॉस से पूच्छने दो मुझे..." डॉली ने खड़ी होकर जैसे ही अपना मोबाइल निकाला; मनीषा ने झपट लिया...," साली को कच्चा चबा जाउन्गा यहीं... चुप चाप पड़ी रह... चल अंजू...!" मनीषा अंजू का हाथ पकड़ कर पलटी ही थी कि दरवाजे पर 2 युवकों को देख कर वा ठिठक गयी...," मेरे रास्ते से हट जाओ प्रेम... ये मेरी..... ये मेरी बेहन है...!"

"ठीक है ठीक है... बॉस से तो पूच्छ लो... चलो पिछे....!" हत्ते कत्ते प्रेम ने गुर्राकार रेवोल्वेर तान दी तो मजबूरन मनीषा को अपने पैर वापस खींचने पड़े........

" बॉस! मनीषा एक लड़की को वापस लेकर जा रही है... !" प्रेम ने रेवोल्वेर मनीषा पर ताने हुए ही दरवाजे पर खड़े खड़े फोन किया....

"मनीषा को बाहर निकाल दो और दोनो के कपड़े निकलवाओ.. सुनील आ गया है.. उसको मैं उपर भेज रहा हूँ...! उसके बाद डॉली को बाहर भेज कर रूम लॉक करवा लेना...." बॉस ने आदेशात्मक लहजे में कहा...

"जी बॉस!" प्रेम ने कहकर फोन काटा और मनीषा की ओर घूरता हुआ बोला,"बॉस ने बोला है कि मनीषा कुच्छ पंगा करे तो गोली मार देना... तुम हमसे सीनियर हो.. सारी बातें अच्छे से समझती हो... चुपचाप बाहर चली जाओ.. वरना मुझे मजबूरन...."

बेबस सी खड़ी मनीषा प्रेम का इशारा समझकर बाहर निकल गयी......

"चलो... नंगी हो जाओ 2 मिनिट में... वरना..... चलो तुम भी...!" प्रेम ने एक एक करके अंजलि और श्वेता को घूरा... डॉली लड़कों के पास आकर खड़ी हो गयी थी....

घिघियाई हुई अंजलि ने श्वेता की तरफ देखते हुए अपने कमीज़ का पल्लू पकड़ लिया... श्वेता फफक फफक कर रोने ही लगी थी...

"चलो जल्दी करो!" प्रेम एक बार फिर गुर्राया....

"ज्जई..." श्वेता सिसकती हुई बुदबुदाई और अंजलि के शुरू करने के साथ ही उसने भी खुद को निर्वस्त्र करना शुरू कर दिया....

अचानक सुनील ने कमरे में प्रवेश किया...,"ये.. हाथ में रेवोल्वेर क्यूँ पकड़ रखी है भाई... रेप सीन की शूटिंग तो कल परसों होनी है ना?"

"डॉली! बाहर जा कर दरवाजा लॉक कर दे....! मैं फोन करूँ तो खोल देना...!" प्रेम ने मुस्कुरकर सुनील का स्वागत करने के बाद डॉली को बाहर जाने का इशारा किया....,"अगर ये प्यार से नही मानती तो रेप सीन आज ही शूट कर लेना... हे हे हे..."

"क्या माल है यार..." सुनील अपनी लपलपाति जीभ को होंटो पर फेरता हुआ अंजलि को घूरकर बोला.... अंजलि के हाथों में छुपे उन्मुक्त मस्त नंगे उभारों को देख कर वहाँ खड़े तीनो लोगों के मुँह में पानी आ रहा था... तब तक श्वेता भी उपर से नंगी हो चुकी थी...

"इसके साथ रेप मत करो यार... ये तो 'प्याआर' करने की चीज़ है स्साली...!" सुनील ने आगे जाकर अंजलि के नितंबों को सलवार के उपर से ही मसलता हुआ उसके उभारों को अपनी छाती पर रगड़ने लगा...,"बोल... प्यार से कर लेगी ना?"

अंजलि बिना कुच्छ बोले सकुचती हुई पिछे हटने की कोशिश करने लगी... तभी प्रेम का फोन बज उठा....

"जी बॉस!"

"अंजलि के साथ कुच्छ मत करना... उसको 'कल' के लिए बचाकर रखना है... जहाँ तक हो सके दूसरी लड़की को भी 'प्यार' से डील करने की कोशिश करो....उसको नंगी करके बिस्तर पर ले आओ!"

"जी बॉस... और कुच्छ?" प्रेम ने पूचछा....

"बस.. कुच्छ होगा तो मैं फोन कर दूँगा.... याद रखना अंजलि खुद भी कहे तो कुच्छ नही करना है... समझ गये ना...!"

"जी बॉस.. हम ध्यान रखेंगे...." कहकर प्रेम ने फोन जेब में डाला..," पीछे आजा सुनील.. अपना काम संभाल ले..... तुम में से अंजलि कौन है?"

"ज्जई... मैं..!" अंजलि को उम्मीद की हल्की सी किरण दिखाई दी....

"हुम्म... तुम्हारा नाम क्या है...?" प्रेम ने श्वेता की तरफ आँख मारते हुए पूचछा....

"ज्जई.. श्वेता...!"

"वेरी गुड! अजय!" प्रेम ने पास खड़े दूसरे लड़के को टोका...

"हां भाई...!"

"श्वेता तेरी है... अंजलि मेरी! हे हे हे"

"कोई बात नही भाई... ये भी कम नही है....!" अजय बत्तीसी निकाल कर बोला और आगे जाकर श्वेता को अपनी बाहों में उठा लिया.....

क्रमशः................ 

गतान्क से आगे..................
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Reply
10-22-2018, 11:37 AM,
#59
RE: Desi Sex Kahani बाली उमर की प्यास
बाली उमर की प्यास पार्ट--44



गतान्क से आगे..................

आधी नंगी श्वेता अजय की बाहों में आते ही आँख बंद करके सिसक उठी.... उसके मदमस्त गेनहूए रंग के करारे 'सेब' अजय की नज़रों के सामने थिरक से रहे थे... श्वेता अपने नितंबों और नंगी कमर पर पहली बार जवान हाथों की चुभन महसूस करके बावली हुई जा रही थी... सिर्फ़ एक बात थी जो अब तक उसकी समझ में नही आई थी... मनीषा ने अंजू को थप्पड़ मार कर लताड़ क्यूँ लगाई और उस आदमी ने मनीषा को रेवोल्वेर के दम पर बाहर क्यूँ भेजा... यही कारण था कि मस्ती में रंगी होने के बावजूद वह भय के मारे काँप भी रही थी....

"ट्तूम.. अब क्या करोगे?" कांपति आवाज़ में श्वेता ने धड़क'ते दिल से सवाल किया....

"जो तुम करने आई हो जान... और क्या?" अजय ने ले जाकर श्वेता को बिस्तर पर पटक दिया और उसके साथ लेटकर उसकी चूचियो से खेलने लगा...,"करोगी ना?"

"आहाआँ...." अपनी चूचियो की घुंडीयों को कसकर भींचे जाने से श्वेता सिसक उठी और अजय का हाथ हटाकर उन्हे अपने हाथों में छुपा लिया...,"पर 'वो' लड़की अंजलि को डाँट क्यूँ रही थी... यहाँ कुच्छ ग़लत तो नही होगा ना...?"

"छ्चोड़ो ना यार... वो खुद तो इतने मज़े करती है यहाँ आकर... दरअसल 'ये' उसकी बेहन है... उसको तो बुरा लगेगा ही ना... तुम ही बताओ.. तुम्हारी कोई बेहन तुम्हे यहाँ देख लेती तो गुस्सा करती की नही...!" कहते हुए अजय ने उसका नाडा खींच लिया.....

"हां...!पर इनको तो बाहर भेज दो..." श्वेता ने अपनी सलवार पकड़ ली....

"चिंता मत करो.. अभी भाई ने क्या बोला है.. तुम मेरी हो... और कोई तुम्हे कुच्छ नही कहेगा.. ये बस यहाँ मज़ा लेने के लिए खड़े हैं..." अजय ने आसवशण देते हुए जवाब दिया और एक बार फिर सलवार नीचे करने की कोशिश करने लगा.....

श्वेता को मालूम था की यहाँ ये अपनी मर्ज़ी से ही सब कुच्छ करेंगे... भलाई इसी में है की खुशी खुशी मज़े लिए जायें... जैसे ही अजय उसकी छातियो पर झुका... आँखें बंद किए हुए ही उसने उत्तेजना के मारे अजय का सिर पकड़ कर अपनी छातियो से चिपका लिया और अपने नितंबों को उपर उचका सलवार को निकल जाने दिया....

इसके साथ ही हल्क काले बालों वाली श्वेता की योनि सबके सामने बेपर्दा हो गयी... फांकों के बीच अजय की उंगली के रेंगने के साथ ही श्वेता ने कसमसा कर अपनी जांघें थोड़ी सी खोल कर उंगली का स्वागत किया...और उसकी योनि ने चिकना पानी छ्चोड़ दिया....

"पहले किया है कभी?" अजय के हल्का सा दबाव देते ही उंगली योनि में सर्ररर से घुस गयी थी...

"आहह... नही..." श्वेता ने सिर पटकते हुए अपने उपर सवार हो रहे पागलपन का सबूत दिया और झूठ बोल दिया....

"झूठ मत बोल यार... मैं तेरा आदमी थोड़े ही हूं... तेरी चूत तो कह रही है कि तूने किया है पहले भी.....!" अजय खेला खाया लड़का था....

"हहान.. किया है...एक बार... तुम बात क्यूँ कर रहे हो... 'वो' करो ना जल्दी....!" श्वेता उंगली अंदर बाहर होने से तड़प उठी थी....

"क्यूँ नही जान... अभी लो... अभी मज़ा देता हूँ तुम्हे..." अजय बिस्तर पर खड़ा होकर अपनी पॅंट उतारने लगा.... बिस्तर से थोड़ी दूरी पर कमरे में लगे पर्दे के पीछे सुनील अब कमरे को अच्छे से फोकस कर चुका था...... अंजलि असमन्झस में थी कि क्या करे और क्या नही... वह नीरस आँखों से कमरे में हो रही हर गतिविधि पर नज़रें गड़ाए देख रही थी....

बिना देर किए ही अजय पूरी तरह नगन होकर मस्ता चुकी श्वेता की जांघों के बीच बैठा और अपने लिंग को एक ही झटके में ठिकाने लगा दिया......

"अयाया!" श्वेता की योनि एक बार में ही पूरे लिंग को हजम कर गयी थी... आनंद के मारे पागल सी हो उठी श्वेता अपने नितंबों को शुरुआत से ही उच्छलने लगी....

"पूरी मस्तयि हुई लौंडिया है साली....!" अजय ने उसकी चूचियो को पकड़ कर धक्के मारते हुए मुड़कर प्रेम की ओर देखा.....

दरवाजे पर तैनात प्रेम ने अचानक अंजलि को अपने पास आने का इशारा किया....

"क्क्या?" अंजलि सरक कर उसके पास चली गयी....

"लंड चूसना आता है ना?"

"क्क्या?" अंजलि ने दोहराया.....

"अरे लंड मुँह में लिया है क्या कभी...?" प्रेम तनिक उत्तेजित स्वर में बोला तो अंजलि ने नज़रें झुका ली....

"नीचे बैठ जाओ.... यहाँ..!" प्रेम ने पॅंट की जीप खोल कर अंजलि को अपने कदमों में बैठने का इशारा किया और अपना तना हुआ लिंग बाहर निकाल लिया....

"देख क्या रही है जानेमंन... चूस इसको जी भर कर...!" अंजलि बैठ कर उसको घूर्ने लगी तो प्रेम ने आगे बढ़ कर अपना लिंग उसके होंटो से सटा दिया... अंजलि को ऐतराज भी नही था... उसने होन्ट खोले और 'गप्प' से लिंग को अपने होंटो में दबोच लिया.....

***********

जैसे ही अजय श्वेता के बदन को पूरी तरह तोड़ कर रख देने के बाद हांफता हुआ उस'से अलग हुआ.. प्रेम उसकी जगह लेने को आतुर हो उठा...."हट पिछे....!" प्रेम ने अंजलि को लगभग धकेल ही दिया... और उच्छल कर श्वेता की जांघों में जा बैठा....

"आ और नही प्लीज़....!" श्वेता गिड़गिडती हुई बोली...,"दुख रही है... तुम अंजलि के साथ कर लो.. फिर हमें जाना है...!"

"देख छ्होरी.. चोद्ते हुए मुझे टोका ताकि पसंद नही है.. अब की बार बोली तो पिछे घहुसेड दूँगा... समझी....!" प्रेम ने कहा और टूट चुकी श्वेता पर पिल पड़ा....

"भाई.. मैं इसकी ले लून तब तक....!" अजय अब पानी छ्चोड़ चुके लिंग को अंजलि से चटवा रहा था......

"उपर कुच्छ भी कर ले... नीचे हाथ नही लगाना इसको... बॉस ने मना किया है...!" प्रेम ने एक पल रुक कर कहा तो अंजलि तड़प उठी... 'आह' अपनी योनि को सलवार के उपर से ही छेड़ते हुए उसके मुँह से निकला......

********************************

श्वेता का बुरा हाल हो चुका था... बुरी तरह 'हाए हाए' कर रही श्वेता को अब सुनील उल्टी करके चोद रहा था... प्रेम और अजय अंजलि को अपने साथ खड़ा करके सुनील द्वारा तैयार की गयी मूवी दिखा दिखा कर हंस रहे थे... श्वेता और अंजलि की शकल हर दृशय में बड़ी सॉफ सॉफ नज़र आ रही थी जबकि लड़कों के चेहरों को अवाय्ड करने की कोशिश की गयी थी.... सब कुच्छ समझ जाने के बाद अंजलि की आँखों में आँसू आ गये... अब जाकर वह समझी थी कि मनीषा क्यूँ उसको वहाँ से ले जाना चाहती थी..... पर अब तो 'वो' शिकार बन चुकी थी...

श्वेता अभी भी उनकी साज़िश से अंजान बिस्तर में पड़ी सूबक रही थी...

"ट्तूम.. इसका क्या करोगे...?" अंजलि ने बेचारी शकल बनाकर पूचछा....

"क्कुच्छ नही... तुम दोबारा आने से मना ना करो.. बस इसीलिए....!" प्रेम ने हंसते हुए जवाब दिया......

****************

सीमा भी कमरे में आ चुकी थी.... सारी बात समझने के बाद अब श्वेता के चेहरे पर भी हवाइयाँ उड़ रही थी....

"अर्रे यार... प्राब्लम क्या है... जब तुम्हारा चुड़ाने का मन करे तो तुम इनको बुला लेना... और जब किसी का तुम्हे चोदने का मंन करेगा तो ये तुम्हे बुला लेंगे... सो सिंपल.. तुम इतना दर क्यूँ रही हो....?" सीमा श्वेता के कंधे पर हाथ रखती हुई बोली....

"ववो.. वो तो ठीक है दीदी जी.. पर... ये फिल्म क्यूँ बनाई...!" श्वेता ज़रा सी हमदर्दी पाकर रोने सी लगी थी.....

"अब ये नाटक मत कर यार... हॉस्टिल चलने पर सब समझा दूँगी....!" सीमा ने झल्लते हुए कहा....

"तो चलो दीदी... जल्दी चलो....!" श्वेता के लिए वहाँ एक पल भी रुकना भारी हो रहा था.....

"ववो.. क्या है कि... अभी तो गाड़ी नही है यहाँ... कल सुबह चलेंगे या कल रात को....!" सीमा ने कहा.....

ये बात सुनकर तो दोनो पर जैसे पहाड़ टूट पड़ा...,"पर कल तो मेरे घरवाले आने हैं दीदी.... आपने रात को ही वापस आने को बोला था...."

"मेरे भी..." अंजलि ने हां में हां की....

"ओहो.. जब मैं यहाँ हूँ तो तुम फिकर क्यूँ कर रहे हो.... मैं प्रिन्सिपल मेडम से कहलवा दूँगी.. बस! वो कुच्छ भी बोल देंगी....!" सीमा बोल ही रही थी कि डॉली दरवाजे पर आकर खड़ी हो गयी..,"सीमा!".. उसके साथ ही मनीषा खड़ी थी....

"हाँ... बोल.." सीमा पलट कर दरवाजे तक गयी.....

"बॉस ने बोला है कि आप सब अंजलि को छ्चोड़ कर नीचे आ जाओ... मनीषा मान गयी है... वो रात को अंजलि के साथ रहना चाहती है... इनको यहीं रहने देने को बोला है.....!"

"ठीक है..." सीमा कहकर मनीषा के पास गयी और उसके कंधे पर हाथ मारा..,"इतना सेनटी मत हुआ कर यार... कुच्छ नही होता इन्न बातों से... एंजाय ही तो करते हैं बस! जा अंदर..."

मनीषा बिना कोई जवाब दिए अंदर आ गयी... जैसे ही बाकी सब बाहर गये... डॉली ने कुण्डी लगाकर ताला लगा दिया.....

*************************

"ले लिए मज़े? कर ली अपनी भी जिंदगी बर्बाद... क्या ज़रूरत थी तुझे यहाँ आने की...!" अकेली होते ही बेबस हो चुकी मनीषा अंजलि पर बरस पड़ी....

नशे का हल्का हल्का सुरूर अंजलि पर अब भी था... कमीज़ तो उसने निकाल ही रखा था... मनीषा की नियत का अंदाज़ा लगाकर वह सलवार खोलने की तैयारी करने लगी... वह खुद भी तो तड़प रही थी बहुत...

"ये क्या कर रही है तू...?" मनीषा ने उसको सलवार का नाडा खोल कर नीचे करते देखा तो वह गुर्रकार बोली...,"कमीज़ पहन ले चुपचाप... हो तो गया सत्यानाश... अब और क्या इरादा है....!"

अंजलि से कुच्छ बोलते ना बना.... वह सिर झुका कर एक पल खड़ी हुई और अचानक हड़बड़ा कर कमीज़ ढूँढने लगी......

"ये तूने क्या किया अंजू...?" मनीषा ने पास आकर अंजलि के कंधे थाम लिए और रोने सी लगी....

"आ... आज के बाद नही आउन्गि दीदी... ग़लती हो गयी...!"

"हुंग... आज के बाद नही आएगी... तुझे पता भी है तू किन लोगों के हत्थे चढ़ गयी है... तुझे शायद पता नही कि तरुण भी इन्ही लोगों के साथ काम करता था... वही मुझे अपने प्यार के जाल में फँसा कर यहाँ लाया था और मैं उसके मरने के बाद भी इस दलदल से निकल नही पाई हूँ... कैसे निकलेगी तू...? तुझे बचाने के लिए मैने उसका खून तक कर दिया और तू फिर भी...." मनीषा की आँखों से आँसुओं की झड़ी लगी हुई थी...

तरुण का कत्ल करने की बात सुनकर अंजलि फटी आँखों से मनीषा को देखती रह गयी...... अचानक उसको मानव का ख़याल आया...,"आपके पास मोबाइल है दीदी...?"

"ये इतने पागल नही हैं... 5 साल से इनके पास आते रहने के बावजूद में लाख कोशिश करके ये जान नही पाई हूँ कि 'बॉस' कौन है...." मनीषा अपना सिर पकड़ कर बैठ गयी....

"त्तोह.. तो क्या दीदी तरुण को आपने...?" अंजलि ने उसके पास बैठते हुए पूचछा...

"हाँ... तो क्या ग़लत किया...? उसने मेरी जिंदगी बर्बाद कर दी.. तुम्हारी, मीनू और पिंकी की करने वाला था.... बता.. बता ग़लत किया क्या मैने?" मनीषा को इस रूप में अंजलि ने पहली बार ही देखा था... रोते हुए.. नारी की तरह....

"नही दीदी.. आपने सही किया... पर ये लोग कौन हैं... तरुण ने आपको कैसे फँसाया.. पूरी बात बताओ ना मुझे....!" अंजलि ने मनीषा के कंधे पर सिर रख लिया.....

बड़ी मुश्किल से मनीषा अपने जज्बातों पर काबू पाती हुई बोलने को तैयार हुई.. धीरे से बिस्तेर से उठकर वह दीवार के पास जाकर खड़ी हुई उपर कोने में मकड़ी के जाले की तरफ उंगली से इशारा करके बोलना शुरू किया...," इस मकड़ी को देख रही हो अंजू? कितनी शांत और मासूम सी लग रही है... पर ऐसा है नही... इसकी वीभात्सा और कुत्सित शक्तियाँ इसके द्वारा बुने गये इस जाल में हैं... ये निसचिंत बैठी है... इसके अनुपम और अनोखे जाल के आकर्षण में बँध कर कोई ना कोई शिकार देर सवेर आ ही जाना है... इसका खेल तभी शुरू होगा... इस महीन से धागे से बने जाल में एक बार अगर शिकार फँस गया तो उसका बच कर निकलना असंभव है... शिकार बाहर निकलने के लिए जितना फड़फडाएगा; उतना ही उलझता जाएगा.... उसके बाद ये तुच्छ सी दिखने वाली मकड़ी, जब चाहे, जहाँ से चाहे शिकार के शरीर को नोचेगी... उसके एक एक अंग को पूरे इतमीनान से हजम करेगी.....

ये लोग इस मकड़ी की तरह हैं अंजू! इनकी मक्कारी का पता हम जैसे शिकार को इनके जाल में फँसने के बाद ही चलता है... उमंगों और आशाओं से भरी उभरती जवानी में प्यार होना कोई बड़ी बात नही है... किसी की भी प्यार भरी मुस्कुराहट कमसिन उमर में हमें उसके दिल के करीब ले जाती है... ये लोग अक्सर अपने घिनोने मकसद को पूरा करने के लिए 'प्यार' नाम का इस्तेमाल करते हैं.... प्यार से पैदा होता है सहज विश्वाश... विश्वाश जो हमें 'यार' की खुशी के लिए कुच्छ भी करने पर विवश कर देता है... झिझकते हुए ही सही, पर पहली बार 'उसके' सामने कपड़े उतारने पर भी...

तरुण ने भी मेरे साथ 5 साल पहले ऐसा ही छल किया... तब उसने ऐसा अपने किसी दोस्त के बहकावे में आकर किया था... पर बाद में उसको भी इसमें मज़ा आने लगा... अपनी किस्मत से अकेले ही टकराने का मंन बना चुकी मैं खेतों में काम करने अकेली ही जाती थी ... दिन में भी और कभी कभी रात में भी.... तरुण को लगा मुझे बड़ी आसानी से हासिल किया जा सकता है.. और उसने कर भी लिया... उसकी बड़ी बड़ी मनमोहक बातों के जाल में उलझ कर मैं एक दिन उसके साथ यहाँ तक पहुँच गयी.. बहला फुसला कर तरुण ने मेरे कौमार्य को यहीं पहली बार कमरे के सामने रौंदा था.... ये मुझे बाद में पता चला कि अब मेरी इज़्ज़त तरुण के अलावा किसी और के हाथ में भी है....

बहुत छट-पटाई.. पर कुच्छ भी ना कर सकी... इनके पास मेरे नंगे बदन के फोटो थे... तरुण मेरी कीमत लेकर भाग गया... और मुझे इस दलदल में सड़ने को छ्चोड़ गया... एक दम लचर!

ये जो कहते मुझे करना पड़ता... जहाँ कहते मुझे जाना पड़ता... सोना पड़ता! अपने चक्रव्युवहा में 'ये' लड़कियों को ही नही, तथाकथित इज़्ज़तदार और अमीर लोगों को भी फाँसते हैं.... ट्रेंड करने के बाद हमें उनके पास केमरा च्छुपाकर ले जाने को कहा जाता है... उनके साथ अपनी नंगी तस्वीरें उतारने को कहा जाता है... और फिर हमी से ये लोग उनके पास फोन करवाते हैं... ब्लॅकमेलिंग के लिए....

पहली बार मैं तरुण के कहने पर ही तुम्हे उठाकर चौपाल में ले गयी थी... वो देखना चाहता था कि तुम किस हद तक जा सकती हो..... पर जाने क्यूँ मुझे तुम्हे छ्छूते हुए तुम्हारे अंदर अपना अक्स महसूस हुआ... मुझे तुम्हारे कुंवारे शरीर से 'प्यार' सा हो गया..... मैं तुम्हे वहाँ पहुँचने नही देना चाहती थी जहाँ वो तुम्हे लेकर जाना चाहता था... इसीलिए मैने तुम्हारी 'काम' भावना को खुद ही शांत करने की कोशिश की..... मैं तुम्हारे और करीब आकर तुम्हे सब कुच्छ बता देना चाहती थी.... पर तुम कभी मेरे पास आई ही नही....

मीनू के लेटर्स उसने मुझे रखने के लिए दे रखे थे... उस रात उसने मुझे चौपाल में बुलाकर 'वो' लेटर्स मुझसे माँगे और अपना 'पूरा' प्लान मुझे बताया.... उसके प्लान में तुम्हारा नाम सुनकर मैं बौखला गयी और लेटर्स के साथ एक 'चाकू' भी ले गयी... लेटर्स उसको सौंप कर मैने तुम्हे इस सारे मामले से बचाए रखने की गुज़ारिश की, पर वो हंस कर वापस जाने के लिए पलटने लगा...

और मजबूरन जो सोचकर मैं वहाँ गयी थी, मैने वो कर दिया... बरसों पहले से सीने में धधक रही टीस अचानक पागलपन की लपटों में बदल गयी और मैने पिछे से उसका मुँह दबोच कर दनादन चाकू के वार उसकी छाती और पेट में कर दिए.... मैं बहुत डरी हुई थी.. पर हल्का सा संतोष भी था... अपना बदला लेने का और तुम्हारी जिंदगी बचाने का.....

हड़बड़ाई हुई मैं बाहर निकल कर अपने घर में घुसने ही वाली थी कि चौपाल के गेट पर आकर सोनू इधर उधर टहलता दिखाई दिया... मुझे लगा कहीं उसने मुझे देख ना लिया हो.... कुच्छ देर बाद 'वो' अंदर चला गया और थोड़ी ही देर बाद भागता हुआ बाहर निकला... मैने उसको किसी से कुच्छ ना कहने के लिए रोकने को आवाज़ भी लगाई पर 'वो' नही रुका.....

चौपाल में लोगों की लड़ाई सुन'ने वाली बात मैने इसीलिए फैलाई थी ताकि अगर सोनू ने मुझे देख लिया हो तो मैं कह सकूँ की मैं भी आवाज़ सुनकर ही वहाँ गयी थी.....सब कुच्छ ठीक हो गया था... तरुण को उसके किए की सज़ा मिल गयी और किसी को शक भी नही हुआ... पर फ़ायदा क्या हुआ.. मेरी तो जिंदगी पहले ही बर्बाद हो चुकी थी... जिसको बचाने के लिए मैने 'वो' सब किया... 'वो' आज मेरे सामने यहीं बैठी है..... इस दलदल में......

क्रमशः................ 
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Reply
10-22-2018, 11:37 AM,
#60
RE: Desi Sex Kahani बाली उमर की प्यास
बाली उमर की प्यास पार्ट--45

गतान्क से आगे..................


मनीषा ने अपनी बात करके एक 'आह' सी भरी... उसको एकटक देख रही अंजलि का चेहरा अब तक डर के मारे सफेद पड़ गया था...,"अब मैं क्या करूँ दीदी?"

"अब कर भी क्या सकती है तू? घर वालों की और अपनी इज़्ज़त प्यारी लगती है तो कहीं डूब कर मार जा... तू यहाँ आई ही क्यूँ?" मनीषा ने गुस्से से अपने दाँत पीसते हुए कहा...

अंजलि पर उसकी बात सुनकर मानो घड़ों पानी पड़ गया,"ववो.. दीदी.. हम अपनी मर्ज़ी से यहाँ नही आई थी... ये सीमा है ना; हॉस्टिल में इसी की चलती है बस... ये हमें ज़बरदस्ती ले आई.... मैं तो आना भी नही चाहती थी...!" बुरी तरह शर्मसार हो चुकी अंजलि और कहती भी तो क्या कहती!

"ये यहाँ किसी को ज़बरदस्ती नही लाती... मुझे सब पता है.. अगर तू मुझे पहले बता देती कि तू गुरुकुल में जा रही है तो मैं तुझे पहले ही इसके बारे में बता देती.... ये वहाँ लड़कियाँ छाँटति है और उनको बहला फुसला कर यहाँ लाती है... तू भी इसकी बातों में आकर यहाँ मस्ती करने आई होगी... मुझे पता है...!" मनीषा ने अंजलि को घूरते हुए कहा...

अंजलि की नज़रें उसकी बात सुनकर फर्श में गड़ गयी...,"अब क्या होगा दीदी?"

"होगा क्या? जो ये कहेंगे 'वो' करना पड़ेगा... 'ये' लोग तुझसे अब धंधा करवाएँगे.... पहले मोटे रुपायों में और फिर 2-2 हज़ार तक की नाइट होगी तेरी... तेरी फिल्में बनेंगी, जो ये लोग विदेशों में बेच देंगे.... बाद में तुझसे उन्न लोगों के पास फोन करवाकर पैसे माँगेंगे जिनके साथ तू सोई है... वहाँ से पैसे मिल गये तो इनके.. फँसेगी तो तू! "

"मैने 'बॉस' से गुहार भी लगाई कि 'तुम्हारे' बदले मैं उनका उतना ही 'काम' कर दूँगी... पर 'वो' नही माना... उसको तुमसे कुच्छ ज़्यादा ही उम्मीद है.... बहुत मिन्नत करने पर आख़िर में 'वो' सिर्फ़ इस बात के लिए राज़ी हुआ कि 'आज रात मैं तुम्हारे साथ रह लूँ... अब मैं और क्या कर सकती हूँ बता?... तुमने अपनी जिंदगी बर्बाद कर ली अंजू....!"

"म्‍मैई... मुझे इनस्पेक्टर का नंबर. पता है दीदी... कहीं से फोन मिल जाए तो... क्या तुम्हे मालूम है कि ये जगह कौनसी है...?" अंजलि ने अपने होश अब तक कायम रखे थे.....

"नही...! मुझे क्या; इनके 2-4 खास लोगों के अलावा शायद किसी को भी ठीक ठीक जगह मालूम ना हो.... वैसे भी मैं बहुत दीनो बाद आई थी इनके पास... आज इन्होने मुझे 'फ्री' कर देने के लिए बुलाया था.... तुम्हे भी कोई 'इन्ही' का आदमी लेकर आया होगा ना?"

"हां दीदी... पर सीमा दीदी उसको अच्छे से जानती हैं...!" अंजलि सकुचाते हुए बोली....

"यहाँ कोई किसी को अच्छे से नही जानता पागल... एक आध चेहरे पहचान में आ जाते हैं वो अलग बात है.. वरना हर बार अलग लोग होते हैं... अलग लड़कियाँ... नाम भी तकरीबन नकली ही होते हैं सबके.... 'जो' तुम्हे लेकर आया है.. 'वो' बॉस का ड्राइवर होगा ज़रूर... जवान सा लड़का था ना?"

"हाँ दीदी... पर सीमा दीदी तो हॉस्टिल में ही रहती हैं... उनको तो हम पकड़वा ही सकते हैं....!" अंजलि ने तर्क दिया....

"धीरे बोल! और ये बात यहाँ किसी और के सामने मत कह देना.. जान से जाएगी क्या? ..... और सीमा को पकड़वा देने से क्या होगा...? वो भी 'बॉस' को नही जानती होगी..... तुझे तो ये फिर भी उठा ही लेंगे...."

"पर और लड़कियाँ तो बच जाएँगी ना....." अंजलि ने हताश होकर अपने माथे पर हाथ रख लिया....." कल हॉस्टिल में चाचा जी आएँगे... उनको पता चल गया तो? सीमा दीदी कह रही थी कि हो सकता है हम कल रात वापस हॉस्टिल जायें...!"

*******************************************************

"जी बॉस!" प्रेम ने फोन कान से लगाते ही कहा...

"मैं निकल रहा हूँ... ये मनीषा अंजलि के साथ मिलकर कुच्छ गड़बड़ कर सकती है... मुझे रिस्क नही चाहिए....इसको श्वेता और सीमा के साथ अभी हॉस्टिल भेज दो... कल रात वो अपने आप इसको बाहर निकाल देगी... रेस्ट हाउस के बाद इसके जल्दी जल्दी 10-12 केस ले लो... समझ गये ना!"

"आ.. ठीक है बॉस... पर सीमा को क्या कहूँ...?" प्रेम ने अपने होंटो पर जीभ फेरी...उसको भी अब अंजलि जैसी मादक हुश्न की मल्लिका के यौवन से जल्द ही खेलने की उम्मीद बँध गयी थी.....

"उसको मैने सब समझा दिया है.... डॉन'ट वरी! कल वाला काम ढंग से करना.. तुम ही साथ जा रहे हो उसके!" उधर से आवाज़ फोन पर उभरी....

"ठीक है बॉस.. ववो.. कुच्छ रुपायों की ज़रूरत थी...." प्रेम ज़रा सा हिचका...

"लाख दे रहा है कल मंत्री... रख लेना... सुबह 9:00 बजे मैं नये नंबर. से रिंग करूँगा... उठा लेना...!"

"थॅंक यू बॉस... ववो.. कल रात तो एक 'रेप केस' वाली मूवी का भी भी प्रोग्राम है ना... तो मैं...?"

"वो मैं अपने आप देख लूँगा... तुम अंजलि के साथ रहोगे... जहाँ तक हो सके रेस्टौउसे के अंदर ही रहना....कुच्छ भी गड़बड़ करे तो ठोक देना वहीं.. मंत्री अपने आप संभाल लेगा... मैने उसको भी बोल दिया है...."

"... और हां... कल रात तक मनीषा को भी अपने साथ रख... मेन्ली कल रात तक की ही प्राब्लम है.. उसके बाद तो मंत्री भी इस केस में साथ हो जाएगा... हमसे ज़्यादा फिकर उसको रहेगी फिर अगर कुच्छ पंगा हुआ तो...."

"ठीक है बॉस... मैं समझ गया!" प्रेम ने पूरी बात सुनकर जवाब दिया....

"वेरी गुड!... डॉली को भी बोल देना अभी निकल जाएगी यहाँ से.....!" बॉस ने कहा और फोन काट दिया.....

"हूंम्म... ओके! रात ठीक 7:00 बजे यहीं मिलते हैं...!" प्रेम ने सीमा को गुरुकुल के खेल के मैदान वाले गेट पर लाकर गाड़ी रोकते हुए कहा...

"आहान... मैं फोन करती हूँ दोपहर तक...!" सीमा उतरते हुए अचानक ठिठक कर बोली....

"फोन का क्या मतलब है...? फाइनल हो तो गया... मुझे 7:30 तक 'बेबी' को वहाँ लेकर जाना है...!" प्रेम ने अंजलि की और आँख मारी...

"हां ठीक है... कहा ना फोन करती हूँ तुम्हे...!" सीमा ने जल्दी से कहा और दोनो लड़कियों को लेकर नीचे उतर गयी... गेट्कीपर थोड़ा सा दरवाजा खोलकर उनके अंदर आने का इंतजार कर रहा था....

"सीमा मॅ'मसाब्, वो लड़की तो आँखें दिखाने लगी है अब.. आप किसी दूसरी से बात करवा दो मेरी...." गेट्कीपर भूना बैठा था...

"तेरी ही ग़लती है..."सीमा तुनक कर बोली..,"तू उसको टोकते हुए ये भी नही देखता कि उसके साथ दूसरी लड़की कैसी है... ये गुरुकुल है यार.. रंडी-खाना थोड़े ही है... अकेले में टोकता था तो क्या मना करती थी तुझे....?"

"फिर भी मॅ'मशाब... उस'से मेरी नही बनेगी अब... आप किसी और से टांका भिड़-वाओ अब... वो तो वैसे भी 'तोती' हो गयी है....!"

"अब ज़्यादा भाव मत खा... कल फ़ुर्सत से बात करूँगी...!" सीमा ने उसको घूरते हुए कहा और आगे निकल आई...

"दीदी... एक मिनिट...!" सीमा अंजलि और श्वेता के पास जाकर आगे बढ़ने लगी तो अंजलि ने उसको रोक लिया....

"जल्दी चलो यार... नींद आ रही है...!" सीमा उनके पास ठिठक कर बोली....

"नही, पहले मेरी बात सुनो दीदी! कमरे पर पिंकी होगी... वहाँ बात नही कर पाउन्गि मैं....!" अंजलि ने वहीं खड़े खड़े कहा.....

"हुम्म... क्या टेन्षन है यार...!" सीमा मुँह पिचका कर बोली और फिर श्वेता की ओर देखा,"तू चल... 44 में जाकर बोल देना कि हम आ गये हैं... जा जाकर सो ले!"

"ठीक है दीदी...!" मारी सी आवाज़ में श्वेता ने जवाब दिया और वहाँ से चली गयी......

"हां... अब बोल! क्या परेशानी है?" सीमा अंजलि का हाथ पकड़ कर बोली....

"म्‍मैइन... मैं आज के बाद कहीं नही जाउन्गि...!" अंजलि ने थोडा हिचक कर कहा....

"ठीक है.. मत जाना... आज तो जाएगी ना?" सीमा ने प्यार से पूचछा....

"नही... कभी भी नही... आज क्यूँ जाउन्गि मैं...?" इस बार अंजलि का सुर कुच्छ तल्ख़ था.....

"आए... क्या समझती है तू खुद को.. कभी भी नही जाना था तो कल रात क्यूँ गयी थी...?" सीमा अचानक गुर्रा पड़ी....

"आपने कहा था कि हम सिर्फ़ मौज मस्ती के लिए जा रहे हैं... 'वहाँ' तो कुच्छ और ही मामला था....!" अंजलि ने थोडा रुक कर सोचने के बाद कहा....

"क्या मामला था वहाँ बता...? तेरे को किसी ने कुच्छ कहा भी था... श्वेता कहती तो मैं मान भी लेती... तू तो कोरी की कोरी आई है ना वहाँ से... बात करती है!"

"पर वो... वो वीडियो क्यूँ बना रहे थे....?" अंजलि ने अपने विरोध की वजह बताई....

"तो क्या हो गया यार... थोड़े से एंजाय्मेंट के लिए... अगर बना भी ली तो.... खाली मज़े के लिए यार... जस्ट फॉर फन... आजा...!"

"नही... आप झूठ बोल रही हो... 'ये' उनका धंधा है... 'उसकी धमकी देकर बार बार बुलाएँगे 'वो' मुझे वहाँ.....!"

"किसने बोला तुझे... बोल किसने बोला... उस कुतिया मनीषा ने भड़काया होगा... है ना?" सीमा तैश में आकर बोली....

"नही... ये सच है!" अंजलि रट लगाए बैठी थी.....

"हाँ सच है... तो? क्या उखाड़ लेगी तू उनका.. बता? तुझे यहाँ से कोई ज़बरदस्ती उठाकर तो नही ले गया था ना....? 'तेरी' में खुजली हुई तो तू गयी... अब उनका 'जी' करेगा तो 'वो' बुला लेंगे... 'जाना' तो तुझे पड़ेगी ही 'बेबी'... और ध्यान से सुन ले... हॉस्टिल के बाहर तेरा नाम बेबी है... समझ गयी...!" सीमा ने इस बार गुर्रकार कहा था....

"पर... पर मैं कह तो रही हूँ दीदी अब मैं नही जाना चाहती... एक बार ग़लती हो गयी... मुझे माफ़ कर दो....!" सीमा का लहज़ा सुन कर अंजलि का रोम रोम काँप सा उठा था....

सीमा ने अपने आवेगॉन पर काबू पाने के लिए एक गहरी साँस छ्चोड़ी...," क्या घिसता है यार... पैसे भी मिलेंगे तुझे...इतने मिलेंगे कि तू ऐश करेगी.... उस जिंदगी का अपना ही मज़ा है... जी कर देख एक बार.... मुझे देख... ऐश है ना मेरी....," सीमा ने झुक कर अपनी जांघों के बीच उंगली टिकाई,"खाली इसके दम पर... गुरुकुल मेरी किसी बाप वाप का नही है... उस 'साले' बुड्ढे को तो कयि बार निचोड़ा है मैने... और ना ही मैं किसी 'प्रिन्सिपल' मेडम की बेटी हूँ.... मेरी तरह जीकर देख... ऐश करेगी ऐश!"

"नही दीदी.... मैं नही करना चाहती ऐश.... आप किसी और को ढूँढ लो....!" अंजलि अब भी टस से मस नही हुई थी....

"ठीक है...." सीमा ने आँखें दिखाई...,"चल... रूम पर जाते ही बोल देती हूँ उनको कि तू मना कर रही है.... फिर देखना क्या करेंगे तेरे साथ... इज़्ज़त से भी जाएगी और जान से भी.... क्या करेगी तू... घर चली जाएगी...? तेरी फिल्म देखी थी मैने... कैसे आँखें बंद करके चूस रही थी तू 'प्रेम' का....तेरी मा चोद देंगे 'वो'... बहुत बड़े बड़े लिंक हैं उनके... चल आजा.. अभी मना कर देती हूँ... चल मेरे साथ!"

"प्लीज़ दीदी..." अंजलि उसकी बातें सुनकर घुटनो के बाल आ गयी...,"मुझसे ग़लती हो गयी... मुझे बचा लो ना दीदी.... प्ल्ज़..." अंजलि की आँखों से निर्झर अश्रुधारा बह रही थी.....

"खड़ी हो जा यार... ऐसे नाटक करने से कुच्छ नही होता... चल ठीक है... आज वाला 'काम' कर दे... फिर मैं रिक्वेस्ट करके देखूँगी... पर किसी को कुच्छ भी बोला तो फिर मुझे मत कहना कुच्छ भी.......! एक दिन मैं तो कुच्छ नही होता.... ऐसे भी तू सलीम से चुदने को भी तो बोल रही थी.....!" सीमा ने उसको एक बार फिर प्यार से पटरी पर लाने की कोशिश की.....

अंजलि के पास उसकी बात का कोई जवाब नही था... ना ही उसके पास ज़्यादा विकल्प थे...,"आज कहाँ जाना है दीदी?"

"चल शाबाश! आ खड़ी हो जा.... सब समझाती हूँ..." सीमा ने उसको खड़ी करके उसके गले में बाँह डाली और हॉस्टिल की तरफ चल पड़ी......

******************************************

"पता है मैं कितनी डरी हुई थी... कहाँ गयी थी तू? क्या हुआ?" अंजलि के रूम में घुसते ही पिंकी उठकर उसकी ओर लपकी....

मुरझाया हुआ चेहरा लिए अंजलि चुपचाप आकर बिस्तर पर लेट गयी और लेट'ते ही दूसरी ओर करवट ले ली.....

"बता ना अंजू, क्या हुआ? तू रो रही है क्या?" पिंकी उसके चेहरे के भावों को पढ़ने की कोशिश करती हुई दूसरी तरफ कूद गयी....

"कुच्छ नही यार... पार्टी थी छ्होटी सी... सोने दे अब.... मुझे नींद आ रही है....!" अंजलि ने आँखें बंद किए हुए ही जवाब दिया... पिंकी ने हताश होकर सीमा की ओर देखा तो 'वो' मुस्कुरा दी....

"दीदी आप ही बता दो... क्या हुआ अंजू को?" पिंकी ने सीमा से सवाल किया....

"कुच्छ नही.. होना क्या था... जब तू अपने यार के साथ जा सकती है तो क्या ये नही जा सकती... ये भी तो जवान है यार..." सीमा ने कहकर पिंकी की ओर आँख मटका दी.....

"म्मै... मैं कब गयी हूँ दीदी..?" पिंकी सकपका सी गयी....

"तू बोल तो रही थी आज जाने की... कॅन्सल हो गयी क्या?" सीमा बेशर्मी से पिंकी के आगे ही कपड़े चेंज करने लगी तो पिंकी ने ही शर्मकार अपनी नज़रें झुका ली...,"ववो.. वो तो दीदी... हम तो बस ऐसे ही... हम कुच्छ ग़लत थोड़े ही करेंगे...!"

"तो ये कौनसा 'धंधा करके आई है.... ये..भी...तो...ऐसे...ही... हा हा हा हा..!" सीमा ने बोलकर अट्टहास किया.....

"नही दीदी... मैने ऐसा नही कहा... पर ये रो क्यूँ रही है....?" पिंकी ने सकपका कर बात पलट दी.....

"कुच्छ नही यार... हम पार्टी अधूरी छ्चोड़कर आ गये... इसीलिए मन उदास है इसका.... अब सारी रात तो पार्टी नही कर सकते ना.... मैने बोला है इसको... आज फिर भेज दूँगी....!" सीमा ने सहज भाव से जवाब देकर पिंकी की जिगयसा को शांत कर दिया.....!"

"तुम आज फिर जाओगी अंजू... यहाँ कौन संभालेगा...? आज तो मुझे भी जाना है...!" कुच्छ देर शांत पड़ी रहने के बाद जब पिंकी से रहा ना गया तो उसने एक बार फिर उस'से दूसरी और करवट ले चुकी अंजलि को अपनी तरफ पलटने की कोशिश करते हुए धीरे से कहा.....

बुरी तरह परेशन अंजलि अचानक चिड सी गयी,"कहा ना नींद आ रही है मुझे... मुझसे बात मत कर वरना...."
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"अरी मीनू.. जल्दी कर ना.. बस निकल जाएगी...!" मीनू की मम्मी खिसियाहट में बाथरूम का दरवाजा पीट'ते हुए बोली.....

"बस आई मम्मी... 2 मिनिट और...!" मीनू बाथरूम के अंदर एक दम तैयार बैठी थी... पर पता नही क्या वजह उसको बाहर निकलने से रोक रही थी....

"पता नही ये लड़की भी... एक घंटा हो गया गुसलखाने में घुसे हुए..." मीनू की मम्मी बड़बड़ाते हुए एक बार फिर दरवाजा पीटने लगी,"जल्दी निकल ले बाहर... तेरे पापा नीचे गुस्सा हो रहे हैं... पिंकी इंतजार कर रही होगी सुबह से... बस निकल गयी तो 2 घंटे से पहले कुच्छ नही मिलेगा...!"

"आ...हाँ.. आ गयी मम्मी...!" मीनू मुरझाए चेहरे के साथ बाहर निकली और निकलते ही घर की मुंडेर पर खड़ी होकर नीचे झाँकने लगी.....

"अरी अब वहाँ से क्या देख रही है... जल्दी चल... सुबह उठते ही तैयार होने लगी थी... !" मम्मी मीनू को लगभग खींचते हुए बोली....

"हाँ..ववो.. मम्मी... हम अगली बस से नही चल सकते क्या?" मीनू कुच्छ बेचैन सी लग रही थी.....

"तू पागल है क्या? एक बस तो पहले ही निकाल दी... अगली बस से जाएँगे तो आते वक़्त कुच्छ नही मिलेगा.... चल जल्दी....!"

"एक मिनिट मम्मी... शायद आ...!" मीनू नीचे किसी गाड़ी का हॉर्न सुनकर कुच्छ बोलने लगी थी कि बीच में रुक कर वो एक बार फिर मुंडेर की तरफ भागी...,"ववो... वो मानव... आया है शायद...मम्मी!" मीनू ने कहकर नज़रें झुका ली...

"मानव? कौन मानव...?" मम्मी कहकर मुंडेर की तरफ लपकी...,"हे भगवान... सत्यानाश हो इस इनस्पेक्टर का... ये हमारा पीचछा क्यूँ नही छ्चोड़ रहा... आज मुझे इसको सॉफ सॉफ बोलना पड़ेगा... तू यहीं रह.. मैं आती हूँ...!" मम्मी भड़कते हुए बोलकर पलटी ही थी कि अचानक वापस मूडी..,"ययए.. आज किसको साथ लेकर आया है...?"

"प्पा..पता नही मम्मी... आप पहले कुच्छ मत बोलना... उनकी बात सुन लेना पहले...!" मम्मी को नीचे जाते देख मीनू ने उनको हिदायत दी और उनके जाते ही दीवार के साथ लगकर अपनी आँखें बंद करके सपना सा लेने लगी... मधुर मिलन का सपना.....!

**********

"जी... नमस्ते आंटी जी..!" मानव मीनू की मम्मी को नीचे देखते ही चारपाई से खड़ा हो गया...,"ये... ये मेरे मम्मी डॅडी है..!" मानव ने कहा और फिर अपने मम्मी पापा से मुखातिब हुआ,"मम्मी.. ये....!"

"हां..हां... अब तू आराम से बैठ जा... इतना उतावला क्यूँ हो रहा है...!" पापा ने मज़ाक करते हुए मानव की बाँह पकड़ कर खींच ली और फिर हाथ जोड़कर मीनू की मम्मी का अभिवादन स्वीकार किया...

मीनू की मम्मी और पापा दोनो पशोपेश में थे... उनकी समझ में अब तक कुच्छ आया नही था... मम्मी तो अभी तक उलझन में हाथ बाँधे खड़ी थी...,"ज्जई...!"

"बैठिए ना... किसी जल्दी में हैं क्या?" मानव की मम्मी ने खड़ी होकर मीनू की मम्मी के पास आते हुए कहा....

"हाँ.. ववो हमें छ्होटी के पास जाना था.. गुरुकुल में...!" मम्मी ने सकुचाते हुए बताया...

"क्या? पर... आज तो... मीनू बिटिया ने कुच्छ बताया नही क्या?" मानव के पिताजी थोड़ी असमन्झस में पड़ गये....

"क्या? उसने क्या बताना था...!" मीनू के पापा ने लंबी साँस छ्चोड़ते हुए पूचछा....

"ओह.. खैर..." मानव के पिताजी ने खंगार कर अपना गला साफ किया...,"ववो हम... दरअसल हम अपने बेटे के लिए आपकी बेटी का...." उन्होने इतना ही कहा था की प्रस्ताव में छिपे भाव को समझकर मीनू के मम्मी पापा की आँखें चमक उठी... हड़बड़ाहट में उसके पिता भी चारपाई से उठ खड़े हुए...," अरे... यहाँ क्यूँ खड़ी हो.. मीनू को बोलो ना कुच्छ चाय पानी के लिए...!"

"मैं... अभी आता हूँ...!" मीनू की मम्मी के मुस्कुरकर उपर चढ़ते ही पापा भी उसके पिछे पिछे हो लिए... मम्मी अभी जीने में ही थी...,"मीनू की मम्मी.. मैं तो खुशी से फूला नही समा पा रहा हूँ... कितना अच्च्छा रिश्ता आया है.. अपनी बेटी के लिए...!"

"हाँ पर ये सब कैसे...?" दोनो अब उपर आ चुके थे.. कसमसाहट में मीनू बार बार उनकी नज़रों से बचने के लिए इधर उधर छिप्ने की कोशिश कर रही थी..,"रिश्ता लेने तो लड़की वाले जाते हैं ना...?" मम्मी इसी दुविधा में थी....!"

"वो जमाना गया अब... तुम नही समझोगी.. 'ये' लव मॅरेज है....!" कहकर उसके पापा खिलखिलाकर हंस पड़े.. उन्हे कहाँ अहसास था कि उनकी हँसी मीनू के दिल में सावन की बादलों की तरह बरस रही है....,"मीनू को बोलो जल्दी से तैयार होकर नीचे आ जाए...!"

"वो तो तैयार ही है... अब कहाँ चली गयी...? पर हम पिंकी के पास नही गये तो वो आसमान सिर पर उठा लेगी....!" मम्मी ने याद करते हुए कहा....

"कुच्छ नही होगा.... उसको बताएँगे तो 'वो' भी बहुत खुश होगी... वहाँ अगले हफ्ते चल पड़ेंगे... मीनू को बोल देना उसके पास फोन कर लेगी... मैं नीचे जा रहा हूँ... तुम भी जल्दी आओ!"

***********************

"हेलो.. पिंकी है?" मीनू ने फोन करके पूचछा....

"तुम कौन?" सीमा ने कड़क आवाज़ में बिस्तर में पड़े पड़े पूचछा....

"मैं.. उसकी बेहन मीनू!"

"अच्च्छा.. एक मिनिट होल्ड करके रखना...वो बाहर खड़ी इंतजार कर रही है सुबह से तुम लोगों का...." सीमा ने ज्योति को आवाज़ लगाकर अपने पास बुलाया...,"ये फोन पिंकी को दे आ...!"

"पिंकी.... घर से तुम्हारा फोन है...?" ज्योति ने फोन पिंकी के हाथ में थमाते हुए बताया.....

मोबाइल स्क्रीन पर घर का नंबर. देखते ही पिंकी की थयोरियाँ चढ़ गयी....,"हेलो!"

"हाँ.. पिंकी!" मीनू की आवाज़ में एक अलग ही कशिश थी....

"मुझे तुम से बात नही करनी... तुम क्यूँ नही आई साथ में... ? मम्मी पापा भी अभी तक नही पहुँचे...!" पिंकी की आवाज़ में नाराज़गी और गुस्सा सॉफ झलक रहा था.....

"हाँ.. ववो.. सुन तो....!" मीनू समझ नही पा रही थी कि अपनी खुशी को पिंकी के साथ कैसे बाँटे....!

"नही.. पहले बताओ, तुम क्यूँ नही आई साथ में....!" पिंकी की आवाज़ अब भी उतनी ही तल्ख़ थी....

"सुन तो ले.. मेरा रिश्ता पक्का हो गया... लंबू से.. हे हे हे...!"

"क्याआआ... सच!" पिंकी सब कुच्छ भूल कर उच्छल पड़ी...,"तुम्हे कैसे पता...?"

"पागल.. वो आए थे आज.. मम्मी पापा के साथ.. मुझे देखने... मैं उन्हे बहुत पसंद आई.. हे हे हे...!"

"ओह्हो... अब तो वो 'वो' हो गया.... 'लंबू' तो लंबू ही रहेगा.. मैं इज़्ज़त से नही बोलूँगी उसको हाँ.. हे हे हे....!" पिंकी के पैर ज़मीन पर नही थे...,"मम्मी पापा चल पड़े क्या?"

"नही ववो..."

"ठीक है.. कोई बात नही... अब तुम भी साथ आना.. मुझे तुमसे बहुत सारी बातें करनी हैं....!" पिंकी को अब कोई गिला नही था....

"ववो.. पिंकी... अभी भी 'वो' यहीं बैठे हैं... पता नही आज आ पाएँगे या नही...!"

"ये क्या बात हुई...?" पिंकी का चेहरा एक पल के लिए मुरझा सा गया...,"फिर तो तुम एक हफ्ते बाद ही आओगे... है ना?"

"नही.. वो.. पापा कह रहे थे कि कल आ जाएँगे... कल भी स्कूल की छुट्टी है ना...!"

"चल कोई बात नही.. अब तू फोन रख दे... मैं अंजू को बता दूँ...!" पिंकी सहज होकर बोली....

"ठीक है.. मैं बाद में फोन कर लूँगी...!" कहकर मीनू ने फोन रख दिया....

**********************************

मीनू के फोन रखते ही पिंकी ने मौके का फ़ायडा उठाते हुए पहले हॅरी के पास फोन कर लिया...,"हेलो!"

"हाँ पिंकी... मैं बस तुम्हे फोन करने ही वाला था.... बड़ी याद आ रही थी तुम्हारी...!"

"रहने दो रहने दो... पता है.. दीदी का रिश्ता पक्का हो गया... आज ही उसको देखकर गये हैं..!" पिंकी ने खुश होकर बताया....

"क्या?" हॅरी ने हल्क से आस्चर्य के साथ पूचछा..,"किसके साथ...?"

"है एक लंबू...! तुम छ्चोड़ो... ये बताओ तुम कब आ रहे हो...?"

"आज रात ही... मुझे सब याद है जान... बड़ी बेशबरी से इंतजार कर रहा हूँ... 10 बजे का...!" हॅरी ने अपनी बेकरारी का परिचय दिया....

"ऐसे नही पागल!" पिंकी तुनक कर बोली....

"और कैसे?"

"जैसे लंबू आया है.. अपने घर वालों को लेकर... ऐसे!"

"ओह्ह... पर अभी तो तुम शादी के लायक नही हुई हो...!" हॅरी ने चटखारा लिया....

"अच्च्छा जी... फिर मुझसे 'क़िस्सी' क्यूँ माँगते हो.. शादी के लायक नही हुई हूँ तो...!" पिंकी ने इठलाते हुए पूचछा....

"पर तुम देती कहाँ हो...?"

"क्यूँ...? पिंकी ने फोन पर ही हॅरी को आँखें निकाल कर दिखाने की कोशिश की...,"ली तो थी गेस्ट रूम में...!"

"वो कोई 'क़िस्सी' थी... तभी तो कह रहा हूँ अभी तुम बच्ची हो.. जब बड़ी हो जाओगी तो मैं भी अपने घर वालों को ले आउन्गा....!" हॅरी मज़ाक में बोला....

"पक्का ना?" पिंकी खुश हो गयी... फोन पर ऐसी बातें करने में उसको 'वो' शर्म नही आ रही थी जो आमने सामने खड़े होने पर आती थी..,"आज जैसे चाहो ले लेना... फिर तो ले आओगे ना अपने मम्मी पापा को...?"

"हाँ.. प्रोमिस!" हॅरी खुश होकर बोला....

"ठीक है... दीदी मुझे 9:30 बजे पिच्छले गेट से बाहर निकल देंगी.. तुम वहाँ पहले से तैयार मिलना... ठीक है ना?"

"ठीक है... कुच्छ भी कर लूं ना आज?" हॅरी ने उसको छेड़ा...

"ऐसे बोलॉगे तो मैं नही आउन्गि...!" पिंकी ने कहते ही फोन काट दिया..... उसके गालों पर हया का गुलबीपन पसर गया था....

क्रमशः................

गतान्क से आगे..................
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